Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2865, दिनांक 29.04.2019
VCD 2865, dated 29.04.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.2019
VCD-2865-Bilingual-Part-2

समय- 16.59-35.17
Time- 16.59-35.17


तो बाप बैठकर के बच्चों को समझाते हैं कि ये बाप है, ऊंच ते ऊंच है ना? तो वो कहते हैं। हे बच्चों, तुम सो पूज्य थे देवी देवता। तुम सो 84 जन्म भोगने के बाद जैसे समझाया गया है कि कैसे तुम 84 जन्म की सीढ़ी नीचे उतरते हो? तो तुम सो फिर पुजारी बनते हो। और लिखा हुआ भी बरोबर - तुम सो पूज्य। भारत जब पूज्य, तो बरोबर जब भारत पूज्य था, तो उसको कहा ही जाएगा भारत में पूज्य देवी-देवताएं थे। तो देवी-देवताओं को ही पूज्य कहा जाता है। हां, जानते हो कि देवी-देवताओं की ही पूजा करते हैं। उनको ही मत्था टेकते हैं। ब्रह्मा की कोई पूजा करते हैं? माथा टेकते हैं? नहीं, दुनिया वाले थोड़ी माथा टेकते। ये तो बस उनके अंडर में जो पलने वाले हैं वो ही उनको मत्था टेकते हैं। हँ? पुष्कर में जाओ, देखो, वहां उनकी कौन पूजा करते हैं? वो पुष्कर में जो रहते हैं वो ही पूजा करते हैं। बाकी दुनिया में तो कोई नहीं करता ना। हां, तो ज़रूर देवताओं को ही मत्था टेकते हैं।

तो तुम नई दुनिया सतयुग में पूज्य हुए ना, बरोबर पूज्य। तो कौन उनको कहते हैं तुम पूज्य? हां, मनुष्य ही कहते हैं। कब? जब वो ही देवताएं नीचे गिर जाते हैं, हँ, उनका मन चंचल हो जाता है, हँ, तो कहते हैं। हाँ। भूल गए हैं। तो जो भूल गए हैं अपन को कि हम ही सो पूज्य थे, सो ही पुजारी बने हैं। क्योंकि बच्चों को समझाया गया है कि जो पूज्य सो ही पुजारी बनते हैं। मैं तो न पूज्य बनता हूं और न पुजारी बनता हूँ। नहीं तो 84 का हिसाब कहां से निकले? पूज्य से निकले। सो पुजारी अंत तक पुजारी ही आवेंगे। पूज्य को कहेंगे सतोप्रधान। सतयुग होता ही है सतोप्रधान। पुजारी को कहेंगे तमोप्रधान। कलियुग में सब तमोप्रधान। अभी तो जो पुजारी की ग्रेड कम है ना बच्चे, ये मनुष्य को मालूम नहीं है कि पुजारी की ग्रेड बहुत कम है। और देवताओं की ग्रेड तो बहुत ऊंचे से ऊंची। एक से एक ऊंची कला के देवता। और फिर 16 कला संपूर्ण देवताओं से भी ऊंचा देवता विष्णु को कहते हैं ना? हाँ।

तो, इसलिए देखो ये शंकराचार्य हैं। अभी किसकी पूजा करते हैं? मनुष्य के बीच में ही हैं ना? किसकी पूजा करते हैं? हँ? शिव की पूजा करते हैं। अभी कलियुग का तो अंत तो आ ही गया। और ये करते हैं शिव की पूजा। अच्छा, ये शिव की पूजा करते हैं। और इनको और तो कुछ मालूम ही नहीं है। दुनिया के लिए और कुछ मालूम ही नहीं है। इनको ये भी शिव को भी जानते तो कुछ भी नहीं है बिल्कुल। ये शिव कौन है जिसकी पूजा करते हैं? नहीं तो जिसकी पूजा करनी चाहिए उनके ऑक्यूपेशन को तो जानना चाहिए। हँ? जानते हैं? अरे, पूजा करते हैं और उसके ऑक्यूपेशन को जानते होते तो फिर वो जब बाप आते हैं तो फिर उनसे टकराते? हँ? नहीं टकराते। क्यों? ये कहते कि आग और कपूस इकट्ठे रह नहीं सकते? नहीं कहते। वो जानते ही नहीं है कि बाप का ऑक्यूपेशन क्या है? भला वो तो समझ सकें ना कि बरोबर वो ज्ञान का सागर ये है। कौन? कौन ये है? हँ? ज्ञान का सागर कौन है? हँ? ये है। ये माने? वो नहीं ऊपर। हाँ, जिसमें प्रवेश करते हैं वो है ज्ञान का सागर। हँ? कि क्या कहेंगे? ज्ञान सूर्य कहेंगे? नहीं। सूर्य तो डिटैच होके रहता है। ये ज्ञान का सागर है। सागर तो धरणी से अटैच होके रहता है।

तो जो ज्ञान का सागर है वो पतित-पावन ये है। क्या? जब पूजा करते हैं तब इनको बुद्धि में ये थोड़ेही होगा कि ये ज्ञान का सागर है, हँ, ये सुख का सागर है, ये पतित पावन है। ऐसे कोई-कोई की बुद्धि में थोड़ेही होता है। बिल्कुल नहीं होता है एकदम। बस, जैसे ऑर्डिनरी मनुष्य होते हैं ना और वो शिव की पूजा करते रहते हैं क्योंकि वो तो जानते ही हैं ऊंचे से ऊंचा भगवान है। होकरके गए हैं ये इनको नहीं मालूम है। कि भगवान होकरके गए हैं ये इनको मालूम ही नहीं है। अगर होकरके गए हैं तो फिर कहें मल्टी-मिलियन इयर्स हुए कि हो गए हैं जबकि मनुष्य सृष्टि, हं, मनुष्य सृष्टि रच करके गए हैं तो कितना टाइम हुआ? बताएं एक्यूरेट। समझा ना बच्ची? तो इनका जो भी एक-एक बात है वो सब बड़े-बड़े लंबे-चौड़े गपोड़े हैं, एक के पीछे एक। समझा ना? और ये सब हैं इनके जटपने के गपोड़े। क्योंकि ये इडियट ऐसे कहते हैं। लिखा जाता है ना जैसे सृष्टि चक्र के आदि, मध्य, अंत ड्यूरेशन को नहीं जानते।

ये, ये बाबा बहुत दफा कहते आए हैं ना। परंतु बच्चे योगयुक्त न होने के कारण ये भूल जाते हैं। योग में होवें, हँ, आत्मा प्योर होवे, तो छापा भी लगे। प्योरिटी में न होने से ऐसे बहुत हैं ये जो भी म्यूजियम बनाते हैं, ये सब कुछ करते हैं इनमें कोई भी योगयुक्त तो हैं नहीं। क्या? ज्ञान के गपोड़े बहुत हैं लंबे-चौड़े, जैसे उन सन्यासियों में बहुत लंबे-चौड़े गपोड़े हैं वैसे इनमें भी। बहुत अच्छी तरह से। ज्ञान अच्छा बैठकर के समझाएगा जो ज्ञान बाबा बैठकर के समझाते हैं 84 की कहानी बहुत अच्छी समझेंगे। उनके दिल में भी धारण है जो समझेंगे। बाकी हम आत्मा है और हमको बाप को याद करना है और हम बहुत छोटी सी आत्मा बिंदी हैं। वो कोई में भी नहीं जो म्यूजियम रचते हैं, जो इतना खर्चा भी करते हैं, तो वो सब व्यर्थ हो जाते हैं वास्तव में। ये जो पहले मुख्य बात चाहिए। क्या? योग की। जिस याद से कुछ सद्गति हो सकती है। अगर याद नहीं है तो उनकी कोई सद्गति पूरी नहीं कहेंगे। और सद्गति कहा जाता है सौ परसेंट सद्गति। सद्गति ऐसे अक्षर नाम नहीं है सौ परसेंट सद्गति। हँ? कहते हैं ना सौ परसेंट प्योरिटी, पीस एंड प्रोस्पेरिटी। किसकी है सौ परसेंट पीस एंड प्रोस्पेरिटी, प्योरिटी? सद्गति किसकी है सौ परसेंट? वो तो अभी किसी की भी नहीं हुई है। न उनकी है ही बाबा कहते हैं। तो पीछे देखो ये बड़े-बड़े ये तो बाबा कहते हैं ये बच्चे हैं तो योग तो है नहीं। बाकी बच्चे ये, ये पंडित जैसे ट्रां-ट्रां करने वाला क्योंकि सिखलाते तो उनको कोई बात हैं। बिल्कुल ही अच्छी बात सिखलाई जाती है। बाकी याद बिगर तो कुछ भी काम की बात नहीं। बिल्कुल ही बुद्धि में नहीं बैठता।

योग बिगर मनुष्य कोई काम के मत पूछो। तूफानों में लटकते रहते हैं, झगड़ते रहते हैं, मरता रहेगा, फिरता रहेगा, यानी लड़ता भी रहता है। हँ? इससे लड़ता, उससे लड़ता, ये ऐसे करता, वो वैसे करता। है ना? कि कोई ना कोई अच्छा, अच्छा, चलो क्रिमिनल आई तो कहेंगे। हँ? कि हमारी क्रिमिनल आई। बाबा मानेंगे भी नहीं कि कोई कहे कि हमारी क्रिमिनल आई अब नहीं है। एकदम नहीं मानेंगे। हां, क्रिमिनल आई को सिविल आई बनाना और ये समझना कि बाबा हमको तीसरा नेत्र देते हैं। हँ? वो तो मुझे आत्मा सम दृष्टि; समदृष्टि माना ये तो सभी आत्माएं हैं। क्या? देह दृष्टि नहीं जाना चाहिए। आत्मा आत्मा भाई भाई हैं। एक परमपिता परमात्मा की, बाप की, हँ, संतान हैं। हैं ना? अभी भाई भाई जब समझेंगे, बहन भाई वरी कहां से या स्त्री कहां से आये? नहीं, हम तो भाई भाई हैं ना। आत्मा आत्मा भाई भाई। तो जो सम दृष्टि भी तब हो जब भाई भाई बनें। नहीं तो अपनी देह की तरफ बुद्धि चली जाती है। मैं भाई, ये बहन। अगर भाई को बहन या बहन को भाई, वो पति और पत्नी देखने में आएंगे, तो वो तो बहन भाई, भाई भाई और फिर बहन भाई, वो हुए थोड़ेही? कैसे हुए? 22.11.1967 की प्रातः क्लास का तीसरा पेज, पांचवी लाइन। प्रजापिता ब्रह्मा की तुम कहते हो ना ब्रह्माकुमार कुमारी। यूं तो प्रजापति ब्रह्मा के तुम ब्रदर्स तो नहीं हो। तुम तो बच्चे हो। जब प्रजापिता ब्रह्मा होते हैं तो ब्रह्मा कुमारी और कुमार होते हैं। जब शिव बाबा के बच्चे हो तो सभी क्या हुए? अरे? अरे, कुमार हुए। कुमारी नहीं। जब शिव बाबा के बच्चे हो तो सभी कुमार। ऐसे कहेंगे। है ना? बच्चे ठहरे, बच्चियां थोड़ी। हँ? कि बच्चियां भी? शिव बाबा के? क्या कहेंगे? बच्चे। ओम शांति। (समाप्त)

So, the Father sits and explains to the children that this is the Father; He is highest on high, isn’t He? So, He says – O children, you were worshipworthy (poojya) deities. After getting 84 births you, just as it has been explained that how you descend the Ladder of 84 births. So, you then become worshippers (pujaari). And it has also been rightly written – You were worshipworthy. When Bhaarat (India) was worshipworthy; so, rightly when Bhaarat was worshipworthy, then it will be said that there used to be worshipworthy deities in Bhaarat. So, it is the deities alone who are called worshipworthy. Yes, you know that people worship the deities only. People bow their foreheads before them only. Does anyone worship Brahma? Do they bow their forehead? No, the people of the world do not bow their forehead. It is only those who get sustenance under him bow their foreheads before him. Hm? Go to Pushkar, observe, who worships him there? Only those who live in Pushkar worship him. Nobody in the rest of the world worships him, do they? Yes, so people definitely bow their forehead in front of the deities only.

So, you were worshipworthy in the new world, the Golden Age; you were rightly worshipworthy. So, who says to them that you are worshipworthy? Yes, it is the human beings only who say. When? When the same deities suffer downfall, when their mind becomes inconstant, then they say. Yes. They have forgotten. So, those who have forgotten themselves that we ourselves were worshipworthy, and we ourselves have become worshippers. It is because children have been explained that those who are worshipworthy become worshippers. I neither become worshipworthy nor do I become a worshipper. Otherwise, how will the account of 84 emerge? It will emerge from the worshipworthy. So, worshippers will come as worshippers only till the end. Worshipworthy will be called satopradhan. The Golden Age itself is satopradhan. Worshippers will be called tamopradhan. Everyone is tamopradhan in the Iron Age. Now the grade of the worshippers is less, isn’t it children? These human beings do not know that the grade of the worshippers is very less. And the grade of the deities is very highest on high. There are numberwise deities who have celestial degrees higher than each other. And then Vishnu is called a deity higher than the deities who are perfect in 16 celestial degrees, isn’t he? Yes.

So, this is why look there are these Shankaracharyas. Whom do they worship now? They are present among the human beings only, aren’t they? Whom do they worship? Hm? They worship Shiva. Now the end of the Iron Age has come. And they worship Shiva. Achcha, they worship Shiva. And they do not know anything else at all. They do not know anything else about the world at all. They do not even know anything about Shiva at all. Who is this Shiva whom they worship? Otherwise, they should know the occupation of the one whom they should worship. Hm? Do they know? Arey, they worship and had they known about His occupation then would they have clashed with the Father when He comes? Hm? They would not clash. Why? Would they have said that fire and hay cannot live together? They wouldn’t say. They do not know at all that what is the occupation of the Father? They should understand as to that ocean of knowledge is rightly this one, shouldn’t they? Who? Who is this one? Hm? Who is the ocean of knowledge? Hm? This one. What is meant by ‘this one’? Not that one above. Yes, the one in whom He enters is the ocean of knowledge. Hm? Or what would you say? Would you call him the Sun of Knowledge? No. The Sun remains detached. This one is the ocean of knowledge. The ocean remains attached with the Earth.

So, the one who is the ocean of knowledge, that purifier of the sinful ones (patit-paavan) is this. What? When you worship, then it must not be in the intellect of these [people] that this one is the ocean of knowledge, this one is the ocean of happiness, this one is the purifier of the sinful ones. It doesn’t remain in the intellect of anyone like this. It doesn’t remain at all. That is it; just as there are ordinary human beings and they keep on worshipping Shiva because they know that He is the highest on high God. They do not know that He had come and departed. They do not know at all that God had come and departed. If He had come and departed, then they will say that it has been multi-million years since He came, created the human world and departed; so, how much time has passed? They should tell accurately. You have understood, haven’t you daughter? So, each and every topic of theirs’ is a big, wide bluff; one after the other. You have understood, haven’t you? And all these are the bluffs of their jatpanaa (stubbornness) because they are called idiots. It is written, isn’t it that they don’t know the duration of the beginning, middle and end of the world cycle.

This, this Baba has been telling many times, hasn’t He? But as the children are not meditative (yogyukt), they forget this. If they remain in Yoga, if the soul becomes pure, then the impression will also be cast. Because of not being in purity, there are many, whatever museum etc they build, do all this, none among them are yogyukt. What? They bluff a lot about the knowledge, just as those sanyasis bluff a lot, these too bluff. Very nicely. He will sit and explain the knowledge nicely; the knowledge that Baba sits and explains about the story of 84, they understand very well. Those who understand, their heart also inculcates. But as regards [thinking that] I am a soul and I have to remember the Father and I am a very small soul, a point; that is not there in anyone who establishes the museum; whatever money they spend goes waste in reality. This main topic is required first. What? Of Yoga. Through this remembrance there can be some sadgati. If there is no remembrance, then their sadgati will not be said to be complete. And sadgati is said to be hundred percent sadgati. Sadgati; there is no such word, name – hundred percent sadgati. Hm? People say, don’t they? 100 percent purity, peace and prosperity. Who has hundred percent peace and prosperity, purity? Whose sadgati is hundred percent? Now nobody has achieved that. Baba says that they don’t have at all. So, later look, these big ones, Baba says - These children do not have Yoga. But the children are like the pundits who utter ‘tran, tran’ (speak wastefully) because they are taught some topic. Completely nice topic is taught. But there is no useful topic except remembrance. It does not sit in the intellect at all.

Without Yoga human beings are of no use. They keep on hanging in storms, they keep on fighting, keep on dying, keep on roaming, i.e. they also keep on fighting. Hm? He fights with this one, he fights with that one; this one does like this, that one does like that. Is it not? Someone or the other okay, okay, it will be called a criminal eye. Hm? We have a criminal eye. Baba will not even accept if someone says that I don’t have a criminal eye any more. He will not accept at all. Yes, to transform the criminal eye to a civil eye and to consider that Baba gives us the third eye. Hm? I the soul should have an equal eye (samdrishti); samdrishti means all these are souls. What? You should not see anyone as a body. All souls are brothers. We are children of one Supreme Father, Supreme Soul, the Father. Aren’t we? Well, when you consider yourselves as brothers, then where did sister and brother or wife emerge from? No, we are brothers, aren’t we? We souls are brothers. So, you will have samdrishti (uniform vision) only when you become brothers. Otherwise, the intellect is attracted towards one’s own body. I am a brother, this one is a sister. If you see a brother as sister or a sister as a brother, if you see as husband and wife, then that sister, brother, brother and brother and then sister, brother; are you that? How can you be that? Third page, fifth line of the morning class dated 22.11.1967. You say, don’t you that we are Brahmakumar-kumaris of Prajapita Brahma? You are not brothers in relation to Prajapati Brahma. You are children. When there is Prajapita Brahma, then there are Brahmakumaris and Kumars. When you are ShivBaba’s children, then what are you all? Arey? Arey, you are Kumars (sons). Not Kumaris (daughters). When you are ShivBaba’s children, then all are sons. It will be said like this. Is it not? You are sons, you are not daughters. Hm? Or are you daughters also? In relation to ShivBaba? What would you be called? Sons. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2866, दिनांक 30.04.2019
VCD 2866, dated 30.04.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.1967
VCD-2866-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-17.42
Time- 00.01-17.42


प्रातः क्लास चल रहा था 22.11.1967 बात चल रही थी – तुम अपन कहते हो प्रजापिता ब्रह्माकुमारी, तो जरूर कहेंगे कि आपस में ब्रदर्स तो नहीं हैं, भाई बहन हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के होते हैं तो कुमार और कुमारी। और जब शिवबाबा के बच्चे हो तो सभी कुमार। ऐसे कहेंगे ना बच्चे ठहरे। तो ये बैठ करके कोई अच्छी तरह से दिल से पहले ये याद करे कि हम ज्योति बिंदु आत्मा हैं तो परमपिता परमात्मा ज्योति बिंदु की संतान आपस में भाई-भाई। और वो सुप्रीम सोल ज्योति बिंदु पढ़ाई कैसे पढ़ावेगा? वो तो बिंदु है। तो कोई मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं। नाम देते हैं प्रजापिता ब्रह्मा। तो उनके द्वारा कहेंगे तुम ब्रह्मा कुमार और कुमारी। ये जो नौकरी-चाकरियों में, और धंधे-धोरी में फंसे हो ना, ये याद रख देना। क्या? कि हम ज्योति बिंदु आत्मा हैं तो भाई हैं और प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं, तो भाई बहन हैं। तो ये याद रख लेना धंधे-धोरी में। ये तो गपोड़ा बहुत लंबा-चौड़ा रहता है। समझा ना? बाकी बाप समझते हैं अच्छी तरह से तो ये योग युक्त जिसको योगी कहा जाए। ये योगी नहीं। कौन? हँ? कौन योगी नहीं? ये योगी नहीं। ज्ञानी भले कहा जाए। कौन? हँ? हाँ, ब्रह्मा चार मुखों वाला योगी नहीं।

और तुम्हारा काम तो है सारा योग से। हँ? क्या सारा काम योग से काम है? कोई ज्ञान से सारी दुनिया थोड़ी ही पलट जाएगी। काहे से पलटेगी? दुनिया तो, सारी दुनिया पलटेगी, प्राणी मात्र पलट जाएंगे योग बल से। योग में ये सच्च नहीं कहती है। नहीं तो सब बाबा को एकदम से लिख देवें, तो बाबा हमारा योग बहुत थोड़ा टाइम लगता है। और जो जिनका योग नहीं लगता है ना, वो बोलो सारे दिन में जब बाबा आप बैठते हो और बैठकरके घड़ी-घड़ी बाबा की यादगिरी आती, तो उस समय में ही याद रहती है, फिर खत्म। उस समय में भी जिनका बुद्धि योग है सुनने-सुनाने के लिए, अच्छी तरह से समझते हैं, सो भी वो अक्षर। बाकी जो बैठकरके मुरली सुनते हैं तो वो मुरली सुनना कोई योग थोड़ेही है बच्ची। वो तो ज्ञान है ना बच्ची। मुरली तो योग नहीं है। योग तो तब कहें मुरली सुनकरके तुम चलें। अपन को आत्मा समझ करके मुरली सुनते हो कि बाबा सुनाते हैं। बस, फिर मुरली सुनाकरके थोड़ा अपन को अलग आत्मा समझती हो। बाबा समझ बाबा को याद करती हो अपनी आत्मा से तो तुम्हारा विकर्म विनाश होगा। बाकी ऐसे नहीं है कोई मुरली सुनने से विकर्म विनाश होगा। कोई भी नहीं करते होंगे बच्ची। ये जानते ही नहीं हैं कि मुरली सुनने से क्या होगा?

ये, ये बच्चा बहुत हैं ढेर के ढेर एकदम। अच्छे-अच्छे फर्स्ट क्लास जिनको कहते हैं ना म्यूजियम बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो ये नहीं जानते हैं कि मुरली सुनने से कोई विकर्म, कोई पाप कर्म विनाश नहीं होंगे एक भी। विकर्म विनाश होगा ही तब जब याद की यात्रा में रहेंगे। सो सच कभी भी कहेंगे भी नहीं। तो बाबा बरोबर मैं योग में नहीं रह पाता हूं। तो बाबा को जब कहे, सच्च कहता हूं योग में तो मैं कभी नहीं कहूं कि तुम म्यूजियम जाकरके बनाओ या जाकर के रचना रचो। हां, मैं बोलूं भी नहीं एकदम। परंतु नहीं। बच्चे हैं। समझा ना? बिल्कुल ही उछलते रहते हैं। नहीं तो बाबा ने कहा ना बच्ची, इसमें बड़ी वो विचार सागर, हँ, मंथन करना होता है। तो कहते हैं ना मंथन करना माने चबाना होता है। कोई खाना नहीं खाता है। हँ? विचार सागर मंथन को चबाना कहा जाता है। एक-एक अक्षर जो बाबा को पहले मिलते हैं। बाबा को मिलते हैं ना। मनमनाभव। अरे, उस मनमनाभव को तो खूब चबाना है बिल्कुल। रोज पूरा बहुत अच्छी तरह से लिखना है।

बाबा युक्तियां तो बहुत अच्छी बताते हैं। परंतु युक्तियां ये न कर-करके पीछे जो ये बैठ करके म्यूजियम वगैरा बनाने में बुद्धि लगा जाती है। तो उसमें क्या होगा? हँ? उनमें वो इतनी उतनी वो फुर्ना नहीं होगी। ये तो फल ही नहीं निकलेगा। है ना? तिक-तिक, तिक-तिक जाकरके करेंगे वहां म्यूजियम में। बाकी जो फल निकले कि ये कही भई ये कोई अच्छा योगी बना वो कोई भी नहीं बनेगा। तिक-तिक करने से योगी बनेगा क्या? इसलिए आय करके ऐसे चक्कर लगाय बिचारे चले जाते हैं। कहां? कहां चक्कर लगाके चले जाते हैं? म्यूजियम में। हां। तो बाप स्वयं कहते हैं - योग है ही नहीं। सिर्फ गपोड़े हैं। हँ? म्यूजियम में तिक-तिक करते रहते हैं। बाकी हां, बाकी सब कुछ है। क्रिमिनल आई भी है, क्रोध भी है, लोभ भी है, मोह भी है, और सब चीजें हैं। कोई ना कोई रखी जरूर हैं। समझा ना?

ये भी गरीब बाबा बोलते हैं ना, जो फंसी हुई हैं। बिचारी मार खाती हैं और वो ऐसी-ऐसी जो अबलाए हैं जो यहां आती हैं। फुरना रहता है बाबा के पास जावें। कहेंगे उनमें कुछ योग है। बाकी तो बहुत थोड़े हैं जो बाबा जैसे कहते हैं ना अभी कि डायरी रखो, रोज़ अपना धंधा देखो। हँ? क्योंकि रोज़ देखने का है नहीं तो जब रोज देखो तब रोज का तुम चार्ट रखो। हँ? चार्ट निकाल सको फायदा और नुकसान का। यानी सात रोज़ की यादगारी सो भी नहीं निकालते। हँ? नहीं। रोज़ निकालो। वो डायरी एकदम पॉकेट में पड़ी हो, हँ, तो तुम्हारी उन्नति होगी। इनमें योग जो उन्नति की बात है ना। जो बाबा इतना योग के ऊपर कह देते हैं कि जो भी ये, ये प्रदर्शनी वगैरा ये सभी खोलते हैं ना। इतना योग बिल्कुल कम है। 22.11.1967 की प्रातः क्लास का चौथा पेज। तो योग का नुकसान है। है नहीं तो नुकसान हुआ ना? इसलिए तुम देखते हो, कितना मत्था मारते हैं! देखो। फिर भी खुद बच्चियां लिखती हैं बाबा कि कितने आते हैं। बाकी जिन-जिनका कोई पद्मापदम भाग्यशाली होगा तो आ करके ये समझने लग पड़ते हैं। बाकी तो सुना और बस वो चले ही गए। सो तो यहां से सुना, बाहर में निकला, एकदम सब चला गया।

तुम्हें तो बाबा कितना कहते हैं भई ये किसी को भी ओपनिंग सेरिमनी कराओ, तो भी पहले-पहले तो उनको यही रस्ता दिखाओ कि बाप को याद करना है, तो पाप कर्म विनाश होगा। नहीं तो जो जन्म-जन्मांतर का 84 जन्मों का बोझा रहा हुआ है, ये थोड़ा-थोड़ा, ऐसे तो जरूर थोड़ा-थोड़ा होता जाएगा ना। भले सतयुग, त्रेता भी होता है तो भी कुछ नीचे गिरते हैं कि नहीं? हां। इतना नहीं कहेंगे जितना द्वापर कलियुग में। नहीं, बिल्कुल, कभी नहीं कहेंगे। समझा ना? कोई कहे कि भई भला सतयुग से क्या एकदम ऐब्सोल्युटली सौ परसेंट प्योरिटी में रहते हैं? सौ परसेंट प्योरिटी में? नहीं, बिल्कुल नहीं क्योंकि वो जो कला कमती होती जाती है ना जरी-जरी सी, तो प्योरिटी का परसेंटेज भी कम होता जाता है। तो जरी-जरी थोड़ी होती है ना कमती। बाकी वहां रावण राज्य तो नहीं है। और बस जब रावण राज्य आया। कितने सिर वाला? 10 सिरों वाला, 10 मतों वाला। हँ? 10 धर्म इकट्ठे हो जाते हैं उस दुनिया में। रावण राज्य आया जैसे तूफान आ गया एकदम। शुरू तूफान। तूफान में, रोज लगा रहता है क्या तूफान? नहीं। तूफान जो आते हैं, जब वो समय होता है, तूफान आते हैं। नहीं तो तूफान नहीं लगते हैं। हवाएं लगती हैं पिछाड़ी में थोड़ी-थोड़ी। तूफान शुरू होते हैं जब रावण राज्य शुरू होता है। तब खूब एकदम वाम मार्ग में गए एकदम और खत्म। वाम मार्ग माने? उल्टे रास्ते पर गए। हाँ। उल्टा रास्ता क्या? हँ? उल्टा रास्ता जो कर्म इंद्रियां हैं उन कर्म इंद्रियों में कामेन्द्रिय से सुख भोगने का रास्ता तो पकड़ा लेकिन दूसरे को दुख होता है वो तो उसे देखा? वो नहीं देखा। तो पीछे सभी तूफान, सभी पीछे-पीछे चलते आते हैं। (क्रमशः)

A morning class dated 22.11.1967 was being narrated – You call yourselves Prajapita Brahmakumari, so, it will definitely be said that you are not mutually brothers; you are brothers and sisters. When you belong to Prajapita Brahma, then you are Kumar (sons) and Kumaris (daughters). And when you are children of ShivBaba, then all are Kumars. It will be said that you happen to be sons, aren’t you? So, one should sit and remember this nicely from his heart that we are point of light souls, children of the Supreme Father Supreme Soul point of light and we are brothers in relation to each other. And how will that Supreme Soul point of light teach knowledge? He is a point. So, He enters in a permanent Chariot. He names him Prajapita Brahma. So, He will tell through him that you are Brahmakumars and Kumaris. You are entangled in the jobs and businesses, aren’t you? You remember this; what? That when we are points of light, souls, then we are brothers and when we are Prajapita Brahma’s children, then we are brothers and sisters. So, remember this during business. This bluff is very long and wide. You have understood, haven’t you? The Father understands nicely that these yogyukt, who could be called yogis; not this yogi; who? Hm? Who is not a yogi? This one is not a yogi. He may be called knowledgeable. Who? Hm? Yes, Brahma with four heads is not a yogi.

And your entire task is with Yoga. Hm? What is the entire task with Yoga? The entire world will not transform through knowledge. How will it change? The world, the entire world, all the living beings will transform through the power of Yoga. In case of Yoga, she doesn’t speak the truth. Otherwise, she should write everything to Baba immediately – Baba, I have Yoga for a very little time. And those who are unable to have Yoga, then say, when Baba you sit throughout the day and while sitting every moment we remember Baba; at that time alone we remember. Then it ends. At that time also those whose intellect is connected for listening and narrating, they understand nicely, that too those words. But as regards the time when you sit and listen to Murli, then that listening to Murli is not Yoga daughter. That is knowledge, isn’t it daughter? Murli is not Yoga. Yoga will be said to be when you listen to Murli and go. You listen to Murli while considering yourself to be a soul that Baba narrates. That is it; then after narrating the Murli, you consider yourself to be a separate soul a little. You understand Baba and then remember Baba from your soul; then your sins will be destroyed. But it is not true that your sins will be burnt by listening to Murli. Nobody must be doing daughter. They do not know at all as to what will happen by listening to Murli?

There are many [such] children. Nice, nice ones, who are called first class, aren’t they? They get ready to build a museum. So, they do not know that no sins will be destroyed by listening to Murli. The sins will be destroyed only when you remain on the journey of remembrance. So, they will never speak the truth. So, Baba, rightly I am unable to remain in Yoga. So, when they tell Baba, I tell truthfully that in Yoga, then I will never tell you to go and build a museum or to go and create creation. Yes, I will not at all ask you. But no. They are children. You have understood, haven’t you? They keep on jumping. Otherwise, Baba said, didn’t He daughter that you have to churn the ocean of thoughts in this. So, He says that to churn means to chew. Someone doesn’t eat food. Hm? Churning of thoughts is called chewing. Each and every word which Baba gets first; Baba gets, doesn’t He? Manmanabhav. Arey, you have to chew that Manmanaabhav a lot. Every day you have to write completely and very nicely.

Baba narrates very nice tactics. But instead of implementing these tactics, later the intellect becomes busy in building a museum, etc. So, what will happen in that? Hm? They will not have that much interest (furna). The fruit will not emerge at all. Is it not? They will go and speak wastefully in the museum. But as regards causing the fruit to emerge that this one became a nice yogi, nobody will become that. Will anyone become a yogi by speaking wastefully? This is why poor fellows come and take a round and go away. Where? Where do they go around and depart? In the museum. Yes. So, the Father Himself says – They do not have Yoga at all. There are just bluffs. Hm? They keep on speaking wastefully in the museum. But yes, there is everything else. There is criminal eye also, there is anger also, there is greed also, there is attachment also. There are all other things. They have definitely kept one thing or the other. You have understood, haven’t you?

Baba says, doesn’t He that these are also poor ladies who are entangled; poor ladies suffer beatings and they are such weak ladies who come here. They crave to go to Baba. It will be said that they have some Yoga. Among the remaining there are very few [who remember Baba], for example now Baba says, doesn’t He that maintain a diary, check your business every day. Hm? It is because you have to check every day; otherwise when you see every day, then you will maintain the daily chart. Hm? You can maintain the chart of benefit and loss. It means that you do not even maintain the record of seven days. Hm? No. Maintain every day. That diary should be lying in the pocket; then you will progress. Among these Yoga, which is a topic of progress, isn’t it? Baba says so much on Yoga that all this, this exhibition, etc, which you organize, don’t you? They have very less Yoga. Fourth page of the morning class dated 22.11.1967. So, there is a loss of Yoga. If it (Yoga) isn’t there, then there is loss, isn’t it? This is why you see, they spoil their heads so much. Look. However daughters themselves write that Baba so many people come. But all those who are multimillion fold fortunate ones will come and start understanding this. The rest listen and that is it, they depart. They listen here, go out and everything vanishes immediately.

Baba tells you so much – Brother, you may get the opening ceremony done by anyone, yet first of all show them the path that you have to remember the Father, then your sins will be destroyed. Otherwise, the burden of many births, 84 births that remains will reduce gradually, it will definitely go on reducing gradually, will it not? Although it may be the Golden Age, the Silver Age, yet, do you experience downfall to some extent or not? Yes. It will not be said to be to the extent it happens in the Copper Age, in the Iron Age. No, completely, it will never be said. You have understood, haven’t you? Someone may say that brother, do you completely, absolutely remain in 100 percent purity from the Golden Age onwards? In 100 percent purity? No, not at all because that celestial degree keeps on decreasing little by little, doesn’t it? Then the percentage of purity also goes on decreasing. So, it reduces little by little, doesn’t it? But there is no kingdom of Ravan there. And that is it; when the kingdom of Ravan arrives; the one with how many heads? The one with 10 heads, 10 opinions. Hm? 10 religions gather in that world. Arrival of Ravan’s kingdom means as if a storm arrived immediately. Storm starts. In a storm; is there a storm every day? No. As regards the storms that come, when it is the time, then the storm arrives. Otherwise, storms do not emerge. Winds start a little later on. When the kingdom of Ravan starts, then the storms begin. Then people enter the leftist path (vaam maarg) a lot immediately and perish. What is meant by vaam maarg? They went on the opposite path. Yes. What is the opposite path? Hm? Opposite path means you did catch the path of experiencing pleasures through the organ of lust among the organs of action, but did you observe the sorrow that the other person is experiencing? You did not see that. So, later all the storms, all of them keep on emerging later on. (continued)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2866, दिनांक 30.04.2019
VCD 2866, dated 30.04.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.1967
VCD-2866-Bilingual-Part-2

समय- 17.43-37.04
Time- 17.43-37.04


ये तो बच्चे समझ सकते हैं कि ये सभी डिग्री जो कमती होती जाती है ना कलाओं की। सो तो आहिस्ते-आहिस्ते, आहिस्ते-आहिस्ते कम होती जाएगी ना। अभी फिर ये पुरुषोत्तम संगमयुग है। न सतयुग है, न त्रेता है, न द्वापर, न कलियुग। क्या है? कलियुग और सतयुग का संगम, पुरुषोत्तम संगमयुग। एकदम ऊपर में चढ़ना है। एकदम माने? 5000 वर्ष में नीचे गिरे। और यहां? हां, ऐसे नहीं कि संगमयुग, ये कोई पुरुषोत्तम संगमयुग 100 साल का है तो 100 साल में ऊंचे चढ़ते हैं। नहीं। जब चढ़ना होता है तो फिर एकदम ऊंचे चढ़ते हैं। सो ऊपर में चढ़ना ऐसे भी नहीं होते हैं कि बस कि कोई सेकंड में जीवन मुक्ति। नहीं। बाबा कहते हैं सेकंड में जब किसको निश्चय हो जाते हैं। अभी निश्चय जब हो गया। किस बात का? हँ? यही हमारा बाप है। सौ परसेंट यही बाप; कहीं बाप कहीं कम परसेंटेज में होता है? कि 90 परसेंट हमारा बाप है 10 परसेंट कोई दूसरा होगा। ऐसे नहीं होता है।

तो जो बाबा कहते हैं कि निश्चय पक्का बैठ जाए कि बाप है और उसके बाद शुरू करें, हँ, याद करना सीखें। समझा ना? जैसे वो बच्चों को सिखलाया जाता है ना। तो बाबा बोलता हैं कि नहीं, जबकि वो बच्चे सीखें फिर दूसरों को सिखावें। बाबा का नाम तो मिल गया ना। बरोबर भई, बाबा को याद करना है। क्या नाम मिल गया है? शिव बाबा। हँ? कि शंकर बाबा? न विष्णु बाबा? ब्रह्मा बाबा? नहीं। शिव बाबा। शिव माने? हँ? कल्याणकारी। ऐसे भी नहीं कभी कल्याणकारी, कभी नहीं। अकल्याणकारी। नहीं। सदा शिव, सदा कल्याणकारी। उस बाबा को याद करना है। पतित पावन मिला है। हँ? पतित भी है और पावन भी है। दोनों का मेल है। जिस तन में, पतित तन में प्रवेश किया तो वो आत्मा भी पतित, तन भी पतित। और जिस आत्मा ने प्रवेश किया, सुप्रीम सोल ने, वो भी पावन, एवरप्योर। और जब प्रवेश किया तो वो तन के द्वारा कोई अपवित्र काम होने देगा? हँ? नहीं होने देगा। तो पावन हुआ ना। एवर प्योर।

अभी हमको याद करना है तो जम दे जाम दे तो नहीं होता है। हँ? ये क्या होता है? कि हथेली पे कोई आम उगाना चाहे तो उग सकता है क्या? नहीं। और समझते भी हो कि टाइम तो लगेगा ना। ऐसे तो नहीं है कि फट से कोई जीवनमुक्ति बन जाती है। नहीं। और बहुत मेहनत लगती है क्योंकि बड़ा-बड़ा तूफान आता है। अरे, बच्ची इतना पद पाना है। कितना? कितना पद पाना है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, लक्ष्मी-नारायण की तरफ इशारा किया। आदिनारायण। नारायण तो सतयुग में बहुत होते हैं। हँ? जैसे क्रिश्चियंस में होता है ना। किंग एडवर्ड फर्स्ट, सेकंड, थर्ड। ऐसे ही सतयुग में 8 पीढ़ियों में 8 नारायण। और उनमें भी उनकी आदि करने वाला नौवां नारायण। कितने? 9 नारायण। उनकी यादगार चलती है। हँ? 9 नारायण के बापों की, जन्मदाताओं की नौनाथ द्वारे। हाँ। तो इतना पद पाना है ऊंच ते ऊंच आदिनारायण का! क्या समझते हो क्या तुम? क्या? पूछा - क्या तुम समझते हो? देखो, बैगर टू सतयुग का प्रिंस एकदम बन जाते हो। हँ? कलियुग अंत में बेगर और सतयुग आदि में एकदम प्रिंस। तो ये तो गायन है ना बच्चे। कहां का? संगम युग के सब गायन, पूजन, यादगार, त्यौहार हैं। हँ? हाँ।

क्लास में बीच में छोटे बच्चे की आवाज हुई। अरे, इस बच्ची को बाहर ले जाओ। यहां आवाज नहीं चाहिए। बड़ी-बड़ी नॉलेज। तो इतना बड़ी साइलेंस। ये तो है ही साइलेंस की इसमें, बिल्कुल बात ही साइलेंस की है। क्योंकि कोई भी झंझट होने से वो जो वाणी चलती है ना उनकी, वो कनेक्शन है ना। वो फट टूट पड़ेगा। हँ? सबका बुद्धि योग कहां चला जाएगा? बच्चे के रोने के ऊपर चला जाता है। पीछे उस पॉइंट को कहां से ढूढेंगे? हँ? चला गया ना। तो मेहनत लगती है ढूंढने में। वो पॉइंट हाथ से निकल जाती है। पीछे वाणी में गड़बड़-शड़बड़ हो जाती है एकदम। कहां से पकड़ें? किसको पकड़ें? हँ? टूट गया लिंक। प्रसंग ही नहीं मिलता। तो ये तो वाणी चलाने वाला जाने ना। अब सुनने वालों का तो बुद्धि योग कट हो गया ना।

दो बाप को याद बैठकर के करो। क्या कहा? हँ? दो बाप को याद करो? अभी तो कहा मामेकम याद करो। हँ? मनमनाभव। मेरे मन में, हँ, समा जा। अब ये दो बाप कहां से आ गए? हँ? अरे, सुप्रीम सोल जिस मुकर्रर रथधारी में प्रवेश करते हैं तो बिना तन के वाणी चलाएंगे क्या? हँ? मुरली से प्यार माना मुरलीधर से प्यार। तो, तो याद करता है मां-बाप। छोटे बच्चे किलकारियां मारते हैं। हँ? कुछ अगड़म-बगड़म ऐसा करते हैं तो बच्चों को हंसी आती है उनकी एक्टिंग देख करके। जैसा बोलते हैं उल्टा-पुल्टा, तो याद आता है ना। तो ऐसे ही बाप जो बोलते हैं ना, वो तन के ही द्वारा बोलेंगे ना। तो तन याद आएगा कि नहीं? तो दो बाप हुए। एक तनधारी बाप और एक? हँ? विदेही, जिसको अपनी देह है ही नहीं। आत्माओं का बाप। तो दो बाप को बैठ करके याद करो।

भले आजू-बाजू में कहीं भी कोई नगाड़े बजते रहें। क्या? हां, याद फिर भी आती रहे। बाबा ने कहा है ना यहां बैठकर के भले नगाड़े, कितना भी कोई नगाड़ा बैठकरके बजाए, तुम्हारी तो है ही बरोबर पहलवानी इसी बात में। क्या? किस बात में? कि कान जो हैं जहां लगाव लगा हुआ है तुम्हारी मन-बुद्धि का, तो कान कहां की आवाज सुनेंगे? जहां लगाव लगा हुआ है, वो बाप की आवाज सुनेंगे। हाँ। तो बीन-बाजा कोई भी कितना बजावे, नगाड़ा बजावे, नहीं, हम तो आत्मा हैं। और आत्मा को बाप को याद करना है भल बीन-बाजे बजते रहें। है ना? जितना भी होवे, कितना भी वो भौंक-भौंक हो जावे, वो कहते हैं तू भौंक, हँ, तू भौंकते रहे, मेरे को तो नींद आएगी। क्या? क्या? भले तू भौंकता रहे और मेरे को तो क्या आएगी? मेरे को तो नींद आएगी। वाह भैया! अभी नींद की तो कोई बात नहीं है ना भौंकने में। नहीं। हम तो अपने बाप की याद में रहते हैं। कितना भी कोई ढिंढोरा पिटवावे, क्या भी करे। हँ? मुरली सुनने में नहीं हो सकेगा। क्या? मुरली सुनने में क्या होगा? हाँ, फांट पड़ जाएगी। मुरली नहीं सुनाई देगी। आगे-पीछे गाजे-बाजे बजते रहेंगे बुद्धि उनमें, गीत गाते रहेंगे लोग, तो उनमें बुद्धि चली जाएगी। फिर मुरली में, मुरली याद रहेगी? मुरली नहीं याद रहेगी। तो ये फर्क है याद में और मुरली सुनने में। हां, उसमें तो शांति चाहिए। किसमें? मुरली सुनने में और मुरली समझने में। हाँ। तब तो बाबा कहते हैं कि ना बच्चे, अगर तुम उन्नति को पाना चाहते हो तो युक्तियां, युक्तियां बहुत ही हैं। देखो, बड़े आदमी तो युक्ति पा ही नहीं सकते हैं। उनको तो देखो चाहिए सारा दिन धंधा-धोरी में, सारा दिन वो पैसा-पैसा याद आता रहेगा। हँ? सबको वो पैसा याद आता है। इतना धन है। इतना हो जावेगा। समझा ना।

22.11.1967 की प्रातः क्लास का पांचवा पेज, बुधवार। हां। ऐसे-ऐसे हैं बाहर की दुनिया में। हमारा सेठ था ना। ये, ये इनका जो सेठ था। समझा ना? उनके पास 30 लाख रुपया था। समझा ना? और था कैश में। जैसे जवाहरी थे ना? तो जवाहरात तो जैसे बिल्कुल कैश है। है ना? वो सोएंगे ना नींद में, उनका हाथ ऐसे चलता रहेगा। रखा है कि नहीं रखा है? हँ? हाँ, उनका हाथ ऐसे चलता रहेगा। वो 30 लाख गिनते रहेंगे नींद में। ये रतन, ये हीरा, ये 10 लाख का, ये 20 लाख का। है ना? और फिर मनहूस में मनहूस होते तो बहुत होंगे। परंतु कोट भी बच्चा उतारेगा बड़ा। तो पहनेगा कोट, हँ, हाँ, वो कोट फटा हुआ होगा, फिर भी नया नहीं खरीदेगा। पक्का वरी ऐसा होगा। अच्छा। फिर क्या ले गया? जब शरीर छोड़ा तो कुछ ले गया क्या? कुछ नहीं।

तो कोई आएंगे। हां, सेठ जी, बच्ची की शादी है। उस समय तो सब कह देते हैं ना। कन्यादान को बहुत उत्तम समझते थे। हमने बहुत किया हुआ है। समझा ना? बस उत्तम समझते थे। तो बोलेंगे, हँ, तुम बच्ची पैदा क्यों की, हँ, जो आए हो हमसे भीख मांगने के लिए, हँ, कि बच्चे की शादी है? अरे, वो बिचारे क्या कहेंगे? है ना। तो ऐसे मनहूस होते हैं। उनका नाम ही रखते हैं मनहूस। समझा ना। और जो नामी-ग्रामी होते हैं उनका तो अखबारों में भी नाम पड़ता है। भई, ये मरा। अरे, वो तो बहुत फिलेंथ्रोफिस्ट था, बहुत दानी था। भई, उसने तो फलानी अस्पताल बनाई। फलानी धर्मशाला बनाई। उनका नाम अखबारों में भी तो आते हैं ना। हां, आते हैं। तो दान-पुण्य तो बहुत करते हैं ना। बहुत-बहुत करते हैं। उनको कोई टाइटल भी मिल सकता है। हँ? ये राय बहादुर, राव साहब, फलाना राव, टीरा। ये भी है। तो पाग है ये सारी झूठी। उस मान-मर्तबे में नाम-मान-शान में कुछ रखा थोड़ी है। हँ? सिर्फ नाम ही नाम है। है ना?

अभी देखो, तुम कौन बनते हो? हँ? ये जो राय, राय बहादुर। अरे, तुम तो पदमपति। तुम क्या यहां बनने आए हो? तुम यहां आए हो बनने के लिए नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी। बस। तो भई विश्व का मालिक हुआ ना। तो विश्व का मालिक। उस समय में विश्व में देखो ये क्या-क्या, विश्व में क्या-क्या नहीं है। हँ? ऐसी कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं है उन विश्व महाराजन को जिसको प्राप्त करने के लिए उनको संकल्प उठें कि ये चीज मिल जाएगी तो काम बने। ये प्राप्त करूं, वो प्राप्त करूं, ऐसा कोई संकल्प नहीं उठे। अभी सब कुछ तुम्हारा, सारी विश्व तुम्हारी। हँ? तुम मालिक हो। तो अभी देखो इनको। किनको? किनको देखो? अरे, इन लक्ष्मी-नारायण को देखो जो विश्व के मालिक बनते हैं। तो इनके लिए कहा जाता है, हँ, कि कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं जिसके लिए संकल्प उठे। सबके लिए नहीं है। ओम शांति। आज क्या तीस तारीख हो गई? हँ? (समाप्त)

Children can understand that these celestial degrees which keep on reducing, don’t they? So, they will keep on decreasing gradually, slowly, will they not? Now again this is Purushottam Sangamyug. It is neither Golden Age, nor Silver Age; it is neither Copper Age nor Iron Age. What is it? It is the confluence of the Iron Age and the Golden Age, the Purushottam Sangamyug. You have to rise immediately up. What is meant by immediately? You fell in 5000 years. And here? Yes, it is not as if the Sangamyug (Confluence Age), this Purushottam Sangamyug is of 100 years; so, you rise up in 100 years. No. When you have to rise, then you rise immediately up. Rising up does not happen that you get jeevanmukti (liberation in life) in a second. No. Baba says that when someone develops faith in a second; now when one develops faith; On which topic? Hm? This one alone is our Father. This one is hundred percent Father. Is a Father anywhere in less percentage? That someone is our 90 percent Father and someone else will be 10 percent. It doesn’t happen like this.

So, Baba says that you should develop firm faith that He is the Father and after that you should make a beginning, learn to remember. You have understood, haven’t you? Just as those children are taught, aren’t they? So, Baba says that no, when those children learn, they will teach others. They got the name of Baba, didn’t they? Rightly brother, you have to remember Baba. What is the name you got? ShivBaba. Hm? Or Shankar Baba? Neither Vishnu Baba? Brahma Baba? No. ShivBaba. What is meant by Shiv? Benevolent. It is also not as if He is sometimes benevolent, sometimes not. Harmful. No. Always Shiv, always benevolent. You have to remember that Baba. You have got the purifier of the sinful ones (patit-paavan). Hm? He is sinful as well as pure. He is a combination of both. The body, the sinful body in which He has entered, that soul is also sinful, the body is also sinful. And the soul which entered, the Supreme Soul, He too is pure, ever pure. And when He entered, then will He let any impure task to be performed through that body? Hm? He will not allow. So, he is pure, isn’t he? Ever pure.

Now we have to remember [Baba]; so, it cannot be ‘jam de, jam de’. Hm? What is this? That can anyone grow a Mango [tree] on one’s palm if he wishes to? No. And you also understand that it will take time, will it not? It is not as if jeevanmukti (liberation in life) is achieved immediately. No. And it takes a lot of hard work because big storms emerge. Arey, daughter you have to achieve such a post. How big? How big a post do you have to achieve? Hm?
(Someone said something.) Yes, a gesture was made towards Lakshmi-Narayan. Aadi (first) Narayan. There are many Narayans in the Golden Age. Hm? For example, it happens among the Christians, doesn’t it? King Edward [the] first, second, third. Similarly, there are eight Narayans in eight generations. And even among them, the one who starts them, the ninth Narayan. How many? Nine Narayans. Their memorial continues. Hm? Of the fathers, creators of nine Narayans, the nine Naathdwaras. Yes. So, you have to achieve such a highest on high post of Aadi Narayan. What do you think? What? It was asked – Do you understand? Look, you become beggar to a Prince of the Golden Age immediately. Hm? Beggar in the end of the Iron Age and absolutely Prince in the beginning of the Golden Age. So, this is the glory, isn’t it children? Of which place? All the praises, worships, memorials, festivals are of the Confluence Age. Hm? Yes.

A small child’s sound emerged in between the class. Arey, take this daughter outside. There shouldn’t be any noise here. Big, big knowledge. So, such a big silence! It is only about silence in this; the complete topic itself is of silence. It is because in case of any disturbance, His Vani that is narrated isn’t it; there is a connection, isn’t it? That will break immediately. Hm? Where will everyone’s intellect get connected to? It is goes towards the child’s cries. Later how will you search that point? Hm? It went away, didn’t it? So, it requires efforts to trace it. That point slips away from your hands. Later complete confusion takes place in the Vani. From where should we catch? Whom should we catch? Hm? The link broke. The context cannot be found at all. So, the one who narrates the Vani knows, doesn’t He? Well, the intellect of the listeners got disconnected, didn’t it?

Sit and remember two fathers. What has been said? Hm? Should you remember two fathers? Just now it was said – Remember Me alone. Hm? Manmanaabhav. Merge into My mind. Well, where did these two fathers emerge from? Hm? Arey, the permanent Chariot-holder in whom the Supreme Soul enters, so will He narrate the Vani without a body? Hm? Love for the Murli (flute) means love for the Murlidhar (holder of the flute). So, so, the parents remember. Small children laugh. Hm? They do something awkward that the children laugh by seeing their acting. They speak something bizarre, so that comes to the mind, doesn’t it? So, similarly, whatever the Father speaks, He will speak through the body only, will He not? So, will the body come to the mind or not? So, there are two fathers. One is the Father holding the body and one? Hm? The bodiless one, who doesn’t have a body of His own at all. The Father of souls. So, sit and remember two fathers.

Trumpets may keep on blowing anywhere around you. What? Yes, however you should be in remembrance. Baba has said, hasn’t He that while sitting here, someone may be sitting and blowing trumpets to any extent, yours is rightly the wrestling in this topic itself. What? In which topic? That the ears should; wherever your mind and intellect is attached, then the ears will hear sounds of which place? They will hear the sound of the Father, where they are attached. Yes. So, one may be playing flute or drums to any extent, someone may blow the trumpet, no, we are souls. And the soul has to remember the Father even if the flute and drums are being played. Is it not? Howevermuch it may happen, howevermuch they may be barking, they say – you bark, you keep on barking, I will get sleep. What? What? You may keep on barking and what will I get? I will get sleep. Wow brother! Well, there is no question of sleeping while someone is barking. No. We remain in our Father’s remembrance. Someone may beat the drums to any extent, someone may do anything. Hm? You will not be able to listen to the Murli. What? What will happen while listening to Murli? Yes, you will have disturbance. The Murli will not be audible. Songs and musical instruments will keep on playing in the front and back in which the intellect; people will keep on singing songs, and then the intellect will be pulled towards them. Then, will you remember the Murli? You will not remember the Murli. So, this is the difference between remembrance [the Father] and listening to Murli. Yes, peace is required in that. In what? In listening to Murli and in understanding Murli. Yes. Only then does Baba say, doesn’t He that children, if you want to progress, then there are a lot of tactics. Look, big personalities cannot get tactics at all. Look, they want that in business throughout the day; throughout the day that money will keep on coming to the mind. Hm? Everyone remembers that money. I have this much wealth. It will grow that much. You have understood, haven’t you?

Fifth page of the morning class dated 22.11.1967, Wednesday. Yes. There are such ones in the outside world. We had a seth (a businessman), didn’t we? This, this one had a seth. You have understood, haven’t you? He had 30 lakh rupees. You have understood, haven’t you? And he had it in cash. He was a jeweler, wasn’t he? So, jewels are like complete cash. Is it not? If they sleep, during sleep their hand will keep on moving like this. Is it kept or not? Hm? Yes, his hand will keep on moving like this. They will keep on counting 30 lakhs in sleep. This gem, this diamond; this one costs 10 lakhs; this one costs 20 lakhs. Is it not? And then there must be many misers among misers. But the child will remove the big coat also. So, when he wears the coat, yes, that coat will be torn; yet, he will not buy a new one. He will certainly be like that. Achcha. Then what did he take with him? When he left the body, then did he take anything? Nothing.

So, some will come. Yes, sethji (businessman), I have to perform my daughter’s marriage. At that time everyone says, don’t they? The donation of a daughter (kanyadaan) used to be considered to be the best one. I have done that a lot. You have understood, haven’t you? That is it; we used to consider it to be best. So, he will say, why did you give birth to a daughter that you have come to beg from me that I have to perform my child’s marriage? Arey, what will that poor fellow then say? Is it not? So, there are such misers (manhoos). Their name itself is coined as manhoos. You have understood, haven’t you? And those who are well-known, their names are published in the newspapers. Brother, this one died. Arey, he was a big philanthropist, a big donor. Brother, he built such and such hospital. He built such and such public lodge (dharmashala). Their names are published in the newspapers also, aren’t they? Yes, they are. So, they make a lot of donations and perform many noble actions, don’t they? They do a lot. They can get some title also. Hm? This Rai Bahadur, Rao Saahab, such and such Rao, etc. This is also there. So, all this paag (head gear) is entirely false. Is there anything in that respect and position, name, respect and grandeur? Hm? It is just a name. Isn’t it?

Now look, what do you become? Hm? This Rai, Rai Bahadur. Arey, you [become] multimillionaire (padampati). You have come here to become what? You have come here to become Narayan from nar (man), Lakshmi from naari (woman). That is it. So, brother, he is the master of the world, isn’t he? So, master of the world. At that time, look, what all in the world, what all is not there in the world? Hm? There is no such unattainable thing for that world emperor to attain for which a thought arises in his mind that my task will be accomplished if I get this thing. I should achieve this, I should achieve that; no such thought should emerge. Now everything belongs to you; the entire world belongs to you. Hm? You are masters. So, now look at these. Whom? Whom should you see? Arey, look at these Lakshmi and Narayan who become masters of the world. So, it is said for these that there is no unattainable thing for which a thought may emerge. It is not for everyone. Om Shanti. Is it thirtieth day today? Hm? (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2867, दिनांक 01.05.2019
VCD 2867, dated 01.05.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.1967
VCD-2867-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.23
Time- 00.01-20.23


प्रातः क्लास चल रहा था 22.11.1967 गुरुवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – ऐसी भी अप्राप्त वस्तु नहीं है जिसके प्राप्त करने के लिए संकल्प उठे कि ये प्राप्त करूं। अभी सब कुछ तुम्हारा, सारी विश्व तुम्हारी। तुम मालिक हो ना। देखो ये इनकी, इनकी सूरत देखो। किनकी? लक्ष्मी-नारायण की। इनके लिए कहा जाता है। सबके लिए नहीं कहा जाता है। क्या? हँ? ऐसी कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं जिसके प्राप्त करने के लिए संकल्प उठे। तो ये बात इनके लिए। इनको क्या दरकार होगी? हँ? कोई चीज़ को पाने के लिए क्या-क्या चेष्टा करते होंगे कि हमको ये चीज़ चाहिए। किसके लिए बताया? हँ? किसके लिए बताया? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, तो इनका पार्ट जो लक्ष्मी-नारायण का चित्र दिखाया इनका पार्ट ब्राह्मणों की दुनिया में है ना। हँ? कि नहीं है अभी? है। तो उनकी पहचान क्या बताई? हँ? कहेंगे ये तो सडसठ की बात है, सिक्स्टी सेवन की। अरे, सिक्स्टी सेवन की जो बात है वो तो चित्र की बात है क्योंकि ब्रह्मा बाबा की बुद्धि में तो चित्र ही बैठा हुआ था। उनकी बुद्धि में ये थोड़ेही बैठा हुआ था कि ये कोई विश्व के मालिक हमारा ये पार्ट है जो सारे विश्व के मालिक बनेंगे। सब धर्मों के विश्व में जितने भी फालोअर्स हैं सबके मालिक। उनकी बुद्धि में थोड़ेही था। उनकी बुद्धि में चित्र ही था या चैतन्य था? हँ? चित्र ही था। और अब? अब किसके लिए लागू होगा? चित्र के लिए लागू होगा? हाँ। अभी चित्र की बात नहीं है।

तो बताया – ऐसे कोई होता ही नहीं है। क्या? कि इनको कोई चीज़ की तमन्ना उठे कि हमें ये चीज़ चाहिए। और उसके लिए चेष्टा करनी पड़े। कुछ चाहिए क्या जिसके लिए चेष्टा करनी पड़े? और ब्राह्मण तो गाते ही आए हैं, 1967 में भी गाते आए हैं। क्या? पाना था सो पा लिया। अब कछु पानो नाहि। तो सभी ब्राह्मणों के लिए ये बात हो गई क्या लागू? हँ? अभी बाबा किसके लिए बोल रहे हैं? एक के लिए, एक युगल के लिए बोल रहे हैं या सबके लिए बोल रहे हैं? एक युगल है जो लक्ष्मी-नारायण, आदि लक्ष्मी-नारायण, आदि नारायण, आदि लक्ष्मी विश्व के मालिक संसार में प्रत्यक्ष होने वाले हैं उनकी ये पहचान बताई। हाँ। क्योंकि बस ये इसके ऊपर और तो कुछ है नहीं। किसके ऊपर? जो विश्व का मालिक बनने वाला है इसके ऊपर और कोई है? और तो कोई है नहीं, कुछ नहीं क्योंकि सारी विश्व इनकी। सारी विश्व इनकी नहीं, इसकी। सारी विश्व इसकी। एक की या दो-चार और अनेक की? एक की। पीछे बाकि क्या चाहिए? जब सारी विश्व इनकी हो गई, इसकी हो गई, तो बाकि क्या चाहिए?

तो भी देखो। क्या? मार्जिन रखी हुई है। हँ? क्या मार्जिन रखी हुई है? हँ? कि इतना माला बनने की है। क्या? कितना माला? आठ की माला का संगठन बनना है। 108 की माला का संगठन बनना है। उसमें भी रुद्र माला का संगठन पहले बनना है। फिर? विजयमाला का संगठन बनना है। तो इतनी माला बनने की है; 16,108 की भी माला होती है ना। मंदिरों में, पुराने-पुराने मंदिरों में। गरारी होती है उसमें नीचे बड़ा तसला रखा रहता है। दो-दो, चार-चार मिलकरके गरारी खींचते हैं माला को। हँ? इतनी बड़ी 16000 की माला। तो ये माला बनने की है। ये मार्जिन है अभी। क्या? क्या मार्जिन? ये जब तक माला नहीं बने तब तक इनको कोई पहचान? पहचान नहीं सकते।

देखो, माला तो बहुत नामीग्रामी है ना। कैसे? बहुत नामीग्रामी कैसे? किस आधार पर? अरे, कोई आधार है? कैसे कहें बहुत नामीग्रामी। हँ? हाँ, सब धरमवाले जो भी हैं आस्तिक धरम, जो भगवान को मानने वाले हैं साकार को या निराकार को, वो सब माला स्मरण करते हैं, घुमाते हैं या नहीं घुमाते हैं? हाँ, आज भी सब धर्मों में जो भी भक्त हैं वो माला घुमाते हैं ना। हाँ। माला के मणकों को जो आत्मा की यादगार हैं उनको एक-एक करके स्मरण करते हैं। यानि कुछ तो निशानियां हैं ना कुछ। हाँ। अभी तुमको इस निशानी का कितना अच्छा पता। हँ? जितना तुमको इतना अच्छा पता है इतना और किसी को नहीं है। तो और ये सभी जट्ट लोग हो गए जिनकी बुद्धि में, हँ, वो नंबरवार जो मालाएं हैं ना, अव्वल नंबर आठ की, फिर 108 की, फिर 16108 की। अरे, कम से कम उनमें जो अव्वल नंबर माला है, उस माला के कुछ दाने कोई, कोई जटबुद्धि नहीं हैं, होशियार हैं तो उनके बुद्धि में आने चाहिए ना। आ रहे हैं? हँ? नहीं आ रहे हैं। तो सभी जट लोग हैं। पूजा करने वाले हैं। हँ? किसी को पता नहीं है। तुमको इस निशानी का कितना पता है! मान लो आठ की माला है। हँ? कहते हैं शिव शंकर भोलेनाथ के सर के ऊपर रखी रहती है अव्वल नंबर माला। तो उस माला में से कितने दानों का तुमको पता है? कुछ पता है या नहीं है? ऐसे ही जो पाना था सो पा लिया। हँ? नहीं पता है तो तुमको भी क्या कहेंगे? जट बुद्धि। और पता है तो जट बुद्धि कहेंगे? अच्छा?

तो बताया – जो पूजा करने वाले वो तो सब जट बुद्धि हो गए। उनको क्या मालूम कि ये माला, ये माला रूपी संगठन जो पूजा करते हैं माला भी तो जरूर फेरते होंगे। हँ? समझे ना। पुजारी जो होंगे वो माला जरूर फेरेंगे। एक न दो दफा फेरेंगे जरूर। हाँ। तो माला फेरना। ये तो पुजारी हो गया ना। हँ? माला बनानी है या फेरना है? माला फेर-फेर के मणकों को स्मरण करना है? 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8. फिर 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8. हँ? कहेंगे पुजारी हैं। अभी ये पुजारी तो तुम नहीं बनते हो। किससे बात किया? हँ? हाँ? अभी ये पुजारी तो तुम नहीं बनते हो। तुम माने एक या अनेक?
(किसी ने कुछ कहा।) तुम माने एक होता है? तुम माने अनेक। और तू माने एक। तो बाबा तू करके भी तो बोलते हैं। तू, तेरे को, बोलते हैं कि नहीं? हाँ, तो तुम का मतलब है जो भी माला में आने वाले हैं उनके लिए भी बोल सकते हैं। आठ के लिए भी बोल सकते हैं। 108 के लिए नहीं बोल सकते? बोल सकते हैं। हाँ।

बताया, तुम नहीं बनते हो ना पुजारी। हँ? तुम माला फेरने वाले पुजारी हो या माला बनाने के लिए, हँ, चेष्टा करते हो, पुरुषार्थ करते हो? क्या करते हो? तुम अभी पूज्य बनते हो ना। हँ? तो पूज्य कौन बनते? अरे? वो टाइटल धराय लेते हैं श्री-श्री 1008 स्वामी जी महाराज। श्री-श्री 108 श्री सतानन्द जी महाराज। हँ? ऐसे-ऐसे माला के जो मणके हैं उनके नंबर लगाके टाइटल लगाते हैं ना। तो उनको क्या कहेंगे? वो पूज्य हुए ना। उनकी सब पूजा करते हैं ना। हाँ, वो तो भक्तिमार्ग। ऐसे ही बिना जाने पूजा करते हैं। तुम तो पूज्य बनते हो। कब बनते हो पूज्य? हँ? माला बनाने वालों में से हो या माला फेरने वालों में से हो? क्या हो? क्या कहेंगे अभी? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) फेरने वालों में से हो? अच्छा? बाबा क्या माला फेरने वालों से बात कर रहे हैं अभी? हँ? अच्छा? अभी तुम तो पूज्य बनते हो। जब पूज्य बनते हो तो माला फेरने वाले हुए या माला बनाने का प्रयत्न करने वाले हुए? चेष्टा करने वाले हुए? पुरुषार्थ करने वाले हुए? हँ? तो पूज्य वरी कोई माला थोड़ेही फेरेंगे। क्या? जो पूज्य बनने वाले होंगे वो माला के दानों को सिमिरण नहीं करेंगे, फेरेंगे नहीं। क्या करेंगे? माला रूपी संगठन बनाएंगे या माला फेरेंगे? हँ? क्या करेंगे? बनाएंगे। कभी नहीं फेरेंगे। ये भी मनुष्यों को मालूम नहीं है। क्या? कि जो माला के; पहले तो अव्वल नंबर माला आठ की। उसके जो मणके होंगे, हँ, वो माला फेरेंगे या माला रूपी संगठन बनाने में सहयोगी बनेंगे? हँ? सहयोगी बनेंगे।

तो ये कौनसे सन्यासियों की बात की? हँ? बाहर के सन्यासियों की बात की या अंदर ब्राह्मणों की दुनिया के सन्यासियों की बात की? हँ? क्योंकि असली ब्राह्मण तो वो हैं जो ब्रह्मा की औलाद हैं प्रैक्टिकल में।
(किसी ने कुछ कहा।) बाहर वालों की बात की? अच्छा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ब्राह्मणों की बात की? और ब्राह्मणों में भी दो प्रकार के हैं। एक तो नीची कुरी में आने वाले। और एक ऐसे हैं जो ऊँची कुरियों में आने वाले। तो जो ऊँची कुरी हैं सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी, उनमें से जो आत्माएं निकलती हैं वो तो ये लक्ष्मी-नारायण के चित्र दिखाए हुए हैं। हँ? राधा जो लक्ष्मी बनती है वो कौनसे वंश से निकलती है? हँ? चन्द्रवंश से निकलती है ना। और नारायण? सूर्यवंश से निकलता है। तो ये तो ऊंच ते ऊंच वंश के हो गए। हाँ। बाकि जो हैं वो तो नीची कुरियों के ब्राह्मण हुए ना। हाँ। नौ कुरियों के ब्राह्मण गाए जाते हैं। तो उनमें जो सात कुरियों के ब्राह्मण हैं, जो सप्त ऋषियों की औलाद माने जाते हैं, हँ, वो ही सप्त ऋषि जो सतयुग में बाद वाले सात नारायण बनते हैं और, और वो ही फिर त्रेता में राम के राज्य में राम के बाद सात राम का टाइटल धारण करने वाले बनते हैं। वो ही फिर जाकरके द्वापरयुग से, द्वैतवादी द्वापरयुग में जो सात विधर्मी मुख्य धरमपिताएं आते हैं उनके प्रभाव में फंस जाते हैं। कन्वर्ट हो जाते हैं।

तो बताया, तो ये तो नंबरवार शंकराचार्य हो गए ब्राह्मणों की दुनिया में भी। अव्वल नंबर भी कोई होगा कि नहीं होगा? हँ? उसकी क्या पहचान बताई? हँ? सबसे ऊँचा कोई है कि नहीं है ब्राह्मणों की दुनिया में? हँ? है? उसकी क्या पहचान बताई? उसकी पहचान बताई - बहुत पढ़ा-लिखा है। क्या पढ़ा-लिखा है ब्राह्मणों की दुनिया में? हँ? ब्रह्मा के मुख से जो पढ़ाई पढ़ाई गई, हँ, ब्रह्मा के मुख से वेद निकलते हैं ना। वेद माने जानकारी। विद। विद माने जानना। तो जो जानकारी सच्चाई की निकलती है वो पढ़ाई सबसे जास्ती पढ़ी है या नहीं अव्वल नंबर शंकराचार्य ने ब्राह्मणों की दुनिया में? हँ? हाँ, इसलिए बहुत पढ़ा-लिखा है, तो सबसे ऊँच, अपन को सबसे ऊँच समझते हैं। और दूसरी पहचान बताई चक्कर भी बहुत लगाया हुआ है। क्या? नहीं चक्कर लगाया हुआ है? हाँ। धमचक्कर मचाय के रख दिया। अरे, ब्राह्मणों की दुनिया में सबसे जास्ती चक्कर लगाया हुआ होगा कि नहीं होगा? अव्वल नंबर शंकराचार्य होगा तो सबसे जास्ती पढ़ा-लिखा भी होगा, हँ, बेहद की ब्राह्मणों की पढ़ाई और जास्ती चक्कर लगाने वाला भी, हाँ, होगा। हाँ, हाँ, होगा।

A morning class dated 22.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Thursday was – There is no such unattainable thing to attain for which a thought could emerge that I should attain this. Now everything belongs to you. The entire world belongs to you. You are masters, aren’t you? Look, look at their faces. Whose? Of Lakshmi and Narayan. It is said for them. It is not said for everyone. What? Hm? There is no such unattainable thing to attain for which a thought may emerge. So, this topic is for them. What would they require? Hm? What efforts would they make to achieve something that we want this thing? For who was it said? Hm? For who was it said? Arey?
(Someone said something.) Yes, so, their part, the picture of Lakshmi-Narayan which was shown, their part is in the world of Brahmins, isn’t it? Hm? Or is it not now? It is. So, what is their indication that was mentioned? Hm? It will be said that this is a topic of 67, of sixty seven. Arey, the topic of sixty seven is a topic of the picture because it was the picture that was sitting in the intellect of Brahma Baba. Was it sitting in his intellect that this part of master of the world is mine that I will become the master of the world. Master of all the followers of all the religions in the world. It wasn’t in his intellect. Was the picture alone in his intellect or was the living one [in his intellect]? Hm? The picture alone was [in his intellect]. And now? For whom will it be applicable now? Will it be applicable for the picture? Yes. Now it is not a topic of the picture.

So, it was told – There is no such person at all. What? That they get desire for something that I want this thing. And he has to make efforts for that. Do they require anything for which they have to make efforts? And Brahmins have been singing; they have been singing in 1967 also. What? We have achieved whatever we had to attain. There is nothing to be achieved now. So, was this topic applicable for all the Brahmins? Hm? For whom is Baba speaking now? Is He speaking for one, for one couple or is He speaking for everyone? This is the indication of one couple, Lakshmi-Narayan, Aadi Lakshmi-Narayan, Aadi Narayan, Aadi Lakshmi, who are going to be revealed as masters of the world. Yes. It is because that is it; there is nothing above it. Above what? Is there anyone above the one who is going to become master of the world? There is no one else, nothing because the entire world belongs to them. The entire world belongs not to them, this one. The entire world belongs to this one. To one or to 2-4 and many? To one. Later what else do you require? When the entire world has become theirs’, of this one, then what else is required?

Still, look. What? A margin has been kept. Hm? What margin has been kept? Hm? That this much rosary is to be formed. What? How much rosary? The gathering of the rosary of eight is to be formed. The gathering of the rosary of 108 is to be formed. Even in that the gathering of the Rudramala is to be formed first. Then? The gathering of Vijaymala is to be formed. So, all these rosaries are to be formed; there is a rosary of 16,108 also, isn’t it? In the temples, in the old, old temples. There is a pulley (garaari); below that a big basket is kept. Two, four persons together pull the garaari, the rosary. Hm? Such big is the rosary of 16000! So, this rosary is to be formed. This margin is still there. What? What margin? Until this rosary is formed nobody can recognize them.

Look, the rosary is very famous, isn’t it? How? How is it very famous? On what basis? Arey, is there any basis? How can we say it is very famous? Hm? Yes, people belonging to all the religions, the theist religions, who believe in God, be it corporeal or incorporeal, all of them remember the rosary, do they feel it or not? Yes, even today all the devotees (bhakt) in all the religions feel the rosary, don’t they? Yes. They remember one by one the beads of the rosary which are memorials of the soul. It means that there are some signs, aren’t there? Yes. Now you know this sign so nicely. Hm? Nobody else knows as well as you know. So, and all these are Jatt people in whose intellect; those numberwise rosaries are there, aren’t they? Number one is of eight, then of 108, then of 16,108. Arey, at least it should come to the intellect of some beads of the number one rosary, who don’t have Jat-like intellect, those who are intelligent, shouldn’t it? Is it coming? Hm? It is not coming. So, all are Jat people. They are the ones who worship. Hm? Nobody knows. You know about this symbol so much! Suppose there is the rosary of eight. Hm? People say that the number one rosary is placed on the head of Shiv Shankar Bholeynatah. So, how many beads from that rosary do you know? Do you know something or not? Is it just like that you say that we have achieved whatever we had to achieve. Hm? If you do not know, then what will you too be called? Jat-like intellect. And if you know then will you be called Jat-like intellect? Achcha?

So, it was told – All those who worship have a Jat-like intellect. They don’t know that these people who worship this rosary, this rosary-like gathering must also be feeling the rosary. Hm? You have understood, haven’t you? Those who are worshippers will definitely feel the rosary. They will definitely feel the rosary once or twice. Yes. So, feeling the rosary. This is like being a worshipper, isn’t it? Hm? Should you form a rosary or should you feel it? Should you remember the beads by feeling the rosary? 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 then 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8. Hm? It will be said that they are worshippers. You do not become this worshipper now. With whom did He talk? Hm? Yes? You do not become this worshipper now. Does ‘you’ (tum) mean one or many?
(Someone said something.) Does ‘you’ (tum) mean one? Tum means many. And ‘too’ (you) means one. So, Baba speaks using the word ‘too’ (you) also. Does He say ‘too’ (you), ‘terey ko’ (to you) or not? Yes, so ‘tum’ means we can also say it is for all those who are going to be included in the rosary. We can say for eight also. Can’t we say for 108? We can say. Yes.

It was told - You don’t become worshippers, do you? Hm? Are you the worshippers who feel the rosary or do you make efforts, make purusharth to form the rosary? What do you do? You now become worship worthy, don’t you? Hm? So, who all become worship worthy? Arey? They assume the title Shri Shri 1008 Swamiji Maharaj. Shri Shri 108 Shri Satanandji Maharaj. Hm? People assume titles by prefixing the number of beads of such rosaries, don’t they? So, what will they be called? They are worship worthy, aren’t they? All of them are worshipped, aren’t they? Yes, that is a path of Bhakti. They simply worship without knowing. You become worship worthy. When do you become worship worthy? Hm? Are you among those who make the rosary or are you among the ones who feel the rosary? What are you? What will you say now? Hm?
(Someone said something.) Are you among those who feel the rosary? Achcha? Is Baba now talking to the ones who feel the rosary? Hm? Achcha? Now you become worship worthy. When you become worship worthy, are you the ones who feel the rosary or are you the ones who try to make the rosary? Are you the ones who try? Are you the ones who make purusharth? Hm? So, will worship worhty ones feel the rosary? What? Those who are to become worship worthy will not remember, feel the beads of the rosary. What will they do? Will they make rosary-like gathering or will they feel the rosary? Hm? What will they do? They will make. They will never feel [the rosary]. Human beings do not know even this. What? That those who belong to the rosary; first the number one rosary is of eight. Will its beads feel the rosary or will they become helpful in making the rosary-like gathering? Hm? They will become helpful.

Nobody, the human beings do not know that Shankaracharya is called worship worthy. Hm? Why is he called worship worthy? Did he make any such rosary of most righteous souls? Hm? That of the number one righteous souls who are placed on the head of God in the form of rosary of eight. Does he have any such gathering? Hm? Do those Shankaracharyas have? Hm? They don’t have. If they don’t have then are they worship worthy or worshippers? It will be said that they are worshippers; they are not worship worthy. You have understood, haven’t you? It is because why their name is uttered more? Whose? Hm? It is because these Shankaracharyas consider themselves to be highest. Why do they consider themselves to be high? They have assumed the titles, Shri Shri 1000, Shri Shri 108. So, they are higher, more righteous than the most righteous 108 souls. They consider themselves to be such righteous. They do not believe in anyone. What? Do they listen to anyone other than themselves? They do not listen to anyone. He considers himself to be highest because he is very educated. What? Hm? He is very educated. And he has also toured a lot. What has been said? Do those sanyasis leave the household and go around on worldly tasks or not? Hm? Yes.

So, which Sanyasis were mentioned? Hm? Were the outside Sanyasis mentioned or were the Sanyasis of the inner world of Brahmins mentioned? Hm? It is because the true Brahmins are those who are Brahma’s children in practical.
(Someone said something.) Did He talk about the outsiders? Achcha? Hm? (Someone said something.) Did He talk about Brahmins? And the Brahmins are also of two kinds. One is those who come in the lower categories. And one is such who come in the higher categories. So, the higher categories, the Suryavanshis and the Chandravanshis, among them the souls which emerge, they are shown as the picture of Lakshmi-Narayan. Hm? Radha who becomes Lakshmi emerges from which dynasty? Hm? She emerges from the Moon dynasty, doesn’t she? And Narayan? He emerges from the Sun dynasty. So, these belong to the highest on high dynasty. Yes. The remaining are Brahmins of the lower category, aren’t they? Yes. Brahmins of nine categories are praised. So, among them the Brahmins belonging to the seven categories, who are believed to be the children of the seven sages (sapta rishis), the same seven sages who become the latter seven Narayans in the Golden Age and, and they themselves become the ones who assume the title of seven Rams after Ram in the kingdom of Ram in the Silver Age. They themselves then go and get entangled in the influence of the seven main vidharmi founders of religions who come from the Copper Age, the dualistic Copper Age. They get converted.

So, it was told, so, these are numberwise Shankaracharyas in the world of Brahmins also. Will there be someone who is number one also or not? Hm? What is his indication? Hm? Is there anyone highest in the world of Brahmins or not? Hm? Is he there? What was mentioned to be his indication? His indication was mentioned as – He is very educated. What is he educated in the world of Brahmins? Hm? The knowledge that has been taught through the mouth of Brahma, hm, Vedas emerge from the mouth of Brahma, don’t they? Ved means information. Vid. Vid means to know. So, the information of truth that emerges, has the number one Shankaracharya in the world of Brahmins studied that knowledge the most or not? Hm? Yes, this is why he is very educated; so, he considers himself to be the highest one. And the second indication was mentioned as – He has also toured a lot. What? Hasn’t he toured? Yes. He has created uproar. Arey, would he have toured the most in the world of Brahmins or not? If he is number one Shankaracharya, then he would also be most educated in the knowledge of the unlimited Brahmins and, hm, yes, he would also be the one who tours a lot. Yes, yes, he would.

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