Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2839, दिनांक 03.04.2019
VCD 2839, dated 03.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning Class dated 17.11.1967
VCD-2839-extracts-Bilingual

समय- 00.01-21.53
Time- 00.01-21.53


आज का प्रातः क्लास है – 17.11.1967. शुक्रवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि जितना-जितना तुम याद की यात्रा में रहेंगे तो तुमको इतनी-इतनी बाप की कशिश होगी। जैसे चकमक लोहे को खींचती है ना। पीछे तुम वहाँ रह नहीं सकेंगे। घड़ी-घड़ी बाबा पूछेंगे। क्यों घड़ी-घड़ी पूछेंगे? बाबा हम रह नहीं सकते हैं। हम चकमक बिगर कैसे रह सकेंगे? हँ? ऐसे अंदर-अंदर आतरवेला हो जावेगी। हमारी तो ये है ही कट निकल गई तो कशिश ही यहाँ होती है ना। कट निकली तो कशिश जरूर होगी। कट होती है तो चकमक इतना खींच नहीं सकती। बीच में कट आ जाती है। तो आगे चलकरके तुमको इतनी कशिश होगी। ये भी तो समझ की बात है ना। क्योंकि जितना तुम आत्मा शुद्ध होते जाएंगे, हँ, कट निकलती जाएगी। और इतना साफ होते जाएंगे। ये तो यहाँ बैठे होंगे तो कशिश तो करेंगे ना जरूर। कहाँ बैठे होंगे? हँ? भृकुटि के मध्य में बैठे होंगे तब तो कशिश करेंगे ही करेंगे। और अगर मधुबन में बैठे हैं जहाँ मुरलिया बाजे, तो वहाँ भी तो कशिश जरूर करेंगे ना। क्योंकि है बरोबर बाप समझाते हैं कि बच्चे बिन्दी होकरके रहो। बाप भी बिन्दी है। तुम भी बिन्दी हो।

तो ये समझने की बातें हैं। तो भी भले सुई भी समझो बाप कहकरके समझाते हैं। पर समझते तो हो कि जितना-जितना प्योर हमारी ये बिन्दी होगी इतना बहुत कशिश होगी। और कशिश होगी। घड़ी-घड़ी बाप की याद आएगी। तो हम ठहर नहीं सकेंगे। तुम लोग रह नहीं सकेंगे। तो ये तो जैसे गले में फांसी पड़ जाएगी। घड़ी-घड़ी फांसी। परन्तु किसको पड़ जाएगी? जो अच्छी तरह से याद करेंगे। याद से ये कट उतरती रहेगी। आत्मा में अनेक जन्मों की कट है ना विकारों की। तो ये कट बाप के संग के रंग से, बाप की याद करेंगे ना मन से, बुद्धि से। तो संग का रंग लगेगा, कट उतरेगी। देखो, ये कट कितनी देरी से उतरती है। टाइम तो लगता है ना। कितनी तुम लोग रिपोर्ट करते हो कि बाबा ये तो मंजिल है। इस मंजिल में तूफान बहुत आते हैं। ज्ञान में कोई तूफान आने की बात नहीं है। ये याद में ही तूफान बहुत लगते हैं। बाबा, अरे, हम गिर जाते हैं कितने तो। कट तो क्या इतनी कट लगती है जो थोड़ी साफ होकरके फिर इतनी कट लग जाती है। फिर सारी कट ज्यों की त्यों, जैसी थी वैसी हो जाती है।

तो जो तमोप्रधान थे सो पूरे फिर तमोप्रधान बन जाते हैं। और बाप ने तो बताय दिया। क्या? कि ये काम महाशत्रु है। हँ? क्योंकि कामना मात्र मन के अंदर आई और ये महाशत्रु चिपट गया। वाचा में आई, दृष्टि में आई तो और गया। और फिर कर्मणा में गिर गए कर्म इन्द्रियों से फिर तो इससे बड़ा शत्रु कोई है ही नहीं। तो वो है बड़ी ते बड़ी कट लगाने वाला एकदम। कौन? ये काम विकार। हँ? एकदम चट्ट खाते में चले जाते हैं। तभी तो पुकारते रहते हो ना – हे पतित-पावन। अब कोई भक्तिमार्ग में पुकारने की बात थोड़ेही है। वहाँ किसको पुकारेंगे? जानते ही नहीं। पहचानते हैं क्या? यहाँ तो नंबरवार पहचानते हैं तो, तो फिर पुकारते हैं – हे पतित-पावन। हँ? बस, सारी रड़ियां तुम्हारी पतित-पावन के ऊपर पड़ती हैं। हँ? पहले किसके ऊपर? हँ? पहले पतित के ऊपर कि पहले पावन के ऊपर? किसके ऊपर रड़ियां डालते हो? हे पतित-पावन! हँ? पहले कौन बुद्धि में?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, पतित पहले बुद्धि में आ जाता है।

तो बताया – पतित के ऊपर ये सारी तुम्हारी रड़ियां पड़ती हैं ना। चिल्लाते हो पतित के ऊपर। कोई-कोई क्रोध वगैरा की तो बात ही नहीं होती है। सिर्फ पतित को आकरके पावन बनाओ। तो मूल बात है पतित। और बाप भी कहते हैं। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘भी’ क्यों लगाया? अरे, बाप तो एवर प्योर है ना। तो ‘भी’, अपने लिए ‘भी’ लगाया। किसके मुकाबले? पतित के मुकाबले अपने प्रति ‘भी’ लगाय दिया। बाप भी कहते हैं बच्चे ये काम महाशत्रु है। बच्चे इन पर जीत पहनने से तुम जगतजीत बन जावेंगे। हँ? है ना। सारे जगत को जीत लेंगे। हँ? सिर्फ एक की बात करते हैं ना।

अच्छा, कुछ शास्त्रों में लिखा है कि द्रौपदी ने भी पुकारा ना। तुम बच्चे में तो बहुत हैं ना द्रौपदियां। हँ? दुःशासन-दुर्योधन पीछे पड़ते हैं तो पुकारती हो। तो ऐसी द्रौपदियां कोई थोड़ी थोड़ेही हैं। थोड़ी-थोड़ी हैं क्या? ढ़ेर हैं बिचारी बांधेली जो पुकारती हैं। बाबा, हमको ये नंगन करते हैं। ऐसे-ऐसे करते हैं कि दूसरों के समाने ही नंगन कर देते हैं। छेड़ते रहते हैं। तो वो द्रौपदियां नहीं ठहरी ना। ठहरी या नहीं ठहरी? द्रौपदियां तो ठहरी ना। ठहरी। तो बिचारी रड़ी मारती हैं। मार खाती हैं, चिल्लाती हैं। तो बाबा कहते हैं ये तो कलप पहले भी तुमने खाया है ना। ऐसे तो नहीं है कि कलप पहले कोई एक द्रौपदी थी। हँ? और कोई कृष्ण भगवान ने बैठकरके ऐसे-ऐसे उनको साड़ियां दी। एक के पीछे एक साड़ियां देते रहे। जैसे वो नाटक में दिखाते हैं। नहीं। ये तो सारी गुप्त बात यहाँ होती है। और ये सहन करनी पड़ती है। अरे, वो तो नाटक बनाय दिया, द्रौपदी, दुःशासन-दुर्योधन।

17.11.1967 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। तो ये नाटक हुआ। समझा ना। और वो ही इस समय का तुम्हारा नाटक। तो देखो तो इस समय का नाटक तुम्हारा। द्रौपदी के चीर हरण करने का नाटक। नंगन करने का नाटक। सारी सभा में नंगन करने का नाटक। कोई एक भी देखेगा तो दूसरों को बताएगा। तो सारी सभा में नंगन हुआ ना। देखो, अभी-अभी तुमको दिखलाते हैं। ये इस संगमयुग की बात है। सतयुग, त्रेता की तो कोई बात ही नहीं है। बाकि शुरू हुई है, तो जब पिछाड़ी हुई है तो जभी अबलाओं के ऊपर अत्याचार हुए हैं। तब देखो, अभी दिखलाते हैं कि भई ये, ये नाटक-वाटक अभी-अभी शुरु हुआ है। कोई आगे थोड़ेही ऐसे नाटक होते थे। तुम बच्चियां जानती हो कि बरोबर ये बच्चियां बहुत ढ़ेर की ढ़ेर हैं। और ढ़ेर की ढ़ेर होने वाली हैं द्रौपदियां। और आगे चलकरके और ही पुकारेंगी। अभी भी पुकारती तो हैं ना। मार खाती हैं, पुकारती हैं बहुत ही। तो तुम बच्चों को तो पूरा मालूम नहीं है ना। सारे समाचार तो बाबा के पास आते हैं। हँ? तो बाबा को तो सारा समाचार मालूम पड़ता है। कैसे ये विकार में जाते हैं। कैसे बिचारी नंगन होती हैं। तो कोई द्रौपदी के मुआफिक अबलाओं के माफिक थोड़ेही। नहीं।

ऐसी और भी बहुत होती हैं जो खुशी-खुशी बहुत नंगन हो पड़ती हैं। क्योंकि काम तो महाशत्रु है ना। बस, थोड़ी भी क्रिमिनल आई आपस में जुड़ी और किसको देखा, हँ, या कोई खूबसूरत अकेला देखा, उसकी कोठी-वोठी देखी और देखा कि अच्छा खासा है, ये गंद खाने में फिर देरी नहीं करते हैं। देखो, इस दुनिया में कितना गंद लगा पड़ा है। अरे, तुम देखते हो। देखते भी हो और सुनते भी हो। रस्ते चलते, चलते-चलते, मोटर से उतरते-उतरते ये गंद कर दिया। और मोटर में चढ़े और भाग गए। अब ये बातें तो तुम अखबार में भी सुनते रहते हो। पर भारत में तो इतनी ढ़ेर की ढ़ेर अखबारें। और कोई सभी अखबारें। सभी अखबारें, कोई एक ही अखबार में थोड़ेही पड़ता है। नहीं-नहीं। जो-जो अखबारें जहाँ-जहाँ जिस स्टेट में हैं; भारत बहुत बड़ा है ना एकदम। समझते हो बच्चे कि बरोबर तमोप्रधान बने पड़े हैं। ये काम शत्रु है।

ये पांच विकार इस समय में बहुत फुल फोर्स में हैं। किस समय में? हँ? जब बाप आते हैं तो ये और ही फोर्स में होते जाते हैं। ये लॉ मुजीब ड्रामा के प्लैन अनुसार है जरूर इनको; इन पर इस जबकि फोर्स में है ना। इस समय में बाप आते हैं। और आकरके बोलते हैं कि अभी देखो तुम पावन बनो। तुम्हारी मर्जी के ऊपर सारी बात है। अभी पूरे पतित बन जाते हो जब तभी तो बाप आते हैं ना। हँ? तो अभी और पतित बनते रहना है क्या? तो देखो कितनी आफत में आना पड़ता है बाप को। और कितना युक्ति से काम करना पड़ता है। और है सब गुप्त एकदम। तुम्हारा नाम ही है इन्काग्निटो, गुप्त। किसको भी मालूम नहीं पड़ सकता कि ये कोई ब्रह्मचारी है या फलाना है या टीरा है या क्या है।

ये भी जो बैज अभी तुमको लगवाया है ना। अभी-अभी लगवाया है। कबकी बात हुई? पहले प्लास्टिक के बैज बनवाए थे। हँ? गोल-गोल बिल्ले जैसे। हाँ। दोनों तरफ से लेमिनेशन और बीच में चित्र डाल दिया। एक तरफ लक्ष्मी-नारायण, दूसरी तरफ त्रिमूर्ति। या एक तरफ श्री कृष्ण का चित्र। तो ये अभी तुमको लगवाया। माने कभी? हँ? कब लगवाए ये बैज? सन् 66-67 में लगवाए। हाँ। समझाने के लिए लगवाए हैं। हँ? कि भई हार्टफेल नहीं हो। मुए छुए नहीं बनो। हँ। घड़ी-घड़ी बैज को देखते रहेंगे तो याद आवेगा। नहीं तो मुए-छुए फट से एकदम बन जाते हैं। हाँ। बहुत ही बच्चे लिख देते हैं बाबा, अरे बाबा क्या करें? ये तो बड़ी आफत है। बहुत बड़ी बीमारी है, फलानी है। अरे, बीमारी तुम्हारी है। अरे, करमभोग तुम्हारा है जन्म-जन्मान्तर का। मैंने कोई ये करम भोग भोगा है क्या? मैंने माने किसने? हाँ, शिव सुप्रीम सोल ने ये कोई करम भोग भोगा है? तुम्हारी बीमारी है। और वो भी जन्म-जन्मान्तर की सिर पर बहुत बोझ पड़ा हुआ है। तो तुमको मालूम थोड़ेही है। मालूम ही नहीं पड़ता है।

अभी ही देखो कितनी क्रिमिनल आई चलती रहती है। हँ? अभी माने सन् 66-67 में। और आगे चलकरके तो और बढ़ेगी या घटेगी? हँ? और जास्ती ये तो, हाँ, जब तक पूरा रावण खलास नहीं हो जाएगा, रावण का राज्य जब तक पूरा नहीं खतम होगा तब तक ये तो रावण, रावण के सहयोगी मेघनाद, कुंभकरण ये बढ़ते ही जाएंगे; बड़े-बड़े चित्र बनाते क्यों हैं? हर साल बड़े-बड़े चित्र बनाते रहते हैं। कारण क्या? कहाँ की यादगार? अरे, यहाँ संगमयुग की यादगार है कि संगमयुग में जब बाप आते हैं तो ये विकार जो हैं ना ये बढ़ते ही जाते हैं, बढ़ते ही जाते हैं।

Today’s morning class is dated 17.11.1967. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Friday was that the more you remain on the journey of remembrance you will be pulled by the Father to the same extent. For example magnet pulls the iron, doesn’t it? Later you will not be able to live there. You will ask Baba again and again. Why will you ask again and again? Baba we cannot live [there]. How can we live without the magnet? Hm? You will feel desperate like this inside. Our cut (rust) has been removed; so, we get attracted towards this place only, don’t we? When the rust has been removed then the attraction will definitely be there. If there is rust, then the magnet cannot pull so much. The rust comes in between. So, in future you will have such attraction (kashish). This is also a topic to be understood, isn’t it? It is because the more you souls become pure, the rust will continue to be removed. And you will become clean to that extent. If this one is sitting here, then He will definitely attract. If He is sitting at which place? Hm? If He is sitting in the middle of the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows) then He will definitely pull. And if He is sitting in Madhuban where the flute is played, then He will attract there as well, will He not? It is because the Father rightly explains that children, remain as a point (bindi). The Father is also a point. You are also a point.

So, these are topics to be understood. However, the Father explains about the needle. But you understand that the purer this point will be the more it will attract. And there will be attraction. You will get the thoughts of the Father again and again. So, we will not be able to stay [there]. You people will not be able to stay. So, it is as if the noose will hang around your neck. Noose every moment. But who will get? Those who remember nicely. This cut (rust) will continue to be removed through remembrance. There is a rust of vices in the soul since many births, isn’t it? So, this rust, through the colour of company of the Father, when you remember the Father through mind and intellect, then the colour of company will be applied, the rust will be removed. Look, this rust is removed so late. It takes time, doesn’t it? You people report so much that Baba this is a target. You face a lot of storms in this target. There is no topic of facing storms in knowledge. A lot of storms emerge only in this remembrance. Baba, arey, we fall so much. As regards the rust, we get covered by so much rust that despite becoming clean we get covered by so much rust again. Then the entire rust becomes as it was earlier.

So, those who were satopradhan become completely tamopradhan. And the Father has told. What? That this lust is the biggest enemy. Hm? It is because even if just a desire emerges in the mind this biggest enemy hugs you. If it comes in words, comes in vision, then one falls down further. And then if you fall in actions through the organs of action then there is no enemy bigger than this one at all. So, that is the one who applies the biggest rust. Who? This vice of lust. Hm? Your account becomes completely nil. Only then do you keep on calling – O purifier of the sinful ones! Well, there is no question of calling on the path of Bhakti. Whom will you call there? You don’t know at all. Do you recognize? Here you recognize numberwise, so, so then you call – O purifier of the sinful ones (patit-paavan). Hm? That is it; all your cries are directed towards the purifier of the sinful ones. Hm? First towards whom? Hm? First towards the sinful one (patit) or the pure one (paavan)? For whom do you cry? O purifier of the sinful ones! Hm? Who comes to your intellect first?
(Someone said something.) Yes, the sinful one comes to the intellect first.

So, it was told – All your cries are addressed to the sinful one, aren’t they? You shout upon the sinful one. There is no topic of anger at all. Just come and make the sinful one pure. So, the main topic is sinful. And the Father also says. Why was ‘also’ added? Hm? Why was ‘also’ added? Arey, the Father is ever pure, isn’t He? So, ‘also’, He added ‘also’ for Himself. When compared to whom? He added ‘also’ for Himself when compared to the sinful one. The Father also says – Children, this lust is the biggest enemy. Children, you will become conqueror of the world by conquering this [lust]. Hm? Is it not? You will conquer the entire world. Hm? He speaks only of one, doesn’t He?

Achcha, it has been written in some scriptures that Draupadi also called [God], didn’t she? There are many Draupadis among you children, aren’t there? Hm? When the Dushasans and Duryodhans chase you, then you call. So, such Draupadis are not a few. Are they very few? There are numerous bandhelis (women in bondage) who call. Baba, this one disrobes me. He does like this that he disrobes me in front of others. He keeps on molesting me. So, they are not Draupadis, are they? Are they or aren’t they? They are Draupadis, aren’t they? They are. So, poor women cry. They suffer beatings, they cry aloud. So, Baba says that you have suffered Kalpa ago as well, haven’t you? It is not as if there was one Draupadi Kalpa ago. Hm? And God Krishna sat and gave her sarees like this. He continued to give one saree after the other. For example, they show in the drama. No. All these incognito topics happen here. And you have to tolerate this. Arey, they have made a drama of Draupadi, Dushasan, Duryodhan.

Seventh page of the morning class dated 17.11.1967. So, this is a drama. Did you understand? And that is your drama of this time. So, look, this is your drama of the present time. The drama of disrobing Draupadi. The drama of disrobing. The drama of disrobing in front of a packed court. Even if one sees, he will tell others. So, she was disrobed in front of the entire court, wasn’t it? Look, it is shown to you just now. This is a topic of this Confluence Age. It is not a topic of the Golden Age, Silver Age at all. But it has started; so, when the end has come, then tortures have taken place against the weaker sex. Then look, now they show that brother, this, this drama has started just now. Were there such dramas earlier? You daughters know that rightly these daughters are in large numbers. And there are going to be numerous Draupadis. And in future many more will call. Even now they call, don’t they? They suffer beatings; they call a lot. So, you children do not know completely, do you? Baba gets all the news. Hm? So, Baba gets to know all the news. How they indulge in lust. How poor ladies get disrobed. So, it is not like Draupadi, like the weaker sex. No.

There are many such ladies who get disrobed very happily. It is because lust is the biggest enemy, isn’t it? That is it; even if the criminal eye gets connected with each other a little and if she sees anyone, hm, or if she sees a handsome man alone, if she sees his bunglow and if she finds that he is a good one, then they do not hesitate to eat this dirt [of lust]. Look, there is so much dirt in this world. Arey, you see. You even see and you also listen. While walking on a road, while walking, while getting down from the motor (vehicle), they perform this dirt. And they get into the motor and run away. Well, you keep on listening (reading) to such topics in the newspapers also. But there are numerous newspapers in India. And all the newspapers. All the newspapers; It is not published in just one newspaper. No, no. All the newspapers which exist in whichever state; India is very big, isn’t it? You understand children that rightly you have become tamopradhan. This lust is an enemy.

At this time these five vices are in very full force. In which time? Hm? When the Father comes then they go on getting in more force. As per law, as per the drama plan, it is certain; they are in force, aren’t they? The Father comes at this time. And He comes and says that now look, you become pure. The entire topic depends on your willingness. Now, when you become completely sinful, only then does the Father come, doesn’t He? Hm? So, now do you have to become further sinful? So, look, the Father has to come in such difficulties. And He has to work so tactfully. And everything is completely incognito. Your name itself is incognito, gupt. Nobody can know that this one is celibate (brahmachaari) or something else.

These badges also which you have been made to wear now, haven’t you? You have been made to wear just now. It is about which time? Earlier they were ordered to be made with plastic. Hm? Like round coins. Yes. Lamination on both sides and the picture was inserted in between. Lakshmi-Narayan on one side and Trimurti on the other side. Or the picture of Shri Krishna on one side. So, now you have been made to wear this. It means which time? Hm? When were you made to wear these badges? You were made to wear in 66-67. Yes. You were made to wear for explaining. Hm? That brother you should not suffer heart fail. Do not become those who die just by touching. Hm. If you keep on seeing the badge every moment, then it will come to the mind. Otherwise, you immediately become those who die on touching. Yes. Many children write, Baba, arey, Baba what should we do? This is a big difficulty. I am suffering from a very big disease, etc. Arey, the disease is yours. Arey, it is your karmic suffering of many births. Have I suffered the punishments for actions (karam Bhog)? ‘I’ refers to whom? Yes, has the Supreme Soul Shiv suffered karam Bhog? It is your disease. And that too you carry a lot of burden of many births on your head. So, you do not know. You do not know at all.

Look, even now people keep on indulging in criminal eye. Hm? ‘Now’ means in 66-67. And in future will it increase further or will it decrease? Hm? It will increase further, yes, until Ravan perishes completely, until the kingdom of Ravan perishes completely this Ravan and Ravan’s helpers Meghnad, Kumbhakaran will keep on increasing; why are big pictures prepared? They keep on making bigger pictures every year. What is the reason? It is a memorial of which place? Arey, it is a memorial of the Confluence Age here that when the Father comes in the Confluence Age then these vices keep on increasing, keep on increasing, don’t they?

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2840, दिनांक 04.04.2019
VCD 2840, dated 04.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2840-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.58
Time- 00.01-20.58


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967. शुक्रवार को नौवें पेज पर तीसरी, चौथी लाइन में बात चल रही थी बाबा ने पूछा - क्या तुम बच्चों को याद रहता है कि हम पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मण हैं? हम कोई कलियुगी थोड़े ही हैं। अगर ये भी बैठ करके याद करें तो भी खुशी का पारा बहुत चढ़े। परंतु नहीं ये भूल जाते हैं बिल्कुल क्योंकि बुद्धि बाहर की दुनिया में चली जाती है, कलयुगी दुनिया में चली जाती है। जो कलियुग में रहे पड़े हैं उनके संगदोष में चली जाती है। तो संग दोष तो होता है ना बच्चे। एक होता है ज्ञानेंद्रियों का संग दोष। और एक होता है स्थूल कर्मेंद्रियों का संग दोष। और एक होता है मन-बुद्धि का संगदोष। तो ज्यादा पावरफुल कौन सा है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, जो ज्यादा असर डालता है वो है मन-बुद्धि का संगदोष। तो संग तो है ही, हँ, ब्राह्मणों का भी या तो कलियुगी दुनिया वालों के साथ। या तो, हां, पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मणों की दुनिया वालों के साथ। और जो संग बताया वो नंबरवार सभी का संग है। कैसा संग? मन-बुद्धि का तो रहता ही है। लेकिन हां, ज्ञानेंद्रियों का भी संग प्रैक्टिकल में रहता है। और कोई-कोई का तो फिर कर्म इंद्रियों का भी प्रैक्टिकल में संग रह जाता है।

तो बताया पाप कर्म ज्यादा कब चढ़ता है? हँ? कौन से संग?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, कर्मेंद्रियों का संग कर लिया तो पाप बहुत चढ़ जाता है। जैसे कि 5 मार से नीचे गिरते हैं। तो संगदोष तो है ही ना यहां ब्राह्मणों की दुनिया में भी। तो देखो उसी का उसी समय में वहीं संग तारे और वहीं संग बोरे। क्या? क्या बताया? उसी समय में। हां, समय वो ही है ब्राह्मणों में। संगदोष का टाइम है। एक सेकंड में बुद्धि कहां से कहां भाग जाती है? उसी समय में ये शूटिंग होती जाती है। संग तारे; हां, पुरुषोत्तम संगम युगी ब्राह्मणों की दुनिया में और जो श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुरुषार्थी हैं नंबरवार तो है ना। तो उनके संग में आते हैं मन-बुद्धि से, ज्ञानेंद्रियों से, कर्म इंद्रियों से, तो वो एक ही समय में क्या कहेंगे? संग तारे या बोरे? संग तारे। और उसी एक सेकंड में बुद्धि भाग जाती है। मन भाग जाता है। हँ? और ज्ञान इंद्रियों को भी कभी-कभी भगाए ले जाता है। कर्मेंद्रियों में भी संगदोष हो जाता है। तो वहीं संग तारे और वहीं संग बोरे, उसी समय में, एक ही टाइम में। देखो, वो ही संग लग जाएगा। क्या? हां, झट वो संग में चला जाएगा। वहीं संग लगेगा, हँ, वहीं, स्थान भी एक ही, स्थान भी, समय भी एक ही। और वहां भी संग लगेगा और इस तरफ में भी चलेगा। इस तरफ माने किस तरफ? ब्राह्मणों की पुरुषोत्तम संगमयुगी दुनिया में। और एक ही सेकंड में आएगा और एक ही सेकंड में चला जाएगा। आएगा, फिर चला जाएगा। फिर आएगा, फिर चला जाएगा।

तभी तो बाबा कहते हैं ना देखो, कितने होते हैं ब्राह्मण जो हमको फारकती दे देते हैं। क्या? ऐसे आना-जाना बार-बार करते रहते हैं तो अंजाम क्या होता है? फिर फारकती दे देते हैं। छोड़ के चले जाते हैं। भाग जाते हैं। कितनी माताएं होती हैं। कितनों ने डाइवोर्स दिया होगा। पहले तो मन-बुद्धि में ये पक्का करके आते हैं, निश्चय पत्र लिख कर के देते हैं कि तुम्हीं हो माता, तुम्हीं हो, तुम्हीं हो बंधु च सखा तुम्हीं हो। जैसे भक्ति मार्ग में बोलते हैं हे प्रभु, जब आप आवेंगे तो हम आपके ही बनके रहेंगे। और कोई संबंध से कोई के नहीं बनके रहेंगे। तो देखो अभी यहां ब्राह्मणों की दुनिया में हिस्ट्री देखो कितनों ने डाइवोर्स दिया होगा। तुमको हम लिस्ट बतावें ना। हम सबके फोटो लेते जा रहे हैं, लेते जावेंगे। और यहां पर एक चित्रशाला बना के रख देंगे डेट वाइज। हां, उनके स्थान वाइज। कहां-कहां के हैं। इतना-इतना चित्र हैं। देखो। किनके? जिन्होंने ये निश्चय किया। क्या? कि तुम्हीं हमारे सब कुछ हो। हँ? सब कुछ हो माने? तुम्हीं मेरे पिता हो, तुम्हीं मेरे बंधु हो, तुम्हीं मेरे पति हो, सब संबंध तुम्हारे से हैं।

फिर देखो इनके चित्र लटके हुए हैं। ढेर के ढेर चित्र हैं जो डायवोर्स दे कर के; क्या? चले गए। समझा ना? सो भी इतने चित्र हो जावेंगे कि ये दीवालें भी छिप जावेगी। क्या? इतने फोटो इन दीवालों में लग जावेंगे कि दीवालें भी नहीं दिखाई पड़ेगी। चित्र ही चित्र डाइवोर्स देने वालों के दिखाई पड़ेंगे। या तो फारकती देने वालों के दिखाई पड़ेंगे। मर जावें। तो हम तुमको दिखलावें कि तुम आधा भी नहीं देखेंगे। क्या? वो सारे चित्र। (बाबा हंसे।) आधे में ही तुम्हारा पेट भर जाएगा। (बाबा हंसे।) हां, चौथा भी नहीं देख सकेंगे। जितने चित्र टांगेंगे भागने वालों के, डाइवोर्स देने वालों के, हँ, और फारकती देने वालों के, तो तुम आधे भी नहीं देखेंगे, चौथे भी नहीं देखेंगे। हँ? ये, ये इतने भागंती हो गए। पता नहीं कहां के थे और कहां चले गए। अब उनके एड्रेस ढूंढो तो पता नहीं कहां के कहां चले गए होंगे। है ना। कितना फोटो हम लेकरके कितना लेंगे। और कितने दीवालों पर चिपकाएंगे? हमको तो रोज बैठकर के चित्र देखना। अरे ये, ये इतना आता था। कैसी-कैसी बातें बनाता था। बहुत प्यार दिखाता था। आज है ही नहीं। अरे फिर चला गया। समाचार आया। अरे, वो तो जाके शादी कर लिया। हां। या बिना शादी के ही गटर में गिर गया। समाचार आया। चलो निकालो उसका चित्र, फोटो निकालो। फेंको, यहां बाहर फेंको। अंदर नहीं लगाएंगे। बाहर लगाओ बाहर। हां, बाहर में फेंको बाहर में। हां।

तो भी देखो कितनी मेहनत करनी पड़े, हँ, उन चित्रों को बाहर फेंकने के लिए। हां। हां, ढेर के ढेर हैं। तो कहते हैं ये सब फालतू हो गए। फालतू हो गए या काम के हुए? हँ? फालतू हो गए। इतना चित्र निकालें, हँ, इतने फोटो उतारें, हँ, और ये करें और ये ढेर सारी पंचायत। ज्ञानामृत पत्रिका में कितने फोटो निकाले होंगे। निकाले ना। और बड़े-बड़े प्रोग्राम किए। अखबार वालों ने कितने डाले होंगे। बड़ी पंचायत। ये भी इनकी यादगारी कौन रखेगा? इतनी ढेर सारी। इतने चित्र निकालें और उतारें। और ये करें। ये पंचायत। हँ? हम अपने बाप को याद करें या इन डायवोर्स देने वालों को, फारकती देने वालों को याद करें? इनके फोटो देखेंगे तो ये याद आएंगे कि नहीं? हँ? हाँ। इन चित्रों को बैठकरके नीचे रखो। क्या? हाँ। और ऊपर फेंकें। नहीं, नहीं। नहीं तो तुमको दिखलावें कि ये देखो वंडरफुल बात है।

बहुत आते हैं और बहुत फारकती दे देते हैं। हँ? कोई फारकती भी देते, कोई डाइवोर्स भी देते। फारकती कौन देते हैं? डाइवोर्स वो देते हैं जिन्होंने ये पक्का निश्चय कर लिया कि हम तो एक शिव बाबा के साथ पति-पत्नी का संबंध बुद्धि में धारण करेंगे और कोई के साथ न इंद्रियों से, न ज्ञानेंद्रियों से, न कर्मेंद्रियों से संबंध जोड़ेंगे। तो वे डायवोर्स देके चले जाते। और जो बच्चे बनते हैं; बच्चे भी तो होते हैं ना। बच्चियां होती हैं ना। तो वो फिर ऐसी भी हैं जो पति का संबंध तो नहीं जोड़ा, मनसा में भी नहीं, कर्मेंद्रियों से भी प्रैक्टिकल नहीं, ज्ञानेंद्रियों से भी नहीं। हां, क्योंकि जो ज्ञानेंद्रियां हैं उनका लगाव कहीं और लगा रहता है। कर्मेंद्रियों का लगाव भी कहीं ना कहीं और लगा रहता है तो वो डाइवोर्स देके चले जाते हैं, वो फारकती देके चले जाते हैं। भई, ये माइयां भी डायवोर्स दे देती हैं। हां। और ये ढेर बच्चे हैं जो फारकती दे देते हैं। क्या फारकती दे देते हैं? कि हम तुम्हारे बच्चे नहीं और तुम हमारे बाप नहीं। फारकती माना? किस को फारकती दी जाती है? बाप को फारकती दी जाती है, मां-बाप को। तो बच्चे जो हैं हमेशा फारकती देते हैं। हँ? और वो कन्याएं-माताएं जिन्होंने अपने अंदर पक्का धारण कर लिया कि अब तो हम इस जीवन में और किसी का वरण नहीं करेंगी तो वो डाइवोर्स देती हैं। तो देखो ये ऐसे-ऐसे अक्षर होते हैं ना। डाइवोर्स या फारकती।

तो यहां तो बहुत ही हैं। ढेर के ढेर। समझा ना? यहां आयकरके, हँ, मिल करके, कोई बाप के रूप में कोई गोद में बैठते हैं पति के रूप में मिलते हैं बच्चे के रूप में मिलते हैं। मिलकर के, यहां गोद में बैठ करके, अच्छी तरह से समझ करके प्रैक्टिकल में और मनसा से भी फिर फारकती, फिर डाइवोर्स दे देते हैं। बहुत बच्ची। अरे, बात मत पूछो। अरे, वो बात तो शुरु से लेकरके चलती चली आई है। कब से? शुरू से माने कबसे? अरे, कुछ याद है? कब शुरु? अरे? वो ही भूल गए।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, ओम मंडली से, सन 36-37 से, जबसे ये ईश्वरीय सत्संग शुरू हुआ, प्रैक्टिकल में ईश्वरीय संबंध, ईश्वरीय सत्संग। वो तो दुनिया में कहते हैं हम सत्संग में जाते हैं। वहां कोई प्रैक्टिकल में ईश्वर थोड़े ही बैठा है। यहां तो ईश्वर बाप खुद कहते हैं कि मैं मुकर्रर रथ में आकरके शुरू से लेकरके अब तक पार्ट बजाय रहा हूं। शुरू में जो आए वो भाग गए। ओम मंडली वाले सारे भाग गए कि नहीं? कि कोई बचे? सारे भाग गए। एकदम भट्टी में पड़े। अरे, उनमें से भी कितनों ने डाइवोर्स दे दिया देखो। जो आए थे ओम मंडली में शुरू से लेकर डायवोर्स और, और ये, ये क्या फारकती चली आ रही है। और चली ही आती है अंत तक भी। हँ? और चली आती रहेगी। क्या? कि बंद हो जाएगी? हँ? चली आती है और चली आती रहेगी।

नहीं तो बाप। कौन सा बाप? हँ? कौनसा बाप? अरे, हद का बाप; 84 जन्मों में हद के बाप हुए ना। नहीं? हाँ। और जो धर्मपिताएं हैं वो भी हद के कहेंगे कि बेहद के? 500-700 करोड़ के कहेंगे? कहेंगे? नहीं। वो भी तो हद के हुए ना। तो बेहद का बाप; कौन? कौन बेहद का बाप? हां, दो बेहद के बाप हैं। एक साकार मनुष्य सृष्टि का बेहद का बाप, साकार मनुष्यों का बाप, सारी 500-700 करोड़ प्रजा का पिता। पिता तो बाप ही हुआ ना। और जिसे मुसलमान कहते हैं आदम, अंग्रेज लोग कहते हैं एडम, हँ, हिंदू लोग कहते हैं; क्या? जगत पिता। जगतम पितरम वंदे पार्वती परमेश्वरौ। और जैनी लोग कहते हैं आदिनाथ, आदि पिता, ऋषभदेव। तो देखो वो दो हुए। आत्मिक रूप में देखेंगे कि दो। और देह के रूप में देखेंगे तो एक। दैहिक। माना जो निराकार बाप है निराकार आत्माओं का वो मुकर्रर रूप से किसी देह में प्रवेश करते हैं। तो वो भी बेहद का बाप ही हुआ ना। साकार हुआ या निराकार? कहेंगे साकार ही है। तो बेहद का बाप उनसे हम वर्सा लेते हैं।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third, fourth lineon the ninth page on Friday was – Baba asked – Do you children remember that we are Purushottam Sangamyugi Brahmins? We are not Kaliyugi (Iron-Aged). Even if we sit and remember this, then the mercury of joy will rise a lot. But no, you forget this because the intellect goes completely into the outside world, into the Iron-Age world. It goes under the ‘bad influence of the company’ (sangdosh) of those living in the Iron Age. So, there is definitely bad effect of company, isn’t it children? One is the bad effect of company of the sense organs. And one is the bad effect of company of the physical organs. And one is the bad effect of company of the mind and intellect. So, which is more powerful? Hm?
(Someone said something.) Yes, that which affects more is the bad effect of the company of the mind and intellect. So, the company is definitely there. Either with the Brahmins or with the people of the Iron Age world. Or, yes, with those from the world of Purushottam Sangamyugi Brahmins. And the company that was described is numberwise everyone’s company. What kind of company? That of mind and intellect definitely remains. But yes, there is the company of the sense organs also in practical. And in case of some there is company of the organs of action in practical.

So, it was told that when do sinful actions increase? Hm? Through which company?
(Someone said something.) Yes, if you keep the company of the organs of action, then you accumulate more sins. It is as if you fall from the fifth storey. So, there is indeed the bad effect of company here in the world of Brahmins also, isn’t it? So, look, in the same time the same company takes you across and the same company causes your downfall. What? What has been told? In the same time. Yes, it is the same time among the Brahmins. It is the time of bad effect of company. The intellect runs from one place to another place in a second. This shooting keeps on taking place in the same time. The good company takes you across; Yes, in the world of Purushottam Sangamyugi Brahmins and the righteous purusharthis are numberwise, aren’t they? So, when you come in their company through mind and intellect, through the sense organs, through the organs of action, then what will it be said in that same time? Does company take you across or does it cause downfall? Company takes you across. And in the same one second the intellect runs away. The mind runs away. Hm? And sometimes it takes in its stride the sense organs also. There is bad effect of company among the organs of action also. So, the same company takes you across and the same company causes downfall, in the same place, in the same time. Look, the same company will have effect. What? Yes, he will go into the company immediately. The company will take place there itself; the place is also the same; the place and the time is also the same. And you will have company there as well as on this side. On this side refers to which side? In the Purushottam Sangamyugi world of Brahmins. And in the same second it will come and in the same second it will go. It will come and then go. It will come again and go again.

That is why Baba says, doesn’t He that look, there are so many Brahmins who give Me faarkati (divorce between Father and son). What? If they keep on coming and going like this again and again, then what is the result? Then they give faarkati. They leave and go. They run away. There are so many mothers. Many must have given divorce. First they come with a firm mind and intellect, they give letter of faith that you alone are my mother, you alone are, you alone are my relative and you alone are my friend. For example, people say on the path of Bhakti – O God, when you come, I will remain only Yours. I will not remain with anyone else in any other relationship. So, look, now here in the world of Brahmins look at the history that how many must have given divorce. Let me give you the list, should I? We continue to click everyone’s photos, we will go on clicking. And here we will build a picture-house (chitrashala) date-wise. Yes, their place-wise. To which all places they belong. There are so many pictures. Look. Whose? Those who developed this faith. What? That you alone are my everything. Hm? What is meant by being everything? You alone are my Father, you alone are my relative, you alone are my husband; I have all the relationships with You.

Then look, their pictures are hanging. There are numerous pictures of those who gave divorce and; what? They went away. Did you understand? That too there will be so many pictures that these walls will be hidden (covered). What? So many photos will be affixed on these walls that the walls too will not be visible. Only the pictures of those who give divorce will be visible. Either the pictures of those who give faarkati will be visible. They may die. So, let Me show you; you will not be able to see even half of them. What? All those pictures. (Baba laughed.) Your stomach will be full just with half. (Baba laughed.) Yes, you will not be able to see even one-fourth. The number of pictures of those who run away, those who give divorce and faarkati that will be hung, you will not be able to see even half, you will not be able to see even one fourth. Hm? These, these many ran away. Who knows to which places they belonged and to which places they went. Now if you search their address then who knows where they must have gone. Is it not? How many photos should we click? And how far will we stick on the walls? We have to sit and see every day. Arey, this one used to come so many times. He used to speak in such and such ways. He used to show so much love. He is not present today. Arey, he went away. His news was received. Arey, he went and got married. Yes. Or he fell into the gutter even without getting married. His news was received. Come on; bring out his picture, his photo. Throw it; throw it out here. It will not be affixed inside. Paste it outside, outside. Yes, throw it outside, outside. Yes.

However, look, you have to work so hard to throw those pictures out. Yes. Yes, there are numerous. So, it is said that all these have become a waste. Are they wasteful or useful? Hm? They have become wasteful. You click so many pictures, you print so many photos and you do this and these numerous Panchayats (public debates). So many photos must have been published in the Gyanamrit magazine. They were published, weren’t they? And big programmeswere organized. The newspaper persons must have published so many. It is a big Panchayat (public debate). Who will keep their records? So many of them. We have to click so many pictures and print. And do this. This Panchayat. Hm? Should we remember our Father or should we remember those who give divorce, give faarkati? If you see their photos, will they come to your mind or not? Hm? Yes. Sit and keep these pictures down. What? Yes. And throw them up. No, no. Otherwise, we can show you that this is a wonderful topic.

Many come and many give faarkati. Hm? Some give faarkati also, some give divorce also. Who gives faarkati? Those people who have developed firm faith that we will inculcate the relationship of husband and wife with one ShivBaba and will not establish relationship with anyone else through organs, either sense organs or the organs of action, give divorce. So, they give divorce and go away. And those who become children; There are children as well, aren’t there? There are daughters, aren’t there? So, they too are such that they may not have established the relationship of a husband; not even in the mind, not even in practical through the organs of action, not even through the sense organs. Yes, because the attachment of the sense organs is somewhere else. The attachment of the organs of action is also somewhere else; so they give divorce and go; and they give faarkati and go. Brother, these ladies also give divorce. Yes. And these numerous children give faarkati. What faarkati do they give? That we are not your children and you are not our Father. What is meant by faarkati? Who is given faarkati? Faarkati is given to the Father, to the parents. So, children always give faarkati. Hm? And those virgins and mothers who have inculcated firmly in their mind that now we will not marry anyone else in this life, give divorce. So, look, there are such words, aren’t there? Divorce or faarkati.

So, there are many here. Numerous. Did you understand? After coming here, hm, after meeting, some sit in the lap in the form of a Father, some meet in the form of a husband, some meet in the form of child. After meeting, after sitting here in the lap, after understanding nicely in practical and then they give faarkati, divorce through the mind as well. Many, daughter. Arey, just don’t ask. Arey, that topic has been continuing from the beginning itself. Since when? ‘From the beginning’ means from which time? Arey, do you remember anything? When did it start? Arey? You forgot that itself.
(Someone said something.) Yes, from Om Mandali, from 36-37, ever since this Godly Satsang (spiritual gathering) started; Godly relationship, Godly satsang in practical. They say in the world that we go to satsangs. Is God sitting there in practical? Here God, the Father Himself says that I come in a permanent Chariot and am playing a part from the beginning till now. Those who came in the beginning ran away. Did all those who belonged to the Om Mandali run away or not? Or were anyone left? All ran away. They joined the bhatti suddenly. Arey, even among them, look, so many gave divorce. Those who had come in the Om Mandali started giving divorce from the beginning and, and this, this faarkati has been going on. And it continues even till the end. Hm? And it will continue. What? Or will it stop? Hm? It continues and it will continue.

Otherwise, Father. Which Father? Hm? Which Father? Arey, the limited Father; there have been fathers in 84 births, haven’t they been? No? Yes. And the founders of religions, will they also be called limited or unlimited? Will they be said to be of 500-700 crores? Will they be called? No. They too are limited, aren’t they? So, the unlimited Father; who? Who is the unlimited Father? Yes, there are two unlimited Fathers. One is the corporeal unlimited Father of the human world, the Father of the corporeal human beings, the Father of all the 500-700 crore subjects. The Father is a Father, isn’t he? And the one whom the Muslims call Aadam, Englishmen call Adam, Hindus call; what? Jagat Pita (Father of the world). Jagatam pitaram vandey paarvati parmeshawarau (I bow to Parvati and Parmeshwar, the ancestors of the world). And Jains call Aadinath, Aadi Pitaa (first Father), Rishabhdev. So, look, they are two. If you view in soul form they are two. And if you view in physical form they are one. Physical. It means the incorporeal Father of the incorporeal souls enters in a body in a permanent form. So, He too is an unlimited Father, isn’t He? Is He corporeal or incorporeal? It will be said that He is corporeal only. So, we obtain inheritance from the unlimited Father.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2841, दिनांक 05.04.2019
VCD 2841, dated 05.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2841-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.20
Time- 00.01-13.20


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967 शुक्रवार को 10वें पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - भक्ति मार्ग का एक भी चित्र करेक्ट नहीं है। और बाबा जो चित्र बनवाते हैं वो सारे ही करेक्ट, जो भी साक्षात्कार से तैयार कराए। देखो, ये लक्ष्मी-नारायण हैं। किसको भी पता नहीं है कि लक्ष्मी-नारायण कौन हैं? हँ? किसको पता है? हँ? ये आदि लक्ष्मी-नारायण हैं नर से डायरेक्ट बनने वाले नारायण हैं। नारी से डायरेक्ट लक्ष्मी बनने वाली लक्ष्मी है। बस, वो तो समझ लेते हैं लक्ष्मी-नारायण। 16 कला संपूर्ण। अरे? अच्छा, तो उनको ये भी पता नहीं है कि राधे कृष्ण कौन हैं? मंदिरों में पूजा करेंगे राधे-कृष्ण की। लेकिन जानते नहीं हैं कि ये राधे-कृष्ण कौन हैं? हँ? हां। किसको भी पता नहीं है कि राधे-कृष्ण कोई वो ही हैं। वो ही। जो लक्ष्मी नारायण हैं, हँ, आदि लक्ष्मी-नारायण।

आदि लक्ष्मी और आदि नारायण, ये नाम कहां होते हैं? नार्थ इंडिया में होते हैं? साउथ इंडिया में होते हैं? हां, साउथ इंडिया में होते हैं। तो वो बाप आता ही है जो साउथ इंडिया है ना वो भारत का विदेश है। तो बाप तो आते ही हैं विदेशी बनकर। क्या? जिस रथ में भी आते हैं परमानेंटली तो, हां, क्या पार्ट बजाते हैं? स्वदेशियों का कि विदेशियों का? विदेशी क्या करते हैं? विदेशी संसार का, जब से आते हैं, तब से विनाश करते हैं, गड्ढे में ले जाते हैं सारी दुनिया को तेजी से। हँ? और आखिर में क्या करते हैं? एटम बंब बनाकर खेल खलास कर देते हैं। और फिर टाइटल किसको मिलता है? हर-हर बम-बम। उनको मिलता है विदेशियों को? नहीं। टाइटल फिर भी बाप कहते हैं मैं जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता हूं उसको ही टाइटल मिलता है। क्या? हर-हर बम-बम क्योंकि वो जो बम बनाते हैं ना, बनाते-2 बनाय तो लेते हैं। और बहुत बनाय लेते हैं। लेकिन इतनी हिम्मत नहीं है, हवा निकल जाती है, अरे छोड़ें कि नहीं छोड़े? और शुरुआत में तो 20-20 मेगावाट की बम्बियां बनाईं सो छोड़ दीं हिम्मत करके। क्या पता बाप ने ही, बाप ने ही हिम्मत कराई होगी? हां। तो वो हिम्मत नहीं है जो इतना बड़ी जो एनर्जी तैयार की है दुनिया के विनाश के लिए कि कई दुनिया ऐसी खलास हो जाएं। हां, समझते हैं ना वो ग्रह-उपग्रह जो हैं ना, हां, उनमें भी दुनिया है, ऐसे समझते हैं। हाँ। तो वो वास्तव में जब वो एटम बंब इतने पावरफुल फटते हैं धड़ाधड़-3 तो ये ग्रह-उपग्रह सारे ही आपस में टूट-फूट के खलास हो जाते हैं। सिर्फ एक ही बचता है। कौन सा? कौन सा? बृहस्तपति। जो पतियों का पति कहा जाता है। बापों का बाप और पतियों का? पतियों का पति।

तो बताया ये राधे- कृष्ण वो ही हैं। कौन से? वो ही माने? कोई भी? जो आदि लक्ष्मी और आदि नारायण गाए जाते हैं। दक्षिण भारत में ज्यादा नाम है ना। खास करके आंध्रा प्रदेश में। क्यों? आंध्रा प्रदेश जो सागर के किनारे-किनारे है ना, हां, लंबा-लंबा फैला हुआ है, दक्षिण से लेकर के और पूरब तक, फैला हुआ है ना? हां। तो बताया कि वो तो भक्ति मार्ग की बातें हैं। स्थूल रूप में आंध्रा की बात हुई। कोई अंधरे हैं थोड़े ही। आंखें तो हैं ना। हां। बाकी बेहद की बात है। क्या? कि जो राधे है ना वो अंधे की औलाद अंधी है कि सोझरे की औलाद सोझरी है? क्या कहेंगे? औलाद किसकी है? अंधे की औलाद अंधे। अंधे माने? अज्ञान के? अज्ञान के अंधे। अज्ञान के अंधे? ज्ञान नहीं है? ज्ञान है कि नहीं है मैं आत्मा हूं? है? अच्छा? मैं आत्मा बिंदी हूं बस इतना ही। ये भी कहेंगे आत्मा क्या है? आत्मा एक रिकॉर्ड है, बैटरी है। ये जानते हैं। फिर ये नहीं बताएंगे ये किस कैटागरी की बैटरी है। कितनी पावर वाली बैटरी है। रिकॉर्ड है तो इसमें कितना पार्ट कैसा-कैसा पार्ट भरा हुआ है? हँ? कितने जन्मों का पार्ट भरा हुआ है और ऊंच ते ऊंच पार्ट है या नीचा पार्ट है, अव्वल नंबर है, दोयम नंबर, ये पता है? अंधे की औलाद अंधे। उन्हें कहां पता? हां।

तो दुनिया वालों को भी पता नहीं और जो दुनिया वालों की शूटिंग करने वाले हैं ब्राह्मणों की दुनिया में उनको? उनको पता है? उनको भी पता नहीं। हां, तो हैं वो ही। कौन? वो ही लक्ष्मी-नारायण जो नर से डायरेक्ट नारायण बनते हैं। बच्चा नहीं बनते। नारायण बाप। हां। और नारी से लक्ष्मी बनते हैं। लक्ष्मी बड़ी होती है कि छोटी? लक्ष्मी तो बड़ी होती है। और राधा-कृष्ण? राधा-कृष्ण की तो मंदिरों में यादगार है छोटा सा चित्र दिखाते हैं बच्चा, बचपने का। हां, तो फिर कैसा कहेंगे? हँ? ये भक्ति मार्ग के जो चित्र हैं वो करेक्ट हैं? कहेंगे करेक्ट? नहीं। और ये जो चित्र बनवाया साक्षात्कार से इसको करेक्ट कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) करेक्ट है? अच्छा? करेक्ट है? ओरिजिनल है? ओरिजिनल नहीं है तो फिर करेक्ट काहे का? ओरिजिनल हो तो करेक्ट। और नकली बनाके रख दिया कागज का, जैसे वो दुनिया में लक्ष्मी-नारायण के मंदिर बनाते हैं टाटा, वो क्या नाम, बिरला, बिरला। हां, तो वो काहे के बनाते हैं? पत्थर के बनाते हैं ना। भले संगमर्मर के पत्थर के बनाते हैं।

तो बताया कि दोनों वो लक्ष्मी-नारायण है ना वो सब के संग में रह-रहकर करके, मर-मरके जीते हैं। क्या? नारायण वाली आत्मा के लिए बाबा ने बताया ना। क्या? वो एक ही आत्मा दुनिया में ऐसी है जो सबके साथ निभाय लेती है। क्या? कोई ऐसी है जिसके साथ निभाती नहीं है? हां, सबके साथ निभाती है। तो कैसे निभाती है? संग में रह-रह करके, मर-मर के निभाती है या एकदम राजा बनकरके निभाती है?
(किसी ने कुछ कहा।) हां? राजा बनके निभाती है? लड्डू। अच्छा? राजा बनेगी तो सबको दंड देना शुरू कर देगी। दंड देती है? अरे किसी को दंड, तुम को दंड दिया? नहीं। हां, तो बताया कि ये करेक्ट नहीं है। चाहे शूटिंग वाले और चाहे बाहर की दुनिया के जो हैं वो। करेक्ट चित्र नहीं है। अच्छा, कोई बताए ये कब आए? हँ? तो वो भक्ति मार्ग वाले तो कहेंगे चाहे शूटिंग वाले भक्ति मार्ग वाले हों, चाहे बाहर की दुनिया वाले, वो क्या कहेंगे? जब बाबा ने साक्षात्कार कराया, तब ये चित्र आए। क्या कहेंगे? हँ? लेकिन ये तो नकली हैं। असली कब आए? पता है किसी को? किसी को मालूम नहीं है कब आए। वो भक्ति मार्ग वाले समझते हैं कि सतयुग के आदि में आए। लक्ष्मी-नारायण कब आए? हां, सतयुग आदि हुआ तो लक्ष्मी नारायण आए 16 कला संपूर्ण।

किसी को मालूम नहीं है कि ये कब राज्य करके गए हैं। हँ? ये। कौन से ये? हां, जो बताया आदि लक्ष्मी-नारायण जिन्होंने नई दुनिया की आदि, शुरुआत की। कब राज्य करके गए किसी को पता है? नहीं पता है। अब तुम बच्चों को तो नंबरवार तो पता है। क्या? कब राज्य करके गए? अरे, जब दुनिया का विनाश सामने खड़ा होता है तो ये सारी दुनिया के विश्व के मालिक बन करके गए। हँ? हां। बाद में फिर सतयुग शुरू होता है। ऐसे तो ये कहेंगे सत युग, सच्चा युग। तो संगम युग को भी सच्चा युग कहेंगे कि झूठा कहेंगे? हँ? सच्चे में सच्चा तो वो ही युग।

तो ये अभी तुमको मालूम पड़ा है। अरे ये तो 5000 वर्ष पहले की बात है। हँ? हाँ। क्या? ये जो आदि लक्ष्मी-नारायण हैं इनकी बात कब की है? 5000 वर्ष पहले की बात है। ये क्राइस्ट से 3000 साल पहले। माने क्राइस्ट को 2000 साल होने जा रहे हैं। हँ? और उससे भी 3000 साल पहले। 3000 साल के अंदर नहीं। 3000 साल पहले। तो टोटल कितने हुए? 5000 साल पहले। हां। अभी तो तुम बच्चों को बिल्कुल बुद्धि में बैठ जाना चाहिए। जैसे यहां बैठे हो ना। बस, यहां चुप करके बैठो। क्या? हँ? चुप करके क्यों बैठें? अरे, कुछ प्रश्न-व्रश्न पूछना हो तो ना पूछें? अरे, बाबा ने तो बताय दिया ना कि मैं सब कुछ बिना पूछे ही बताता हूं। हँ? कि तुम मांग करते हो तब बताता, देता हूं क्या? मैं तो ज्ञान रतन तुम्हें बिना पूछे ही जैसी तुम्हारी स्टेज बनती जाती है आत्मा की, मन-बुद्धि की, ऐसे-ऐसे टाइम पर तुम्हारी मन-बुद्धि की स्टेज के अनुसार मैं खुद सारा ज्ञान देता रहता हूं।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the 10th page on Friday was – Not even a single picture of the path of Bhakti is correct. And the pictures that Baba gets prepared are all correct which were prepared through visions. Look, these are Lakshmi and Narayan. Nobody knows as to who are Lakshmi and Narayan? Hm? Who knows? Hm? These are Aadi Lakshmi-Narayan, the Narayan who becomes Narayan direct from nar (man). Lakshmi is the one who becomes direct Lakshmi from naari (woman). That is it; they think it is Lakshmi-Narayan. Perfect in 16 celestial degrees. Arey? Achcha, so, they do not even know that who are Radhey and Krishna? They worship Radhey and Krishna in the temples. But they do not know that who are these Radhey and Krishna? Hm? Yes. Nobody knows that it is the same Radhey Krishna. The same. The ones who are Lakshmi-Narayan, hm, Aadi Lakshmi-Narayan.

Aadi Lakshmi and Aadi Narayan; where do these names exist? Do they exist in north India? Do they exist in south India? Yes, they exist in south India. So, that Father comes; the south India is India’s abroad. So, the Father comes as a foreigner (videshi). What? In whichever Chariot He comes permanently, yes, so, what part does He play? One of the swadeshis or videshis? What do the videshis do? Ever since the foreigners come, they cause the destruction of the world, they take the entire world into a pit at a fast pace. Hm? And what do they do in the end? They build atom bombs and destroy it. And then who gets the title? Har-har bam-bam. Do those foreigners get? No. However the Father says that the title is received only by the permanent Chariot in which I enter. What? Har-har, bam-bam because the bomb that they prepare, they do prepare it. And they prepare it in large quantities. But they do not have the courage, they lose the air (gas), arey, should we explode them or not? And in the beginning they prepared bombs of 20 megawatts each and they showed the courage of exploding them. Who knows the Father, the Father Himself must have given them the courage? Yes. So, they do not have the courage that such a big energy that they have prepared for the destruction of the world that many such worlds can perish. Yes, they think that there is a world even in those planets and satellites. Yes. So, actually, when those powerful atom bombs explode one after the other then all these planets and satellites perish by clashing with each other. Only one is saved. Which one? Which one? Saturn (Brihaspati). The one who is called highest among all the husbands (patiyon ka pati). Father of fathers and husband of? Highest among all the husbands.

So, it was told – These Radhey and Krishna are the same. Which ones? What is meant by ‘the same’? Is it anyone? The ones who are praised as Aadi (first) Lakshmi and Aadi Narayan. They are more famous in south India, aren’t they? Especially in Andhra Pradesh. Why? Andhra Pradesh which is spread along the ocean, isn’t it? Yes, it is spread in length from south to east; it is spread, isn’t it? Yes. So, it was told that those are the topics of the path of Bhakti. It is a topic of Andhra in a physical form. They are not andhrey (blind). They do have eyes, don’t they? Yes. But it is an unlimited topic. What? That is Radhey the blind child of the blind one or is she an eyed child of the eyed one? What would you say? Whose child is she? Blind children of the blind one. What is meant by blind? In ignorance? Blind by ignorance. Blind by ignorance? Don’t they have knowledge? Do they have the knowledge or not that I am a soul? Do they have? Achcha? I am a soul, a point; Just this much? It will also be said – What is a soul? The soul is a record, a battery. They know this. But they will not tell as to which category of battery is it? It is a battery with how much power? When it is a record, then how much part and what kind of a part is recorded in it? Hm? A part of how many births is recorded in it and is it a highest on high part or a low part, number one, number two? Do they know? They are blind children of the blind one. Do they know? Yes.

So, the people of the world also do not know and what about those who perform the shooting of the people of the world in the world of Brahmins? Do they know? They too do not know. Yes, they are the same ones. Who? The same Lakshmi-Narayan who become direct Narayan from nar (man). They do not become a child. Father Narayan. Yes. And they become Lakshmi from naari (woman). Is Lakshmi old or young? Lakshmi is old. And Radha & Krishna? There is a memorial of Radha and Krishna in the temples; small picture of the children, of their childhood is shown. Yes, so then what kind will it be called? Hm? Are these pictures of the path of Bhakti correct? Will they be called correct? No. And will this picture prepared through visions be called correct?
(Someone said something.) Is it correct? Achcha? Is it correct? Is it original? If it is not original, then how can it be correct? If it is original it will be correct. And if a duplicate one has been prepared on paper, just as they, the Tatas, or what do they call them, the Birlas build the temples of Lakshmi-Narayan in the world. Yes, so what do they build it with? They build it with stone, don’t they? Although they make it with marble.

So, it was told that both of those Lakshmi and Narayan live while dying while living in the company of everyone. What? Baba has told for the soul of Narayan, hasn’t He? What? His is the only soul in the world which maintains relationship with everyone. What? Is there anyone with whom it does not maintain relationship? Yes, it maintains with everyone. So, how does it maintain? Does it maintain while living, while dying in company or does it maintain completely as a king?
(Someone said something.) Yes? Does it maintain as a king? Laddu. Achcha? When it becomes a king it will start punishing everyone. Does it give punishment? Arey, did it punish anyone? Did it punish you? No. Yes, so it was told that this is not correct. Be it those who perform shooting and be it those who belong to the outside world. The pictures are not correct. Achcha, will anyone tell as to when did they arrive? Hm? So, those who belong to the path of Bhakti will tell, be it those who perform the shooting of the path of Bhakti or be it those who belong to the outside world, what would they say? These pictures arrived when Baba caused visions. What would they say? Hm? But these are duplicate. When did the original ones come? Does anyone know? Nobody knows as to when they came. Those who belong to the path of Bhakti think that they came in the beginning of the Golden Age. When did Lakshmi-Narayan come? Yes, when the Golden Age began, then Lakshmi-Narayan perfect in 16 celestial degrees came.

Nobody knows as to when these had ruled. Hm? These. Who these? Yes, it was told that Aadi Lakshmi-Narayan, who started the new world. Does anyone know as to when they ruled? They don’t know. Now you children know numberwise. What? When did they rule? Arey, when the destruction of the world is in front of you then these became the master of the entire world. Hm? Yes. Later the Golden Age begins. It will be said Sat yug, true Age. So, will the Confluence Age also be called a true Age or a false one? Hm? That Age itself is the truest of all.

So, now you have come to know of this. Arey, this is a topic of 5000 years ago. Hm? Yes. What? To which time does the topic of these Aadi Lakshmi-Narayan pertain? It is a topic of 5000 years ago. 3000 years before Christ. It means that it is going to be 2000 years since Christ. Hm? And 3000 years even before that. Not within 3000 years. 3000 years ago. So, how many years is it in total? 5000 years ago. Yes. Now it should sit completely in the intellect of you children. For example you are sitting here, aren’t you? That is it; sit quietly here. What? Hm? Why should we sit silently? Arey, shouldn’t we ask if we want to ask some questions? Arey, Baba has told that I reveal everything even if anyone doesn’t ask. Hm? Or do I reveal, give when you demand? I give you the gems of knowledge without your seeking them; as per the stage of the soul, of the mind and intellect that you go on developing, at such time I Myself keep on giving the entire knowledge as per the stage of your mind and intellect.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2842, दिनांक 06.04.2019
VCD 2842, dated 06.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2842-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.21
Time- 00.01-15.21


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967. शुक्रवार को 11वें पेज की आदि में बात चल रही थी ये लक्ष्मी-नारायण का चित्र ले आओ। हँ? इसको देखो हम क्या बनने वाले हैं। बाबा हमको क्या बनाते हैं? बाबा बनाते हैं या हम खुद अपने पुरुषार्थ से बनते हैं? बनते तो अपने पुरुषार्थ से हैं। जैसा एम-आब्जेक्ट तो ये है ना मूल बात कि एम ऑब्जैक्ट क्या रखा है? लक्ष्य क्या है? क्योंकि जैसा लक्ष्य होता है वैसे ही लक्षण आते हैं ना। नहीं तो क्या एम-ऑब्जेक्ट रखावें? हँ? बाप तो चाहते हैं हर बच्चा ऊंच ते ऊंच पद पावे। तो ऊंचे ते ऊंची एम ऑब्जेक्ट रखी हुई है। लक्ष्मी-नारायण बनना है। कौन सा लक्ष्मी-नारायण? जो नाम ही है नारायण। होंगे तो नंबरवार ही। नार माने ज्ञान जल। अयन माने घर। जो ज्ञान जल के घर में रहते हों। माना मनन-चिंतन-मंथन में रहते हों।

तो अब एम-ऑब्जेक्ट देखना है कि हम कितना मनन-चिंतन-मंथन में रहें। मनन-चिंतन-मंथन भी काहे का? हँ? शास्त्रों की बातों का? नहीं। मनुष्यों की बातों का जो मनुष्य सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हैं उनका? नहीं। अरे, बाबा आकरके ब्रह्मा के तन में जो सुनाते हैं, समझाते हैं, उन बातों का मनन-चिंतन-मंथन करना। तो जरूर नर से नारायण की ये एम-ऑब्जेक्ट बुद्धि में आवेगी। क्या बनना है? नर से डायरेक्ट नारायण बनना है। ऐसे नहीं कि प्रिंस बनना है। हँ? क्या बनना है? प्रिंस बनना है या नारायण बनना है? हँ? नर से डायरेक्ट नारायण बनना है। और कोई एक ही बनेगा क्या नर से डायरेक्ट नारायण? और उसके फॉलो करने वाले नहीं होंगे? होंगे या नहीं होंगे? तो जो फॉलो करेंगे तो वो भी नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनेंगे इसी जन्म में या नहीं बनेंगे? भले नंबरवार बनेंगे। बनेंगे तो जरूर।

और फिर ये सत्यनारायण की कथा भी तुम सुनते रहते हो। हँ? बाबा सच्ची-सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनाते हैं। वो भक्तिमार्ग में तो झूठी कथाएं सुनाते रहते हैं। हँ? लीलावती, कलावती, लकड़हारा, लकड़बग्घा जाने क्या-क्या सुनाते रहते हैं। हँ? वो असली कथा थोड़े ही सुनाते हैं। नाम रख दिया है सत्यनारायण। अरे, काम के आधार पर नाम होता है ना। तो बाबा आकर के सच्ची-सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनाते हैं। हां, कथा कब बनाई जाती है? कथा माने कहानी। क्यों कहानी बनाई गई? जरूर उन्होंने झूठ खंड के बीच में रहते हुए, झूठ आत्माओं के बीच में रहते हुए, हां, सच्चाई से आचरण किया, बात किया, तो सच्ची भाषण करके लोगों को मिर्च लगती है ना। हां, तो झगड़ा होता है। युद्ध होता है। वाचा का भी युद्ध होता है। मनसा का भी युद्ध होता है।

तो ये सत्यनारायण की कथा तुम सुनते रहते हो। कोई प्रजा की कथा थोड़े ही सुनते हो? हँ? प्रजा क्या, प्रजा जो है वो कोई राजयोग सीखती है क्या? नहीं। तुम बच्चे तो राजयोग सीखते हो राजा बनने के लिए। तो राजाओं को तो प्रजावर्ग में तो सब तरह की आत्माएं होती हैं। फोर्थ क्लास प्रजा भी होती है। थर्ड क्लास प्रजा की होती है। और वो तो बड़े दुष्ट होते हैं कोई-कोई चोर-चकार। उनको कंट्रोल करना पड़ता है ना। हां। और ऐसे तो थोड़े ही कि सतयुग त्रेता में ही राजा बनेंगे। द्वापर कलियुग में भी तो राजा बनेंगे ना। तो वहां चोरी-चकार नहीं होंगे? लुच्चे-लफंगे होंगे नहीं? गुंडे नहीं होंगे? उनसे टक्कर नहीं लेनी पड़ेगी? हां। तो शूटिंग कहां होती है? शूटिंग, रिहर्सल यहां होती है। तो बताया तो प्रजा की कथा तुम नहीं सुनते। तुम सुनते हो, हां, सत्यनारायण की कथा।

सीता राम की कथा भी सुनी है तुमने। हाँ। तो जानते हो कि जो अव्वल नंबर सीता, अव्वल नंबर राम, वो ही तो अव्वल नंबर सत्यनारायण बनते हैं। सत्य नारायण होगा तो सत्य नारायणी भी होगी। हँ? तो तुम लोगों ने सीता राम की कथा सुनी है ना। हां। कहते हैं नहीं। बस, हम तो सत्यनारायण की कथा ही सुनेंगे। अरे? क्यों भाई? सत्यनारायण की कथा सुनाइए। हँ? राम-सीता की कथा क्यों मना करते हो? कहते हैं राम-सीता तो फेल हो गए थे। अरे, सिर्फ राम-सीता ही फेल हुए? माया सिर्फ राम-सीता को ही फेल करती है? और कोई को फेल नहीं करती? माया किसी को छोड़ती है? हां। किसी को नहीं छोड़ती। हां, ये है किसी को पहले फेल कर देगी, तो किसी को बाद में पड़ीलेगी अच्छी तरह से। तो बताया जो पहले फेल हो जाएगा वो ज्यादा अनुभवी हुआ या जो बाद में फेल होगा वो ज्यादा अनुभवी हुआ? अनुभवी कौन हुआ? पहले फेल होने वाला ज्यादा अनुभवी हुआ ना।

तो बच्चे समझते नहीं हैं कि यज्ञ के आदि में जिनके लिए बताया कि वो राम-सीता वाली आत्माएं फेल हो गईं, तो फेल हो गई तो बाप ने क्या किया? भई तुम फेल हो गए तो तुम जाओ। ये लो धनुष और ये लो बाण। क्या? तुम हमारे पास जो भी वर्सा है ज्ञान बाणों का और जो भी तुमको सिखाते हैं, हँ, ये शरीर रूपी धनुष से कैसे-कैसे पुरुषार्थ करना है, इस शरीर रूपी धनुष को इतना लचीला बनाना है कि अच्छी तरह से बाण उसमें खिंचे और पूरे छोर मिल जाएं। हँ? तो तीखा बाण जाएगा ना। हां। तो बस उनको बाण दे देते हैं। और ऐसा धनुष देते हैं शरीर रूपी धनुष, जिस शरीर रूपी धनुष से वो अच्छी तरह से अगले जन्म में पुरुषार्थ करेंगे कि नहीं? करेंगे। और फिर तरकश भी दे देते हैं। तरकश क्या होता है? हँ? तरकश जो है वह पीठ में लटकाया जाता है माना बुद्धि। देखने में आती है क्या? देखने में तो नहीं। बुद्धि में वो ज्ञान बाण भरे रहते हैं। हां।

तो ये सत्यनारायण की कथा कोई ऐसे नहीं कहेंगे कि वह राम-सीता वाली आत्माएं नहीं थी। अरे, वो ही तो राम-सीता वाली आत्माएं फर्स्ट क्लास पार्ट बजाने वाली यज्ञ के आदि वाली थी। हां, जिनको ब्रह्माकुमार-कुमारी आज भी समझते हैं कोई पीयू था, हँ, पीयू की वाणी चलती थी। और वो मम्मा-बाबा को भी डायरेक्शन देते थे, ड्रिल कराते थे, योग कराते थे। तो आदि में ऊंचा पार्ट था ना। आदि में ऊंच थे, तो आदि में ऊंच, तो अंत में भी ऊंच ही पार्ट बजाएंगे ना। हां। तो ऐसे थोड़े ही समझना चाहिए कि घृणा कर दी की भई हम राम-सीता की कथा नहीं सुनेंगे। वो तो फेल हो गए। हम तो सत्यनारायण की कथा। अरे, वो फेल हो गए तो क्या ब्रह्माकुमारियों से पूछो, कुमारों से कि तुम्हारा ब्रह्मा बाबा क्या फेल नहीं हुआ? पास हो गया? हँ?

वो शरीर रूपी धनुष जो है वह पार गया विषय वैतरणी नदी के? अरे, धनुष कहो, चाप कहो, जहाज कहो, उसके लिए तो शास्त्रों में भी गायन है। कहते हैं शंकर चाप जहाज। जेहि चढ़ी उतरें पार नर। डूबी सकल संसार। तो वो शंकर वाली आत्मा कौन सी आत्मा है? कृष्ण की आत्मा तो ब्रह्मा का पार्ट बजाती है जो सतयुग में 16 कला संपूर्ण कृष्ण है। बजाती है ना। तो बताओ शंकर का पार्ट कौन सी आत्मा बजाती होगी? हँ? कहेंगे ना कि वो राम की आत्मा शंकर का पार्ट बजाती है। एक राइटियस और एक लेफ्ट में बैठा है। त्रिमूर्ति में चित्र देखा ना। एक है लूज। हँ? सब बातें मान लेता है। हाँ, बच्चे पूछते हैं बाबा घर में बहुत परेशानी है। दादी अम्मा और हमारी अम्मा और हमारे बप्पा बीमार पड़े रहते हैं, बुड्ढे हो गए हैं। और खाना-वाना बनाने में हमें भी तकलीफ होती है। शादी कर लें? हां, हां, बच्चे, बाबा तो कहते हैं कोई बच्चा ऐसा निकले जो पवित्र रहके दिखावे, शादी करके दिखावे और पवित्र रहे। तो बाबा परमिशन देते हैं। हां, करो, कर लो शादी। अरे, बाबा ने मुरली में क्या बोला और तुमने क्या डायरेक्शन दे दिया? क्या मुरली में बोला? शादी बर्बादी। पहले ही दिन ढेर हो पड़ेंगे। तो देखो ऐसे-ऐसे डायरेक्शन देते रहे।

तो बताया कि यज्ञ के आदि में जो आत्मा थी, हँ, राम सीता वाली आत्माएं वो ही पीयू वाली आत्मा। और बाबा भी कहते हैं राम बाप को कहा जाता है। अरे, बाप ही तो बीज होता है। बीज कहां से आता है? अम्मा के अंदर बीज होता है क्या? हँ? वो तो है ही नाम ब्रह्मा। ब्रह्मा माने बड़ी अम्मा। तो अब वो बड़ी अम्मा चाहे चार मुंह वाली हो और चाहे पांचवां मुंह वाली ब्रह्मा हो, पंचमुखी ब्रह्मा, ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा ब्रह्मा। लेकिन ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा भी होगा तो उसके अंदर बीज होता है क्या? कि बाप ही बीज होता है? बीज तो बाप में होता है। तो बताया कि ये जो ब्रह्मा है और जो सरस्वती है वो तो बाद में पार्ट बजाया ना। पहले पार्ट बजाया कंट्रोल करने का यज्ञ में या बाद में पार्ट बजाया, पश्चात में पार्ट बजाया ना। तो वो तो पश्चात्य सभ्यता की स्थापना करने वाले हो गए, जिन्होंने पहले बजाया पूरब में। पूरब माने पहले। सूरज कहां निकलता है? पूरब में निकलता है। तो जिन्होंने पूरब में पहले पार्ट बजाया वो श्रेष्ठ हो गए। वैसे भी देखो वो स्थूल सूरज है। सवेरे को निकलता है। तो ज्यादा फायदेमंद सवेरे का होता है कि दोपहर का होता है कि शाम का होता है सूरज की रोशनी लेना? सवेरे की रोशनी ज्यादा पावरफुल होती है ना। हां।

तो बस ऐसे नहीं समझना चाहिए कि हम सत्यनारायण की कथा सुनेंगे हम राम सीता की कथा नहीं सुनेंगे। हां, ये है कि राम-सीता वाली आत्माएं कलियुग के अंत में जाकरके तमोप्रधान बनती हैं तो उस समय बाबा ने बताया कि अपनी-अपनी कथा कहानी अपने-अपने शास्त्रों में लिख देते है। तो राम वाली आत्मा ने कलियुग में जाकरके तमोप्रधान युग में जो कथा लिखी है वो तो एक जैसे उपन्यास हो गया। क्या? असली बात उसमें से नहीं रहती है। तो बाकी ऐसे है कि नर से नारायण बनने की कथा और राम-सीता की कथा कोई अलग-अलग नहीं है। हां, ये है कि वो अव्वल नंबर नारायण है और कोई बाद वाले नारायण हैं। ये भी तो बताया है, मुरली में तो बाबा ने सब कुछ बताय दिया है, ये भी बताय दिया जो नारायण बनते हैं वो ही त्रेता में जाके क्या बनते हैं? राम सीता बनते हैं। जिस नंबर के नारायण बनेंगे उसी नंबर के राम-सीता बनेंग। तो जो अव्वल नंबर के राम-सीता हैं वो ही अव्वल नंबर के नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने वाले हैं। तो गलतफहमी जिन ब्रह्माकुमार-कुमारियों को हो जाती है तो वो अव्वल नंबर के चित्र ही बनाना बंद कर देते हैं। उन चित्रों को ही गुम कर देते, छुपाए देते, फाड़-फूड़ के फेंक देते, हँ, जलाए देते।। तो देखो गलतफहमी से कितना गड़बड़ हो जाता है।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the eleventh page on Friday was – Bring this picture of Lakshmi-Narayan. Hm? Look at this, what are we going to become. What does Baba make us? Does Baba make or do we become with our own purusharth? We do become with our own purusharth. This is the aim-object, isn’t it? The main topic is that what is the aim-object? What is the aim? It is because as is the aim, so are the characteristics that we develop, don’t we? Otherwise, what is the aim-object that we should set? Hm? The Father wants that every child should achieve the highest on high post. So, the highest on high aim-object has been set. We have to become Lakshmi-Narayan. Which Lakshmi-Narayan? The name itself is Narayan. They will be numberwise only. Naar means the water of knowledge. Ayan means home. Those who live in the house of water of knowledge. It means those who live in [the stage of] thinking and churning.

So, now the aim-object should be seen that how long we remain in thinking and churning. Thinking and churning also of what? Hm? Of the topics of scriptures? No. Of the topics of human beings, such human beings who believe in hearsay? No. Arey, you should think and churn about the topics that Baba comes and narrates, explains in the body of Brahma. Then this aim-object of becoming Narayan from nar (man) will come to the intellect. What do you have to become? You have to become direct Narayan from nar (man). It is not as if you have to become a prince. Hm? What do you have to become? Do you have to become a prince or Narayan? Hm? You have to become direct Narayan from nar (man). And will only one become direct Narayan from nar? Will there not be others who follow him? Will there be or will there not be? So, those who follow, then will they also become Narayan from nar and Lakshmi from naari (woman) in this birth itself or not? Although they will become numberwise. They will definitely become.

And then you also keep on listening to this story of Satyanarayana. Hm? Baba narrates the truest story of Satyanarayana. They keep on narrating false stories on the path of Bhakti. Hm? Leelavati, Kalavati, Lakadhara, Lakadbaggha; they keep on narrating so many things. Hm? They do not narrate the true story. They have named him Satyanarayan. Arey, the name is based on the task performed, isn’t it? So, Baba comes and narrates the truest story of Satyanarayana. Yes, when is the story (katha) formed? Katha means story. Why was the story formed? Definitely, yes, they acted, talked truthfully while living in the midst of false land, amidst false souls; so, when someone talks truthfully, people feel the pinch of chili powder, don’t they? Yes, so, a fight erupts. A war takes place. There is war of words as well. There is war of thoughts as well.

So, you keep on listening to this story of Satyanarayana. Do you listen to the story of subjects? Hm? Do the subjects (praja) learn rajyog? No. You children learn rajyog to become kings (raja). So, there are all kinds of souls among the subjects of kings. There is fourth class praja as well. There is third class praja as well. And some of the thieves are very wicked. They have to be brought under control, will they not have to be? Yes. And it is not as if you will become kings only in the Golden Age and Silver Age. You will become kings in the Copper Age and the Iron Age also, will you not? So, will there not be thieves there? Will there not be scoundrels and bums there? Will there not be goons? Will you not have to clash with them? Yes. So, where is the shooting performed? The shooting, the rehearsal takes place here. So, it was told that you don’t listen to the story of subjects. You listen to, yes, the story of Satyanarayana.

You have also heard the story of Sita-Ram. Yes. So, you know that the number one Sita, the number one Ram themselves become number one Satyanarayana. If there is Satyanarayana, then there will be Satyanarayani also. Hm? So, you people have heard the story of Sita-Ram as well, haven’t you? Yes. They say – No. That is it; we will listen to only the story of Satyanarayana. Arey? Why brother? Narrate the story of Satyanarayana. Hm? Why do you turn down the story of Ram-Sita? They say – Ram-Sita had failed. Arey, did just Ram and Sita fail? Does Maya make just Ram and Sita to fail? Does she not make anyone else fail? Does Maya leave anyone? Yes. She doesn’t leave anyone. Yes, it is true that she will make someone fail first and she will nicely trouble some people later on. So, it was told that is the one who failed initially more experienced or is the one who fails later more experienced? Who is experienced? The one who fails initially is more experienced, isn’t he?

So, children do not understand that the ones for whom in the beginning of the Yagyait was told that the souls of Ram and Sita failed; so, when they failed what did the Father do? Brother, you failed; so, you go. Take this bow and take this arrow. What? Whatever inheritance of the arrows of knowledge that I have and whatever I teach you, hm, how you should make purusharth through this body-like bow; you have to make this body-like bow so flexible that arrow can be fitted nicely and both the ends should meet. Hm? Then the arrow will be shot sharply, will it not be? Yes. So, that is it; He gives him the arrows. And He gives such a bow, the body-like bow, through that body-like bow will he make nice purusharth in the next birth or not? He will. And then He also gives the quiver (tarkash). What is a tarkash? Hm? Tarkash is hung on the back, i.e. intellect. Is it visible? It is not visible. Those arrows of knowledge are contained in the intellect. Yes.

So, as regards this story of Satyanarayana, it will not be said that those souls of Ram and Sita didn’t exist. Arey, it is the same souls of Ram and Sita who play first class part and who existed in the beginning of the Yagya. Yes, the Brahmakumar-kumaris think about them even today that there was a Piu, hm, Piu’s Vani used to be narrated. And they used to give directions even to Mama & Baba, they used to make them do drill, they used to make them do Yoga. So, they had a high part in the beginning, didn’t they? They were high in the beginning; so, when they were high in the beginning, then they will play a high part only in the end also, will they not? Yes. So, you shouldn’t think with hatred that brother, we will not listen to the story of Ram and Sita. They failed. We will listen to the story of Satyanarayana. Arey, they failed; so, you ask the Brahmakumaris, the Kumars that didn’t your Brahma Baba fail? Did he pass? Hm?

Did his body-like bow sail across the river of vices (Vishay-vaitarni nadi)? Arey, call it a bow, call it a boat, call it a ship, there are praises for him in the scriptures as well. It is said – Shankar-chaap jahaaj (Shankar-like ship). Jehi chadhi utraen paar nar (By boarding it men sail across). Doobi sakal sansaar (the entire world sinks). So, which soul is that soul of Shankar? The soul of Krishna plays the part of Brahma who is the Krishna perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age. It plays [the part], doesn’t it? So, tell, which soul plays the part of Shankar? Hm? It will be said that the soul of Ram plays the part of Shankar. One is righteous and one is sitting on the left [side]. You have seen the picture in Trimurti, haven’t you? One is loose. Hm? He accepts all the topics. Yes, children ask – Baba, there is a lot of trouble at home. My grandmother and my mother and my Father remain ill; they have grown old. And I too face difficulties in cooking. Should I get married? Yes, yes, child, Baba says that one such child should emerge who sets the example of leading a pure life; he should get married and lead a pure life. So, Baba gives permission. Yes, get married, get married. Arey, what did Baba say in the Murli and what is the direction that you gave? What has been said in the Murli? Marriage means ruination. You will fall on the first day itself. So, look, he (Brahma Baba) used to give such directions.

So, it was told that the soul in the beginning of the Yagya, hm, the souls of Ram & Sita, the same soul of Piu. And Baba also says that the Father is called Ram. Arey, the Father Himself is the seed. From where does the seed come? Does the seed exist within the mother? Hm? The name itself is Brahma. Brahma means the senior mother (bari amma). So, well, be it the four-headed senior mother or be it Brahma with the fifth head, the five-headed Brahma, the Brahma with his head facing upwards (oordhwamukhi). But even if it is the Oordhwamukhi Brahma, is the seed contained within him? Or is the Father himself the seed? The seed exists in the Father. So, it was told that this Brahma and Saraswati played their parts later on, didn’t they? Did they play the part of controlling in the beginning of the Yagya or did they play the part later on? They played the part later on, didn’t they? So, they are the ones who establish the Western Civilization, who played their parts initially in the East. East means before. Where does the Sun emerge? It emerges in the East. So, those who played their part first in the East are righteous. Even otherwise that is a physical Sun. It emerges in the morning. So, is it more beneficial to get sunlight in the morning or in the afternoon or in the evening? The morning light is more powerful, isn’t it? Yes.

So, that is it. You should not think that we will listen to the story of Satyanarayana; we will not listen to the story of Ram-Sita. Yes, it is true that the souls of Ram and Sita become tamopradhan in the end of the Iron Age; so, at that that time Baba has said that they write their own stories in their own scriptures. So, the story that the soul of Ram wrote in the Iron Age, in the tamopradhan Age, is like a novel. What? The true topic doesn’t exist in that. As such it is true that the story of becoming Narayan from nar (man) and the story of Ram-Sita are not different. Yes, it is true that he is the number one Narayan and some are latter Narayans. It has also been told [in the Murli]; Baba has narrated everything; He has also told that what do those who become Narayans become in the Silver Age? They become Ram-Sita. The serial number at which they become Narayan, they will become Ram-Sita of the same number. So, the number one Ram-Sita become the number one Narayan from nar (man) and Lakshmi from naari (woman). So, those Brahmakumar-kumaris who misunderstand stop making the pictures of the number one [Lakshmi-Narayan]. They make those pictures to vanish, they hide them, tear and throw them, burn them. So, look misunderstanding causes such confusion

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2843, दिनांक 07.04.2019
VCD 2843, dated 07.04.2019
रात्रि क्लास 19.11.1967
Night class dated 19.11.1967
VCD-2843-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.50
Time- 00.01-18.50


आज का रात्रि क्लास है 19.11.1967. भक्तिमार्ग में तो जिसको चाहिए जो किताब चाहिए, पुस्तक चाहिए वेद चाहिए, तो वो उठाए सकते हैं और पढ़ सकते हैं। मार्केट में से उठाएं, चाहे लाइब्रेरी में से उठाएं और सभी भाषाओं में हैं, पढ़ सकते हैं। और गीता भी सभी भाषाओं में है। और सारे ही ग्रंथ सभी भाषाओं में हैं। सिर्फ उसमें नहीं है। सिंधी में भी हैं। और शायद उर्दू में भी होगा। तो वह तो जिसको चाहिए तो उठा करके पढ़ लेवें। तो भक्ति मार्ग के वेद, ग्रंथ, शास्त्र पढ़े। वो सब भाषाओं में हैं। हँ? सिर्फ किसमें नहीं है? बोला ना सिर्फ उसमें नहीं है। नहीं। किसमें? हँ? संस्कृत भाषा में भी तो है ना। तो वो संस्कृत भाषा बनाई है। कहीं दुनिया में कहीं बोली जाती है? कहीं नहीं बोली जाती। समझते हैं कि बहुत ऊंची भाषा है। वो तो क्या कहेंगे? ज्ञान मार्ग की भाषा है या भक्ति मार्ग की भाषा है? क्या कहेंगे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, कहेंगे भक्ति मार्ग की भाषा है। जब कोई बोलता ही नहीं तो क्या कहेंगे? मरी हुई भाषा है या जिंदा है दुनिया में? मरी हुई है। तो जैसे वो भक्ति मार्ग में मरी हुई भाषा है वैसे ही ये तुम ब्राह्मणों की जो भाषा है ना वो किसी को समझ में नहीं आती दुनिया में। मरी हुई भाषा है। इस दुनिया में किसी को समझ में नहीं आती जब तक आकरके 7 दिन का कोर्स ना लें, 7 दिन की भट्टी में न बैठे। हां। तो देखा, बताया, सिर्फ उसमें नहीं है। उसमें माने? जो ब्राह्मणों की भाषा है उसमें नहीं है। बाकी सब भाषाओं में भक्ति मार्ग के ग्रंथ, शास्त्र तो मिलेंगे। तो लोग उठाएं और पढ़ें।

यहां तो बाप बैठकर के पढ़ाते हैं। कैसा बाप? दुनिया में तो जितने बाप हुए हैं उनके मुकाबले कोई वंडरफुल बाप है या तुरिया बाप कहें? तुरिया बाप है। तुरिया माने उस जैसा और कोई बाप हो ही नहीं सकता। तो यहां तो वो तुरिया बाप बैठकर के पढ़ाते हैं। कौन? आत्माओं का बाप। उनकी आत्मा की भाषा है। हँ? आत्मा की भाषा जो आत्मा समझेंगे पहले कम से कम सुन करके समझ तो ले कि हां हम आत्मा हैं। भले प्रेक्टिस नहीं है सदा काल की आत्मिक स्थिति में टिकने की तो भी मानें तो, जान तो लें। हाँ। तो वो आत्मिक भाषा बाप बैठ पढ़ाते हैं। और वो है चलती आती है। कौन सी भाषा?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, दुनिया में जो भी भाषाएं हैं और संस्कृत में जैसे गीता है वो भी चलती आ रही है। ये जन्म-जन्मांतर के ही पुस्तकें चली आती हैं। हर जन्म में तुम देखते हो चाहे उर्दू में हों, अरबी में हों, फारसी में हों, अंग्रेजी में हों, जर्मन में हों, वो पुस्तकें चली आ रही हैं। परंतु ये जो बाप बैठकरके समझाते हैं वो भाषा जन्म-जन्मांतर नहीं चलती है। कहां? इस एक ही जन्म में संगमयुग में चलती है। वो है ही इस एक जन्म के लिए। कौन सी भाषा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, रूहानी भाषा। रूहानी भाषा, रूह की रूह से रिहान, रूह रिहान करो। क्या? उसमें देह की जरूरत ही नहीं। क्यों? क्योंकि रूह तो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है ना। देह तो दिखाई पड़ेगी। देह के मुख में से आवाज निकलेगी। मुख को शंख कहते हैं ना। हाँ, तो गीता में लिखा है जब महाभारत युद्ध हुआ तो सबने अपने-अपने शंख बजाए। वो समझते हैं कि वो शंख बजाया, स्थूल शंख वो जो सागर में एक कीड़ा होता है ना उसका मुख होता है बड़ा बुलंद तो उसको, उसकी हड्डी निकाल लेते हैं। तो वो शंख। अरे उस शंख की बात थोड़े ही है। ये तो प्रैक्टिकल में मुख रूपी शंख है जिस शंख को बाप आ करके, हँ, अपना मीडिया बनाते हैं। हाँ।

तो ये बाप बैठ करके समझाते हैं। वो तो है ही इस एक जन्म के लिए। क्या? क्या समझाते हैं? जो भी रूहानी भाषा समझाते हैं, सुनाते हैं, वो इस एक जन्म के लिए जन्म-जन्मांतर वो भाषा चलती नहीं है। इस जन्म में जितना उठाया; किस जन्म में? कहेंगे संगम। अरे वो संगम नहीं सतयुग त्रेता का, त्रेता द्वापर का, द्वापर कलियुग का। नहीं। ये जो पुरुषोत्तम संगमयुग है। कौनसा? हँ? कलियुग और सतयुग के बीच का संगम। तो इस जन्म में जो 100 साल का संगम है ना। और भी धर्मपिताएं जो आए, विधर्मी धर्मपिताएं आए ना। चाहे चंद्रवंशी हों, चाहे इस्लामी हों, चाहे बौद्धी हों, क्रिश्चियन हों, कोई भी हों, उनके सहयोगी धर्मपिताएं हों। तो वो धर्मपिताएं आकरके अलग-अलग जन्मों में अपनी-अपनी भाषाएं उनकी चली हैं तो उनमें सुनाते रहे हैं उनके ग्रंथ सुनाए जाते रहे। और ये जो रूहानी भाषा बाबा बोलते हैं शिव बाबा ये तो इस एक ही जन्म में जितना उठाया; कौन सा? पुरुषोत्तम संगमयुग में। पुरुषों में; पुरुष माने आत्मा बताया ना। तो पुरुषों में आत्माओं में उत्तम से उत्तम पार्ट बजाने वाली कौन-कौनसी आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो जब जानकारी होती है तो उस संगम को कहते हैं पुरुषोत्तम संगम युग।

तो इस जन्म में जो जिसने जितना उठाया, जितना धारण किया और दूसरों को कराया इतनी ही उनकी जन्म-जन्मांतर की मिल्कियत बन जाती है, प्रॉपर्टी बन जाती है। कैसे? ये भाषा वहां चलेगी दूसरे जन्मों में? 84 के चक्कर में चलेगी? नहीं चलेगी। भले नहीं चलेगी लेकिन बाप कहते हैं ये जो रतन, तुमको ज्ञान रतन मिलते हैं रूहानी भाषा के ये ज्ञान रतन जो हैं तुम्हारे स्थूल रतन बन जाएंगे। क्या? ये तो मानसी सृष्टि चल रही है ना। ये मानसी सृष्टि में मनसा के द्वारा जो शूटिंग हो रही है वो कोई स्थूल चीज थोड़े ही है। मन-बुद्धि स्थूल है? नहीं। मन-बुद्धि भी स्थूल नहीं है और ये मन-बुद्धि के द्वारा जो सृष्टि रची जा रही है वो भी कोई, हां, स्थूल चीज थोड़े ही है। तो तुम्हारा जो ज्ञान है वो गुप्त ज्ञान है रूहानी ज्ञान। रूह ही समझती है। और सुनाने-समझाने वाला भी रूह है। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तो इस दुनिया में तो सिर्फ ये 100 साल की बात है। जितना जिसने उठाया उतना उठा लेते। उसके बाद तो कभी, हां, फिर ये होगा? ये जो रूहानी रतन है मनसा; मनसा और बुद्धि के द्वारा जो मानसी सृष्टि बन रही है वो फिर स्थूल सृष्टि बन जावेगी। सतयुग में स्थूल शरीर की सृष्टि होगी या सिर्फ मनसा की सृष्टि होगी? (किसी ने कुछ कहा।) हां, स्थूल शरीर। भले सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियों से पैदाइश होगी; स्थूल इंद्रियों से द्वापरयुग से पैदाइश होगी। लेकिन होगी तो स्थूल शरीर के द्वारा ना। हां।

तो ये जो तुम्हारी मिल्कियत है रूहानी ज्ञान रत्नों की वो स्थूल ज्ञान रतन बन जावेगी। स्थूल शरीर के लिए स्थूल ही तो चाहिए ना। हां। क्योंकि ये मिल्कियत है। और वो जो दुनिया में मिल्कियत है सोना, चांदी, हँ, वो जो जितने भी मेटल हैं ना, पहले तो वो ही चलता था। अभी तो कागज के नोट निकल पड़े। वह भी तो मिल्कियत ही हो गई ना। हां। तो ये जो मिल्कियत है ना, हाँ, बड़े-बड़े महल-माडियां, अटारियां, कारखाने, कल-कारखाने, वो भी मिल्कियत हुई ना। हां। खेती-बाड़ी, दुकानदारी, ये सब मिल्कियत है उस दुनिया की स्थूल मिल्कियत। और वो कोई मिल्कियत थोड़े ही है बच्ची। यहां संगम युग में वो मिल्कियत है क्या? वो नहीं। कौन सी मिल्कियत? हां, ये तो रूहानी ज्ञान की रूहानी मिल्कियत है। तो वो नहीं है। वो तो ऐसे पढ़ना है, हाँ, वो भी जैसे और पढ़ाई पढ़ी जाती है। हँ? ये रूहानी पढ़ाई भी ऐसे ही पढ़ी जाती है। उस पढ़ाई में भी पैसा कमाया जाता है, मिल्कियत कमाई जाती है ना, जायदाद कमाते हैं। और इसमें भी? इसमें भी वो ज्ञान रतन जो तुम्हारे हैं वो तुम्हारा पैसा है वो कमाया जाता है।

वो स्थूल रतन और ये सूक्ष्म ज्ञान रतन। क्या? ज्ञान रतन को सूक्ष्म कहेंगे या स्थूल कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, स्थूल ज्ञान धन-संपत्ति जो है वो गुरुओं के द्वारा सिखाई जाती है कि तुम ये धंधा करो, धोरी करो, ये ब्राह्मण बनो, ये बड़े-बड़े यज्ञ रचो, तुम्हें बहुत पैसा मिलेगा ये है और वो है। ये धंधा ब्राह्मणों का है, ये धंधा क्षत्रियों का है, राजा बनो, पूरी राज्य की प्रजा की पूरी मिल्कियत तुम्हारी है। और वो वैश्यों की खेती करो, जानवर पालो और ये सब तुम जो कुछ है सो अपने कब्जे में करो सारी खेती-बाड़ी जमीन। हाँ। और शूद्रों की? अरे तुम सब की सेवा करो। सेवा से तुमको ढेर सारी मिल्कियत मिल जाएगी। तो वो तो स्थूल मिल्कियत हो गई। और ये? ये कौनसी मिल्कियत? ये तो रूहानी ज्ञान की मिल्कियत है। तो जैसे वो मिल्कियत स्थूल कमाई जाती है वैसे ही ये ज्ञान रत्नों की इसकी भी पढ़ाई है। वो पढ़ाई जैसे पढ़ी जाती है ये भी पढ़ाई पढ़ी जाती है। और उनको जो स्थूल पैसे मिलते हैं यहां भी तुमको सूक्ष्म ज्ञान रतन मिलते हैं कि नहीं? हां, मिलते हैं।

तो सो हर एक जन्म में पैसा मिलते हैं। हँ? और जो उस दुनिया में वो स्थूल पैसा मिलता है सोना-चांदी मिलता है। और यहां? यहां तो ज्ञान रत्नों का धंधा है। तो समझो इस समय में कोई साधु, संत, महात्मा है और वो साधु, संत, महात्मा का कोई बड़ा मठ-मंडलेश्वर बने पड़े हैं तो वो कोई बहुत धन छोड़ करके जाते हैं अपने मठ पंथ में। छोड़के जाते हैं ना। हाँ। अभी देखो दक्षिण भारत में एक मंदिर में कितना धन मिला। छोड़ के गए ना। हाँ। लेकिन वो छोड़ कर गए किसी के काम आया? किसी के काम नहीं आया। हां। और वो अभी भी दबा पड़ा है। कुछ सरकार ने निकाला। हां, भ्रष्टाचारी सरकार ने निकाला तो भ्रष्टाचारी तो क्या करेंगे? विदेशों में भेज देंगे। स्विस बैंक में डाल देंगे। भारत वासियों को तो कोई फायदा नहीं। तो वो जो साधु, संत, महात्माएं जो धन छोड़ करके जाते हैं, ऐसे नहीं है कि फिर जाकरके उसी स्थान में जन्म लेंगे। लेंगे? हँ? उसी मंदिर में, उसी मठ-पंथ में जाके जन्म लेंगे? नहीं लेते हैं। ऐसे तो नहीं है ना।

ये जो तुम्हारी नॉलेज है ये तो तुम जहां जाकरके जन्म लेंगे। हँ? चाहे सतयुग में, चाहे त्रेता में, स्वर्ग में और चाहे नरक की दुनिया में, द्वैतवादियों दैत्यों की दुनिया में, राक्षसी दुनिया में जो दुखदाई राक्षस हैं। इस्लामी आते हैं ना ढाई हजार साल से, हां, तो उन्होंने हिंसा की या नहीं की? हां, हिंसा की। तो राक्षस हुए ना ना। हां। मुसलमान आए उनके फॉलोअर्स। तो उन्होंने हिंसा की। तो जो हिंसा करते हैं वो हिंसा करने वाले दैत्य कहे जाते हैं। क्या? हां। दैत्य क्यों कहे जाते हैं? दिति माने चीरना-फाड़ना। अरे जो हिंसा करेंगे वो क्या करेंगे? शेर क्या करता है? चीता क्या करता है? चीर-फाड़ कर देता है ना। हां, तो ये हिंसक जो हैं ये तो फिर जहां उन्होंने अपनी धन-संपत्ति इकट्ठी की थी मठ-पंथ, संप्रदाय में वो तो वहां जन्म नहीं लेते। और तुम? तुम तो कोई भी जन्म में जाकर के जन्म लेंगे कोई भी युग में तो ये जो तुम्हारी नॉलेज है ना रूहानी नॉलेज ये तो तुम्हारे, हां, तुम्हारे साथ रहेगी। और उसके साथ होने के कारण तुम्हारे अंदर जो इसका जो मूल तंत है आत्मिक स्टेज, वो कुछ ना कुछ कलियुग के अंत तक चलती रहेगी। और जितनी-जितनी आत्मिक स्टेज धारण करेंगे योग बल से, हँ, तो बाप से योग लगाएंगे ना तो बाप तो सदा काल की आत्मा है। कि कभी देह बनता है? देह तो नहीं बनता।

तो तुम्हारी जो आत्मिक स्थिति है वो नंबरवार बनती है। काहे से? इस नॉलेज से। तो ये तुम्हारी नॉलेज तो ये तो जहां जाकरके जन्म लेंगे फिर वहां जाकर के वो साथ ही जाएगी इसकी प्रारब्ध। और वहां तो धन ही धन होगा तुम्हारे पास। बताया ना ये जो स्थूल ये जो तुम्हें सूक्ष्म ज्ञान धन ज्ञान रतन मिलते हैं ना ये वहां जाकरके उतना स्थूल धन का भंडार बन जावेंगे। तो दूसरी तो कोई बात नहीं है ना यहां।

Today’s night class is dated 19.11.1967. On the path of Bhakti, whoever wants whichever book, whether they want a textbook or the Veda, they can pick it and read it. They may get it from the market or pick it from a library and they can read it in all the languages. And the Gita is also available in all the languages. And all the scriptures are available in all the languages. They aren’t available only in that [language]. They are also available in Sindhi and perhaps they will be available in Urdu too. So, whoever wants those [books], he can pick them and read them. You read the Vedas, books, scriptures of the path of Bhakti. They are available in all languages. It isn’t available in just which language? It was said: It isn’t available only in that [language], wasn’t it? No. In which [language]? It is available in Sanskrit too, isn’t it? So, they have made the Sanskrit language. Is it spoken anywhere in the world? It isn’t spoken anywhere. They consider it to be a very high language. For that… what will be said? Is it the language of the path of knowledge or the path of Bhakti? What will be said?
(Someone said something.) Yes, it will be said that it is the language of the path of Bhakti. When no one speaks it at all, what will be said? Is it a dead language or a language that is alive in the world? It is dead. So, just like it is a dead language on the path of Bhakti, similarly, no one in the world understands the language of you Brahmins. It is a dead language. No one in the world understands it until they come and do the seven days course and undergo the seven days bhatti. Yes. So look, it was said: It isn’t available only in that [language]. What does ‘that’ mean? It isn’t available in the language of the Brahmins. The books and scriptures of the path of Bhakti will be available in all other languages, so, people may pick them and read them.

Here, the Father sits and teaches [us]. What kind of a Father? Is He a wonderful Father compared to all the fathers of the world or will He be called a unique (turiya) Father? He is a unique Father. Unique means there can be no other Father like Him at all. So, here that unique Father sits and teaches [us]. Who? The Father of the souls. His [language] is the language of the souls. Hm? Those who consider themselves as a soul [will understand] the language of the souls. First, at least they should listen to it and understand: ‘yes, we are a soul’. Although they don’t have the practice to remain in the soul conscious stage forever, at least they should accept it, know it. Yes. So, the Father sits and teaches that spiritual language. And that [language] continues. Which language?
(Someone said something.) Yes, all the languages in the world… For example, there is the Gita in Sanskrit; that has also continued. Those very books continue birth after births. You see, those books, whether they are in Urdu, Arabic, Persian, English [or] German, they have continued in every birth. But this language that the Father sits and explains [to us] doesn’t continued birth after birth. Where? It continues only in this one birth, in the Confluence Age. It is only for this one birth. Which language? (Someone said something.) Yes, the spiritual language. The spiritual language… have a spiritual chit chat. What? There isn’t the need of the body in it at all. Why? It is because the soul is certainly the mind and the intellect like soul, isn’t it? The body will be visible. The voice comes out of the mouth in the body. The mouth is called conch, isn’t it? Yes. So, it is written in the Gita: When the Mahabharata war was waged, everyone blew their conch. They think that they blew that conch, the physical conch. There is a creature in the ocean; its voice is very loud. So, they take out the bone. So, that conch. Arey, it isn’t about that conch. It is the conch like mouth in practical that the Father makes as His media after coming. Yes.

So, this Father sits and explains: It is in fact for this one birth. What? What does He explain? The spiritual language that He explains and narrates is for this one birth. That language doesn’t continue for birth after birth. The extent to which you grasp it in this birth; In which birth? It will be said, in the Confluence Age. Arey, not that confluence of the Golden Age and the Silver Age, the Silver Age and the Copper Age, the Copper Age and the Iron Age. No. This Elevated Confluence Age. Which [confluence]? The confluence of the Iron Age and the Golden Age. So, in this birth; The Confluence Age is of 100 years, isn’t it? The other religious fathers who came, the vidharmi religious fathers did come, didn’t they? Whether they are the Chandravanshis (those of the Moon dynasty), those of Islam, the Buddhists, the Christians or whoever they are, their helper religious fathers, so, those religious fathers come and; There have been their own languages in different births, so they narrated in that [language]. Their scriptures have been narrated [in those languages]. And this spiritual language that Baba, ShivBaba speaks, the extent to which someone grasps it in this one birth; which [birth]? The Purushottam Confluence Age. Among the purush; It was said, purushmeans the soul, wasn’t it? So, among the purush, among the souls, which are the souls who play the most elevated part on this stage like world, the confluence in which you get this information is called the Purushottam Confluence Age.

So, in this birth, the extent to which someone grasps [this language], assimilates it and makes others assimilate it, he makes his property (milkiyat) for many births to that extent. How? Will this language continue there, in the other births? Will it continue in the cycle of the 84 births? It won’t. Although it won’t continue, the Father says: These gems, the gems of knowledge of the spiritual language that you receive will become the physical gems. What? This is the maansi world (the world born from the mind), isn’t it? The shooting that is being performed through the mind in this maansi world isn’t something physical. Are the mind and the intellect physical? No. The mind and the intellect aren’t physical and yes, the world that is being created through the mind and the intellect isn’t physical either. So, yours is the secret knowledge, the spiritual knowledge. The soul alone understands it. And the one who narrates and explains it is also a soul.
(Someone said something.) Yes. So, it is only about these 100 years in this world. Someone can grasp it as much as he wants; after that he can never; yes, then, will this exist? These spiritual gems of the mind; the maansi world that is being created through the mind and the intellect, it will turn into the physical world. Will there be the world of the physical body in the Golden Age or will there be just the world of the mind? (Someone said something.) Yes, [there will be the world of] the physical body. There will be the creation of the subtle sense organs (gyanendriyaan) and there will be creation through the physical organs from the Copper Age; but it will certainly be created through the physical body, won’t it? Yes.

So, the property of your spiritual gems of knowledge will become physical gems of knowledge. Physical [gems] are required for the physical body, aren’t they? Yes. It is because this is property and the properties of the world [i.e.] gold, silver… all those metals... Earlier that is what was used [as currency], now paper notes have emerged, so, that is also property only, isn’t it? Yes. So, the properties of big palaces, multi storied buildings, factories, machines and factories, they too are properties, aren’t they? Yes. Farming, shop keeping, all these are the properties of that world, the physical properties. And daughter, that isn’t the property. Is there that property here in the Confluence Age? Not that. Which property [do we have here]? Yes, there is the spiritual property of the spiritual knowledge. So, there isn’t that [property]. You should study it like the other studies (of the world) are studied, hm, this spiritual study is also learnt in the same way. Money is earned in that study too, the property is earned, isn’t it? The property is earned. And even in this [study]? In this study too, your gems of knowledge which is your wealth is earned.

Those are the physical gems and these are the subtle gems of knowledge. What? Will the gems of knowledge be called subtle or physical?
(Someone said something.) Yes. The [way to earn] physical wealth and property is taught by the gurus that you pursue this occupation and business, become a Brahmin, organize big yagyas, you will receive a lot of money, this and that; this occupation belongs to the Brahmins, this occupation belongs to the Kshatriyas, become a king, the entire property of the kingdom, of the subjects is yours. And do farming, [the task] of the Vaishyas, rear cattle and keep all this farming and land under your control. Yes. And what about the Shudras? Arey, you serve everyone, you will receive a lot of properties by serving. So, that is the physical property. And this? What is this property? This is the property of the spiritual knowledge. So, just like that physical property is earned, in the same way, this is also the study of these gems of knowledge. Just like you study that knowledge, similarly this knowledge is also learnt. And [just like] they receive physical money, here too, do you receive the subtle gems of knowledge or not? Yes, you do receive.

So, you receive money in every birth. Hm? You receive physical money, gold, silver in that world. And here? Here, there is the business of the gems of knowledge. So, suppose at this time there are some sages, saints, great souls and if someone has become math-mandaleshwar (head of a sect) of those sages, saints, great souls. So, they depart leaving a lot of wealth in their sects [math-panth]. They leave it and go, don’t they? Yes. Look, recently so much wealth was found in a temple in south India. They left it, didn’t they? Yes. But did whatever they leave come in use for anyone? It didn’t come in use to anyone. And it is buried even now. The government brought out some of it. Yes, the corrupt government brought it out. So, what will the corrupt ones do? They will send it to the foreign countries. They will deposit it in a Swiss Bank. There is no benefit for the residents of India (Bharatvasis). The wealth that the sages, ascetics and great souls leave behind, it isn’t that they will be born in that very place. Will they? Hm? Will they be born in that very temple and sect? No, they won’t. It isn’t like that, is it?

This knowledge of yours, wherever you are born, hm, whether in the Golden Age, in the Silver Age, in heaven or in the world of hell, in the world of the dualistic demons, in the demoniac world, the demons who give sorrow. The people of Islam come 2500 years before, don’t they? Yes. So, did they use violence or not? Yes, they indulged in violence. So, they are demons, aren’t they? The Muslims came as their followers. So they used violence. So, those who use violence are called demons. What? Yes. Why are they called demons (daitya)? Diti means to rip and tear. Arey! What do those who use violence do? What does a lion, a cheetah do? It rips apart, doesn’t it? Yes. So, these violent ones who collected their wealth and property in their sects and communities aren’t born there. And you? In whichever birth or Age you are born, your knowledge, spiritual knowledge will be with you. And because of its with you, the main essence of it, the soul conscious stage will remain within you to some extent or the other till the end of the Iron Age. And the extent to which you assimilate the soul conscious stage through the power of Yoga, you will have Yoga with the Father, won’t you? The Father is certainly a Soul forever or does He ever become a body? He doesn’t become a body.

So, you attain the soul conscious stage number wise. Through what? It is through this knowledge. So, the attainment (praarabdh) of this knowledge of yours will go with you wherever you are born. And you will have wealth and only wealth there. It was said, wasn’t it? These subtle gems of knowledge that you receive will become the treasure of physical wealth there. So, there is no other topic here.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2844, दिनांक 08.04.2019
VCD 2844, dated 08.04.2019
रात्रि क्लास 19.11.1967
Night class dated 19.11.1967
VCD-2844-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.28
Time- 00.01-16.28


रात्रि क्लास चल रहा था - 19.11.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – ये जो दुनिया में पढ़ाइयां पढ़ाते हैं, ऐसे नहीं है कि ऊंची पढ़ाई पढ़ने के लिए सभी बनारस कॉलेज में जाते हैं। नहीं। ऐसी कॉलेजें तो इस दुनिया में ढ़ेर हैं जहां-तहां। परन्तु ये जो बेहद की नॉलेज है, रूहानी नॉलेज, वो फिर यहां पढ़ने आनी होती है। यहाँ माने कहाँ? जहाँ मधुबन में मुरलिया बाजे। ऐसे क्यों बोला? सभी मधुबन में तो मुरलिया बाजती है। हँ? बताया - फर्स्टक्लास मुरली है जो सन्मुख। और सेकण्ड क्लास वो है जो टेप रिकार्डर से सुनते हैं या टीवी में देखते हैं। थर्ड क्लास वो है जो कागज़ में सुनते हैं, पढ़ते हैं, सुनाते हैं। तो बताया, ये तो एक ही नॉलेज है और एक ही कॉलेज है। उसके लिए यहाँ ही पढ़ना आना होता है। बस। और इस टीचर के बिगर; किस टीचर के बिगर? हँ? किस तरफ इशारा किया? इस टीचर के बिगर और कोई पढ़ाय ही नहीं सकते हैं। हँ? और कोई माने कौन-कौन? हँ? चाहे कोई ब्रह्माकुमार हों, चाहे कोई ब्रह्माकुमारी हों, चाहे वो चतुर्मुखी ब्रह्मा हो, चार मुखों वाला, वो कोई भी ये पढ़ाई नहीं पढ़ाय सकते हैं सिवाय एक मुकर्रर रथधारी के। हँ? ये समझानी कोई दे ही नहीं सकते।

वो एक ही है। एक बिगर कोई दूसरा नहीं पढ़ाय सकते। अगर पढ़ाते भी हैं तो एक से समझ करके फिर औरों को पढ़ाते हैं। हँ? अब एक से कैसे समझेंगे? घड़ी-घड़ी माया जो है संशय में लाती रहती है। कि नहीं लाती है? लाती रहती है। तो फिर एक को जब अच्छे से समझेंगे और समझकरके फिर औरों को पढ़ाते हैं क्योंकि एक ही तो पढ़ाते हैं ना बच्ची। हँ? ऐसे तो नहीं कि ब्रह्मा के पांच मुख हैं तो पांचों मुख पढ़ाते हैं। हँ? नहीं पढ़ाते? अरे? बेसिक नॉलेज तो पढ़ाते हैं? नहीं? लेकिन बेसिक नॉलेज भी जो पढ़ाते हैं वो भी समझ में नहीं आती है तो पढ़ाने से फायदा क्या हुआ? थोड़ी समझ में भी तो आनी चाहिए। हाँ। ये ही बात नहीं बुद्धि में बैठती है। क्या? कि मुकर्रर रथ क्या होता है? टेम्परेरी रथ क्या होता है? और टेम्परेरी रथ कितने होते हैं और मुकर्रर रथ कितने होते हैं? कुछ भी पता नहीं है।

तो यहाँ जो एक से पढ़ाई पढ़ाई जाती है उसके ऊपर बहुत अटैन्शन चाहिए। हँ? अगर पढ़ाई के ऊपर अटैन्शन नहीं है तो फिर क्या होगा? और-और तरफ बुद्धि चली जाती है। और जब और-और तरफ बुद्धि चली जाती है; और-और तरफ माने? हँ? चतुर्मुखी ब्रह्मा के जो चार मुख हैं, हँ, जो अधोमुखी मुख हैं उनकी तरफ बुद्धि चली जाएगी तो क्या नुकसान होगा? हँ? नुकसान होगा या फायदा होगा? हाँ, नुकसान हो जाएगा। क्या नुकसान होगा? वो अधोमुखी ब्रह्मा जो है वो चारों मुख जो हैं वो नीचे की ओर खुद जाने वाले हैं चारों युगों में, तो तुमको भी कहाँ ले जावेंगे? नीचे की ओर ले जावेंगे। तो उसमें तुम्हारा नुकसान हो जाता है। हँ? इतनी पढ़ाई; कितनी? जितनी एक मुकर्रर रथधारी से पढ़ सकते हैं उतनी पढ़ाई और किसी टेम्परेरी मुख वाले ब्रह्मा से पढ़ ही नहीं सकते हैं। ऐसे बहुत हैं बच्चे। कैसे? हँ? कैसे बच्चे बहुत हैं? वो थोड़े नहीं हैं। कैसे? जो मुकर्रर रथ को पहचानते ही नहीं हैं। हँ? जिनकी पढ़ाई, पढ़ाई में ध्यान नही रहता है। फिर काहे में ध्यान रहता है? हँ? उनका जो ध्यान है ना वो काहे में रहता है? हँ? अरे, वो ही ब्रह्मा के जो चार मुख हैं ना, बस, वो मुख ही याद आते रहते हैं। या देह याद आती रहती है। मुख में से जो वाचा निकलेगी वो मिक्स ज्ञान सुनाएंगे या एक्यूरेट ज्ञान सुनाएंगे? हँ? मिक्स ही ज्ञान सुनाएंगे। और जब मिक्स ज्ञान सुनाएंगे तो फिर ऐसे ही बात हो जाती है जैसे दूध का भरा हुआ घड़ा हो, उसमें एक बूंद विष की डाल दो तो सारा ही? सारा ही विषैला हो जाएगा।

तो ऐसे जो बहुत बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई जो एक्यूरेट पढ़ाई है उस पढ़ाई में ध्यान ही नहीं रहता है। हँ? कुछ न कुछ चटक लगे और वो भी अच्छी चटक लगे। थोड़ा भी पढ़ें; किससे? उस एक मुकर्रर रथधारी जो सुप्रीम टीचर बाप है शिवबाबा, थोड़ा भी पढ़ें तो वो भी अच्छा। क्या? बाबा कहते हैं ना अगर थोड़ा भी पढ़ेंगे, पढ़ाएंगे तो विश्व के मालिक तो बनेंगे ना। हँ? विश्व के मालिक बनेंगे? विश्व के मालिक? अरे, विश्व का मालिक एक बनेगा कि अनेक बनेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) एक बनेगा? अरे? नहीं। बाप कहते हैं कि मैं आप समाना बनाता हूँ ना। तो मैं क्या विश्व का मालिक बनता हूँ? बनता हूँ? तो जिसको आप समान बनाऊंगा 100 परसेन्ट वो फिर विश्व का मालिकाना अपनी मुट्ठी में रखेगा सारा? हँ? रखेगा? छोटी-छोटी बातों के लिए भी वो अपना कंट्रोल चलाएगा क्या? नहीं चलाएगा ना। हाँ। फिर तो वो क्या हो गई? हिटलरशाही हो गई। हो गई कि नहीं हो गई? हाँ।

तो बताया, हाँ, जो और भी सहयोगी हैं ना वो सहयोगी भुजाएं जो मददगार बनती हैं सच्चाई से; हँ? कबसे लेकर कब तक? हँ? एक जनम या 2-4 जनम या सिर्फ 21 जनम? कितने जनम सहयोगी बनती हैं? हँ? अरे?
(किसी ने कुछ कहा।) 21 जनम सहयोगी बनती हैं? बाकि तलाक दे देती हैं, धोखा दे देती हैं? ऐसे? नहीं। वो जो भुजाएं हैं ना वो 83 जनम में भी पूरा सहयोग देती हैं। क्या? हाँ, एक के अलावा और कोई के सहयोगी नहीं बनते। जो गाते हैं ना, हँ, क्या? एक लिंग महाराज। मानते हैं कि नहीं? हाँ। एकलिंग को मानने वाले जो होते हैं वो एक लिंग को ही मानेंगे या अनेकों को पकड़ेंगे? हँ? एक को ही। उनके अंदर संस्कार भरे हुए हैं। तो वो तो शूटिंग पीरियड में भी, जबसे ज्ञान में निकलते हैं, तन से, मन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों की ताकत लगाकरके भी, हँ, किसके बनकरके रहते हैं? एक के ही बनकरके रहते हैं। क्या? वो अपने जेब का फूटी कौड़ी भी किसको नहीं देंगे? उनको नहीं देंगे। किनको? देह के संबंधियों को, या देह के संपर्क में जो आने वाले कितने भी हों प्यारे ते प्यारे, उनको नहीं देंगे। वो तो एक के बनकरके रहते हैं ना। उनकी खास पहचान है। जबसे ज्ञान में आवेंगे तबसे लेकर जबसे बाप को पहचानेंगे तबसे लेकरके वो एक बाप के ही बनकरके रहेंगे। हाँ, बाकि नंबरवार तो होंगे ना। नहीं होंगे? नंबरवार तो ज़रूर होंगे। कोई कम कोई ज्यादा।

तो ऐसे जो बच्चे हैं सहयोगी भुजाएं, हाँ, वो फिर जन्म-जन्मान्तर वो विश्व के मालिक ही कहे जावेंगे, विश्वपिता के साथ रहने वाले, हँ, उनके द्वारा बाप सारी विश्व को कंट्रोल करने वाला या अकेला ही कंट्रोल करता है? नहीं। हाँ। देखो, द्वापरयुग में भी जब शुरुआत होती है तो गायन है ना विक्रमादित्य के दरबार में नवरतन थे। तो नौ रतन जो हैं वो किसलिए थे? इसीलिए थे कि वो राजकाज सारा संभालते थे। हाँ। तो विश्व के मालिक तो बनेंगे ना। हाँ। और उनके कंट्रोल में चलने वाली जो प्रजा होगी वो भी तो यथा राजा तथा प्रजा होगी ना। हाँ। प्रजा भी विश्व का मालिक अपन को समझेगी या नहीं समझेगी? हँ? वो भी कहती है ना। कैसे? जैसे परिवार में छोटा बच्चा भी होता है, हँ, वो कहता है, उससे पूछे, अरे, ये कारखाना किसका है? तो क्या कहेगा? मेरा है, मेरे बाप का है। हँ? पूछने की क्या बात है? तुमको पता नहीं है? उमंग-उल्लास से कहेगा या ये कहेगा मेरे बाप का कारखाना है, मेरा तो नहीं है? ऐसे कहेगा? नहीं कहेगा।

तो बताया, तो इस हिसाब से मर्तबा तो बडा हुआ ना। किनका? चाहे प्रजावर्ग की आत्माएं हैं, चाहे राज-काज चलाने वाले ऊँचे-ऊँचे अधिकारी आत्माएं हैं, हँ, उनका मर्तबा तो अंदर से बड़ा है ना। हँ? कि प्रजा; प्रजा का मतलब क्या है? प्रकष्ट रूप से जा माने जन्म लिया जिसने। हँ? जिनकी प्रत्यक्षता रूपी जन्म प्रकष्ट रूप से हुआ। किसने दिया? बाप ने जन्म दिया। बाप ने बच्चों को प्रत्यक्ष किया। क्या होता है? बच्चे बाप को प्रत्यक्ष करते हैं, बाप बच्चों को प्रत्यक्ष करता है। ज्यादा पावरफुल कौन है? बच्चे ज्यादा पावरफुल होते हैं या बाप ज्यादा पावरफुल होता है? बाप ज्यादा पावरफुल होता है। तो बाप पहले बच्चों को प्रत्यक्षता रूपी जन्म देता है। क्या? हाँ। कि ये मेरे बच्चे हैं। और बच्चे भी यही समझते हैं कि ये मेरा बाप है। और मेरे सिवाय और किसी को सुख-शांति की मिल्कियत जो ज्ञान के द्वारा मिलती है, वो और किसी को, हँ, तहे दिल से और किसी को दे ही नहीं सकता। क्यों? क्योंकि सच्चे दिल के बच्चे जो होते हैं वो क्या कहते हैं? सच्चे दिल पर साहेब राज़ी। झूठे दिल के हैं वो अपना पोतामेल पूरा तन का, मन का, धन का, सब बातों का पोतामेल पूरा देंगे? बिल्कुल नहीं देंगे। नहीं देते हैं।

बोल दिया – हैं तो नंबरवार। आठ भी नंबरवार होंगे। लेकिन बताय दिया कि अपना पूरा-पूरा पोतामेल देने वाला कोई कोटों में एक ही है। तो बाकि तो फिर नंबरवार ही हुए ना। चलो, फिर भी देते तो हैं ना। हाँ, जितना भी देते हैं। हिसाब है। प्रजावर्ग में भी, हँ, अपना दिल सच्चा रखने वाले होंगे या दिल में एक बात है और बाहर से दूसरी बात? बाप कहते हैं जो अंदर से एक और बाहर से दूसरे होते हैं वो मेरे नज़दीक नहीं आ सकते। क्या? विश्व का पिता होगा ना, उसकी खासियत क्या है? उसकी खासियत बताई कि जो आदि लक्ष्मी और आदि नारायण के खास, आदि नारायण की ये खास क्वालिटी होगी। क्या? कि कोई भी आत्मा हो, प्रजावर्ग की हो, राजवर्ग की हो, हँ, दास-दासी वर्ग की हो, अधिकारी वर्ग की हो, सबके कनेक्शन में आता है। और सबसे बनाके रखता है। उसकी किसी से आमने-सामने की कोई ऐसा झगड़ा होता ही नहीं। तो बताया तो इस हिसाब से मर्तबा तो बड़ा हुआ ना। क्योंकि प्रजा भी कहती है हम विश्व के मालिक हैं। प्रजा माने बच्चे हुए ना। प्रजा। प्रकष्ट। जा माने जन्म लेने वाले। जिनको बाप से प्रकष्ट रूप से प्रत्यक्षता रूपी जन्म मिलता है। तो बाप के बच्चे हुए ना। हाँ।

A morning class dated 19.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was – The education that is being imparted in this world, it is not as if everyone goes to the Benares College to study higher education. No. There are numerous such colleges in this world everywhere. But in order to study this unlimited knowledge, the spiritual knowledge one has to come here. ‘Here’ refers to which place? To Madhuban where the Murli (flute) is played. Why was it said so? The Murli is played in all the Madhubans. Hm? It was told – First class Murli is that which is narrated face to face. And second class is that which you listen through the tape recorder or that which you see on TV. Third class is that which you listen from a paper, you read and narrate. So, it was told, it is the only knowledge and only college. For that you have to definitely come here to study. That is it. And without this teacher; Without which teacher? Hm? In which direction was a gesture made? None other than this teacher can teach at all. Hm? ‘None other’ refers to who all? Hm? Be it the Brahmakumars, be it the Brahmakumaris, be it the four-headed Brahma, the one with four heads, none of them can teach this knowledge except one permanent Chariot holder. Hm? Nobody can give this explanation at all.

He is only one. None other than one can teach. Even if they teach, they understand from one and then teach others. Hm? Well, how can they understand from one? Maya brings you in doubts every moment. Or doesn’t she? She keeps on bringing [you in doubts]. So, then when you understand one nicely and after understanding, you teach others because only one teaches, doesn’t He daughter? Hm? So, it is not as if there are five heads of Brahma, so, all the five heads teach. Hm? Don’t they teach? Arey? Do they not teach basic knowledge? No? But even the basic knowledge that they teach, they do not understand even that; so, what is the use of teaching? One should also understand a little. Yes. This topic itself doesn’t sit in the intellect. What? That what is a permanent Chariot? What is a temporary Chariot? And how many temporary chariots are there and how many permanent chariots are there? They don’t know anything.

So, you should pay a lot of attention to the education that is imparted here by one. Hm? What will happen if there is no attention on the studies? The intellect wanders in other directions. And when the intellect wanders in other directions; what is meant by ‘in other directions’? Hm? There are four heads of the four-headed Brahma; if the intellect moves towards the downward facing heads, then what will be the loss? Hm? Will you suffer loss or will you reap benefits? Yes, you will suffer loss. What will be the loss? The downward facing Brahma, all his four heads themselves move downwards in all the four Ages; so, where will they take you too? They will take you downwards. So, you suffer loss in that. Hm? Such education; How much? The knowledge that you can study from one permanent Chariot-holder, you cannot study through any Brahma with temporary head at all. There are many such children. How? Hm? What kind of children are more in numbers? They are not few. How? Those who do not recognize the permanent Chariot at all. Hm? They do not pay attention to the studies, the education. Then towards what do they pay attention? Hm? On what do they pay attention? Hm? Arey, the same four heads of Brahma; that is it, those heads only keep on coming to the mind. Or the body keeps on coming to the mind. The words that emerge from their mouth, do they narrate mix knowledge or accurate knowledge? Hm? They will narrate mix knowledge only. And when they narrate mix knowledge, then the topic is like if there is a pot full of milk and if you put a drop of poison in it, then the entire thing? The entire thing becomes poisonous.

So, there are many such children whose studies, they do not pay attention to the accurate studies at all. Hm? They should get some or the other enthusiasm and that too they should get good enthusiasm. They should study a little. From whom? Even if they study a little from that one permanent Chariot holder, the Supreme Teacher Father, ShivBaba, then that is also good. What? Baba says, doesn’t He that even if you study a little, teach a little, then you will become masters of the world, will you not? Hm? Will you become masters of the world? Masters of the world? Arey, will one person become master of the world or will many become?
(Someone said something.) Will one person become? Arey? No. The Father says that I make you equal to Myself, don’t I? So, do I become master of the world? Do I become? So, the one whom I make 100 percent equal to Myself, will he keep the entire ownership of the world in his hands? Hm? Will he keep? Will he exert control even for petty things? He will not, will he? Yes. Then what is that? It is Hitlerism. Is it or is it not? Yes.

So, it was told, yes, the other helpers, those helper arms, which become helpful truthfully; hm? From which time to which time? Hm? For one birth or for 2-4 births or just 21 births? For how many births do they become helpful? Hm? Arey?
(Someone said something.) Do they become helpful for 21 births? Do they give divorce, do they dupe for the rest of the births? Is it so? No. Those arms extend full help even in 83 births. What? Yes, they do not become helpful to anyone except one. It is sung, isn’t it? What? Ek ling Maharaj. Do they believe or not? Yes. Those who believe in Ekling, will they believe in only one ling or will they catch many? Hm? Only one. The sanskars are recorded in them. So, even in the shooting period, ever since they enter the path of knowledge, they remain faithful to whom through body, through mind, through wealth, through time, through contacts, through the power of the relatives? They remain faithful to one. What? To whom will they not give even a broken cowrie from their pocket? They will not give to them. To whom? To the relatives of the body or to those dearest ones who come in contact with the body, they will not give to them. They remain faithful to one, don’t they? This is their special indication. Ever since they enter the path of knowledge, ever since they recognize the Father, they will remain faithful to one Father only. Yes, but they will be numberwise, will they not? Will they not be? They will definitely be numberwise. Some less, some more.

So, such children, who are the helper arms, yes, they will then be called masters of the world birth by birth, who live with the Father of the world; does the Father control the entire world through them or does he control alone? No. Yes. Look, even when the Copper Age starts, then it is sung that there were nine gems in the Court of Vikramaditya. So, why did these nine gems exist? They existed because they used to take care of the entire governance. Yes. So, they will become masters of the world, will they not? Yes. And the subjects who work under their control will also be like the king (yatha raja tatha praja), will they not be? Yes. Will the subjects also consider themselves to be masters of the world or not? Hm? They too say, don’t they? How? For example, even if there is a small child in a family, hm, he says; if anyone asks him, arey, whose factory is this? Then what would he say? It is mine; it belongs to my Father. Hm? Where is the question of asking? Don’t you know? Will he say with zeal and enthusiasm or will he say that this is my Father’s factory, not mine? Will he say so? He will not say.

So, it was told that by this account the post is high, isn’t it? Whose? Be it the souls of the subjects category, be it the souls of high-ranking officials who run the government, hm, their position is big from inside, isn’t it? Hm? The praja (subjects); what is meant by praja? The one who was born in a special manner. Hm? Those who got revelation like birth in a special manner. Who gave? The Father gave birth. The Father revealed the children. What happens? Children reveal the Father, the Father reveals the children. Who is more powerful? Are the children more powerful or is the Father more powerful? The Father is more powerful. So, the Father gives revelation-like birth to the children first. What? Yes. That these are My children. And the children also think that this is my Father. And except me nobody else; the property of happiness and peace that one gets through knowledge; He cannot give that to anyone else from His heart [except me]. Why? It is because what do the children with a true heart say? Sachchey dil par saaheb raazi (God is pleased with the true heart). Will those with a false heart give their entire potamail of body, of mind, of wealth, of all the topics? They will not give at all. They do not give.

It was told – They are indeed numberwise. The eight will also be numberwise. But it was told that the one who gives his complete potamailis one in crores. So, all others are then numberwise only, aren’t they? Okay, however they do give, don’t they? Yes, to whatever extent they give. There is an account. Even among the subjects’ category, will they maintain a true heart or will they have something in their heart and something else outside? The Father says that the ones who are something inside and something else outside cannot come close to Me. What? What is the specialty of the Father of the world? His specialty was mentioned which would be special quality of the first Lakshmi and the first Narayan. What? That be it any soul, be it someone from the subjects category, be it someone from the royal category, hm, be it those from the category of servants and maids, be it those from the officers category, he comes in connection with everyone. And he maintains the relationship with everyone. He doesn’t enter into any fight with anyone face to face at all. So, it was told that by this account their position is big, isn’t it? It is because the subjects also say that we are masters of the world. Subjects means that they are children, aren’t they? Praja. Prakasht (special). Ja means ‘those who get birth’. Those who get revelation like birth from the Father in a special manner. So, they are the Father’s children, aren’t they? Yes.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
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रात्रि क्लास चल रहा था 19.11.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - भक्ति मार्ग में तो शास्त्रों में चतुर्युगी की आयु की बड़ी लंबी-चौड़ी दिखाय दी है। और वैसे भी वो लिखने वाले शास्त्र खुद भी तो कहते हैं नेति-नेति। हम आदि, मध्य, अंत को नहीं जानते। तो उन्हें 84 जन्मों का चक्कर कुछ भी याद नहीं रह सकता है। और ये भी जानते हो कि जो पढ़ाते हैं वो कहां पढ़ करके तो नहीं आते हैं ना। हँ? यहां तो ज्ञान सागर बाप बैठा हुआ है ना। ऐसे नहीं कि उनको कोई देहधारी मनुष्य पढ़ाता है। नहीं। वो तो मनुष्य सृष्टि का बीज रूप है। उसको कौन पढ़ाएगा? बीज माने बाप। तो बच्चे जानते हैं कि जो बीज चैतन्य होगा उनको तो जरूर सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान है क्योंकि बीज में तो सारा वृक्ष होता है ना। बीज से ही सारा वृक्ष निकलता है।

तो बताया, इसीलिए गाया जाता है ना कि जिससे भी पूछो ऋषि-मुनि से तो वो बोलेंगे ना मुझे आदि, मध्य, अंत का ज्ञान सृष्टि का नहीं है। नेति-नेति कहते आए। शास्त्रों में ही लिख दिया। तो भई तुमको ये आदि, मध्य, अंत का ज्ञान नहीं है तो भई किसमें है? तो ये तो ज़रूर कह देते हैं कि ज्ञान का सागर तो परमपिता परमात्मा है। अरे, परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है तो फिर सूर्य कौन है? हँ? अरे, सागर में ज्यादा ज्ञान की रोशनी होती है, हँ, ज्ञान की गर्मी होती है या सूर्य में ज्यादा गर्मी होती है, ज्यादा रोशनी होती है? ज्ञान को रोशनी कहा जाता है ना। तो सूर्य में ज्यादा ज्ञान की रोशनी होती है, गर्मी होती है। और उस गर्मी को सागर सबसे जास्ती ग्रहण करता है। ऐसे तो नहीं है कि नदियां ग्रहण करती है जास्ती, पहाड़ ग्रहण करते हैं, पोखरे ग्रहण करते हैं, तालाब ग्रहण करते हैं, नहरें ग्रहण करती हैं। नहीं। सागर ही ज्ञान को सबसे जास्ती ग्रहण करता है। तो वो ज्ञान का सागर किससे लेता है ज्ञान? उस जड़ सूर्य से लेता है क्या? नहीं। वो तो ज्ञान लेता ही है चैतन्य ज्ञान सूर्य से। जैसे वो जड़ सूर्य सदा सागर से, पृथ्वी से, पहाड़ों से, नदियों से, मनुष्य मात्र से, प्राणी मात्र से डिटैच रहता है ना। ऐसे ही ये जो ज्ञान सूर्य है ना, हां, सभी आत्माओं का बाप, हां, वो तो सदा डिटैच रहने वाला ज्ञान सूर्य है। तो वो मानेंगे जरूर कि हाँ, ज्ञान सूर्य भी कोई है और अति सूक्ष्म है, चैतन्य है। क्योंकि वो जो आसमान का सूर्य है, चांद है, सितारे हैं, वो तो जड़ हैं। और इस सृष्टि पर तो आत्मा रूपी सितारे हैं। हँ? कोई चांद है। और इस सृष्टि पर पार्ट बजाने वाला सूर्य भी तो कोई होगा। हँ? पार्ट तो बजाता है लेकिन सदैव डिटैच होकर के पार्ट बजाता है। कोई में अटैचमेंट उसका जाता ही नहीं।

तो वो है परमपिता परमात्मा शिव कहा जाता है। उसको परमात्मा नाम क्यों लगाय दिया? परमपिता दो नाम क्यों लगाय दिए? वो भी तो बताया ना। परमपिता इसलिए कि वो सब आत्माओं का पिता है। जो भी बिंदु-बिंदु निराकर ज्योति स्टार रूप आत्माएं हैं सबका पिता। उसका कोई पिता नहीं है। और पीछे से परमात्मा शब्द लगाया जाता है। ऐसे थोड़े ही कि परमात्मा परमपिता कहेंगे कोई? नहीं। जैसे कहते हैं शिव शंकर भोलेनाथ। तो कभी ऐसे कहते हैं शंकर शिव भोले नाथ? कभी नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि जो बाप है उसका नाम आगे और बच्चे का नाम पीछे। तो ऐसे ही परम पिता, जो आत्माओं का पिता है शिव, वो इस सृष्टि पर आते हैं, तो इस सृष्टि पर पार्ट बजाने वाली जो भी मनुष्य आत्माएं हैं क्योंकि मनुष्यों को ही समझाएंगे ना। क्यों? और दूसरे प्राणियों को क्यों नहीं समझाएंगे? अरे, शास्त्रों में तो लिखा हुआ है कच्छ अवतार, मच्छ अवतार, मत्स्यावतार, वराह अवतार, हँ, घोड़ा अवतार। क्या-क्या अवतार दिखाई दिए हैं जानवरों के। अरे भाई, चैतन्य ज्ञान का सागर है तो ज्ञान जानवरों को सुनाएगा क्या? हँ? और जानवर ज्ञान सुनेंगे क्या? समझेंगे? अरे, यहां तो मनुष्यों में प्रवेश करते हैं, हँ, उनके मुख से जो सुनाते हैं वो ही नहीं समझ पाते। ये जो 4 मुखों का ब्रह्मा दिखाया है ना शास्त्रों में, तो 4 मुखों का ब्रह्मा भगवान की बातों को समझता है? हँ? अगर समझता होता तो चारों मुख एक ही बात बोलेंगे ज्ञान की कि अलग-अलग बातें अलग-अलग प्रकार से ज्ञान सुनाएंगे? हँ? एक ही बात बोलेंगे। इससे तो साबित होता है ना कि वो समझते कुछ भी नहीं है।

तो परमपिता तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर तमोप्रधान दुनिया में, कलियुग के अंत में आता है तो ऐसी आत्मा को पकड़ता है जो जन्म-जन्मांतर भले नीचे तो गिरती है, सतोप्रधान से तमोप्रधान तो हर आत्मा को बनना ही है। परंतु फिर भी औरों के मुकाबले सत्य पार्ट बजाती है या झूठा पार्ट बजाती है? सच्चाई का पार्ट बजाती है। सच बाप का बच्चा नंबरवार होंगे ना इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर? हँ? कि एक जैसे होंगे? नंबरवार। तो जो अव्वल नंबर बच्चा है उसका नाम गीता में भी, शास्त्रों में लिखा हुआ है शास्त्रकारों ने। क्या? हाँ, कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली दो प्रकार की खास आत्माएं हैं। याद हैं कौन-कौन सी? हँ? एक तो क्षर और एक अक्षर। हां, क्षर माना क्षरित होने वाली। अक्षर माने जो क्षरित होती ही नहीं। पतित होती ही नहीं। शक्ति क्षीण होती ही नहीं। तो दो प्रकार की आत्माएं हुई ना।

तो जो क्षरित होने वाली आत्माएं हैं वो तो ढेर की ढेर हैं। पशु-पक्षी, प्राणी, जितने भी मात्र हैं भोगी आत्माएं, वो सब क्षरित होती हैं। भोग भोगेंगी तो शक्ति क्षीण होगी ना सुख भोगने से। हाँ। सभी भोगी आत्माएं हैं। लेकिन जो अक्षर आत्मा है वो कितनी हैं? हँ? बोलो। अरे लिखो भई। कितनी हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) एक? अच्छा? अक्षर आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली कितनी हैं? लिखते ही नहीं। कहेंगे अब हम ये प्रश्न पत्र का जवाब नहीं देंगे। (किसी ने कुछ कहा।) दो। लो एक कहता है एक और दूसरा कहता है दो। तीसरा कहेगा तीन। अरे? अरे भाई दो प्रकार की आत्माएं बताई। तो जो अक्षर हैं वो भी दो प्रकार की आत्माएं, हँ, हैं तो उनमें अक्षर भी दो हैं कम से कम। क्या? एक तो आत्माओं का बाप अक्षर। और वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता है तो आप समान किसी को तो बना के जाएगा। हँ? हां। टीचर पढ़ाई पढ़ाए और सब फेल हो जाए तो कहेंगे कि टीचर ने पढ़ाया? नहीं। टीचर पढ़ाई पढ़ाए और एक निकले फर्स्ट क्लास, टॉप मोस्ट यूनिवर्सिटी में। तो क्या कहेंगे कि टीचर ने पढ़ाई पढ़ाई कि नहीं पढ़ाई? तो टीचर जो है सुप्रीम टीचर बाप भी आते हैं तो इस सृष्टि पर आकरके बताते हैं कि बच्चे तुम आत्मा हो ज्योति बिंदु आत्मा। जैसे मैं ज्योति बिंदु हूं ऐसे तुम भी ज्योति बिंदु आत्मा को।

तो तुम निराकारी हो। हँ? आत्मा भी जब निराकारी स्टेज धारण करती है तो निर्विकारी भी हो जाती है। निरहंकारी हो जाती है क्योंकि अहंकार तो देह का होता है ना। तो देह अहंकार भी नहीं होता। जैसे मैं निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, ऐसे तुम आत्माएं भी निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बन जाती हो। हँ? तो अब नंबरवार बनेंगे कि सब एक साथ बन पड़ेंगे? हँ? नंबरवार बनेंगे ना। तो जो अव्वल नंबर, जो ओटे सो अर्जुन, अव्वल नंबर का गायन होता है ना। तो जो अव्वल नंबर मिलता है बाप को बच्चा जो बस 7 दिन का कोर्स लिया, अरे 6 दिन भी पूरे हुए और बुद्धि में फट से बैठ जाता है कि मैं देह नहीं हूं, क्या हूं? ज्योति बिंदु आत्मा। और आत्मिक स्थिति में टिकना शुरू कर देता है। तो निराकार बाप है तो निराकार बाप किससे बात करेगा? हँ? निराकारी निराकारी से बात करेगा ना। और निराकारी; अरे, हाथी हाथी से बात कर लेता है। चींटी है; चींटी देखा होगा ना। चींटी चल रही है एक-दूसरे से मोहरा मिलाती हैं, बस, एक-दूसरे से बात हो जाती है। चींटी चींटी से बात करेगी। पक्षी पक्षी से बात करेगा। तो निराकार शिव बाप किससे बात करेगा? जो निराकार पहले बनेगा बस उसी से बात करेगा।

तो वो निराकार बाप वो निराकारी आत्मा जो बनती है, भले थोड़े समय के लिए, धीरे-धीरे बढ़ेगी ना प्रैक्टिस क्योंकि अनेक जन्मों की प्रैक्टिस पड़ी हुई है देह अहंकार की। देह से जन्म लिए हैं। हँ? देह का सुख भोगा है विकारी इंद्रियों का तो एकदम थोड़े ही हो जाएगा। तो जैसे-जैसे प्रैक्टिस बढ़ती जाती है आत्मिक स्थिति की वैसे-वैसे वो निराकारी बाप शिव ज्योति बिंदु, हँ, सुप्रीम सोल हेवनली गॉडफादर उस निराकार आत्मा को ज्ञान का डोज देते जाते हैं। क्या डोज़ देते हैं? सुनाते हैं? अरे, सुनाते तो हैं ब्रह्मा के द्वारा। किसके द्वारा? हां, उसके ही द्वारा सुनाएंगे जिसको मुख होगा। और मुख होने के साथ-साथ कान होंगे। हँ? सुनेगा तो सबसे पहले वो ही सुनेगा ना। और दूसरों को सुनाएगा तो वो ही सुनाएगा ना। सबसे जास्ती सुनेगा, सबसे जास्ति सुनाएगा। तो उसका नाम शास्त्रों में रख दिया कर्ण। कर्ण माने कान। क्या? वो कर्ण जो है वो किसकी तरफ से लड़ाई लड़ता है? कौरवों की तरफ से कि पांडवों की तरफ से? हँ? कौरवों की तरफ से लड़ाई लड़ता है।

कौरव नाम क्यों दिया? कौ माने कौआ, रव माने शोरगुल। कौओं की तरह शोरगुल बहुत करते हैं। ये प्रदर्शनी करो, ये प्रोजेक्टर शो, ये भाषण करो, ये कॉन्फ्रेन्स करो। दुनियाभर की टीवी में, चैनल्स में भाषणबाजी। हँ? और भाषणबाजी तो उसी तरह की होती है जैसे दुनिया में आजकल प्रजातंत्र गोर्मेन्ट के जो बड़े-बड़े मिनिस्टर हैं, हँ, वो कितनी भाषणबाजी करते हैं। करते हैं कि नहीं? हाँ। भाषणबाजी तो बहुत करते हैं। उनके बापूजी ने भाषणबाजी की ना। क्या कहते थे? रामराज्य लाएंगे। भाषणबाजी किसलिए की? क्या? ये अंग्रेजों का जो रावण राज्य है ये खलास करेंगे और रामराज्य लाएंगे। तो उनके बापूजी की बात उन्होंने भी सीख ली। और वो भी खूब भाषणबाजी करते हैं। हँ? भाषणबाजी करते-करते 47, सन् 47 से लेकरके अब 2019 शुरू हो गया। कितने साल हो गए पूरे? 70 साल से भी जास्ती टाइम हो गया भाषणबाजी करते-करते, रामराज्य लाएंगे, रामराज्य लाएंगे। दिल्ली को स्वर्ग बनाएंगे, इंद्रप्रस्थ बनाएंगे। अरे, दिल्ली को स्वर्ग बनाया कि और ही नर्क बनाय दिया? और दिल्ली को तो सारा भारत फालो करता है। सारे भारत में प्रजा बहुत दुखी हो रही है कि सुखी हो रही है? हँ? अकाल बढ़ता जा रहा है या कम होता जा रहा है? बहुत अत्याचारी राजाएं होते हैं, शासन करने वाले, तो उनके राज्य में, हाँ, प्रकृति जो है अकाल डाल देती है, ताकि लोगों को पता चले कि ये राजाएं जो हैं कंट्रोल करने वाले बहुत अत्याचार कर रहे हैं। अत्याचारी राजाओं के राज्य में अकाल पड़ता है, दुकाल पड़ता है, अतिवृष्टि होती है।

तो बहुत भाषणबाजी करते हैं। अब उनकी शूटिंग कौन करते हैं? ब्राह्मणों की दुनिया में ये शूटिंग करने वाले जो हैं ना बेसिक वाले तथाकथित ब्रह्माकुमार-कुमारी। बड़ी भाषणबाजियां, बड़ी कॉन्फ्रेन्स करते हैं, हँ, और स्वर्ग बन रहा है कि नरक बन रहा है? स्वर्ग बन रहा है? हँ? भीख मांग रहे हैं कि एकदम जैसे भारत को बाबा ने ऐसा देवताओं का स्थान बनाया जहाँ भरपूर धन-संपत्ति रही है, कुछ भी किसी से प्रजा के, फोर्थक्लास प्रजा होगी उसको भी कोई से कुछ भी मांगने की दरकार नहीं है। और ये क्या करते रहते? बस, बस भीख मांगते रहते हैं, हँ, हाँ, ये बात दूसरी है कोई रायल भीख मांगते हैं, भई ईश्वरीय सेवा करेंगे। अरे, क्या तुम ईश्वरीय सेवा करोगे? तुम पब्लिक को बेवकूफ बनाते जाते हो। उनसे जो पैसा मिलता है वो रिश्वत में देते जाते हो। और रिश्वत देकरके जो, हँ, हाँ, जो अच्छा काम करते हैं उनको डाउन करने के काम करते हो।

जैसे दुनिया में मठ, पंथ, संप्रदाय वाले होते हैं ना, मठ, पंथ, संप्रदाय वाले दूसरे मठ, पंथ, संप्रदाय वाले जो मुखिया होते हैं, उनको जान से मरवाने की कोशिश करते हैं। करते हैं कि नहीं? हाँ, मरवाय देते हैं। तो ऐसे ही जान से मरवाय दो और उनको जेल में डलवा दो। जैसे वो कौन? आसाराम बापू। उनको क्या किया? हँ? जेल में डलवाय दिया। अरे, भाई क्यों ऐसे काम करते हो? फिर भी तो वो ज्ञान की बातें सुनाता था। हँ? कोई ऐसे तो भ्रष्टाचारी नहीं था, जैसे आज की गोर्मेन्ट के नुमाइंदे भ्रष्टाचारी हैं। हँ? जो कुछ प्यार से मिलता था रुपया, दो रुपया वो सब इकट्ठा करता था, और उससे प्रोग्राम करता था और लोगों को खुश करता था, खुशी-खुशी लोग देते थे ना। और ये लोग चोर-डकैत ऐसे-ऐसे हैं बाहर की दुनिया में भी और ब्राह्मणों की शूटिंग करने वाली ब्राह्मणों की दुनिया में भी। कितना-कितना चोरी-चकारी, छल-छिद्र, कपट, कितना करते रहते हैं। तो ये भाषणबाजी बहुत करते हैं।

A night class dated 19.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was – On the path of Bhakti the duration of the four Ages has been shown to be very long in the scriptures. And even otherwise, those writers of the scriptures themselves also say – Neti-Neti. We don’t know the beginning, middle and the end. So, they cannot remember anything about the cycle of 84 births. And you also know that the one who teaches [you] does not study from anywhere and come, does He? Hm? Here, the ocean of knowledge Father is sitting, isn’t He? It is not as if a bodily human being teaches Him. No. He is the seed-form of the human world. Who will teach him? Seed means Father. So, children know that the living seed definitely has the knowledge of the beginning, middle and end of the world because the entire tree is contained in the seed, isn’t it? The entire tree emerges from the seed only.

So, it was told – This is why it is sung that whichever sage and saint you ask, they will say that I don’t have the knowledge of the beginning, middle and end of the world. They have been saying – Neti-Neti. It has been written in the scriptures itself. So brother, if you don’t have the knowledge of this beginning, middle and the end, then brother who has it? So, they definitely say that the Supreme Father Supreme Soul is the ocean of knowledge. Arey, if the Supreme Father Supreme Soul is the ocean of knowledge, then who is the Sun? Hm? Arey, is there more light of knowledge in the ocean, does it have more heat of knowledge or does the Sun have more heat of knowledge, more light? Knowledge is called light, isn’t it? So, there is more light, heat of knowledge in the Sun. And the ocean absorbs that heat more than anyone else. It is not as if the rivers absorb more, mountains absorb, ponds absorb, lakes absorb, canals absorb. No. The ocean itself absorbs the knowledge the most. So, from whom does that ocean of knowledge obtain knowledge? Does he obtain from that non-living Sun? No. He obtains the knowledge from the living Sun of Knowledge. Just as that non-living Sun always remains detached from the ocean, from the Earth, from the mountains, from the rivers, from the human beings, from the living beings, doesn’t it? Similarly, this Sun of Knowledge, yes, the Father of all the souls, yes, he is the Sun of Knowledge who remains detached forever. So, they will definitely accept that yes, there is also a Sun of Knowledge and he is very subtle, living. It is because that Sun, the Moon, the stars of the sky are non-living. And there are soul-like stars in this world. Hm? Someone is a Moon. And there must also be a Sun playing his part in this world. Hm? He does play His part, but He always plays His part in a detached manner. He never develops attachment for anyone at all.

So, He is called the Supreme Father Supreme Soul Shiv. Why was the name Supreme Soul added? Why were two names Supreme Father added? That was also told, wasn’t it? Supreme Father [was added] because He is the Father of all the souls. Father of all the point-like incorporeal, stars of light like souls. He does not have any Father. And later the word ‘Parmatma’ (Supreme Soul) is added. It is not as if anyone will say – Supreme Soul Supreme Father? No. For example, they say Shiv Shankar Bholeynath. So, do you ever say – Shankar Shiv Bholeynath? You will never say. Why? It is because the Father’s name is first and the child’s name is later. So, similarly, Supreme Father Shiv, who is the Father of souls, when He comes to this world, then all the human souls which play their parts in this world because He will explain only to the human beings, will He not? Why? Why will He not explain to other living beings? Arey, it has been written in the scriptures – Incarnation as a tortoise, incarnation as a crocodile, incarnation as a fish, incarnation as a pig, hm, incarnation as a horse. What all incarnations as animals have been depicted? Arey, brother, when He is the living ocean of knowledge then will He narrate knowledge to the animals? Hm? And will the animals listen to knowledge? Will they understand? Arey, here He enters in human beings; hm, they are unable to understand whatever He narrates through their mouths. This four-headed Brahma has been depicted in the scriptures, hasn’t he been? So, does four-headed Brahma understand the topics of God? Hm? Had he understood, then will all the four heads speak the same topic of knowledge or will they narrate different topics, different kinds of knowledge? Hm? They will speak the same topic. It proves that they don’t understand anything.

So, the Supreme Father comes on this world stage in a degraded (tamopradhan) world, in the end of the Iron Age; so, He catches such a soul which does fall birth by birth; every soul has to definitely become tamopradhan from satopradhan (pure). But however, when compared to others, does it play a true part or a false part? It plays the part of truth. Will the children of the true Father be numberwise on this world stage? Hm? Or will they be alike? Numberwise. So, the name of the number one child has been written by the writers of the scriptures in the Gita, in the scriptures also. What? Yes, there are two kinds of special souls playing their parts on this world stage. Do you remember which ones? Hm? One are kshar and one are akshar. Yes, kshar means those who get discharged. Akshar means those who do not get discharged at all. They do not become sinful at all. Their power does not decline at all. So, there are two kinds of souls, aren’t there?

So, the souls that get discharged are numerous. Animals, birds, all the living beings, the pleasure-seeker souls get discharged. When they enjoy pleasures, then their vigour will decrease by enjoying pleasure, will it not? Yes. All are pleasure-seeking (bhogi) souls. But how many akshar (non-discharging) souls are there? Hm? Speak up. Arey, write brother. How many are there?
(Someone said something.) One? Achcha? How many akshar souls play their part on this world stage? You don’t write at all. You will say that now we will not answer this question paper. (Someone said something.) Two. Look, one says ‘one’ and the other says ‘two’. The third one will say – Three. Arey? Arey, brother, two kinds of souls were mentioned. So, those who are akshar are also two kinds of souls; hm, even among the akshar, there are at least two. What? One akshar is the Father of souls. And when He comes to this world stage, then He will make someone equal to Himself. Hm? Yes. If a teacher imparts education and if everyone fails then will it be said that the teacher taught anything? No. If a teacher teaches and if one emerges to be first class, top most in the University, then what will you say? Did the teacher teach or not? So, when the teacher, the Supreme Teacher, the Father also comes then He comes to this world and tells that children you are souls, point of light souls. Just as I am a point of light similarly you too are points of light, souls.

So, you are incorporeal. Hm? When the soul also assumes an incorporeal stage, it becomes viceless as well. It becomes egoless because it is the body, whose ego one develops, isn’t it? So, there is no body consciousness as well. Just as I am incorporeal, viceless, egoless, similarly, you souls also become incorporeal, viceless and egoless. Hm? So, well, will you become numberwise or will everyone become simultaneously? Hm? You will become numberwise, will you not? So, the number one, the one who wins is Arjun, the number one is praised, isn’t he? So, the number one child whom the Father finds, who just undergoes the seven days course, arey, as soon as the sixth day is completed and it sits immediately in the intellect that I am not a body; what am I? A point of light soul. And he starts becoming constant in soul conscious stage. So, when the Father is incorporeal, then with whom will the incorporeal Father talk? Hm? The incorporeal will talk to the incorporeal, will He not? And incorporeal; arey, an elephant is able to talk to an elephant. There is an ant; you must have seen ants, haven’t you? An ant is moving; they touch each other’s face; that is it; they communicate with each other. An ant will talk to an ant. A bird will talk to a bird. So, with whom will the incorporeal Father Shiv talk? He will talk only to the one who becomes incorporeal first.

So, that incorporeal Father; the soul which becomes incorporeal, although for a short period; the practice will progress slowly, will it not? It is because there has been a practice of body consciousness since many births. You have been born through the body. Hm? You have enjoyed the pleasures of the body, of the vicious organs; so, will it become [soul conscious] suddenly? So, as and when the practice of soul conscious stage increases, that incorporeal Father Shiv, the point of light, hm, the Supreme Soul, the Heavenly God Father goes on giving the dose of knowledge to that incorporeal soul. What dose does He give? Does He narrate? Arey, He narrates through Brahma. Through whom? Yes, He will narrate only through the one who has a mouth. And along with a mouth he will have ears. Hm? If he has to listen, it is he who will listen first of all, will he not? And if he has to narrate to others, it is he who will narrate, will he not? He will listen the most and he will narrate the most. So, his name has been coined in the scriptures as Karna. Karna means ears. What? On whose behalf does that Karna fight? On behalf of the Kauravas or on behalf of the Pandavas? Hm? He fights on behalf of the Kauravas.

Why was the name Kaurava coined? Kau means Kauva (crow), rav means noise. They create a lot of noise like the crows. Organize this exhibition, this projector show, deliver this lecture, and organize this conference. Delivering lectures on TV, in the channels all over the world. Hm? And the lectures are same as the big ministers of today’s democratic governments in the world; they deliver so many lectures. Do they or don’t they? Yes. They deliver a lot of lectures. Their Bapuji (Mahatma Gandhi) delivered lectures, didn’t he? What did he used to say? We will usher in a kingdom of Ram. Why did he deliver lectures? What? We will end this kingdom of Ravan of the Britishers and usher in the kingdom of Ram. So, they too learnt the words of their Bapuji. And they too deliver a lot of lectures. Hm? While delivering lectures from 47, from 1947, now 2019 has started. How many years have passed? It has been more than 70 years time while delivering lectures; we will bring the kingdom of Ram, we will bring the kingdom of Ram. We will make Delhi a heaven, Indraprasth. Arey, did they make Delhi heaven or did they make it a hell? And the entire India follows Delhi. Are the subjects (praja) becoming very sorrowful all over India or are they becoming happy? Hm? Is drought increasing or is it decreasing? There are very tormentor kings, governors; so, yes, nature brings drought in their kingdom so that people realize that these kings who control [them] are torturing people a lot. Droughts, famines, excessive rainfall occurs in the kingdom of tormentor kings.

So, they deliver a lot of lectures. Well, who performs their shooting? Those who perform this shooting in the world of Brahmins are these so-called basic Brahmakumar-kumaris, don’t they? They deliver big lectures, organize big conferences, hm, and is heaven being established or is hell being established? Is heaven being established? Hm? Are they begging or is it completely like the Bhaarat which was made a place of deities by Baba where there was complete wealth and property; even the subjects, even the fourth class subjects will not require to seek anything from anyone. And what do these people keep doing? That is it; they just keep on begging, hm, yes, it is another aspect that some beg royally, brother, we will do Godly service. Arey, what Godly service will you do? You keep on fooling the public. You go on giving the money received from them as bribes. And after paying bribes, hm, yes, you perform the task of pulling down those who are doing a good work.

For example, there are math, panth, sampradaay (sects, communities), aren’t there? People belonging to math, panth, sampradaay try to get the heads of other math, panth, sampradaays killed. Do they try or not? Yes, they get them killed. So, similarly you get them killed and put them in jail. For example, who is that person? Aasaram Bapu. What was done to him? Hm? He was put in the jail. Arey brother, why do you perform such tasks? He only used to narrate topics of knowledge. Hm? He was not corrupt like the representatives of today’s government are corrupt. Hm? Whatever rupee or two rupees he used to get affectionately, he used to collect them and used to organize programmes with that and used to make people feel happy; people used to give him happily, didn’t they? And these people are such thieves and dacoits in the outside world as well as in the world of Brahmins performing the shooting of Brahmins. They keep on indulging in so much theft, cheating and deceit. So, these people deliver a lot of lectures.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2846, दिनांक 10.04.2019
VCD 2846, dated 10.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2846-extracts-Bilingual

समय- 00.01-23.16
Time- 00.01-23.16


आज का प्रातः क्लास है – 20.11.1967. सोमवार को रिकार्ड चला – आज अंधेरे में हैं हम सब इंसान। ज्ञान का सूरज चमका दे भगवान। हँ? कब हैं अंधेरे में? हँ? 67 में? हँ? 67 में तो 40 के ऊपर, 40-50 वर्ष हो गए लगभग। अभी तो अंधेरे में नहीं होंगे ना। हँ? आज अंधेरे में हैं हम इंसान। कौन अंधेरे में है? कहते हैं हम इंसान हैं। लेकिन इंसान हैं? हँ? आत्मिक स्थिति की शान में रहते हैं? हँ? हाँ, इंसान कहां हैं? देह भान में रहते हैं तो देह के इंद्रियों से हिंसा करते रहते हैं। देह से हिंसा होती है। आत्मा से हिंसा थोड़ेही होती है। आत्मा से हिंसा होती है? नहीं। तो हैं तो इंसान। लेकिन शान में न रहने के कारण, आत्मिक स्थिति में सदाकाल न रहने के कारण क्या बने पड़े हैं? हँ? राक्षस बन पड़े हैं, दुखदायी बन पड़े हैं, द्वैतवादी दैत्य बने पड़े हैं। दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो भाषाएं, दो-दो कुल, दो-दो परंपराएं, दो से चार, चार से आठ, हँ, मतभेद बढ़ता जा रहा है या घटता जा रहा है? बढ़ता ही जा रहा है। तो अंधेरे में हुए, अज्ञान के अंधेरे में हुए या सोझरे में हुए? अंधेरे में हुए। अच्छा।

और दुनियावाले अज्ञान के अंधेरे में हैं या जो दुनिया की रिहर्सल कर रहे हैं, शूटिंग कर रहे हैं वो भी अंधेरे में हैं? दोनों अंधेरे में हैं। अच्छा। कौन कर रहे हैं रिहर्सल? हँ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) एडवांस वाले रिहर्सल कर रह हैं? बेसिक वाले रिहर्सल नहीं कर रहे हैं? हँ? हाँ, ब्राह्मण रिहर्सल कर रहे हैं। जो ब्रह्मा की औलाद अपने को कहते हैं वो ये रिहर्सल कर रहे हैं। हँ? क्या? रिहर्सल कहो, शूटिंग कहो, क्या कर रहे हैं? रिकार्डिंग कर रहे हैं। किस बात की? हँ? कि हम सब अभी अंधेरे में हैं। रोशनी में नहीं हैं। अच्छा, अंधेरे में हैं तो सब अंधेरे में हैं, हँ, या कोई अंधेरे से बाहर भी है? हं? अरे, कोई है कि नहीं? कौन? हँ? शिवबाबा। जिसे हम शिवबाबा कहते हैं वो तो सदा ही ज्ञान की रोशनी में रहने वाला है। वो तो ज्ञान सूर्य है ना। तो सूर्य कभी अंधेरे में आता है क्या? सूर्य तो अंधेरे में नहीं आता। जैसे मिसाल देते हैं वो जड़ सूर्य का, जड़ चंद्रमा का, जड़ सितारों का, जड़ नक्षत्रों का। मिसाल देते हैं ना। हाँ। तो उनमें सूर्य एक अकेला ऐसा है जो कभी अंधेरे में नहीं आता है। और बाकि नक्षत्र और सितारे तो अंधेरे में आते हैं या नहीं आते हैं? कोई कम आते हैं कोई ज्यादा आते हैं।

तो उनकी मिसाल दी जाती है ये धरती के चैतन्य सितारों के लिए कि इन धरती के चैतन्य सितारों में, हँ, कोई ऐसी सितारा रूपी आत्मा भी है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली, भले थोड़े समय के लिए पार्ट बजाती है। लेकिन रोशनी में ही रहती है। हँ? तो, तो वो सूरज है, जो सूर्य जो सदा रोशनी में रहने वाला है, अभी इस सृष्टि पर है या नहीं है?
(किसी ने कुछ कहा।) है? अच्छा? तुमने देख लिया? इन्होंने देख लिया? देख लिया? अरे? देख लिया कि माया आँखें बंद कर देती है? झपकाय देती है? हँ? पूरा पहचानने नहीं देती माया। हँ? हाँ।

तो हम अंधेरे में हैं। रिहर्सल करने वाले भी अंधेरे में हैं। उनमें से जो फर्स्टक्लास ब्राह्मण हैं, वो भी अंधेरे में हैं। सेकन्ड क्लास चन्द्रवंशी ब्राह्मण हैं, सूर्यवंशी नहीं हैं, चन्द्रवंशी हैं, वो भी अंधेरे में हैं। और उनके बाद जो नंबर लगता है 9 कुरी के ब्राह्मणों में से, वो तो सब अंधेरे में होंगे ही होंगे। तो रिकार्ड में बताया – क्या करना है? हँ? प्रार्थना करता है। क्या करता है? रिकार्ड में कोई आवाज़ आ रही है तो कोई ने आवाज़ निकाली ना। हाँ, जिसने कविता बनाई, गीत बनाया, उसके अंदर से आवाज निकाली। क्या निकाली? ज्ञान का सूरज चमका दे भगवान। हे भगवान, ज्ञान का जो सूरज है वो चमका दे। क्योंकि हमें दिखाई नहीं पड़ता है। क्यों नहीं दिखाई पड़ता है? हँ? इसलिए नहीं दिखाई पड़ता है कि उसको देखने के लिए हमको तरीका तो थोड़ा बताया गया ना। क्या करो? अरे, कुछ करो या? अपन को, हाँ, ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो। तो ये आत्मा समझने की ही किल्लत होती है। माया समझने नहीं देती है। घड़ी-घड़ी देहभान में लाती है। हँ?

तो जब हम खुद ही आत्मिक स्थिति में स्थित नहीं हो रहे हैं तो आत्मा के बाप को कैसे पहचानेंगे? हँ? अरे, बाप को पहले बच्चे पहचानते हैं? हँ? मनुष्य और मनुष्यों का बाप मनुष्य ही होगा ना। तो मनुष्यों का बाप को मनुष्य ही पहचानेंगे। कि जानवर पहचानेंगे? पहले कौन पहचानेगा? मनुष्यों के बाप को मनुष्य पहचानेंगे। तो आत्माओं के बाप को कौन पहचानेंगे? हँ? अरे? देहभान वाले? जो देह अपन को समझे बैठे हैं वो पहचानेंगे? नहीं।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जो परमात्मा हैं सो पहचानेंगे? अरे, वो तो अपने को ही नहीं पहचानेंगे कि हम हैं परमात्मा। पहचानेंगे कहाँ से? हाँ, आत्मिक स्थिति में लगातार रहें तो पहचानेंगे। और नहीं तो जितना रहेंगे आत्मिक स्थिति में उतना पहचानेंगे। हँ? अगर नहीं रहेंगे आत्मिक स्थिति में तो नहीं। फिफ्टी-फिफ्टी परसेंट रहेंगे तो फिफ्टी परसेंट पहचानेंगे और फिफ्टी परसेंट अंधेरे में रहेंगे। है ना। हाँ। चंद्रमा क्या है? चंद्रमा क्या करता है? हँ? चंद्रमा महीने में 15 दिन अंधेरे में जाता है और 15 दिन रोशनी में आता है। तो हम चंद्रमा की औलाद हैं या सूर्य की औलाद हैं? क्या बनना है? बनना तो है सूर्य की औलाद। सूर्यवंशी।

तो सूर्यवंशी बनने के लिए, हँ, पहला-पहला काम जो बताया, क्या करना है? आत्मा बनना है। आत्मा बनेंगे तो आत्माओं के बाप को आत्मा पहचानेगी। नहीं तो जो ज्यादा आत्मा बनेगा, आत्मिक स्थिति में रहने की प्रैक्टिस करेगा वो ज्यादा पहचानेगा। और जो ज्यादा पहचानेगा तो उसकी प्रैक्टिस ज्यादा हुई ना आत्मिक स्थिति की। तो उसकी दौड़ आगे हो गई ना। हँ? दौड़ आगे हो गई। दौड़ में आगे निकल गया और निकल जाता है तो उसका रिजल्ट क्या होगा? हँ? वो जल्दी बाप के पास पहुँचेगा या देर से पहुंचेगा? जल्दी पहुंचेगा। तो जैसे बड़ा बच्चा होता है बाप का वो पहले पहचानता है या जो बीच वाले बच्चे हैं वो पहले पहचानते हैं? या जो लास्ट वाला बच्चा है दुधमुंहा, दूध पी रहा है, मां का, वो पहले पहचानता है? हँ? बड़ा बच्चा पहले पहचानता है। तो ये बड़ा और छोटे की तकनीक क्या बताई? वो तो तकनीक हमें मिल गई ना। क्या? कि अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो देहभान में न आओ। हँ? देह को याद न करो, देह की इंद्रियों को याद न करो, देह की इंद्रियों के सुख को याद न करो, देह के संबंधियों को याद न करो। याद करेंगे तो क्या होगा? हँ? कुछ गड़बड़ होगा? क्या? याद करेंगे देह को, देह के संबंधियों को, देह की इंद्रियों को तो देह भान? देह भान आ जाएगा।

और देहभान आ जाने से, अपन को देह समझने लगने से क्या होगा? हँ? देह जो है वो तो राक्षसीपना लाती है। खुद भी क्या बनती है? हँ? जो देह है, जो देहभान में रहने वाली है ना, हँ, वो देहभान में रहने वाली कोई आत्मा है इस सृष्टि पे जो सबसे जास्ती देहभान में रहती है? हँ? है कि नहीं? कौन? हँ? जगदम्बा, पृथ्वी। पृथ्व्याति। हँ? हाँ। लगातार चौड़ी होती रहती है, विस्तार पाती रहती है देहभान का। मिट्टी बढ़ती है संसार में कि कम होती है? हँ? कि जल में रहती है ज्ञान जल में? नहीं। मिट्टी बढ़ती जाती है और ज्ञान जल? जैसे बम्बई में क्या किया? हँ? सागर को, जल को सुखाय दिया और वहाँ मिट्टी ही मिट्टी हो गई। तो फिर क्या रिजल्ट होता है? हँ? रिजल्ट आखरीन क्या होगा? रिजल्ट ये होगा कि जो पृथ्वी है वो तो माता है। और सागर है पिता। सागर की गोद में पृथ्वी समाई हुई है ना। हाँ। तो या तो बच्ची कहो या पत्नी कहो बात एक ही है। तो वो जो ज्ञान सागर है, जब कोई बात की अति हो जाती है तो क्या करना पड़ता है? अति होती है तो अंत करना पड़ता है। हाँ।

तो फिर ये जो अति करने वाली है ना पृथ्वी, बहुत देहभान बढ़ जाता है, बहुत बड़ी राक्षसी बन जाती है। क्या नाम पड़ता है राक्षसी का? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) महाकाली। हँ? सारी दुनिया के लिए काल रूप बन जाती है, सारी दुनिया को खपाखप-खपाखप मारती जाती है। किसी को छोड़ती है? अरे, सारी दुनिया में कलियुग के अंत में क्या बन जाते हैं? असुर बन जाते हैं, राक्षस बन जाते हैं, दुखदायी बन जाते हैं कि देवता बन जाते हैं? हँ? दुखदायी राक्षस बन जाते। कोई ऐसा है जो ये कहे हम किसी को मन से, वचन से, कर्म से दुख नहीं देते कभी भी? है कोई? कोई नहीं है। सब राक्षस बन जाते हैं। तो, हाँ, तो वो महाराक्षसी जो है ना जो रूप धारण करती है वो सबके गले काट देती है। हाँ।

तो महाकाली का मतलब है कि सारे संसार में अज्ञान का अंधकार फैलाने वाली है या रोशनी फैलाने वाली है? हँ? हाँ, अज्ञान का अंधकार फैलाने वाली। खुद भी गांधारी बनती है। क्या? अंधी। और जानबूझ के अंधी बनती है। ऐसे नहीं कि अंधी है नहीं। है नहीं। अंधी है या नहीं है वास्तव में? हँ? वास्तव में अंधी है? अरे, वास्तव में तो अंधी नहीं है। जैसे वो रावण है ना। तो रावण वास्तव में भगवान को पहचानने वाला ज्ञानी था या नहीं था? पहचानता था। लेकिन फिर भी जानबूझ के, हाँ, जानबूझकरके देह अहंकार के कारण, हाँ, अरे, भगवान है तो हमको जीत के दिखाए इस दुनिया में। तो युद्ध करता है। ऐसे ही महाकाली जो है, हँ, घोर अज्ञान की अंधकार की रात्रि है, तो उस घोर अज्ञान के अंधकार की रात्रि के प्रभाव में आने वाला है कौन? धृतराष्ट्री के प्रभाव में रहने वाला कौन? धृतराष्ट्री आगे-आगे चलती है गांधारी, और पीछे-पीछे कौन चलता है उसकी, उसका कपड़ा पकड़ के? हँ? दुपट्टा पकड़ के कौन चलता है? धृतराष्ट्र। अंधा। हाँ।

तो ये भी ब्राह्मणों की दुनिया में शूटिंग हो रही है कि नहीं? नहीं हो रही है? कैसे? हँ? कौन है गांधारी? हँ? जिस गांधारी का वो शरीर रूपी वस्त्र को फालो करने वाला कौन? चन्द्रमा। कौनसा ब्रह्मा? चार मुखी वाला ब्रह्मा। चारों ब्राह्मण मुखों को संगठन में बांध लेता है। जैसे रावण है ना। कितने मुखों को बांधता है अपने अंदर? दस मुखों को अपने अंदर बांधता है। ऐसे ही ब्रह्मा चार मुखों वाला, चारों मुखों को अपने संगठन में संगठित कर लेता है। उसकी यादगार शास्त्रों में दिखाई है चार मुखों वाला ब्रह्मा। बाकि वो जो ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा है वो तो अलग हो जाता है पहले ही।

तो ये चार मुखों वाला जो ब्रह्मा है चारों दिशाओं से कनेक्टेड है या एक ही दिशा से कनेक्टेड है? हँ? चारों दिशाओं से। कोई पूरब की बात करेगा तो कोई पश्चिम की बात करेगा, तो कोई उत्तर की बात करेगा तो कोई दक्षिण की बात करेगा। किसको फालो करता है? नाम बताएंगे किसको फालो करता है?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जगदम्बा को फालो करता है। और कबसे फालो करता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? हाँ, यज्ञ के आदि से ही फालो करता है। कैसे? हँ? यज्ञ के आदि में ही उसने वो जगदम्बा के मुख से सुना ना, जो बोल-बोल करने वाली माता थी। क्या सुना? हँ? अपने साक्षात्कारों का क्लेरिफिकेशन किसने सुनाया? दादा लेखराज चार मुखों वाले ब्रह्मा को किसने सुनाया? जगदम्बा, हाँ, सारे जगत की जो अम्बा है, बहुत बोल-बोल करने वाली, वाचा की देवी कही जाती है, वाक् देवी, हाँ, उसने सुनाया कि तुम कृष्ण के रूप में सतयुग में जन्म लेने वाले हो। इस जनम में तुमको सफेदपोश का साक्षात्कार हुआ, इसलिए तुम सफेदपोश के ब्रह्मा बनने, ब्रह्मा का पार्ट बजाने वाले हो। सारी दुनिया तुम्हें ब्रह्मा के रूप में पहचानेगी। सारी दुनिया तुम्हारा ब्रह्मा की औलाद बनेगी। ब्राह्मण बनेगी कि नहीं? अब ये बात दूसरी है कि फर्स्टक्लास सूर्यवंशी ब्राह्मण बने कि सेकण्ड क्लास चन्द्रवंशी बने या बाद वाली नीची कुरियों के ब्राह्मण बनें। बनेंगी सारी दुनिया ब्राह्मण। किसकी औलाद? चार मुखों वाले ब्रह्मा की औलाद।

तो जो चार मुखों वाले ब्रह्मा की सारी दुनिया औलाद बनेगी तो ब्रह्मा अंधेरे में, वो दादा लेखराज अंधेरे में है या रोशनी में है? अज्ञानता में है, अज्ञान के अंधेरे में या ज्ञान की रोशनी में? बाप को पहचाना? बाप को तो पहचाना नहीं। अम्मा को पहचाना, अम्मा की बात पे विश्वास कर लिया। और पक्का कर लिया कि मैं कृष्ण की आत्मा हूँ, सतयुग में मैं 16 कला संपूर्ण कृष्ण बनूंगा, हँ, और फिर बड़ा होके नारायण बनूंगा। बस। ऊँच ते ऊँच पद इस दुनिया में मेरा है। हाँ। और पैदा करने वाला कौन होगा कृष्ण बच्चे को सो बुद्धि में नहीं आया। बुद्धि में आया? नहीं आया। यहां भी बुद्धि में नहीं आता है कि वास्तव में उसको पैदा करने वाला कौन है? बिना अम्मा-बाप के कोई पैदा होता है क्या? हाँ, वो तो पैदा होता नहीं। लेकिन ब्रह्मा ने भी नहीं पहचाना शुरुआत में, पक्का निश्चय-विश्वास तो कर लिया कि हाँ, मैं कृष्ण वाली आत्मा हूँ। हँ? और मैं गीता का भगवान बनूंगा। बनूंगा कि हूँ? मैं ही आत्मा हूँ जो गीता का भगवान हूँ। जब मैं गीता का भगवान हूँ तो साकार रूप में भगवान गीता का होगा, गीता ज्ञान सुनाने वाला, गीता का ज्ञान का गीत सुनाने वाला कि निराकार होगा? हँ? साकार तो मैं ही हुआ ना। तो अपन को भगवान समझ के बैठ गया। शिवोहम्।

तो ये शिवोहम् वाली बात जो है वो अज्ञान अंधकार में ले जाने वाली है या ज्ञान की रोशनी में ले जाने वाली है? जैसे दुनिया के गुरु हैं गुरु घंटाल। आज क्या अपने बड़े-बड़े गुरु क्या समझे बैठे हैं सन्यासी जो सारी दुनिया के और खास भारतवासियों के गुरु बने बैठे हैं? शिवोहम्। हम ही शिव हैं। अगर साकार रूप में कोई हाथ-पांव वाला, इंद्रियों वाला शिव है तो हम हैं। और कोई शिव, शिव नहीं है। अच्छा। तो वो अंधेरे में हुए या उजाले में हुए? उन्होंने जो पढ़ाई पढ़ाई हज़ारों साल से उससे दुनिया गड्ढे में जा रही है, हँ, या सुख की सृष्टि, स्वर्ग बन रही है? हँ? क्या बन रही है? हँ? नीचे गड्ढे में जा रही है, हँ, नर्क, घोर नरक बन रही है, रौरव नरक बनती जा रही है। तो बताया कि ये सब अज्ञान अंधेरे में हैं।

Today’s morning class is dated 20.11.1967. The record played on Monday was – Aaj andherey mein hain hum sab insaan (today, we all human beings are in darkness). Gyaan ka sooraj chamka dey Bhagwaan (Cause the Sun of Knowledge to shine, O God!). Hm? When are you in darkness? Hm? In 67? Hm? It had been more than 40, 40-50 years in [19]67. You must not be in darkness now (in 1967), should you? Hm? Today we human beings are in darkness. Who is in darkness? People say that we are human beings (insaan). But are you human beings? Hm? Do you remain in the glory (shaan) of soul conscious stage? Hm? Yes, are you human beings? When you remain in body consciousness, then you keep on indulging in violence through the organs of the body. Violence is perpetrated through the body. The soul doesn’t indulge in violence. Does the soul indulge in violence? No. So, you indeed are human beings. But because of not being in shaan (glory/royalty), because of not remaining in soul conscious stage always, what have you become? Hm? You have become demons, givers of sorrows, dualist demons. There are two-two religions, two-two kingdoms, two-two languages, two-two clans, two-two traditions, two lead to four, four lead to eight; hm, is difference of opinion increasing or decreasing? It is going on increasing. So, are you in darkness, are you in the darkness of ignorance or in light? You are in darkness. Achcha.

And are the people of the world in darkness or are even those who perform the rehearsal, perform the shooting of the world also in darkness? Both are in darkness. Achcha. Who is doing the rehearsal? Hm? Hm?
(Someone said something.) Are those from Advance [Party] doing the rehearsal? Aren’t those from basic [knowledge] doing the rehearsal? Hm? Yes, the Brahmins are doing the rehearsal. Those who call themselves children of Brahma are doing this rehearsal. Hm? What? Call it a rehearsal, call it a shooting; what are they doing? They are recording. What [are they recording]? Hm? That we all are now in darkness. We are not in light. Achcha, if you are in darkness, are you all in darkness or is anyone out of darkness as well? Hm? Arey, is there anyone or not? Who? Hm? ShivBaba. The one whom we call ShivBaba, He always remains in the light of knowledge. So, He is the Sun of Knowledge, isn’t He? So, does the Sun ever come under darkness? The Sun doesn’t come under darkness. An example of that non-living Sun, non-living Moon, non-living stars, non-living constellations are given. Example is given, isn’t it? Yes. So, among them the Sun is the only one who never comes in darkness. And do all other constellations and stars come under darkness or not? Some come [in darkness] to a lesser extent and some come to a greater extent.

So, their example is given for these living stars of the Earth that among these living stars of the Earth, hm, there is one such star-like soul also playing its part on this world stage; although it plays part for a short period. But it remains in light only. Hm? So, so, that Sun, the Sun who always remains in light, is He now in this world or not?
(Someone said something.) Is He there? Achcha? Have you seen? Have these people seen? Have you seen? Arey? Have you seen or does Maya close your eyes? Does it close the eyelid? Hm? Maya doesn’t allow you to recognize completely. Hm? Yes.

So, we are in darkness. Those who perform the rehearsal are also in darkness. Even those who are first class Brahmins among them are in darkness. Those who are second class Chandravanshi Brahmins; they are not Suryavanshi, they are Chandravanshis; they too are in darkness. And after them the next number among the 9 categories of Brahmins, all of them will be in darkness only. So, it was mentioned in the record (song) – What should we do? Hm? He prays. What does he do? A sound is emerging in the record; so, someone has produced the sound, hasn’t he? Yes, the one who penned the poem, penned the song, a sound was made to emerge from his inner self. What was made to emerge? O God! Let the Sun of Knowledge shine. O God, let the Sun of Knowledge shine. It is because we are unable to see. Why aren’t we able to see? Hm? We are unable to see because we were told of the little method to see him, were we not? What should you do? Arey, should you do anything or? Yes, consider yourself to be a point of light soul. So, there is difficulty in considering oneself to be a soul only. Maya doesn’t allow you to understand. It brings you in body consciousness again and again. Hm?

So, when we ourselves are not becoming constant in soul conscious stage, then how will we recognize the Father of the soul? Hm? Arey, do the children recognize the Father first? Hm? Human being and the Father of human beings will be a human being only, will he not be? So, it is the human beings only who will recognize the Father of human beings. Or will the animals recognize? Who will recognize first? It is the human beings who will recognize the Father of human beings. So, who will recognize the Father of souls? Hm? Arey? Those with body consciousness? Will those who have considered themselves to be a body recognize [Him]? No.
(Someone said something.) Yes. Will those who are the Supreme Souls recognize? Arey, they will not recognize themselves that we are the Supreme Soul. How will they recognize? Yes, if they remain continuously in soul conscious stage, then they will recognize. And otherwise, to whatever extent they remain in soul conscious stage, they will recognize to the same extent. Hm? If they don’t remain in soul conscious stage, then they will not. If they remain fifty-fifty percent, then they will recognize fifty percent and remain in darkness fifty percent. Is it not? Yes. What is the Moon? What does the Moon do? Hm? The Moon goes into darkness for 15 days and comes into light for 15 days. So, are we the children of the Moon or are we the children of the Sun? What do we have to become? We have to become the children of the Sun. Suryavanshi (souls belonging to the Sun dynasty).

So, in order to become Suryavanshi, the first and foremost task that was mentioned, what should you do? You have to become a soul. If you become a soul, then the soul will recognize the Father of souls. Otherwise, the more someone becomes a soul, the more someone does the practice of remaining in soul conscious stage, the more he will recognize [Him]. And the more someone recognizes, the more is his practice of soul conscious stage, isn’t it? So, he is ahead in the race, isn’t he? Hm? He is ahead in the race. He galloped ahead in the race and when he goes ahead, then what will be its result? Hm? Will he reach the Father soon or late? He will reach soon. So, for example, there is an eldest child of the Father; does he recognize [his Father] first or do the middle children recognize first? Or does the last suckling child, he is drinking mother’s milk, does he recognize first? Hm? The eldest child recognizes first. So, what is the technique of this old and young? We have found that technique, haven’t we? What? That consider yourself to be a point of light soul; do not become body conscious. Hm? Do not remember the body, do not remember the organs of the body, do not remember the pleasures of the organs of the body, do not remember the relatives of the body. What will happen if you remember? Hm? Will anything wrong happen? What? If you remember the body, the relatives of the body, the organs of the body, then the body consciousness? You will become body conscious.

And what will happen when the body consciousness emerges, when you start considering yourselves to be a body? Hm? The body brings demoniac character. What does it itself also become? Hm? The body, which remains in body consciousness, doesn’t it? Is there any soul living in body consciousness in this world which remains in body consciousness the most? Hm? Is it there or isn’t it there? Who? Hm? Jagdamba, Prithvi (Earth). Prithvyaati. Hm? Yes. It keeps on widening continuously, keeps on expanding in body consciousness. Does the soil increase or decrease in the world? Hm? Or does it remain in water, in the water of knowledge? No. The soil keeps on increasing and the water of knowledge? For example, what did they do in Bombay? Hm? They dried the sea, the water and there was only soil there. So, then what is the result? Hm? What will be the ultimate result? The result will be that the Earth is a mother. And the ocean is the Father. The Earth is lying in the lap of the ocean, isn’t it? Yes. So, either call her a daughter or call her a wife, it is one and the same. So, that ocean of knowledge, when any topic reaches the extreme level, then what has to be done? When anything becomes extreme, then it has to be brought to an end. Yes.

So, this Earth, which causes extremity, doesn’t it? When its body consciousness increases a lot, she becomes a very big demoness. What is the name of the demoness coined as? Hm?
(Someone said something.) Mahakali. Hm? She becomes the form of death (kaal) for the entire world; she goes on killing the entire world. Does she leave anyone? Arey, what does the entire world become in the end of the Iron Age? Do they become demons, rakshasas, do they become givers of sorrow or do they become deities? Hm? They become the givers of sorrows, demons. Is there anyone who would say that I never give sorrows to anyone through the mind, through the words, through the actions ever? Is there anyone? There is no one. Everyone becomes a demon. So, yes, the form that that biggest demoness (maharakshasi) assumes, she cuts everyone’s head. Yes.

So, Mahakali means that does she spread the darkness of ignorance in the entire world or does she spread light? Hm? Yes, she spreads the darkness of ignorance. She herself also becomes Gaandhaari. What? Blind (andhi). And she becomes blind knowingly. It is not that she is not blind. She is not. Is she blind or not in reality? Hm? Is she blind in reality? Arey, she is not blind in reality. For example, there is that Ravan, isn’t he? So, was Ravan actually a knowledgeable person who recognizes God or not? He used to recognize. But yet, knowingly, yes, knowingly, because of body consciousness, yes, arey, if he (Ram) is God, let him conquer me in this world. So, he wages a war. Similarly, Mahakali, who is the night of complete darkness of ignorance, so, who comes under the influence of that night of complete darkness of ignorance? Who comes under the influence of Dhritrashtri (wife of Dhritrashtra, i.e. Gandhari)? Dhritrashtri, i.e. Gandhari walks ahead and who follows her by holding her dress? Hm? Who holds her dupatta (a loose cloth worn by the women on their shoulders)? Dhritrashtra. Blind. Yes.

So, is this also a shooting that is taking place in the world of Brahmins or not? Is it not happening? How? Hm? Who is Gandhari? Hm? Who follows the body like cloth of that Gandhari? Chandrama (Moon). Which Brahma? Four-headed Brahma. He binds the gatherings of all the four Brahmin heads. For example there is Ravan, isn’t he? How many heads does he bind within himself? He binds ten heads within himself. Similarly, four-headed Brahma unites all the four heads within his gathering. His memorial has been shown in the scriptures as four-headed Brahma. As regards that Brahma with upwards-facing head, he separates beforehand.

So, is this four-headed Brahma connected with all the four directions or is he connected with only one direction? Hm? With all the four directions. If one [head] talks about the East, another one talks about the West, another one talks about the North and another one talks about the South. Whom does he follow? Can you name the person whom he follows?
(Someone said something.) Yes, he follows Jagdamba. And since when does he follow? Hm? (Someone said something.) Achcha? Yes, he follows from the beginning of the Yagya itself. How? Hm? In the beginning of the Yagya itself he heard from the mouth of Jagdamba, didn’t he? She was the mother who used to talk a lot. What did he hear? Hm? Who narrated the clarification of his visions? Who narrated to the four-headed Brahma, Dada Lekhraj? Jagdamba, yes, the mother (amba) of the entire world (jagat), the one who talks a lot, she is called the Devi (female deity) of speech, Vaak Devi, yes, she narrated that you are going to get birth as Krishna in the Golden Age. You had the vision of the white-clad person in this birth; this is why you are going to play the part of becoming white-clad Brahma. The entire world will recognize you in the form of Brahma. Entire world will become the progeny of you Brahma. Will it become a Brahmin or not? Well, it is another aspect that it may become first class Suryavanshi Brahmin or second class Chandravanshi or Brahmins of latter lower categories. The entire world will become a Brahmin. Whose progeny? Progeny of four-headed Brahma.

So, the four-headed Brahma, whose progeny the entire world will become, so, is that Brahma, Dada Lekhraj in darkness or in light? Is he in ignorance, in the darkness of ignorance or in the light of knowledge? Did he recognize the Father? He did not recognize the Father. He recognized the mother, believed the words of the mother. And he believed firmly that I am the soul of Krishna; I will become Krishna, perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age and then after growing up, I will become Narayan. That is it. Mine is the highest on high post in this world. Yes. And it did not strike his intellect as to who will give birth to the child Krishna. Did it strike his intellect? It didn’t. Even here it doesn’t strike the intellect that actually who gives birth to him? Is anyone born without mother and Father? Yes, nobody is born [without mother and Father]. But even Brahma didn’t recognize in the beginning; he did develop firm faith that yes, I am the soul of Krishna. Hm? And I will become the God of Gita. Will I become or am I? I am the soul which is God of Gita. When I am the God of Gita, then will the God of Gita, will the narrator of Gita knowledge, will the narrator of the song of knowledge of Gita be in a corporeal form or in an incorporeal form? Hm? I am the corporeal one, am I not? So, he considered himself to be God. Shivohum (I am Shiva).

So, does this topic of Shivohum take you into the darkness of ignorance or does it take you to the light of knowledge? For example, the Gurus of the world are Guru ghantaal (deceiving gurus). What do today’s big gurus, the sanyasis, the gurus of the entire world and of the residents of India in particular consider themselves? Shivohum. We ourselves are Shiv. If there is any Shiv with hands and legs, with organs, then it is we. There is no other Shiv. Achcha. So, are they in darkness or in light? Through the knowledge that they taught since thousands of years, is the world going into a pit or is a world of happiness, heaven being created? Hm? What is it becoming? Hm? It is going below into the pit, hm, it is becoming hell, complete hell, extreme hell. So, it was told that all these people are in the darkness of ignorance.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2847, दिनांक 11.04.2019
VCD 2847, dated 11.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2847-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.13
Time- 00.01-17.13


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को पहले पेज पर रिकार्ड चल रहा था – आज अंधेरे में हैं हम इंसान। ज्ञान का सूरज चमका दे भगवान। हँ? भगवान चमका दे? ज्ञान का सूरज तो हमेशा ही चमकता रहता है। हँ? कि चमक कभी खतम हो जाती है? फिर क्यों कहा, हँ, ज्ञान का सूरज चमका दे भगवान? भक्तिमार्ग में शास्त्रों में जिसे बताया है गीता में भी बताया है कि भगवान आते हैं तो पहले-पहले सूर्य को ज्ञान देते हैं। तो ज्ञान की चमक उसी में देखने में आनी चाहिए।

तो वो मनुष्य सृष्टि का बाप है। मनुष्य सृष्टि का बीज है जो जनम बाइ जनम सुख भोगते-भोगते सबसे जास्ती तामसी बन जाता है, तमोप्रधान हो जाता है। और उसकी यादगार भी है। क्या यादगार? हँ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) काला लिंग? सूरज की यादगार है? अरे, उसकी यादगार है कि सूर्य को ग्रहण दिखाते हैं। हँ? सवल्ली, संपूर्ण ग्रहण। हाँ, पूरा सूर्य जो है वो अंधेरे से ढ़क जाता है। अब वास्तव में जो असली सूर्य है वो तो ढ़कने की बात नहीं क्योंकि पृथ्वी का परछाया पड़ता है। हँ? बीच में वो चंद्रमा आ जाता है सूरज और पृथ्वी के बीच में। तो वो चंद्रमा की परछाया पूरी सूरज के ऊपर पड़ती है। तो उसकी परछाया में आने से सूरज दिखाई नहीं पड़ता है पृथ्वी वालों को। समझा? वो न दिखाई पड़ने से वो क्या समझते हैं सूरज को ग्रहण लग गया। अरे, ज्ञान सूर्य शिव को ग्रहण थोड़ेही कभी लग सकता है। नहीं। वो जिसमें प्रवेश करता है मनुष्य सृष्टि के बीजरूप बाप में, वो सतोप्रधान, तमोप्रधान बनता है इस सृष्टि पर। हाँ। तो कलियुग के अंत में पहुंचते-पहुंचते पूरा तमोप्रधान अज्ञान अंधकार में आ जाता है, हँ, तब के लिए ये गायन है कि वो जो अंधेरे में आया हुआ सूरज है उसको जो असली ज्ञान सूर्य है शिव, चैतन्य ज्ञान सूर्य उसको प्रार्थना करते हैं– चमका दे।

ओमशान्ति। रूहानी बच्चों ने क्या सुना? हँ? और किसने पूछा? सुना किसने? रूहानी बच्चों ने सुना। और पूछा किसने? रूहानी बाप ने पूछा। क्या पूछा? कि रूहानी बच्चों; बच्चों से पूछा – सिर्फ रूहानी बाप ही प्रश्न पूछते हैं। क्या? हाँ, क्योंकि बच्चों को पहले ही समझाया जाता है कि आत्मा अभिमानी होकर बैठो। हँ? सबसे पहले क्या पाठ पढ़ाया जाता है? पहले-पहले पाठ पढ़ाया जाता है तुम देह नहीं हो, आत्मा हो। ज्योतिबिन्दु आत्मा। हँ? तो आत्मा अभिमानी जो हो, सो होकरके बैठो। ये है पहले नंबर की ऊँचे ते ऊँची सब्जेक्ट। हँ? कि जभी यहाँ बैठते हो बाप के सामने, हँ, और जो भी पुरुषार्थी होंगे अच्छे-अच्छे ब्राह्मण कुल भूषण क्योंकि तुम्हारा कुल ही भारतवासी तो क्या? सारे विश्व से तुम्हारा कुल न्यारा है। हँ? क्योंकि तुमको कहा जाता है सच्चे-सच्चे प्रजापिता ब्रह्मा मुख वंशावली। हँ? ऐसे तो अपने-अपने धरम के जो भी धरमपिताएं हैं वो सब धरमपिताएं हैं। अपने धरम के प्रजापिता हैं। लेकिन सच्चे हैं? हँ? हाँ, सच्चे नहीं हैं। अगर सच्चे होते तो फिर जबसे आते तबसे लेकरके कितना टाइम बीत गया? कोई को ढ़ाई हज़ार साल बीत गया, कोई को सवा दो हज़ार साल बीत गया। कोई को दो हज़ार साल बीत गया। हँ? ऐसे हुआ ना। हाँ। और कोई तो अभी अंत में आए हैं तो उनको 100-200 साल हुआ। महर्षि दयानन्द को आर्य समाज स्थापन किये कितना टाइम हुआ? 100-200 साल। तो वो सब अपने-अपने धरमवंश के प्रजापिता हुए ना। हाँ। अपने-अपने धरमवंश के बीज हुए। बीज माने पिता। तो वो सच्चे नहीं हैं। क्योंकि इतने-इतने लंबे टाइम से आए हुए हैं तो भी उन्होंने दुनिया को सचखंड बनाया? बनाया नहीं। सच्चे हों तो सचखंड बनाएं।

तो तुम बच्चे हो सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण। हँ? और वो जो प्रजापिताएं हैं और-और धर्मों के, हँ, वो तो क्या कहेंगे? कुख को प्यार करने वाले, देह को प्यार करने वाले हैं, हँ, कोख से जन्म लेने वाले हैं या मुख वंशावली हैं? हँ? मुख वंशावली थोड़ेही हैं? मुख वंशावली तो तुम ब्राह्मण कुल भूषण हो जो मैं आता हूँ तो जिस तन में आकरके बोलता हूँ, हँ, कोई भी ब्रह्मा नंबर का हो, पंचमुखी ब्रह्मा, चतुर्मुखी ब्रह्मा, उनमें से कोई भी ब्रह्मा हो, हँ, तो उसका नाम ब्रह्मा ही देते हैं ना। जिस तन में भी प्रवेश करेंगे। तो तुम तो उन ब्रह्मा नामधारियों में वो सर्वोत्तम जो ब्रह्मा है परमब्रह्म, हाँ, उस परमब्रह्म के बच्चे ब्राह्मण कुल भूषण मुख वंशावली हो।

और तुमने तो चतुर्मुखी ब्रह्मा है उसके मुख से भी जो ज्ञान सुना है उस मुख के ऊपर तुम्हारा कॉन्सन्ट्रेशन रहता है मन-बुद्धि का कि देह के ऊपर, गोद के ऊपर जाता है? हँ? गोद के ऊपर किनका जाएगा और मुख के ऊपर किनका कॉन्सन्ट्रेशन जाएगा? अरे, जिन्होंने गोद ली होगी, गोद का सुख लिया होगा, झूले होंगे, तो उनको याद आएगी गोद। हँ? और जिन्होंने लिया ही नहीं इस जनम में तो उनको याद आएगा? नहीं याद आएगा। उनको क्या याद आएगा? उन्हें तो मुख से जो वाणी सुनी है और वो वाणी वो कौनसी आत्मा ने चलाई? ब्रह्मा ने चलाई? नहीं। ब्रह्मा वाली आत्मा तो बच्चा बुद्धि कृष्ण वाली आत्मा। हाँ, उसमें जो प्रवेश करने वाली सुप्रीम सोल शिव है जो जनम-मरण के चक्कर से न्यारी होने के कारण तीनों काल का ज्ञाता है। और जो सब आत्माएं हैं, हैं ना इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो जन्म-मरण के चक्र में आने वाली हैं या नहीं? आने वाली हैं। तो सब भूल जाते हैं कि याद रहता है? अब वो चाहे 16 कला संपूर्ण कृष्ण की आत्मा हो, परशुराम की आत्मा हो, राम की आत्मा हो, कोई भी हो ऊँच ते ऊँच, वो सब जन्म-मरण के चक्कर में आती हैं ना। तो भूलेंगी या याद रहेगा? हाँ, जनम-मरण का चक्कर ऐसा है कि पूर्व जन्म की बातें सबको भूल जाती हैं।

लेकिन एक ही आत्मा सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर है, हँ, शिव। शिव माने कल्याणकारी जो सदा कल्याणकारी है क्योंकि सदा आत्मिक स्थिति में रहता है। हँ? वो त्रिकालदर्शी होने के कारण वो जो ज्ञान सुनाता है ना वो संपूर्ण सच्चा ज्ञान सुनाता है कि झूठा सुनाता है? सच्चा ज्ञान। तो जिसमें प्रवेश करता है परमानेन्ट्ली मुकर्रर रूप से तो उसको भी सच्चा ढ़ूंढके उसका नाम देगा प्रजापिता ब्रह्मा कि ऐसे ही नाम दे देगा? खुद सच्चा है तो क्या ढ़ूंढ़ेगा? सच्चा ही ढ़ूंढ़ेगा ना। हाँ।

तो सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण हो। सर्वोत्तम ब्रह्मा की औलाद हो, परमब्रह्म की औलाद तुम बच्चे हो क्योंकि तुम डायरेक्ट ईश्वर की संतान हो। क्या? ऐसे नहीं चार मुखों वाले ब्रह्मा की संतान हो। ऐसे कहें? क्यों नहीं कहें? भले चार मुखों के संगठन के ब्रह्मा से जनम तो लिया, पहचाना तो कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं, लेकिन वो आत्मा ने अपने स्वरूप को पहचाना कि हम आत्मा जो बैटरी है, आत्मा रूपी बैटरी उसमें कितने जन्म के स्वभाव-संस्कार भरे हुए हैं? हँ? उस ज्योतिबिन्दु आत्मा में कितने जन्मों का पार्ट और कैसा-कैसा पार्ट भरा हुआ है? किस-किस के साथ पार्ट बजाया? वो जाना? वो नहीं जाना। तो जिसके द्वारा तुम जानते हो ये; क्या? क्या जानते हो? ये जानते हो कि हमारे जन्म-जन्मान्तर का हमारी ज्योतिबिन्दु आत्मा का पार्ट क्या है? क्योंकि तुम आत्मा एक्टर हो ना। तो एक्टर कौनसा एक्टर अच्छा और कौनसा बेवकूफ कहा जाए? हँ? रंगमंच पे जाके खड़ा हो जाए और उसे अपने पार्ट की याद ही नहीं, हँ, क्या बोलना है, क्या करना है, क्या पार्ट बजाना है तो बेवकूफ कहेंगे या होशियार कहेंगे?

तो बाप आकरके बुद्धिमानों की बुद्धि है ना। तो तुम बच्चों को ऐसी बुद्धि देता है कि तुम्हारी बुद्धि में तुम्हारे सारे जन्मों का सारा ज्ञान आ जाता है। तो तुम हो डायरेक्ट ईश्वर की संतान। क्या? वो चतुर्मुखी ब्रह्मा को डायरेक्ट नहीं कहेंगे। क्या? डायरेक्ट कहेंगे? चारों मुखों में से कोई भी को डायरेक्ट नहीं कहेंगे। डायरेक्ट किसे कहेंगे? डायरेक्ट उसे कहेंगे जिसके तन में परमानेन्ट, मुकर्रर रूप से पार्ट बजाते हैं। तो तुम ईश्वरीय संतान क्योंकि डायरेक्ट ईश्वरीय संतान तो होने चाहिए ना। हँ? हाँ। संतान। हाँ। यूं तो भाई-भाई तो सभी हैं। हँ? और सभी भाई-भाई आत्माएं हैं। एक परमपिता की संतान हैं जिसको अंग्रेजी में कहते हैं ब्रदरहुड। हँ? वो कोई फादरहुड थोड़ेही है? हँ? कि हम भी बाप हैं तुम भी बाप हो। शिवोहम् सब अपने-अपने को कहना शुरु कर दें तो फादरहुड हो जाएगा कि ब्रदरहुड होगा? फादरहुड हो जाएगा। तो अंग्रेजी में सही अक्षर है ब्रदरहुड। तुम सब भाई-भाई। आत्मा-आत्मा भाई-भाई। और आत्माओं का बाप परमपिता शिव जिसका कोई पिता नहीं है। वो सबका बाप है।

एक भगवान है सबका बाप। और उनको कहा ही जाता है भगवान ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। क्या? उनको कहा जाता है। उनको क्यों कह दिया? अरे, ब्रह्मा के तन से 67 में बोला ना चार मुखी ब्रह्मा के मुख से। तो उनको कहेंगे कि इनके तन से कहेंगे? क्या कहेंगे? हँ? उनको कहेंगे ना। हां। उनको माने भविष्य में जो पार्ट प्रत्यक्ष होने वाला है ना, हाँ, सारी दुनिया के सामने प्रत्यक्ष होगा। सब जानेंगे, जो इन आँखों से देखेंगे, स्थूल आँखों से भी उनके मुख से भी निकलेगा, जो इन कानों से स्थूल से सुनेंगे दो शब्द भी सुनें, उनके मुख से भी निकलेगा। तो उनको कहा जाता है भगवान ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। हँ? ऊँचे ते ऊँचा माने किसी से कम्परिजन किया या नहीं किया? किससे कम्परिजन किया? हँ? कहते हैं गणेश भगवान, हनूमान भगवान, परशुराम भगवान, राम भगवान, कृष्ण भगवान। अरे, इन सबसे; विष्णु भगवान। अरे, इन सबसे ऊँचा तो वो है जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जन्म-मरण के चक्र में आता ही नहीं। प्रवेश करता है मुकर्रर रूप से कोई तन में। और फिर उस तन में प्रवेश करके ऊँचे ते ऊँचा पार्ट बजाता है। कैसा ऊँचे ते ऊँचा पार्ट? उस तन के द्वारा हीरो पार्टधारी का पार्ट बजाता है। तो वो हीरो पार्टधारी है? नहीं? हीरो पार्टधारी तो वो ही कहा जाएगा जो रंगमंच पर चारों सीन में रहे। हीरो किसे कहा जाता है? एक सीन में पार्ट बजाए बाकि तीन-चार सीन में पार्ट ही न बजाए तो उसे हीरो कहेंगे? नहीं। तो जिस तन में प्रवेश करते हैं उसको आप समान बनाते हैं। तो उसके लिए बोला - ऊँचे ते ऊँचा भगवंत। लेकिन ऊंचे ते ऊँचा तब जब मैं उसमें प्रवेश करके मुकर्रर रूप से, हँ, पार्ट बजाऊँ।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The record played on the first page on Monday was – Aaj andherey mein hain ham insaan (today, we human beings are in darkness). Gyaan ka sooraj chamka dey Bhagwaan (Cause the Sun of Knowledge to shine, O God!). Hm? Should God make it shine? The Sun of Knowledge keeps on shining always. Hm? Or does its shine finish any time? Then why was it said, hm, cause the Sun of Knowledge to shine, O God? On the path of Bhakti, in the scriptures, the one who has been described, it has been described in the Gita as well that when God comes, then He first of all gives knowledge to the Sun. So, the shine of knowledge should be visible in him alone.

So, he is the Father of the human world. The seed of the human world becomes the most impure, degraded while enjoying pleasures birth by birth. And his memorial is also there. What is the memorial? Hm? Hm?
(Someone said something.) Black ling? Is there a memorial of the Sun? Arey, his memorial is that the solar eclipse is shown. Hm? Savalli, complete eclipse. Yes, but the Sun is completely covered by darkness. Well, there is no question of the true Sun getting covered [by darkness] in reality because the shadow of the Earth falls on it. Hm? That Moon comes in between the Sun and the Earth. So, the shadow of that Moon falls on the entire Sun. So, when it comes under its shadow, the residents of Earth are unable to see the Sun. Did you understand? As it is not visible they think that the Sun has been eclipsed. Arey, can the Sun of Knowledge Shiv be eclipsed ever? No. The one in whom He enters in the seed-form Father of the human world becomes satopradhan (pure), tamopradhan (impure) in this world. Yes. So, by the time he reaches the end of the Iron Age he becomes completely tamopradhan and comes under the darkness of ignorance. It is praised for that time that people pray to the true Sun of Knowledge Shiv, the living Sun of Knowledge for the Sun who has come under darkness, that make him shine.

Om Shanti. What did the spiritual children hear? Hm? And who asked? Who heard? The spiritual children heard. And who asked? The spiritual Father asked. What did He ask? That spiritual children; He asked the children – Only the spiritual Father asks questions. What? Yes, it is because children are explained in the beginning itself that you sit as soul conscious ones. Hm? What is the lesson that is taught first of all? The first and foremost lesson that is taught is that you are not a body; you are a soul, a point of light soul. Hm? So, you sit as soul conscious ones. This is the number one highest on high subject. Hm? That when you sit here in front of the Father and all those who are purusharthis, the nice jewels of the Brahmin clan because your clan itself is unique not just in India but in the entire world. Hm? It is because you are called the true Prajapita Brahma Mukh Vanshavali (mouth born progeny of Prajapita Brahma). Hm? In a way all the founders of individual religions are founders of religions. They are Prajapitas of their religion. But are they true? Hm? Yes, they are not true. Had they been true, then ever since they came, how much time has passed? In case of someone it has been 2500 years, in case of someone it has been 2250 years. In case of someone it has been 2000 years. Hm? It happened like this, hasn’t it? Yes. And some have now come in the end; so, it has been 100-200 years since they came. How much time has passed since Maharshi Dayanand established Arya Samaj? 100-200 years. So, they all are the Prajapitas of their religious dynasty, aren’t they? Yes. They are seeds of their religious dynasty. Seed means Father. So, they are not true. It is because they have come since such a long time; yet, did they make the world a land of truth? They did not make. If they are true they will make the land of truth.

So, you children are the highest jewels of the Brahmin clan. Hm? And what would those Prajapitas of other religions say? Do they love the womb, do they love the body, do they get birth through the womb or are they mouth born progeny? Hm? They are not mouth born progeny. It is you jewels of the Brahmin clan who are mouth born progeny; when I come, then the body in which I come and speak, be it Brahma of any number, the five-headed Brahma, the four-headed Brahma, be it any Brahma among them, so, he is named Brahma only, isn’t he? In whichever body He enters. So, you are children of the highest Brahma, the Parambrahm among those titleholders of Brahma; you are jewels of the Brahmin clan, the mouth born progeny.

And the knowledge that you have heard through the mouth of four-headed Brahma, does your concentration of mind and intellect remain on that mouth or does it remain focused on the body, on the lap? Hm? Whose concentration will be on the lap and whose [concentration] will be on the mouth? Arey, those who have enjoyed the lap, those who have enjoyed the pleasure of the lap, those who have dangled in it, will remember the lap. Hm? And those who did not enjoy [the lap] at all in this birth, will they remember it? They will not remember. What will they remember? They will remember the speech that they have heard through the mouth and which soul narrated that speech? Did Brahma narrate? No. Brahma’s soul, the soul of Krishna has a child-like intellect. Yes, the Supreme Soul Shiv who enters in him is the knower of all the three aspects of time because of being away from the cycle of birth and death. Do all other souls on this world stage pass through the cycle of birth and death or not? They do pass through it. So, do they forget everything or do they remember? Well, be it the soul of Krishna which is perfect in 16 celestial degrees, be it the soul of Parshuram, be it the soul of Ram, be it any highest on high [soul], all of them pass through the cycle of birth and death, don’t’ they? So, will they forget or will they remember? Yes, the cycle of birth and death is such that everyone forgets the topics of the past birth.

But there is only one soul, the Supreme Soul, the Heavenly God Father Shiv. Shiv means benevolent (kalyaankaari) because He remains in soul conscious stage forever. Hm? Because of being Trikaaldarshi the knowledge that He narrates, does He narrate completely true knowledge or does He narrate false [knowledge]? True knowledge. So, the one in whom He enters permanently, will He search and give a true name Prajapita Brahma to him or will He give him any name? When He Himself is true, then what will He search? He will search for a true one only, will He not? Yes.

So, you are jewels of the highest Brahmin clan. You are children of the highest Brahma; you are children of Parambrahm because you are children of direct God. What? It is not as if you are the children of the four-headed Brahma. Should we say like this? Why shouldn’t we say so? Although you were born from the Brahma who is a gathering of four heads, you did realize that we are points of light, souls, but did that soul recognize its form that the nature and sanskars of how may births are recorded in us soul-like batteries, the soul-like battery? Hm? The parts of how many births and what kinds of parts are recorded in that point of light soul? With who all have I played my part? Did you know that? You did not know that. So, the one through whom you get to know this; what? What do you get to know? You get to know that what the part of my point of light soul is birth by birth. It is because you souls are actors, aren’t you? So, which actor is said to be good and which one is said to be foolish? Hm? If he goes and stands on the stage and doesn’t remember his part at all as to what he has to speak, what he has to do, what part he has to play, then will he be called foolish or clever?

So, the Father comes and; He is the highest of all the intellectuals, isn’t He? So, He gives you children such intellect that your intellect gets the entire knowledge of all the births. So, you are the children of direct God. What? That four-headed Brahma will not be called direct. What? Will he be called direct? None of the four heads will be called direct. Who will be called direct? Direct is said to be the one in whose body He plays a permanent part. So, you are Godly children because you should be direct Godly children, shouldn’t you? Hm? Yes. Children. Yes. In a way everyone is a brother. Hm? And all the brothers are souls. You are children of one Supreme Father which is called brotherhood in English. Hm? That is not fatherhood that we are also fathers and you are also a Father. If everyone starts calling himself Shivohum (I am Shiv), then will it be fatherhood or brotherhood? It will be fatherhood. So, the correct word in English is brotherhood. You all are brothers. Souls are brothers. And the Father of souls is the Supreme Father Shiv who doesn’t have any Father. He is the Father of everyone.

One God is everyone’s Father. And that one (unko) is called God, the highest on high God. What? That one is called. Why was it said ‘that one’? Arey, it was said through the body of Brahma, through the four-headed Brahma in 67, wasn’t it? So, will it be said ‘that one’ or through the body of this one? What would you say? Hm? You would say ‘that one’, will you not? Yes. That one means the part that is going to be revealed in future, isn’t it? Yes, it will be revealed in front of the entire world. Everyone will know, whoever sees through these eyes, through even these physical eyes, it will emerge from their mouths also, those who will hear even two words through these physical ears, it will emerge from their mouths also. So, that one is called God, the highest on high God. Hm? Highest on high means that was a comparison made with anyone or not? With whom was the comparison made? Hm? People say – God Ganesh, God Hanuman, God Parshuram, God Ram, God Krishna. Arey, when compared to all these; God Vishnu. Arey, higher than all these is the one who does not enter into the cycle of birth and death on this world stage at all. He enters in a body in a permanent form. And then, after entering in that body He plays the highest on high part. What kind of a highest on high part? He plays the part of a hero actor through that body. So, is he the hero actor? No? Hero actor is said to be the one who remains on the stage in all the four scenes. Who is called a hero? If someone plays a part in one scene and does not play a part in three-four scenes at all, will he be called a hero? No. So, the body in which He enters, He makes him equal to Himself. So, it was said for him – Highest on high God. But he is highest on high when I enter in him in a permanent manner and play My part.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2848, दिनांक 12.04.2019
VCD 2848, dated 12.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2848-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.07
Time- 00.01-14.07


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – घोर अंधियारा और घोर सोझरा। जिसको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है उनके लिए घोर सोझरा। और ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं मिला, इन्हीं आंखों से देखता है, इन्हीं आँखों में बुद्धि जाती है, मन जाता है, और जो आँखों का प्राप्ति है उसमें बुद्धि जाती है, मन जाता है, तो घोर अंधेरे में है या रोशनी में है? हां, अंधेरे में है। बताया कि सतयुग में तो घोर अंधेरा नहीं होता होगा ना। वहाँ तो घोर सोझरा। क्योंकि ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात गाई हुई है ना। ब्रह्मा माने ज्ञान चन्द्रमा। हँ? आधा समय रोशनी में रहता है और आधा समय अंधेरे में रहता है। नहीं रहता? रहता है। तो जो ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा आधा समय रोशनी में रहता है तो वो रोशनी की दुनिया ही तो बनाएगा ना। कौनसी दुनिया? जहाँ अज्ञान अंधेरे का नाम-निशान नहीं है। रोशनी ही रोशनी, ज्ञान ही ज्ञान। हँ? तो ज्ञान की रोशनी तो सुख ही सुख।

तो सतयुग को, हाँ, चन्द्रमा के लिए दिखाते हैं 16 कला संपूर्ण। इतनी रोशनी। तो सतयुग में जो निर्माण किया ज्ञान चन्द्रमा ने सुख का, कितना निर्माण किया? कितनी लिमिट? 16 कला संपूर्ण। हँ? अरे भई जितना खुद अर्जन करेगा उतना ही तो अपने बच्चों को देगा। कमाई कम करेगा तो देगा भी कम देगा। तो 16 कला संपूर्ण जो ज्ञान चन्द्रमा है उसने 16 कला संपूर्ण सतयुग की रचना की। और जो रचना करेगा वो प्राप्ति भी करेगा कि नहीं? हाँ, तो पहले-पहले 16 कला संपूर्ण कृष्ण की आत्मा वो ही बनती है। कौन? वो ब्रह्मा जो चतुर्मुखी ब्रह्मा कहा जाता है। कैसा चतुर्मुखी? चारों युगों में, हँ, हाँ, जैसे चार दिशाएं होती हैं ना। तो चारों दिशाओं में उसका आधिपत्य है। कैसे? कि चारों मुखों को संगठित कर लेता है। नहीं? अपने संगठन में बांध लेता है तो आधिपत्य हो गया ना चारों युगों में। हां।

तो बताया कि सतयुग में कोई नहीं कहेगा हम अज्ञान अंधेरे में हैं, हमको ज्ञान की रोशनी दो। हँ? ज्ञान का सूरज प्रत्यक्ष कर दो। वो तो वहां होता ही है। संपूर्ण सूरज होता है, 24 घंटे रोशनी देता है या 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे रात, अंधेरा? क्या होता है सतयुग में? हँ? हाँ, 24 घंटे रोशनी। जैसे आज की दुनिया में भी मिसाल है। नार्थ पोल और साउथ पोल पर 6 महीने का दिन होता है ना। हां। तो ऐसे ही सतयुग और त्रेता आधा कल्प ढ़ाई हजार वर्ष रोशनी ही रोशनी। हँ? सूर्य जैसे छिपता ही नहीं। तो बताया कि वहाँ कोई नहीं पुकारता है कि हम अंधेरे में इंसान हैं और हमको आकरके ज्ञान का सूरज चमका दो। अरे, वहाँ तो चमकता ही रहता है। नहीं? हाँ।

तो बताया वहाँ इंसान तो पक्के इंसान हैं ना। आत्मिक स्थिति की शान में ही तो रहते हैं ना। कि कोई भूल जाता है? हाँ, वहाँ 24 घंटे आत्मिक स्थिति की शान में। अरे, क्या सोते नहीं हैं? अरे, सोता कौन है? देह सोती है या आत्मा सोती है? आत्मा सदा जागती ज्योति है या वो सोती हुई है? आत्मा तो सदा जागती ज्योति। तो जो आत्माएं सतयुग में देव आत्माएं थीं, सदा जागती ज्योति थी, उनके सोने का तो सवाल ही नहीं। और सोता कौन है? थकान होती है तो सोता है। बहुत भागदौड करेगा ना। इधर जाओ, उधर जाओ, ये जाओ, वो जाओ, ये करो, वो करो, देह का ही धंधा ज्यादा। तो थकान होगी कि नहीं? और थकान होगी तो फिर नींद भी? हाँ, नींद भी ज्यादा आएगी। ऐसा कुछ वहाँ सतयुग-त्रेता में, स्वर्ग की दुनिया में, राम कृष्ण की दुनिया में ऐसा कुछ भी अंधेरा और उसका रिजल्ट दुख होता ही नहीं। सुख ही सुख।

बाद में पिछाड़ी में देखो जब द्वैतवादी द्वापरयुग आता है दैत्यों का, हँ, बता दिया ना किसका युग? दैत्यों का। दिति की संतान। दिति माने? हँ? दिति माने खंडित हो गई। जिसका ब्रह्मचर्य खंडित हो गया। हाँ। कैसे खंडित हो गया? अनेकों से आँख लड़ाना, अनेकों की बातें सुनना, व्यभिचारी ज्ञान सुनना। एक से सुनना नहीं दिल लगा के, मन लगा के। नहीं तो जिनमें दिल लग जाता है बस उसी से बातें करने की दिल होती है कि नहीं? हाँ, ये तो व्यभिचारी। व्यभिचारी माने ज्ञानेन्द्रियों से भी खंडित और कर्मेन्द्रियों से भी खंडित। कर्मेन्द्रियों में मुख्य इंद्रिय कौनसी? हँ? काम इंद्रिय। तो काम इंद्रिय से द्वैतवादी द्वापरयुग में सबसे पहले खंडित हो जाती है। कौन? दिति। हाँ। तो वो दिति जो है उससे जो संतान पैदा होती है वो दैत्यों की संतान। दिति की संतान दैत्य। बताया ना ब्रह्मा की संतान ब्राह्मण। एक मात्रा बढ़ी ना। शिव की संतान शैव। एक मात्रा बढ़ी ना। हाँ। विष्णु के फालोअर्स, संतान? एक मात्रा बढ़ी। वैष्णव। ऐसे ही दिति की संतान दैत्य। हाँ, चीर-फाड़ का काम उनका 24 घंटे बुद्धि में ये ही लगा रहता है। हाँ। कैसे कोई साबुत कन्या मिले और उसकी चीर-फाड़ करके रख दें। ऐसी बुद्धि बन जाती है।

तो ये जो दैत्यों की दुनिया फिर दिनोंदिन बढ़ती जाती है द्वापरयुग से या घटती जाती है? हाँ, बढ़ती जाती है। कलियुग के अंत तक जाकरके ऐसी हालत हो जाती है कि ऐसे धर्म का वर्चस्व दुनिया में हो जाता है, हाँ, मुख्य धर्म चार हैं ना – देवता, इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन। तो क्रिश्चियन धर्म के जो सहयोगी आते हैं कलियुग में, हाँ, वो फिर तो अति कर देते हैं चीर-फाड़ की। बस उनका धंधा ही है, उनकी दृष्टि ही ऐसी रहती है। हाँ, इसको खोखला करो, इसको खोखला करो। इसकी चीर-फाड़ करो। खुद उससे सुख बहुत उन्हें मिलता है। क्या? सुख मिलता है कि दुख मिलता है? हँ? अरे, शेर है, खूंख्वार जानवर है, जानवर है ना, तो जानवर को धंधा क्या है? हँ? जानवर का क्या धंधा है? जानवर का धंधा है चीर-फाड़ करना, फाड़ देता है। कोई भी जानवर को पकड़ेगा, फाड़ देगा। खाएगा नहीं। हँ? हाँ, कुत्ते का मांस नहीं खाएगा, छोड़ देगा। किसका खाएगा? बढ़िया-बढ़िया जो होगा ना जानवर, तो फिर उसका मांस खूब खाएगा लेकिन चीरेगा फाड़ेगा ना। तो उसका धंधा है खूंख्वार। खून खार। कैसा धंधा? खून खार कर देना। ऐसा धंधा।

तो ये पिछाड़ी में जाकरके कलियुग के अंत में ये हालत हो जाती है, हँ, दुख बढ़ता है मनसा का कि घटता है? अत्यंत बढ़ जाता है। इतने दुखी हो जाते हैं वो क्रिश्चियनिटी की दुनिया में तो खास क्रिश्चियन्स का देश है ना यूरोप, अमेरिका, हाँ, तो उसमें तो ऐसे राक्षस बन जाते हैं जो भारत में कहते हैं पाताल लोक में रहते हैं। पाताल लोक माने? पृथ्वी गोल है ना। तो ऊपर है भारत। उसके दूसरी ओर क्या होगा? अमेरिका। तो पाताल लोक हो गया ना। हाँ। पाताल लोक। तो बताया पिछाड़ी में तो ये पाताल लोक वासी कितने आत्मघात करते हैं। क्या करते हैं? जीवघात। हँ? मेंटल टेंशन इतना बढ़ता है कि मेंटल टेंशन में आकरके वो अपनी ही हत्या, अपनी जीव हत्या कर लेते हैं, जीव घात कर लेते हैं। तो अति दुखी हुए कि नहीं? हाँ, अति दुखी हुए। क्योंकि मन तो सबसे जास्ती इन्द्रियों में शक्तिशाली होता है। और जो शक्तिशाली है वो ही इतना कमजोर बन गया। हँ? सुइसाइड करने के लिए अनसन्नद्ध हो गया।

तो बताया ये गीत पिछाड़ी में ही बहुत बनते जाते हैं। क्या? हँ? हम अंधेरे में हैं, अज्ञान अंधेरे में हैं, अंधेरे में होने के कारण, अज्ञान में होने के कारण बहुत दुखी हैं। हे भगवान, अब तो यहाँ आकरके क्या करता है? हँ? इस सृष्टि पर और धरमपिताओं की तरह सौ साल के लिए ही आता है ना। ज्यादा तो नहीं आता। तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो चार सीन की, चार युगों की सृष्टि है इसमें आकर क्या कर दे? हँ? तू ज्ञान का सूरज वो चमका दे जो चारों युगों में ज्ञान की रोशनी फैल जाए। आत्मिक स्थिति में रहेगा तो रोशनी फेंकेगा या देहभान में ज्यादा रहेगा तो फेंकेगा? हँ? आत्मिक स्थिति में।

शूटिंग कहाँ होती है? रिहर्सल तब होती है जब सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर शिव, जो जनम मरण के चक्र से न्यारा है, गर्भ से जन्म नहीं लेता है, अकर्ता, अभोक्ता, निराकार है, तो वो निराकार शिव इस सृष्टि पर सौ वर्ष के अंदर इस दुनिया की शूटिंग कराने आता है, रिहर्सल कराने आता है। क्या? और बड़ा डायरेक्टर हुआ ना। हाँ। कैसा डायरेक्टर? मैनेजिंग डायरेक्टर। जो मैंनेजिंग डायरेक्टर होता है ना वो थोड़े समय के लिए आता है, चक्कर लगाता है कि 24 घंटे कारखाने में चढ़ा रहता है? हाँ, उसको तो बुद्धि ज्यादा है ना। उसने पढ़ाई, पढ़ाई पढ़ी है कि पढ़ा-पढ़ाया है हमेशा का? हाँ, जनम ही नहीं लेता। तो वो तो हमेशा का ही पढ़ा-पढ़ाया है। जो जनम-मरण के चक्कर में आते हैं वो तो भूल जाते हैं। हँ? इस जनम की भी बहुत बातें भूल जाते हैं, पिछले जनम की तो बहुत ही भूल जाते हैं।

तो ये गीत इस समय होते हैं। किस समय? जब बाप इस सृष्टि पर आते हैं, ये दुनिया सदैव नरक बनना लगती है तब इस समय ये गीत बनते हैं। सतयुग में तो ऐसे गीत कोई बनाएंगे भी नहीं। हँ? न बनाएंगे, न कोई गाएंगे।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page on Monday was – Complete darkness and complete light. For those who receive the third eye of knowledge it is complete light. And if someone hasn’t received the third eye of knowledge, if he sees only through these [physical] eyes, if the intellect, if the mind is attracted only towards these eyes and if the intellect, if the mind is attracted towards the attainments of the eyes, then is he in complete darkness or in light? Yes, he is in darkness. It was told that there must not be complete darkness in the Golden Age. There is complete light. It is because Brahma’s day and Brahma’s night is praised, isn’t it? Brahma means the Moon of knowledge. Hm? He remains in light for half the time and remains in darkness for half the time. Doesn’t he remain? He remains. So, the Moon of knowledge Brahma who remains in light for half the time will create a world of light only, will he not? Which world? The place where there is no trace of the darkness of ignorance. There is just light, there is just knowledge. Hm? So, if there is light of knowledge, there is just happiness.

So, the Golden Age, yes, it is depicted for the Moon that it is perfect in 16 celestial degrees. It has such light. So, the happiness that the Moon of knowledge created in the Golden Age; how much did he create? What is the limit? Perfect in 16 celestial degrees. Hm? Arey brother, he will give to the children to the same extent that he earns for himself. If he earns less, what he gives will also be less. So, the Moon of knowledge perfect in 16 celestial degrees created a Golden Age perfect in 16 celestial degrees. And will the one who creates achieve attainments also or not? Yes, so, it is he who becomes the soul of Krishna perfect in 16 celestial degrees first of all. Who? That Brahma who is called four-headed Brahma. What kind of four-headed? In all the four Ages, hm, yes, just as there are four directions, aren’t there? So, he governs all the four directions. How? He gathers all the four heads. No? He binds them in his gathering; so, his dominance is established in all the four Ages, isn’t it? Yes.

So, it was told that nobody will say in the Golden Age that we are in the darkness of ignorance, give us the light of knowledge. Hm? Reveal the Sun of Knowledge. He does exist there. Is there complete Sun there, does it give light for 24 hours or does it give light for 12 hours and is there night, darkness for 12 hours? What happens in the Golden Age? Hm? Yes, there is light for 24 hours. For example, there is an example in today’s world also. There is day for 6 months on the North Pole and the South Pole, isn’t it? Yes. So, similarly, there is just light for half a Kalpa, 2500 years in the Golden Age and the Silver Age. Hm? It is as if the Sun does not hide at all. So, it was told that nobody calls there that we human beings are in darkness and come and make the Sun of Knowledge shine for us. Arey, it keeps on shining there. No? Yes.

So, it was told that there the human beings (insaan) are firm human beings, aren’t they? They remain in the glory (shaan) of soul conscious stage, don’t they? Or does anyone forget? Yes, there you remain in the glory of soul conscious stage for 24 hours. Arey, don’t you sleep? Arey, who sleeps? Does the body sleep or does the soul sleep? Is the soul forever an enlightened lamp (jaagti jyoti) or does it sleep? The soul is forever an enlightened lamp. So, the souls which were deity souls in the Golden Age, were enlightened lamps, there is no question of their sleeping. And who sleeps? When one feels tired, he/she sleeps. He will run a lot, will he not? Go here, go there, go for this, go for that, do this, do that; the business of the body is more. So, will there be tiredness or not? And if there is tiredness, then the sleep too? Yes, one will get more sleep. No such thing happens there in the Golden Age, Silver Age, in the world of heaven, in the world of Ram and Krishna, there is no such darkness and it does not result in sorrows at all. There is just happiness.

Later, look, later on, when the dualist Copper Age of demons begins, hm, it was told, wasn’t it? Whose Age? Of the demons (daitya). Children of Diti. What is meant by Diti? Hm? Diti means broken. The one whose celibacy (brahmacharya) was broken. Yes. How did it break? Exchanging glances with many, listening to many, listening to adulterous knowledge. Not listening to one person with her heart, with her mind. Otherwise, does your heart feel like talking only to the one whom your heart loves or not? Yes, she is adulterous (vyabhichaari). Adulterous means broken through the sense organs also and broken through the organs of action as well. Which is the main organ among the organs of action? Hm? The organ of lust. So, she becomes impaired first of all through the organ of lust from the dualist Copper Age. Who? Diti. Yes. So, the children born through that Diti are children of demons. Children of Diti are daitya (demon). It was told, wasn’t it that the children of Brahma are Brahmins. One syllable increased [in the Hindi word], didn’t it? Children of Shiv are Shaiv. One syllable increased, didn’t it? Yes. Followers, children of Vishnu? One syllable increased. Vaishnav. Similarly, children of Diti are daitya. Yes, their intellect remains busy 24 hours in the task of tearing apart [the body]. Yes. How can I find a pure virgin and tear her apart? The intellect becomes like this.

So, then does this world of demons go on increasing day by day from the Copper Age or does it go on decreasing? Yes, it goes on increasing. By the end of the Iron Age, the situation becomes such that such a religion becomes dominant in the world, yes, there are four main religions, aren’t there? Deity, Islamic, Buddhist, Christian. So, the helpers of Christianity who come in the Iron Age, yes, they then cause the tearing [of the body] to reach extreme proportions. That is it; their occupation itself is; their vision itself is like this. Yes, make this one hollow, make that one hollow. Tear this one apart. They themselves get a lot of joy from that. What? Do they get joy or sorrows? Hm? Arey, there is lion, it is a ferocious animal; it is an animal, isn’t it? So, what is the occupation of an animal? Hm? What is the occupation of an animal? An animal’s occupation is to tear apart; it tears. It will catch any animal and tear it apart. It will not eat it. Hm? Yes, it will not eat a dog’s meat. It will leave it. Whose [meat] will it eat? The animal which is very nice, it will eat its meat a lot, but it will tear it apart, will it not? So, its occupation is blood-thirsty (khoonkhwaar). Khoon khaar. What kind of an occupation? To indulge in bloodshed. Such occupation.

So, later on in the end of the Iron Age the condition becomes such, hm, does the sorrow of the mind increase or decrease? It increases extremely. They become so sorrowful in the world of Christianity; Europe, America is a country especially of the Christians, isn’t it? Yes, so, people become such demons in it for whom people say in India that they live in the nether world (paataal lok). What is meant by paataal lok? The Earth is spherical, isn’t it? So, India is above. What will be on the other side? America. So, it is the paataal lok, isn’t it? Yes. Paataal lok. So, it was told that later on these residents of the nether world commit so many suicides (aatmaghaat). What do they do? Suicide (jeevghaat). Hm? The mental tension increases so much that due to mental tension, they kill themselves; they kill their body (jeev), commit suicide. So, are they most sorrowful or not? Yes, they are most sorrowful. It is because the mind is the most powerful one among the organs. And the one which is powerful has itself become so weak. Hm? It has become ready to commit suicide.

So, it was told these songs are penned a lot in the end. What? Hm? We are in darkness, we are in the darkness of ignorance; because of being in darkness, because of being in ignorance we are very sorrowful. O God! Now what does He do by coming here? Hm? He comes to this world for hundred years like other founders of religions, doesn’t He? He doesn’t come for a longer period. So, what should He do by coming to this world stage consisting of four scenes, this world consisting of four Ages? Hm? You cause the Sun of Knowledge to shine so that the light of knowledge spreads in all the four Ages. Will he spread light If he remains in soul conscious stage or will he spread [light] if he remains more in body consciousness? Hm? In soul conscious stage.

Where does the shooting take place? The rehearsaltakes place when the Supreme Soul, Heavenly God Father Shiv, who is beyond the cycle of birth and death, is not born through the womb, is akarta (non-doer), abhokta (non-pleasure seeker), incorporeal, so, that incorporeal Shiv comes to this world to cause the shooting, the rehearsal of this world within hundred years. What? And He is a big director, isn’t He? Yes. What kind of a director? Managing Director. Does the Managing Director come for a little while, go around or does he remain seated in the factory for 24 hours? Yes, he has a lot of intellect, doesn’t he? Has he studied knowledge or is He educated forever? Yes, He does not get birth at all. So, He is forever educated. Those who pass through the cycle of birth and death forget. Hm? They forget many topics of this birth also; and they forget a lot about the past birth.

So, these songs exist at this time. At which time? When the Father comes to this world, when this world starts becoming a hell forever, then these songs are penned at this time. Nobody will pen such songs in the Golden Age. Hm? Neither will anyone write nor will anyone sing.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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वीसीडी 2849, दिनांक 13.04.2019
VCD 2849, dated 13.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2849-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.03
Time- 00.01-18.03


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – ज्ञान सागर तो एक ही बाप है। वो सागर अनेक तो नहीं होते हैं। नहीं। ज्ञान सागर एक, सर्व का सद्गति दाता एक। तुम बच्चों को भी ये समझाते हैं - जो बच्चे समझते हैं कि हमारे में ज्ञान है शास्त्रों का, वो शास्त्रों का ज्ञान तो नहीं है ना, वो तो भक्ति है। भक्ति है भटकने का मार्ग। बुद्धि भागती रहती है। कभी एक गुरु के पास, कभी दूसरे गुरु के पास। शास्त्रों में बुद्धि भटकती रहती है। और भारतवासियों की बुद्धि तो दूसरे-दूसरे धर्मों में भी भटकती रहती है। कन्वर्ट होते रहते हैं ना। तो ये सभी, ये सारे भारत में तो क्या, सारी इस विश्व में इस समय भक्ति का पहरा है। इसको कहा जाता है भक्ति कल्ट। और तुम बच्चों को, जो अभी ज्ञान सूर्य है, वो आकरके तुमको तीसरा नेत्र ज्ञान का दे रहे हैं। तो तुम बच्चों को अभी ज्ञान मिल रहा है। और ज्ञान तो मिलता ही है ब्राह्मणों को। ब्रह्मा। ब्राह्मण किसे कहते हैं? ब्रह्मा की औलाद ब्राह्मण। वो ब्राह्मण भल अपन को कहते हैं दुनियावाले कि हम ब्राह्मण हैं। उनसे पूछो तुम ब्रह्मा की औलाद हो, ब्राह्मण हो, तो तुम्हारा ब्रह्मा कहाँ है? तो कहते वो सूक्षम वतन में है।

चलो, ये तो दुनिया की बात हुई। और शूटिंग कहाँ होती है? इस ब्राह्मणों की दुनिया में अभी शूटिंग भी इस बात की हो रही है। वो जो ब्राहमण हैं ना जो कहते हैं हम ब्रह्मा की औलाद हैं, हँ, तो उनसे पूछो तुम्हारा ब्रह्मा कहाँ है? कहते हैं वो सूक्षम वतनवासी हो गया। सूक्षम वतन से आता है गुल्ज़ार दादी में ज्ञान सुनाने के लिए। अरे, तो तुम सूक्षम वतनवासी की औलाद हुए ना। सूक्षम वतन वाले तो क्या भूत-प्रेत होते हैं, और फरिश्ते होते हैं। तो तुम उनकी औलाद हो? ब्रह्मा की औलाद नहीं हो।

तो देखो न अभी देव आत्माओं में ज्ञान है और न शूद्रों में ज्ञान है। क्योंकि ये चार वर्ण तो होते हैं ना। ब्राह्मण, क्षत्रीय, हँ, ब्राह्मण सो देवता, फिर क्षत्रीय, फिर वैश्य, फिर शूद्र। तो वर्ण तो बिल्कुल प्रिंसिपल गाए जाते हैं। कहाँ गाए जाते हैं? गीता में बात आई है ना, हँ, कि भगवान ने कहा कि मैं आता हूँ तो चातुर्वण्यम मयासृष्टम्। मैं चार वर्णों की रचना करता हूँ गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार। विभाग, विभाग कर देता हूँ। क्योंकि वर्णों का ही तो ये चित्र भी बनाते हैं। क्या? विराट रूप का चित्र बनाते हैं ना। तो उसमें दिखाते हैं चोटी में ब्राह्मण। अब वो चोटी तो ब्राह्मणों की रही नहीं। उड़ाय देते हैं। मस्तक में देवताएं दिखाते हैं। बाहों में क्षत्रीय, पेट और जंघाओं में वैश्य और पांवों में शूद्र। तो उसमें दिखलाते हैं ना कि सर्वोत्तम कुल तो ब्राह्मणों का है क्योंकि चोटी है ना वो। चोटी तो सबसे ऊपर होती है। हँ? होती है कि नहीं? जैसे दुनिया में बड़े-बड़े पहाड़ हैं। और पहाड़ ज्यादा ऊँचे कि पहाड़ों की चोटी ज्यादा ऊँची? चोटी ज्यादा ऊँची। और पहाड़ों में भी बड़ा पहाड़ माना जाता है ऊँचा पहाड़ हिमालय पहाड़। उसकी भी सबसे ऊँची चोटी एवर ईस्ट चोटी। हाँ। एवर ईस्ट नाम क्यों रखा? ये यादगार है। कि जो सबसे ऊँची चोटी का ब्राह्मण है वो एकदम पूर्वीय सभ्यता का है। सभ्यताएं होती हैं ना। पूर्वी सभ्यता, पश्चिमी सभ्यता। तो पूर्वी सभ्यता भारत में मानी जाती है। भारत देश है पूरब में। और जो पश्चिम में चले जाओ तो जितने भी देश पश्चिम में जाएंगे वो सब विधर्मी।

तो ब्राह्मणों के लिए ही गाया जाता है एक है ब्रह्मा। हँ? तो वो है प्रजापिता ब्रह्मा मुख वंशावली। बाकि ऐसे थोड़ेही है कि चार मुखों वाला ब्रह्मा है तो वो प्रजापिता कहेंगे उसको। नहीं। प्रजापिता तो एक ही है। हँ? और एक है ब्राह्मण चोटी। फिर ऐसे नहीं कि प्रजापिता ब्रह्मा की कुख वंशावली होती है। नहीं। वो तो चार मुखों वाला जो ब्रह्मा है ना उसकी कुख वंशावली हो सकते हैं। लेकिन प्रजापिता ब्रह्मा की कुख वंशावली नहीं होते हैं। हां। उनके तो क्या होते हैं? हँ? प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली। हाँ। तो 20.11.1967 के प्रातः क्लास का दूसरा पेज। तो प्रजापिता ब्रह्मा जो एक है उसकी होती है मुख वंशावली। बाकि फिर जो बचे चार ब्रह्मा के मुख। हँ? अधोमुखी मुख हैं ना कि ऊर्ध्वमुखी हैं? अधोमुखी हैं। अधो माने नीचे की ओर। तो फिर दूसरे जो चार मुख हैं उनमें होते हैं कुख वंशावली। कुख माने? कुख माने गोद। हाँ। देह के ऊपर ध्यान जाता है। सो तो तुम जानते हो। वो कुख से पैदा होते हैं यानि विकार से पैदा होते हैं। कोख माने गोद। गोद में गर्भ महल से जो बच्चे पैदा होते हैं वो विकार से पैदा हुए ना। हाँ। और तुम तो एडाप्टेड चिल्ड्रेन हो। तुमको बाप ने आकरके एडाप्ट किया। हाँ, क्योंकि प्रजापिता ब्रह्मा के ब्राह्मण और ब्राह्मणियां हुए। कोई चार मुखों वाले ब्रह्मा के तुम बच्चे थोड़ेही हो। तो इतना ढ़ेर फिर कहां से आएंगे? हँ? थोड़ेही आएंगे ना। एक प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे थोड़े। और बाकि चार के तो ढ़ेर हो जाते हैं।

तो तुमको कहा जाता है एडॉप्शन। एडॉप्शन भी होता है। एडॉप्ट करते हैं। क्रियेटर को पहले-पहले ही एडॉप्ट करना होता है। हाँ, क्रियेटर है, रचयिता है, इस सारी सृष्टि का भी रचयिता है। हँ? और प्राणी मात्र का भी रचयिता है। आत्माओं को तो रचयिता नहीं कहेंगे। आत्माएं तो कभी रची थोड़ेही जाती है? हाँ। तो एडॉप्ट करना होता है। किसको? अब ये तो सब जानते हैं कि पहले-पहले तो कन्या को एडाप्ट करना होता है। एडाप्ट करके फिर उनको माता कहा जाता है। हाँ, जब कहा जाता है माता जब बच्चा-वच्चा पैदा करती है। यूं भी तो जब पति मिल जाता है तो फिर उनको माता ही तो कहा जाएगा ना। नहीं? हाँ। तो कन्या से एडॉप्ट किया। हँ? कन्या को एडॉप्ट किया और कन्या से, कन्या को कोई, पैदा मुख से, मुख से पैदा नहीं किया ना। एडाप्ट किया। हाँ। नहीं, वो कुख से एडाप्ट किया। तो देखो, तुम सभी हैं एडाप्टेड चिल्ड्रेन। हँ? प्रजापिता ब्रह्मा को इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियां आए, ये कहाँ से आए? तो इसको कहा जाता है एडाप्शन। तो पुरुष जब शादी करते हैं तभी भी कन्या को एडॉप्ट करते हैं। फिर उन कन्या को जभी बच्चा पैदा होते हैं तो उनको मां कहा जाता है। और फिर मां जब बुड्ढी होती है तो फिर उनको, हँ, और बच्चे पैदा होते हैं। बच्चे के बच्चे पैदा होते हैं ना। तो फिर मां को दादी कहा जाता है। हँ? दादी कहा जाता है ना।

हाँ, तो बताया, ऐसे होते हैं ना कि बच्चों को जब बच्चे पैदा होते हैं तो वो बूढ़ी मां को दादी कहा जाता है। हाँ-हाँ, यहाँ कोई दादी-वादी नहीं चलता है। क्या? कि कुमारिका दादी नाम रख दो। फलानी दादी नाम रख दो। यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में दादी-वादी नहीं होने की है तुम्हारे लिए। होने की है? हँ? हाँ, नहीं। तुम्हारे में। तुम्हारे माने? जो बच्चे सन्मुख बैठे हैं उनके लिए कहा यहाँ कोई दादी-वादी नहीं है। तुम्हारे में तो सिर्फ प्रजापिता ब्रह्माकुमार और कुमारियां। भाई-भाई और भाई-बहन। क्योंकि प्रजापिता ब्रह्मा तो मौजूद रहता है ना कि शरीर छोड़के सूक्षमवतनवासी बन जाता है? नहीं। नहीं। वो तो इस सृष्टि पर अंत तक रहेगा। क्यों? क्योंकि सारी प्रजा का पिता है ना। कितनी है प्रजा? 500-700 करोड़ इस मनुष्य सृष्टि में जो भी महाविनाश तक प्रजा होती है कलियुग के अंत में वो सबका एक ही बाप है।

तो बताया भाई और बहन, विचार भी अगर किया जाए कि हम भगवान की संतान हैं तो वो तो संतान वो हैं जो भाई-भाई हो गए। आत्मा-आत्मा भाई-भाई। पीछे प्रजापिता ब्रह्मा के एडाप्टेड चिल्ड्रेन। तो भाई-बहन हो गए। हाँ। भाई-भाई कब हुए? ऊँच ते ऊंच एक भगवंत, हैविनली गॉड फादर, शिव बाप की संतान तो आपस में क्या हुए? भाई-भाई। और प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हुए तो? तो भाई-बहन हो गए। क्योंकि तुम्हारा संबंध सिर्फ ये एक संबंध है। और तो तुम्हारा कोई संबंध इनसे ज्यादा है नहीं। हँ? नई दुनिया में भी जो सतयुग, त्रेता होगा वहाँ ढ़ेर संबंध होंगे कि थोड़े संबंध होंगे? थोड़े संबंध। यहाँ फाउण्डेशन डाला जाता है। तो जो फाउण्डेशन डाला जाएगा, हँ, तो पक्का फाउण्डेशन में थोड़े संबंध होंगे या ढ़ेर होंगे? थोड़े होंगे। हाँ। तो ज्यादा संबंध नहीं। क्योंकि भाई-बहन हो गए ना। तो जब भाई बहन हो गए इस हिसाब से प्रजापिता ब्रह्मा की संतान बन गए। प्रजापिता की संतान बन गए और भाई-बहन बन गए तो भाई बहन के साथ कुदृष्टि रखना, हँ, क्रिमिनल आई रखना, वो तो फिर क्रिमिनल एसॉल्ट हो जावे। हँ? समझा ना? नीच काम हुआ ना। क्रिमिनल आँखों से देखना। तो गोया क्रिमिनल फिर एसाल्ट करने लग पड़ते हैं ना। क्योंकि वो उन खयालात से नहीं देखना है कि ये हमारी कोई स्त्री है। स्त्री है या बहन है? बहन है। तो नहीं। कहेंगे तुम भाई-बहन हो गए। चेंज हो गए।

तो यादगार कोई दिखाई है मन्दिरों में? जो पहले-पहले भाई-बहन बनते हैं तो उनकी यादगार दिखाई। दूसरे उनको फालो करेंगे। क्या यादगार दिखाई? अरे? कहां-कहां देखने लगे। याद ही नहीं आ रहा। हँ? अरे, चेंज हो जाते हैं तो जगन्नाथ के मंदिर में, हँ, जगन्नाथ के साथ भाई भी दिखाया है और बहन भी दिखाई है। हँ? कौन बहन हुई? हाँ, वो ही बहन, जिसको कहते हैं भक्तिमार्ग में सुभद्रा। उन्होंने कृष्ण का नाम दे दिया है। बाप कहते हैं – तो ये कृष्ण का जहाँ नाम दिया है वहाँ तुम आकृष्ट करने वाली आत्मा को समझो। हँ? तो मैं जिसमें प्रवेश करता हूँ वो सारे जगत का नाथ, सारी दुनिया की आत्माओं को खींचता है, आकृष्ट करता है। तो फिर जब भाई-बहन बनते हैं तब आकृष्ट करता है। क्या? अगर बहन को देखा और स्त्री का भान आया तो फिर भाई-बहन थोड़ेही हुए। तो जब पूरे चेंज हो जाएं। तो यही समझना कि हम दोनों भाई-बहन हैं।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page on Monday was – The ocean of knowledge is only one Father. Those oceans are not many. No. The ocean of knowledge is one; the bestower of true salvation upon everyone is one. He also explains this to you children – Children think that we have the knowledge of scriptures; that is not knowledge of the scriptures, is it? That is Bhakti. Bhakti is a path of wandering. The intellect keeps on running. Sometimes it runs to one guru, sometimes to another guru. The intellect keeps on wandering in the scriptures. And the intellect of the residents of India keeps on wandering in other religions also. The keep on getting converted, don’t they? So, there is a guard of Bhakti over not just entire India but in the entire world at this time. This is called Bhakti cult. And the one who is the Sun of Knowledge comes and is giving you children the third eye of knowledge. So, you children are now getting knowledge. And it is the Brahmins who get knowledge. Brahma. Who is called a Brahmin? Brahma’s children are Brahmins. Although those Brahmins of the world call themselves Brahmins; ask them – If you are Brahma’s children, if you are Brahmins, then where is your Brahma? Then they say that he is in the Subtle Region.

Okay, this is about the world. And where does the shootingtake place? The shooting of this topic is taking place now in this world of Brahmins. Those Brahmins who call themselves children of Brahma, if you ask them as to where is your Brahma, they say he has become a Subtle Region dweller. He comes from the Subtle Region in Gulzar Dadi to narrate knowledge. Arey, then you are children of the Subtle Region dweller, aren’t you? The dwellers of the Subtle Region are ghosts and devils and angels (farishtey). So, are you his children? You are not Brahma’s children.

So, look, neither is there any knowledge now in the deity souls nor is there knowledge in the Shudras. It is because there are these four classes (varna), aren’t there? Brahmin, Kshatriya, hm, Brahmins who become deities, then Kshatriyas, then Vaishyas, then Shudras. So, the Varnas (classes) are sung in a completely principal manner. Where are they sung? A topic has been mentioned in the Gita, isn’t it that God has said that when I come, then ‘Chaaturvarnyam mayaasrishtam’, I create four classes as per the attributes, actions and nature. I divide them. It is because this picture is also based on the classes. What? The picture of the gigantic form (viraat roop) is prepared, isn’t it? So, in it the Brahmins are depicted at the top (choti). Now Brahmins do not have that choti (hairlock at the top of the back of the head). They remove it. Deities are shown on the forehead. Kshatriyas are shown in the arms; Vaishyas [are shown] in the abdomen and thighs and Shudras in the legs. So, it is shown in it that the highest clan is of the Brahmins because they are the pinnacle (choti), aren’t they? The pinnacle is topmost. Hm? Is it or isn’t it? For example, there are big mountains in the world. And are the mountains higher or is the peak of the mountains higher? The peak is higher. And the big mountain, high mountain among the mountains is Mount Himalaya. Even its highest peak is the Ever East peak. Yes. Why was it named Ever East? It is a memorial. The highest peak-like Brahmin belongs to the completely Eastern civilization. There are civilizations, aren’t there? Eastern civilization, Western Civilization. So, the Eastern Civilization is believed to exist in India. India, the country is in the East. And if you travel Westwards, then all the countries in the West are heretic (vidharmi).

So, it is sung for the Brahmins only that there is one Brahma. Hm? So, they are mouth-born progeny of Prajapita Brahma. But it is not true that the four-headed Brahma will be called Prajapita. No. Prajapita is only one. Hm? And one is the Brahmin peak. Then it is not true that there are womb-born progeny of Prajapita Brahma. No. There can be womb-born progeny of the four-headed Brahma. But there aren’t womb-born progeny of Prajapita Brahma. Yes. What does he have? Hm? There are mouth-born progeny of Prajapita Brahma. Yes. So, second page of the morning class dated 20.11.1967. So, there are mouth-born progeny of Prajapita Brahma who is one. Then the remaining are the four heads of Brahma; hm? Are they downward-facing heads (adhomukhi) or upward-facing (oordhwamukhi)? They are downward-facing heads. Adho means downward. So, then the other four heads have womb-born progeny (kukhh vanshavali). What is meant by ‘kukhh’? Kukhh means lap. Yes. The attention goes towards the body. You know that. They are born through the womb, i.e. lust (vikaar). Womb means lap. The children who are born in the lap through the palace-like womb are born through lust, aren’t they? Yes. And you are adopted children. The Father came and adopted you. Yes, it is because you are Brahmins and Brahmanis of Prajapita Brahma. You are not children of four-headed Brahma. So, where will these numerous come from? Hm? Very few will come, will they not? The children of one Prajapita Brahma are a few. And those of the remaining four are numerous.

So, you are called adoption. Adoption also takes place. People adopt. The creator has to first of all adopt. Yes, He is the Creator, Rachayita; He is the Creator of this entire world as well. Hm? And He is the Creator of the living beings also. He will not be said to be the creator of the souls. Are souls ever created? Yes. So, one has to adopt. Whom? Well, everyone knows that first of all a virgin has to be adopted. Once she is adopted, she is called a mother. Yes, she is called a mother when she gives birth to a child. Even otherwise, when she gets a husband, she will be called a mother only, will she not be? No? Yes. So, He adopted through a virgin. Hm? He adopted a virgin and through the virgin; the virgin was not given birth through the mouth, was she? She was adopted. Yes. No, she was adopted through the womb. So, look, you all are adopted children. Hm? Where did Prajapita Brahma get so many Brahmakumar-kumaris from? So, this is called adoption. So, when men marry, at that time also they adopt a virgin. Then, when a child is born to that virgin, then she is called a mother. And then when the mother grows old, then more children are born to him. Children are born from the child, aren’t they? So, then the mother is called a grandmother. Hm? She is called a grandmother (daadi), isn’t she?

Yes, so it was told, it happens like this that when children are born to the children, then that old mother is called a grandmother. Yes, yes, here there is no practice of being a grandmother (Dadi), etc. What? You coin the name Kumarika Dadi. You coin the name - such and such Dadi. Here in the world of Brahmins there will not be any grandmother for you. Will you have? Hm? Yes, no. Among you. What is meant by ‘you’? It was said for the children sitting face to face that here there is no Dadi, etc. here. Among you there are just Prajapita Brahmakumars and Brahmakumaris. Brothers (Bhai-Bhai); and brothers and sisters (Bhai-Bhen). It is because Prajapita Brahma remains present, doesn’t he? Or does he leave the body and become a Subtle Region dweller? No. No. He will remain in this world till the end. Why? It is because he is the Father of all the subjects (praja), isn’t he? How many subjects are there? He is the only Father of all the 500-700 crore subjects who exist in this human world till the mega-destruction (mahaavinaash) in the end of the Iron Age.

So, it was told, brother and sister, even if we think that we are children of God, then those children are brothers. Souls are brothers. Later adopted children of Prajapita Brahma. So, you happen to be brothers and sisters. Yes. When are you brothers? If you are children of highest on highest one God, Heavenly God Father, Father Shiv, then what is your mutual relationship? Brothers. And if you are children of Prajapita Brahma? Then you are brothers and sisters. It is because you have only this one relationship. You don’t have any more relationships other than this. Hm? Even in the new world, the Golden Age and the Silver Age, will there be many relationships or few relationships? Few relationships. The foundation is laid here. So, the foundation that is laid here, will there be few relationships or many relationships in the firm foundation? There will be a few. Yes. So, there aren’t more relationships. It is because you are brothers and sisters, aren’t you? So, when you are brothers and sisters, then by this account you are children of Prajapita Brahma. When you become children of Prajapita and when you become brothers and sisters then having evil eye for brothers and sisters, having a criminal eye is like committing a criminal assault. Hm? Did you understand? It is a lowly task, isn’t it? To see with criminal eyes. So, it is as if you start committing a criminal assault, don’t you? It is because you shouldn’t see with that thought that this one is my wife. Is she a wife or a sister? She is a sister. So, no. It will be said that you are brothers and sisters. You have changed.

So, has any memorial been shown in the temples? The memorial of those who become the first and foremost brother and sister has been shown. Others will follow them. What is the memorial that has been depicted? Arey? Where all have you started seeing? You are not recollecting. Hm? Arey, when you change, then in the temple of Jagannath, hm, along with Jagannath a brother has also been shown and a sister has also been shown. Hm? Who is the sister? Yes, the same sister, who is called Subhadra on the path of Bhakti. They have mentioned the name of Krishna. The Father says – So, wherever they have mentioned the name of Krishna you consider it to be the soul which attracts. Hm? So, the one in whom I enter is the Lord of the entire world, He pulls, attracts the souls of the entire world. So, then when you become brothers and sisters, then He attracts. What? If you see a sister and if you feel the consciousness of a wife, then you are not brothers and sisters. So, when you change completely. So, consider that we both are brother and sister.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
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वीसीडी 2850, दिनांक 14.04.2019
VCD 2850, dated 14.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2850-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.34
Time- 00.01-15.34


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को तीसरे पेज के अंतिम पांचवीं लाइन में बात चल रही थी – बच्चों ने समझा है कि जो हठयोग सन्यासी हैं वो कोई राजयोग सन्यासी तो नहीं हैं जो राज़ भरा योग सिखाते हो और रिजल्ट में राजाई राजयोग से दिलाते हों। राजयोग सिखाने वाला तो एक ही बाप है जो राजयोग सिखाकरके तुम आत्माओं को जन्म-जन्मान्तर की राजाई दिलाता है। तो हठयोगी कभी भी राजयोग नहीं सिखलाय सकेंगे। और राजयोगी हठयोग नहीं सिखलाय सकेंगे क्योंकि पौड़ी नीचे कैसे ले जाएंगे? तो इनकी सिखावणी बिल्कुल अलग है। परन्तु पत्थरबुद्धि होने के कारण, तमोप्रधान होने के कारण वो कुछ बुद्धि से समझते नहीं हैं कि तमोप्रधान को तुच्छबुद्धि, पत्थरबुद्धि कहा जाता है। समझा ना? और ये किसने कहा है? भगवानुवाच है। 20.11.1967 की प्रातः क्लास का चौथा पेज। भगवानुवाच है, हँ, कि तुच्छ बुद्धि हैं, पत्थरबुद्धि हैं। लेकिन ये किसको कहा है? हँ? भगवानुवाच। भगवान ने जब उवाच किया ब्रह्मा के मुख से, साक्षात् ब्रह्मा के मुख से उवाच किया होगा ना। तो किसको कहा? दुनियावालों को कहा? किसको कहा? हाँ, अपने ब्राह्मण बच्चों को कहा कि तुम पत्थरबुद्धि हो गए हो। हँ?

अभी आकरके पारसबुद्धि बनो। कहाँ आकरके? हँ? अभी तक तुम पत्थरबुद्धि 1967 तक बताया। हँ? अभी कहाँ आकरके पारसबुद्धि बनो? हँ? जो भी मुकर्रर रथ है ना बाप का, हँ, उसके सन्मुख आकरके सुनो। तब पारसबुद्धि बनो। क्योंकि दुनिया में ये जो भी मनुष्य मात्र हैं इस सारी दुनिया में वो सभी पत्थरबुद्धि हैं। तमोप्रधान, पतित बुद्धि। देखो, जरूर पतित बुद्धि ही होंगे ना। क्योंकि पावनबुद्धि कहाँ होते हैं? कौनसे युग में? पावनबुद्धि सतयुग में होते हैं। हँ? और अभी सतयुग है क्या? हँ? सतयुग तो नहीं है। तुम ब्राह्मण बच्चे कहेंगे क्या कि हम सतयुग में हैं? नहीं। कोई सतयुग में नहीं कह सकता। संगमयुग में हैं। वो भी कहें कि हम पुरुषोत्तम संगमयुग में हैं।

तो फिर कौन है पुरुषों में उत्तम, सो तो जानना चाहिए। हँ? हाँ। अगर कहें कि दादा लेखराज ब्रह्मा वो पुरुषोत्तम। वो तो सूक्षम शरीरधारी बन गया। तो पुरुषोत्तम कैसे हुआ? पुरुषोत्तम तो देवताएं होते हैं। तो देवताओं की पूजा होती है, मंदिर बनते हैं। हँ? क्या भूत-प्रेतों के मंदिर बनते हैं क्या? भूत-प्रेतों की विधर्मी आत्माएं पूजा करती हैं विदेशी आत्माएं, हँ, विदेशी धरमपिताओं के फालोअर्स कि भारतवासी जो देवी-देवताओं की पूजा करने वाले हैं वो भूत-प्रेतों को मानते हैं? अगर मानते भी हैं तो ज़रूर उन विधर्मियों से प्रभावित होने वाली आत्माएं हैं जो तांत्रिकों के पीछे पड़ती रहती हैं। क्या? औलियों के पीछे पड़ती रहती हैं। ये गंदी विद्या है। क्या? भूत-प्रेतों की पूजा करना। नहीं तो देखो उस गीता में भी बताया, शास्त्रीय गीता में भी बताय दिया मेरे फालोअर्स, मेरे उपासना करने वाले मेरे से प्राप्ति करते हैं। देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं से प्राप्ति करते हैं। और भूत-प्रेतों की उपासना करने वाले भूत-प्रेतों से प्राप्ति करते हैं। तो जो भूत-प्रेतों की उपासना करेंगे तो क्या बनेंगे? भूत-प्रेत बनेंगे। हाँ। देवी-देवता तो बन न सकें।

तो बताया सब कहेंगे इस दुनिया में कि अभी क्या हैं? पत्थरबुद्धि, तुच्छबुद्धि, पतितबुद्धि। क्योंकि अभी सतयुग थोड़ेही आ गया। यहाँ कलियुग में तो सब पतितबुद्धि ही होते हैं। हँ? चाहे वो अपन को कहें कि हम ब्रह्मा की औलाद हैं, ब्राह्मण बन गए। लेकिन कौनसे ब्रह्मा की औलाद? हँ? क्या कहेंगे? अधोमुखी ब्रह्मा की औलाद हैं या ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा की औलाद हैं? हाँ, ऊँच ते ऊँच ब्रह्मा, जिसे परमब्रह्म कहा जाता है, हँ, उसकी औलाद हैं? नहीं। पहचानते ही नहीं हैं तो औलाद कहाँ से हो गए? तो तुम यहाँ कभी भी किसी को पावन आत्मा कभी नहीं कह सकते हो। क्या कहा? तुम बच्चे भी। क्या? किसी को पावन आत्मा कह सकते हो? किसी को नहीं कह सकते। सब पतितबुद्धि हैं। जरूर तुम पतित आत्मा ही कहेंगे क्योंकि पावन आत्मा के लिए तो पुकारते हैं ना। क्या पुकारते हैं? हे पतित पावन आओ। हँ? एकदम 100 परसेन्ट पावन आत्मा बनती है ना। हँ? पहले पतित थी। पुरुषार्थ करके फिर क्या बनती? पावन बनती। जब पावन बनती तो सतयुग हुआ उसके लिए कि कलियुग हुआ? हँ? सतयुग हुआ।

तो वो एक ही शरीर है जो पतित भी कहें और पावन भी कहें। श्याम भी कहें और सुंदर भी कहें। ऐसे थोड़ेही जैसे तुम ब्राह्मण बच्चों ने पहले समझ लिया था। या कोई ब्राह्मण अभी भी समझते हैं कि दादा लेखराज ब्रह्मा इस जनम में पतित और सतयुग में नया शरीर लेंगे तो पावन बन जाएंगे। ऐसे? दो शरीरों का नाम है, हँ, श्यामसुंदर? नहीं। एक ही शरीरधारी का नाम है जो पुरुषार्थी जीवन में पतित और पुरुषार्थ संपन्न होता है तो क्या बन जाता? पावन बन जाता है। जब बन जाता है तब तुम प्रैक्टिकल में पुकारते हो, हँ, हे पतित-पावन आओ। आओ, आओ कहकरके शूटिंग करते हो या नहीं करते हो? रिहर्सल करते हो, आओ, अब हमसे नहीं रहा जाता। आ जाओ। क्या? बुलाते हो या नहीं बुलाते हो? हँ? या ढ़ाई हज़ार साल की तरह बुलाते रहते हो? आता है नहीं। नहीं। बुलाते भी हो और बाप प्रैक्टिकल में होता है तो आता भी है। अरे, इस दुनिया में होगा तभी तो आएगा ना। हाँ। तो आकरके, हाँ, हमको पतित से पावन बनाओ। आकरके अपने संग का रंग लगाओ। कैसे? चाहे मुख से लगाओ, चाहे कानों से, चाहे आँख से, ज्ञान इन्द्रियों से। अरे, कोई-कोई तो ऐसे हैं जो ज्ञानेन्द्रियों की बात तो उनकी बुद्धि में ही नहीं बैठती कि भगवान बाप आकरके ज्ञानेन्द्रियों से और उनसे भी ऊँची जो मनसा है, मन-बुद्धि उससे मानसी सृष्टि बनाते हैं। और देवताओं की ज्ञानेन्द्रियों की सृष्टि चलती है। उनकी बुद्धि में बैठता ही नहीं। तो जिनकी बुद्धि में नहीं बैठता वो क्या करेंगे? हँ? क्या करेंगे? हाँ।

तो बताया – कैसे भी करके हमको पतित से पावन बनाओ। तो फिर जब बाप आकरके ब्राह्मणों को बनाएंगे तभी तो पावन होंगे। कि जैसे ढ़ाई हज़ार साल कलियुग में आते हैं नहीं, बुलाते रहते हैं तो पावन हो जाते हैं? नहीं हो जाते। हाँ। तो आवेंगे और आकरके प्रैक्टिकल में संग के रंग से पावन बनावेंगे। हाँ। पतित कैसे बने? हँ? कैसे बने देवताएं पतित? आधा कल्प तो पावन थे सतयुग-त्रेता में। फिर द्वैतवादी द्वापरयुग में जहाँ दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो मतें, दो-दो कुल, दो-दो भाषाएं, द्वैतवाद, दो से चार, चार से आठ होने लगा तो पतित कैसे बने? हाँ, अनेकों के संग के रंग में आने से पतित बने। हाँ। और अनेक भी कैसे? स्वधर्मी या विधर्मी? आत्मा के धर्म को मानने वाले या देह के धर्म को मानने वाले? देह धर्मी, विधर्मी। विधर्मी भी और विदेशी भी। कि भारतवासी? हँ? अपना धर्म कहाँ स्थापन करते हैं? विदेशों में कि भारत में? विदेशों में। हाँ। तो विदेशी भी हैं विधर्मी भी हैं। हँ? और वो तो पावन बनाय नहीं सकते। और ही क्या बनावेंगे? हाँ, संग के रंग से एक तो खुद भी पतित बनते हैं भ्रष्ट कर्मेन्द्रियों से और द्वैतवादी द्वापरयुग से जबसे इब्राहिम आया तबसे, हाँ, जो भी संग के रंग में आएंगे सबको क्या बनावेंगे? पतित ही बनावेंगे।

तो देखो पतित हैं सारी दुनिया। तुम क्या समझते हो अपन को? हाँ, तुम ब्राह्मण भी तो अभी यही कहेंगे हम तो कलियुग में हैं ना। सतयुग थोड़ेही देवता बन गए सतयुग में? हँ? न आदि सतयुग है विष्णु लोक बन गया जहाँ अतीन्द्रिय सुख भोगें। वो भी नहीं। तो पतित हैं ना। पावन बनने के लिए तो, हाँ, जो पतित हैं वो तो जानते ही नहीं हैं कि पावन कैसे बना जाता है? अभी पता चल गया कैसे पावन बना जाता है? क्या? हाँ, कैसे पावन बना जाता है? हाँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ऊँच ते ऊँच एक के संग। नहीं तो तुम कोई को भी एक को पकड़ लो। हँ? गधा, उल्लू, पाजी को तो पावन बन जाएंगे। एक की बात नहीं है। ऊँच ते ऊँच जो इस दुनिया में हाँ, ऊँच ते ऊँच भगवंत कहा जाता है ना। ऊँच ते ऊँच भगवान है उसको पहचानकरके, जानकरके, मानकरके फिर पावन बन सकते हो। पावन बनने के लिए तो कोई जानते ही नहीं हैं वो है कौन और कहाँ है? हँ? कोई जानते हैं? अरे, इस कलियुगी दुनिया में कोई जानते हैं? कोई नहीं जानते कि वो पुरुषोत्तम जो पुरुष माने आत्माओं को संग के रंग से एक ही पुरुषोत्तम, सारे संसार को नंबरवार उत्तम बनाता है। नंबरवार प्रत्यक्ष होंगे ना संसार में? हाँ, वो उत्तम बनेंगे। तो ये कहते हैं मन से, बुद्धि से, हे पतित-पावन आओ, परन्तु फिर भी हैं भक्तिमार्ग में। क्या? बुद्धि कभी एक के पीछे भागती है, कभी बुद्धि दूसरे के पीछे भागती है। हँ? तो भक्तिमार्ग हुआ या ज्ञान मार्ग हुआ? भक्तिमार्ग हुआ। ज्ञानमार्ग तो तब कहें जब लगातार बुद्धि एक के पीछे भागे, पक्का हो जाए, तब कहेंगे ज्ञान मार्ग। नहीं तो? भक्तिमार्ग।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fifth line of the third pageon Monday was – Children have understood that the hathyog sanyasis are not rajyog sanyasis who teach Yoga full of raaz (secret) and enable you to get kingship as a result of rajyog. The teacher of rajyog is only one Father who teaches rajyog and enables you souls to get kingship for birth by birth. So, hathyogis can never teach rajyog. And rajyogis cannot teach hathyog (physical Yoga) because how can they take one step downwards? So, their teaching is completely different. But because of having stone-like intellect, because of being tamopradhan (degraded) they do not understand anything through the intellect that a tamopradhan person is called tuchhbuddhi (having lowly intellect), pattharbuddhi (having stone-like intellect). Did you understand? And who said this? These are the words of God. Fourth page of the morning class dated 20.11.1967. God says that they have a lowly intellect, stone-like intellect. But to whom was this said? Hm? Bhagwaanuwaach (God speaks). When God spoke through the mouth of Brahma, He must have spoken practically through the mouth of Brahma, didn’t He? So, to whom did He say? Did He say to the people of the world? To whom did He say? Yes, He said to His Brahmin children that you have developed a stone-like intellect.

Now come and become paarasbuddhi (elixir-like intellect). After coming to which place? Hm? It was told that you were till now pattharbuddhi till 1967. Hm? Where should you now come and become paarasbuddhi? Hm? Come and listen face to face from the permanent Chariot of the Father. Then you will become paarasbuddhi. It is because all the human beings in the world, in this entire world are pattharbuddhi. Tamopradhan (degraded), sinful intellect. Look, they will definitely have a sinful intellect only, will they not? It is because where do people have a pure intellect? In which Age? People have a pure-intellect in the Golden Age. Hm? And is it a Golden Age now? Hm? It is not Golden Age. Will you Brahmin children say that we are in Golden Age? No. Nobody can say that they are in the Golden Age. We are in the Confluence Age. That too we should say that we are in the elevated Confluence Age (Purushottam Sangamyug).

So, then you should know as to who is the highest (uttam) among the souls (purush). Hm? Yes. If we say that Dada Lekhraj Brahma is Purushottam (highest among the souls), then he has become subtle bodied. So, how can he be Purushottam? The deities are Purushottam. So, deities are worshipped, their temples are built. Hm? Are temples built for the ghosts and devils? Do the vidharmi (heretic) souls, do the videshi (foreigner) souls, do the followers of foreign founders of religions worship the ghosts and devils or do the residents of India who worship the deities, believe in ghosts and devils? Even if they believe, then definitely they are the souls which get influenced by those vidharmis who keep on following the tantriks (black magicians). What? They follow the Aulias (black magicians from Muslim religion). This is an evil art. What? To worship ghosts and devils. Otherwise, look, it has been told in that Gita also, that scriptural Gita also that My followers, those who worship Me achieve attainments from Me. Those who worship the deities achieve attainments from the deities. And those who worship ghosts and devils achieve attainments from ghosts and devils. So, what will those who worship ghosts and devils become? They will become ghosts and devils. Yes. They cannot become deities.

So, it was told that everyone will say that what are we now in this world? We have a stone-like intellect, lowly-intellect, sinful intellect. It is because the Golden Age has not yet arrived. Here everyone has a sinful intellect only in the Iron Age. Hm? They may say that we are children of Brahma, we have become Brahmins. But children of which Brahma? Hm? What would you say? Are you children of the Brahma with downward facing head (adhomukhi) or children of the Brahma with upward facing head (oordhwamukhi)? Yes, are you the children of the highest on high Brahma who is called Parambrahm? No. When they don’t recognize at all, then how can they be his children? So, you can never call anyone a pure soul here. What has been said? Even you children. What? Can you call anyone a pure soul? You cannot call anyone. Everyone has a sinful intellect. Definitely you will call them a sinful soul only because you call the pure soul, don’t you? What do you call? O purifier of the sinful ones! come. Hm? The soul becomes completely 100 percent pure soul, doesn’t it? Hm? Earlier it was sinful. What does it become after making purusharth? It becomes pure. When it becomes pure, then is it the Golden Age for it or is it the Iron Age for it? Hm? It is the Golden Age.

So, that is the only body which can be called sinful as well as pure. It can be called shyaam (dark) as well as sundar (beautiful). It is not as if you Brahmin children had thought earlier. Or some Brahmins think even now that Dada Lekhraj Brahma is sinful in this birth and when he takes up a new body in the Golden Age, then he will become pure. Is it so? Is Shyamsundar the name of two bodies? No. It is the name of the same bodily being who is sinful in the purusharthi (effort-making) life and what does he become when his purusharth is completed? He becomes pure. When he becomes then you call in practical, O purifier of the sinful ones, come. Do you perform the shooting or not by calling ‘come, come’? You perform the rehearsal, come, we cannot bear any more. Come. What? Do you call or not? Hm? Or do you keep on calling like 2500 years? He doesn’t come. No. You call also and when the Father is in practical, then He comes as well. Arey, He will come only when He is in this world, will He not? Yes. So, come and, yes, make us pure from sinful. Come and apply the colour of your company. How? Either apply through the mouth, either through the ears, either through the eyes or through the sense organs. Arey, some are such that the topic of the sense organs doesn’t sit in their intellect at all that God, the Father comes and creates a world of thoughts (maansi srishti) through the sense organs and through the mind, the mind and intellect which is higher than them. And the deities procreate through the sense organs. It doesn’t sit in their intellect at all. So, what will those in whose intellect this topic doesn’t sit do? Hm? What will they do? Yes.

So, it was told – In whatever manner possible make us pure from sinful. So, then, when the Father comes and makes the Brahmins, only then will they become pure. Or is it as if He doesn’t come in 2500 years, in the Iron Age and you keep on calling, do you become pure? You don’t become. Yes. So, He will come and make you pure through the colour of company in practical. Yes. How did you become sinful? Hm? How did the deities become sinful? They were pure for half a Kalpa in the Golden Age and Silver Age. Then in the dualist Copper Age, where two religions, two kingdoms, two opinions, two clans, two languages, dualism, two leads to four, four leads to eight, then how did you become sinful? Yes, you became sinful by getting coloured by the company of many. Yes. And how were even those numerous people? Swadharmi or vidharmi? Did they believe in the dharma (religion) of the soul or did they believe in the religion of the body? They believed in the religion of the body, vidharmi (heretics). Vidharmi as well as videshi (foreigners). Or the residents of India? Hm? Where do they establish their own religion? In the foreign countries or in India? In the foreign countries. Yes. So, there are videshis as well as vidharmis. Hm? And they cannot make you pure. What will they make you even more? Yes, they themselves become sinful through the colour of company through the unrighteous organs and from the dualist Copper Age, ever since Ibrahim came, yes, whoever gets coloured by his company, what will he make them? He will make them sinful only.

So, look, the entire world is sinful. What do you consider yourself? Yes, you Brahmins would also say now that we are in the Iron Age, aren’t we? Golden Age; Have we become deities in the Golden Age? Hm? Neither is it the very beginning of the Golden Age, the abode of Vishnu where you experience super-sensuous joy. Not even that. So, we are sinful, aren’t we? In order to become pure, yes, those who are sinful do not know that how can one become pure? Do you now know how you can become pure? What? Yes, how does one become pure? Yes?
(Someone said something.) Yes, in the company of the one, highest on high. Otherwise, you may catch any one, hm, a donkey, owl, dog (paaji) you will become pure. It is not about one. The highest on high in this world, yes, He is called the highest on high God, isn’t He? There is highest on high God; you can become pure by recognizing Him, knowing Him and accepting Him. In order to become pure, nobody knows at all as to who is He and where is He? Hm? Does anyone know? Arey, does anyone know in this Iron Age world? Nobody knows that that Purushottam, the only one Purushottam, who makes the purush, i.e. souls, the entire world numberwise uttam (best) through the colour of company. Souls will be revealed numberwise in the world, will they not be? Yes, they will become uttam (best). So, they say through the mind, through the intellect – O purifier of the sinful ones, come; yet, they are on the path of Bhakti. What? Sometimes the intellect runs after one, sometimes the intellect runs after another. Hm? So, is it a path of Bhakti or a path of knowledge? It is a path of Bhakti. It will be called a path of knowledge when the intellect runs after one continuously, when it becomes firm, then it will be called a path of knowledge. Otherwise? A path of Bhakti.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2851, दिनांक 15.04.2019
VCD 2851, dated 15.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2851-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.50
Time- 00.01-19.50


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को चौथे पेज के मध्य में बात चल रही थी – अभी जो भी भक्तिमार्ग में महिमा करते हैं वो मनुष्य मनुष्य की महिमा करते हैं। ऐसे नहीं यहां कि कोई देवताएं बैठे हैं या कोई भगवान-भगवती बैठे हैं। या प्रैक्टिकल में कोई भगवान पार्ट बजाय रहा है। देखो, मनुष्यों की महिमा में और देवताओं की महिमा में या भगवान की महिमा में कोई फर्क तो होगा ना। प्रैक्टिकल चलन में फर्क दिखाई देगा कि नहीं देगा? हाँ, देखो, वो पूज्य और जो महिमा करने वाले हैं वो पुजारी। तो फिर महिमा करते हैं। हाँ, ये जरूर है कि जो महिमा करते हैं देवताओं की सो पूज्य होते हैं सतयुग और त्रेता में। द्वापर, कलियुग में महिमा करने लग पड़ते हैं।

तो देखो पुजारी होते हैं फिर द्वापर, कलियुग में। वो द्वापर, कलियुग में कभी पूज्य होते ही नहीं हैं। तो किसकी महिमा करते हैं? अरे, मनुष्य बैठकरके मनुष्यों की महिमा करते हैं ना। समझा ना बच्ची? यहाँ तो अभी सबको पूज्य कह देते हैं। जैसे, हाँ, मुसलमान होंगे, उनके नाम के आगे भी श्री लगा देंगे। श्री माना श्रेष्ठ देवताएं। श्री-श्री फरखुद्दीन अली अहमद। वाह भई। परन्तु सच्चा-सच्चा पूज्य जो फिर पूजा ही न करे, ऐसे पूज्य तो फिर होते ही सतयुग में हैं। वो कोई द्वैतवादी द्वापर कलियुग में थोड़ेही हो सकते हैं जहाँ दो-दो राज्य हो जाते हैं, दो-दो धरम हो जाते हैं, दो-दो भाषाएं हो जाती हैं, दो-दो कुल, दो-दो मतें हो जाती हैं। सब आपस में टकराते हैं, लड़ाई-झगड़ा, मारामारी। तो वो मारामारी की जो हिंसा करते हैं वो हिंसक कोई देवताएं होते हैं क्या? अरे, वो जो मन्दिरों में जाकरके मूर्तियां बनाके पूजा करते हैं ना वो कोई पूजा थोड़ेही हुई पूज्य की। वो तो पत्थर की; क्या है? पत्थर की पूजा हो गई। मुसलमान लोग कहते हैं अरे, ये तो काफिर हैं, बुतपरस्त। हाँ, बुत की पूजा करते रहते हैं। हँ?

तो देखो, यहाँ इस कलियुगी दुनिया में पुजारी हैं। तो जिन पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते हैं वो कभी चैतन्य थी। और वो पूज्य बनती हैं। कहाँ बनती हैं? इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर पूज्य बनती हैं जब बाप आकरके पुरुष माने आत्मा; कौनसी आत्मा? मनुष्य आत्माएं मनुष्य आत्माओं के बीच में जो पुरुषों में उत्तम आत्मा है उत्तम ते उत्तम, हँ, उसकी प्रत्यक्षता की घोषणा करवाते हैं। कौनसे वर्ष में? मनुष्य सृष्टि का बाप माने बीज। कौन? आदम कहो, अर्जुन कहो, हँ, पुरुषोत्तम कहो, आदि नारायण कहो, बात तो एक ही है। तो उसकी घोषणा करवाते हैं कि सन् 76 है बाप का, मनुष्य सृष्टि के बाप का प्रत्यक्षता वर्ष। तो मनुष्य जभी गायन करते हैं तो उनका करते हैं पहले गायन। किनका? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पहले-पहले प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेते हैं। सारी मनुष्य सृष्टि के सामने नंबरवार। हँ? उनका गायन करते हैं। किनका? भगवान का।

भगवान माने? भगवान माने भाग्यवान। हँ? क्यों भाग्यवान? कि मैं आता हूँ तो जिस तन का आधार लेता हूँ; कौन? मैं कौन? शिव सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर जब आते हैं तो जिस मुकर्रर रथ का आधार लेते हैं, हाँ, वो मुकर्रर रथ ही को आप समान बनाता हूँ। आप समान माने? अरे, इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ऊँच ते ऊँच भगवंत का पार्ट बजाने वाली कोई आत्मा है या नहीं है? कौन है? हँ? हाँ
(किसी ने कुछ कहा।) लो। आत्मा। मुकर्रर रथ ही आत्मा? शिव नहीं है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो शिव; शिव नहीं कहना चाहिए। सदा शिव। शिव कहेंगे तो जिसको आप समान बनाते हैं वो भी तो कल्याणकारी बन जाता है ना सारी सृष्टि का। तो सिर्फ शिव नहीं। सदा शिव। क्योंकि जिसको आप समान बनाते हैं वो तो डुप्लिकेट ही हुआ ना। क्या? कि ओरिजिनल हुआ? हाँ, डुप्लिकेट हुआ। तो वो जो डुप्लिकेट कॉपी है वो कितना भी लंबा समय चले फिर भी तो एकदम लगातार सदा शिव थोड़ेही कहेंगे? हाँ।

तो बताया – वो जो गायन करते हैं, पूजा करते हैं, वो उनकी पूजा करते हैं। किनकी? उनकी। उनकी। उनकी क्यों कहा? उसकी क्यों नहीं कहा? क्योंकि दो आत्माएं हैं ना उसमें। मुकर्रर रथधारी मनुष्य सृष्टि का जो बीजरूप बाप आदम, एडम, अर्जुन है ना उसमें दो आत्माएं हैं उस शरीर रूपी रथ में। एक अर्जुन की अपनी आत्मा और दूसरी? दूसरी सुप्रीम सोल, हैविनली गॉड फादर। तो उनका कहा। उसका नहीं कहा। तो उनका गायन करते हैं भगवान का। आपेही पूज्य। फिर कहते हैं आपे ही पुजारी। अरे, मैं कहाँ पूज्य और पुजारी बनता हूँ? सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर पूज्य और फिर पुजारी बनता है क्या? नहीं। जिसमें प्रवेश करते हैं उसको पूज्य बनाते हैं। और वो ही फिर जब जनम बाइ जनम सतयुग, त्रेता में सुख भोगते-भोगते नीचे गिरता है, तो फिर पुजारी बन जाता है। पूज्य नहीं कह सकते। हँ? तो उसकी बात है आपेही पूज्य आपेही पुजारी बनता है। ये ऐसे नहीं कहते हैं कि आप ही पूज्य बनाते हो। हँ? फिर जो पूज्य बनाते हैं वो ही पुजारी बनते हैं। कहते तो नहीं हैं ना कि आप पूज्य बनाते हो। हाँ। ऐसे नहीं कहते हैं। ये कहते हैं आपेही यानि भगवान को कहते हैं। हँ? आपेही पूज्य आपेही पुजारी। अरे, उसको कैसे कहेंगे आपेही पूज्य आपेही पुजारी? ये क्यों कहते हैं आपेही पूज्य आपेही पुजारी? हँ? आपेही पूज्य बनते हो तुम बच्चे नंबरवार। और फिर आपेही लीला करने के लिए पुजारी बनते हो। क्या? हाँ। आपेही पूज्य तो पुजारी बनते हो ना। तो वो ऐसे। समझा ना?

तो इसको कहा जाएगा ना घोर अंधियारा। क्या? कि वो भगवान को ही कह देते हैं। हँ? जो ऊँचे ते ऊँचा भगवंत इस सृष्टि पर आकरके ऊँच ते ऊँच पार्ट बजाता है, जिससे ऊँचा पार्ट और कोई आत्मा सुप्रीम सोल के अलावा कोई बजा ही नहीं सकती। उसके लिए समझ लेते हैं कि आपेही पूज्य आपेही पुजारी। अरे, घोर अंधियारा लगा पड़ा है। तभी घोर अंधियारे वाले कहते हैं कि हे ज्ञान सूर्य आय करके हमारा ज्ञान का सूर्य जगाओ। हँ? हमारा ज्ञान का सूर्य। मेरा या हमारा? क्या अंतर है? मेरा माने एक का। हँ? हमारा माने हम सबका 500-700 करोड़ का। तो जो हम सबका 500-700 करोड़ हैं ना उनमें भी जो देवी देवता सनातन धर्म के हैं, भारतवासी हैं, वो ही तो बुलाते हैं। हाँ। क्योंकि वो ही तो जानते हैं कि वो साकार भी है और निराकार भी बनता है। तो कहते हैं हमारा ज्ञान का सूरज जगाओ। अब उनका हमारा कौन हुआ? सुप्रीम सोल कहें हैविनली गॉड फादर, जो सदा निराकार है, सदा ज्योतिबिन्दु है? हँ? असली रूप उसका क्या है? सदा? सदा ज्योतिबिन्दु। भले शरीर में प्रवेश करता है मुकर्रर में या टेम्परेरी रथ में तो भी कैसी स्टेज में रहता है? बिन्दु रूप स्टेज में निराकारी स्टेज में रहता है। तो वो आकरके उनका, उनका सूर्य जगाता है क्या? हँ? जगाता है कि नहीं? अरे, वो ही तो उनका सूर्य जगाता है। इसलिए गीता में लिखा हुआ है कि मैं जब आता हूँ तो सूर्य को ज्ञान देता हूँ। क्या? गीता में नाम भी दिया हुआ है विवस्वत। सूर्य को ज्ञान देता हूँ। तो जिस सूर्य को ज्ञान देता हूँ उस सूर्य के लिए कहते हैं हमारा ज्ञान सूर्य जगाओ। माने जगाने वाला अलग आत्मा और जगने वाली अलग आत्मा। और जो जगने वाली अलग आत्मा है वो हमारा ज्ञान सूर्य है। क्या? हमारा माने? हम भारतवासियों का ज्ञान सूर्य है। जगाओ क्योंकि हम घोर अंधियारे में पड़े हैं। क्या? जो विदेशी आत्माएं हैं उतना घोर अंधियारे में नहीं पड़े हैं। उतनी अंधश्रद्धा में नहीं पड़ी हुई हैं। लेकिन हम? हम तो एकदम अंधश्रद्धा में हैं। पूरे अंधे बने पड़े हैं।

तो ये पुकारते रहते हैं। कौन? ये। किसकी तरफ इशारा किया? ये पुकारते रहते हैं। ये माने किसकी तरफ इशारा किया? हाँ, दादा लेखराज ब्रह्मा की तरफ इशारा किया। हँ? इनका क्या पार्ट हुआ? हँ? कलियुग के अंत में आकरके क्या पार्ट हुआ? अंधे धृतराष्ट्र। क्या? कैसा नाम पड़ता है? अंधे धृतराष्ट्र। कैसा राष्ट्र? सारे राष्ट्र की धन-संपत्ति को जो असली धन-संपत्ति है उसको अपनी मुट्ठी में कर ले। कब कर लिया? कब कर लिया? 1947 में अपनी मुट्ठी में कर लिया कि नहीं? किसको कर लिया? अरे? जो भी ज्ञान गंगाएं हैं ईश्वरीय ज्ञान को धारण करने वाली, और संसार में फैलाने वाली, पवित्रता के जीवन को जीने वाली, पवित्र रहने वाली, वो ही पवित्र आत्माएं तो फैलाय सकेंगी ईश्वरीय ज्ञान को। हँ? ईश्वर, जिसे हम ईश्वर कहते हैं, ऊँच ते ऊँच भगवान कहते हैं वो एवर प्योर है ना। तो एवर प्योर का ज्ञान कौन फैलाय सकेगा? हँ? कोई फैलाय सकेगा? जो एवर प्योर होगा वो ही फैलाय सकेगा।

तो ये जो कन्याएं-माताएं हैं जो ज्ञान गंगाएं कही जाती हैं, हाँ, तो ये ज्ञान गंगाएं, इन ज्ञान गंगाओं को कहेंगे असली धन संपत्ति। क्या? हाँ, जो ज्ञान को धारण करे वो ही तो संपत्तिवान हुआ ना। तो उनको अपने कंट्रोल में कर लेता है। कौन? हँ? दादा लेखराज ब्रह्मा। 1947 में उन ब्रह्माकुमार-कुमारियों को अपने कंट्रोल में करता है, जो ब्रह्माकुमार-कुमारी ओम मंडली में, हाँ, सिंध, हैदराबाद में, हाँ, निकले थे, जिनके लिए शास्त्रों में गायन है कि गोपियों को भगाया। तो वो तो अखबार में निकल गया कि कलकत्ते का कोई जौहरी कहता है कि 300-400 मिल गईं हैं और अभी 16000 और चाहिए। ऐसे कहता है। तो वो बात किसकी थी? जो ओम मंडली में ये पार्ट बजाया, दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा ने बजाया या प्रजापिता ने बजाया? हँ? मनुष्य सृष्टि का जो बीज है पिता, प्रजापिता, 500-700 जो करोड़ प्रजा है इस मनुष्य सृष्टि में उस सारी मनुष्य सृष्टि का पिता। अरे, पहले पिता होता है कि पति होता है? पहले क्या होता है? लिखो ना। पी लिखो या प लिखो?
(किसी ने कुछ लिखकर जवाब दिया।) हाँ, पहले पिता होता है क्योंकि शास्त्रों में तो लिख दिया है प्रजापति। अरे, वो तो संपन्न स्टेज का नाम लिखा हुआ है। हँ? 500-700 करोड़ प्रजा का पति कहो चाहे विश्व पति कहो। तो विश्व की बादशाही जब लेगा तभी तो पति कहेंगे, प्रजापति कहेंगे। या पहले से ही कहना शुरू कर देंगे? हँ? पहले तो पुरुषार्थ करेगा ना राजयोग का, तब ही तो विश्व की बादशाही लेगा ना।

तो शास्त्रों में तो अगडम-बगडम सब कर ही दिया है। बाप आकरके सच्ची बात बताते हैं कि मैं प्रजापति में नहीं आता हूँ। वो तो बाद में बनेगा पुरुषार्थ करके। हँ? मैं प्रजापिता में आता हूँ। माने इस मनुष्य सृष्टि का जो आदि पिता आत्मा है मनुष्यात्मा, हाँ, ये तो उसको कहते हैं प्रजापिता। और ये तो अंधियारे में पड़े हैं। कौन? ये दादा लेखराज ब्रह्मा और उनके जितने भी फालोअर्स हैं ब्रह्माकुमार-कुमारी अपन को कहते हैं, प्रजापिता शब्द नहीं लगाते अपने नाम से पहले। बाप का नाम ही नहीं बताते। भूल गए। क्यों? क्योंकि बाप का नाम बताएंगे तो ओम मंडली का वो पीयू याद आ जाएगा। इसलिए वो प्रजापिता का नाम ही उड़ाय दिया। अपने नाम से पहले प्रजापिता का नाम उड़ाय दिया या रखा हुआ है? सिर्फ ब्रह्माकुमारी, ब्रह्माकुमार कहते हैं या प्रजापिता ब्रह्माकुमार कहते हैं? हँ? अरे, अपने सेंटरों का, आश्रमों का नाम भले रखा प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी लेकिन अपन को ये नहीं कहते हैं। क्या? हँ? क्या? प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी। ना। पीबीके नहीं कहेंगे। सिर्फ कहेंगे बीके। माने अम्मा की औलाद हैं। अब बताओ, दुनिया में कोई ये कहे कि हम अम्मा की औलाद हैं, 20 बार पूछो तो 20 बार बताएगा, अम्मा का नाम बताएगा, अम्मा की औलाद, अम्मा की औलाद। तो लोग क्या समझेंगे? अरे, इसकी अम्मा का कुछ गडबड रहा होगा। नहीं? गडबड रहा होगा। हँ? तो वो अपने बच्चे को जो असली बाप है जिसके साथ गडबड किया या व्यभिचार किया, उसका नाम नहीं बताया। बस कहते तुम हमारे ही बच्चे हो। अम्मा के बच्चे हो। तो बस वो अम्माकुमारी, अम्माकुमारी, ब्रह्माकुमारी-ब्रह्माकुमारी चिल्लाने लगे। हाँ। तो उनका बाप भी अंधियारे में और वो उसके फालो करने वाले ब्रह्माकुमार-कुमारी भी क्या? अंधियारे में कि उजियारे में? अंधियारे में पड़े हैं। तो ये पुकारते रहते हैं।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fourth page on Monday was – The glory that is sung on the path of Bhakti now is a praise of human beings by the human beings. It is not as if any deities or God-Goddess are sitting here. Or that God is playing His part in practical. Look, there will be a difference between the glory of the human beings and the glory of the deities or the glory of God, will it not be there? Will the difference in practical behaviour be visible or not? Yes, look, they are worshipworthy and those who praise are worshippers. So, then they praise. Yes, it is certain that those who praise the deities are worshipworthy in the Golden Age and the Silver Age. They start praising [the deities] in the Copper Age and the Iron Age.

So, look, then there are worshippers in the Copper Age and the Iron Age. They are never worshipworthy in the Copper Age and the Iron Age. So, whom do they praise? Arey, human beings sit and praise the human beings, don’t they? You understood daughter, didn’t you? Here, now people call everyone worshipworthy. For example, yes, there are Muslims; they prefix ‘Shri’ to their names as well. Shri means righteous deities. Shri-Shri Farkhuddin Ali Ahmad. Wow brother! But the true worshipworthy person is the one who doesn’t worship at all; such worshipworthy ones exist only in the Golden Age. They cannot exist in the dualist Copper Age, Iron Age where there are two kingdoms, two religions, two languages, two clans, two opinions. Everyone clashes with each other; Fights, quarrels, killings. So, those who indulge in the violence of killings, are those violent persons deities? Arey, they go and make idols in the temples and worship them, don’t they? That is not a worship of the worshipworthy ones. That is of stone; what? It is the worship of a stone. Muslims say – Arey, these are kaafirs, idol-worshippers. Yes, they keep on worshipping idols. Hm?

So, look, there are worshippers here in this Iron Age world. So, the stone-idols which they worship were living at one point of time. And they become worshipworthy. Where do they become? They become worshipworthy in this Purushottam Sangamyug when the Father comes and purush, i.e. soul; which soul? Human souls; the best soul among the human souls, among the purush, the one who is best of all; He gets the revelation of that one announced. In which year? Father of the human world, i.e. seed. Who? Call him Aadam, call him Arjun, hm, call him Purushottam, call him Aadi Narayan, it is one and the same. So, He causes his announcement that 76 is the year of revelation of the Father, of the Father of the human world. So, when human beings sing praises, they first sing his praises. Whose? Hm?
(Someone said something.) Yes, the one who gets the first and foremost revelation-like birth on this world stage in front of the entire human world numberwise. Hm? He is praised. Who? God (Bhagwaan).

What is meant by Bhagwaan? Bhagwaan means bhaagyawaan (fortunate). Hm? Why fortunate? It is because when I come, then the body whose support I take; who? Who am I? When Shiv, the Supreme Soul, the Heavenly God Father comes, then the permanent Chariot whose support He takes, yes, I make that permanent Chariot itself equal to Me. What is meant by ‘equal to Me’? Arey, is there any soul which plays the part of the highest on high God on this world stage or not? Who is it? Hm? Yes
(Someone said something.) Look. Soul. Soul of the permanent Chariot? Is it not Shiv? (Someone said something.) Yes, Shiv; You shouldn’t say Shiv. Sadaa (forever) Shiv. If you say Shiv, then the one whom He makes equal to Himself, also becomes benevolent for the entire world, doesn’t he? So, not just Shiv. Sadaa (forever) Shiv. It is because the one whom He makes equal to Himself is only a duplicate, isn’t he? What? Or is he original? Yes, he is duplicate. So, however long the duplicate copy may last, will it be called completely continuously forever Shiv? Yes.

So, it was told – Those people who sing praises, worship, they worship them. Whom? Them (unki). Them. Why was it said ‘them’? Why it was not said ‘him’? It is because there are two souls in it. The permanent Chariot holder, the seed-form Father of the human world, Aadam, Adam, Arjun is there, isn’t he? There are two souls in him, in that body like Chariot. One is the soul of Arjun himself and the other? The other is the Supreme Soul, the Heavenly God Father. So, it was said ‘them’ (unka). It was not said ‘him’ (uska). So, they .worship them, the God. Aapey hi poojya (You yourself are worshipworthy). Then they say – Aapey hi pujaari (You yourself are a worshipper). Arey, do I become worshipworthy and worshipper? Does the Supreme Soul, the Heavenly God Father become worshipworthy and then a worshipper? No. The one in whom He enters, He makes him worshipworthy. And when he himself suffers downfall birth by birth, while enjoying pleasures in the Golden Age, in the Silver Age, then he becomes a worshipper. He cannot be called worshipworthy. Hm? So, it is about him that he himself becomes worshipworthy and he himself becomes a worshipper. People don’t say that you yourself make us worshipworthy. Hm? Then the one who makes you worshipworthy, he himself becomes a worshipper. They don’t say that you yourself make us worshipworthy, do they? Yes. They don’t say so. They say that you yourself, i.e. they address God. Hm? You yourself are worshipworthy and You yourself become a worshipper. Arey, how can He be called ‘You yourself are worshipworthy and you yourself become a worshipper? Why do they say ‘You yourself are worshipworthy and you yourself become a worshipper’? Hm? You children become numberwise worshipworthy. And then you yourself become a worshipper to enact a drama. What? Yes. You yourself become worshipworthy and a worshipper, don’t you? So, that is like this. Did you understand?

So, this will be called complete darkness, will it not be? What? That they say about God Himself. Hm? The highest on high God who comes to this world and play the highest on high part; no soul other than the Supreme Soul can play a part higher than that. They think for Him that He Himself is worshipworthy and He Himself is a worshipper. Arey, there is complete darkness. Only then do the people in complete darkness say that O Sun of Knowledge, come and cause our Sun of Knowledge to rise. Hm? Our Sun of Knowledge. Mine or our? What is the difference? Mine means belonging to one. Hm? Our means belonging to all of us, belonging to 500-700 crores. So, the one who belongs to all of us; there are 500-700 crores, aren’t there? Even among them, those who belong to the ancient deity religion and are the residents of India, they alone call. Yes. It is because they alone know that He is corporeal also and becomes incorporeal as well. So, they say – Cause our Sun of Knowledge to rise. Well, who is ‘our’ for them? Can we say it is the Supreme Soul, the Heavenly God Father, who is forever incorporeal, forever point of light? Hm? What is His true form? Forever? Forever point of light. Although He enters in a body in a permanent or a temporary Chariot, yet in what kind of a stage does He remain? He remains in a point form stage, incorporeal stage. So, does He come and cause their Sun to rise? Hm? Does He cause it to rise or not? Arey, He Himself causes their Sun to rise. This is why it has been written in the Gita that when I come I give the knowledge to the Sun. What? The name has also been coined in the Gita as Vivasvat. I give knowledge to the Sun. So, the Sun to whom I give knowledge, they say for that Sun that cause our Sun to rise. It means that the soul that causes it to rise is different and the soul that rises is different. And the separate soul that rises is our Sun of Knowledge. What? What is meant by ‘our’? He is the Sun of Knowledge of us residents of India. Cause it to rise because we are lying in complete darkness. What? The foreigner souls are not lying in that much complete darkness. They are not in that much blind faith. But we? We are in complete blind faith. We have become completely blind.

So, these keep on calling. Who? These. In which direction was a gesture made? These keep on calling. In which direction was a gesture made by uttering ‘these’? Yes, a gesture was made towards Dada Lekhraj Brahma. Hm? What is the part of this one? Hm? What is his partin the end of the Iron Age? Blind Dhritrashtra. What? What kind of a name does he get? Blind Dhritrashtra. What kind of rashtra (country)? The one who takes the wealth and property of the entire nation in his hands. When did he take it? When did he take it? Did he take it in 1947 in his hands or not? What did he take? Arey? All the Gangeses of knowledge, who inculcate the Godly knowledge and spread it in the world, those who lead a life of purity, those who lead a pure life, only those pure souls can spread the Godly knowledge. Hm? God (Ishwar), whom we call Ishwar, the highest on high God is ever pure, isn’t He? So, who can spread the knowledge of the Ever Pure? Hm? Can anyone spread? Only the one who is ever pure can spread.

So, these virgins and mothers, who are called the Gangeses of knowledge, yes, so, these Gangeses of knowledge, these Gangeses of knowledge will be called the true wealth and property. What? Yes, only the one who inculcates knowledge is the wealthy person, isn’t he? So, he takes them under his control. Who? Hm? Dada Lekhraj Brahma. In 1947 he takes under his control those Brahmakumars and Kumaris, yes, the Brahmakumar-kumaris who had emerged in Om Mandali, yes, in Sindh, Hyderabad for whom it is praised in the scriptures that Gopis (female friends of Krishna) were made to run away. So, it was published in the newspapers that there is a jeweler of Calcutta who says that he has found 300-400 [ladies] and he wants 16000 more. He says so. So, whose topic was it? This part which was played in Om Mandali, was it played by the soul of Dada Lekhraj Brahma or was it played by Prajapita? Hm? The seed of the human world, Prajapita, the Father of the entire human world, the 500-700 crore subjects who exist in this human world. Arey, is the Father (pitaa) first or is the husband (pati) first? Who is first? Write, will you not? Write either ‘pi’ or ‘pa’.
(Someone wrote something in reply.) Yes, the Father is first because it has been written in the scriptures – ‘Prajapati’ (husband/Lord of the subjects). Arey, that is the name of the perfect stage. Hm? Call him the husband (pati) of 500-700 crores or call him the husband of the world (vishwapati). So, people will call him pati (husband), Prajapati only when he obtains the emperorship of the world. Or will they start calling him before that? Hm? First he will make purusharth of rajyog, will he not? Only then will he obtain the emperorship of the world, will he not?

So, everything has been mixed-up in the scriptures. The Father comes and tells the truth that I do not come in Prajapati. He will become that later after making purusharth. Hm? I come in Prajapita. It means that the soul, the human soul of the first Father of this human world, yes, he is called Prajapita. And these are in darkness. Who? This Dada Lekhraj Brahma and all his followers, who call themselves Brahmakumar-kumaris and do not prefix the word ‘Prajapita’ to their name. They do not reveal the name of the Father at all. They have forgotten. Why? It is because if they reveal the name of the Father, then they will recollect that Piu of Om Mandali. This is why they have made the name of Prajapita itself to vanish. Have they made the name of Prajapita to vanish as prefix from their name or have they retained it? Do they call themselves just Brahmakumari, Brahmakumar or do they call themselves Prajapita Brahmakumars? Hm? Arey, although they have named their centers, ashrams as Prajapita Brahmakumar-kumari, yet they do not call themselves so. What? Hm? What? Prajapita Brahmakumar-kumaris. No. They will not say PBKs. They say just BKs. It means that they are the children of the mother. Well, tell, if anyone tells in the world that we are children of the mother, if you ask them 20 times, he will tell 20 times, he will reveal the name of the mother, a child of the mother, a child of the mother. So, what would people think? Arey, there must be something wrong with his mother. No? There must be something wrong. Hm? So, she has not revealed to her child the name of the true Father with whom she has done something wrong, indulged in adultery. She just says that you are only my child. You are a mother’s child. So, that is it; they started shouting Ammakumari (daughter of the mother), Ammakumari, Brahmakumari-Brahmakumari. Yes. So, their Father is also in darkness and even the Brahmakumars and Kumaris who follow him? Are they in darkness or light? They are in darkness. So, they keep on calling.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2852, दिनांक 16.04.2019
VCD 2852, dated 16.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning Class dated 20.11.1967
VCD-2852-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.45
Time- 00.01-17.45


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को पांचवें पेज की आदि में बात चल रही थी – जो सन्यासी होते हैं ना वो तो झूठ-मूठ जाकरके राजयोग सिखाते हैं विदेशों में, विलायत में। विलायत माने? अमेरिका हो, यूरोप हो, अफ्रीका हो ये झूठा राजयोग सिखाते हैं। तो तुम लोग को ये अखबार में डालना होता है। क्या? कि मनुष्य कभी भी, जिनका मन चलायमान होता है, मन चंचल होता है, स्थिर नहीं हो पाता है वो कभी भी किसी को राजयोग नहीं सिखाय सकते। क्योंकि मनुष्यों में तो सब मनुष्य आ गए 500-700 करोड़ इस दुनिया के जो भी मनुष्य हों। एकदम सब आ गए। क्योंकि वो तो है ऊँचे ते ऊँचा भगवंत। कौन? जिसका बुद्धिमानों की बुद्धि है उसको मन? मन नहीं है। ज्ञानेन्द्रियां हैं? ज्ञानेन्द्रियां भी नहीं। कर्मेन्द्रियां? कर्मेन्द्रियां भी नहीं। वो तो बुद्धिमानों की बुद्धि है।

तो वो तो उसको कहा ही जाता है भगवान। हँ? उसको। इसको क्यों नहीं कहा? उसको कहके दूर क्यों कर दिया? क्यों कर दिया? क्योंकि भविष्य में प्रत्यक्ष होने वाला है वो भगवान भगवान के रूप में। संसार जानेगा कि सारी दुनिया में वो भाग्यवान सबसे जास्ती कौन है इस मनुष्य सृष्टि पर। उनको शरीर तो होता ही नहीं है ना बच्चे। भाग्यवान को शरीर नहीं होता? हँ? शरीर होता है लेकिन आत्मा को शरीर का भान नहीं होता है। ब्रह्मा को भी देवता कहते हैं। भगवान तो नहीं कहते। हँ? विष्णु को भी देवता कहते हैं। विष्णु भी कोई भगवान तो नहीं है ना। विष्णु तो दो मिलकरके स्वभाव-संस्कार से दो आत्माएं एक हो जाती हैं तो उनको विष्णु कहा जाता है। शंकर को भी देवता कहते हैं। भगवान तो नहीं कहते। शंकर भगवान, ऐसे कहते हैं कोई? नहीं। कोई भी नहीं। क्यों? क्योंकि वो भी तो याद में बैठा है ना। हँ? और जो याद में बैठा है वो तो पुरुषार्थी हुआ ना। तो जो पुरुषार्थ करते हैं आत्मा के उत्थान के लिए उनको देवता ही कहा जाता है। हाँ। भगवान तो नहीं कहते हैं ना। क्योंकि शंकर की भी मूर्ति दिखाई जाती है। विष्णु की भी मूर्ति दिखाते हैं। ब्रह्मा की भी मूर्ति, चित्र बनाते हैं। तो जिनके चित्र हैं उनको फिर विचित्र तो नहीं कहेंगे। हँ? चित्र के विपरीत। उसका चित्र खींचा ही नहीं जा सकता। जैसे शरीर से आत्मा निकल जाती है। निकल जाती है ना। तो उसका कोई फोटो खींच पाएगा? खींचेगा? हँ? नहीं खींचेगा।

तो मनुष्य जभी उनको भगवान नहीं कहा जाता तो मनुष्यों को भगवान कहना, कहना, सो भी फिर आजकल के तमोप्रधान मनुष्यों को भगवान कैसे कहा जाए? हँ? क्योंकि भगवान तो सदा क्या है? सदा सत है कि सतोप्रधान है? क्या है? हँ? सदा सत है। प्रधान होने की बात ही नहीं। प्रधान का मतलब है कि सत्वगुण प्रधान है तो दूसरे गुण गौण हैं। लेकिन उसमें रजो और तमो का नाम निशान नहीं। तो प्रधान होने की बात ही नहीं। तो मनुष्य को भगवान कैसे कह सकते हैं? बताओ। कैसे कहा जाए मनुष्य को भगवान? हाँ, टाइटल मिलता है भगवान-भगवती का। तो भगवान तो एक होता है या दो होते हैं? एक होता है।

तो बाप बैठकरके समझाते हैं। हँ? कौनसा बाप? वो दुनिया के वो बाप नहीं जो जन्म-जन्मान्तर बाप बनते हैं। वो धरमपिताएं भी बाप नहीं। वो भी तो पिताएं हैं ना। वो भी नहीं बैठकरके समझाते हैं। यहाँ तो समझाने वाला वो है जो कभी भी शरीर में आकृष्ट होता ही नहीं। आसक्ति उसमें शरीर की कभी होती ही नहीं। कौन? उनका नाम कुछ है? उनका नाम है शिव। शिव माने? कल्याणकारी। काम के आधार पर नाम। तो क्या सदा कल्याणकारी? हाँ, सदा कल्याणकारी। हाँ, ये जरूर है कि वो इस सृष्टि पर आते हैं तो जिस मनुष्य शरीर रूपी रथ में प्रवेश करके मुकर्रर रूप से पार्ट बजाते हैं तो उसे आप समान बनाते हैं। तो आप समान बनाने का मतलब ये नहीं है कि उसे सदा शिव बनाय देते हैं। शिव नाम है तो कल्याणकारी बनाय देते हैं। कैसा कल्याणकारी? दुनिया में जितना कोई भी मनुष्यमात्र कल्याणकारी नहीं हो सकता है, हँ, सबसे जास्ती इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर भोगी आत्माओं के बीच कल्याणकारी। बाकि ऐसे नहीं कि सदा कल्याणकारी। क्या? सदा कल्याणकारी तो सिर्फ वो एक ही बाप है जो बापों का बाप है जिसका कोई? कोई बाप नहीं।

तो वो बाप बैठकरके समझाते हैं कि ये जो हठयोगी हैं, हँ, वो अपने को हठपूर्वक भगवान शिवोहम्। हँ? हाँ। जानते भी हैं कि वो शिव निराकार है, हँ, विदेही है, फिर भी अपन को भगवान कहते हैं। अरे, भगवान अपन को कैसे कहते हो? शिवोहम् कह देते हो। फिर कह देते हो ब्रह्मा अस्मि। अरे, शिव निराकार है, तो ज़रूर ब्रह्मा के मुख से ही आके बोलेंगे, वाणी चलाएंगे। हँ? जिसको कहते हैं वेद। विद; विद माने ज्ञान। ज्ञान माने सच्चाई। कि झूठ का ज्ञान? सच्चाई का ज्ञान। तो वो सत्य ज्ञान तो वो ही आत्मा सुनाय सकती है निराकारी आत्मा। आत्माएं तो निराकार ही होती हैं ना। तो वो ही निराकारी आत्मा सुनाय सकती है जो जन्म-मरण के चक्र में कभी फंसती ही नहीं है। क्योंकि जो भी जन्म-मरण के चक्र में जो आत्माएं आती हैं वो तो, हँ, सब भूल जाती हैं पिछले जन्म का। कोई ऐसी आत्मा है मनुष्य सृष्टि में जो पिछले जनम की सब बातें बताए? कोई नहीं बताय सकती। थोड़ी बहुत बात बताएंगे भी, सारी बात तो नहीं बताय सकते। तो वो भगवान तो त्रिकालदर्शी है। तीनों काल का ज्ञाता है।

तो इन सन्यासियों को कोई पता थोड़ेही पड़ता है। पता ही नहीं पड़ता है कि हम तमोप्रधान बन गए हैं। इसलिए हम अपन को ही भगवान कहते हैं। हँ? वो हैं कौन? उनको क्या कहेंगे? शिवाचार्य कहेंगे कि शंकराचार्य कहेंगे? क्या कहेंगे? हँ? बताओ। अरे, एक पक्का नाम बताओ उनका। क्या कहेंगे? अरे? लिखते-लिखते छोड़ दिया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, उनको कहेंगे शिवाचार्य। हँ? भल जो ऊँच ते ऊँच पुरुषार्थी है देव आत्माओं के बीच में जो महादेव के रूप में शंकर गाया जाता है, मूर्ति बनाई जाती है, वो मूर्ति में ही प्रवेश करते हैं। और मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं। क्योंकि वो एक ही है जिसको त्रिनेत्री कहा जाता है। पुरुषों में कोई है जिसको त्रिनेत्री कहा जाए? हँ? हाँ, स्त्री चोलाधारियों में तो है त्रिनेत्री महाकाली। तीसरा नेत्र दिखाते हैं। लेकिन पुरुषों में तो एक ही शंकर है जिसको तीसरा नेत्र दिखाते हैं। तो वो तीसरा नेत्र कौनसा नेत्र है? हँ? शिव नेत्र कहा जाता है। ऐसे कभी कहा जाता है शंकर नेत्र? शंकर नेत्र नहीं कहा जाता। शिव नेत्र माना उसमें कौन प्रवेश करता है? शिव प्रवेश करता है। तो वो शिव जो प्रवेश करता है, तो प्रवेश करने से जिसमें प्रवेश किया उसको कोई भगवान कहेंगे? हँ? और अगर भगवान कहेंगे भी क्योंकि टाइटल मिल जाता है भगवान-भगवती का तो सदाकाल के लिए भगवान या कोई काल ऐसा भी आता है जिसमें भगवान तो क्या बड़े ते बड़ा क्या? शैतान बन जाता है। बनता है कि नहीं? बनता है। शैतानों का बाप है कोई दुनिया में कि नहीं? हँ? बाबा बोलते हैं ना, मुरली में बोलते हैं – बच्चे, तुम्हारा बाप आया हुआ है। तो क्या अच्छे बच्चों का ही बाप आया हुआ है? हँ? जो बुरे ते बुरे बच्चे हैं, दुष्ट से दुष्ट हैं उनका बाप नहीं आया? सबका बाप आया हुआ है।

तो बताया कि जो तमोप्रधान बन जाते हैं वो अपन को भगवान कहते हैं। शिवोहम्। ब्रह्मा अस्मि। ऐसे कहते हैं। तमोप्रधान बन गए हैं। कहेंगे तुच्छ बुद्धि। क्योंकि बाप समझाते हैं कि भक्ति, हँ, सो आहिस्ते-आहिस्ते तुच्छ बुद्धि को ले आती है। क्या? भक्ति क्या करती है? धीरे-धीरे तुच्छ बुद्धि बनाय देती है। कैसे? भगाती रहती है। भक्ति क्या करती है? भक्ति खुद भी भागती है और जो उसकी बात सुनते हैं, ध्यान देते हैं तो उनको भी, उनको भी भगाती है। टिकने नहीं देती है एक स्थान पर। तो सीढ़ी उतरते ही रहते हैं ना भक्ति में। हँ? जो भक्त होते हैं वो बुद्धि को प्रिफरेंस देते हैं या भावना को प्रिफरेंस देते हैं? भावना दिल से निकलती है। हँ? बुद्धि तो कहाँ से आती है? बुद्धिमानों की बुद्धि एक ही है। वो एक से ही बुद्धि आती है। क्योंकि बुद्धि का विषय है ज्ञान। हँ? तो जो ज्ञान है वो अनेकों से आता है कि एक से आता है? हँ? किससे आता है? एक से आता है ज्ञान। और बाकि भक्ति तो अनेकों की तरफ भगाती रहती है तो उससे आता है अज्ञान। भक्ति है माना भक्ति दुर्गति है। क्या?

बताओ, वो अव्वल नंबर आत्मा कौनसी है जो अव्वल नंबर भक्त? कुछ पता है? हँ? अव्वल नंबर भक्त आत्मा? हँ? अरे? पता ही नहीं?
(किसी ने कुछ कहा।) जगदम्बा अव्वल नंबर भक्त है? हँ? कि उस जगदम्बा का भी आधार लेने के लिए, हँ, ब्रह्मा को जाना पड़ता है? किस ब्रह्मा को? जो चौमुखी ब्रह्मा गाया हुआ है। हँ? चन्द्रमा के रूप में जगदम्बा जब महाकाली बनती है, तामसी बनती है तो मस्तक पर चन्द्रमा दिखाते हैं अधूरा। तो वो कौनसी आत्मा की यादगार है? हँ? हाँ, वो ही चौमुखी ब्रह्मा की यादगार है दादा लेखराज की। वो ही आत्मा प्रवेश करती है। है ना? तो बताओ, जो अव्वल नंबर भक्त आत्मा है वो इस संसार में कौन है? जो, हाँ, हाँ, जो, हाँ, पहले ही जनम से दुर्गति में जाने का टंटा शुरू कर देती है। दुर्गति कहेंगे नहीं क्योंकि पता नहीं चलती है सतयुग, त्रेता में दुर्गति। लेकिन बहुत धीमी गति से होती है। बाकि दृष्टि से, वृत्ति से गिरना शुरू होता है या नहीं होता है? होता है। तो वो पहली आत्मा कौन? हँ? हाँ, पहली आत्मा कहेंगे जिसको अंतिम जनम में साक्षात्कार होता है बंद आँखों का, भक्ति का। भक्तिमार्गीय साक्षात्कार होते हैं। उनको बुद्धि का साक्षात्कार कहेंगे? भक्ति का साक्षात्कार। तो भक्ति के साक्षात्कार के आधार पर ही वो पक्का फैसला कर लेती है कि मेरा यही पार्ट है। चारों युगों में मेरा ही ऊँच ते ऊँच ये पार्ट है कृष्ण का पार्ट, 16 कला संपूर्ण। वो फर्स्टक्लास भगत हुआ ना। हाँ।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the fifth page on Monday was – The Sanyasis go and teach false rajyog in the foreign countries, abroad (vilayat). What is meant by vilaayat? Be it America, be it Europe, be it Africa; they teach this false rajyog. So, you people have to publish this in the newspapers. What? That human beings, whose mind is inconstant, whose mind is fluctuating, is unable to become constant can never teach anyone rajyog. It is because all the 500-700 crore human beings are included among the human beings, all the human beings of this world. Everyone is included completely. It is because He is the highest on high God. Who? The one who is the highest among all intellectuals; does He have a mind? He doesn’t have a mind. Does He have sense organs? He doesn’t have the sense organs as well. The organs of action? Not even the organs of action. He is the highest among the intellectuals (buddhimaanon ki buddhi).

So, that one (usko) is called God (Bhagwan). Hm? That one. Why wasn’t it said ‘this one’ (isko)? Why was He made distant by uttering ‘that one’? Why was He made distant? It is because that God is going to be revealed in the form of God in future. The world will know who that most fortunate one in the entire world in this human world is. He doesn’t at all have a body child, does He? Doesn’t the fortunate one have a body? Hm? He does have a body, but the soul doesn’t have the consciousness of the body. Brahma is also called a deity. He is not called God. Hm? Vishnu too is called a deity. Vishnu too isn’t God, is he? When two persons, when two souls become one in nature and sanskars, then they are called Vishnu. Shankar is also called a deity. He is not called God. Does anyone say ‘Shankar Bhagwaan’? No. Nobody. Why? It is because he too is sitting in remembrance, isn’t he? Hm? And the one who is sitting in remembrance is purusharthi, isn’t he? So, those who make purusharth (efforts) for the upliftment of the soul are called deities. Yes. He is not called God, is he? It is because Shankar’s idol is also depicted. Vishnu’s idol is also depicted. Idols and pictures of Brahma are also prepared. So, those who have a picture (chitra) will not be called pictureless (vichitra). Hm? Opposite of chitra. His chitra (photo) cannot be clicked at all. For example, a soul goes out of the body. It goes out, doesn’t it? So, can anyone click its photo? Will anyone click? Hm? Nobody can click.

So, when human beings are not called God, then calling human beings as God; that too how can today’s degraded (tamopradhan) human beings be called God? Hm? It is because what is God forever? Is He forever Sat (pure) or is He satopradhan (the one in whom there is a dominance of purity)? What is He? Hm? He is forever Sat. There is no question of there being any dominance (pradhaan). Pradhaan means that when the Satwagun is dominant, then other attributes are secondary (gaun). But there is no trace of rajo and tamo in it. So, there is no question of being ‘pradhaan’ (dominant) at all. So, how can we call human beings as God? Speak up. How can human beings be called God? Yes, they get the title of Bhagwaan-Bhagwati (God-Goddess). So, is God one or two? He is one.

So, the Father sits and explains. Hm? Which Father? Not those fathers of the world who become fathers birth by birth. Not even those fathers who are fathers of their religions. They too are fathers, aren’t they? They too don’t sit and explain. Here the one who explains is He who never gets attracted to the body at all. He never gets attached to the body at all. Who? Does He have any name? His name is Shiv. What is meant by Shiv? Benevolent. The name is based on the task performed. So, forever benevolent in what? Yes, forever benevolent. Yes, it is sure that when He comes to this world, then the human body like Chariot in which He enters and plays a part in a permanent manner, He makes him equal to Himself. So, making him equal to Himself doesn’t mean that He makes him forever benevolent (Sadaa Shiv). When the name is Shiv, He makes him benevolent. What kind of benevolent? No human being can be as benevolent as him in the world; hm, most benevolent among the bhogi (pleasure-seeking) souls on this human world stage. But it is not as if he is forever benevolent. What? Only one Father, who is the Father of fathers, is forever benevolent. The one who doesn’t have any Father.

So, that Father sits and explains that these hathyogis call themselves God ‘Shivohum’ (I am God) obstinately. Hm? Yes. They even know that that Shiv is incorporeal, bodiless (videhi), yet they call themselves God. Arey, how do you call yourself God? You call yourself ‘Shivohum’. Then you say ‘Brahma Asmi’ (I am Brahma). Arey, when Shiv is incorporeal, then definitely He will speak through the mouth of Brahma only and narrate Vani (speech). Hm? That is called Ved. Vid; Vid means knowledge. Knowledge means truth. Or the knowledge of lies? The knowledge of truth. So, only that soul, the incorporeal soul can narrate that true knowledge. The souls are incorporeal only, aren’t they? So, only that incorporeal soul, which does not get entangled in the cycle of birth and death at all, can narrate. It is because all the souls which pass through the cycle of birth and death forget everything about the past birth. Is there any soul in the human world which can narrate all the topics of the past birth? Nobody can narrate. They may narrate some topics, but they cannot narrate all the topics. So, that God is Trikaaldarshi (knowledgeable about the past, present and future). He is knowledgeable about all the three aspects of time (kaal).

So, these Sanyasis do not get to know. They do not realize at all that we have become degraded (tamopradhan). This is why we call ourselves God. Hm? What are they? What will they be called? Will they be called Shivacharya or Shankaracharya? What will they be called? Hm? Speak up. Arey, tell their one firm name. What will they be called? Arey? You stopped while writing something. Hm?
(Someone said something.) Yes, they will be called Shivacharya. Hm? Although the highest on high purusharthi, who is sung as Shankar, the highest deity (Mahadev) among the deity souls, his idol is prepared, He enters in that personality only. And He enters in a permanent manner. It is because He is the only one who is called Trinetri (three-eyed one). Is there anyone among the men who is called Trinetri? Hm? Yes, among the female bodied persons Mahakali is Trinetri. She is depicted to have a third eye. But among the men it is Shankar alone who is depicted to have the third eye. So, which eye is that third eye? Hm? It is called Shiv netra (Shiva’s eye). Is it ever called Shankar netra? It is not called Shankar’s eye. Shiv netra means who enters in him? Shiv enters. So, that Shiv who enters, by entering in him, will the one in whom He entered be called God? Hm? And even if he is called God because he gets the title of Bhagwaan-Bhagwati (God-Goddess), so is he God forever or does one such time also come when instead of God what does he become in the biggest way? He becomes a Satan (shaitaan). Does he become or not? He becomes. Is there any Father of Satans in the world or not? Hm? Baba says, doesn’t He? He says in the Murli – Children your Father has come. So, has only the Father of the good children come? Hm? Hasn’t the Father of the most evil children, most wicked ones come? Everyone’s Father has come.

So, it was told that those who become tamopradhan call themselves God. Shivohum (I am Shiva). Brahma asmi (I am Brahma). They say so. They have become tamopradhan. They will be said to have a lowly intellect. It is because the Father explains that Bhakti causes the intellect to gradually become lowly (tuchch). What? What does Bhakti do? It gradually makes the intellect lowly. How? It keeps on making it run. What does Bhakti do? Bhakti itself also runs and those who listen to her, pay attention to her, she makes them also run. She doesn’t allow them to remain constant at one place. So, they keep on descending the Ladder in Bhakti, don’t they? Hm? Do those who are devotees give preference to intellect or give preference to the emotions? Emotions emerge from the heart. Hm? Where does the intellect emerge from? The intellect of the intellectuals (buddhimaanon ki buddhi) is only one. That intellect comes only from one. It is because the subject of intellect is knowledge. Hm? So, does the knowledge come from many or from one? Hm? From whom does it emerge? Knowledge comes from one. And as regards Bhakti, it keeps on making you run towards many; so, from it emerges ignorance. If there is Bhakti, then Bhakti means durgati (degradation). What?

Tell, which is that number one soul who is the number one devotee (bhakt)? Do you know anything? Hm? Number one bhakt soul? Hm? Arey? Don’t you know at all?
(Someone said something.) Is Jagdamba the number one bhakt? Hm? Or does Brahma have to go to take the support of even that Jagdamba? Which Brahma? The one who is praised as the four-headed Brahma. Hm? When Jagdamba in the form of a Moon becomes Mahakali, become impure (taamsi), then the incomplete Moon is shown on the forehead. So, it is a memorial of which soul? Hm? Yes, it is the memorial of the same four-headed Brahma, Dada Lekhraj. The same soul enters [in her]. Is it not? So, tell, who is the number one bhakt soul in this world? The one who, yes, yes, the one who, yes, starts the system of going into degradation from the first birth itself. It will not be called degradation because one does not know about degradation in the Golden Age and the Silver Age. But it happens very slowly. But does downfall start through vision, through vibrations or not? It starts. So, who is that first soul? Hm? Yes, the first soul will be said to be the one who has visions of Bhakti through closed eyes in the last birth. He has visions of the path of Bhakti. Will they be called the visions of intellect? Vision of Bhakti. So, it decides firmly on the basis of the vision of Bhakti that this is my part. I alone play the highest on high part in all the four Ages, the part of Krishna perfect in 16 celestial degrees. He is the first class Bhagat (devotee), isn’t he? Yes.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2853, दिनांक 17.04.2019
VCD 2853, dated 17.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning Class dated 20.11.1967
VCD-2853-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.47
Time- 00.01-19.47


प्रातः क्लास चल रहा था – 20.11.1967. सोमवार को छठे पेज के आदि में बात चल रही थी – कृष्ण के लिए कहते हैं श्यामसुंदर। श्याम माने काला, सुंदर माने गोरा। राधे के लिए क्यों नहीं कहते हैं? प्रश्न तो उठता है ना। गीत भी बनाय दिया है। राधा क्यों गोरी, कृष्ण क्यों काला? वो भी प्रश्न पूछते हैं गीत बनाने वाले। जवाब कोई नहीं देता है। हँ? बड़े-बड़े विद्वान, पंडित, आचार्यों से पूछा। कोई जवाब नहीं देता है। हाँ, इतना तो कहते हैं कि एक पार्वती का पार्ट है जो कहती है वरहुं शंभु न तु रहहूं कुंवारी। जनम-जनम लगी रगरि हमारी। कोई एक जनम की बात नहीं है। जनम-जनम के लिए ये विरुद है कि एक का संग करूंगी। तो वो आत्मा गोरी ही तो कही जाएगी ना। कि काली कही जाएगी? हाँ। सिक्ख लोग भी तो कहते हैं एक नारी सदा ब्रह्मचारी। तो अब सवाल ये है क्या पार्वती और राधा एक ही हैं? नहीं? अलग-अलग हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जो पार्वती की आत्मा है पार लगाने वाली वो ही राधा की आत्मा है। शास्त्रकारों ने गल्ती इतनी की है कि भगवान के नाम पर कृष्ण का नाम डाल दिया 16 कला संपूर्ण कृष्ण का। अब कृष्ण तो मंदिरों में बच्चे के रूप में पूजा जाता है। और गीता ज्ञान दाता के रूप में बड़े रूप में दिखाया है अर्जुन के रथ में बैठा।

तो ये भी बात कोई को समझ में नहीं आती। हँ? वास्तविकता क्या है? वास्तविकता ये है कि न द्वापर के अंत में कृष्ण भगवान आया और न कोई शंकर-पार्वती पहाड़ पर आया। ये तो संगमयुगी कृष्ण की बात है पुरुषोत्तम संगमयुग की बात है कि जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सब आत्माएं तमोप्रधान हो जाती हैं कलियुग में चतुर्युगी में सुख भोगते-भोगते तमोप्रधान बनेंगी ना। तो अंतिम जनम में जो इस मनुष्य सृष्टि का बीजरूप बाप है, जिसे कहते भी हैं शास्त्रों में जगतम् पितरम् वंदे। जगत के मात-पिता। तो एक तरफ जगत के मात-पिता को भगवान मानते हैं। फिर दूसरी तरफ कृष्ण बच्चे को भगवान कह देते हैं। अरे, वो पिता तो पिता ही है ना मनुष्य सृष्टि का। तो वो मनुष्य सृष्टि का पिता ये भी शास्त्रों में बताते हैं कि उसका कोई मां-बाप साकार में नहीं होता। कृष्ण के तो मां-बाप साकार में दिखाते हैं। और राम के भी मां-बाप साकार में दिखाते हैं। लेकिन वो ये नहों जानते कि जो रामचन्द्र और कृष्णचन्द्र की आत्माएं हैं वो ही महाविनाशकाल में चतुर्युगी के अंत में, कल्प के अंत में बाप और बच्चे के रूप में पार्ट बजाती हैं। मनुष्य सृष्टि का बडे ते बड़ा बाप और मनुष्य सृष्टि का बड़े ते बड़ा बाप का बच्चा।

तो जो बाप है, वो तो एवरलास्टिंग बाप है। उसका कोई साकार में बाप नहीं है। साकारी मनुष्य सृष्टि का बाप है। और कृष्ण की आत्मा बच्चा है। तो जो साकारी मनुष्य सृष्टि का बाप है उसी में जो ओरिजिनल बापों का बाप है, जिसका कोई बाप नहीं, आत्माओं का बाप है। और आत्मा कैसी? भोगी या अभोक्ता? अभोक्ता। क्योंकि वो राम और कृष्ण को तो भोगी दिखाया है। शादी करते हैं बच्चे पैदा करते हैं। हँ? तो भोगी हुए ना। तो भगवान किसे कहेंगे? भोगी को कहेंगे कि अभोक्ता को कहेंगे? हँ? भोगी तो भोग-भोग करके सुख-दुख के भोगकरके कमजोर आत्मा बनेगी ना। हँ? भगवान आकरके इस सृष्टि पर सबकी सद्गति करके जाता है। कहते भी हैं सबका सद्गति दाता। तो जब सबकी सद्गति करके जाता है तो नंबरवार सभी आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पहले जनम में आती हैं तो सद्गति का पार्ट बजाती हैं। सद्गति कहा ही जाता है शरीर से सुख भोगें; दुख? दुख न भोगें।

तो कोई आत्माएं तो पहले सीन में ही; ड्रामा के सीन होते हैं ना। तो ये भी बेहद का ड्रामा है। इसके चार सीन हैं सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। कोई आत्माएं तो सतयुग के आदि में ही उतरती हैं। उनमें जो अव्वल नंबर आत्मा है क्योंकि सतयुग को तो 16 कला संपूर्ण कहा जाता है ना। तो 16 कला संपूर्ण जो कृष्ण की आत्मा है वहाँ तक विद्वान, पंडित, आचार्यों की बुद्धि पहुंचती है। लेकिन वहाँ तक बुद्धि नहीं पहुंचती जो सतयुग से पहले भी महाविनाश हुआ था। हँ? जिसके लिए भगवान के लिए टाइटिल है कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। क्या? कलाओं से अतीत है माना सूर्य का पार्ट है। कलाओं में बंधायमान सूर्य होता है या चन्द्रमा? हँ? सूर्य बंधायमान नहीं होता है। तो इसका मतलब ये हुआ कि राम और कृष्ण की आत्माएं तो इनके पीछे, नाम के पीछे चन्द्र लगाया जाता है। कृष्ण चन्द्र, रामचन्द्र। तो ये तो देव आत्माएं हो सकती हैं। लेकिन वो आत्माओं का बाप है, बापों का बाप, जिसका कोई बाप नहीं वो तो नहीं हो सकती।

तो वो आत्माओं का बाप उनका नाम है शिव माना कल्याणकारी। और शिव नहीं सिर्फ। सदा शिव। तो साबित हो जाता है कि राम-कृष्ण की आत्माएं कोई सदा शिव नहीं हो सकतीं। तो जो सदा शिव है उसे ही भगवान कहेंगे, हँ, या जो कभी शिव है, कल्याणकारी है और कभी अकल्याणकारी है या कल्याण नहीं उतना कर पाते हैं, तो किसको कहेंगे भगवान? भगवान तो सदा ही कल्याणकारी है ना। तो वो जो मनुष्य सृष्टि है वो साकार ही मनुष्य सृष्टि है। और उस साकार मनुष्य सृष्टि में वो सदा निराकार जो आत्माओं का बाप है, जो कभी भी जनम-मरण के चक्र में नहीं आता इसलिए अभोक्ता है, जन्म, ए, जन्म-मरण के चक्र में आएगा तो देह के सुख और दुख भी भोगना पड़े। तो वो तो जन्म-मरण के चक्र में ही नहीं आता। और इसीलिए वो त्रिकालदर्शी है क्योंकि जो जन्म-मरण के चक्र में आता है वो तो पूर्व जनम की सब बातें भूल जाते हैं। और जो जन्म-मरण के चक्र में ही नहीं आता है उसे तो सब याद रहेगा ना। सिर्फ एक बार इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता है। जैसे धरमपिताएं हैं, कोई भी धरमपिताएं इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि, तो वो सौ वर्ष के अंदर अपना-अपना धर्म का स्थापना का पार्ट बजाते हैं। ऐसे ही वो परमपिता हैविनली गॉड फादर शिव इस सृष्टि पर सौ वर्ष के लिए आता है और सौ वर्ष के अंदर इस सृष्टि में रंगमंच पर डायरेक्टर के रूप में पर्दे के पीछे रहकर पार्ट बजाता है। क्या? जो हद के ड्रामा होते हैं ना तो प्रॉम्पटिंग करने वाला जो डायरेक्टर होता है वो पर्दे के पीछे प्रॉम्पट करता रहता है ना। हँ? हाँ, उसे कोई देखता है? उसे कोई नहीं देख पाता। वो तो इतना सूक्ष्म है, अचिंत्य है। हँ? चिंतन करने योग्य भी नहीं। अति सूक्ष्म आत्मा।

तो बताया कि वो सुप्रीम सोल जो असली भगवान है, हँ, वो इस सृष्टि पर आता है वो तो अपने को गुप्त रखता है। क्या? और बाकि जो भगवान बनकरके बैठ जाते हैं या जिन्हें भगवान समझ करके उनकी मूर्तियां बनाकरके पूजा की जाती है मंदिरों में। और एक नहीं, ढ़ेर सारे भगवान। ऐसे नहीं कि राम-कृष्ण ही भगवान मनुष्य रूप में। नहीं। जानवर के रूप में ढ़ेर सारे अवतार दिखाए। कहाँ गणेश अवतार, हनूमान अवतार, हँ, मछली अवतार, और कौनसा? शेर का अवतार। घोड़े का अवतार। हँ? क्या-क्या जानवरों के अवतार दिखाय दिये। फिर शास्त्रों में कहते हैं ऋते ज्ञानान् न मुक्ति। बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती। अब क्या भगवान आकरके जो ज्ञान सुनाएंगे गीता का ज्ञान वो क्या जानवरों को सुनाएंगे? हँ? जानवर ज्ञान सुनेंगे, समझेंगे? अरे? ये क्या शास्त्रों में बकवास लिख रखी है?

भगवान जो असली है निराकार वो तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो हीरो-हीरोइन का पार्ट बजाने वाली विशेष आत्माएं हैं; कौन? हीरो कौन? राम वाली आत्मा, जिसे दूसरे धर्मों में आदम, एडम कहा जाता है, आदिनाथ कहा जाता है। वो जिसे भारत में आदिपिता, जगतपिता, जगन्नाथ भी कहा जाता है। तो उसमें प्रवेश करता है मुकर्रर रूप से। और टेम्परेरी रूप से जिन ब्रह्मा नामधारियों में प्रवेश करता है वो चार मुखों वाले संगठित रूप दिखाए जाते हैं। अरे? तो चार मुखों वाले जो सगंठित रूप जो ब्रह्मा का है उनमें जो मुखिया होगा ना कोई चार में वो, हाँ, बाकि तीन को भी अपने संगठन में अच्छी तरह बांध लेता है। क्या? हाँ। तो वो चार मुख जो हैं वो इकट्ठे दिखाए जाते हैं। तो शास्त्रकारों ने या मूर्तिकारों ने वो चार मुख बनाय दिये ब्रह्मा के। पांचवां मुख जो ऊर्ध्वमुखी मुख है उसको भूल गए जो असली है। ऐसे तो शास्त्रों में लिखा हुआ भी है, कोई ने श्लोक भी बनाया – गुरुर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरूर्साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः। लेकिन गड़बड़ क्या कर दी? उन्होंने जो ब्रह्मा का लोक है उसे ब्रह्म लोक बताय दिया। ब्रह्म लोक को वो परमधाम, आत्मधाम, आत्माओं का धाम समझते हैं। अरे, ब्रह्मलोक तो ब्रह्मा का लोक हुआ ना।

तो ये जो चार ब्रह्मा हैं ना और ये जो सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, चारों युगों में पार्ट तो बजाते हैं लेकिन कोई युग में विशेष पार्ट बजाते हैं, है ना? तो जो कोई युग में विशेष पार्ट बजाते हैं, माता के रूप में। मां नाम है ना। ब्रह्म मां। माने भारत में या दुनिया में जितनी भी माताएं हैं उन माताओं के बीच में बड़े ते बड़े माता के रूप में सहनशक्ति का पार्ट बजाने वाली आत्माएं। तो सतयुग में कौन? त्रेता में कौन? द्वापर में कौन? कलियुग में कौन? हँ? सतयुग में किसे कहें? सतयुग में कहेंगे जिसने 16 कला संपन्न कृष्ण को जन्म दिया। कि जैसे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि सागर में पीपल के पत्ते पर सृष्टि के आदि में कृष्ण टपक पड़ा। अरे, पीपल के पत्ते के ऊपर इतना बड़ा सागर हिलोरें लेता हुआ ऊँची-2 लहरें मारता हुआ। उसमें पीपल का पत्ता टिकेगा? टिकेगा? अरे? क्या-क्या बातें बनाय दी हैं। वो बात नहीं है। हँ? इसका कोई रहस्य है। तो वो रहस्य आकरके वो जो असली भगवान है ज्ञान सूर्य सदा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अटैच, डिटैच होकरके पार्ट बजाता है, कभी भी किसी भी भोगी आत्मा के साथ अटैच? अटैचमेंट में नहीं आता। परन्तु मिसाल देने के लिए तो वो आसमान के सूरज, चांद, सितारे हैं। हँ? लेकिन वो तो जड़ सितारे हैं ना। उनकी मिसाल दी जाती है, जिन धरती के चैतन्य सितारों के लिए, धरती के सूर्य के लिए, हँ, धरती के चन्द्रमा के लिए, नक्षत्रों के लिए, वो तो चैतन्य आत्माएं हैं।

तो उनमें जो ज्ञान सूर्य है, उस सृष्टि रूपी रंगमंच पर बहुत तीव्र प्रकाश फेंकता है। क्या? अरे, आरंभ में हलका-हलका प्रकाश फेंकेगा। जड़ सूर्य क्या करता है? सवेरे को अमृतवेले जो सूर्य की रोशनी होती है वो धीमी-धीमी, मध्यम-मध्यम होती है कि तीखी होती है? मध्यम होती है। और ज्यों-ज्यों, हँ, टाइम बढ़ता जाता है त्यों-त्यों रोशनी तीक्षण होती जाती है। इतनी तीक्षण होती जाती है कि सहन करना ही मुश्किल। तो जैसे जड़ सूर्य दुनिया की सबसे बडी जड़ ऊर्जा है ऐसे ही ये ज्ञान सूर्य जो है, हैविनली गॉड फादर, चैतन्य, वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सबसे बडे से बड़ी ऊर्जा के रूप में पार्ट बजाने वाली आत्मा है।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the sixth page on Monday was – People say ‘Shyamsundar’ for Krishna. Shyam means black, sundarmeans fair. Why don’t they say for Radha? A question arises, doesn’t it? A song has also been penned. Why is Radha fair, why is Krishna black? Those who write the song also ask a question. Nobody gives an answer. Hm? It was asked to big scholars, pundits, acharyas (teachers). Nobody gives an answer. Yes, they do say that there is a part of Parvati who says – Varahun Shambhu na tu rahahun kunwaari (I will either marry Shambhu or remain a virgin.) Janam janam lagi ragari hamaari (this is my devotion since many births). It is not about one birth. This is my pledge for every birth that I will keep the company of one. So, that soul will be called fair only, will she not be? Or will she be called black? Yes. Sikhs also say – ek naari sadaa brahmachaari (being faithful to one’s wife is like being celibate). So, now the question is that whether Paarvati and Radha are one and the same? No? Are they separate?
(Someone said something.) Yes. The soul of Parvati which enables [others] to sail across is the soul of Radha only. The only mistake that the writers of scriptures have committed is that they have inserted the name of Krishna, the one who is perfect in 16 celestial degrees in place of God. Well, Krishna is worshipped in the temples in the form of a child. And as the giver of the knowledge of the Gita he has been shown in a grown-up form sitting on the Chariot of Arjun.

So, nobody understands this topic. Hm? What is the reality? The reality is that neither did God Krishna come in the end of the Copper Age (Dwapar) nor did Shankar Parvati come on a mountain. It is about the Confluence Age Krishna, it is about the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) that when all the souls become degraded (tamopradhan) on this world stage in the Iron Age; they will become tamopradhan while enjoying pleasures in the four Ages, will they not? So, in the last birth, the seed-form Father of this human world, who is also called – Jagatam pitaram vandey (I bow to the Father of the world) in the scriptures; mother and Father of the world. So, on the one hand they believe the mother and Father of the world to be God. And on the other hand they call child Krishna as God. Arey, that Father is the Father of the human world, isn’t he? So, it is also told in the scriptures that the Father of the human world does not have any parents in corporeal form. Parents of Krishna are shown in corporeal form. And the parents of Ram are also shown in a corporeal form. But they do not know that the souls of Ramchandra and Krishnachandra play the part in the form of a Father and a son in the period of mega-destruction (mahaavinaashkaal), in the end of the four Ages, in the end of the Kalpa (cycle of 5000 years). The biggest Father of the human world and the child of the biggest Father of the human world.

So, the Father is an everlasting Father. He doesn’t have a Father in corporeal form. He is the Father of the corporeal human world. And the soul of Krishna is a child. So, in the Father of the corporeal human world, the original Father of fathers, who doesn’t have a Father, who is the Father of souls; and what kind of a soul? Bhogi (pleasure-seeker) or abhokta (non-pleasure seeker)? Abhokta. It is because those Ram and Krishna have been depicted as bhogis. They get married and give birth to children. Hm? So, they are bhogis, aren’t they? So, who will be called God? Will a bhogi be called [God] or will abhokta be called [God]? Hm? Bhogis will become weak souls by enjoying pleasures, by experiencing happiness and sorrows, will they not? Hm? God comes and causes the true salvation (sadgati) of everyone in this world and goes. He is also called bestower of true salvation upon everyone. So, when He goes after causing everyone’s true salvation, then when all the souls come to this world stage numberwise in their first birth, they play the part of true salvation. True salvation means that they should enjoy happiness through the body; sorrows? They shouldn’t suffer sorrows.

So, some souls in the first scene itself; there are scenes in a drama, aren’t there? So, this is also an unlimited drama. It has four scenes – Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age. Some souls descend in the beginning of the Golden Age itself. Among them the number one soul because the Golden Age is called perfect in 16 celestial degrees, isn’t it? So, the soul of Krishna which is perfect in 16 celestial degrees, the intellect of the scholars, pundits, acharyas reaches up to him. But the intellect doesn’t reach up to the time when the mega-destruction had taken place even before the Golden Age, hm, for which there is a title for God – Kalaateet (beyond celestial degrees) kalyaan (benevolent) kalpaantkaari(the one who brings an end to the Kalpa). What? He is beyond the celestial degrees, i.e. it is a part of the Sun. Is the Sun or is the Moon bound by celestial degrees? Hm? The Sun is not bound. So, it means that ‘Chandra’ (moon) is suffixed to the names of the souls of Ram and Krishna. Krishnachandra, Ramchandra. So, these can be deity souls. But He is the Father of souls, the Father of fathers who does not have any Father. It cannot be Him.

So, the name of that Father of souls is Shiv, i.e. benevolent. And not just Shiv. Forever Shiv. So, it is proved that the souls of Ram and Krishna cannot be Sadaa Shiv (forever benevolent). So, will Sadaa Shiv alone be called God or will the one who is sometimes Shiv, sometimes benevolent and sometimes harmful or cannot cause benefit to that extent; who will be called God? God is forever benevolent, isn’t He? So, the human world is a corporeal human world only. And in that corporeal human world, that forever incorporeal who is the Father of souls, the one who never enters into the cycle of birth and death, and is therefore abhokta (non-pleasure seeker), if He enters into the cycle of birth and death, then He will have to experience the pleasures and pains of the body also. So, He does not enter into the cycle of birth and death at all. And this is why He is Trikaaldarshi (knowledgeable about the three aspects of time) because the one who enters into the cycle of birth and death forgets all the topics of the past birth. And the one who doesn’t enter into the cycle of birth and death at all will remember everything, will He not? He comes to this world stage only once. For example, there are founders of religions; Be it any founder of religion, Ibrahim, Buddha, Christ, etc, they come and play the part of establishment of their religion within 100 years. Similarly, that Supreme Father Heavenly God Father Shiv comes to this world for 100 years and within 100 years He plays a part as a Director by being behind the curtains on the world stage. What? In the limited dramas the Director who prompts, keeps on prompting from behind the curtain, doesn’t He? Hm? Yes, does anyone see him? Nobody is able to see him. He is so subtle, unthinkable. Hm? He is not even thinkable. Very subtle soul.

So, it was told that that Supreme Soul, who is the actual God, comes to this world and keeps Himself incognito. What? All others who sit as Gods or those who are worshipped as Gods by sculpting their idols in the temples; and not just one, numerous Gods. It is not as if only Ram and Krishna are Gods in the form of human beings. No. Numerous incarnations have been depicted in the form of animals. On the one hand is incarnation of Ganesha, incarnation of Hanuman, incarnation of fish, and what else? Incarnation of lion. Incarnation of horse. Hm? Different incarnations of animals have been depicted! Then they say in the scriptures – Ritey gyaanaan na mukti. There is no mukti (salvation) without knowledge (Gyan). Well, the knowledge, the knowledge of the Gita which God will come and narrate, will He narrate to the animals? Hm? Will the animals listen, understand the knowledge? Arey? What is this waste written in the scriptures?

The true incorporeal God, the special souls playing the part of hero-heroine on this world stage; who? Who is the hero? The soul of Ram, who is called Aadam, Adam, Aadinath in other religions; The one who is also called Aadipita (the first Father), Jagatpita (Father of the world), Jagannath (Lord of the world) in India. So, He enters in him in a permanent manner. And the titleholders of Brahma in whom He enters in a temporary form are shown in a four-headed united form. Arey? So, among the united form of four heads of Brahma, there must be a chief among the four, yes, he binds nicely the remaining three in his gathering. What? Yes. So, those four heads are shown together. So, the writers of the scriptures or the sculptors have made four heads of Brahma. The fifth head, which is the upward facing head, the true head has been forgotten. It has also been written in the scriptures; someone made a shloka (hymn) as well – Gururbrahma, Gururvishnu, Gururdevo Maheshwarah. Gurursaakshaat Parambrahm Tasmai Shri Guruve namah. But what is the confusion that they have created? They have mentioned the abode of Brahma to be the abode of Brahm. They think of the Brahmlok as the Supreme Abode, the Soul World, the abode of souls. Arey, Brahmlok is the abode of Brahma, isn’t it?

So, these four Brahmas are there, aren’t they? And they play their parts in the Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age, all the four Ages, but they play a special part in a particular Age, don’t they? So, in whichever Age they play a special part in the form of a mother; their name is mother (ma), isn’t it? Brahm ma. It means the souls that play the part of tolerance in the form of biggest mother among all the mothers who have existed in India or in the world. So, who is in the Golden Age? Who is in the Silver Age? Who is in the Copper Age? Who in the Iron Age? Hm? Who should we say in the Golden Age? It will be said that in the Golden Age it was the one who gave birth to the Krishna perfect in 16 celestial degrees. For example, it has been written in the scriptures that Krishna emerged in the beginning of the world on a fig leaf in the ocean. Arey, on a fig leaf amidst such a big ocean which is shaking due to high tides. Will a fig leaf remain stable on it? Will it? Arey? What all topics have been created! That is not the topic. Hm? It has a secret. So, the true God, the Sun of Knowledge, who always plays a part on this world stage in an attached, no, detached manner, never gets attached with any bhogi soul, does not come in its attachment. But there is the Sun, the Moon and the stars of the sky to give an example. Hm? But those are non-living stars, aren’t they? The living stars of the Earth, the Sun of the Earth, the Moon of the Earth, the constellations of the Earth, for whom their example is given, are living souls.

So, the one who is the Sun of Knowledge among them spreads very intense light over that world stage. What? Arey, in the beginning he will spread dim light. What does the non-living Sun do? In the morning at Amrit Vela (pre-dawn period), is the light of the Sun low, medium or intense? It is medium. And as and when the time passes the light goes on becoming intense. It goes on becoming so intense that it is difficult to tolerate. So, just as the Sun is the biggest non-living energy of the world, similarly, this Sun of Knowledge, the Heavenly God Father, the living one, is the soul that plays a part in the form of the biggest energy on this world stage.

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