Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2803, दिनांक 26.02.2019
VCD 2803, dated 26.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2803-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.31
Time- 00.01-17.31


प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को पांचवें पेज पर मध्यांत में बात चल रही थी कि जो भोगी आत्माएं हैं वो शरीर से भोग भोगते हैं तो उनको नाम तो जरूर चाहिए। नाम बिगर तो काम ही नहीं चल सकता। कोई सर्विस ही नहीं चल सकती। अरे, ये सृष्टि भी नहीं चल सकती। तो ऐसा नहीं कोई ख्याल करना कि वहाँ नाम नहीं रहेगा। नाम तो बिल्कुल सहज है। बाकि हाँ, यहाँ जरूर आत्मा के ऊपर ही सारी बात है कि हे पतित-पावन आओ। आकरके हमारी आत्मा को पावन बनाओ। हँ? आओ का मतलब क्या? हँ? आओ माने आओ और गुप्त बने रहो? हँ? अरे, आत्मा भी परमधाम से आती है कोई भी आत्मा तो कब कहा जाता है कि आई? जब कोई शरीर के द्वारा प्रत्यक्ष हो; बच्चा भी जन्म लेता है तो बाहर प्रत्यक्ष होता है तभी कहते हैं ना आया। तो बताया – जो बुलाते हैं पतित पावन आओ, तो जरूर तब ही आत्मा को आकरके पावन बनाएंगे जब इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच की सबसे जास्ती पतित, तमोप्रधान आत्मा में प्रवेश करके पार्ट बजाए। तो दोनों का प्रत्यक्षता रूपी जन्म साथ-साथ है। पतित का भी और पावन आत्मा का भी। तो, तो कहा जाएगा आया।

फिर उस पावन आत्मा को तो देखो श्री-3 सबका नाम पड़ता है। जो भी पावन बनते जाते हैं संग के रंग से तो पावन बनते जाते हैं। तो ऐसा कोई न समझकरके बैठे कि वहाँ नई दुनिया में आत्माभिमानी बनके रहेंगे, नहीं, देह अभिमानी बनके रहेंगे। नहीं। देह का नाम तो वहाँ होगा परन्तु वो याद नहीं आएगा। नाम जरूर होगा। तो जभी नाम-नाम रखे जाते हैं तो फिर आत्माभिमानी बनकरके ही कैसे रह सकेंगे? रह कैसे सकेंगे? हाँ, इतना ज़रूर है कि आत्मा प्योर हो जाती है। तो तुम्हारे से वहाँ कोई पीछे विकर्म नहीं होता है। पवित्र आत्मा अपने ठिकाने पर टिकी रहती है। हाँ, लक्ष्मी वा नारायण या जो भी सीता या राम, हँ, उस ऊँची स्थिति में टिके रहने के कारण, हँ, कौनसी ऊँची स्थिति? भृकुटि के मध्य में जिसे कहते हैं मूर्धा। फिर उतने विकर्म नहीं होंगे। बल्कि नाम तो फिर भी यही गिनती करते जाएंगे ना। क्योंकि यहाँ तो है प्योर बनने की बात।

पीछे बच्चे जानते हैं कि वो ही आत्मा थोड़ी-5 डिग्री कमती होती जाएगी। कहाँ? नई दुनिया में। यहाँ जब तुम्हारी आत्मा बिल्कुल प्योर हो जाएगी। अभी तो नहीं कहेंगे बिल्कुल प्योर। क्यों? आत्मिक स्थिति में कम रहते और देह भान में ज्यादा रहते। तो प्योरिटी की बात ही नहीं। तो बिल्कुल जब प्योर हो जाएगी तब ही ये शरीर छोड़ जावेंगे। हँ? आत्मा ऐसे अनुभव करेगी कि ये देह अलग और मैं आत्मा अलग। फिर उस प्योर आत्मा को प्योर शरीर मिलेगा। हँ? किस प्योर आत्मा को? उस प्योर आत्मा को। किस प्योर आत्मा को प्योर शरीर मिलेगा? हँ? हाँ? जिस शरीर में मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं उसको पवित्र शरीर, नीरोगी कंचनकाया मिलेगी या नहीं मिलेगी? इसी जनम में मिलेगी या बरफ में दब जाने के बाद मिलेगी?
(किसी ने कुछ कहा।) बरफ में दब जाने के बाद मिलेगी? अच्छा? बरफ में दब जाने का मतलब भी हद का है, बेहद का है। बर्फ में क्या होता है? ठंडा हो जाता है। है ना? और यहाँ बेहद में क्या है ठंडी का मतलब ब्राह्मणों की दुनिया में? पुरुषार्थ की ठंडी ऐसी पड़ जाती है कि कोई से भी वो पुरुषार्थ हो नहीं पाता है। कौनसा पुरुषार्थ? इस दुनिया में जब विनाश का हड़कंप चलता है तो इस हड़कंप के बीच में आत्मा स्थिर हो नहीं पाती है। अब जब स्थिर नहीं हो पाती है तो क्या कहें कि पुरुषार्थ की ठंडी लग रही है कि नहीं? ठंडी लग रही है।

तो, तो जो आत्मा बताया, उस आत्मा, जो प्योर आत्मा बन जाती है फिर शरीर भी प्योर मिलेगा। तो इसी दुनिया में मिलेगा कि जो नई दुनिया कही जाती है उसमें मिलेगा? हाँ, तो खूबी ये है। क्या? जो बताते हैं कि तुम्हारी आत्मा रूपी नैया, वो आत्मा रूपी जो बिठैया है और शरीर रूपी जो नैया है तुम्हारी जिसमें आत्मा बैठी हुई है, दोनों का पार लगाने वाला खिवैया तुमको मिला हुआ है। किसको? किसको? हँ? अरे, बताओ जल्दी। किसको मिला हुआ है? इसी दुनिया में, हाँ,
(किसी ने कुछ कहा।) पूरी रूद्र माला को? पूरी रुद्र माला के जो भी मणके हैं वो बर्फ में नहीं दबेंगे शरीर के साथ? बर्फ में नहीं जाएंगे? तो कहेंगे, तो कहेंगे यहीं कंचनकाया बन जाएगी इसी दुनिया में? हँ? हाँ, बताया उस प्योर आत्मा को। उस प्योर आत्मा को माने उन आत्माओं को या उस आत्मा को? एक के लिए बोला। तो खूबी ये है। क्या खूबी? कि तुम्हारी आत्मा भी पवित्र और तुम्हारा शरीर भी पवित्र बन जाएगा।

शरीर भी प्योर और फिर यहाँ, यहाँ देखो इस दुनिया में न कोई की आत्मा प्योर न कोई शरीर प्योर। ये तो समझ सकते हो ना बच्चे कि न आत्मा प्योर होती है न शरीर प्योर होते हैं। हँ? ये जो ढ़ेर के ढ़ेर शरीरधारी हैं वो यहाँ इस दुनिया में, नरक की दुनिया में पवित्र बनते हैं? बनते हैं? हँ? अरे? अरे, विष्णुलोक में जाएंगे तब ही पवित्र कहेंगे या स्वर्ग में जाएंगे, सतयुग जिसे कहेंगे 16 कला संपूर्ण, वहाँ जाएंगे तब पवित्र होंगे शरीर या यहाँ नरक की दुनिया में पवित्र होंगे? हँ? नहीं। तो शरीर प्योर नहीं होते हैं क्योंकि, क्योंकि ये अलाय पड़ता ही रहता है। अलाय माने किसका अलाय? अलाय माने खाद। कौनसी खाद? दूसरी-दूसरी जो देहधारी आत्माएं हैं ना उनके संग के रंग की, उनकी स्मृति की खाद पड़ती है। वो खाद छूटती ही नहीं। जब छूटती नहीं तो शरीर पवित्र बनेगा ही नहीं। अलाय पड़ता जाता है।

तो अच्छी तरह से ये सब बातें धारण करनी होती है ना। क्या? कि जो बर्फ में भी दबेंगे उनमें भी तो नंबरवार होंगे। कोई तो पहले निकलेंगे कि बाद में निकलेंगे सब इकट्ठे? हाँ, कोई पहले निकलेंगे, कोई? कोई बाद में निकलेंगे। 13.11.67 के प्रातः क्लास का छठा पेज। तो ये धारण करने से इन बातों को फिर खुशी बहुत रहती है। क्या खुशी रहती है? कि हम आत्मा जब ये बातें ज्ञान की अच्छी तरह गहराई से धारण हो जाएंगी तो बुद्धि में बैठेगा कि हम आत्मा अब नई दुनिया में जल्दी से जल्दी विष्णुलोक में पहुँचने वाले हैं। क्योंकि बच्चों को समझाया तो जाता है ना।

बच्चे वो तो सभी बाप, टीचर, वगैरा अलग हैं। क्या? वो बाप, दुनिया में जितने भी बाप हुए। चाहे धरमपिताएं हों ऊँच ते ऊँच पावरफुल कहे जाते हैं और चाहे वो जन्म-जन्मान्तर के तुम्हारे बाप हों। या जन्म-जन्मान्तर के टीचर हों। वो सब अलग हैं। और ये तो बाप, टीचर, सद्गुरु बिल्कुल अलग है। और ये एक ही है। वो तो अनेक हैं। तो सुप्रीम जिसको कहा जाता है परमपिता। क्या? क्या? सुप्रीम माने? परमपिता। जिससे ऊँचा पिता और कोई होता ही नहीं। परम और क्या? परम शिक्षक। जिसमें प्रवेश करते हैं उसको भी कहेंगे परमशिक्षक? हँ? नहीं कहेंगे? अरे? अरे, कहेंगे कि नहीं? चक्कर में पड़ गए। कहेंगे? कौन कहेंगे? हँ? वो खुद कहेगा परमशिक्षक? कहेगा? हाँ, बिल्कुल नहीं कहेगा। क्यों? क्योंकि उसको भी पढ़ाई पढ़ाने वाला कौन है उससे भी ऊँचा? हाँ, वो ही सुप्रीम सोल जिसको कहा जाता है परमपिता। तो फिर कहेंगे परम टीचर। परम टीचर भी है, परम पिता भी है। और? सद्गुरु भी। कब? वो तो निराकार तो नहीं हो सकता। वो कब? जब शरीर में प्रवेश करते हैं तो परमगुरु भी हैं। हाँ। लेकिन फिर परमगुरु तो भले कह दो लेकिन सतगुरु नहीं कह सकते। क्यों? सत तब कहेंगे जो इस दुनिया में सदा काल सत रहे। वो सदाकाल सत रहता है इस दुनिया में? सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु निराकार? नहीं। तो जब शरीर में प्रवेश करते हैं तब उनको कहा जाता है सद्गुरु क्योंकि सत के बदली में परम कह देते हैं। क्या? परमपिता, परम टीचर, परम गुरु। बाकि उस सुप्रीम सोल को; क्या? सतगुरु नहीं कह सकते।

तो वो तो फिर एक ही हो जाते हैं ना बच्ची। हँ? एक ही कैसे? एक ही शरीर में प्रवेश करते हैं दो आत्माएं तो जब सद्गुरु कहेंगे तो दोनों मिल करके एक ही हो जाते हैं। हाँ। एक ही कहेंगे। एक ही हो जाते हैं माने? दो आत्माएं नहीं रहती? हँ? अरे? विष्णु को एक कहेंगे या दो कहेंगे? विष्णु को क्या कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) विष्णु को 4-5 कहेंगे? अलग-अलग हैं? उनके संस्कार टकराते हैं? हँ? एक रहते हैं। न संस्कार टकराते, न वाचा टकराती, न दृष्टि तुर्स होती है एक-दूसरे के प्रति। होती है? बिल्कुल नहीं होती है। तो कहते हैं एक विष्णु। ऐसे ही ये सद्गुरु भी एक हुआ या दो अलग-अलग हुए? हाँ, एक हुआ। एक हो जाते हैं।

देखो ऐसे कभी भी कृष्ण को तो नहीं कह सकेंगे। कहेंगे? कहेंगे? परमपिता तो कह भी नहीं सकते कृष्ण को। हँ? कि उनका भी जन्म देने वाला कोई बाप था या नहीं था? तो उसको परमपिता कहेंगे? नहीं। और यहाँ तो जो तुम कहते हो बापों का बाप जिसका कोई बाप होता ही नहीं। किसका बाप? हाँ, मनुष्य सृष्टि का। अनेक प्रकार का धरमपिताओं में विभाजन है। क्या? बड़े ऊँचे-ऊँचे धरमपिताएं माने जाते हैं ना। सारी दुनिया मानती है ना। हाँ, लेकिन उन धरमपिताओं का भी कोई बाप है जिसको कहते हैं। क्या? वो आदम, एडम को मानते हैं ना। जानते नहीं हैं। तो वो हो गया उनसे भी ऊँचा। फिर? आदम से भी ऊँचा कोई और है? हाँ। उससे भी ऊँचा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्मा है। सदाकाल पार्ट नहीं बजाती है। लेकिन सौ वर्ष के लिए जैसे और धरमपिताएं आते हैं, अपना धर्म स्थापन करते हैं, सौ वर्ष के अन्दर, वैसे वो परमपिता शिव भी, हाँ, आते हैं, प्रवेश करके पार्ट बजाते हैं।

A morning class dated 13.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fifth page on Monday was that the bhogi (pleasure-seeking) souls experience pleasures through the body; so, they definitely require a name. The task cannot be performed without a name. No service can be done. Arey, this world cannot work, too. So, nobody should think that you will not have a name there. The name is very easy. But yes, here the entire topic is based definitely on the soul only that O purifier of the sinful ones, come. Come and make our soul pure. Hm? What is the meaning of ‘come’? Hm? Does ‘Come’ mean come and remain incognito? Hm? Arey, when a soul, any soul comes from the Supreme Abode, then when is it said to have come? It is when it is revealed through a body; Even when a child gets birth, when he comes out, only then do people say, don’t they that he came? So, it was told – Those who call – O Purifier of the sinful ones, come, so, He will come and make the soul pure only when He enters in the most sinful, degraded (tamopradhan) soul of this human world stage and plays His part. So, the revelation-like birth of both is simultaneous. That of the sinful one also and that of the pure soul also. Then, then, it will be said that He came.

Then, look, that pure soul, everyone gets the name Shri-Shri. All those who go on becoming pure through the colour of company go on becoming pure. So, nobody should sit thinking that we will remain soul conscious there in the new world, no, as body conscious ones. No. There will be the name of the body there, but it will not come to the mind. The name will definitely be there. So, whenever names are coined, so, then how will you continue to remain soul conscious? How will you be able to remain? Yes, it is sure that the soul becomes pure. So, you do not commit sins there later. The pure soul remains constant in its destination. Yes, Lakshmi or Narayan or Sita or Ram, because of being constant in that high stage, hm, which high stage? In the middle of the bhrikuti (in the middle of the forehead between the eyebrows), which is called moordha. Then you will not commit that many sins. Rather you will go on counting these names only, will you not? It is because here it is a topic of becoming pure.

Later children know that the same soul’s degree will keep on decreasing little by little. Where? In the new world. Here, when your soul becomes completely pure; Now it will not be called completely pure. Why? You remain less in soul consciousness and more in body consciousness. So, there is no question of purity at all. So, when it becomes completely pure, only then will you leave this body. Hm? The soul will feel as if this body is separate and I, the soul, am separate. Then that pure soul will get a pure body. Hm? Which pure soul [will get]? That pure soul [will get]. Which pure soul will get a pure body? Hm? Yes? The body in which He enters in a permanent way, will it get a pure body, healthy kanchankaya (disease-free body) or not? Will it get in this birth itself or will it get after getting buried in the ice?
(Someone said something.) Will it get after getting buried in the ice? Achcha? Getting buried in the ice has a limited meaning and an unlimited meaning. What is in an ice? It becomes cold. Is it not? And what is the meaning of cold here in the world of Brahmins in an unlimited sense? The purusharth becomes so cold that nobody is able to make purusharth. Which purusharth? When there is upheaval of destruction in this world, then the soul is unable to become constant in the midst of this upheaval. Well, when it is unable to become stable, then what would you say? Are you experiencing coldness in purusharth or not? You are experiencing cold.

So, so, the soul which was mentioned, that soul, which becomes a pure soul, then the body that it gets, will also be pure. So, will it get in this world itself or will it get in the world which is called the new world? Yes, so, this is the specialty. What? It is mentioned that your soul-like boat, the soul-like passenger (bithaiyya) and the body-like boat in which your soul is sitting, you have found the boatman who sails both of them across. Whom? Whom? Hm? Arey, speak up fast. Who has found? In this world itself, yes,
(Someone said something.) The entire Rudramala? Will not all the beads of the entire Rudramala get buried under the ice along with their bodies? Will they not go under the ice? So, will it be said, will it be said that they will become kanchankaya (healthy, disease-free body) here, in this world itself? Hm? Yes, it was told that that pure soul. Does that pure soul mean those souls or that soul? It was said for one. So, this is the specialty. What specialty? That your soul will also become pure and your body will also become pure.

The body will also be pure and then here, here, look, in this world neither anyone’s soul is pure, nor is anyone’s body pure. Children, you can understand that neither the soul is pure nor the bodies are pure. Hm? Do these numerous bodily beings become pure here in this world, in the world of hell? Do they become? Hm? Arey? Arey, will they be called pure when they go to the abode of Vishnu or when they go to the heaven, to the Golden Age, which will be called perfect in 16 celestial degrees, will the bodies become pure when you go there or will they be pure here in the world of hell? Hm? No. So, the bodies do not become pure [here] because, because this alloy keeps on getting added. Alloy refers to which alloy? Alloy means mixture (khaad). Which mixture? The mixture of the colour of company, the remembrance of the other embodied souls gets added. That mixture does not get removed at all. When it is not removed, then the body will not become pure at all. The alloy keeps on getting added.

So, you have to inculcate all these topics nicely, will you not? What? That those who get buried under the ice will also be numberwise. Will some come out first or will everyone come out together later on? Yes, some will emerge first and some? Some will emerge later on. Sixth page of the morning class dated 13.11.67. So, by inculcating these topics you get a lot of joy. Which joy do you get? That when we souls inculcate these topics of knowledge nicely, deeply in our intellect that we souls are now going to reach the new world, the abode of Vishnu very soon. It is because children are explained, aren’t they?

Children, all those fathers, teachers
, etc. are separate. What? Those fathers, all the fathers who have existed in the world. Be it the founders of religions, who are called the highest on high powerful ones and be it your fathers of birth by birth. Or be it the teachers of birth by birth. All of them are separate. And this Father, Teacher, Sadguru is completely different. And this one is only one. They are many. So, the Supreme, who is called the Supreme Father. What? What? What is meant by supreme? The Supreme Father. There is no Father higher than Him at all. Supreme and what? Supreme Teacher. Will the one in whom He enters also be called the Supreme Teacher? Hm? Will he not be called? Arey? Arey, will he be called or not? You are confused. Will he be called? Who will call? Hm? Will he himself call him the Supreme Teacher? Will he call? Yes, he will not at all say. Why? It is because who is the one who teaches him, who is higher than him as well? Yes, the same Supreme Soul, who is called the Supreme Father. So, then He will be called the Supreme Teacher. He is the Supreme Teacher as well as the Supreme Father. And? Sadguru also. When? That incorporeal cannot be that. When is He? He is the Supreme Guru also when He enters in a body. Yes. But then you may call Him the Supreme Guru, but you cannot call Him the Satguru. Why? He will be called Sat (true) when He remains true in this world forever. Does He remain true forever in this world? The Supreme Soul, point of light, incorporeal? No. So, when He enters in a body, then He is called the Sadguru because instead of Sat (truth), people say ‘Param’ (supreme). What? Supreme Father, Supreme Teacher, Supreme Guru. As such that Supreme Soul; what? He cannot be called Satguru.

So, they become one only, don’t they daughter? Hm? How one? Two souls enter in the same body, so when you say ‘Sadguru’, then both of them together become one only. Yes. They will be called one only. What is meant by ‘they become one only’? Don’t they remain two souls? Hm? Arey? Will Vishnu be called one or two? What will Vishnu be called?
(Someone said something.) Will Vishnu be called 4-5? Are they different? Do their sanskars clash? Hm? They remain one. Neither do the sanskars clash nor do the words clash; neither do the eyes become angry towards each other. Do they become? They do not become at all. So, they are called one Vishnu. Similarly, is this Sadguru also one or two different? Yes, he is one. They become one.

Look, you will never be able to say so for Krishna. Will you say? Will you say? You cannot even call Krishna the Supreme Father. Hm? Was there any Father who gave birth to him or not? So, will he be called the Supreme Father? No. And here you say ‘the Father of fathers who does not have any Father at all’. Whose Father? Yes, of the human world. There are many kinds of divisions among the founders of religions. What? The founders of religions are considered to be big and high, aren’t they? The entire world believes, doesn’t it? Yes, but there is a Father of even those founders of religions who is called; what? They believe in Aadam, Adam, don’t they? They do not know. So, he is higher than them. Then? Is there anyone higher than Aadam? Yes. There is a soul who a part higher than him on this world stage. It does not play a part forever. But for hundred years, just as other founders of religions come and establish their religions within hundred years, similarly that Supreme Father Shiv also, yes, comes and plays His part by entering [in someone].

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2804, दिनांक 27.02.2019
VCD 2804, dated 27.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2804-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.00
Time- 00.01-16.00


प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को छठे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – शंकर को काला गला दिखाय दिया है, नीला। अरे, वो गला तो दूसरे का लोन लिया हुआ है ना। शिव बाप, सदा शिव जो निराकार है, हँ, जिसको अपना शरीर ही नहीं है, तो गला कहाँ से आया? तो गला लोन लेता है। लिया है ना। तो उस गले से तो बैठकरके बोलते ये हैं ना। उस गले से नहीं, उन गले से। माना कोई एक का गला नहीं लेते हैं। हँ? कितनों का गला लेते हैं? दिखाते हैं भक्तिमार्ग में चतुर्मुखी ब्रह्मा, पंचमुखी ब्रह्मा। तो 4-5 व्यक्तित्व हुए ना। हाँ। उनसे बैठ करके गला लेते हैं और फिर बोलते हैं। कौन? शिव सुप्रीम सोल सदा शिव। उनको कोई अपना गला थोड़ेही है जो काला हो जाएगा वरी। हँ? अरे, इनका भी काला कैसे होगा? इनका माने किनका? जो ब्रह्मा नामधारी चतुर्मुखी ब्रह्मा है, चित्रों में भी जो अर्जुन का रथ दिखाया है उसमें सफेद घोड़े दिखाए हैं या काले घोड़े दिखाए हैं? हँ? सफेद घोड़े दिखाए हैं ना। तो जब हैं ही सफेद घोड़े तो उनका गला कहाँ से काला हो गया? गला भी तो सफेद ही हुआ ना। हाँ।

तो ये सभी दंत कथाएं हैं ढ़ेर सारी शास्त्रों में। ये जो हड्डी-हड्डी कहते हैं ना कि भई दधीची ऋषि के मुआफिक ये हड्डी देनी है। हँ? कौन हुआ दधीची ऋषि? कोई ने तो अपनी हड्डियां दी होंगी ना, गलाई होंगी ना, हँ, दूसरों को सुख देने के लिए। कहाँ शूटिंग हुई? हँ? हाँ, अरे, ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में ही कोई चतुर, चार मुखों वाले ब्रह्मा में से कोई मुख्य ब्रह्मा है जिसने अपनी गोद में ले-लेकरके अपनी हड्डियां गलाय दीं। ऐसे थोडेही कहेंगे कि इन्द्रियजीत हो गया, इन्द्रिय पर जीत पा ली, डिस्चार्ज होता ही नहीं। ऐसे कहेंगे? कह ही नहीं सकते। अरे, जो ऐसा पक्का योगी होगा जिसने अपनी इन्द्रिय को जीत लिया, खास करके कामेन्द्रिय को, तो उसका हार्टफेल हो सकता है? उसका हार्टफेल तो हो ही नहीं सकता। हां। इसलिए बाप ने मुरली में ही बताय दिया योगी का कभी हार्टफेल नहीं हो सकता। तो ये दधीची ऋषि की शूटिंग हो गई, रिहर्सल कर दी। क्या? अपनी हड्डियां भी दान में दे दीं। किसलिए दे दीं? हँ? अपने फायदे के लिए कि दूसरे के फायदे के लिए? हाँ, अपने फायदे के लिए, दूसरे को, दूसरों को हड्डियां भी गलाय दीं। क्या फायदा? अरे, जो दधीची ऋषि की आत्मा है हड्डी-हड्डी अर्पण करती है ईश्वरीय सेवा में दूसरों को कल्याण करने के लिए, दूसरों को सुख देने के लिए वो ही आत्मा तो स्वरग का इन्द्र बनती है स्वर्ग का राजा कि कोई दूसरा बनता है? वो ही बनती है। तो स्वर्ग का जो मुख्य शस्त्र है वो कौनसा हुआ? हाँ, कहते हैं वज्र हुआ। अरे, वो वज्र काहे का बना? हाँ, संगमयुग में जो हड्डियाँ गलायीं दधीची ऋषि ने तो वो दधीची ऋषि जाके इन्द्र बनते हैं, उनको अपनी हड्डियों का अस्त्र मिल जाता है। कहाँ? यहीं संगमयुग में। क्या करते हैं? वो सतयुग में नहीं कोई दैत्य होते हैं, राक्षस होते हैं, जिनका संघार करना है। यहाँ संगमयुग में जो राक्षसी आत्माएं हैं उऩका संघार करते हैं।

तो, तो ये बात बताई है कि दधीची ऋषि के मुआफिक हड्डी-हड्डी देंगे, हँ, शरीर की हड्डियां भी अर्पण करेंगे दूसरों के कल्याण के लिए, दूसरों को सुख देने के लिए तो उसका रिजल्ट क्या होगा? अच्छा ही रिजल्ट होगा, सुख ही मिलेगा या दुख की दुनिया में जाएंगे? सुख ही मिलेगा। तो अब हड्डी-हड्डी क्या देने का है? हँ? वो भी तो बुद्धि में आना चाहिए। हँ? बाप तो कहते हैं बच्चे बड़े तंदुरुस्त रहो। बाप कहते हैं कि अपनी हड्डियाँ गला दो और, और टीबी के मरीज हो जाओ? ऐसे कहते हैं? हँ? या हार्टपेल हो जाओ? नहीं। बाप तो कहते हैं बच्चों को बड़े तंदुरुस्त होकर रहो। बिल्कुल अच्छी तरह से रहो। ऐसे अच्छी तरह से रहो कि कोई कितना भी, कैसा भी आघात करे, तुम्हारे ऊपर कोई न मन के ऊपर, न तन के ऊपर, कोई असर न हो। क्या? असर हो? नहीं। ऐसे तंदुरुस्त रहो। तन से, मन से।

तो जितनी तुम बच्चों को बाप की याद रहेगी इतनी खुशी बहुत रहेगी। किसकी याद? हँ? सिर्फ अपनी आत्मा की याद या साथ में बाप की भी याद? हाँ, बाप; बाप के लिए क्या टाइटल देते हैं? सत, चित, आनन्द। कभी आनन्द से नीचे उतरती है वो आत्मा? नहीं। अरे, इस पतित दुनिया में आती है, पतित तन में आती है, फिर भी? फिर भी आनन्द मनाती है, आनन्द में रहती है या कभी दुखी होती है? हँ? सदा आनन्द। तो, तो उसका याद करेंगे उसकी तो खुशी रहेगी ना। कितनी खुशी रहेगी! बहुत खुशी। तो कहेंगे कि ऐसी खुशी जैसी तो कोई खुराक ही नहीं। कोई होती है इतनी खुशी? हँ? जो ज्ञान की खुशी है, हँ, जो योग की खुशी है, इससे बड़ी खुराक तो और कोई आत्मा को हो ही नहीं सकती। तो तुम बच्चों को कितनी खुराक मिलती है! हँ? कौनसे बच्चों को? हँ? देहधारी बच्चों को? अरे, देह के बच्चों से तो बात ही नहीं करते। किनसे बात करते हैं? हाँ, जो आत्मिक स्थिति में रहते हैं, जितना भी रहते हैं। कोई कम कोई ज्यादा। तो उन आत्मिक स्थिति में रहने वाले बच्चों से कहते हैं कि तुमको कितनी खुराक मिलती है! तुमको माने किसको? देह को थोड़ेही? किसको? आत्मा को खुराक मिलती है। कितनी खुशी मिलती, मिलती है! हम अभी ये बात जान गए हैं।

हाँ, ये, ये बाप समझाते हैं। क्या? समझाने वाला कौन है? हँ? ये, ये; ये, ये कहके किसकी तरफ इशारा किया? हाँ, कोई आत्मा इमर्ज की कि ये, ये। बाप समझाते हैं। क्यों? शिव सुप्रीम सोल नहीं समझाते? अरे, समझाते तो हैं लेकिन मनुष्य सृष्टि के बाप में ही प्रवेश करके समझाएंगे ना। तो वो तो दोनों एक ही हो गए। ये बाप समझाते हैं जबकि भगवान है। हँ? हाँ। भगवान से तो हमको वर्सा, स्वरग का वर्सा मिलना चाहिए। हँ? भगवान है तो कहाँ का वर्सा मिलना चाहिए? हँ? स्वरग का वर्सा। स्व माने? स्व माने आत्मा। ग माने गया। आत्मा जब आत्मिक स्थिति में गई तो स्वर्ग का सुख भोगती है। और वरी वो भगवान सबका ही है। ऐसे नहीं कि देवताओं का है, दैत्यों का, राक्षसों का नहीं है, कीड़े-मकोड़ों का नहीं है। नहीं। भगवान तो सबका है। तो हम सबको तो कुछ वर्सा मिलना चाहिए ना। हाँ। कुछ। कुछ क्यों? सब कुछ क्यों नहीं? अरे, जैसा संग करेंगे वैसा प्राप्ति करेंगे। ऊँच ते ऊँच का संग करेंगे तो ऊँच ते ऊँच जास्ती से जास्ती प्राप्ति।

तो वर्सा भगवान का है। किसका वर्सा है? हँ? धनवान का है? अरे, वो टाटा-बिड़ला वाले जो भगवान कहे जाते हैं भारत में, हँ, ये प्रजातंत्र वाले क्या समझते हैं हमारा भगवान कौन है? जो बड़ी-बड़ी ऊँची-ऊँची गद्दियों पे बैठते हैं, हँ, मंत्री, महामंत्री बन करके वो क्या समझते हैं हमारा भगवान कौन है? जो पैसा देगा इलेक्शन लड़ने के लिए वो हमारा भगवान है। हँ? है ना? नोटों से वोटों की राजाई चलती है ना। हाँ। तो उनका नाम शास्त्रों में दिया है धृतराष्ट्र। धृत माने धारण कर लिया। और क्या? राष्ट्र माने राष्ट्र की धन-संपत्ति सारी अपनी बगल में दबा के रख ली गरीबों की खून चूस-चूस के। तो उनको क्या कहेंगे? धृतराष्ट्र नहीं कहेंगे? धृतराष्ट्र। हाँ। तो वो कोई उनके भगवान हैं। कौन? धृतराष्ट्र। और तुम बच्चों का भगवान कौन है? तुम बच्चों का तो भगवान वो धनवान नहीं है स्थूल धन का। काहे का धनवान है? हँ? ईश्वरीय ज्ञान धन का धनवान है। अकूट ज्ञान का धनवान। और वो अकूट ज्ञान का धनवान भी कोई ऐसे नहीं कि बिन्दी है, निराकार है, हवा है। नहीं। वो भी साकार मनुष्य तन में मुकर्रर रथ में प्रवेश करके, हाँ, क्या बनता है? भगवान। जो सारी दुनिया उस भगवान को निराकार रूप में याद करती है कि साकार रूप में याद करती है? सारी दुनिया में जो दूसरे धर्म की आत्माएं हैं वो निराकार रूप में याद करती हैं। और जो तुम बच्चे हो, हँ, देव आत्माएं वो साकार और निराकार, दोनों रूपधारी जो है उसको भगवान समझते हो। हँ?

तो वो भगवान का वर्सा है। हाँ, सृष्टि के, विश्व के रचने वाला। हँ? या स्वरग का रचने वाला। पर वो स्वरग का वर्सा सबको कैसे देंगे? हँ? कैसे देंगे? हँ? नाम ही है स्वर्ग। जो अपनी आत्मा की ऐसे स्टेज बनाए प्रैक्टिस करके कि मैं ज्योतिबिन्दु निराकार आत्मा हूँ, ज्योति का बिन्दु हूँ, हँ, ऐसी प्रैक्टिस करकरके पक्का कर दें। क्या पक्का कर दें? कि लगातार क्या याद आए? देह न याद आए। ज्योतिबिन्दु आत्मा याद आए। तो वो स्वर्गवासी बन जाते हैं। तो बताओ वो जो पुरुषार्थ करेंगे आत्मिक स्थिति में रहने का वो ही स्वरग का वर्सा लेंगे कि सबको दे देंगे? हँ? कीड़े-मकोड़ों को, पशु-पक्षियों को दे देंगे? अरे, उनको तो मन-बुद्धि ही नहीं होती। वो तो ज्ञान को, ईश्वर के ज्ञान को वैल्यू देते ही नहीं। वो तो समझ ही नहीं सकते। हाँ, इस मनुष्य सृष्टि में भी जो मनुष्य हिंसक नहीं हैं, देवात्माएं हैं, सुख देने वाले हैं, वो उनको वो वर्सा मिलता है। बाकि जो हिंसक हैं, तन से, मन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों की ताकत लगाके, दुख ही दुख देते हैं, उनको वर्सा मिलेगा स्वर्ग का? मिलेगा? कैसे मिल सकता है?

तो बताया – तो जिनको हक है लेने का, हँ, जिन्होंने पुरुषार्थ किया है, जिन्होंने पुरुषार्थ किया उनको हक है। जरूर हक है। परन्तु सबको कैसे दे सकते हैं? जो पुरुषार्थ ही नहीं करते, देह के अर्थ ही सब कुछ करते रहते हैं। हँ? देहार्थ या पुरुष माने? पुरु माने? पुरुष माने आत्मा। आत्मा के अर्थ। तो वो भी तो हिसाब चाहिए ना बच्चे। क्या हिसाब? कि देह के लिए जब भगवान बाप आते हैं, ज्ञान का अखूट भंडारी आके अखूट भंडार बांटते हैं, तो वो, वो कितना धारण किया? हँ? धारण किया, ज्यादा टाइम उसमें लगाया, ज्यादा तन, मन, धन उसमें अर्पण किया या अपने रथ में स्वारथ में लगाया? वो हिसाब नहीं चाहिए? वो हिसाब चाहिए ना बच्चे। 13.11.1967 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। तो वो हिसाब बाप बैठकरके समझाते हैं। क्या कहा? कौन समझाते हैं? हँ? कौन समझाते हैं? बाप बैठकरके। कौनसा बाप? जन्म-जन्मान्तर के लौकिक बाप या धरमपिताओं रूपी बाप या धरमपिताओं का भी बाप आदम समझाते हैं? हँ? आदम भी तब समझाते हैं जब आदम के उस मुकर्रर रथ में शिव बाप प्रवेश करते हैं तो कहेंगे कि हाँ, वो दो बेहद के बाप हैं – एक आत्माओं का बाप, निराकार आत्माओं का बाप निराकार बाप। और साकार मनुष्य सृष्टि का बाप आदम, एडम, आदि देव जिसे कहा जाता है। तो वो दोनों एक ही हो गए ना। जब एक ही शरीर में दोनों प्रवेश हैं। तो वो हिसाब बैठ करके दो बाप समझाते हैं।

A morning class dated 13.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the sixth page on Monday was – Shankar’s neck has been shown to be black, blue. Arey, that throat has been taken on loan from someone else, hasn’t it been? Father Shiv, Sadaa Shiv, who is incorporeal, doesn’t have a body of His own, then where will He get a throat from? So, He takes the throat on loan. He has taken, hasn’t He? So, He sits and speaks through that throat, doesn’t He? Not through that throat, those throats. It means that He does not take the throat of any one [person]. Hm? He takes the throat of how many? Four-headed Brahma, five-headed Brahma is shown on the path of Bhakti. So, there are 4-5 personalities, aren’t there? Yes. He sits and takes the throat from them and then speaks. Who? Shiv, the Supreme Soul, Sadaa Shiv. Does He have a throat of His own which will then become black? Hm? Arey, how will that of these also be black? These refer to whom? The Brahma name-holder, the four-headed Brahma; in the Chariot of Arjun that has been shown in the pictures also, have white horses been shown or have black horses been shown? Hm? White horses have been shown, haven’t they been? So, when they are white horses, then how did their throats become black? The throat is also white only, isn’t it? Yes.

So, all these numerous mythological stories are mentioned in the scriptures. They speak of the bones, don’t they that brother, you have to give your bones like sage Dadhichi. Hm? Who is sage Dadhichi? Someone must have given his bones, melted his bones in order to give happiness to others, didn’t he? Where did the shooting take place? Hm? Yes, arey, there is a clever, main Brahma among the four-headed Brahma in the Confluence Age world of Brahmins itself who took people in his lap and melted his bones. Will it be said that he became a conqueror of organs, conquered the organs, and does not discharge at all. Will it be said? You cannot say at all. Arey, the one who is such firm yogi, who conquered his organ, especially the organ of lust, then can he suffer a heart failure? He cannot suffer heart failure at all. Yes. This is why the Father told in the Murli itself that a yogi can never suffer a heart failure. So, this was a shooting, a rehearsal of sage Dadhichi that took place. What? He donated even his bones. Why did he give? Hm? For his own benefit or for the benefit of others? Yes, for his benefit, for others, for others, he melted even his bones. What benefit? Arey, the soul of sage Dadhichi, which dedicates its every bone in Godly service to cause benefit to others, to give happiness to others, does that soul itself become Indra of heaven, the king of heaven or does anyone else become? It only becomes. So, which is the main weapon of heaven? Yes, it is said to be Vajra. Arey, what is that Vajra made up of? Yes, the bones that sage Dadhichi melted in the Confluence Age, so, that sage Dadhichi goes and becomes Indra; he gets the weapon of his bones. Where? Here, in the Confluence Age itself. What does he do? There aren’t any demons in the Golden Age who have to be killed. He kills the demoniac souls which exist here in the Confluence Age.

So, so, this topic was mentioned that if you give your bones like sage Dadhichi, if you dedicate even the bones of the body for the benefit of others, to give happiness to others, then what will be its result? Will the result be good only, will you get happiness only or will you go to the world of sorrows? You will get happiness only. So, what do you have to give as bones now? Hm? That should also strike your intellect. Hm? The Father says – Children, remain very healthy. Does the Father say – Melt your bones and, and become TB patients? Does He say so? Hm? Or should you suffer a heart failure? No. The Father tells the children – Remain very healthy. Live very nicely. Live so nicely that someone may attack you to whatever extent, in whatever manner, it should not have any effect on your mind, on your body. What? Should it affect? No. Be so healthy. Through the body, through the mind.

So, the more you children remember the Father, the more the joy you will experience. Whose remembrance? Hm? Just the remembrance of the soul or the remembrance of the Father also? Yes, Father; what is the title given to the Father? Sat, Chit, Anand. Does that soul ever come down from Anand (bliss)? No. Arey, even when it comes to this sinful world, in a sinful body? Yet, does it enjoy bliss, remain in bliss or does it ever become sorrowful? Hm? Forever bliss. So, so, if you remember Him, then you will enjoy His happiness, will you not? You will experience so much joy! Lots of joy. So, it will be said that there is no food like joy at all. Do you enjoy such happiness? Hm? No other soul can enjoy a food that is greater than the joy of knowledge, the joy of Yoga. So, you children get so much food! Hm? Which children? Hm? Is it the embodied children? Arey, He does not talk at all with the children of the body. To whom does He talk? Yes, those who remain in soul conscious stage, to whatever extent they stay. Some less and some more. So, He tells those children who remain in soul conscious stage that you get so much food! ‘You’ refers to whom? Is it the body? Who? The soul gets the food. It gets so much joy! We have now come to know this topic.

Yes, this, this Father explains. What? Who is the explainer? Hm? This, this; towards whom did He make a gesture by uttering ‘this, this’? Yes, He caused a soul to emerge that ‘this, this’. The Father explains. Why? Doesn’t the Supreme Soul Shiv explain? Arey, He does explain, but He will explain only by entering in the Father of the human world, will He not? So, both of them became one only. This Father explains when He is God. Hm? Yes. We should get the inheritance, the inheritance of heaven from God. Hm? If He is God, then we should get inheritance of which place? Hm? The inheritance of heaven (swarag). What is meant by swa? Swa means soul. Golden Age means went. When the soul went into soul consciousness, then it enjoys heaven. And that God belongs to everyone. It is not as if He belongs to the deities and not to the demons, the worms and insects. No. God belongs to everyone. So, we all should get some inheritance, shouldn’t we? Yes. Some. Why some? Why not everything? Arey, we will achieve the attainments in accordance with the company that we keep. If we keep the company of the highest on high, then we will achieve maximum attainments from the highest on high.

So, the inheritance is of God. Whose inheritance is it? Hm? Is it of a wealthy person? Arey, those Tatas and Birlas who are said to be Gods in India, hm, whom do these people living in a democracy consider being Gods? Those who sit on big, high seats as Mantris, Mahamantris (ministers), what do they think - Who is our God? The one who gives them money to fight elections is our God. Hm? Is it not? The kingship of votes is run through notes, isn’t it? Yes. So, they have been named in the scriptures as Dhritrashtra. Dhrit means ‘inculcated’. And what? Raashtra means they kept under their armpit the entire wealth and property of the raashtra, i.e. country. So, what will they be called? Will they not be called Dhritrashtra? Dhritrashtra. Yes. So, they are their Gods. Who? Dhritrashtra. And who is the God of you children? The God of you children is not that wealthy person with physical wealth. He is wealthy in terms of which wealth? Hm? He is wealthy with the wealth of Godly knowledge. He is wealthy with inexhaustible knowledge. And that wealthy one with inexhaustible knowledge is not a point, incorporeal, air. No. He too enters in a corporeal human body, in a permanent Chariot and yes, what does He become? God. Does the entire world remember that God in an incorporeal form or in a corporeal form? The souls belonging to the other religions in the entire world remember Him in an incorporeal form. And you children, the deity souls consider the one with both corporeal and incorporeal form as God. Hm?

So, that is God’s inheritance. Yes, the creator of the world. Hm? Or the creator of heaven. But how will He give the inheritance of heaven to everyone? Hm? How will He give? Hm? The name itself is swarg (heaven). He should make the stage of his soul through practice that I am a point of light, incorporeal soul, point of light; he should firm up through such practice. What should he firm up? That what should come to his mind continuously? The body should not come to the mind. The point of light soul should come to the mind. So, they become residents of heaven. So, tell, will only those who make purusharth of being in soul conscious stage, obtain the inheritance of heaven or will He give to everyone? Hm? Will He give to the worms and insects, animals and birds? Arey, they do not have mind and intellect itself. They do not accord value to the knowledge, to God’s knowledge at all. They cannot understand at all. Yes, even in this human world, those human beings who are not violent, are deity souls, are givers of happiness, they get inheritance. As regards those who are violent and give only sorrows through the body, through the mind, through time, through contacts, relatives’ power, will they get the inheritance of heaven? Will they get? How can they get?

So, it was told – So, those who have the right to obtain, those who have made purusharth, those who have made purusharth have the right. They definitely have the right. But how can He give to everyone? Those who do not make purusharth at all, do everything for the sake of the body only; hm? For the sake of the body or for the sake of the soul (purush)? What is meant by puru? Purush means soul. For the sake of soul. So, that account is also required, isn’t it children? What account? That for the sake of the body; when God, the Father comes, when the inexhaustible stock house of knowledge comes and distributes the inexhaustible store house, then how much did they inculcate it? Hm? Did they inculcate it, did they devote more time to it, did they invest more body, mind and wealth in it or did they invest more of it in their own Chariot, in selfishness? Isn’t that account required? That account is required, isn’t it children? Seventh page of the morning class dated 13.11.1967. So, the Father sits and explains that account. What has been said? Who explains? Hm? Who explains? The Father sits and. Which Father? Is it the worldly Father of birth by birth or the fathers in the form of founders of religions or even the Father of the founders of religions, Aadam who explains? Hm? Aadam also explains only when Father Shiv enters in the permanent Chariot of Aadam; then it will be said that yes, they are two unlimited fathers – One is the Father of souls, the Father of incorporeal souls, the incorporeal Father. And the Father of the corporeal human world, who is called Aadam, Adam, Aadi Dev. So, both of them are one only, aren’t they? It is when both of them enter in the same body. The two fathers sit and explain that account.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2805, दिनांक 28.02.2019
VCD 2805, dated 28.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2805-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-21.20
Time- 00.01-21.20


प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – कि तुम बच्चे तो ट्रस्टी हो ना। ट्रस्टी को सेठ पैसा देंगे तो काम चलेगा। नहीं तो काम कैसे चलेगा? तो ये ब्रह्मा भी ट्रस्टी है। और नंबरवार जो भी ब्रह्मा नामधारी हैं ट्रस्टी हैं। बच्चों को सुनाया है शिवबाबा का भंडारा भरपूर है। ये बाबा ट्रस्टी है ब्रह्मा बाबा क्योंकि ट्रस्टी हुआ ना सच-सच। तो है भी ऐसे ही बरोबर ट्रस्टी यानि इनका तो कुछ भी नहीं है बिल्कुल भी। जब अपना सब कुछ दे दिया तो इनका कैसे हुआ? तो इनको तो फिर कोई चीज़ याद भी नहीं पड़नी चाहिए। क्या? तन दिया, धन दिया, हँ, मन के संकल्प दिये, तो जो संकल्प बाप चलाना चाहते हैं वो ही चलाएं ना श्रीमत के अनुकूल। कुछ भी याद नहीं पड़ना चाहिए श्रीमत के विपरीत। समझा ना?

ये क्या है? ये तो शिव बाबा का है। अब हमारा तो कुछ भी नहीं है। हँ? किसने कहा? हँ? ब्रह्मा बाबा ने कहा हमारा तो कुछ भी नहीं है। बाबा को दिया तो दिया। कोई भी चीज़ हमारा कुछ भी नहीं। अब हम तो ऐसे समझें कि हम अकेला आया है, अकेला आए हैं, आत्मा अकेली आई है ना। आत्मा जाने। तो जानती है आत्मा कि जाने का है। इसलिए हम अकेला बनने के लिए याद करते रहते हैं बाप को। हँ? जितना बाप को याद करेंगे तो प्रैक्टिस पक्की होती जावेगी। अकेले होते जावेंगे। सब भूल करके अकेले। 13.11.67 के प्रातः क्लास का आठवां पेज। फिर रोज़-रोज़ समझाते रहते हैं बच्चों को – अरे भाई ये सारी दुनिया को अब भूल जाने का है। हँ? ये बेहद का सन्यास है। तो इस दुनिया को भूलते जाओ, भूलते जाओ, भूलते जाओ। बाकि आत्मा समझते जाओ। और ऐसे तो तुम सच-सच आत्मा ही थे ना। और रहने वाले भी तुम आत्मलोक के। हँ? तुम भी तो दूरदेश के रहने वाले हो ना। यहाँ आए हो इस देश में। पहले तो अपने देश में आए थे। कहाँ? नई दुनिया में। हँ? राज्य करने के लिए आए थे। हाँ। वो राज्य, जहाँ दुख का नाम-निशान नहीं था। पीछे वो पराया देश आया। किसका? हँ? पराया माने; पराया माने पर का। अपना नहीं कहेंगे। पर माने? पर माने प्रकृति। हँ? स्व माने आत्मा। प्रकृति क्या? ये जो पांच तत्वों का जो शरीर हैं ना, ये क्या है? प्रकृति है। प्रकृति का ये संघात है। तो ये भी पराया हुआ।

अब देखो ये फारेनर आ गए देखो। कौनसी तरफ इशारा किया? अरे, इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट ये क्या हैं? फारेनर हुए ना। तो सबसे दुश्मन तो फारिनर। हँ? सबसे दुश्मन फारेनर। बाप समझाते हैं ना इनको। दुनिया तो कोई नहीं जानती है कि ये रावण कोई हमारा दुश्मन है। और हम हैं रावण के राज्य में। तो दुनिया में कोई की बुद्धि में ये है कि हम रावण राज्य में हैं? नहीं। देखो, जब कहते भी हैं तुम रावण सम्प्रदाय और राम राज्य में जाने वाले हो, हँ, तो वो बिगड़ पड़ेंगे। हँ? कौन बिगड़ पड़ते हैं? अरे, यही कांग्रेसी। हँ? काहे की रेस? कांग्रेसी काहे की रेसी? कांव-कांव की रेसी। बिगड़ पड़ते हैं। कांव-कांव करके किसको बुलाते हैं? हँ? वो ही जो फाइव स्टार होटल खोले हुए हैं। आओ कांव-कांव तुम भी आओ। बोलते हैं - हमको रावण क्यों कहते हो? तो जो ब्राह्मण बच्चे चुस्त होंवें, बोलें - वाह, तुमको एम.पी. कृपलानी, फलाना, टीरा जो कहते हैं। अरे, ये सभी रावण राज्य है। उनको कुछ नहीं कहते हो। हँ? हमको कहते हो। अरे, हमको रावण राज्य क्यों कहते हो? क्योंकि सभी कहते तो हैं ना बाहरवाले। हँ? सभी बहुत कहते हैं - ये रावण राज्य है। ये तो मुख से बहुतों को निकलता ही रहता है। इसलिए वो कहते हैं ये रावण राज्य को उखाड़ देना चाहिए, उड़ा देना चाहिए। क्यों? रावण ने क्या किया? हँ? क्या करता है? पराई स्त्री को, हाँ, कंट्रोल में करता है। तो यथा राजा तथा? तथा प्रजा हो जाती है। तो ये करना चाहिए। इनको उड़ाय देना चाहिए।

सो तो ज़रूर आखरीन में ये सिविल वार तो होनी ही है। सिविल वार माने क्या होता है? अंदर ही अंदर, हाँ, अंदर ही अंदर, ऊपर से पता नहीं चलता कि कोई वार हो रही है। अंदर ही अंदर युद्ध चलता रहता है। तो बताया – सिविल वार कहते हैं। क्या? कि आपस में लड़ाई-झगड़ा। अब ये तो ज़रूर यहाँ होगा। हँ? होएगा ना। क्योंकि ये भारत ही एक ऐसा देश है। कैसा? और इसकी राजधानी भी ऐसी ही है। कैसी? जो सबको अड्डा दे देते हैं। क्या? दिल्ली की राजधानी में देखो, हाँ, क्रिश्चियन्स भी खूब बड़ी तादाद में जुटे हुए हैं, मुसलमान भी जुटे हुए हैं, सिक्ख भी जुटे हुए हैं। हैं ना? हाँ। तो सबको अड्डा मिला हुआ है। कोई भी होवे। मुसलमान होवे, फलाना होवे, टीरा होवे। कोई भी आकरके यहाँ रहे। क्यों? मातृ प्रधान देश है ना। तो माता की गोद में सब; सबने अपना मनमाना राज किया, मनमाना राज्य किया। हँ? खून की नदियां बहाईं या नहीं बहाईं? बहाईं। हाँ। तो ये सब करना चाहिए। हँ? सिविल वार कहती है, आपस में लड़ाई-झगड़ा जरूर होना चाहिए क्योंकि यहाँ तो सबको अड्डा देते ही हैं ना। मुसलमान होवें, फलाना होवें। कोई को मना किसी को भी नहीं है।

तो देखो, यहाँ सभी जाते हैं। हँ? कोई भी ऐसे नहीं यहाँ होते हैं कि तुम जाओ, जैसे सीलोन वाले ने बोल दिया, हँ, ये तमिलियन यहाँ से जाओ। हाँ। तुम जाओ अपने घर। सब जाओ। यहाँ से रवाना हो जाओ। अब देखो, वो जकार्ता में वो है ना वहाँ इंडोनेशिया से, बोले जाओ। तुम सब अपने-अपने घर में जाओ। बर्मा से भी अपने घर में जाओ। तो देखो ऐसे-ऐसे करते रहते हैं। तो जब लड़ाई लगेगी तो फिर लड़ पड़ेंगे आपस में ही। सो तो तुम बच्चों ने देखी भी है, समझा भी है। अभी समझ भी गए हो ना कि ये यवन हैं मुसलमान। और ये हिंदुओं की लड़ाई लगी थी। ये पार्टीशन में, हँ, पार्टीशन से पहले लड़ाई थी थोड़ेही? फिर? फिर लड़ाई हुई। यहाँ था क्या? यहाँ तो मुसलमानों का ही राज्य था। था भले। जब लड़ाई चलती है पीछे तो वो भी खतम हो गए। मुसलमानों का राज्य भी खतम हो गया ना। खतम हो गया। हँ? फिर भी तो देखो मुसलमानों का भी राज्य रह गया ना कुछ भी। रहा? ऐसे तो नहीं रहा कि मुसलमानों का राज्य नहीं रहा तो मुसलमान नहीं रहे। मुसलमान रहे ना। सभी मुसलमानों का। देखो सबसे पहले ते पहले नंबर में तो निजाम का राज्य रहा कि नहीं रहा? हाँ। ये भारत में सबसे जास्ती साहूकारों के साहूकार निजाम मुसलमान। क्योंकि उनके पास पैसे बहुत रह गए। तो वो भी तो रह गए ना इसमें। सब हिंदुस्तान में रह गए। तो रह गए तो पिछाड़ी में तो नहीं होंगे। पिछाड़ी में तो, हँ, भारत में से क्या होगा फिर? भारतवासी ही रहेंगे कि ये जो बाहर से आए हैं, राज्य किया, वो रहेंगे? पिछाड़ी में तो मार-पीट कर-करके फिर कौन रहेंगे? अरे, ये मुसलमान रहेंगे? नहीं। फिर तो बाकि जाकरके देवता ही रहेंगे। कहाँ? भारत में।

ये समझा तो है ना। इस सारे चक्कर को तुम बच्चों ने समझ तो लिया ना। सृष्टि के आदि, मध्य, अंत को तो बहुत जाना हुआ भी है। जैसे बॉम्बे में महाराष्ट्रियन कहते हैं। हँ? महाराष्ट्र में हमारा राज्य होवे। गुजराती कहेंगे गुजरात में हमारा राज्य होवे। तो लड़ पड़ते हैं एक-दो में। क्योंकि बच्चे बहुत हो गए ना। तो अभी बाबा आए हैं सबका बैठकरके फैसला करने। क्या फैसला कर देते हैं? हँ? क्या फैसला कर देते हैं? चलो, लड़ो, मरो, खतम हो जाओ। ये फैसला हुआ? पीछे बाकि आकरके देवी-देवता रहेंगे। जो तुम देवी-देवता बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। सो भी तुम जानते हो कि हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। हँ? किस बात का? मनुष्य से देवता बनने का। कहते भी हैं ना मनुष्य से देवता किये करत न लागी वार।

तो वो माला बनेगी। हँ? राजाई में रहेंगे तो। लेकिन पहले माला बनेगी या नहीं बनेगी? माला माने? हँ? जो राजा बनने वाले हैं या राजघराने में आने वाले हैं, हँ, या नंबर वन माला है, नंबर टू माला है उनका माला रूपी संगठन बनेगा या नहीं बनेगा? बनेगा। आठ की माला बनेगी। हँ? 108 की माला बनेगी। कब बनेगी? हँ? कब बनेगी? अरे, कुछ बताया कि नहीं? बनेगी, ऐसे करके छोड़ दिया क्या? हाँ। 28 में 8 की माला बन जाएगी? कि 108 की बन जाएगी? अच्छा? बोला - ये तो है ना बच्चे। बच्चों को तो ये समझाय दिया है कि ये जो, हँ, भारतवासी खास माला सिमरते हैं, सिमरते हैं ना? ऐसे तो सभी धरमवाले माला तो सिमरते हैं ना। उनकी अपनी-अपनी माला होती है ना। हां। तो दूसरा कोई थोड़ेही जानते हैं कि ये माला क्यों सिमरी जाती है सिवाय तुम बच्चों के। क्यों सिमरन करते हैं? सिमरन करना माने? स्मरण करना, याद करना। एक-एक मणके को, हँ, बुद्धि रूपी हाथ में लेके याद करते जाते हैं। तो भक्तिमार्ग में तुमको मालूम, मालूम पड़ा है कि ये माला किसकी बनी हुई है? हँ? किसकी बनी हुई है? जो राजयोग सीखकरके राजाई पाते हैं, नंबरावार पुरुषार्थ अनुसार उनकी माला बनी हुई है। दुनिया में तो कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो तुमको ये बात बताय देवे कि माला किसकी बनी हुई है? और हम इस माला को क्यों सिमरते हैं? माला के मणकों को क्यों स्मरण करते हैं? उन्हें थोड़ेही मालूम है कि ये माला के गोल-गोल मणके, गुरवे ये कोई आत्मा की यादगार हैं? और वो भी नबंरवार हैं। कोई ऊँचे, कोई नीचे, कोई दाएं के, कोई बाएं के, कोई मध्यम। बाकि इन बातों को एक भी मनुष्य नहीं जानते। (क्रमशः)

A morning class dated 13.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle of the seventh page on Monday was that you children are trustees, aren’t you? Trustee can work if the prosperous person (seth) gives money. Otherwise, how can the work be managed? So, this Brahma is also a trustee. And all those who are numberwise titleholders of Brahma are trustees. Children have been told that ShivBaba’s stockhouse (bhandara) is full. This Baba, Brahma Baba is a trustee because he is truly a trustee, isn’t he? So, he is rightly a trustee, i.e. nothing belongs to him, nothing at all. When he gave all his belongings, then how does it belong to him? So, this one should not remember anything. What? You gave the body, you gave the wealth, hm, you gave the thoughts of the mind; so, you should create thoughts in the same way as the Father wants you to create in accordance with Shrimat. Nothing against the Shrimat should come to your mind. Did you understand?

What is this? This belongs to ShivBaba. Now nothing belongs to us. Hm? Who said? Hm? Brahma Baba said that nothing belongs to me. When I gave to Baba, then I gave. Nothing belongs to me. Now we should think that I have come alone, we have come alone; the soul has come alone, hasn’t it? The soul knows. So, the soul knows that it has to go. This is why we keep on remembering the Father to become alone. Hm? The more we remember the Father the practice will go on becoming strong. You will go on becoming single. Forget everything and become alone. Eighth page of the morning class dated 13.11.67. Then He keeps on explaining to the children daily – Arey, brother, now this entire world has to be forgotten. Hm? This is unlimited sanyas (renunciation). So, go on forgetting, go on forgetting, go on forgetting this world. And go on considering yourselves to be souls. And you were in reality souls only, weren’t you? And you are residents of the Soul World. Hm? You are also residents of the distant country, aren’t you? You have come here to this country. First you had come to your country. Where? To the new world. Hm? You had come to rule. Yes. That kingdom where there was no name or trace of sorrows. Later that alien rule arrived. Whose? Hm? Alien means; Alien means belonging to others. It will not be called one’s own. What is meant by alien (par)? Par means prakriti (nature). Hm? Swa means soul. What is prakriti? What is this body made up of the five elements? It is prakriti. This is a combination of prakriti. So, this is also alien.

Now look, these foreigners came, look. Towards whom was a gesture made? Arey, what are all these Ibrahim, Buddha, Christ? They are foreigners, aren’t they? So, the most enemies are the foreigners. Hm? The biggest enemies are the foreigners. The Father explains these [topics], doesn’t He? The world doesn’t know that this Ravan is our enemy. And we are in the kingdom of Ravan. So, is it in the intellect of anyone that we are in the kingdom of Ravan? No. Look, even when you say that you belong to the Ravana community and we are going to go to the kingdom of Ram, hm, then they will get angry. Hm? Who gets angry? Arey, these very Congresssmen (kaangresi). Hm? Race of what? Kaangresi; whose resi (racers)? Racers of kaanv-kaanv (crowing). They get angry. Whom do they call by crowing? Hm? The same persons who have opened five star hotels. Come, kaanv-kaanv, you too come. They say – Why do you call us Ravan? So, the Brahmin children who are active will say – Wow! You are called M.P. Kripalani, etc. etc. Arey, all these belong to the kingdom of Ravan. You don’t say anything to them. Hm? You tell us. Arey, why do you call us kingdom of Ravan? It is because everyone, the outsiders say, don’t they? Hm? Everyone does say a lot – This is a kingdom of Ravan. Many people keep on uttering this from their mouths. This is why they say that this kingdom of Ravan should be uprooted, made to vanish. Why? What did Ravan do? Hm? What does he do? Yes, he controls unrelated woman. So, as is the king, so is? So the subjects become. So, you should do this. You should make these to vanish.

So, definitely ultimately this civil war is bound to happen. What is meant by civil war? Inside itself, yes, inside itself; from the surface it does not appear as if a war is taking place. The war keeps on taking place within. So, it was told – It is called civil war. What? Fighting and quarreling with each other. Well, this will definitely take place here. Hm? It will take place, will it not? It is because this Bhaarat alone is such country. How? And its capital is also like this only. How? They give shelter to everyone. What? Look at the capital city of Delhi, yes, there are Christians also in large numbers, there are Muslims also, there are Sikhs also. They are present, aren’t they? Yes. So, everyone has got shelter. Be it anyone. Be it the Muslims, be it anyone. Anyone may come and live here. Why? It is a matriarchal country, isn’t it? So, everyone in the lap of a mother; everyone ruled arbitrarily, everyone ruled arbitrarily. Hm? Did they cause the rivers of blood to flow or not? They did. Yes. So, you should do all this. Hm? Civil war says that there should definitely be fights and quarrels with each other because here everyone is given shelter, isn’t it? Be it Muslims or anyone. Nobody is prohibited.

So, look, all go here. Hm? There is no one here that you go, for example, those from Ceylon said, hm, these Tamilians should go from here. Yes. You go to your home. All of you go. Start moving from here. Well, look, those people are there in Jakarta, they said, leave Indonesia. You all go to your homes. You also go from Burma to your home. So, look, they keep on doing like this. So, when the war breaks out, then they will start fighting with each other. So, you children have seen as well as understood. Now you have also understood that these Yavans are Muslims. And they had fought with these Hindus. During this partition, hm, was there any fighting before the partition [of India]? Then? Then the fight started. What existed here? Here it was a rule of the Muslims only. Although it was there; Later, when the fight starts, then they too perished. The rule of the Muslims also ended, didn’t it? It ended. Hm? However, look, the rule of the Muslims also survived to some extent. Did it survive? It didn’t happen that the rule of Muslims did not survive; so, there were no Muslims. Muslims did survive, didn’t they? All the Muslims. Look, first of all, at the first number did the rule of Nizam continue or not? Yes. Muslim Nizam was the most prosperous in India. It is because they had a lot of money. So, they too survived in this. They all remained in India. So, when they remained, they will not remain in the end. In the end, hm, what will happen from India? Will the residents of India alone survive or will these who have come from outside, ruled, survive? In the end, who will survive after the beatings? Arey, will these Muslims survive? No. Then only the deities will survive. Where? In India.

You have understood this, haven’t you? You children have understood this entire cycle, haven’t you? You have also known a lot about the beginning, middle and the end of the world. For example, the Maharashtrians say in Bombay. Hm? There should be our rule in Maharashtra. Gujaratis will say that there should be our rule in Gujarat. So, they start fighting with each other. It is because children, they have grown in numbers, haven’t they? So, now Baba has come to sit and decide about everyone. What decision does He give? Hm? What decision does He give? Okay, you fight, die, perish. Is this the decision? Later deities will come and live. You are making purusharth to become those deities. That too you know that we are making purusharth. Hm? For what? To become deities from human beings. People also say that it does not take much time to become deities from human beings.

So, that rosary will be formed. Hm? If you remain in kingship. But will the rosary be formed first or not? What is meant by rosary (mala)? Will the rosary-like gathering of those who are to become kings or those who are to be included in the royal clan, or the number one rosary, number two rosary be formed or not? It will be formed. The rosary of eight will be formed. Hm? The rosary of 108 will be formed. When will it be formed? Hm? When will it be formed? Arey, was anything mentioned or not? It will be formed; did He leave saying this? Yes. Will the rosary of 8 be formed in [20]28? Or will the rosary of 108 be formed? Achcha? It was said – It is there, isn’t it children? Children have been explained that this rosary that the residents of India especially feel; they feel the rosary, don’t they? In a way people of all the religions feel the rosary, don’t they? They have their individual rosaries, don’t they? Yes. So, does anyone else except you children know that why this rosary is felt? Why do they feel? What is meant by feeling the rosary (simran karna)? To remember. They go on remembering each bead by taking them in the intellect-like hand. So, you have come to know on the path of Bhakti that this rosary is formed of what? Hm? It is made up of what? The rosary is formed of those who learn rajyog and achieve kingship numberwise as per purusharth. There is no human being in the world who could tell you that whose rosary is it? And why do we feel the rosary? Why do we remember the beads of the rosary? Do they know that these round, round beads of the rosary, are they memorials of any soul? And they too are numberwise. Some upper, some lower, some of left side, some of right side, some of middle. But not even a single human being knows about these topics. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
सीडी 2805, दिनांक 28.02.2019
VCD 2805, dated 28.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2805-Bilingual-Part-2

समय- 21.21-39.20
Time- 21.21-39.20


अब तुम बच्चे तो सब समझ गए हो। हँ? तुम बच्चे। ये बच्चे नहीं। ये बच्चे और तुम बच्चे क्या हुआ? ये माने? जिनको बाजू में रख दिया उनको कहेंगे ये। और तुम माने? तुम माने जो सन्मुख बैठे तो तुम। अच्छी तरह से समझ गए हो कि ऊपर में है बाबा। हँ? ऊपर में बाबा है या बाप है? कौन है? हँ? माला में ऊपर में कौन है? हाँ, जो रुद्र माला बनती है, ऊपर में फूल दिखाते हैं। उसको मणका नहीं दिखाते हैं। क्यों? क्योंकि वो तो जो भी आत्माएं हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली उन सबके बीच में सबसे जास्ती हल्की-फुल्की है या भारी है? हाँ। हल्की-फुल्की आत्मा है। प्रवेश करती है तो पता नहीं चलता, निकल जाती है तो भी पता नहीं। और बाकि आत्माएं? बाकि आत्माएं तो सूक्ष्म शरीरधारी भी बनती हैं। तो जो सूक्ष्म शरीरधारी बनती हैं, ज्यादा पाप करती हैं, तो वो प्रवेश करती हैं, तो चेहरा-मोहरा भारी हो जाता है।

तो ऊपर में है बाबा। कौनसा बाबा? क्या कहेंगे? ऊपर में है शिवबाबा। और पीछे तो फिर युगलों की माला। उसमें शिवबाबा नहीं है। उसमें क्या है? हँ? उसमें युगल मणका ऊपर है। बाकि 108 मणके नीचे हैं। वो युगल मणका ऊपर क्यों दिखाया गया? इसलिए दिखाया गया कि ये माला के अंदर जो युगल मणका दिखाया गया ये इस युगल मणके को फालो करने वाले सब युगल हैं। हँ? वो कोई भी वो नहीं हैं जो रुद्रमाला में दिखाया गया सिंगल-सिंगल। हाँ। क्योंकि पीछे तो युगल की माला बनेगी ना। युगल ही हैं प्रवृत्ति मार्ग वाले। देवताएं तो प्रवृत्तिमार्ग वाले ही होते हैं ना। हँ? प्रवृत्ति को निभाने वाले होते हैं या प्रवृत्ति को तोड़ देते हैं? हँ? क्या करते हैं? प्रवृत्ति को निभाते हैं। हाँ। तुम सतयुग में जावेंगे, त्रेता में जावेंगे, वहाँ प्रवृत्ति को निभावेंगे ना। कितने जन्म? हँ? बताया - कितने जनम? 21 जनम के लिए तुमको पक्की प्रवृत्ति निभानी है। तो उसके लिए क्या करें? कहते हैं अपन को आत्मा समझो। क्योंकि प्योर होकरके, पवित्र होकरके ही तुम आत्मा को जाना है। इस आत्मा में देहभान का कोई भी खाद पड़ा रहेगा, कोई भी धर्म का या देवी देवता सनातन धर्म का भी; खाद पड़ती है कि नहीं उनमें? हँ? सतयुग में भी खाद पड़ती है कि नहीं? हाँ, नहीं पड़ती? अरे, ज्ञानेन्द्रियों की खाद पड़ती है ना। ज्ञानेन्द्रियों में भी ऊँचे ते ऊँची और नीची इन्द्रियां भी होती हैं। तो नीची इन्द्रियों का सुख लेने वाले बाद में आते हैं या पहले आते हैं? हँ? बाद में आते हैं। तो जो बाद में आते हैं और ज्यादा संख्या में आते हैं तो उनके संग का रंग लगता है। तो कुछ न कुछ नीचे आत्मा गिरती तो है ना। लेकिन अभी तो तुम सबको पवित्र होकरके जाना है। कैसा होके जाना है? हँ? कोई भी धर्म का, कोई भी संग का रंग न रहे। एकदम पवित्र। तो अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो फिर सज़ाएं खाएंगे। सज़ाएं खाकरके जाना होता है। हँ?

तो मीठे-मीठे सीकिलधे यानि 5000 वर्ष के बाद और बाबा घड़ी-घड़ी कहेंगे 5000 वर्ष के बाद; हँ? ये 5000 वर्ष को घटाएंगे नहीं कि कोई जल्दी आ जाएंगे। नहीं। फिर से आय करके मिले रूहानी बच्चों के प्रति रूहानी बाप का और रूहानी बाप ही तो पढ़ाते हैं। हँ? जिस जिस्मानी बाप में मुकर्रर रूप से भी पढ़ाते हैं या टेम्परेरी शरीरधारियों में भी पढ़ाते हैं, तो पढ़ाने वाला है कौन? एक ही बाप है ना। आत्माओं का बाप ही पढ़ाते हैं। तो वो भी समझते हो बरोबर क्योंकि आत्मा ही तुम हो। क्योंकि आत्मा को ही पढ़ाते हैं।

अभी देखो तुम भी ज्ञान के सागर बन रहे हो ना। हँ? सारा ज्ञान किसमें बैठा? कहेंगे नदियों में बैठा, सरोवरों में बैठा, झीलों में बैठा या सागर में बैठा? सारा ज्ञान तो एक सागर में ही बैठता है। हाँ। अब ये किसने कहा? कौन कहते हैं ऐसे-ऐसे कि सारा ज्ञान एक सागर में ही बैठता है? हँ? न पहाड़ों में बैठता है। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिव में बैठता है? हँ? हां, शिव कहते हैं सुप्रीम सोल बाप कहते हैं कि सारा ज्ञान तो सागर में बैठा। बैठा? पूछा। हँ? ये किसने? पूछा है। ऐसे-ऐसे पूछा है। तो ये आत्मा कहती है ना, हँ, कि हाँ, मुझे इतनी छोटी सी बिन्दी में ये जो आपका इतना सारा अखूट ज्ञान का भंडार है वो बुद्धि में है आत्मा में। जो हम साथ में ये संस्कार ले जाएंगे। कहाँ ले जाएंगे? हँ? ये अखूट ज्ञान के भंडार के संस्कार साथ में ले जावेंगे। कहाँ ले जाएंगे? हँ? अरे, नई दुनिया में ले जावेंगे? हाँ, वहाँ तो सार रूप में ले जावेंगे। बीजरूप में ले जावेंगे। बीज सार को कहा जाता है ना। हाँ। फिर वो संस्कार कहाँ विस्तार को पाएंगे? हाँ, कहेंगे द्वैतवादी द्वापरयुग में फिर विस्तार में जाएंगे। परन्तु वहाँ शिव बाप तो, शिव बाप तो होगा नहीं। तो क्या अंतर पड़ेगा? कुछ न कुछ अपनी मनमत मिक्स करेंगे या नहीं करेंगे? करेंगे।

तो देखो शरीर तो सबके खतम हो जाते हैं ना। यहाँ कोई को शरीर रह जाता है क्या? नहीं। तो ये घड़ी-घड़ी, घड़ी-घड़ी अपने से बात करनी चाहिए। करनी पड़े। ये हुई अपने से आपे ही बातें करना। और फिर अंदर ही अंदर विचार सागर मंथन करना। नहीं तो अपने आप से चरिये-खरिये पागल लोग बात करते हैं। अब ये मालूम है तुम लोगों को। चरिये लोग जो होते हैं वो आपे ही आपे बक-बक करते रहते हैं। कहीं भी जाएंगे कुछ न कुछ बक-4 करते ही जाएंगे। हँ? दीवाल पर लिखते जाएंगे। ये दीवाल होगी, ये होगा, वो होगा। ये पता नहीं क्या बोलते जाएंगे। और जितना भी रास्ता चलते जाएंगे सारा रास्ता बोलते चले जाएंगे। हाँ, कि चरिये लोग ऐसे विचार-सागर-मंथन चरिये बनके करते हैं। क्या? अभी तुमको कुछ बोलने का नहीं है। क्या? अंदर ही अंदर विचार-सागर-मंथन करना है। वो चरिये-खरिये तो बाहर से मुख से बहुत बोलते जाते हैं। हँ? वो तो मुख से बोलते हैं। और तुमको तो कुछ बोलने का ही नहीं है। सारा सब कुछ तुम्हारे दिल में रखा हुआ है।

अभी देखो सारा झाड़ तुम्हारी बुद्धि में खड़ा हो गया। हँ? सारा झाड़ माने? सब धर्मों की टाल-टालियां दाईं ओर की, बाईं ओर की। हँ? और तुम्हारा अपना मुख्य तना। वो भी बुद्धि में आया ना। हाँ, सारा ख्याल आ गया। ऊपर से लेकरके और स्थूल के 84 जन्म तक। तुमको सारा बुद्धि में बैठ गया। सतयुग से लेकरके कलियुग के अंत तक। कोई भी तुम्हारे से बोलेंगे - तुम रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अंत को जानते हो? तो तुम तो फट से सुना देंगे। और कह देंगे कि हां हम जानते हैं। जानते भी हैं और हम बताय भी सकते हैं नटशैल में। क्या? क्योंकि वो ऋषि-मुनि, सन्यासियों ने तो सृष्टि की आयु लाखों वर्ष बताय दी। तो वो तो बताय ही नहीं सकते। हँ? और यहाँ तो हमको बाप ने बताया है कि ये चारों युगों का, चार सीन का जो ड्रामा में बेहद में चक्कर है वो टोटल 5000 वर्ष का है। तो पीछे कोई अच्छा बताय सकते हैं। कोई तुम बच्चों में फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार कम बताय सकते हैं। पर बताय तो सकते हैं ना।

और ये तो जानते हो कि आगे हम ये नहीं थे। क्या? ये क्या? आगे हम ये नास्तिक नहीं थे। क्या थे? हँ? आगे हम आस्था रखने वाले, श्रद्धा-विश्वास रखने वाले थे। हँ? कहेंगे, बाप कहेंगे - तुम आस्तिक भी नहीं थे। क्या? आस्तिक थे? हँ? आस्तिक किन्हें कहा जाता है? जो बाप को जानते हैं कि बाप प्रैक्टिकल में इस दुनिया में किस मुकर्रर रथ में पार्ट बजाय रहा है पुरानी दुनिया को पलट करके नई दुनिया बनाने का। तो जो जानते हैं उसको, बाप को जानते हैं तो आस्तिक और बाप को प्रैक्टिकली नहीं जानते हैं तो? तो नास्तिक। तो कहेंगे, हँ, आगे हम नास्तिक थे, आस्तिक नहीं थे। अभी भी? अभी भी कोई कहेंगे; क्या कहेंगे? हम आस्तिक हैं कि नास्तिक हैं? हँ? क्योंकि दुनिया सारी नास्तिक है। और तुम थोड़े से बच्चे आस्तिक। ब्राह्मण ही हैं ना। ब्रह्माकुमार-कुमारी। तो सिर्फ ब्राह्मण ही आस्तिक हैं। हँ? किनको कहेंगे ब्राह्मण? हँ? यहाँ तो 4-5 ब्रह्मा के मुख दिखाय दिये। तो पक्का ब्राह्मण किसको कहें? हँ? तो कहेंगे, हाँ, नंबरवार ब्राह्मण हैं। भक्तिमार्ग में भी कहते हैं ना। ब्राह्मणों की नौ कुरियाँ होती हैं। नौ ऋषि-मुनियों के आधार पर नौ कुरियाँ बनाई हुई हैं। तो देखो, नंबरवार क्यों कहा? नंबरवार ब्राह्मण कोई फर्स्ट कुरी के कोई लास्ट कुरी के, कोई मध्यम कुरी के। क्योंकि फर्स्ट कुरी में जाने के लिए, आदि नारायण के राज्य में जाने के लिए, हँ, विष्णु लोक में जाने के लिए, वैकुंठ में, दैवी गुण तो बहुत अच्छी तरह से चाहिए। क्या? कैसा दैवी गुण? कलाओं में बंधे हुए दैवी गुण? हँ? 16 कला संपूर्ण दैवी गुण? नहीं। कलाओं से भी अतीत। जैसे सूर्य होता है ना। सूर्य की कलाएं होती हैं? होती हैं? नहीं होती हैं। वो तो कलाओं से भी परे। तो ऐसे दैवी गुण, हँ, बच्चों में कमी रहती है। बच्चों में बहुत ही कमी रहती है।

फिर भी कहेंगे टाइम तो पड़ा है ना। वो तो 67 की मुरली है ना सिक्स्टी सेवन की। तो कहा टाइम तो पड़ा है ना। फिर भी भले टाइम पड़ा है, पुरुषार्थ करके जितना हो सके इतना दैवी गुण धारण करना चाहिए। हँ? जितना उतना क्या? हँ? नौ कुरी के ब्राह्मण हैं तो नौ कुरी में लास्ट कुरी में तो कोई नहीं जाना चाहेगा। हँ? क्योंकि लास्ट कुरी के बाद तो फिर अंदेशा रहता है कहीं उससे भी बाहर न चले जाएं, नास्तिक न बन जाएं। हाँ। तो पुरुषार्थ करके जितना हो सके नौवीं कुरी से लेकरके आठवीं, सातवीं, जितना ऊपर चढ़ सकें इतना दैवी गुण धारण करना चाहिए। और फिर जो अवगुण हैं; हँ? जब दैवी गुण धारण करेंगे तो अवगुण सारे निकालते जाना चाहिए। अब अवगुण भी धारण रखेंगे और गुण भी धारण करेंगे तो फिर? तो फिर कुछ मिलेगा? हँ? पलड़ा बराबर हो जाएगा। हँ? या हो सकता है अवगुणों का पलड़ा भारी हो जाए। तो कुछ भी नहीं मिलेगा। फिर लाटरी मिलेगी क्या? हँ? नहीं मिलेगी। अच्छा, ऐसे मीठे-मीठे रूहानी पुरुषार्थी बच्चों के प्रति रूहानी बाप व दादा का दिल व जान से, सिक व प्रेम से यादप्यार व गुडमार्निंग। ओमशान्ति। (समाप्त)

Now you children have understood. Hm? You children. Not these children. What is ‘these children’ and ‘you children’? What is meant by ‘these’ (ye)? The one who has been placed in the side will be called ‘these’ (ye). And what is meant by ‘you’? ‘You’ means those of you who are sitting face to face. You have understood very well that Baba is above. Hm? Is Baba above or is Father above? Who is it? Hm? Who is above in the rosary? Yes, in the Rudramala that is formed, a flower is depicted at the top. It is not shown as a bead. Why? It is because among all the souls which play a part on this world stage is it the lightest or the heaviest? Yes. It is a light soul. When it enters, one does not know and even when it departs, then one doesn’t know. And what about the remaining souls? Remaining souls become subtle bodied also. So, when those who become subtle bodied, commit more sins, then, when they enter, then the face becomes heavy.

So, Baba is above. Which Baba? What would you say? ShivBaba is above. And later is the rosary of couples. ShivBaba is not included in it. What is in it? Hm? In it the couple bead is above. The remaining 108 beads are below. Why was that couple bead shown above? It is shown because the couple bead that was depicted in the rosary, all those who follow this couple bead are couples. Hm? None of them are those that have been depicted in the Rudramala as single, single. Yes. It is because later the rosary of couples will be formed, will it not be? The couples themselves belong to the path of household. Deities belong to the path of household only, don’t they? Hm? Do they maintain the household or do they break the household? Hm? What do they do? They maintain the household. Yes. You will go to the Golden Age, you will go to the Silver Age; you will maintain the household there, will you not? For how many births? Hm? It was told – For how many births? You have to maintain the firm household for 21 births. So, what should we do for that? He says – Consider yourselves to be souls. It is because you souls have to depart only after becoming pure. If any mixturity of body consciousness remains in the soul, be it of any religion or even of the Devi-Devata Sanatan Dharma; is mixturity (khaad) added in it or not? Hm? Is mixturity added even in the Golden Age or not? Yes, is it not added? Arey, the mixturity of sense organs is added, isn’t it? Even among the sense organs, there are highest on high and lowest on low organs. So, do those who experience the pleasure of lower organs come later or do they come first? Hm? They come later. So, those who come later and come in higher numbers, then they get coloured by the company. So, the soul falls to some extent or the other, doesn’t it? But now you all have to go after becoming pure. How do you have to go? Hm? There should not be the colour of any religion, any company. Completely pure. So, if you don’t become pure, then you will suffer punishments. You have to suffer punishments and go. Hm?

So, sweet, sweet, seekiladhey, i.e. after 5000 years and Baba will say every moment – After 5000 years; hm? He will not reduce these 5000 years so that someone comes early. No. To the spiritual children who have come to meet once again, from the Spiritual Father and it is the Spiritual Father only who teaches. Hm? The physical Father in whom He teaches in a permanent manner or even if He teaches in the temporary embodied souls, so who is the teacher? It is only one Father, isn’t He? The Father of souls only teaches. So, you understand that as well because you are souls only. It is because He teaches the soul only.

Now look, you too are becoming oceans of knowledge, aren’t you? Hm? In whom did the entire knowledge sit? Will it be said that it sat in the rivers, it sat in the lakes, it sat in the ponds or did it sit in the ocean? The entire knowledge sits only in one ocean. Yes. Well, who said this? Who says like this that the entire knowledge sits in only one ocean? Hm? Neither does it sit in the mountains. Hm?
(Someone said something.) Yes, does it sit in Shiv? Hm? Yes, Shiv says, the Supreme Soul Father says that the entire knowledge sat in the ocean. Did it sit? It was asked. Hm? Who this? It has been asked. It has been asked like this. So, this soul says, doesn’t it that yes, in me, in such a small point, your entire inexhaustible store house of knowledge is in the intellect, in the soul. We will carry this sanskar with us. Where will we carry? Hm? We will carry the sanskar of inexhaustible stock house of knowledge. Where will we take? Hm? Arey, will you carry to the new world? Yes, we will carry there in the essence form. We will carry in seed form. The essence is called seed, isn’t it? Yes. Then where will those sanskars undergo expansion? Yes, it will be said that they will go into expansion in the dualist Copper Age. But Father Shiv, Father Shiv will not be there. So, what will be the difference? Will you mix the opinion of your mind to some extent or the other or not? You will.

So, look, everyone’s bodies perish, don’t they? Does anyone’s body remain here? No. So, you should talk to yourself every moment, every moment like this. You will have to. This is about talking to yourself. And then churning the ocean of thoughts within. Otherwise, it is the mad people who talk to themselves. Now you people know this. The mad people keep on talking on their own. Wherever they go, they will keep on talking something or the other. Hm? They will go on writing on the wall. There will be this wall, this will happen, that will happen. You don’t know what they keep on talking. And throughout the path that they walk, they will keep on talking. Yes, mad people churn the ocean of thoughts like this as mad persons. What? Now you don’t have to speak anything. What? You have to churn the ocean of thoughts within only. Those mad people keep on speaking a lot externally through the mouth. Hm? They speak through the mouth. And you don’t have to speak anything at all. Everything is placed in your heart.

Now look, the entire tree is standing in your intellect. Hm? What is meant by the entire tree? The branches and sub-branches of all the religions on the right side and the left side. Hm? And yours is the main stem. That has also entered the intellect, hasn’t it? Yes, the entire thought has entered. From above and till the 84 physical births. Everything has sat in your intellect. From the Golden Age to the end of the Iron Age. Anyone will tell you – do you know the Creator and the beginning, middle and end of the creation? So, you will narrate immediately. And you will say that yes, we know. We also know and we can even tell in a nutshell. What? It is because those sages, saints, sanyasis have mentioned the age of the world to be lakhs of years. So, they cannot tell at all. Hm? And here the Father has told us that this unlimited cycle of four Ages, four scenes in the drama is of 5000 years in total. So, later someone can tell nicely. Then among you children, some can tell less numberwise as per their purusharth. But they can tell, can’t they?

And you know that earlier we were not this. What? What this? Earlier we were not these atheists. What were we? Hm? Earlier we were the ones who had faith, devotion. Hm? He will say, the Father will say – You were also not theists. What? Were you theists? Hm? Who are called theists? Those who know the Father that in which permanent Chariot is the Father playing the part of transforming the old world to new world in practical in this world. So, those who know Him, those who know the Father are theists and if they do not know the Father practically? Then they are atheists. Then, it will be said that earlier we were atheists, we were not theists. Even now? Even now some will say; what will they say? Are we theists or atheists? Hm? It is because the entire world is atheist. And you few children are theists. You are Brahmins only, aren’t you? Brahmakumar-kumaris. So, only Brahmins are theists. Hm? Who will be called Brahmins? Hm? Here 4-5 heads of Brahma have been shown. So, who will be called firm Brahmins? Hm? So, it will be said, yes, Brahmins are numberwise. Even on the path of Bhakti, it is said, isn’t it? There are nine categories of Brahmins. Nine categories have been formed on the basis of nine sages and saints. So, look, why were they called numberwise? Some numberwise Brahmins belong to the first category, some to the last category, some to the medium category. It is because in order to go to the first category, in order to go to the kingdom of the first Narayan, hm, in order to go to the abode of Vishnu, in Vaikunth, you need to have divine virtues very nicely. What? What kind of divine virtues? Divine virtues bound in celestial degrees? Hm? Divine virtues perfect in 16 celestial degrees? No. Beyond the celestial degrees. For example, there is the Sun, isn’t it? Does the Sun have celestial degrees? Does it have? It doesn’t have. It is beyond celestial degrees. So, children lack such divine virtues. There is a lot of shortcoming in the children.

However it will be said that there is time, isn’t it? That is mentioned in the Murli of 67, Sixty Seven, is’t it? So, it was said that there is time, isn’t it? Then although there is time, you should make purusharth and you should imbibe divine virtues as much as possible. Hm? What is as much, that much? Hm? There are nine categories of Brahmins; so, among the nine categories, nobody would like to go to the last category. Hm? It is because after the last category, then there is a presumption that one may go beyond that, become an atheist. Yes. So, by making purusharth, as much as possible, from ninth category to the eighth, seventh, as high as you could climb, you should inculcate as many divine virtues. And then the vices; Hm? When you inculcate the divine virtues, then you should go on removing all the vices. Well, if you inculcate the vices also and the virtues also, then? Then will you get anything? Hm? The balance will become equal. Hm? Or it may be possible that the side of vices may become heavy. Then you will not get anything. Then will you get the lottery? Hm? You will not get. Achcha, to such sweet, sweet, spiritual, purusharth children, remembrance, love and good morning of the spiritual Father and Dada from the heart and life, love and affection. Om Shanti. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2806, दिनांक 01.03.2019
VCD 2806, dated 01.03.2019
रात्रि क्लास 13.11.1967
Night class dated 13.11.1967
VCD-2806-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.25
Time- 00.01-15.25


आज का रात्रि क्लास है – 13.11.1967. पूछने के पहले जो देही अभिमानी होकरके नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। माना जो आत्मा की स्थिति में नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। बैठे थे। नहीं बैठे थे? (किसी ने कुछ कहा।) एक ही है? अच्छा? बाकि सब ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? हँ? एक ने और मना किया। सिर्फ आज की बात नहीं पूछ रहे। बैठे थे। माना आज बैठे हो या पहले कभी बैठे हों। वो ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? पूछा। ये पक्का निश्चय हुआ कि हम देह नहीं हैं? हँ? हम देह को चलाने वाली ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। हँ?

और वो आत्मा की यादगार भारत में खास कन्याएं-माताएं आज भी लगाती हैं बिन्दी भृकुटि के मध्य में। लगाती हैं ना। हां। ऐसे तो कोई-कोई भाई लोग भी लगाते हैं। हिस्ट्री में तो ये प्रसिद्ध है – जब राजाएं या उनकी सेना, हँ, या सेना के जो भाती होते थे उनके परिवार वाले उनको युद्ध में भेजते थे तो टीका लगाते थे ना। हाँ। कहाँ? नाक के ऊपर? नहीं, भृकुटि के मध्य में टीका लगाते थे ना। हाँ। कि भई आत्मिक स्थिति में होकरके युद्ध करना। हं? हाँ। कहाँ की यादगार? ये पुरुषोत्तम संगमयुग की यादगार है जब बाप ने आकर ये बात बताई कि चाहे मन का युद्ध हो, चाहे तन का युद्ध हो, तन की इन्द्रियों का युद्ध हो, अगर युद्ध करना पड़े तो कौनसी स्थिति में रहना है? हँ? ज्योति बिन्दु आत्मा की स्थिति को चैक करना है कि ज्योति बिन्दु आत्मा याद है। हँ? कैसे याद किया जाता है? हँ? किसी को याद किया जाता है तो पहले उसका रूप याद आता है ना। तो वो स्टार, वो ज्योतिबिन्दु, वो किरण, हँ, क्योंकि सूर्य का ज्ञान है ना। तो सूर्य की किरण होगी ना। तो ये है तो चैतन्य ज्ञान सूर्य। बताया – वो उसकी जो ये किरणें हैं आत्मा रूपी बच्चे, हाँ, वो अपन को देखें कि वो किरण भृकुटि के मध्य में याद रहती है?

ये एक-दो को देखकरके हाथ उठाय रहे हैं। क्या? कोई तो उठा ही नहीं रहे हैं अभी तक। बताया – इससे अगर अच्छा ऐसे होता जब कोई भी क्लास कराते हैं; क्या? ऐसे नहीं बाबा क्लास कराते हैं। नहीं। कोई भी क्लास कराते हैं तो वो पहले देही अभिमानी के लिए कहकरके बैठें। क्या? क्लास शुरु होने से पहले पूछें कि आत्माभिमानी होकर बैठे हो? स्टार की, ज्योतिबिन्दु की भृकुटि के मध्य में याद है? हँ? कि भई देही अभिमानी होकरके बैठो। आत्मा अभिमानी होकर बैठो। फिर जब क्लास कराने वाला गद्दी से उतरे, हँ, तख्त से नीचे उतरे तभी भी जरूर कहना चाहिए, याद दिलाना चाहिए कि आत्मा अभिमानी स्थिति में बैठे हो? देह अभिमान में तो नहीं बैठे हो? या फिर दीदी बैठे। तभी दीदी पूछ पड़े। तो बताओ कि देही अभिमानी होकरके बैठे हो? बाबा दीदी किसको कहते थे? मनमोहिनी दीदी को दीदी कहते थे। हाँ। तो थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी हो जाएगी। अगर जो टीचर है क्लास कराने वाला, गद्दी पे बैठने वाला वो बार-बार याद दिलाएगा स्टूडेन्ट्स को कि आत्मिक स्थिति में बैठे हो? हँ? तो आत्मा को ही तो ज्ञान सुनाना है। शिव बाप किसको ज्ञान सुनाने आए? आत्मा को या देह को? या देह अभिमानी को? नहीं।

तो ऐसे बार-बार पूछने से थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी होती जाएगी। क्योंकि मूल बात है ही इसके ऊपर। किसके ऊपर? अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझ करके बैठो। और सिर्फ बैठने की भी बात नहीं है। चलते-फिरते, उठते, कर्मेन्द्रियों से कुछ भी कर्म करते आत्मिक स्थिति में हैं? हँ? चैक करो। क्योंकि जब देही अभिमानी होकरके बैठते हैं तो ये बात ज़रूर है कि आत्मा की याद आएगी तो साथ में फिर क्या होगा? हँ? हाँ। जो आत्मा का बाप है वो ज़रूर, ज़रूर याद आएगा क्योंकि आत्मा भी ज्योति बिन्दु और बाप भी ज्योतिबिन्दु। आत्मा अति सूक्ष्म, तो बाप भी अति सूक्ष्म। तो ऐसे तो नहीं समझते कि आत्मा को याद किया, स्टार को याद किया भृकुटि के मध्य में तो बाप याद नहीं आया? हँ? अरे, ये तो बुद्धि में बैठा है ना कि ज्यादा फायदा जो है वो आत्मिक स्थिति में स्थिर रहने में है, आत्मा को याद करने में ज्यादा फायदा है कि आत्मा समझकरके साथ-साथ बाप को भी याद करने में ज्यादा फायदा है? हँ? बाप को याद करेंगे तो बहुत फायदा है। कैसे? आत्मिक स्थिति में रहेंगे, कोई भी कार्य करेंगे, भ्रष्ट इन्द्रियों से, श्रेष्ठ इन्द्रियों से कर्म करेंगे, तो पाप कर्म नहीं बनेगा उस समय। आत्मिक स्थिति में रहेंगे तो पाप कर्म बनेगा? नहीं बनेगा। लेकिन पिछले जन्म के पाप और इस जनम के पाप भस्म होंगे? हँ? भस्म होंगे? आत्मिक स्थिति में सिर्फ रहेंगे, बाप को याद नहीं करेंगे तो? हाँ, आत्मिक स्थिति में रहें, अपनी भृकुटि में ज्योतिबिन्दु आत्मा को याद करें और फिर आत्मा को याद करने के बाद फिर आत्मा का जो बाप है सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु वो भी याद आए या ना आए? हँ? हाँ।

वो ब्रह्माकुमारियां कुमार क्या कहते हैं? कि हाँ, हम तो याद करते हैं। अपनी आत्मा ज्योतिबिन्दु को भी याद करते और अपने बाप को भी याद करते। तो सही बोलती हैं क्या? क्यों? क्यों नहीं सही बोलती? हँ? झूठ कैसे बोलती? हाँ, क्योंकि वो उन्हें पता ही नहीं है कि वो ज्योतिबिन्दु सुप्रीम सोल जो सब आत्माओं का बाप है वो है कहाँ? हँ? अगर आत्मा सो परमात्मा, तो तो झूठी बात हुई, सच्ची बात हुई? हँ? चींटी, हाथी, हँ, और ये कीड़े-मकोड़े आत्माएं हैं ना। तो फिर वो सब परमात्मा हो गए? हँ? ऐसे कहेंगे आत्मा सो परमात्मा? नहीं। ये तो फिर सर्वव्यापी हो गया। तो ये तो झूठी बात है। तो सच्ची बात क्या हुई? हँ? क्या सच्ची बात हुई? हँ? अरे, कुछ सच्ची बात भी बताओ। हँ? अरे?
(किसी ने कुछ कहा।) साकार में निराकार आया। ठीक है हमारी आत्मा हमारे साकार शरीर में है ना। क्या? और आत्मा निराकार है। हमारे साकार शरीर है कि नहीं? और भृकुटि के मध्य में निराकार आत्मा बैठी है ना। तो साकार में निराकार आया है तो हम उसी को तो याद कर रहे हैं। झूठी बात है? अच्छा? कैसे झूठी बात? (किसी ने कुछ कहा।) आत्मा को परमात्मा एक ही है। आत्मा को परमात्मा एक ही है? शिव बाप, क्या लिखा? शिव बाप साकार मुकर्रर रथ में आया है। हाँ।

ये भी तो बोला है। क्या? मुरली में ये नहीं बोला बीस बार? क्या? कि दो प्रकार के रथ हैं। एक मुकर्रर रथ और दूसरा टेम्परेरी। तो मुकर्रर रथ तो एक ही है जो सदाकाल मुकर्रर है। हँ? आदि से लेकरके जबसे ये ओम मंडली शुरू हुई या सिंध, हैदराबाद में जो भी संगठन चलता था, ज्ञान का क्लास होता था तबसे लेकरके। कबसे लेकरके? जबसे ये परिचय मिला। क्या परिचय मिला? ब्रह्मा बाबा को कि तुम्हारा पार्ट, साक्षात्कार जो तुम्हें हुए हैं, उनके आधार पर तुम्हारा पार्ट ही है इस जनम में ब्रह्मा के रूप में, सफेदफोश के रूप में और अगले जनम में कृष्ण के रूप में। और? और क्या? और दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। एटम बम्ब इसीलिए बने हैं। क्या? ओम मंडली जब शुरू हुई थी उससे पहले एटम बमों के नाम, नाम-निशान था क्या? नहीं था। ये तो बाप है दोनों काम कराने के लिए आए हैं ना। पुरानी दुनिया, पुराने धर्म, पुरानी मान्यताएं, परंपराएं, सब खलास कर देगा। हँ? और नई दुनिया, नई मान्यताएं शुरू कर देगा।

तो उसके सब लिए वो बाप सुप्रीम सोल आत्माओं का बाप कहते हैं स्पष्ट बताय देते कि मैं मुकर्रर रथ में तो मुकर्रर रूप से सदाकाल रहता हूँ। कायमी रहता हूँ। क्या? कायमी रहता हूँ माने? सदाकाल मुकर्रर रथ में तो रहता ही हूँ। लेकिन बीच-बीच में ज़रूरत पड़े तो फिर मुकर्रर नहीं तो जो टेम्परेरी रथ है ना उनमें भी आता हूँ। इसलिए तो शास्त्रों में दिखाया है कि ब्रह्मा के चार मुख ज्यादा दिखाते हैं। पांचवां मुख दिखाते ही नहीं हैं। मानते हैं कि ब्रह्मा पांच मुख वाला भी था, पंचानन भी कहते हैं। तो ये फाउण्डेशन कहाँ पड़ा? हँ? ये जो मान्यता चल रही है कि ब्रह्मा के चार मुख; और जब भी चित्रों में दिखाएंगे चार ही मुख दिखाएंगे। हँ? कोई सीरियल बनाएंगे, नाटक बनाएंगे तो चार मुखों वाला ब्रह्मा दिखाएंगे। पांच मुखों वाला दिखाते हैं? दिखाते ही नहीं। तो ये शूटिंग कहाँ होती है? हाँ। यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में तुम बच्चे शूटिंग करते हो। क्या? क्या शूटिंग करते? कि मुकर्रर रथधारी को पक्का-पक्का बाप के रूप में पहचान नहीं पाते कि मेरा सौ परसेन्ट यही बाप है। और मैं अब इस बाप को कभी भूलने वाला नहीं हूँ। अरे? बाप की एक बार पहचान हो जाए बच्चे को; मां ही तो पहचान देती है ना। तो बच्चा कभी ये कहेगा ये मेरा बाप नहीं है या दूसरा भी हो सकता है? हँ? बाप है तो बाप है। नहीं है तो नहीं है। तो देखो ये घड़ी-घड़ी पहले याद दिलाने की बात है कि पहले तो आत्माभिमानी होकरके बैठो। फिर दूसरी बात? फिर दूसरी बात ये है कि बाप को भी याद करो।

Today’s night class is dated 13.11.1967. Those who were not sitting in soul consciousness before asking may raise their hands. Dehi means the soul which assumes the body. It means that those who were not sitting in soul consciousness should raise their hands. You were sitting. Were you not sitting?
(Someone said something.) Is there only one? Achcha? Were all others sitting in the remembrance of the point of light soul? Hm? One more person denied. I am not asking only about today’s topic. Were sitting. It means whether you were sitting today or you may have sat any time earlier. Were they sitting in the remembrance of the point of light soul? It was asked. Have you developed the firm faith that we are not bodies? Hm? We are points of light running the body. Hm?

And the memorial of the same soul is applied as bindi especially by the virgins and mothers in India even to this day in the middle of the forehead. They apply, don’t they? Yes. Some brothers also apply. It is famous in the history – Whenever the members of family of the kings or their armies or the members of the army used to send them off to war, they used to apply teeka, didn’t they? Yes. Where? On the nose? No. They used to apply in the middle of the forehead between the eyebrows (bhrikuti), didn’t they? Yes. Brother, fight the war in soul consciousness. Hm? Yes. It is a memorial of which place? It is a memorial of the Purushottam Sangamyug when the Father came and told that be it the war of the mind, be it the war of the body, be it the war of the organs of the body, if you have to wage the war, then in which stage should you remain? Hm? You should check the stage of the point of light soul whether you remember the point of light soul? Hm? How do you remember? Hm? If you have to remember anyone, first his form comes to your mind, doesn’t it? So, that star, that point of light, that ray, hm, because it is the knowledge of the Sun, isn’t it? So, there will be the ray of the Sun, will it not be? So, this is a living Sun of Knowledge. It was told – Its rays, the soul-like children, yes, they should check themselves that do you remember that ray in the middle of the bhrikuti?

These people are raising their hands by seeing each other. What? Some are still not raising their hand at all. It was told – It would be better when anyone takes the class; what? It is not as if Baba takes the class. No. Whenever anyone takes the class, then they should first ask others to sit in soul consciousness and then sit. What? Before the start of the class, they should ask whether they are sitting in soul consciousness. Do you remember the star, the point of light in the middle of the bhrikuti? Hm? Brother, sit in soul consciousness. Sit in soul consciousness. Then, when the person taking the class leaves the guddi, comes down from the seat, at that time also he/she should definitely say, remind that whether you are sitting in soul consciousness? Are you sitting in body consciousness? Or if Didi is sitting, then Didi should ask. So, tell whether you are sitting in soul consciousness? Who did Baba used to address as Didi? He used to call Manmohini Didi as Didi (elder sister). Yes. Then your practice will be good. If the teacher who takes the class, the one who sits on the guddi, reminds the students again and again that whether you are sitting in soul consciousness? Hm? So, it is the soul which has to be narrated the knowledge. To whom has the Father Shiv come to narrate knowledge? To the soul or the body? Or to the body conscious one? No.

So, by asking again and again like this, the practice will go on improving because the main topic is based on this. On what? Consider yourself to be a point of light soul. And it is not just about sitting as well. While walking, getting up, are we in soul conscious stage while performing any action through the organs of action? Hm? Check. It is because when you sit in soul consciousness, then it is definite that if you remember the soul, then what will happen along with that? Hm? Yes. The Father of the soul will definitely, definitely come to the mind because the soul is also a point of light and the Father is also a point of light. When the soul is very subtle, then the Father is also very subtle. So, do you think that when you remember the soul, when you remember the star in the middle of bhrikuti, then the Father did not come to the mind? Hm? Arey, it has sat in your intellect that is there more benefit in being constant in soul conscious stage, is there more benefit in remembering the soul or is there more benefit in remembering the Father also while considering yourself to be a soul? Hm? There is a lot of benefit in remembering the Father. How? If you remain in soul consciousness, if you perform any action through the unrighteous organs, if you perform actions through the righteous organs, then you will not accrue sins at that time. Will you accrue sins if you remain in soul conscious stage? You will not. But will the sins of the past birth and this birth be burnt? Hm? Will they be burnt? If you remain just in soul conscious stage, if you do not remember the Father then? Yes, if you remain in soul consciousness, if you remember the point of light soul in your bhrikuti and then after remembering the soul, should you remember the Father of the soul, the Supreme Soul point of light also or not? Hm? Yes.

What do those Brahmakumar-kumaris say? That yes, we remember. We remember our soul, the point of light also and we also remember our Father. So, do they speak correctly? Why? Why don’t they speak correctly? Hm? How do they speak lies? Yes, it is because they do not know that that point of light Supreme Soul, who is the Father of all the souls, where is He? Hm? If the soul is the Supreme Soul, then is it false or true? Hm? Ants, elephants and these worms and insects are souls, aren’t they? So, then are they all Supreme Souls? Hm? Will it be said that the soul is the Supreme Soul? No. This is then omnipresence. So, this is a false topic, isn’t it? So, what is the true topic? Hm? What is the true topic? Hm? Arey, tell something true as well. Hm? Arey?
(Someone said something.) The incorporeal came within the corporeal. It is correct that our soul is also in our corporeal body, isn’t it? What? And the soul is incorporeal. Are our bodies corporeal or not? And the incorporeal soul is sitting in the middle of the bhrikuti, isn’t it? So, when the incorporeal has come within the corporeal, then we are remembering it only. Is it a false topic? Achcha? How is it a false topic? (Someone said something.) The soul has only one Supreme Soul. Does the soul have only one Supreme Soul? Father Shiv; what did you write? Father Shiv has come in a corporeal permanent Chariot. Yes.

This has also been said. What? Has this not been said twenty times in the Murli? That there are two kinds of chariots. One is the permanent Chariot and the other is temporary. So, there is only one permanent Chariot which is forever permanent (mukarrar). Hm? From the beginning, ever since this Om Mandali started or from the time whatever gathering, the class of knowledge used to be organized in Sindh, Hyderabad. Since when? Ever since this introduction was received. What introduction was received? To Brahma Baba that your part, the visions that you had, on the basis of them your part itself is in the form of Brahma, in the form of a white-robed one in this birth and in the form of Krishna in the next birth. And? And what? And the destruction of the world is staring at you. This is why atom bombs have been produced. What? Was there any name or trace of atom bombs before Om Mandali had started? It wasn’t there. This Father has come to get both the tasks done, hasn’t He? He will destroy the old world, old religions, old beliefs, traditions, everything. Hm? And He will start the new world, new beliefs.

So, for all that that Father, the Supreme Soul, the Father of souls says, tells clearly that I remain forever in a permanent manner in the permanent Chariot. I remain permanent. What? What is meant by permanent (kaayami)? I remain forever in the permanent Chariot. But in between, whenever required, if not the permanent [Chariot], then I enter in the temporary chariots also. This is why it has been depicted in the scriptures that mostly four heads of Brahma are depicted. The fifth head is not depicted at all. They do believe that Brahma had five heads also; he is also called Panchanan (five-headed). So, where was this foundation laid? Hm? The belief that continues that Brahma has four heads; and whenever they depict [Brahma] in the pictures, they show four heads only. Hm? Whenever they produce any [TV] serial, whenever they enact a drama, they show four-headed Brahma only. Do they show five headed one? They do not show at all. So, where does this shooting take place? Yes. You children perform this shooting here in the world of Brahmins. What? What shooting do you perform? That you are unable to recognize the permanent Chariot-holder firmly in the form of a Father that this one itself is my hundred percent Father. And now I am not going to forget this Father. Arey? If a child recognizes his Father once; the mother herself gives the introduction, doesn’t she? So, will the child ever say that this is not my Father or that there can be another one as well? Hm? If he is the Father, he is the Father. If he isn’t, he isn’t. So, look, this is a topic to be reminded every moment first that sit in soul consciousness. Then the second topic? Then the second topic is that remember the Father also.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2807, दिनांक 02.03.2019
VCD 2807, dated 02.03.2019
रात्रि क्लास 13.11.1967
Night Class dated 13.11.1967
VCD-2807-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.17
Time- 00.01-20.17


रात्रि क्लास चल रहा था – 13.11.1967. पहले पेज के अंतिम चौथी लाइन में बात चल रही थी वो दुनियावी वैष्णवपंथियों की और तुम बच्चे जो कहते हो कि हम भी वैष्णवपंथी हैं, परंतु विष्णु तो चाहिए ना। विष्णु माने संपन्न स्टेज। संपन्न स्टेज माना? हँ? स्त्री और पुरुष, मेल, फीमेल, दोनों के संस्कार-स्वभाव मिलकरके एक हो जाएं। वो तो नई सृष्टि में सतयुग के आदि में ही थे। इस सृष्टि का जब अंत होने का होता है तब तो कोई के संस्कार आपस में मिलते ही नहीं। तो बताया - अपने पास वो दुनियावी वैष्णवों का वैष्णवपना बुद्धि में नहीं है। अपने पास तो बिल्कुल ही एकदम आत्मा को पक्का वैष्णव बनना है, ये बुद्धि में है। विष्णुवंशी बनना है। जैसे विष्णु की स्टेज कम्बाइंड ऐसे हमारी भी स्थिति बने। बुद्धि में पक्का बैठ जाए कि 21 जन्म का साथी हमारा नई दुनिया में कौन बनेगा? उसके साथ हमारे स्वभाव-संस्कार मिलकरके कम से कम 21 जन्म के लिए तो, हाँ, एक हो जाएं। फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। तो बनना तो है विष्णुवंशी। परन्तु उसमें फिर वो सभी चल नहीं सकते हैं। वो सभी कौन? हँ? वो सभी जो दूसरे धर्म की आत्माएं हैं, या उन दूसरे धर्मों के प्रभाव में आकरके कन्वर्ट होने वाली देवी-देवता सनातन धर्म की आत्माएं हैं, हँ, नई दुनिया में जाने वाली, वो भी सभी एक जैसा पुरुषार्थ तो कर ही नहीं सकती। तो सभी चल भी नहीं सकते हैं।

अगर कहें वो चमड़ा; तो चमड़ा तो वो गाय का है, हँ, शरीर का है। एक तो शरीर मनुष्यों का भी होता है, देवताओं का भी होता है और फिर जानवरों का भी। हाँ। और बताया गाय। कृष्ण को गऊएं दिखाई हैं। तो वो भी तो चमड़ा ही है ना। भले गाय सीधी-सादी पशु है। ये चमड़ा कहते हैं ना इनको। हँ? किसको? इनको माने? देह अभिमान को चमड़ा कहते हैं। तो वास्तव में ये कोई ज़रूरत नहीं है। हँ? किस बात की जरूरत नहीं है? हँ? क्या ज़रूरत नहीं है? देह भान में रहने की ज़रूरत नहीं है? हँ? अच्छा? देह में आत्मा रहेगी तभी तो पुरुषार्थ करेंगे। हाँ, पुरुषार्थ करें, लेकिन देह के अर्थ, देह के अर्थ न करें।

13.11.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। बाकि उनकी भावना शुद्ध है अच्छी। वो करके मंगाकरके देवें; क्या? क्या मंगाय के देवें? अरे, चप्पल की बात हो रही थी ना। तो भी चप्पल बिगर रह नहीं सकते। क्या मंगाय कर देवें? वो ही लांग बूट वाली बात। याद आई? हाँ। वो उनकी बुद्धि में बैठाएंगी तो भी क्या होगा? वो दूसरे धर्म में कन्वर्ट होने वाली या जो भी दूसरे धर्म वाले हैं अपने धर्म के पक्के वो फिर चप्पल के बिगर रह नहीं सकते। और फिर उनको चाखरी में थोड़ा डर भी है। क्या? क्या डर है? तुम बच्चों को तो पता है। हँ? वो जो चाखरी बताई; कैसी चाखरी बताई? चाखरी कहो; वस्त्र भी बताया। खादी का वस्त्र। कैसी चाखरी है? खादी का कपड़ा है। खादी का कपड़ा? आजकल वो जूते मिलते हैं वो भी तो मजबूत कपड़े के मिलते हैं कि नहीं? हँ? मिलते हैं। तो बताया वो चाखरी में भी थोड़ा डर है। क्या? कि सर्दियों में तो ठंडक देता है, वो सर्दियों में तो गर्मी देता है और गर्मियों में ठंडक देता है लेकिन बरसात में? बरसात में सबके लिए बहुत भारी पड़ जाता है। हँ? हाँ। तो भारी पड़ जाता है तो गिरने का डर है। हँ? उथलने का डर है।

तो वो चमड़ा भी पहना हुआ हो। तो बुद्धि रूपी पांव में तो पहना हुआ है। हँ? पर अंदर में अगर बाप को याद करते हो; अंदर माने मन-बुद्धि में। तो फिर तो कोई हर्जा नहीं है। उस बाप की पहचान लिया, जान लिया, मान लिया और फिर याद करके, हँ, हाँ, वो पहना हुआ भी है तो कोई हर्जा नहीं है। क्यों? क्योंकि वो चमड़ा भी कोई पाप नहीं चढ़ाते। कौनसा चमड़ा? लांग बूट का? क्यों? हँ? चमड़ा माने देह भान। वो पाप क्यों नहीं चढ़ाते? क्यों नहीं पाप चढ़ाते? क्योंकि वो जो शरीर रूपी वस्त्र है वो सदाकाल इस सृष्टि पर अविनाशी है या और आत्माओं की तरह उनका, जैसे और आत्माओं का शरीर रूपी वस्त्र विनाशी है, ऐसे विनाश हो जाता है? हँ? नहीं। तो जब विनाशी नहीं है, तो अविनाशी को याद करेंगे तो कैसे बनेंगे? अविनाशी बनेंगे। और विनाशी को याद करेंगे तो विनाशी बनेंगे।

तो पाप जो चीज़ चढ़ाती है, हँ, वो कौनसी चीज़ चढ़ाती है? पाप चढ़ाती है वो काम महाशत्रु। काम महाशत्रु माने? कामना, इच्छाएं। देह है तो इच्छा है। और देह भी तामसी, राजसी है तो इच्छाएं हैं। अगर सात्विक शरीर हो जाए, हँ, देवात्माओं जैसा, तो इच्छा रहती है? हँ? सब इच्छाएं प्रकृति पूरी करती रहती है। तो इच्छा मात्रम अविद्य़ा रहते हैं। तो वो काम महाशत्रु कहाँ से आता है? जबसे ये द्वैतवादी द्वापरयुग के धरमपिताएं आते हैं तबसे ये काम महाशत्रु बहुत शत्रुता करने के लिए, हँ, हाँ, हमारे कनेक्शन में आ जाता है। तो हम, हम उससे बच नहीं सकते? कैसे बचेंगे? आठ कलाएं तो रहती हैं नई दुनिया में। और जब पुरानी दुनिया में आते हैं द्वैतवादी द्वापरयुग में तो कलाएं कम हो जाती हैं। तो कमज़ोरी आ जाती है। किनको? जो नई दुनिया की आत्माएं हैं उनको या जो नई-नई आत्माएं उतर रही हैं उनको? जो द्वापरयुग में नई आत्माएं उतरती हैं उनको कमजोरी होती है, वो पावरफुल होती हैं कि कमज़ोर होती हैं? वो तो पावरफुल होती हैं। जो देवात्माएं हैं वो नीचे उतरते कमज़ोर हो जाती हैं सुख भोगते-भोगते ज्ञानेन्द्रियों से। तो उनके प्रभाव में आने से वो काम महाशत्रु हमको भी घेर लेता है।

बाकि ऐसे है कि थोड़ा-थोड़ा पाप चढ़ते हैं। हँ? हमारे में बहुत ज्यादा एकदम पाप नहीं चढ़ते हैं। हाँ, जो आत्माएं उनके ज्यादा कनेक्शन में आती हैं विधर्मियों के उनके ऊपर ज्यादा चढ़ेंगे। और हम? हँ? हम तो अपने धरम में पक्के रहते हैं देवी-देवता सनातन धर्म के जो ऊँचा जाने वाला, ऊँचाई पे जाने वाला, एक सीध में जाने वाला तना है दायीं ओर, बाईं ओर झुकता ही नहीं है। तो, तो हमपे धीरे-धीरे असर होगा कि जल्दी असर होगा? हँ? धीरे-धीरे असर पड़ता है। क्योंकि ऐसा दूसरे मनुष्य बहुत थोड़े होंगे। तुम्हारे अलावा दूसरे जो ये पाप न करते होंगे। हँ? कौनसा पाप? पाप किसे कहा जाता है? दुख देने को पाप कहा जाता है। तो बाप तो कहते हैं कि इस पुरानी दुनिया में भी, हँ, पतित तो सब होते हैं। हँ? वो तो इस पतित दुनिया का कायदा है। परन्तु हाँ एक के साथ मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव पक्का रहना चाहिए। अनेकों के साथ अगर मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव रहा, हँ, और पक्षपात आ गया तो फिर क्या होगा? हँ? तो फिर हाँ, ऊपर नीचे होते रहेंगे। फिर पाप करते रहेंगे। क्या पाप? एक होता है धर्मानुकूल। क्या? काम भोगना। और एक होता है धर्म के विपरीत। धर्म क्या कहता है? दुख देना? धर्म क्या कहता है? दुख नहीं देना। लेकिन जो द्वैतवादी द्वापरयुग में जो विधर्मियों के द्वारा भ्रष्ट इन्द्रियों का जो सुख लेने की परंपरा चलाई जाती है वो तो वो उनको तो पक्का है। क्या? क्या? उनके धरम में क्या पक्का है? वो तो तोड़-फोड़ करेंगे, हिंसा करेंगे। लेकिन तुमको तो हिंसा? हिंसा नहीं करनी है। एक होता है कोई को प्यार से थप्पड़ मार दो। और एक होता है गुस्से में आके जोर से थप्पड़ मार दो। तो अंतर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? अंतर पड़ेगा।

तो ये जो तुम बच्चे हो थोड़े वो पाप नहीं करते होंगे। जो छोटेपन से ब्रह्मचारी होकरके रहते हैं, फिर भी कोई न कोई पाप तो हो ही जाते हैं ना किसम-किसम के। क्योंकि; क्या बताया? हँ? काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाए, एक लीक काजर की लागि है पे लागि है। तो ऐसे-ऐसे पाप क्यों हो ही जाते हैं? कारण क्या है? क्योंकि ये राज्य किसका आ जाता है? हँ? राज्य रुलाने वालों का आ जाता है या देवात्माओं का राज्य होता है? हाँ। द्वैतवादी दैत्यों का राज्य होता है। हिंसक लोगों का राज्य होता है। हिंसक कर्मेन्द्रियों से हिंसा करने वाले हैं। वो अपनी आदत से मजबूर हैं। वो तो छोड़ नहीं सकते। तो कोई न कोई पाप तुम बच्चों से भी कुछ न कुछ नंबरवार हो जाता है। किसम-किसम के हैं ना पाप। हाँ। रावण राज्य है। यथा राजा? राज्य है तो यथा राजा तथा प्रजा। तो वो पाप छोड़ता तो नहीं है। उसके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। किसके राज्य में? उस रावण के राज्य में। उसमें क्या अंतर है? राम राज्य में क्या अंतर है? अरे, राम को; राम लीला देखी ना। एक मुख दिखाया जाता है। और रावण को? रावण को अनेक मुख दिखाए जाते हैं। वो सब मिलकरके बस एक जैसे, हँ, एक जैसे स्वभाव संस्कार, एक जैसी वाचा।

तो उनके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। और उसमें भी जनम तो पाप से ही होता है ना। द्वैतवादी द्वापरयुग से, जबसे ही ये विधर्मी धरमपिताएं आते हैं, भ्रष्ट इन्द्रियों से कर्म करना सिखाते हैं, तो जन्म तो कौनसी इन्द्रियों से होता है? हँ? भ्रष्ट इन्द्रियों के भ्रष्ट कर्मों से, पाप कर्मों से होता है या वहाँ श्रेष्ठ इन्द्रियां ही काम करती हैं? हँ? श्रेष्ठ इन्द्रियां तो तब काम करें जब श्रेष्ठ ज्ञान बुद्धि में बैठा हो। क्या? कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। वो आत्मा की स्मृति तो 21 जन्म देवताओं को रहती है। उसके बाद वो आत्मिक स्मृति तो खतम हो जाती है। तो जनम तो ज़रूर सबका द्वैतवादी द्वापरयुग से ढ़ाई हज़ार साल के बाद नई दुनिया जब पूरी होती है तो सबका जन्म पाप से ही होना है।

तो ये छोटी-मोटी जो बातें होती रहती हैं ना वो इस ज्ञानमार्ग में, हँ, इतनी जरूरत नहीं है। हाँ। ज्ञान मार्ग में जहाँ भी मेहनत रहती है बच्चों के ऊपर; क्या मेहनत विशेष रहती है? मेहनत रहती है अपन को, हँ, देह भूल करके आत्मा समझ और बाप को पहचानने की, पहचान करके याद करने की मेहनत रहती है। हँ? तो देखो सिर्फ ये कि अपन को आत्मा समझना और बाप को नित्य याद करना। हाँ। परन्तु ये भूल बहुत होती है। अरे? क्या? क्या भूल होती है? आत्मा को भी भूलते हैं और बाप सुप्रीम सोल, जब तक ये बुद्धि फैसला न करे कि वो सुप्रीम सोल ज्योति बिन्दु निराकार; जैसे हमारी आत्मा निराकार, लेकिन हमारी आत्मा तो हमारे शरीर में है। वो निराकार कौनसे मुकर्रर रथ में सदाकाल इस सृष्टि पर पार्ट बजाता है, सौ साल के लिए, तो वो भूल जाते हैं। घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में; निश्चय में लाती है कि अनिश्चय में लाती है? घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में ले आती है। भूल कराय देती है। तो ये घड़ी-घड़ी भुलाय देती है, भूल जाते हैं। क्योंकि यहाँ ये नई शिक्षा मिलती है बच्चों को। क्या? दुनिया में ऐसी शिक्षा कहीं भी नहीं मिलती कि अपन को ज्योति बिन्दु स्टार भृकुटि के मध्य में आत्मा समझो और उस निराकार आत्मा के बाप ज्योतिबिन्दु निराकार हैविनली गॉड फादर, जो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, उसको प्रैक्टिकल में किस शरीर में पार्ट बजाय रहा है, परमानेन्टली पार्ट बजाय रहा है, उसे पहचान करके याद करो। ये शिक्षा कहीं दुनिया में मिलती है? नहीं मिलती है। बिल्कुल ही नई शिक्षा है।

A night class dated 13.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last but fourth line of the first page was about those worldly Vaishnavpanthis; and you children say that we are also Vaishnavpanthis, but Vishnu is required, isn’t he? Vishnu means perfect stage. What is meant by perfect stage? Hm? The sanskars and nature of wife and husband, male, female should become one. They were that in the new world in the beginning of the Golden Age only. When this world is about to end, then nobody’s sanskars match with each other. So, it was told – We do not have the Vaishnav nature of those worldly Vaishnavs in our intellect. We have realized in our intellect that the soul has to become completely firm Vaishnav. We have to become Vishnuvanshi. Just as Vishnu’s stage is combined, our stage should also become like that. It should sit firmly in the intellect that who will become my companion in the new world for 21 births? Our nature and sanskars should become one with him/her, yes, at least for 21 births. Then, numberwise as per purusharth. So, we do have to become Vishnuvanshi. But all those cannot go in it. Who are all those? Hm? All those who are souls of other religions or are souls of Devi-Devata Sanatan Dharma who go to the new world, but who convert under the influence of those other religions, hm, all of them cannot make similar purusharth. So, all of them cannot go.

If we say that skin/leather (chamda); so, that skin is of a cow, hm, of the body. One body is of the human beings also, it is of the deities also and then of the animals also. Yes. And it was told cow. Krishna has been depicted with cows. So, that is also a skin only, isn’t it? Although cow is a simple animal, this is called skin. Hm? What? This refers to what? Body consciousness is called skin (leather). So, actually this is not needed. Hm? What is not needed? Hm? What is not needed? Is there no need to remain in body consciousness? Hm? Achcha? You will make purusharth only when the soul remains in the body. Yes, you should make purusharth (efforts made for the purush, i.e. soul), but you should not do for the sake of the body, for the body (dehaarth).

Second page of the night class dated 13.11.1967. But their feeling is pure, nice. We may order for that and give; what? What should we order for and give? Arey, the topic of chappals (slippers) was being discussed, wasn’t it? However you cannot live without slippers. What should we order for and give? The same topic of long boot. Did you recollect? Yes. Even if they make it sit in their intellect, what will happen? Those who are to convert to other religions or those who belong to other religions, those who are firm in their religion, they cannot live without slippers. And then they have a little fear for chaakhri (cloth). What? What is the fear? You children know. Hm? That chaakhri which was mentioned; what kind of chaakhri was mentioned? Call it chaakhri; it was mentioned as cloth also. Khaadi (hand-spun) cloth. What kind of chaakhri is it? It is a khadi cloth. Khadi cloth? Now-a-days those shoes that you get, do you get them made up of strong cloth (canvas) or not? Hm? You get. So, it was told that there is a little fear in that chaakhri also. What? It gives coolness in the winters; it gives warmth in the winters and it gives coolness in the summers; but in the rainy season? In the rainy season it becomes very heavy for everyone. Hm? Yes. So, when it becomes heavy, then there is a fear that one may fall. Hm? There is a fear of stumbling.

So, you should have worn that leather as well. So, it has been worn on the intellect-like feet. Hm? But if you remember the Father within; ‘within’ means ‘in the mind and intellect’. Then it does not matter. If you have recognized, known, accepted that Father and then by remembering Him, hm, yes, even if you have worn it, it doesn’t matter. Why? It is because that leather also does not cause any sin to be accrued. Which leather? Of the long boot? Why? Leather means body consciousness. Why doesn’t it cause sins to be accrued? Why doesn’t it cause sins to be accrued? It is because is that body-like cloth forever imperishable in this world or like other souls, just as the body-like cloth of other souls is perishable, does his cloth also get destroyed? No. So, when it is not perishable, then if you remember the imperishable one, then how will you become? You will become imperishable. And if you remember the perishable one, then you will become perishable.

So, the thing that causes sins to be accrued, hm, which thing causes that? That biggest enemy lust causes sins to be accrued. What is meant by the biggest enemy lust (kaam mahashatru)? Desires (kaamna, ichchaaen). If there is a body there is desire. And if the body is also taamsi (impure), raajasi (semi-impure), then there are desires. If the body becomes pure, hm, like the deity souls, then does any desire remain? Hm? The nature fulfills all the desires. So, they remain free from the knowledge of desires (ichcha maatram avidya). So, where does that biggest enemy lust come from? Ever since these founders of religions of dualist Copper Age come, this biggest enemy lust comes in our connection to indulge in a lot of enmity. So, can’t we, we protect ourselves from it? How will you be saved? Eight celestial degrees remain in the [end of the] new world. And when you come to the old world, to the dualist Copper Age, the celestial degrees decrease. So, weakness emerges. In whom? In the souls of the new world or in the new souls that are descending? Do the new souls which descend in the Copper Age have weakness? Are they powerful or weak? They are powerful. So, the deity souls become weak while undergoing downfall while enjoying pleasures through the sense organs. So, by being influenced by them, that biggest enemy lust surrounds us as well.

But it is true that the sins are accrued gradually. Hm? We do not accrue too many sins immediately. Yes, those souls who come more in connection with them, the vidharmis, they accrue more sins. And we? Hm? We remain firm in our religion, the Devi-Devata Sanatan Dharma which goes high, which goes to a height, the stem which goes straight upwards, does not bend to the right side or the left side at all. So, so, will we be influenced gradually or quickly? Hm? We get influenced gradually. It is because such other human beings will be very few. Others apart from you who don’t commit these sins. Hm? Which sin? What is called sin? Giving sorrows is called a sin. So, the Father says that even in this old world, hm, everyone becomes sinful. Hm? That is a rule of this sinful world. But yes, the affinity, inclination of the mind and intellect should be firmly with one. If the affinity, inclination of the mind and intellect remains with many, hm, and if partiality emerges, then what will happen? Hm? Then yes, you will keep on oscillating up and down. Then you will keep on committing sins. Which sin? One is in accordance with dharma. What? To enjoy lust. And one is against the dharma. What does dharma say? To give sorrows? What does dharma say? Not to give sorrows. But the tradition of deriving pleasure of unrighteous organs that was started by the vidharmis (heretics) in the dualist Copper Age, they are firm in that. What? What? What is firm in their religion? They will indulge in sabotage (tor-for), they will indulge in violence. But should you indulge in violence? You shouldn’t indulge in violence. One thing is to slap someone affectionately. And one is to slap someone strongly out of anger. So, will there be a difference or not? There will be a difference.

So, you few children must not be committing sins. Those who remain celibate from their childhood, however commit different kinds of one or the other sin. It is because; what has been told? Hm? Kaajar ki Kothari kaiso hu sayano jaaye, ek leek kaajar ki laagi hai pe laagi hai (howevemuch clever person may enter into a room full of soot, he will definitely get stained by at least a line of soot). So, why are such sins committed? What is the reason? It is because whose kingdom arrives? Hm? Does the rule of those who make others cry arrives or is it the rule of deity souls? Yes. It is the rule of dualist demons. There is a rule of violent people. They indulge in violence through violent organs. They are helpless in front of their habits. They cannot leave them. So, you children also commit one or the other sin to some extent or the other numberwise. There are a variety of sins, aren’t there? Yes. It is a kingdom of Ravan. As is the king? When it is the kingdom [of Ravan] then as is the king so are the subjects. So, that sin doesn’t spare [anyone]. Nobody can remain without committing sins in his kingdom. In whose kingdom? In the kingdom of that Ravan. What is the difference in it? What is the difference in the kingdom of Ram? Arey, Ram; You have seen Ramleela, haven’t you? One head is shown. And Ravan? Ravan is shown to have many heads. All of them come together to become one, with similar nature and sanskars, similar speech.

So, nobody can remain without committing sins in his kingdom. And even in that the birth takes place through sin only, doesn’t it? From the dualist Copper Age, ever since these vidharmi founders of religions come and teach you to perform actions through the unrighteous organs, then through which organs does the birth take place? Hm? Does it take place through the unrighteous actions of the unrighteous organs, through sinful actions or do only the righteous organs work there? Hm? The righteous organs will work when the righteous knowledge has sat in the intellect. What? That we are point of light souls. The deities have the awareness of the soul for 21 births. After that the awareness of the soul ends. So, everyone has to be born through sin from the dualist Copper Age, after 2500 years, when the new world is over.

So, these small topics which keep on happening on this path of knowledge are not required that much. Yes. On the path of knowledge wherever children need to work hard; what hard work is especially required? The hard work is to forget oneself to be a body, to consider oneself as a soul and there is hard work to recognize the Father and to remember after Him after recognizing Him. Hm? So, look, just consider yourself to be a soul and remember the Father regularly. Yes. But this mistake happens a lot. Arey? What? Which mistake is committed? You forget the soul also and the Father, the Supreme Soul; until the intellect decides that that Supreme Soul point of light incorporeal; just as our soul is incorporeal, but our soul is in our body. You forget that permanent Chariot in which that incorporeal plays His part forever in this world for hundred years. Maya brings you into doubts every moment; does it enable you to develop faith or does it create doubts? Maya brings you into doubts every moment. It makes you commit mistakes. So, she makes you forget every moment; you forget. It is because here the children get this new teaching. What? Nowhere in the world you get such teaching that consider yourself to be a point of light star in the middle of the bhrikuti and recognize that Father of incorporeal soul, the point of light, incorporeal, heavenly God Father, who shows the path of establishing heaven, the body in which He is playing His part in practical, playing His part permanently and remember Him by recognizing Him. Do you get this teaching anywhere in the world? You don’t get. It is a completely new teaching.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2808, दिनांक 03.03.2019
VCD 2808, dated 03.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2808-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.58
Time- 00.01-18.58


आज का प्रातः क्लास है – 14.11.1967. मंगलवार को रिकार्ड चला – ये कौन आया आज सवेरे-सवेरे, हँ, कि दिल चौंक उठा सवेरे-सवेरे? किसका दिल चौंक उठा? हँ? दिल चौंक उठा माने दिल प्रभावित हुआ। पहले-पहले किसका दिल चौंक उठा? हँ? अरे, किसी का तो चौंक उठा होगा ना? हं? (किसी ने कुछ कहा।) मुकर्रर रथ चौंक उठा? वो पत्थर दिल, उसका दिल चौंक उठा? हँ? पत्थरबुद्धि का दिल भी कैसा होगा? पत्थरबुद्धि का दिल भी पत्थर। हँ? हाँ। वो गीत गाते हैं ना – पत्थर के सनम तुझे हमने क्या जाना? बड़ी भूल हुई। क्या? हाँ। तो ये गीत है; (किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी का गीत है? अच्छा? किस समय का गीत है लक्ष्मी का? हँ? अरे? कोई को तो लक्ष्मी ही लक्ष्मी दिखाई पड़ती। हँ? दिखाई पड़ना चाहिए नारायण को। हँ? बताओ। कब? लक्ष्मी का दिल अगर चौंक उठा तो कब? सो पता नहीं। ये पता है कि लक्ष्मी का ही चौंक उठा होगा। हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को दिल चौंक उठा? अच्छा? और सवेरे-सवेरे आया कौन? 5 दिसम्बर को सवेरा हुआ? हँ? कब कहें सवेरा हुआ? और किसका दिल चौंक उठा?

अरे, अरे, पहले-पहले तो दिल चौंक उठा दादा लेखराज ब्रह्मा का जिनको साक्षात्कार हुए। हँ? और उन साक्षात्कारों का अर्थ उनको कहीं से भी पता नहीं चला। न अपने गुरु से, न दुनिया के या बनारस के विद्वान, पंडित, आचार्य या कोई से भी नहीं पता चला। फिर जब अपने अनुभव के आधार पर जिस विद्वान व्यक्ति को समझा कि सच्चा व्यक्ति है, उस अपने भागीदार के पास पहुँचे। तो उसने जो बताया तो दिल चौंक उठा। चौंक उठा कि नहीं चौंक उठा? हाँ। फिर भी जाना तो नहीं ये कौन आया। हँ?

ओमशान्ति। तो ये कौन आया? भगवानुवाच। सुना - कौन आया? हँ? किसने पूछा? शिव बाप ने पूछा – सुना - कौन आया सवेरे-सवेरे? हँ? और किसमें आया? सुना? कुछ जाना तुमने? पहले किससे पूछा? पहले तो दादा लेखराज ब्रह्मा से ही पूछा। कौन आया? अरे, भगवानुवाच। देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। क्या? जो देह में जिसकी बुद्धि धरी हुई हो, उसको भगवान कहा जाता है? नहीं। भगवान तो न देह लेता है, न देह का जन्म लेता है, हँ, और न देह में आसक्त होता है। वो तो देहधारी है ही नहीं। तो देहधारी नहीं है, विदेही है, तो फिर ये भक्तिमार्ग में जो अर्जुन का रथ दिखाया है वो किस बात की यादगार? हँ? वो इसी बात की यादगार है कि देह ली ना अर्जुन की। ये शरीर रूपी रथ लिया। हँ? तो शास्त्रों में ही लिखा हुआ है, हँ, शरीरं रथं विद्धि इन्द्रियाणि हयान्याहू। हँ? ऐसे बोला है ना? तो ये शरीर जो है अर्जुन का जो ज्ञान धन अर्जन करने में सबसे आगे है। तो भगवान के पास क्या है? हाँ? उसके पास तो अखूट ज्ञान धन की संपत्ति है। तो उसकी वैल्यू जो देता होगा उसी के रथ में आएगा ना। हाँ। लेकिन जिसके रथ में आया उसकी बुद्धि तो देह में धरी हुई है या विदेही में धरी हुई है? विदेही को तो जानता ही नहीं। जानता है? हँ? जानता है? नहीं। वो तो कब आता है कब जाता है किसी को पता भी? पता भी नहीं चलता। तो जो रथधारी अर्जुन है वो तो देहधारी है। उसको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? किसको कहा जा सकता है भगवान?

भगवान तो उसे कहा जा सकता है जो देह में जिसकी बुद्धि एक सेकण्ड भी न टिके। क्या? कहाँ टिके? या तो अपनी आत्मा ज्योति में टिके या तो, हँ, किसमें टिके? वो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है वो आत्माओं के बाप की याद में टिके। हँ? और किसी की याद में दुनिया में न टिके। तो, तो कहेंगे उसको भगवान।
(किसी ने कुछ कहा।) मंथन? अरे? मंथन भी तो अधूरी स्टेज है ना। हँ? कि भगवान की स्टेज है? हँ? मंथन करता है, मनन-चिंतन-मंथन करता है तो मन का उपयोग करता है ना। हँ? हाँ। और भगवान को मन होता है क्या? हँ? भगवान को तो मन ही नहीं होता, हँ, जो मनन-चिंतन-मंथन करे। और उसे मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार भी? दरकार भी नहीं है। क्यों? क्योंकि वो तो अजन्मा है, अकर्ता है, अभोक्ता है, त्रिकालदर्शी है। हँ? जन्म-मरण के चक्र में न आने से वो तो सब कुछ जानता है पहले से ही। तो किस बात का मनन-चिंतन-मंथन करेगा? करेगा? हाँ, जिसमें प्रवेश करता है, हँ, देहधारी में तो उसके लिए बताया कि वो जिस देहधारी में प्रवेश करता है उसको पहले-पहले आप समान बनाता है। कैसा आप समान? हँ? निराकारी, निरहंकारी, हँ, निर्विकारी। अभोक्ता बनाता है कि नहीं? हँ? अरे? हाँ, अभोक्ता। जब आत्मा संपन्न बनेगी तो देहभान होगा तो भूख लगेगी? हँ? देहभान होगा तो कोई भी इन्द्रियों की भूख लगेगी कि नहीं? तो भूख लगेगी। और देहभान है ही नहीं, आत्मिक स्थिति है सदाकाल, तो भूख लगेगी? न कोई भूख, न कोई प्यास।

तो बताया – जैसे सुप्रीम सोल बाप हैविनली गॉड फादर कहा जाता है कि वो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, हँ, ज्ञान बताता है, जानकारी देता है। और जिसको जानकारी पहले-पहले देता है वो ही इस संसार में क्या कहा जाता है? भगवान। भगवान माने? भग का अर्थ भाग्यवान भी है। हँ? कहते हैं ना जिस घर में कन्या पैदा होती है तो कन्या अपना भाग्य लेके आती है। हँ? तो कन्या भग वाली है। हाँ। तो ज़रूर जो भाग्य है वो काहे से बनता है? सन्यासियों का भाग्य बनता है क्या? हँ? वो तो, वो तो घृणा के मारे छोड़छाड़ के भाग खड़े होते हैं। तो उनका भाग्य कहेंगे? कोई भाग्य नहीं। तो भाग्य तो कहा जाता है किसका ऊँचे ते ऊँचा? ऊँचे ते ऊँचा भाग्य उसका कहा जाता है जो विश्व का मालिक बने। हँ? कौनसी ताकत से? हँ? भगवान की, जो सुप्रीम सोल गॉड फादर है, उसकी याद की पावर से, हँ, योग की पावर से, हँ, विश्व का मालिक बन जाए। माने राजाई राजयोग से मिलती है ना। तो इसलिए; फिर उसे देहधारी थोड़ेही कहेंगे? क्या? देह में बुद्धि धरी रहेगी या विश्व कल्याण में बुद्धि धरी रहेगी? हँ? स्वार्थ में बुद्धि लगेगी, रथ माना शरीर के कल्याण में बुद्धि लगेगी या सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेगी? सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेगी। क्योंकि ये भी देहधारी है ना। ये भी कौन? ये भी है और फिर वो भी है। ‘ये’ किसके लिए कहा? हँ? हाँ, दादा लेखराज ब्रह्मा के लिए कहा जिसके तन में ये वाणी चलाई जा रही थी कि ये भी है देहधारी। ‘ये भी’ का मतलब क्या है? कि ये भी है और कोई दूसरा भी है देहधारी। तो इनको; इसको भी और जो दूसरा है उसको भी। हँ? मुकर्रर रथधारी भी है ना। ये तो टेम्परेरी रथ है। आज है, सन् 67 में है और पता नहीं एक साल के बाद रहे या, या न रहे। हाँ।

तो इनको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? दोनों को नहीं भगवान कहा जा सकता। कब? हँ? माने 1967 की बात बताई कि वो देहधारी हैं कि विदेही हैं? भगवान तो विदेही होता है। देह के विपरीत होता है। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। और आत्माएं सब भोगी होती हैं। इस दुनिया में सब आत्माएं भोगी कि संपूर्ण योगी? सब भोगी। तो भगवान तो विदेही है। वो भोग वासना से बिल्कुल न्यारा है। तो इनको भगवान नहीं कहा जा सकता। दोनों को नहीं। न मुकर्रर रथधारी को और न टेम्परेरी रथधारी दादा लेखराज ब्रह्मा को।

बाकि बच्चे जानते हैं। कौनसे बच्चे? रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कौन बच्चे जानते हैं? हँ? रूहानी बच्चे जानते हैं। तो वो रूहानी बच्चे जिस्मानी नहीं हुए? हँ? जिस्मानी हुए तो। लेकिन फिर भी कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं या नहीं हैं? हाँ, जरूर कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं। तो रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कि ये पहले ही से बताया जाता है। क्या? अभी की बात नहीं है 1967 की। ये तो पहले से ही बताया जाता है कि देहधारी को कभी भी भगवान नहीं कहा जा सकता है। हँ? न आज और न भविष्य में कभी और न पास्ट में कभी देहधारी को भगवान कहा गया हो ऐसे तो होता ही नहीं। और ये भी पहले से बताय दिया। क्या? कि रूहानी बच्चे कब कहे जाएं? जब रूह की पहचान हो।

तो रूह की पहचान, रूह की पहचान कब से कहें? हँ? कबसे कहें?
(किसी ने कुछ कहा।) 1936 से रूह की पहचान हो गई? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को रूह की पहचान हुई? माने 5 दिसम्बर को रूह की स्थिति में टिका नहीं, सिर्फ पहचान हुई? हँ? टिका या पहचान हुई? हँ? टिका भी। तो वो टिकने की बात नहीं है। पहचान कबसे हुई जो रूहानी बच्चा कहा जाए? एक पहचान होना अलग बात है। और उस स्थिति में टिकना अलग बात है। तो पहचान 1936 से हो गई? अच्छा? हँ? कैसे? हाँ। 36-37 में जब दादा लेखराज को उनके साक्षात्कारों का अर्थ बताया गया, हँ, तो फिर भगवान ने तो, जो भगवान ऊँच ते ऊँच आत्मा कही जाती है, सुप्रीम सोल गॉड फादर, वो तो कुछ न कुछ आकरके सुनाएगा ना। तो उसने तो पहले-पहले ये ही बात सुनाई होगी। क्या? क्या? गीता का पहले ओम मंडली में क्या किया जाता था? क्लेरिफिकेशन दिया जाता था, व्याख्या दी जाती थी। तो गीता में तो ये श्लोक आया हुआ है। क्या? अणोणीयांसम् अनुस्मरेत यः। आत्मा या आत्माओं का बाप क्या है? अणु रूप है। लेकिन किसी को समझ में नहीं आया। ये समझ में तो आया कि अणु रूप, अणोणीयांसम् माने अणु से भी अणु रूप छोटी से छोटी अति सूक्ष्म आत्मा, ये भृकुटि के मध्य में है, ये इतना समझ में आया। तो जिनको समझ में आया वो तो थोड़ा बहुत तो प्रैक्टिस करेंगे ना। तो बताया कि ये सभी देहधारी बच्चों को भगवान नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये इनकी देह तो है ही नहीं। किनकी देह? शिव बाप की देह तो है ही नहीं। ये तो बच्चे सभी जानते हैं ये पराई देह है।

Today’s morning class is dated 14.11.1967. The record played on Tuesday is – Ye kaun aaya aaj saverey-saverey, hm, ki dil chaunk utha saverey-saverey? (Who is this person who has come early in the morning that the heart is surprised early in the morning) Whose heart was astonished? The heart was astonished means that the heart was influenced. First of all whose heart was astonished? Hm? Arey, someone’s [heart] must have been astonished, wasn’t it? Hm?
(Someone said something.) Was the permanent Chariot astonished? He has a stone-like heart; was his heart astonished? Hm? How will the heart of a person with a stone-like intellect be? The heart of a person with stone-like intellect will also be a stone. Hm? Yes. They sing a song, don’t they? Pathhar ke sanam, tujhey hamney kya jana? Badi bhool hui (O my stone-like beloved, I couldn’t understand you. I committed a big mistake). What? Yes. So, this is a song; (Someone said something.) Is it the song of Lakshmi? Achcha? It is a song of Lakshmi of which time? Hm? Arey? Some see only Lakshmi. Hm? She should be visible to Narayan. Hm? Speak up? When? If Lakshmi’s heart was astonished, then when was it astonished? You don’t know that. You know that it was Lakshmi’s [heart] only which was surprised. Hm? Hm? (Someone said something.) Was the heart astonished on 5th December? Achcha? And who came early in the morning? Did the morning arrive on 5th December? Hm? When can we say that the morning arrived? And whose heart was astonished?

Arey, arey, first of all the heart of Dada Lekhraj, who had visions, was astonished. Hm? And he could not get the meaning of those visions from anywhere. Neither from his guru, nor from the scholars, pundits, teachers of Benares or from anyone. Then, on the basis of his experience, the scholarly person whom he found to be a true person, he reached out to his partner. So, whatever he (the partner) revealed, his (Dada Lekraj’s) heart was astonished. Was he astonished or wasn’t he? Yes. However he did not know as to who is this who has come. Hm?

Om Shanti. So, who is it that has come? God speaks (Bhagwaanuvaach). Did you hear? Who came? Hm? Who asked? Father Shiv asked – Did you hear – Who came early in the morning? Hm? And in whom did He come? Did you hear? Did you know anything? Whom did He ask first? First He asked Dada Lekhraj Brahma only. Who came? Arey, it is God who speaks. A bodily being is not called God. What? Is the one whose intellect is focused on the body called God? No. God neither takes up a body, nor does He takes a physical birth. Hm? And neither does He become attached to the body. He is not a bodily being at all. So, when He is not a bodily being, when He is videhi (one who does not have a body), then the Chariot of Arjun that has been depicted on the path of Bhakti is a memorial of which topic? Hm? It is a memorial of the same topic that He took the body of Arjun, didn’t He? He took this body like Chariot. Hm? So, it has been written in the scriptures itself – Shareeram ratham viddhi indriyanu hayanyaahu. Hm? It has been said like this, hasn’t it been? So, this body of Arjun which is ahead of everyone in earning the wealth of knowledge; so, what does God have? Yes? He has the property of inexhaustible wealth of knowledge. So, He will come only in the Chariot of the one who gives value to that, will He not? Yes. But the one in whose Chariot He came, is his intellect immersed in the body or is it immersed in the videhi? He does not know the videhi at all. Does he know? Hm? Does he know? No. Does anyone know as to when He comes, when He goes? Nobody knows. So, the Chariot-holder Arjun is a bodily being. He cannot be called God. Hm? Who can be called God?

The one whose intellect does not become constant in the body even for a second can be called God. What? Where should it become constant? Either it should become constant in the light of his soul or in whom should it become constant? He is a mind and intellect like soul; it should become constant in the remembrance of the Father of souls. Hm? It should not become constant in the remembrance of anyone else. Then, then he will be called God.
(Someone said something.) Churning? Arey? Churning is also an incomplete stage, isn’t it? Hm? Or is it God’s stage? Hm? When He churns, thinks and churns, then he uses the mind, doesn’t he? Hm? Yes. And does God have mind? Hm? God doesn’t have mind at all through which He could think and churn. And does He need to think and churn? He doesn’t need [to think and churn] as well. Why? It is because He is ajanma (one who doesn’t get physical birth), akarta (non-doer), abhokta (non-pleasure seeker), Trikaaldarshi (knower of past, present and future). Hm? As He doesn’t pass through the cycle of birth and death He knows everything beforehand. So, what will He think and churn about? Yes, the one in whom He enters, in the bodily being, it has been said for him that the bodily being in whom He enters He makes him first of all equal to Himself. In what way equal to Himself? Hm? Incorporeal, egoless, viceless. Does He make him abhokta or not? Hm? Arey? Yes, abhokta. When the soul will become perfect, then if there is body consciousness, will he feel hungry? Hm? If he has body consciousness, then will he feel the hunger of any of the organs or not? Then he will feel hungry. And if there is no body consciousness at all, if there is soul consciousness forever, then will he feel hungry? Neither any hunger, nor any thirst.

So, it was told – Just as it is said for the Supreme Soul Father, Heavenly God Father that He shows the path of establishing heaven, narrates knowledge, and gives information. And the one to whom He gives the information first of all, what is he called in this world? Bhagwaan (God). What is meant by Bhagwaan? The meaning of bhag is fortunate (bhaagyavaan) also. Hm? It is said, isn’t it that in whichever home a virgin gets birth, that virgin brings her own fortune. Hm? So, a virgin has a bhag (fortune). Yes. So, how is that fortune definitely formed? Do the sanyasis earn fortune? Hm? They, they run away [from the household] due to hatred. So, will they be said to have earned fortune? No fortune. So, whose fortune is said to be highest on high? The one who becomes the master of the world is said to earn the highest on high fortune. Hm? Through which power? Hm? He should become the master of the world through the power of remembrance, through the power of Yoga of God, the Supreme Soul God Father. It means that the kingship is achieved through rajyog, isn’t it? So, that is why; then will he be called a bodily being? What? Will the intellect be focused on the body or will the intellect remain focussed on the benefit of the world? Hm? Will the intellect be busy in selfishness (swaarth), will the intellect be busy in the benefit of the rath (Chariot), i.e. the body or will the intellect remain engaged in the benefit of the entire world? The intellect will remain busy in the benefit of the entire world. It is because this one is also a bodily being, isn’t he? Who ‘this one also’? This one is also there and then that one is also there. For whom was it said ‘this one’? Hm? Yes, it was said for Dada Lekhraj Brahma in whose body this Vani was being narrated that this one is also a bodily being. What is the meaning of ‘this one also’? That this one is also there and there is another bodily being also. So, these; this one also and the other one also. Hm? There is the permanent Chariot-holder also, isn’t he? This one is a temporary Chariot. He exists today; he exists in 67 and who knows whether he will remain after one year or not. Yes.

So, these cannot be called God. Hm? Both cannot be called God. When? Hm? It means that the topic of 1967 was mentioned that are they bodily beings or bodiless (videhi)? God is bodiless. He is opposite (vipreet) to the body. Dehi means the soul which assumes the body. All other souls are pleasure-seekers (bhogi). Are all the souls in this world bhogi or complete yogis? All are bhogis. So, God is videhi. He is completely detached from pleasure and lust. So, these cannot be called God. Neither of them. Neither the permanent Chariot-holder nor the temporary Chariot-holder Dada Lekhraj Brahma.

As such children know. Which children? The spiritual children know that Baba has come. Which children know? Hm? The spiritual children know. So, aren’t those spiritual children physical? Hm? They are indeed physical. But however, do they become constant in the stage of the soul to some extent or the other or not? Yes, they definitely become constant in the stage of the soul to some extent or the other. So, the spiritual children know that Baba has come. It is told beforehand. What? It is not the topic of the present, 1967. It is told beforehand that a bodily being can never be called God. Hm? It never happens at all that either today or in future or in the past was any bodily being ever called God;. And this was also told beforehand. What? That when will you be called spiritual children? It is when you get the introduction of the soul.

So, from when would it be said that you recognized the soul, realized the soul? Hm? From when can you say?
(Someone said something.) Was the soul realized from 1936? Hm? (Someone said something.) Was the soul realized on 5th December? Does it mean that he did not become constant in the stage of soul, but just realized it on 5th December? Hm? Did he become constant or did he realize? Hm? He also became constant. So, it is not about that becoming constant. Since when did the realization take place that he would be called a spiritual child? Realizing is a different topic. And becoming constant in that stage is a different topic. So, did the realization take place from 1936? Achcha? Hm? How? Yes. When Dada Lekhraj was told about the meanings of his visions in 36-37, then God, the God, who is called the highest on high soul, the Supreme Soul God Father, He will come and narrate something or the other, will He not? So, He must have told this topic first of all. What? What? What did they used to do with Gita in the Om Mandali initially? Its clarification, its interpretation used to be given. So, this shlok has been mentioned in the Gita. What? Anoneeyaamsam anusmaret yah. What is the soul or the Father of souls? He is a form of atom. But nobody understood. They did understand that it is in an atomic form, anoneeyaamsam, i.e. it is smaller than an atom, smallest of all, very subtle soul, in the middle of the bhrikuti. So, those who understood will practice to some extent, will they not? So, it was told that all these bodily children cannot be called God because this is not His body at all. Whose body? Father Shiv doesn’t have a body at all. All the children know that this body is alien.
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arjun
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शिवबाबा की मुरली
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वीसीडी 2809, दिनांक 04.03.2019
VCD 2809, dated 04.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2809-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.18
Time- 00.01-22.18


14.11.1967. मंगलवार को पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – अभी इनको आत्माभिमानी बनाय; हँ? किनको? इन ब्रह्मा नामधारियों को आत्माभिमानी बनाय और बैठकरके आय समान बनाय रहे हैं। हँ? आप समान माना? हँ? निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता। हँ? तो क्या चारों ही, पांचों ही ब्रह्मा नामधारी निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता की स्टेज पर पहुंचेंगे कि सारे संसार का विनाश भी कर दें फिर भी, हँ, जैसे कुछ भी नहीं किया? अकर्ता की स्टेज पर टिके रहें। हँ? पांचों ब्रह्मा नामधारियों को ऐसी स्टेज धारण कराय देते हैं आप समान बनाने की? हाँ, क्योंकि जिसको कहा आप समान, वो तुरीया तो एक ही है। तो तुरीया एक ही तुरीया को तुरीया बनाता है।

तो आत्मा की महिमा गाई जाती है। हँ? कब? हाँ, शरीर की तो कोई महिमा नहीं गाई जाती है। हँ? वास्तव में हर एक की आत्मा की महिमा गाई जाती है। भई, फलाना था। हरेक की आत्मा की? हाँ। हर एक आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जब पहले-पहले जनम में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा; सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है या राजसी या तामसी? सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा गाई जाती है। कहते हैं भई फलाना था, बहुत अच्छा था। हँ? तो सतोप्रधान था ना, सात्विक था ना, तभी तो अच्छा था ना। हाँ। अब शरीर तो नहीं कहेंगे। क्या? अब। हँ? शरीर तो नहीं। बाकि आत्मा के लिए कहा जाता था कि फलाने की आत्मा बहुत अच्छी। अच्छी तरह से पार्ट बजाया। और आत्मा के पार्ट का तो किसको मालूम भी नहीं है बच्चे। बाकि ये ज़रूर महिमा करेंगे उस जीव आत्मा की। हँ? किस जीव आत्मा की? हँ? किधर इशारा किया? बाबा तो मिसाल देते हैं; भक्तिमार्ग की दुनिया का मिसाल देते हैं।

तो मिसाल दिया भई नेहरू बड़ा अच्छा था। क्या? क्या नाम दिया? नेह का रूह। नेह माने? स्नेह, हँ, का रूह बड़ा अच्छा था। तो कहेंगे कि जिसका मिसाल दिया, नेहरू बड़ा अच्छा था। बच्चों को बहुत प्यार करता था। हँ? तो हद का नेहरू या बेहद का नेहरू? हँ? क्या कहेंगे? हद का नेहरू अपन को आत्मिक स्थिति में स्थित करता था? नहीं। तो जो आत्मिक स्थिति में स्थिर करे उसकी बात है कि सबको आत्मा-आत्मा भाई-भाई के रूप में उस दृष्टि से देखे तो कहेंगे कि रूह अच्छी। और देह की दृष्टि से देखा, हँ, और दैहिक प्यार किया तो अच्छा कहेंगे क्या? नहीं। तो मिसाल दिया बाहर की दुनिया का लेकिन तुम बच्चों के मिसाल दिया क्योंकि तुम बच्चे तो आत्मा हो ना। आत्मा अपने को समझ लिया ना। हाँ। जैसे नेहरू के लिए कहते हैं वैसे शास्त्री भी बड़ा अच्छा था। हँ? अभी शास्त्री का तो शरीर नहीं है। हँ? बाकि कहेंगे कि शास्त्री की आत्मा बड़ी अच्छी थी।

तो बाप बैठकरके समझाते हैं कि मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। हँ? कौन आया हूँ? आत्मा आया हूँ या शरीर आया हूँ? हँ? मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। माना इसको कहा जाता है प्रभात। क्या? प्रकष्ट रूपेण ‘भा’ माने रोशनी देने वाला। प्रभात। हाँ। सवेरे को सूर्य निकलता है ना। तो सवेरे की सूर्य की किरणें जो हैं वो ज्यादा फायदेमन्द होती हैं या दोपहर और शाम की किरणें ज्यादा फायदेमन्द होती हैं? हँ? कौनसी ज्यादा फायदेमन्द? दुनिया में तो शरीर को हिसाब से देखते हैं तो वो स्थूल सूर्य को कहते हैं सवेरे 7-8 बजे की सूर्य की किरणें लेना चाहिए। लेकिन वो तो स्थूल सूर्य है ना। हँ? यहाँ तो बात किसकी है? ज्ञान सूर्य चैतन्य आत्मा की बात है ना। कहते ही हैं सत, चित, आनन्द। चैतन्य है ना? तो वो, वो जब आता है तो ज्ञान की रोशनी का प्रभात, हँ, सवेरे को कहा जाता है। हँ? उसको कहेंगे अंग्रेजी में ए.एम.। ए.एम. की शुरुआत, माना एकदम फर्स्टक्लास या सेकण्ड, थर्ड क्लास? हाँ, एकदम फर्स्टक्लास ए.एम. प्रभात; प्रभात हो गई। हँ? फिर बाद में कहेंगे पी.एम. हो गई। हँ? क्या हो गई? पहले ए.एम. हो गई। बाद में पी.एम. हो गई। तो प्रभात तो ए.एम. हो गई ना। सवेरे में। बारह बजे के बाद फिर दिन हो जाता है। कौनसे बारह बजे के बाद? दोपहर के या रात के? हँ? हँ? वो स्थूल सूर्य हो या ये चैतन्य सूर्य हो। हँ? इसका जो प्रत्यक्षता रूपी जन्म है वो कबसे शुरु होता है? हँ? भारत में भी मनाते हैं। क्या मनाते? घोर अज्ञान अंधकार की रात्रि शिवरात्रि मनाते हैं ना। मनाते हैं। हाँ। तो ये किस आधार पर मनाते हैं? भारत में तो सवेरे को जब सूर्य निकलता है; हँ? जो इन आँखों से देखे, जो इन कानों से दूसरों से सुने बस सूर्य निकल आया, हँ, तब मानते हैं दिन की शुरुआत। भारतवासी दिन की शुरुआत कै बजे मानते हैं? हँ? स्थूल सूर्य निकलता है, देखने में आता है तब मानते हैं, सुनने में आता है तब मानते हैं या रात के 12 बजे से मानते हैं? हँ? कब मानते हैं? सवेरे 6 बजे से 5 बजे से, हाँ, दिन की शुरुआत मानते हैं।

तो बाबा ने यहाँ जो 12 बजे से बोला 12 बजे के बाद फिर दिन हो जाते हैं। ये किस हिसाब से बोला? दोपहर के 12 बजे के बाद या रात के 12 बजे के बाद? हँ? हाँ, क्योंकि बाप विदेशी बनकरके आया है ना। हँ? तो विदेशी बनकरके आया है तो विदेशियों की बात पहले करेगा या पहले स्वदेशियों की बात करेगा? हँ? क्यों? विदेशियों की क्यों? क्योंकि स्वदेशी तो कुंभकर्ण बनके पड़े हुए हैं। और विदेशी? विदेशियों को कोई कुंभकर्ण कहेगा? हँ? सोते हैं? नहीं। वो तो ज्यादा बुद्धिमान हैं, बाप को पहचान लेते हैं। क्या? जब बाप आते हैं तो विदेशियों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है कि भारतवासी कुंभकर्णों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है? हँ? भारतवासी कुंभकर्ण तो नींद में, अज्ञान की नींद में सोए पड़े हैं। हाँ। मनाते हैं। क्या? क्या मनाते हैं? कि भारत में, नार्थ इंडिया में भगवान का जनम हुआ। चाहे वो कृष्ण के रूप में मथुरा में हुआ हो, चाहे वो विश्वनाथ शंकर के रूप में बनारस, काशी में हुआ हो। और चाहे राम भगवान के रूप में अयोध्या में हुआ हो। भक्तिमार्ग में तो ये मानते हैं; क्या? भगवान का जन्म तो नार्थ इंडिया में होता है, हँ, लेकिन जब भगवान प्रैक्टिकल में आते हैं तो क्या पहचान पाते हैं? हँ? वो नहीं पहचान पाते। जो भी प्रत्यक्षता होती है जो भारत का विदेश, दक्षिण भारत बताया है जिनकी भाषा भी अलग, कि नहीं? भाषा भी अलग। और परंपराएं भी नार्थ इंडिया वालों से अलग। परंपराएं भी। और धनाढ्य भी? नार्थ इंडिया में ज्यादा धनाढ्य कि दक्षिण भारत में ज्यादा धनाढ्य? कहाँ ज्यादा धनाढ्य? हाँ, दक्षिण भारत में धनाढ़्य भी।

तो देखो हाँ, दक्षिण भारत की आत्माएं पहले आती हैं बाप के सन्मुख। हँ? आती हैं? हाँ। भले अंदर से नहीं समझ पातीं लेकिन शरीर से तो आती हैं ना। आती हैं। तो बताया 12 बजे के बाद जो दिन हो जाते हैं, वो विदेशियों के हिसाब से बताया रात के बारह बजे से सूर्य निकलना शुरू होता है स्थूल सूर्य या सवेरे को जब दिखाई पड़ता है तब सूर्य उदय होता है? वास्तविकता क्या है? हँ? कहेंगे रात के बारह बजे तक सूर्य डूबता रहता है। और रात के बारह बजे से, हाँ, उदय होना शुरू होता है। तो पहले-पहले जो पश्चिम में जाता है ना सूर्य तो पश्चिम में जाता है, तो पश्चिम में कौनसे देश हैं? कहेंगे अमेरिका है, यूरोप है। है ना? तो, जो अमेरिका, यूरोप कनाडावासी हैं वो पहले पहचानते हैं। हाँ। और इधर जो पूरब साइड के हैं वो अज्ञान की नींद में सोए पड़े रहते हैं।

तो बताया – उनके भी जो बीज हैं वो कहाँ हैं? हँ? कहाँ हैं? बताया – वो हैं दक्षिण भारत में। हँ? जो बताया ना जो मूल रूप में बीज दिखाए जाते हैं, आठ हैं ना। हाँ। वो आठ बीजों की पूजा कहाँ होती है? हँ? मूर्तियां कहाँ बनती हैं? मंदिर कहाँ बनते हैं? कहां बने हुए हैं? दक्षिण भारत में। तो बताया कि ये पहले पहचान लेते हैं। तो जब पहचानते हैं तो क्या कहेंगे? कि जो देखे, जो सुने, हँ, वो स्थिति आ गई? वो स्थिति नहीं आई। माना देखने की इन आँखों से और इन कानों से दो शब्द वो ध्यान देकरके, जैसे, हँ, जैसे सुना जाता है बड़ा आदमी आता है ना एरिया में, जैसे प्रधान मंत्री आता है, राष्ट्रपति आता है तो कितनी भीड़ लगती है। हँ? कितने चाव से सुनते हैं! क्या बोल रहा है? कैसा है? क्या है? आँखें फाड़-फाड़ के देखते हैं। देखते हैं या नहीं? हाँ। तो इससे तो ज्यादा बेहद का, बड़ा और कोई पार्ट बजाने वाली आत्मा संसार में है ही नहीं। लेकिन भारतवासी क्या करते हैं? हँ? भारतवासी सोए पड़े रहते हैं। और वो जिनको बोला कि बाप विदेशी बनकरके किसके लिए आते हैं? भारतवासियों के लिए पहले आते हैं या विदेशियों के लिए आते हैं? हाँ, विदेशियों के लिए आते हैं क्योंकि विदेशी ही बाप को पहले पहचानते हैं। पहचानते हैं और डम-8 चारों तरफ क्या होता है? हाँ, नगाड़ा बजाय देते हैं बाप आ गया। बेसिक में भी ऐसे ही होता है। पश्चिम में आवाज़ निकली, चलो इंडिया से ही निकली, तो कहाँ से निकली? दक्षिण हैदराबाद? हँ? पश्चिम हैदराबाद से या दक्षिण हैदराबाद से? पश्चिम हैदराबाद से निकली ना। तो पश्चिमी देश हुआ ना। भारत का पश्चिमी देश हुआ। ऐसे तो नहीं कहेंगे पूर्वी देश हुआ। हँ? आता तो है पूरब में वास्तव में। क्या? कहते हैं ना कि इस रथ को कहाँ से पकड़ा? कहते हैं, हँ, कलकत्ते से पकड़ा। क्यों? क्योंकि कलकत्ते में ही यादगार है। क्या? इस मनुष्य सृष्टि का बीज कहाँ पड़ा हुआ है जो बड़े वृक्ष के रूप में दिखाया जाता है? बनियन ट्री। है ना।

तो लेकिन वो पहचाना किसी ने नहीं। क्या? पहचाना किसी ने? जो चार मुख वाले ब्रह्मा हैं चार दिशाओं के, हँ, वो उन्होंने पहचाना? उन्होंने भी नहीं पहचाना। और पांचवां मुख जो है ऊर्ध्वमुखी मुख कहा जाता है ब्रह्मा का उसने पहचाना? उसने भी? उसने भी नहीं पहचाना। तो ब्रह्मा तो विदेश में नहीं होता है। ब्रह्मा विदेश में होता है कि स्वदेश में होता है? ब्रह्मा सो विष्णु। हँ? ब्रह्मा कहेंगे मुख वालों को जिनके मुख इकट्ठे होकरके बोलते हैं। हँ? और तो जैसे रावण के मुख होते हैं तो मुख से बोलते हैं। हँ? सहयोग देते हैं? रावण राम राज्य की स्थापना में सहयोग देता है? कि विरोध करता है? हाँ, विरोध करता है। वो जो दिखाया गया है ना कि सागर मंथन हुआ, हँ, तो जो सांप था ना जिसकी रस्सी बनाई गई मथानी, वो मथानी, वो घुमाने के लिए तो मुख किसकी तरफ रहा? मुख रहा किसकी ओर? हाँ, असुरों की ओर मुख रहा। और भारतवासियों की ओर, देवताओं की ओर? हाँ, पूंछड़ी। इसका मतलब क्या हुआ? कि भारतवासी पूंछ माने फालो करते हैं पूंछ को पकड़ते हैं। और जो विदेशी हैं वो क्या करते हैं? हँ? पूंछ को नहीं पकड़ते, मुँह पकड़ते हैं। तुमने ये ऐसा किया, ये हमें समझाओ, वो ऐसा किया, वो समझाओ, ये कैसे हो सकता है? वो कैसे होता? ये हमारी समझ में नहीं आता। वो हमारी समझ में नहीं आता। ऐसे-ऐसे करते रहते हैं। सामना ज्यादा करते हैं। हँ? तो उनको फिर क्या होता है? उनको वा सांप की जो विषैली फुंकार है ना वो सहन करनी पड़ती है।

तो बताया – बाप किसके लिए आए? बाप ये देखते हैं; क्या? बाप ये बात देखते हैं कि कौन अपोजिशन कर रहा है, कौन अपोजिशन नहीं कर रहा है? हर बात में, हँ, कोई को तो हर बात अच्छी लगती है। और कोई को हर बात में, क्या, संशय पैदा होता है। तो बाप को दोनों प्रिय हैं या कोई एक प्रिय है एक प्रिय नहीं है? हँ? बाप को तो दोनों प्रिय। हँ? क्योंकि जानते हैं कि ये जो भी मेरे बच्चे हैं वो सब मेरे से वर्सा लेने वाले हैं। कौनसा वर्सा? हँ? पहले जनम का पहले-पहले सुख का वर्सा सबको मिलना है। हाँ। और उसमें भी जितने जनम पार्ट बजाएंगे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, आधा समय सुख और आधा समय दुख। ये तो सबको है। बाकि हाँ, कि जो मेरे डायरेक्ट बच्चे बनते हैं, हँ, पहचान करके बनते हैं; पहचान करके माने? निराकार सो साकार तो पहचाना या सिर्फ निराकार को पहचाना और साकार के ऊपर विश्वास नहीं बैठा तो पहचाना? नहीं। साकार सो निराकार भगवान को अच्छी तरह से पहचान करके, हँ, जो आँखों से भी देख लेते हैं और कानों से भी दो शब्द सुनते हैं, तो ऐसे बच्चों के लिए बताया कि मैं बाद में प्रत्यक्ष होता हूँ। क्या? पहले-पहले किसके सामने? प्रिफरेंस किसको देता हूँ? प्रिफरेंस विदेशियों को देता हूँ या स्वदेशियों को? विदेशियों को देता हूँ। क्यों? क्योंकि अगर बाप विदेशी बनकरके न आते तो इन बच्चों से मिल भी नहीं, हँ, मिल पाते? नहीं मिल पाते। तो बताया कि रात के बारह बजे वास्तव में दिन होना शुरू होता है। हाँ, और उस बात की गहराई को विदेशी जो बुद्धि में ज्यादा तीखे होते हैं या कहो बुद्धि का जिनको ज्यादा अभिमान होता है वो ही पहचान पाते हैं। दूसरे पहचान पाते हैं? नहीं।

14.11.1967. The topic being discussed in the middle of the first page on Tuesday was – Now, after making these soul conscious; hm? Whom? After making these titleholders of Brahma soul conscious and He is sitting and making them equal to Himself. Hm? What is meant by ‘equal to Himself’? Hm? Incorporeal, viceless, egoless, non-doer (akarta), non-pleasure seeker (abhokta). Hm? So, will all the four, all the five titleholders of Brahma reach the stage of incorporeal, viceless, egoless, akarta, abhokta that even if they destroy the entire world, it is as if they did not do anything? They should remain constant in the stage of akarta. Hm? Does He make all the five titleholders of Brahma reach that stage of becoming equal to Himself? Yes, because the one who was said to be equal to Himself, that unique (turiya) is only one. So, the Unique makes only one unique as unique.

So, the praise of the soul is sung. Hm? When? Yes, no praise of the body is sung. Hm? Actually, it is the soul of everyone which is praised. Brother, he was such and such person. Of the soul everyone? Yes. When each soul plays its part in the very first birth on this world stage then its glory; does it play its part in a satvik (pure) stage or in raajasi (semi-pure) or taamsi (impure)? When it plays its part in a pure stage, then its glory is sung. People say, brother, there was such and such person; he was very good. Hm? So, he was satopradhan, wasn’t he? He was satwik, wasn’t he? Only then was he good, wasn’t he? Yes. Well, the body will not be called. What? Now. Hm? Not the body. It used to be said for the soul that the soul of such and such person was very good. It played a part very nicely. And children, nobody knows about the part of the soul. But they will definitely praise that jeev aatma. Hm? Of which jeev aatma? Hm? In which direction was a gesture made? Baba gives an example; He gives the example of the world of the path of Bhakti.

So, an example was given that brother, Nehru was very good. What? Which name was he given? Neh ka rooh (soul of love). What is meant by neh? The soul (rooh) of sneh was very nice. So, it will be said that the one whose example was given, Nehru was very good. He used to love the children a lot. Hm? So, was it the limited Nehru or the unlimited Nehru? Hm? What will you say? Did the limited Nehru used to make himself constant in soul conscious stage? No. So, the one who makes himself constant in soul conscious stage, it is about him that if he sees everyone with the vision of souls being brothers, then it will be said that the soul is good. And if he sees through the vision of the body and if he gives physical love, then will he be called good? No. So, an example was given of the outside world, but an example of you children was given because you children are souls, aren’t you? You considered yourself to be a soul, didn’t you? Yes. Just as it is said for Nehru, similarly Shaastri was also good. Hm? Now Shaastri’s body doesn’t exist. Hm? But it will be said that Shaastri’s soul was very good.

So, the Father sits and explains that I have come early in the morning. Hm? What have I come as? Have I come as a soul or as a body? Hm? I have come early in the morning. It means that this is called prabhaat (early morning). What? Prakasht roopen (in a special manner), bha, i.e. the one who gives light. Prabhaat. Yes. The Sun rises in the morning, doesn’t it? So, are the early morning rays of the Sun more beneficial or are the rays of the afternoon and evening more beneficial? Hm? Which are more beneficial? In the world, from the point of view of the body, it is said for that physical Sun that you should receive the sun rays between 7-8 AM. But that is a physical Sun, isn’t it? Hm? Whose topic is it here? It is a topic of the Sun of Knowledge, a living soul, isn’t it? It is said – Sat, chit, anand. He is living, isn’t he? So, He, when He comes then it is said to be the morning of the light of knowledge. Hm? That is called A.M. in English. Does the beginning of A.M. mean completely first class or second, third class? Yes, completely first class A.M., prabhaat (early morning). Morning started. Hm? Then later it will be said that it is P.M. Hm? What happened? First it was A.M. Later it became P.M. So, morning is A.M., isn’t it? In the morning. It becomes day after 12 O’clock [midnight]. After which 12 O’clock? Of the afternoon or of the night? Hm? Hm? Be it that physical Sun or this living Sun. Hm? When does the revelation-like birth of this one start? Hm? They celebrate in India also. What do they celebrate? They celebrate the night of complete ignorance, Shivratri, don’t they? They do celebrate. Yes. So, on which basis do they celebrate? In India when the Sun rises in the morning; Hm? Whoever sees through these eyes, whoever listens through these ears, that is it; the Sun came out, then they believe the day to have begun. From which time do the residents of India believe the day to begin? Hm? Do they believe when the physical Sun comes out, is visible, is heard of or do they believe it to be from 12 midnight? Hm? When do they believe? They believe it to be from 6 A.M., from 5 A.M. yes.

So, Baba said here that from 12 O’ clock, after 12 O’clock the day starts. On what account did He say this? After 12 noon or after 12 midnight? Hm? Yes, it is because the Father has come as a foreigner, hasn’t He? Hm? So, when He has come as a foreigner, then will He talk of the foreigners (videshis) first or will He talk of the swadeshis (residents of India) first? Why? Why about the videshis? It is because the swadeshis have become Kumbhakarnas. And the videshis? Will anyone call the videshis as Kumbhakarnas? Hm? Do they sleep? No. They are more intelligent; they recognize the Father. What? When the Father comes, then does the revelation take place through the videshis or through the residents of India, the Kumbhakarnas? Hm? The residents of India, the Kumbhakarnas are sleeping in the slumber of ignorance. Yes. They celebrate. What? What do they celebrate? That God was born in India, in north India. It may have been in the form of Krishna in Mathura; it may have been in the form of Vishwanath Shankar in Benares, Kashi. And it may have been in the form of God Ram in Ayodhya. They believe so on the path of Bhakti. What? God is born in north India, but when God comes in practical, then are they able to recognize? Hm? They are unable to recognize. Whatever revelation takes place, south India which was mentioned as India’s abroad, whose language is also different; or not? Their language is also different. And their traditions are also different from the north Indians. The traditions also. And the wealthy also? Are there more rich people in north India or are there more rich people in south India? Where are richer people found? Yes, wealthy people also in South India.

So, look, yes, the souls of south India come face to face with the Father first. Hm? Do they come? Yes. Although they are unable to understand from inside, yet they come through their bodies, don’t they? They come. So, it was told that the day which starts after 12 O’clock, it was told that from the point of view of the foreigners does the Sun, the physical Sun start rising from 12 O’clock in the night or does the Sun rise when it is visible in the morning? What is the reality? Hm? It will be said that the Sun keeps on setting till 12 O’clock in the night. And yes, it starts rising from 12 O’clock in the night. So, first of all the Sun goes to the West, doesn’t it? It goes to the west; so, which countries are situated in the west? It will be said that there is America, there is Europe. Isn’t it? So, the residents of America, Europe, and Canada recognize first. Yes. And those who belong to the Eastern side here keep on sleeping in the slumber of ignorance.

So, it was told – Where are their seeds also? Hm? Where are they? It was told – They are in south India. Hm? It was told that the seeds which are shown originally are eight, aren’t they? Yes. Where are those eight seeds worshipped? Hm? Where are idols formed? Where are temples built? Where are they built? In south India. So, it was told that they recognize first. So, when they recognize, then what will be said? Has the situation arrived that ‘whoever sees, whoever listens’? That situation hasn’t arrived. It means that seeing through these eyes and listening to two words through these ears, for example, hm, people listen; when a big personality comes in your area, for example, the Prime Minister comes, the President comes, then such a big crowd gathers. Hm? People listen with such interest! What is he speaking? How is he? What is he? They see with their eyes wide open. Do they see or not? Yes. So, there is no soul which plays greater unlimited, bigger part in the world at all. But what do the residents of India do? Hm? The residents of India keep on sleeping. And those for whom it was said that the Father has come as a foreigner for whom? Does He come first for the residents of India or for the foreigners? Yes, He comes for the foreigners because it is the foreigners who recognize the Father first. They recognize and what happens everywhere ‘dum-8’? Yes, they play the trumpet that the Father has come. It happens like this in basic also. The sound emerged in the West; okay, it emerged from India only, so, where did it emerge from? Hyderabad, South [India]? Hm? From Hyderabad, West [India] or from Hyderabad, South [India]? It emerged from Hyderabd, West [India], didn’t it? So, it is a Western country, isn’t it? It happens to be the Western country of India. It will not be said that it is an Eastern country. Hm? He actually comes in the East in reality. What? It is said, isn’t it that where was this Chariot caught from? It is said that it was caught from Calcutta. Why? It is because there is a memorial in Calcutta only. What? Where the seed of this human world is sowed, which has been depicted in the form of a big tree? Banyan tree? Isn’t it?

So, but nobody recognized Him. What? Did anyone recognize? Did the four-headed Brahmas of four directions recognize? They too didn’t recognize. And the fifth head, which is said to be upward facing (oordhwamukhi) head of Brahma, did he recognize? He too? He too didn’t recognize. So, Brahma doesn’t exist in the foreign countries. Does Brahma exist in the foreign countries or in India (swadesh)? Brahma becomes Vishnu. Hm? Brahma will be said to be those with heads, whose heads talk collectively. Hm? And just as there are heads of Ravan, so, they speak through the mouths. Hm? Do they extend cooperation? Does Ravan extend cooperation in the establishment of the kingdom of Ram? Or does he oppose? Yes, he opposes. It has been shown that when the ocean was churned, then in which direction was the head of the snake which was used as a rope to rotate the mathaani (churning rod)? In which direction was the head? Yes, the head was towards the demons. And towards the residents of India, the deities? Yes, the tail. What does it mean? That the residents of India follow the tail, i.e. catch the tail. And what do the foreigners do? Hm? They do not catch the tail, they catch the mouth. You did like this; explain to us this topic; he did like this; explain that topic; how can this be possible? How does that happen? I cannot understand this. I cannot understand that. They keep on doing like this. They confront more. Hm? So, what happens to them? They have to tolerate the poisonous hiss of the snake.

So, it was told – why has the Father come? The Father observes; what? The Father observes the topic that who is indulging in opposition, who is not indulging in opposition? In every topic, hm, someone likes every topic. And some raises a doubt in every topic. So, does the Father like both or does He like one and does not like the other? Hm? The Father likes both. Hm? It is because He knows that all these children of Mine are going to obtain inheritance from Me. Which inheritance? Hm? Everyone is to receive the inheritance of happiness of the first birth first of all. Yes. And even in it whatever number of births they play their part on this world stage, they enjoy happiness for half the time and suffer sorrows for half the time. This is for everyone. But yes, those who become My direct children; recognize Me and become; what is meant by ‘after recognizing’? Did they recognize if they know the incorporeal within the corporeal or did they recognize if they recognize just the incorporeal and do not develop faith on the corporeal? No. After recognizing well the incorporeal God within the corporeal, those who see through their eyes also and hear two words through their ears also, then it was said for such children that I am revealed later on. What? First of all in front of whom? Whom do I give preference? Do I give preference to the foreigners or to the residents of India (swadeshis)? I give [preference] to the foreigners. Why? It is because had the Father not come as a foreigner, then He would not have been able to meet these children; hm? Could He meet? He couldn’t meet. So, it was told that the day actually begins at 12 O’clock in the night. Yes, and only the foreigners who have a sharper intellect or you may say those who have more ego of the intellect are able to realize the depth of that topic. Are others able to recognize? No.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2810, दिनांक 05.03.2019
VCD 2810, dated 05.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2810-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.36
Time- 00.01-16.36

प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को दूसरे पेज के पांचवीं लाइन में बात चल रही थी कि पावन किसको कहा जाता है और पतित किसको कहा जाता है? माना इस दुनिया में कोई पावन ते पावन आत्मा पार्ट बजाने वाली होगी ना। हाँ। और पतित से पतित पार्ट बजाने वाली आत्मा भी कोई होगी ना। नहीं होगी? होगी। पावन माने क्या? कैसे कहें वो पावन? और कैसे कहें वो पतित? हँ? हाँ, शिव जिस साकार में आते हैं वो अपने साकार तन, साकार इन्द्रियों के द्वारा, हँ, उन इन्द्रयों से जितना व्यभिचारी बनता है, हँ, उतना इस दुनिया में और कोई भी मनुष्य आत्मा व्यभिचारी नहीं बनती है। इसलिए उसको पतित से पतिततम कामी कांटा कहा जाता है। बताया भी है – संगमयुग कब तक? पतिततम कामी कांटे में शिव साकार होते जब तक। कब तक? हँ? 100 साल। लिख लिया? पक्का-पक्का लिख लिया? याद कर लिया? क्या? सलोगन हो गया ये। हँ? हाँ। संगमयुग कब तक? पतिततम कामी कांटे में शिव साकार होते जब तक। समझा? हाँ। तो कितने साल? सौ साल।

ऐसे नहीं कि कोई ओम मंडली में ही ये पतित होता रहा। नहीं। वहाँ तो 300-400 ही अमेरिका के अखबारों में पड़ गया कि कलकत्ते का एक जौहरी है, हँ, कहता है कि 300-400 रानियां मिल गईं। अब 16000 चाहिए। लेकिन 16000 तो नहीं हुई ना। हाँ। ओम मंडली खलास हो गई। बात खतम हो गई। फिर शुरु हुई ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय। हुआ ना। हाँ। 1947 से ब्रह्मा के नाम से। तो उस विद्यालय में भी, हँ, कोई ऐसा निकला क्या, हँ, जिसने 300-400 से संख्या बढ़ाकरके 1000-1500 से भी ऊपर कर दी? कर दी या नहीं कर दी? हँ? प्रूफ चाहिए। जरूर प्रूफ होंगे। हँ? जिन्होंने लिख के दिया होगा। क्या? तन से, तन की इन्द्रियों से ना। तन से, मन से, धन से हम ईश्वरीय सेवा में, हँ, ईश्वर ही, जिसको हमने ईश्वर मान लिया ना, निश्चय पत्र दिया नहीं लिख के? हाँ, किसी को मान लिया ना। तो उसके हम सहयोगी ही बनके जैसे चलाएगा, वैसे चलेंगे। जैसे मत देगा उसी मत पर चलेंगे। तो पतित कैसी मत देगा? हँ? पतित कैसी मत देगा? पतित मत देगा कि पावन मत देगा? हँ? हाँ। देखो, पतित तो जरूर पतित बनाने की ही मत देगा।

अब उसमें दूसरी आत्मा भी है। कौन? सुप्रीम सोल। वो तो आई है, आता ही है पतिततम कामी कांटे में। उसको सुधार लिया तो सारी दुनिया सुधर जाएगी। तो वो सुप्रीम सोल क्या कहता है? हँ? वो कहता है। क्या? हँ? जो भी मनुष्य मात्र हैं इस दुनिया में नर; नर कहा जाता है ना मनुष्यों को। तो वो सब नरक बनाने वाले हैं। नरक माने व्यभिचार की दुनिया। नरक माने? नर क। नर क्या करता है? व्यभिचार की दुनिया बनाता है। अब उनमें चाहे कोई अव्वल नंबर हो, आदम हो, एडम हो, हँ, जिसे हिंदू लोग कहते हैं आदि देव, जैनी लोग कहते हैं आदीश्वर, आदिनाथ। हँ? कोई भी ऊँच ते ऊँच पार्ट बजाने वाली मनुष्यात्मा हो, हँ, वो नरक ही बनाएगी या स्वर्ग बनाएगी? क्या बनाएगी? नरक ही बनाएगी।

तो पता चला कि पतित से पतित किसको कहा जाता है, हँ, और पावन ते पावन किसको कहा जाता है? हाँ, उसी सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर को कहा जाता है जो आकरके, क्या, रास्ता बताता है कि वो हैविन कैसे बनेगा जिस हैविन में व्यभिचार का नाम-निशान नहीं होता? आँखों का भी व्यभिचार का नाम-निशान नहीं। श्रेष्ठ इन्द्रियों में, हँ, जो ज्ञानेन्द्रियां हैं ना श्रेष्ठ इन्द्रियां, उनमें श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जो आँखें हैं, उन आँखों से भी वहाँ स्वर्ग में व्यभिचार नहीं होता। तो वो ये कहता है। कौन? सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर। कहता ही है या कुछ करके भी दिखाता है? हँ? हाँ। उस तन में प्रवेश करता है। किस तन में? जिसे अर्जुन का रथ कह दो। आदम का रथ कह दो। बात तो एक ही है। तो उसकी इन्द्रियों को कंट्रोल करके; हं? एकदम नहीं। कहता है धीरे-धीरे, आहिस्ते-आहिस्ते क्या करो? मेरे को याद करो। कैसे याद करो? अपन को ज्योति बिन्दु, जैसे मैं ज्योतिबिन्दु हूँ, अपन को आत्मा समझ भृकुटि के मध्य में जहाँ मैं बैठता हूँ तुम भी भृकुटि के मध्य में मुझे याद करेंगे तो क्या होगा? तो मेरे जैसे पावन बनेंगे या नहीं? संग का रंग लगेगा या नहीं? लगेगा।

तो ये राजयोग बताया। इसमें राज़ भरा हुआ है। क्या राज़ भरा हुआ है? यही राज़ भरा हुआ है कि इस दुनिया में जो देवात्माएं हैं, हँ, सतयुग, त्रेता कहो, स्वर्ग कहो, वहाँ की जो देवात्माएं हैं वो द्वैतवादी द्वापर, कलियुग की दुनिया में जब उतरती हैं तो वो असुरों के संग के रंग में आकरके, हँ, इस दुनिया को नरक बनाना शुरू करती हैं, देवात्माएं भी। क्यों? क्योंकि वो देवात्माएं, कौनसे देश की हैं? हँ? मातृ देश की हैं या पितृ देश की हैं? एक ही मातृ देश है सारी दुनिया में। भारत। इसलिए आज भी भारत की जो गोर्मेन्ट है ना वो झंडा ऊंचा करके बड़ी जोर-शोर से कहती है – भारत माता की जय। बोलती है कि नहीं? हाँ। बिचारों को पिता भूल जाता है। हाँ। तो अब वो भारत माता कोई विधवा तो नहीं होगी। विधवा होगी? भारत में विधवाओं की मान्यता है? नहीं है। विधवाओं की थोड़ेही मान्यता है। सधवाओं को पूजा जाता है, मान्यता है, या विधवाओं की मान्यता है? नहीं।

तो बताया कि ये जो गोर्मेन्ट है ना वो गोर्मेन्ट भी भ्रष्टाचारी गोर्मेन्ट बन जाती है। भ्रष्टाचारी मनुष्यों के संग के रंग में आकरके ऐसे-ऐसे फाइव स्टार होटल खोलती है जिनमें कउओं की कांव-कांव होती ही रहती है। आओ, आओ हम भी गंद खाएं, तुम भी गंद खाओ। हाँ। प्रधानमंत्री बिचारे कहते रहते हैं। क्या? कोई भी मंत्री फाइव स्टार होटलों में नहीं जाएगा। हाँ। वो कहते रहते हैं। तो भी जाना बंद करते हैं क्या? अरे, सवाल ही पैदा नहीं होता। तो बताया कि ऐसी जो भ्रष्टाचारी गोर्मेन्ट अंत में बनती है, वो तब बनती है जब मैं इस सृष्टि पर भारत में आ जाता हूँ। कौन? शिव सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर उस पतिततम कामी कांटे में जिसे बताया; पूछा ना पावन किसको कहा जाता है पतित किसको कहा जाता है? वो आत्माओं का नाम बताओ। तो पता चला? पतिततम कौन आत्मा और पावनतम कौन आत्मा? पतिततम, हाँ, वो ही आत्मा जिसे इस दुनिया के जो भी आस्तिक धरम हैं वो सब जानते भी हैं और मानते भी हैं। किसको? हाँ, अर्जुन को, आदम को, प्रजापिता, प्रजापति को मानते हैं कि नहीं? हाँ, जानते भी हैं। वो ही मनुष्य सृष्टि का पहला पुरुष है। और मुसलमान आज भी कहते हैं – अरे, क्या बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो? माना सबसे पुराना हुआ ना। हाँ। तो सबसे पुराना तो मनुष्य सृष्टि का बाप ही होगा। बाप माने? बीज। बीज माने? बाप क्या करता है? बीज ही डालने का तो काम करता है। तो बाप माना ही बीज।

तो वो मनुष्य सृष्टि का बीज इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, हँ, सबसे जास्ती जन्म लेते-लेते 84 के चक्र में आते-आते सबसे जास्ती पतित बन जाता है। तो उसको पतित कहा जाता है। हँ? और वो आत्मा कलियुग में आकरके मध्यांत में बोलती भी है अपने ही मुख से, हँ, लिखके रख देती है। क्या? हँ? मैं पतितन को राजा। क्या? सारी दुनिया में पतित ही पतित तो हैं। कलियुग में। क्या? पावन है कोई? कोई नहीं। तो उनका राजा? राजा तो सबसे ज्यादा पतित होगा ना। होता भी है। और देखने में भी आता है। हिस्ट्री देख लो उठाके राजाओं की। कितनी-कितनी ढ़ेर की ढ़ेर रानियां रखी हैं। तो राजाएं, जो हिस्ट्री बनी है मनुष्यों की मनुष्यों के द्वारा, उसमें राजाएं पतित हुए हैं या पावन बने हैं? हँ? पतित ही बने हैं।

तो बताया कि पतित किसको कहा जाता है और पावन किसको कहा जाता है। पावन उसको कहा जाता है जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल पार्ट नहीं बजाता है। क्या? जैसे और धरमपिताएं सौ बरस के अंदर अपना धर्म स्थापन करते हैं और गायब हो जाते हैं। गायब हो जाते हैं कि नहीं? पता चलता है कहाँ गए? हाँ। ऐसे ही वो सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर शिव जो है निराकार; कि साकार? निराकार, हँ, ज्योतिबिन्दु आत्मा, इस सृष्टि से सौ वर्ष का पार्ट बजाकरके गायब हो जाता है। कहाँ गायब हो जाता है? हँ? हाँ, वो तो सदा आत्मा है ना। देह तो नहीं है। तो आत्म लोक में चला जाता है। कौनसे आत्मलोक में? हाँ, जिस आत्मलोक में, हाँ, देवात्माओं से लेकरके; देवताएं 16 कला संपूर्ण होते हैं ना। तो 16 कला संपूर्ण देवात्माओं से लेकरके, हँ, जो भी ऋषि-मुनि की मनुष्यात्माएं हैं या दैत्य आत्माएं, राक्षसी आत्माएं हैं या पशु-पक्षी हैं, कीड़े-मकोड़े हैं, इन्सैक्ट्स हैं, सबकी सामान्य आत्माओं का वो घर है। सामान्य आत्माओं का। विशेष आत्माओं का नहीं। विशेष आत्माएं कौन? विशेष आत्माएं वो ही हैं जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर शिव बाप आते हैं तो उसको सबसे पहले पहचानती हैं और पहचान करके सबसे जास्ती सहयोग तन का, मन का, धन का, समय का, संबंधियों का, संपर्कियों की ताकत लगाकरके सारा सहयोग देती हैं।

तो वो हैं बाप के डायरेक्ट बच्चे, हँ, जिन्हें भारतवर्ष में ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों में लिखा है रुद्रगण। कहाँ रहते हैं? हँ? मैदान में नीचे रहते हैं कि पहाड़ पे ऊँचे रहते हैं? अरे, उनका बाप कैलाशीवासी है। कहाँ का वासी? कैलाश पर्वत का वासी है। हाँ। तो उस कैलाश पर्वत का जो बाप का बच्चा है; 16 कला संपूर्ण कोई बच्चा होगा ना। तो वो 16 कला संपूर्ण बच्चा भी, हँ, उसी पर्वत का वासी होगा। क्या नाम दिया है? कहते हैं हिमवान; हिमालय। काहे का आलय? आलय माने घर। काहे का आलय? हिम का आलय। वो ऐसी जगह है जहाँ सदा गर्मियों में भी हिम, हँ, हाँ, बर्फ जमी ही रहती है। माना कोई पहाड़ की बात नहीं है। पहाड़ का मिसाल दिया है। जैसे सूरज, चांद, सितारों का, सागर का, पृथ्वी का, नदियों का मिसाल दिया जाता है ना। ऐसे ही वो पहाड़ है हिमालय पहाड़ जो दुनिया का सबसे ऊँचा पहाड़ है। पहाड़ है। लेकिन उसकी ऊँचे से ऊँची चोटी कौन है? चोटी वो ही पतिततम कामी कांटा एवर ईस्ट चोटी। कैसी? एवर ईस्ट। हाँ। एकदम पूर्वीय सभ्यता का पक्का पार्ट बजाने वाला आदि से अंत तक। ऐसी आत्मा है जो आदि के जीवन में पहले जीवन; 84 के चक्कर में से जो पहला जन्म है, उसमें एकदम शिव बाप हैविनली गॉड फादर के समान पावनतम बनती है मनुष्यों के बीच में। हीरो पार्टधारी। और फिर नीचे उतरते-उतरते, हँ, धीरे-धीरे नीचे उतरते, क्योंकि राजयोग सीखा है ना सबसे जास्ती, योगीश्वर बनती है ना। तो वो धीरे-धीरे नीचे उतरेगी कि एकदम नीचे उतर पड़ेगी? हाँ, योगबल की ताकत आत्मा में भरी रहती है तो धीरे-धीरे नीचे उतरते-उतरते अंतिम जनम में जाकरके सबसे जास्ती नीच, तमोप्रधान, पतित बन जाती है। तो बात तो समझ में आ गई इस दुनिया में पतिततम किसको कहा जाता है, पावनतम किसको कहा जाता है।

A morning class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fifth line of the second page on Tuesday was that who is called pure and who is called sinful? It means that there must be a soul playing the purest of all part, mustn’t there be? Yes. And there must also be a soul playing the most sinful part, mustn’t there be? Will there not be? There will be. What is meant by pure? How can we say that he is pure? And how will we say that he is sinful? Hm? Yes, the corporeal in whom Shiv comes, the extent to which he becomes adulterous through his corporeal body, corporeal organs, no human soul becomes adulterous to that extent in this world through those organs. This is why he is also called the most sinful, lustful thorn. It has also been told – Until when is the Confluence Age? Until Shiv is corporeal in the most sinful, lustful thorn. Until when? Hm? 100 years. Did you write? Did you write firmly? Did you memorize? What? This has become a slogan. Hm? Yes. Until when is the Confluence Age? Until Shiv is corporeal in the most sinful, lustful thorn. Did you understand? Yes. So, how many years? Hundred years.

It is not as if he continued to become sinful in the Om Mandali only. No. There only 300-400; it was published in a newspaper of America that there is a jeweler in Calcutta who says that he has got 300-400 queens. Now he wants 16000. But 16000 have not gathered, have they? Yes. The Om Mandali ended. The topic ended. Then the Brahmakumari Ishwariya Vishwa Vidyalaya started. It started, didn’t it? Yes. From 1947 by the name of Brahma. So, in that Vidyalaya also, did any such person emerge who increased the number from 300-400 to more than 1000-1500? Did he increase or not? Hm? A proof is required. There must definitely be proofs. Hm? Those who must have given in writing. What? Through the body, through the organs of the body, didn’t they? Through the body, through the mind, through the wealth, we will be busy in Godly service, hm, only God, the one whom we accepted as God, didn’t we? Didn’t we write a letter of faith and give? Yes, we accepted someone, didn’t we? So, we will tread as His helpers in whatever way He makes us to tread. We will follow the directions that He gives. So, what kind of direction will a sinful one give? Hm? What kind of a direction will a sinful one give? Will he give a sinful direction or will he give a pure direction? Hm? Yes. Look, a sinful one will definitely give directions for making sinful only.

Well, there is another soul also in him. Who? The Supreme Soul. It has come; He comes only in the most sinful, lustful thorn. If He reforms him, then the entire world will reform. So, what does that Supreme Soul say? Hm? He says; what? Hm? All the human beings in this world, the men (nar); Human beings are called nar, aren’t they? So, all of them build a hell (narak). Narak means a world of adultery. What is meant by narak? Nar ka. What does a nar (man) do? He establishes a world of adultery. Well, one may be number one among them, be it Aadam, be it Adam, whom the Hindus call Aadi Dev, Jains call him Aadishwar, Aadinath. Hm? Be it any human soul playing the highest on high part, will it create hell or heaven? What will it build? It will build a hell only.

So, did you get to know as to who is called the most sinful one, hm, and who is called the purest one? Yes, the same Supreme Soul Heavenly God Father, who comes and shows the path that how will that heaven be established, the heaven in which there is no trace of adultery? There is no trace of adultery even of the eyes. Among the righteous organs, hm, the sense organs, the righteous organs, among them the most righteous ones, the eyes, there is no adultery even through those eyes there in heaven. So, He says this. Who? The Supreme Soul Heavenly God Father. Does He just say or does He also do something and show? Hm? Yes. He enters in that body. In which body? Call it the Chariot of Arjun. Call it the Chariot of Aadam. It is one and the same topic. So, by controlling his organs; hm? Not suddenly; He says – what should you do slowly, gradually? Remember Me. How should you remember? Consider yourself to be a point of light; just as I am a point of light, hm, consider yourself to be soul in the middle of the bhrikuti where I sit, if you also remember Me in the middle of the forehead, then what will happen? Then will you become pure like Me or not? Will you be coloured by the company or not? You will be.

So, this rajyog was mentioned. It is full of secrets (raaz). What is the secret filled in it? The secret filled is that the deity souls in this world, hm, the deity souls of the Golden Age, the Silver Age, the heaven, when they descend to the dualist Copper Age, Iron Age world, then they get coloured by the company of the demons and the deity souls also start making this world a hell. Why? It is because to which country do those deity souls belong? Hm? Do they belong to the motherland or the fatherland? There is only one motherland in the entire world. India. This is why even to this day the government of India raises the flag high and says loudly – Hail the victory of Mother India. Does it say or not? Yes. The poor fellows forget the Father. Yes. So, well, that Mother India will not be a widow. Will she be a widow? Are widows recognized in India? They aren’t. The widows are not recognized. Are the married women worshipped, recognized or are the widows recognized? No.

So, it was told that this government, isn’t it, even that government becomes an unrighteous government. It gets coloured by the company of the unrighteous human beings and opens such five star hotels in which the crows keep on crowing. Come, come, we will also eat dirt, you also eat dirt. Yes. Poor Prime Minister keeps on telling. What? No Minister will go to the five star hotels. Yes. He keeps on telling. Yet, do they stop going there? Arey, the question does not arise at all. So, it was told that such unrighteous government which is formed in the end, it is formed at a time when I come to this world in India. Who? Shiv, the Supreme Soul, the Heavenly God Father in that most sinful, lustful thorn for whom it was told; It was asked, wasn’t it that who is called pure one and who is called sinful? Tell the name of those souls. So, did you know? Who is the most sinful soul and who is the purest soul? The most sinful one, yes, the same soul, whom all the theist religions of this world know and they also believe. Whom? Yes, do they believe in Arjun, Aadam, Prajapita or not? Yes, they also know. He is the first man of the human world. And the Muslims say even today – Arey, why do you talk about the times of Baba Aadam? It means that he is the oldest one, isn’t he? Yes. So, the oldest one will be the Father of the human world only. What is meant by the Father? The seed. What is meant by the seed? What does a Father do? He performs the task of sowing the seed only. So, the Father itself means seed.

So, that seed of the human world on this world stage, hm, while getting most births, while passing through the cycle of 84 becomes the most sinful one. So, he is called the sinful one. Hm? And after reaching the end of the middle portion the Iron Age, that soul even says through its own mouth, it puts it in writing. What? Hm? Mai patitan ko raja (I am the king of the sinful ones). What? There are only sinful ones in the entire world. In the Iron Age. What? Is there any pure one? Nobody. So, their king? The king will be the most sinful one, will he not be? He too is indeed. And he is also seen to be so. Pick up and look at the history of the kings. They have so many, numerous queens. So the kings; history of human beings has been written by the human beings; in it were the kings sinful or did they become pure? Hm? They have become sinful only.

So, it was told that who is called sinful and who is called pure. The one who does not play a part forever on this world stage is called pure. What? Just as other founders of religions establish their religion within hundred years and then vanish. Do they vanish or not? Do you know where they went? Yes. Similarly, that Supreme Soul Heavenly God Father Shiv who is incorporeal; or corporeal? The incorporeal, hm, point of light soul plays His part for hundred years and vanishes from this world. Where does He vanish? Hm? Yes, He is forever a soul, isn’t He? He is not a body. So, He goes to the Soul World. In which Soul World? Yes, the Soul World in which, yes, from the deity souls; the deities are perfect in 16 celestial degrees, aren’t they? So, from the deity souls who are perfect in 16 celestial degrees, all the human souls of the sages and saints or the demoniac souls or animals or birds, the worms and insects, the insects, it is the home for everyone’s ordinary souls. Of ordinary souls. Not of the special souls. Who are the special souls? Special souls are the ones who recognize first of all the Father Shiv when He comes to this world stage and after recognizing Him they render the maximum help through the power of their body, mind, wealth, time, relatives, and contacts and render the entire help.

So, they are the direct children of the Father who have been mentioned by the sages and saints in the scriptures as Rudragan. Where do they live? Hm? Do they live on the plains below or do they live on the high mountains? Arey, their Father is a resident of [Mount]Kailash. Resident of which place? He is a resident of Mount Kailash. Yes. So, the Father’s child of that Mount Kailash; there must be a child perfect in 16 celestial degrees, mustn’t there be? So, even that child perfect in 16 celestial degrees will be a resident of that mountain only. What is the name assigned? He is called Himvaan, Himalay. Aalay (house) of what? Aalay means house. House of what? House of ice. It is a place where there is ice forever, even in the summers. It means that it is not a topic of any mountain. An example of a mountain has been given. For example, the example of the Sun, the Moon, the stars, the ocean, the Earth, the rivers is given, isn’t it? Similarly that mountain is Mount Himalaya which is the highest mountain of the world. It is a mountain. But who is its highest peak? The peak is the same most sinful, lustful thorn, the Ever East peak. How? Ever East. Yes. The one who plays a firm part in completely Eastern civilization from the beginning to the end. He is such a soul who, in the beginning of the life, in the first life; in the first birth in the cycle of 84 he becomes the purest one among the human beings, equal to the Father Shiv, the Heavenly God Father. The hero actor. And then while coming down, while coming down gradually, because he has learnt RajYoga more than anyone else, becomes Yogishwar, doesn’t it? So, will he descend gradually or will he descend suddenly? Yes, the power of Yoga remains filled in the soul; so, while descending gradually, in the last birth it becomes the lowliest, degraded, and sinful. So, you have now understood as to who is called the most sinful one in this world and who is called the purest one.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2811, दिनांक 06.03.2019
VCD 2811, dated 06.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2811-extracts-Bilingual

समय- 00.01-29.32
Time- 00.01-29.32


प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को दूसरे पेज के मध्यादि में, मध्य में, मध्यादि में बात चल रही थी कि बच्चों में ये समझ होनी चाहिए कि ये सृष्टि में आत्माएं कैसे आती हैं। नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार आती हैं। तो ये शुरू से लेकरके कलहयुग तक ये आत्माएं कैसे आती हैं ये समझ चाहिए। बाप ने समझाया है ये जो झाड़ है वो भी देखो आहिस्ते-आहिस्ते वृद्धि को पाता है। झाड़ का मिसाल दिया है। शास्त्रों में भी मिसाल दिया है अश्वत्थ वृक्ष। तो अश्वत्थ वृक्ष नाम दिया है तो अश्व तो मन रूपी घोड़े को ही कहा जाता है ना। मन रूपी घोड़ा जो इतना चलायमान है, उसको स्थिर करने में; कबसे चलायमान है? ढ़ाई हज़ार साल से चलायमान है। तो उसको स्थिर करने में टाइम तो लगेगा ना। तो ये लंबा टाइम लग जाता है। आहिस्ते-आहिस्ते ही काम होगा ना। और ये झाड़ में तीन फाउन्टेन भी हैं। हँ? एक तो थुर है। हँ? तीन फाउन्टेन भी हैं क्योंकि थुर को फाउन्टेन में नहीं ले आएंगे ना। थुर तो एक ही है। थुर तो थुर ही है ना। पीछे तीन ट्यूब्स निकलती हैं। इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन। तीन निकलते हैं। देखो, इसको कहा ही जाता है फ्लावरवाज़। अच्छा, फिर देखो उन तीन ट्यूब्स से कितनी ब्रांचेज़ निकलती हैं। हँ? ढ़ेर के ढ़ेर मठ-पंथ, संप्रदाय निकल पड़ते हैं। सहयोगी धर्म पहले निकलते हैं। फिर मठ, पंथ, संप्रदाय निकल पड़ते हैं।

तुम तो कलकत्ते में भी होकरके आई हो। तो वहाँ ज़रूर बनियन ट्री भी देखा होगा। देखा था बच्ची? अरे, ये तो देखो तुम बनियन ट्री ही नहीं देखो। किसी ने कहा – देखा है। देखा ना? और इसने नहीं देखा। बनियन ट्री किसको कहा जाता है। बड़ वृक्ष का झाड़ है। तो किसी ने कहा – कलकत्ते में अभी नहीं गए थे। अच्छा। ये कलकत्ते में बच्ची नहीं गई? अच्छा, तुम तो देखा? आगे देखा हुआ है। अच्छा! खैर वो तो पास्ट हो गया। नहीं तो वास्तव में चक्कर लगाना होता है तो पहले कलकत्ते जाकरके फिर चक्कर लगाकरके फिर यहाँ से पास होकरके मुंबई चला जाते हैं। कलकत्ता तो बहुत बड़ा शहर है। बहुत बड़ा शहर है। तो वो तो देखने की चीज़ है। अब देखा होगा या नहीं देखा होगा। ये तो खुद ही जानती होगी। देखा है बच्ची कलकत्ता? किसी ने कहा – नहीं। तो तो तुमने कुछ भी नहीं देखा। कलकत्ता तो देखने जैसा है। उसकी रौनक और है। और बॉम्बे की रौनक और है। वो कलकत्ता नदी के किनारे पर है और वो बॉम्बे समुंदर के किनारे पर है। हँ? और देहली तो भले जमुना के किनारे पर है परन्तु वो देहली में जमुना तो बीच में है शहर के। हँ? दिल्ली का हिस्सा पूरब साइड में पड़ता है कुछ पश्चिम में, दक्षिण में। कलकत्ता जैसे किनारे पे है। क्योंकि समुद्र भी तो बाजू में है ना। बिल्कुल ही बाजू में।

उनका नाम भी देखो कितना अच्छा रखा हुआ है। हँ? डायमंड हार्बर। इंग्लिश में नाम रखा हुआ है। भई हीरे जैसा। तो वो, वो बंदर, अरे, वो बंदर नहीं कहता हूँ पूंछ वाला। नहीं, बंदरगाह। बंदरगाह, जहाँ स्टीमर खड़ा रहता है बंदर में। तो इसका नाम ही रखा है हीरे जैसा। डायमंड हार्बर। क्योंकि वो भी तो तीर्थ है ना बच्चे। ब्रह्मपुत्री, ब्रह्मपुत्रा, और, और सागर। तो ये है ना। ब्रह्मा की पुत्री भी है। जैसे ये देखो ब्रह्मपुत्री और ये ब्रह्मा। तो देखो सागर इनमें प्रवेश किया हुआ है। सागर। तो वो ब्रह्मपुत्री भी जाकरके सागर में प्रवेश करती है। हँ? तो बरोबर ये भी ब्रह्मा। तो ब्रह्मा कहेंगे ना इनको। ये भी तो बड़ी नदी है ना। बाबा ने समझाया है ना वो, बहुत दफा समझाया है, ये है सबसे बड़ी नदी। हँ? ब्रह्मा। ब्रह्मा सबसे बड़ी नदी। ये सागर नहीं कहेंगे। नदी ही कहेंगे।

14.11.67 का प्रातः क्लास, तीसरा पेज। तो ये नदी सबसे बड़ी नदी। तो पहले-पहले छोड़ करती है सागर में। और इसके ऊपर मेला बड़ा भारी लगता है क्योंकि यहाँ भी मेला लगते हैं जीवात्मा और परमात्मा का। हँ? जीवात्मा कौन? और परमात्मा कौन? हँ? जीवात्मा, हँ, कौन? जीवन धारण करने वाली आत्मा। तो क्या जो परमात्मा है वो जीवन धारण करने वाला नहीं है क्या? हँ? तो अलग-अलग क्यों कर दिया? हँ? इसलिए अलग कर दिया कि वो जो जीवात्मा है साकार में ब्रह्मा बाबा, वो जीवात्मा परमात्मा नहीं कही जा सकती। माना आत्माओं में परम पार्टधारी नहीं कहा जा सकता। तो देखो, यहाँ ब्रह्मपुत्री लगता है ना। ये ब्रह्मा के पास लगता है मेला। तो यहाँ इतना बड़ा मेला लगते हैं कलकत्ते में। वहाँ तुम गई नहीं हो देखो। वो सागर और नदी का बड़ा मेला लगता है। और कब लगता है? हँ? गर्मी में लगता है? बरसात में लगता है कि ठंडी में लगता है? कब लगता है? बहुत ठंडी में। शिवरात्रि आती है तो बहुत, हँ, माघ मास का अंतिम मेला होता है तो बहुत जाते हैं।

यूं तो अपना बाप ने समझाया है कि जो भारत है वो भारत तो सारा ही बड़े ते बड़ा तीर्थ है। उसमें भी बाबा ने समझाय दिया है तो जनम एक, एक जगह में लेता है, हँ, और शरीर दूसरी जगह में लेते हैं। ये क्या बात? डॉट, डॉट (..) जनम एक है डॉट, डॉट (..) जगह में लेता है और शरीर दूसरी जगह में लेते हैं। माना? हँ? है तो भारत के ही अंदर। कोई दूसरी जगह में नहीं है। हँ? कौन? जनम जो प्रत्यक्षता रूपी जनम की बात है वो मगध देश में। हँ? और शरीर दूसरी जगह धारण किया। कहाँ? कहाँ से रथ पकड़ा? कलकत्ते में। तो जहाँ से जनम लिया उसको मगध देश कहा जाता है। मगरमच्छ जैसे वो मनुष्य वहाँ रहते हैं। हँ? है ना? बहुत खाते हैं, पीते हैं और भला मच्छ, मगरमच्छ भी वहाँ रहते हैं। तो ये बहुत नामीग्रामी है।

तो बाप बैठकरके समझाते हैं कि बच्चे ये जो बनियन ट्री है वहाँ वो अभी बिल्कुल ही उसका मिसाल गीता में भी लगा हुआ है अश्वत्थ वृक्ष के नाम से कि उनका थुर अभी नहीं है। बाकि तो एकदम हरा-भरा है। माना थुर नहीं है, ऐसे क्यों दिखाया? थुर माने जहाँ एक धर्म हो, एक राज्य हो, एक भाषा हो, एक कुल हो, एक मत हो, तो वो एक थुर दिखाया गया। वो अब ये नहीं है। माना स्वर्ग अभी? अभी तो नहीं है। बाकि हां, वो वृक्ष तो हरा-भरा खड़ा है अभी भी। भले वो स्वर्ग रूपी थुर नहीं है। फिर भी वो वृक्ष कभी भी सूखता नहीं है। हँ? ये जो बनियन ट्री है ना वो सूखता नहीं है। हँ? सदैव सरसब्ज़ रहते हैं। थुर है नहीं उसका। नहीं तो कोई वृक्ष हो जिसका थुर चला जावे तो वो तो सूख जाते हैं। पर इसका ही मिसाल देते हैं सृष्टि के लिए। हँ? क्यों? इसका मिसाल क्यों देते हैं? क्योंकि ये सृष्टि रूपी जो अश्वत्थ वृक्ष है यही, ये सृष्टि रूपी रंगमंच पर पूरा 84 का चक्कर लगाता है। तो आधा समय स्वर्ग। फिर आधा समय नरक। और द्वैतवाद शुरू होता है। दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो कुल, दो-दो मर्यादाएं, दो से चार, चार से आठ। तो है तो वो एक ही वृक्ष ना।

तो बाप बैठकरके समझाते हैं बच्चों को तो ये भी एक बड़ा झाड़ है। क्या? हँ? कौन? क्या बड़ा झाड़ है ये भी? जिसका राज़ बाप बैठकरके समझाते हैं सारा कि इसका बीज बहुत छोटा अति सूक्ष्म। और झाड़ बहुत बड़ा। तो ये तुम्हारी बुद्धि में सारा झाड़ है अभी। और देखो ऊपर में परमधाम में देखेंगे, जाएंगे तो वहां उल्टा झाड़। क्या? बीज ऊपर में और झाड़? झाड़ है नीचे। ऊपर में? क्योंकि सत है ना। जो सत होगा, सच्चा होगा वो सदा ऊपर रहेगा या डाउन हो जाएगा? ऊपर रहेगा। सत ही नहीं, चैतन्य भी है, आनन्द भी है। आनन्द में भी है। और इस मनुष्य सृष्टि का बीज रूप भी है। हँ? मनुष्यों की सृष्टि। मनुष्य चैतन्य तो ये मनुष्यों की सृष्टि भी चैतन्य आत्माओं की। तो उनका बीज भी है। मनुष्यों का बीज तो जरूर मनुष्य ही होगा। तो ये भी तो गाया हुआ है। और बीज को ही ऊपर याद करते हैं। हँ? ओ गॉड फादर! हँ? ऊपर क्यों याद करते हैं? देखो, वो गॉड फादर बेहद का बीज हुआ ना। हँ? और जो धर्म हैं उनको तो फिर भी कहेंगे हद के। ऐसे तो नहीं कहेंगे कि 500-700 करोड़ पत्तों के वो बीज हैं कोई। कोई भी नहीं। ये तो जो भी इस झाड़ के पत्ते हैं 500-700 करोड़ सबका एक ही बीज है मनुष्य सृष्टि का बाप। तो फादर हुआ ना। अभी तुम बच्चों को अच्छी तरह से डीटेल में समझाया जाता है कि बरोबर बीज ऊपर में है। और फिर उस बीज का क्रियेटर; हँ? बीज को क्रियेटर भी तो कहा जाता है ना। तो क्रियेट करने वाला तो ऊपर में होगा ना। हँ? जिस क्रियेटर को बच्चे याद करते हैं अभी। क्रियेटर को याद करते हो ना बच्ची। कहेंगे – हाँ, शिवबाबा को याद करते हो। हँ? शिवबाबा को याद करते हो। तो क्रियेटर ऊपर में ज़रूर है क्योंकि ऐसे ही याद किया जाता है ओ फादर, ओ बाबा! हाथ उठाकरक ऊपर करेंगे ना। ओ पतित-पावन! हे परमपिता परमात्मा! हे दुख हर्ता! हे सुखकर्ता! तो जब ये पुकारते हैं तो बुद्धि ऊपर में चली जाती है।

तो उनको बुलाया जाता है कि आओ। अब यहाँ फिर ‘उनको’ लगाय दिया। हँ? क्यों नहीं कहें ‘उसको बुलाया जाता है’? हँ? क्योंकि आत्माएं तो दो हैं ना। एक है सदा शिव। और दूसरा सदा शिव तो नहीं कहेंगे। हँ? सदा कल्याणकारी है? क्यों? कैसे नहीं कल्याणकारी है? हँ? दूसरा जो है नंबर दो वो सदा कल्याणकारी कैसे नहीं है? हँ? क्योंकि विनाश कराय देता है। तो कल्याणकारी हुआ? हँ? विनाश करना कोई कल्याण की बात हुई क्या? नहीं। तो एक है सदा कल्याणकारी और एक सदा नहीं कहेंगे। हाँ। तो वो दोनों इकट्ठे होते हैं तो उनको बुलाया जाता है। आयकरके देखो पढ़ाते हैं अभी तुम बच्चों को। पढ़ाते कौन हैं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) वो जो सदा शिव है वो पढ़ाते हैं और जो सदा शिव नहीं है वो पढ़ाते हैं? दोनों पढ़ाते हैं? अच्छा? पत्थरबुद्धि पढ़ाएगा? हँ? पत्थरबुद्धि भी पढ़ाता है? एक है। (किसी ने कुछ कहा।) हँ? समान बनता है तब? बनाया किसने? वो भूल गया। हँ? जिसने बनाया वो भूल गया। और जो बन गया वो याद गया (रहा)। हँ? दोनों? लड्डू। बताया वो बाप पढ़ाने वाला भी एक, हँ, टीचर और बाप भी एक और सद्गुरु भी एक कहें? नहीं कहेंगे। क्यों? सद्गति की बात करें तो सद्गति तो शरीर के साथ होती है कि बिना शरीर के सद्गति? बिना शरीर के क्या कहते हैं? शरीर नहीं है तो सद्गति तो नहीं कहते हैं। गति कहते हैं। गति माने मुक्ति। गति माने कहां के लिए गति? ऊपर के लिए [गति]। माना ऊपर जो गति हुई, ऊपर गए तो वहाँ जाकरके सुख भोगेंगे? हँ? वहाँ तो सुख नहीं है। क्या है? शांति है। तो देखो बाबा समझाय देते हैं ना बच्ची। ये अक्षर जरूर रखना चाहिए। क्या? कि वो बाप भी है, टीचर भी है, हँ, और सुप्रीम है। सुप्रीम टीचर, सुप्रीम बाप। और गुरु भी है। कौन? एक ही तो है। साकार में निराकार तो एक हुआ या दो हुए? एक ही हुआ। तो ये तुम बच्चों को अभी अच्छी तरह से मालूम हो गया।

A morning class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion, in the middle, in the beginning of the middle portion of the second page on Tuesday was that children should have the wisdom as to how the souls come in this world. They come numberwise as per their purusharth. So, the wisdom is required as to how these souls come from the beginning to the Iron Age. The Father has explained that look, this Tree also grows gradually. An example of a tree has been given. In the scriptures also the example of Ashwathh Vriksh (Ashwathh tree) has been given. So, when the name Ashwatth Tree has been coined, then the mind-like horse is called ashwa, isn’t it? In order to stabilize the mind-like horse which is so inconstant; since when is it unstable? It is inconstant since 2500 years. So, it will take time to make it stable, doesn’t it? So, a long time is taken. The task will be accomplished gradually, will it not be? And there are three fountains also in this tree. Hm? One is the stem. Hm? There are three fountains also because the stem will not be counted in the fountain, will it be? The stem is only one. The stem is stem only, isn’t it? Later three tubes emerge. Islamic, Buddhist, Christian. Three emerge. Look, this is called a flower vase. Achcha, then look, so many branches emerge from those three tubes. Hm? Numerous math-panth, sampradaay (sects/communities) emerge. The helper religions emerge first. Then math, panth, sampradaay emerge.

You have been to Calcutta as well. So, you must have definitely seen the Banyan tree there. Did you see daughter? Arey, look, you haven’t seen the Banyan tree itself. Someone said – I have seen. You have seen, haven’t you? And this one has not seen. What is meant by Banyan tree? It is a tree called ‘bud vriksh’. So, someone said – We haven’t yet been to Calcutta. Achcha. Hasn’t this daughter been to Calcutta? Achcha, have you seen? You have seen in the past. Achcha! Anyhow, that is past. Otherwise, actually if you have to go around, then first you go to Calcutta, then after going around, then while passing through this place you go to Mumbai. Calcutta is a very big city. It is a very big city. So, that is a thing to be seen. Well, you might have seen or you might not have seen. She herself must be aware. Daughter, have you seen Calcutta? Someone said – No. So, then, you haven’t seen anything. Calcutta is worth seeing. Its magnificence is different. And Bombay’s magnificence is different. That Calcutta is on the banks of a river and that Bombay is on the sea shore. Hm? And although Delhi is on the banks of Jamuna (a river), yet Jamuna is in the middle of the city in Delhi. Hm? Some portion of Delhi is on the Eastern side and some in the West, in the south. Calcutta is on the shore. It is because the ocean is also nearby, isn’t it? Very near.

Look, the name that it has been given is also so nice. Hm? Diamond Harbour. The name has been coined in English. Brother, like a diamond. So, that Bandar, arey, I am not talking of that Bandar (monkey) with a tail. No, bandargaah (port). Bandargaah, where the steamer remains anchored in the dock. So, its name itself has been coined ‘like a diamond’. Diamond Harbour. It is because that is also a pilgrimage center (teerth), isn’t it child? Brahmputri, Brahmaputra and, and ocean. So, this one is there, isn’t she? She is Brahma’s daughter (putrii) also. For example, look this Brahmputri and this Brahma. So, look, the ocean has entered in these. Ocean. So, that Brahmaputri also goes and enters in the ocean. Hm? So, definitely this one is also Brahma. So, this one will be called Brahma, will he not be? This one is also a big river, isn’t he? Baba has explained, hasn’t He? He has explained many times – This one is the biggest river. Hm? Brahma. Brahma is the biggest river. This one will not be called ocean. This one will be called a river only.

Morning class of 14.11.67, third page. So, this river is the biggest river. So, first of all it drains into the ocean. And a very big fair (mela) is organized on it because even here a fair (meeting) takes place between the jeevatma (living soul) and the Parmatma (Supreme Soul). Hm? Who is jeevatma? And who is Parmatma? Hm? Who is jeevatma? The soul which holds the life. So, doesn’t the Supreme Soul assume life? Hm? So, why were they separated? Hm? They were separated because that jeevatma is Brahma Baba in corporeal form; that jeevatma cannot be called Parmatma. It means that he cannot be called the supreme actor among the souls. So, look, here Brahmputri is organized isn’t it? This fair is organized near Brahma. So, such a big fair is organized here in Calcutta. Look, you haven’t gone there. A big fair of ocean and the river is organized. And when is it organized? Hm? Is it organized in the summers? Is it organized in the rainy season or in the winters? When is it organized? In severe winters. When Shivratri comes, then many, hm, when the last fair of the month of Maagh is organized, then many people visit.

Our Father has explained that Bhaarat (India), that entire Bhaarat is the biggest pilgrimage center (teerth). Even in that Baba has explained that He is born at one, one place, hm, and takes up a body in another place. What is this topic? Dot, dot (..) one birth, dot, dot (..) takes at one place and takes up a body in another place. What does it mean? Hm? It is within India only. It is not in any other place. Hm? Who? The topic of birth, the revelation-like birth is in the Magadh country. Hm? And the body was assumed at another place. Where? Where was the Chariot caught? In Calcutta. So, the place from where He got birth is called Magadh country. Crocodile (magarmachch) like human beings live there. Hm? Is it not? They eat, drink a lot and perhaps machch, magarmachch (crocodiles) also live there. So, this is very famous.

So, the Father sits and explains that children, this Banyan tree there, now its complete example is given in the Gita also by the name Ashwath Vriksh (tree) that its stem does not exist now. The rest [of the tree] is green. It means that the stem doesn’t exist; why has it been shown like this? Stem means the place where there is one religion, one kingdom, one language, one clan, one opinion; so that one stem has been depicted. That does not exist now. Does it mean that heaven exists now? It does not exist now. But yes, that tree stands green even now. Although that heaven-like stem does not exist. However that tree never dries up. Hm? This Banyan tree never dries up, does it? Hm? It remains green forever. Its stem doesn’t exist. Otherwise, if there is a tree, whose stem vanishes, then it dries up. But the example of this one [Banyan tree] alone is given for the world. Hm? Why? Why is its example given? It is because this world-like the Ashwathh tree, it passes through the entire cycle of 84 on this world stage. So, half the time there is heaven. Then half the time hell. And dualism begins. Two religions, two kingdoms, two clans, two codes of conduct, two lead to four, four lead to eight. So, it is only one tree, isn’t it?

So, the Father sits and explains to the children that this is also a big tree. What? Hm? Who? What is this also a big tree? The Father sits and explains its entire secret that its seed is very small, very minute. And the tree is very big. So, this entire tree is now in your intellect. And look, if you see, go to the Supreme Abode above, the tree is upside down there. What? The seed is at the top and the tree? The tree is below. Above? It is because it is true, isn’t it? Will the one who is true be at the top forever or will he come down? He will remain up. He is not only truth (sat), but also living (chaitanya) and blissful (anand). He is also in bliss. And he is also the seed form of this human world. Hm? World of human beings. When the human beings are living, this world of human beings is also of living souls. So, he is their seed also. When he is the seed of the human beings, then he will definitely be a human being only. So, this is also sung. And the seed itself is remembered above. Hm? O God Father! Hm? Why do they remember Him up? Look, that God Father is an unlimited seed, isn’t he? Hm? Other religions will however be called limited. It will not be said that they are the seeds of 500-700 crore leaves. None. The seed of all the 500-700 crore leaves of this Tree is only one, the Father of the human world. So, he is the Father, isn’t he? Now you children are explained nicely in detail that the seed is rightly up above. And then the creator of that seed; hm? The seed is also called a Creator, isn’t it? So, the creator will be above, will he not be? Hm? The Creator whom children remember now. You remember the Creator, don’t you daughter? It will be said – Yes, you remember ShivBaba. Hm? You remember ShivBaba. So, the Creator is definitely above because He is remembered like this only – O Father, O Baba! They raise their hands up, don’t they? O purifier of the sinful ones! O Supreme Father Supreme Soul! O remover of the sorrows! O giver of happiness! So, when they call, then the intellect goes up.

So, they (unko) are called - Come. Now again here ‘they’ has been added. Hm? Why shouldn’t we say ‘that one (usko) is called’? Hm? It is because the souls are two, aren’t they? One is Sadaa (forever) Shiv. And the other will not be called forever Shiv. Hm? Is he forever benevolent? Why? How is he not benevolent? Hm? How isn’t the other one, the number two forever benevolent? Hm? It is because he causes destruction. So, is he benevolent? Hm? Is causing destruction a topic of benevolence? No. So, one is forever benevolent and one will not be called ‘forever’. Yes. So, when both of them come together, then they are called. Look, He comes and teaches you children. Who teaches? Hm?
(Someone said something.) Does that one who is forever Shiv teach or does the one who isn’t forever Shiv teach? Do both of them teach? Achcha? Will the one who has a stone-like intellect teach? Hm? Does the one who has a stone-like intellect teach? It is one. (Someone said something.) Hm? Is it when he becomes equal [to Shiv]? Who made? You forgot that. Hm? You forgot the one who made. And you remembered the one who became. Hm? Both? Laddu. It was told that that Father, who teaches is also one, hm, the Teacher and the Father is also one and should we say that the Sadguru is also one? It will not be said. Why? If you speak of sadgati (true salvation), then is sadgati caused along with the body or without the body? What is said without the body? If there is no body, then it is not called sadgati. It is called gati (salvation). Gati means mukti (liberation). Gati means gati for which place? For up above. It means that the gati that happened above, when you went up, then will you go and enjoy happiness there? Hm? There is no happiness there. What is there? There is peace. So, look, Baba explains, doesn’t He daughter? You should definitely keep these words. What? That He is the Father also, Teacher also, hm, and is Supreme. Supreme Teacher, Supreme Father. And He is also a Guru. Who? It is only one. If He is incorporeal within corporeal, then is it one or two? It is only one. So, you children have now come to know this nicely.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2812, दिनांक 07.03.2019
VCD 2812, dated 07.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2812-extracts-Bilingual

समय- 00.01-21.50
Time- 00.01-21.50


प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - बाबा हरेक को अमरनाथ और अमरनाथनी बनाते हैं। हैं तो नंबरवार। कैसे बनाते हैं? ये अमरकथा सुनाय करके बनाते हैं। तो बच्चों को तो बहुत खुशी होनी चाहिए, अथाह खुशी। खुशी का पारावार नहीं रहना चाहिए। सो भी वास्तव में जो यहाँ रहते हैं उनको तो बहुत खुशी होनी चाहिए। कहाँ रहते हैं? हँ? मधुबन में रहते हैं उनको तो बहुत खुशी होनी चाहिए। क्योंकि जैसे कि बापदादा की गोद में बैठे रहते हैं। तुमको तो बहुत खुशी होनी चाहिए। चाहिए। ‘चाहिए’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘चाहिए’ का मतलब क्या हुआ? हाँ, ‘चाहिए’ लगाया ही इसलिए कि अभी खुशी है नहीं क्योंकि जैसे बापदादा को खुशी। यहाँ तो जैसे अभी गोद में तो कोई बैठते ही नहीं हैं ना सारा दिन। घर में रहने से तुम अभी जैसे कि ईश्वरीय परिवार के रहे पड़े हो। जैसे कि। यहाँ भी ‘जैसे कि’ लगाय दिया।

बस यहाँ देखते रहते हो ना। हँ? क्या देखते रहते हो? हँ। इन आँखों से बापदादा को भी देखते रहते हो ना? किन आँखों से? अंदर की आँख से या बाहर की आँखों से? हँ? बाहर की आँखों से देखते रहते हो। अंदर की आँखों से पक्का निश्चय होता नहीं है। अभी तो सिर्फ दादा तो नहीं है ना। हँ? दादा के साथ कौन है? बाप भी तो है ना। अभी तो बापदादा दो हो गया ना। तो यहाँ इनको घड़ी-घड़ी देखते हो। हँ? इनको माने किनको? बाप को देखते हो? इन आँखों से? हँ? किसको कहा यहाँ इनको घड़ी-घड़ी देखते हो? हँ? हाँ।
(किसी ने कुछ कहा।) दादा? दादा कौन? आत्मिक रूप से कहें तो दादा अलग हो जाता है। और देहभान के रूप में कहें तो दादा अलग हो जाता है। कौन? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, आत्मिक रूप से कहें तो मनुष्य सृष्टि की बीज रूप आत्मा, जिसमें प्रवेश करते हैं, तो जरूर आत्मिक स्थिति में जास्ती टिकती होगी क्योंकि मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं। तो बोला यहाँ इनको घड़ी-घड़ी देखते हो। इनको माने किनको देखते हो? हँ? हाँ, इनको माने कौन दो को देखते हो? 67 की वाणी है। तो घड़ी-घड़ी देखने से ज़रूर बाप याद आएगा ना घड़ी-घड़ी देखने से।

ये बाबा जाता है। जाता है? कौन बाबा जाते हैं? बापदादा जाते हैं। भई शिव बाबा। तो तुम्हारा तो घड़ी-घड़ी शिवबाबा को याद करना होता है। परन्तु कोई याद न करे ऐसे। ऐसे-ऐसे युक्ति से कि शिवबाबा आते हैं। हँ? शिवबाबा एक या दो-चार? हाँ। शिवबाबा आते हैं, शिवबाबा जाते हैं। बापदादा जाते हैं। अगर सिर्फ वो भी कहो कि शिवबाबा जाता है तो शरीर बिगर जाएगा कैसे वरी? कोई जाएगा थोड़ी शरीर बिगर? तो तुम सिर्फ ये शिव का नाम याद करते रहो। शिवबाबा जाते हैं, शिवबाबा घूमते हैं। शिवबाबा ये करते हैं, शिवबाबा वो करते हैं। तो तुमको कितना तम्हारा शिवबाबा को याद करने का मिल जावेगा। बाप तो रस्ता बताते रहते हैं। बहुत सहज रास्ता बताते हैं कि आत्मा तो यहाँ देखने में भी नहीं आती है। हँ? बाकि शिवबाबा जो हम कहेंगे बाबा, सो तो समझेंगे ना। क्योंकि शिव तो आत्माओं का बाप। उसको तो बाबा नहीं कहेंगे। शरीर में प्रवेश करते हैं तो शिवबाबा। तो शिवबाबा इस शरीर में जाते हैं। ये जाते हैं। जाते हैं।

देखो तुम लोग लिखते भी हो। लिफाफे के ऊपर लिखते हो ना। शिवबाब केयर आफ ब्रह्मा बाबा। तो भई केयर ब्रह्मा लिखते हो ना। तो जरूर ब्रह्मा के द्वारा शिवबाबा। तो ज़रूर ब्रह्मा। ये ब्रह्मा हुआ केयर आफ। और शिवबाबा है ना इसमें। इसमें। किसमें? किसमें है शिवबाबा? बाबा शिवबाबा ब्रह्मा बाबा में है। शिवबाबा है या शिव बाप है? हँ? ब्रह्मा बाबा में कौन है? हँ? कौन है?
(किसी ने कुछ कहा।) शिव बाप है? बाबा नहीं है? अच्छा? मुकर्रर रथ को छोड़के आ जाता है? यही तो मुसीबत है। क्या? मुकर्रर रथ को छोड़ के आ जाता है। तो मुकर्रर हुआ? परमानेन्ट हुआ? हँ? फिर परमानेन्ट तो नहीं हुआ। तो कहेंगे इस समय शिवबाबा है ना। शिव (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, 1967 में। 1967 में वो नॉन मुकर्रर में होता है? सन् 36-37 से मुकर्रर रथ नहीं लिया? 36-37 के बाद 42 में शरीर छोड़ दिया तो नॉन मुकर्रर हो गया? हँ? अरे स्थूल शरीर छूट जाता है तो आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है कि नहीं? तो सूक्ष्म शरीर जाता है कि नहीं? छूट जाता है? हाँ। तो शिवबाबा है ना इसमें। 67 में। शिवबाबा कि शिव बाप? बाबा।

तो अगर तुम्हारी टेव ही अंदर में पड़ जावे। क्या समझने की? कि ब्रह्मा बाबा में, दादा लेखराज में कौन है आता है, कौन जाता है? शिवबाबा आता है, शिवबाबा जाता है। अगर ये टेव पड़ जावे तो। ये अगर मगर और लगा दी। किससे बोला? जो भी ब्रह्माकुमार-कुमारी सामने बैठे हों सबको बोला। अगर तुम्हारी टेव पड़ जावे कि इसमें शिवबाबा आते हैं, शिवबाबा जाते हैं। अच्छा। तो अगर का मतलब नहीं पड़ी है टेव या पड़ी है? हँ? नहीं पड़ी है। तो किसकी याद करने की टेव पड़ी है? निराकार ज्योति बिन्दु आता है जाता है? किसकी टेव पड़ी हुई है? निराकार ज्योतिबिन्दु आत्मा। ब्रह्माकुमार-कुमारी बेसिक नॉलेज वाले क्या समझते हैं? ब्रह्मा बाबा में कौन आता, कौन जाता है? निराकार ज्योतिबिन्दु आता है, ज्योतिबिन्दु जाता है। तो बाबा कहते अगर तुम्हारी एक टेव पड़ जावे कि इसमें शिवबाबा आता है, जाता है। हँ? बाहर में नहीं। बाहर में कहने की तो दरकार ही नहीं वास्तव में। परन्तु बाहर में तुमको कहना पड़े। तो बापदादा जरूर कहना पड़े। क्योंकि दो आत्माएं एक शरीर में हैं। हँ? दो आत्माएं एक शरीर में हैं। तो उनको कहना पड़े। पड़े माने मजबूरी है क्या? हँ? हाँ, इसका मतलब अभी भले नहीं कहते हो, न समझते हो; क्या? क्या नहीं समझते हो? कि दो आत्माएं इसमें हैं। कौनसी दो आत्माएं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) एक शिव और एक? अरे, अलग-अलग आत्माएं बताओ ना। दोनों इकट्ठा कर दिया। वो तो समझती हैं कि हाँ इसमें शिवबाबा आया। वो थोड़े ही समझती हैं कि शिवबाप कहा जाता है, और शिवबाबा कहा जाता है। (किसी ने कुछ कहा।) हँ? हाँ, मुकर्रर रथ वाली आत्मा भी और शिव वाली आत्मा भी।

तो बताया ये जरूर कहना पड़े। अभी भले तुम कहते हो या नहीं कहते हो। आगे चल करके तुम्हें कहना पड़े दूसरों को। क्या? कि दो आत्माएं एक शरीर में आती हैं। आया समझ में कि नहीं? अरे, बोलो। क्या पूछना चाहते हो? पूछो। मुकर्रर रथ लेके आता है कि नहीं लेके आता है सूक्षम शरीर? तो दो आत्माएं हुईं कि एक हुईं? हाँ, दो हुईं। क्योंकि एक तो देखो फर्क भी कितना है। हँ? क्या फर्क है? दो रतन पड़े हुए हैं। हँ? एक है अंगूठी। क्या? एक है अंगूठी। हाँ, ये, ये पाई-पैसे का रतन है। क्या? अंगूठी। ये जो है ये पाई-पैसे का रतन है अंगूठी। और उसमें आकरके देखो हीरा बैठा है। किसमें? उसमें। उसमें माने किसमें? अंगउठी में। अरे, स्थूल रूप में अंगूठी कौन हुआ? हँ? ओह। इसमें हीरा बैठा हुआ है। अंगूठी की बात हो रही है। हाँ। हँ? अरे, सन् 67 की मुरली है ये। तो बताया, एक है अंगूठी। अंग उठी। उसके अंग उठे हुए महसूस किये। गोद में बैठने वालों को महसूस तो होते होंगे। हँ? नहीं? हाँ। अंगूठी। हाँ, हाँ, ये, ये पाई-पैसे का रतन है। हाँ, ब्रह्मा बाबा के लिए कहा – ये पाई-पैसे का रतन है। और दूसरे रतन होते हैं नौ रत्नों में। उनकी ज्यादा कीमत होती है या हीरे की ज्यादा कीमत होती है? हीरा की कीमत ज्यादा होती है। तो ये है पाई-पैसे का रतन। और उसमें बाकि आकरके देखो हीरा बैठा है। हीरा माने कौन? क्या शिव को कहेंगे? हँ? हीरा तो पत्थर होता है। शिव को हीरा कहेंगे? नहीं। माना शिव जिस मुकर्रर रथधारी आत्मा के साथ आता है वो क्या हुआ? हीरा हुआ। आकरके देखो हीरा बैठा है अंदर में। क्या? अंगौठी है तो वो तो उठी हुई बाहर दिखाई पड़ जाएगी। महसूस होगी कि हां, उठी है। हाँ। ये हीरा तो अंदर में दिखाई पड़ेगा? दिखाई नहीं। अंदर है।

तो देखो, ये डबली ठहरी ना। कौन? डबली जानते? डिब्बी। कौन हुई डिब्बी? हँ? हाँ, ये ब्रह्मा बाबा दादा लेखराज, ये क्या हुआ? ये डिब्बी हुई ना जिसमें हीरा रखा जाता है। हीरा कहाँ रखा जाएगा? हँ? बढ़िया सी डिब्बी बनाते हैं, उसमें रखते हैं। ये डबली ठहरी ना। कौन? ब्रह्मा बाबा। इस डबली में जैसे बाप होते जवाहरी, तो बहुत अच्छा हीरा देखता है। हँ? तो कहाँ रखेगा? हँ? अरे, हीरा जवाहर, हीरा जवाहरात बेचने वाला जवाहरी होगा और बहुत अच्छा हीरा देखेगा कि बड़ा कीमती है तो कहाँ रखेगा? हँ? अरे, डबली में रखेगा ना। अच्छी सी डबली में रखेगा। कैसी डबली? सोने की डबली बनाकरके उसमें डाल देता है। हँ? सोना कहाँ होगा? सोना संगमयुगी दुनिया में कि सतयुग में कि त्रेता में कि द्वापर में कि कलियुग में? हँ? सोना कहाँ? सोने जैसी दुनिया कहाँ? सतयुग। सोने जैसी दुनिया सतयुग। और संगमयुग को क्या कहेंगे? हीरे जैसी। हीरे जैसा युग है संगमयुग। तो बताया सोने की डबली बनाकरके उसमें डाल देता है। हँ? तो सोने की डबली कौन हुई? हँ? हाँ, ब्रह्मा बाबा हुआ ना सोने की डबली। कृष्ण सतयुग में 16 कला संपूर्ण कृष्ण बनकरके पार्ट बजाएगा ना। तो सोने की दुनिया हुई ना। कि त्रेता की चांदी की दुनिया हुई? द्वापर को कहेंगे तांबे की दुनिया। और कलियुग को? लोहे की दुनिया।

तो देखो ये सोने की तो डबली है नहीं अभी। कौन? हँ? कौन नहीं है सोने की डबली?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ये ब्रह्मा बाबा अभी 67 में क्या कहेंगे? पुरुषोत्तम संगमयुग या सिर्फ संगमयुग? पुरुषोत्तम संगमयुग तो नहीं कहेंगे। क्योंकि पुरुषों में उत्तम जब प्रत्यक्ष हो ब्राह्मणों की दुनिया में तब कहेंगे पुरुषोत्तम संगमयुग। बाकि संगमयुग तो है ना। माना कलियुग और सतयुग का संगम तो कहेंगे। तो बताया ये सोने की डब्बी है नहीं। ये है तो यही पतित। क्या? यही पतित माने? लोहे की या सोने की? क्या कहेंगे अभी? हँ? अरे? उल्टी सीढ़ी चढ़के द्वापरयुग में पहुँच गई या त्रेता में पहुँच गई या सतयुग में पहुँच गई? क्या कहेंगे अभी? हँ? है तो यही पतित। पतित है ना। तो बताया – इसमें आकरके ये हीरा बनाने वाला। कौन? इसमें आकरके ये हीरा बनाने वाला। कौन? कौन हीरा बनाने वाला? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिव हीरा बनाने वाला। हीरा आकरके यहाँ बैठे हैं। बनाने वाला भी बैठा है। और हीरो पार्ट बजाने वाली आत्मा भी यहाँ इस डबली में; कौनसी डबली में? हाँ, जो पतित है उसमें आकरके यहाँ बैठे हैं। बाप को बीच में रखा जाता है ना। किसको? बाबा को या बाप को? ब्रह्मा भी बाबा, जिस डबली में आते हैं वो भी बाबा। कि बाप? क्या कहेंगे? बाबा ही कहेंगे ना। तो दोनों के बीच में कौन है? हँ? दोनों के बीच में? शिव बाप। अरे, हत् तेरे की नहीं की। एक पतित, हँ, कम कीमत वाला। और एक हीरा, बहुत कीमत वाला। दोनों के बीच में कौन? बीच में बाप रखा जाता है। कौनसा बाप? शिव बाप रखा जाता है।

A morning class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page on Tuesday was – Baba makes each one Amarnath (Lord of eternity) and Amarnathni (Lady of eternity). They are indeed numberwise. How does He make? He makes by narrating this Amarkatha (the story of eternity). So, children should feel very happy, immensely happy. There should be no limit of joy. That too those who live here actually should feel very happy. Where do they live? Hm? Those who live in Madhuban should feel very happy. It is because it is as if they are sitting on the lap of BapDada. You should feel very happy. Should. Why was ‘should’ added? What is the meaning of ‘should’? Yes, ‘should’ was added only because now there is no joy because just as BapDada feels happy. It is as if nobody sits here in the lap now throughout the day at all. By living at home it is as if you are now living in the Godly family. As if. Even here ‘as if’ was added.

That is it; you keep on seeing here, don’t you? Hm? What do you keep on seeing? Hm. You keep on seeing BapDada also through these eyes, don’t you? Through which eyes? Through the inner eyes or through the external eyes? Hm? You keep on seeing through the external eyes. You don’t develop firm faith through the inner eyes. Now it is not just Dada. Hm? Who is with Dada? The Father is also there, isn’t He? Now BapDada are two, aren’t they? So, you keep on seeing these here every moment. Hm? ‘These’ refers to whom? Do you see the Father? Through these eyes? Hm? Who was told – You keep on seeing these here every moment? Hm? Yes.
(Someone said something.) Dada? Who Dada? If you speak in soul form, then Dada is different. And if you speak in the form of body consciousness, then Dada is different. Who? Hm? (Someone said something.) Yes, if you speak in soul form then the seed-form soul of the human world in whom He enters; so, definitely it must be becoming constant in soul conscious stage more because He enters in a permanent manner. So, it was said - You keep on seeing these here every moment. These means whom do you see? Hm? Yes, you see ‘these’ meaning which two? It is a Vani dated 67. So, when you see every moment, then definitely the Father will come to the mind by seeing every moment, will He not?

The Baba goes. Goes? Which Baba goes? BapDada go. Brother, ShivBaba. So, you have to remember ShivBaba every moment. But nobody remembers like this with such tacts that ShivBaba comes. Hm? ShivBaba one or two-four? Yes. ShivBaba comes, ShivBaba goes. BapDada go. If you just say that ShivBaba goes, then how will he go without a body? Will anyone go without a body? So, you just keep on remembering Shiv’s name. ShivBaba goes, ShivBaba visits. ShivBaba does this; ShivBaba does that. Then you will get so much to remember ShivBaba. The Father keeps on showing the path. He shows a very easy path that the soul is not even visible here. Hm? But, ShivBaba, if we say Baba, then they will understand, will they not? It is because Shiv is the Father of souls. He will not be called Baba. When He enters in a body, then He is ShivBaba. So, ShivBaba goes into this body. He goes. He goes.

Look, you people even write. You write on the envelope, don’t you? ShivBaba care of Brahma Baba. So, brother, you write care [of] Brahma, don’t you? So, definitely ShivBaba through this Brahma. So definitely Brahma. This Brahma is care of. And ShivBaba is present in this one, isn’t He? In this one. In whom? In whom is ShivBaba present? Baba, ShivBaba is present in Brahma Baba. Is ShivBaba present or is Father Shiv present? Hm? Who is present in Brahma Baba? Hm? Who is present?
(Someone said something.) Is Father Shiv present? Isn’t Baba present? Achcha? Does He leave the permanent Chariot and come? This is the problem. What? He comes leaving the permanent Chariot. So, is he permanent (mukarrar)? Is he permanent? Hm? Then he is not permanent. So, it will be said ShivBaba is present at this time, isn’t He? Shiv (Someone said something.) Yes, in 1967. Is He present in the non-mukarrar (non-permanent) one in 1967? Did He not take the permanent Chariot since 36-37? When he left his body after 36-37 in 42, then is he non-permanent? Hm? Arey, when the physical body is left, then does the soul enter in another body or not? So, does the subtle body go or not? Is it gone? Yes. So, ShivBaba is present in this one, isn’t He? In 67. ShivBaba or Father Shiv? Baba.

So, if you develop this habit within. To think of what? That who is present, who comes and who goes out of Brahma Baba, in Dada Lekhraj? ShivBaba comes, ShivBaba goes. If you develop this habit then; This ‘if and but’ was also added. Who was addressed? He said to all those Brahmakumar-kumaris who might be sitting in the front. If you develop the habit that ShivBaba comes in this one, ShivBaba goes from this one. Achcha. So, does ‘if’ mean that you have developed the habit or not? Hm? You haven’t. So, you have developed the habit to remember whom? Does the incorporeal point of light comes and goes? Which habit have you developed? The incorporeal point of light soul. What do the Brahmakumar-kumaris with basic knowledge think? Who comes and goes from Brahma Baba? The incorporeal point of light comes and the point of light goes. So, Baba says – If you develop one such habit that ShivBaba comes and goes from this one; Hm? Not outside. There is no need to say externally (orally) at all in reality. But you will have to say outside. So, you will definitely have to say BapDada. It is because there are two souls in one body. Hm? There are two souls in one body. So, they will have to say. Does ‘will have to’ mean is there any compulsion? Hm? Yes, it means that although you neither say nor understand now; what? What do you not understand? That there are two souls in this one. Which two souls? Hm?
(Someone said something.) One Shiv and one? Arey, mention separate souls, will you not? You have mixed both of them. She thinks that yes, ShivBaba came in this one. She doesn’t think that He is called Father Shiv and He is called ShivBaba. (Someone said something.) Hm? Yes, the soul of the permanent Chariot also and the soul of Shiv also.

So, it was told that this will definitely have to be said. Although you now say or don’t say. In future you will have to tell others. What? That two souls come in one body. Did you understand or not? Arey, speak up. What do you wish to ask? Ask. Does the permanent Chariot bring the subtle body or not [when entering in a temporary Chariot]? So, are there two souls or not? Yes, there are two. It is because look, firstly there is such a vast difference! Hm? What is the difference? There are two gems. Hm? One is the ring (angoothi). What? One is the ring. Yes, this, this is a gem worth pie-paise. What? Ring. This ring is a gem worth pie-paise. And look, the diamond has come and sat in that. In what? In that. ‘In that’ refers to whom? In the ring (ang-uthi). Arey, who is angoothi in physical form? Hm? Oh. The diamond is sitting in this one. The topic of angoothi is being discussed. Yes. Hm? Arey, this is a Murli dated 67. So, it was told that one is the ring. Ang uthi (the raised organ). His organs were felt to have risen. Those sitting on the lap must have experienced. Hm? No? Yes. Angoothi. Yes, yes, this is a gem worth pie-paise. Yes, it was said for Brahma Baba – This is a gem worth pie-paise. And there are other gems among the nine gems. Are they more costly or is the diamond more costly? The diamond is more costly. So, this is a gem worth pie-paise. And look, the diamond has come and sat in that. Who is diamond? Will Shiv be said to be that? Hm? The diamond is a stone. Will Shiv be called a diamond? No. It means that the soul of the permanent Chariot along with whom Shiv comes, what is he? He is the diamond. Come and see, the diamond is sitting inside. What? When it is angauthi then it will appear to be raised externally. It will be felt that yes, it is raised. Yes. Will this diamond be visible inside? It will not be visible. It is inside.

So, look, this is a box (dabli), isn’t it? Who? Do you know dabli? Dibbi (a small box). Who is the box? Hm? Yes, what is this Brahma Baba, Dada Lekhraj? This is the box in which the diamond is kept. Where will the diamond be placed? Hm? A nice box is made and it is kept in it. This happens to be the box, isn’t it? Who? Brahma Baba. In this box, for example, if a Father is a jeweler, and he observes a very nice diamond. Hm? So, where will he keep it? Hm? Arey, if there is a jeweler selling diamonds, jewels and if he finds a very nice diamond that to be very costly, then where will he keep it? Hm? Arey, he will keep it in a box, will he not? He will keep it in a nice box. What kind of a box? He makes a golden box and puts it in it. Hm? Where will be gold? Will the gold be in the Confluence Age world or in the Golden Age or in the Silver Age or in the Copper Age or in the Iron Age? Hm? Where will the gold be? Where is the gold-like world? The Golden Age. The Golden Age is the gold-like world. And what will be the Confluence Age called? Like a diamond. The Confluence Age is a diamond like Age. So, it was told that he makes a golden box and puts it in it. Hm? So, who is the golden box? Hm? Yes, Brahma Baba is the golden box, isn’t he? Krishna will play the part of Krishna perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age, will he not? So, it is a golden world, isn’t it? Or is it the world of silver of the Silver Age? Dwapar (Copper Age) will be called a world of copper. And what about the Iron Age? The world of iron.

So, look, this is not a golden box now. Who? Hm? Who isn’t a golden box?
(Someone said something.) Yes, what will be this Brahma Baba called now in 67? Purushottam Sangamyug or just Sangamyug? It will not be called Purushottam Sangamyug. It is because Purushottam Sangamyug will be said to be when the best ones (uttam) among the souls (purush) are revealed in the world of Brahmins. But it is indeed Sangamyug, isn’t it? It means that it will be called the confluence (sangam) of the Iron Age and the Golden Age. So, it was told that this is not a golden box now. This one is this sinful. What? What is meant by ‘this sinful’? Is it of iron or of gold? What will be it called now? Hm? Arey? Did it climb up the Ladder and reach the Copper Age or did it reach the Silver Age or did it reach the Golden Age? What would you say now? Hm? It is this sinful only. It is sinful, isn’t it? So, it was told – This maker of diamond by coming in this one; who? This maker of diamond by coming in this one; Who? Who is the maker of diamond? Hm? (Someone said something.) Yes, Shiv is the maker of diamond. The diamond has come and sat here. The maker is also sitting. And the soul that plays the hero part is also here in this box; in which box? Yes, He has come in the sinful one and is sitting here. The Father is kept in the center, isn’t He? Who? Baba or Father (Baap)? Brahma is also Baba; the box in which He comes is also Baba. Or is he Father? What would you say? He will be called Baba only, will he not? So, who is in between both of them? Hm? In between both of them? Father Shiv. Arey, damn it. One is sinful, hm, less costly. And one is a diamond, very costly. Who is in between both of them? The Father is placed in the middle. Which Father? Father Shiv is placed.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2813, दिनांक 08.03.2019
VCD 2813, dated 08.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2813-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-25.42
Time- 00.01-25.42


प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी सोमनाथ मंदिर की। जो सोमनाथ मंदिर की यादगार है वो कोई इतना अभी नहीं है क्योंकि वो तो टूट-फूट गया ना सोमनाथ का मंदिर क्योंकि वो जो काशी का मंदिर है ना काशी विश्वनाथ तो वो अभी यादगार शिव का मंदिर है। क्यों? क्या यादगार? विश्व के मालिकपने की यादगार है। तो वो सोमनाथ इतना नहीं है जितना काशी को रखा है। जो वो धाम होते हैं ना उसमें भी काशी धाम रख दिया हुआ है। वो जो उज्जैन, वहाँ, वहाँ तो सोमनाथ का मंदिर था। उसको धोम नहीं रखते हैं। अरे? उज्जैन में महाकाल का मंदिर है या सोमनाथ का मंदिर है? हँ? अरे, सोमनाथ का मंदिर तो प्रभास क्षेत्र में गुजरात में है ना। सागर के किनारे है। उज्जैन कोई सागर के किनारे है क्या? नहीं। बाबा को याद नहीं रहा। तो बोला, हँ, कि उज्जैन वहाँ जो सोमनाथ का मंदिर था उसको धाम नहीं रखते हैं। काशी को धाम रखते हैं। क्योंकि काशी किनारे पर भी है गंगा के। और बच्चे वहाँ बहुत बैठे हुए हैं। हँ? कौनसे बच्चे? हँ? कौनसे बच्चे बैठे हुए हैं? हँ? बनारस में तो गई होगी तुम। कि नहीं गई हो? अरे, बनारस में भी नहीं गई हो क्या? तो किसी ने कहा – अभी नहीं। काशी में नहीं। अभी-3 की यात्रा। किसी ने कहा – अभी की लाइन में गई है।

हाँ, तो बनारस भी बहुत अच्छी है। उसमें बहुत साधु-संत, महात्मा रहते हैं। नंबरवन है काशी। और पीछे है हरिद्वार वास्तव में। क्योंकि काशी में तो काशी करवट खाते हैं ना। कहते हैं शिवकाशी-3. और वहाँ तो हरिद्वार कहते हैं। कहाँ? पहाड़ से गंगा उतरती है ना। तो हरिद्वार कहते हैं। हरि के द्वार में उतरी। और यहाँ तो शिव की काशी का नाम। यहाँ शिव की याद आती है। इसलिए जो भी साधु-संत बैठे रहते हैं वो जपते रहते हैं शिवकाशी-3. ये शिवकाशी वो काशी को बनारस भी कहते हैं। क्यों? जो कहते हैं, जो भी नाम दिये हुए हैं किस नाम के आधार पर? हँ? काशी नाम है काश्य के आधार पर। काश्य माने तेज। हँ? और बनारस किसलिए नाम दिया? हाँ, जब तेज आएगा याद का तो वो मंथन ज्यादा चलेगा ना। मनन-चिंतन-मंथन चलता है तो फिर ज्ञान का बना-बनाया रस निकलता है। बाकि असुल नाम तो इसका काशी था। पीछे बनारस रखा गया है। अंग्रेजों ने बनारस रखा। अंग्रेजों ने बनारस क्यों रखा? हँ? क्योंकि तुमको बादशाही कहाँ से लेनी है? अंग्रेजों से ही तो लेनी है ना। तो उनकी बुद्धि में सारा ज्ञान ठहरता है। बाकि याद की बात तो।

तो अभी ये नाम रख दिया है बनारस दूसरा। तो कोई ने कहा – बाबा, वाणारसी। हाँ, वाणारसी। नाम इसका असुल सच्चा नाम है काशी। फिर ये जो शूद्र संप्रदाय हैं उन्होंने बैठकरके देखो नाम फिराय दिया है काशी का वाणारसी या बनारस। अब बनारस, वाणारसी है थोड़ा सा ही फर्क। परन्तु जैसा राजा होता है ना तो वो शहरों का नाम भी बदलते जाते हैं। गलियों का भी नाम बदल देते हैं। अरे, बहुत चीज़ों के नाम बदलते जाते हैं। ये दिल्ली इसका भी नाम बदला हुआ है। हँ? आगे असल कोई दिल्ली नहीं कहते थे। हँ? आगे क्या कहते थे? हँ? इंद्रप्रस्थ। इंद्रप्रस्थ कहते थे। कि इंद्र की बसाई हुई, स्थिर की हुई, प्रकष्ट रूप में स्थिर की हुई इंद्रप्रस्थ नगरी। तो पहले हिलती होगी। हँ? इंद्र ने आकरके उसको स्थिर किया। किसी ने कहा – हस्तिनापुर कहते थे। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर; हस्ति माने हाथी। अरे; हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देह भान होता है। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर हस्तिनापुर माने हाथी। अरे? हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देहभान होता है! है। अरे, यहाँ तो परियां रहती थी ना। हँ? ज्ञान योग के पंखों से उड़ने वाली परियां। इंद्र के दरबार में अप्सराएं, परियां दिखाते हैं ना। तो हैं ना वो नाम – पुखराज परी, नीलम परी। तो वो परियां हैं। तो ये परियां किसको कहते हैं? इंद्र की परियां हैं।

तो इंद्र तो कोई बरसात नहीं बरसाते हैं। इंद्र बरसात बरसाते हैं क्या? हँ? वो तो कहते हैं वरुण देवता, वो बरसात बरसाते हैं। हँ। गाया जाता है कि इंद्र सभा में कोई परी, हँ, कोई परी थी जो छी-छी को ले आई। तो उनको श्राप मिल गया, हँ, कि तुम जाकरके पत्थर बन जाओ। अब कोई पत्थर बनने की बात थोड़ेही है। पत्थरबुद्धि बन गई। 14.11.1967, मंगलवार का प्रातः क्लास, छठा पेज। तो पत्थर बन जाओ। या वो परियां नीचे की तो बात नहीं है। ये तो बाप यहीं बताय दिया है कि जो जानबूझ करके छी-छी को ले आते हैं ना, साथ में ही ले आते हैं, यहाँ पतित को ले आते हैं तो गोया उनको जैसे श्राप मिल जाता है कि तुम जाकरके फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओ। हँ? बुद्धि पत्थर बन जाएगी तो क्या होगा? हँ? क्या अंतर पड़ेगा? आत्मिक स्थिति ठहरेगी? नहीं ठहरेगी। क्योंकि हैं तो सभी पत्थरबुद्धि ना। तो उनको बोला जाकरके तुम फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओगी। कहाँ जाकरके? हँ? सतयुग, त्रेता में कोई पत्थरबुद्धि होते हैं? वहाँ तो आत्मिक स्थिति रहती है ना, याद रहती है ना। लगातार याद रहती है। तो हैं सब बातें यहाँ की। क्या सब बातें? यहाँ सब बातों की शूटिंग होती है।

इंद्रप्रस्थ नाम बिल्कुल ठीक है। क्या? बिल्कुल ठीक कैसे? कि इंद्र ने प्रकष्ट रूप से दिल्ली को स्थिर किया। हँ? पहले दिल्ली, पहले दिल्ली में हाहाकार होता है; तो हिलती है या स्थिर होती है? हिलती है। हाँ। तो हो सकता है ना। बाकि वो तो इंद्र तो है नहीं ना। माना अभी नहीं है। इंद्र माने? राजा। और यहाँ परियां-वरियां तो कुछ नहीं हैं ना जिनको वो पंख हों, उड़ती हों। ये तो ज्ञान-योग के पंखों की बात है। हँ? ज्ञान का पंख और योग का पंख। तो परियां तो अभी तुम बन रही हो सच्ची-सच्ची। हँ? दैवी गुणों को धारण करने वाली परियां। तो जब तुम दैवी गुण धारण करती हो तो बरोबर बस इनसे ऊँची तो कोई परी होती नहीं है। इसको ही स्वरग की परियां भी कहते हैं। तो वो तुम हो यहाँ पढ़ रही हो अच्छी तरह से। कहाँ जाने के लिए? अरे, परिस्तान में चलने के लिए। कौनसा परिस्तान? जो इंद्र ने क्या बनाया? कब्रिस्तान दिल्ली बन गई थी; मरा पड़ा था ना। तो जब ज्यादा मरते हैं तो कब्रिस्तान में ज्यादा कब्रें बन जाती हैं। हाँ। कब्रिस्तान बन गई माने देह अभिमान की मिट्टी में सब गल गए। पहले तो बेहद की बात। फिर हद में।

तो बताया – परिस्तान में चलने के लिए तुम अब तैयार हो रही हो क्योंकि जानती हो अभी परिस्तान भी तो यहीं बनने का है ना। क्यों? पहले दिल्ली क्या बनती है? पहले कब्रिस्तान, फिर परिस्तान बनती है। तो ये वो ही तो दिल्ली है ना। दूसरी जगह तो कोई नहीं है ना। तो बच्चे तो समझ गए हैं कि हम अपने घर जाकरके फिर वापस आएंगे। कौन बच्चे? आत्मा रूपी जो तुम बच्चे हो बिन्दु-बिन्दु आत्माएं, देह तो नहीं हो ना। आत्मा, आत्मा आत्मा के घर में रहेगी। आत्माओं का घर कौनसा? आत्मलोक। हाँ। तो वहाँ जाकरके फिर वापस आएंगे। कहाँ आएंगे? हँ? इसी इंद्रप्रस्थ में वापस आएंगे क्योंकि पहले घर तो ज़रूर जाना है। क्यों? क्योंकि अभी पार्ट बजाते-बजाते आत्मा थक गई है। तो कहाँ जाना है? थक जाते हैं तो रात में सोने जाते हैं ना। हँ? हाँ, तो ये आत्मा थक गई तो कहाँ चली जाएगी? सुषुप्ति में चली जाएगी। वहाँ संकल्प-विकल्प चलेंगे? इंद्रियां काम-धंधा करेंगी? वहाँ इन्द्रियां होती ही नहीं। जैसे सुषुप्ति में इन्द्रियों की याद रहती है? नहीं।

तो घर तो जाना ही है। और जाना भी नंगा ही है। माना ये शरीर रूपी चोला उतार करके जाना है। हँ। पवित्र बनके जाना है। ये तो चोला अपवित्र हुआ ना। हँ? अगर अपवित्र चोले को पवित्र नहीं बनाया तो क्या होगा? तो सज़ाएं खानी पड़ेंगी। सज़ाएं खा-खाकरके जाना है। तो फिर प्योर होकरके जावेंगे। घर जाएंगे। फिर वहाँ से यहाँ आना है। फिर भी वहाँ से नंगा ही आवेंगे ना कि घर में से कपड़े-वपड़े पहनके आवेंगे? हाँ। तो ये तो बिल्कुल समझ की बात हो गई कि नंगा जाना है, नंगा आना है। कहते भी हैं नंगे गए, नंगे आते हैं, नंगे जाते हैं। हँ? तो अंत में नंगा जाना है। जब वो पुरानी दुनिया खत्म होती है, हँ, फिर हम आते हैं नई दुनिया में। तो ये तो तुम बच्चे समझाते हैं कि ऊपर से आते ही रहते हैं। हँ? आना शुरू करते हैं तो पहले अच्छे-अच्छे आएंगे या जो आत्माओं ने अच्छे से पुरुषार्थ नहीं किया वो आएंगे पहले? नहीं। आते ही रहते हैं। तो आते रहते हैं नंबरवार। किस नंबर से? हँ? इस समय के पुरुषार्थ के अनुसार नंबरवार आते हैं।

तो अभी परिस्तान तो तुम्हारी बुद्धि में घूमता रहता है। हँ? दिल्ली क्या बन जाएगी? परियों का स्थान। घूमना चाहिए ना क्योंकि तुम पढ़ते ही हो परिस्तान के लिए। हँ? तो ज़रूर बुद्धि में परिस्तान ही घूमना चाहिए ना। सो भी तुम जानते हो कि अभी जो पढ़ते हैं हम वो कितने जन्म के लिए पढ़ते हैं? हँ? 21 जन्म के लिए पढ़ते हैं। तो तुम्हारे पास जो परिस्तान तो सदैव ही रहना चाहिए। खास करके अभी पिछाड़ी में। जबकि तुम ये पढ़ाई पढ़ रहे हो। और ये भी जानते हो कि बाप ने समझाया है कि तुम पढ़ते रहते हो। पढ़ते-पढ़ते तुम परिस्तान में चले जाएंगे। और स्वरग की परी कहा जाता है। बाकि और तो कोई परियां नहीं होती हैं ना बच्ची। परियां कोई होती नहीं हैं दूसरी। शास्त्रों में भी दिखाते हैं ना कि इंद्र का स्वर्ग में राज्य था। वहाँ परियां होती थी। अब बताओ परियां सतयुग, त्रेता में होती हैं क्या? वहाँ परियां कहाँ से आईं ज्ञान-योग के पंखों वाली? हँ? वहाँ देवी-देवताएं ज्ञान-योग वाले होते हैं? किससे योग लगाते हैं? उनमें ज्ञान होता है? नहीं। तो ज्ञान योग के पंखों की वहाँ तो बात ही नहीं।

और फिर बाद में तो द्वापुर आ गया, कलहयुग आ गया। हँ? द्वापुर माने दो-दो पुर, चार-चार पुर। हँ? तो कलह-क्लेश बढ़ता जाता है। हाँ। तो फिर ये जो मनुष्य हैं ना जो देवताएं थे वो फिर क्षत्रीय बने, क्षत्रीय से वैश्य बने, वैश्य से कलियुग में शूद्र बन गए। तो ये मनुष्य सिर्फ फिरते जाते हैं। बदलते जाते हैं। अगर सच्ची-सच्ची परियां बनते हो तभी तुम जानते हो कि हम परिस्तान की परियां बन रहे हैं। कैसे? अब देखो, ऐसे बन रहे हैं। इनसे ऊँचा वेश तो दूसरे का कोई का होता ही नहीं है। इतना धनवान, इतना ये। ये जो इस दुनिया में देखते हो, ये तो कुछ भी नहीं है बच्ची। (क्रमशः)

A morning class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Tuesday was about Somnath temple. The memorial of Somnath temple does not exist to that extent now because it, the Somnath temple has broken, hasn’t it? It is because that temple of Kashi, the Kashi Vishwanath, that is a memorial temple of Shiv. Why? What memorial? It is the memorial of the mastership of the world. So, that Somnath is not as much as Kashi has been placed. Among those dhaams (abodes), Kashi Dhaam has also been placed. That Ujjain, there; the temple of Somnath existed there. That is not placed as Dhom. Arey? Is there a temple of Mahaakaal or is there a temple of Somnath in Ujjain? Hm? Arey, the temple of Somnath is in the Prabhaas area of Gujarat, isn’t it? It is on the sea shore. Is Ujjain on the sea-shore? No. Baba did not remember. So, it was said, hm, the temple of Somnath which was at Ujjain is not placed as a Dhaam. Kashi is placed as a Dhaam. It is because Kashi is also on the banks of Ganga. And a lot of children are sitting there. Hm? Which children? Hm? Which children are sitting? Hm? You must have been to Benares. Or did you not go? Arey, haven’t you been to Benares as well? So, someone said – Not yet. Not in Kashi. Now, now, now the pilgrimage was undertaken. Someone said – She has gone in the present line.

Yes, so Benares is also very good. Many sages, saints and mahatmas live there. Kashi is number one. And later is Haridwar in reality. It is because they undertake Kashi Karvat (a ritual in the past where people used to sacrifice their life by jumping in a well) in Kashi, don’t they? They say – Shivkashi-3. And there they call it Haridwar. Where? The Ganges descends from the mountain, doesn’t it? So, they say Haridwar. It descended at the gate (dwar) of Hari. And here there is a name of Shiv’s Kashi. Here people remember Shiv. This is why all the sages and saints who sit there keep on chanting Shivkashi-3. This Shivkashi, that Kashi is also called Benares. Why? Whatever people utter, whatever names have been assigned are on the basis of which name? Hm? The name Kashi is on the basis of kaashya. Kaashya means luster (tej). Hm? And why was the name Benares coined? Yes, when one gets the luster of remembrance, then there will be more churning, will it not be? When one thinks and churns, then the readymade juice of knowledge emerges. But its actual name was Kashi. Later it was named Benares. The Britishers named it Benares. Why did the Britishers name it Benares? Hm? It is because where do you have to obtain the emperorship from? You have to obtain it from the Britishers only, will you not? So, the entire knowledge sits in their intellect. But as regards the topic of remembrance;

So, now this other name has been coined as Benares. So, someone said – Baba, Vanarasi. Yes, Vanarasi. Actually, its true name is Kashi. Then look, these people from the Shudra community sat and changed the name of Kashi to Vanarasi or Benares. Well, there is very little difference between Benares, Vanarasi. But as is the king, so do they keep on changing the names of cities. They change the name of the lanes also. Arey, they keep on changing the names of many things. The name of this Dilli has also been changed. Hm? Earlier, actually nobody used to call it Dilli. Hm? What did they used to call it? Hm? Indraprasth. They used to call it Indraprasth. Indraprasth city established by, made constant by, made constant in a special way by Indra. So, earlier it must be shaking. Hm? Indra came and made it constant. Someone said – They used to call it Hastinapur. Hm? Hastinapur? Someone said – Yes. This name Indraprasth is correct. Why? An abode of elephants (haathiyon ka pur); Hastinapur means elephant (haathi). Arey? Why should you name it an abode of elephants? Hm? Elephants have so much body consciousness. It has. Arey, here the angels (pariyaan) used to live, didn’t they? Hm? The angels who fly with the wings of knowledge and Yoga. Apsaras, angels are shown in the Court of Indra, aren’t they? So, those names are there, aren’t there? Pukhraj pari, Neelam pari. So, they are angels. So, who are called these angels? They are angels of Indra.

So, Indra doesn’t cause any rainfall. Does Indra cause rainfall? Hm? They say that deity Varun causes rainfall. Hm. It is sung that there was an angel (pari) in the Court of Indra who brought a dirty person. So, she got a curse that you may go and become a stone. Well, it is not about becoming a stone. Her intellect became stone-like. Morning class, dated 14.11.1967, Tuesday, sixth page. So, become a stone. Or those angels are not a topic of below. The Father has revealed that those who knowingly bring dirty ones here, don’t they? They bring them along with themselves; they bring the sinful ones here; so, it is as if they get cursed that you go and develop a stone-like intellect (pathharbuddhi). Hm? What will happen if she develops a stone-like intellect? Hm? What will be the difference? Will the soul conscious stage remain constant? It will not remain constant. It is because everyone has a stone-like intellect, isn’t it? So, she was told that you will then go and become stone-like intellect. By going where? Hm? Does anyone have a stone-like intellect in the Golden Age, Silver Age? Soul conscious stage remains there, isn’t it? There is remembrance [of the soul], isn’t it? The remembrance remains continuously. So, all the topics are of this place. Which all topics? The shooting of all the topics takes place here.

The name Indraprasth is completely correct. What? How is it completely correct? That Indra made Delhi constant in a special manner. Hm? First there are uproars of despair in Delhi, in Delhi. So, does it shake or does it remain constant? It shakes. Yes. So, it can be possible, isn’t it? But it is not that Indra, isn’t it? It means that he is not present now. What is meant by Indra? King. And here there are no angels, etc who have those wings and fly. It is about the wings of knowledge and Yoga. Hm? Wing of knowledge and wing of Yoga. So, you are now becoming truest angels. Hm? Angels who inculcate divine virtues. So, when you inculcate divine virtues, then definitely there is no angel higher than these. These are only called the angels of heaven also. So, you are studying here nicely. To go where? Arey, to go to the abode of angels (paristaan). Which paristaan? What did Indra make? Dilli had become a graveyard (kabristaan); it was dead, wasn’t it? So, when more people die, then more graves are dug in the graveyard. Yes. It became a graveyard means that everyone melted in the soil of body consciousness. First, the unlimited topic. Then in a limited sense.

So, it was told – You are now getting prepared to go to the abode of angels because you know that now the Paristaan is also going to be established here itself, isn’t it? Why? What does Delhi become first? First a graveyard, then it becomes an abode of angels. So, this is that Delhi only, isn’t it? It is not any other place, isn’t it? So, children have understood that we will go to our home and then come back. Which children? You soul-like children, the point-like souls; you are not bodies, are you? The soul, the soul will live at the soul’s home. Which is the soul’s home? The Soul World. Yes. So, you will go there and then come back. Where will you come? Hm? You will come back to this very Indraprasth because first you have to definitely go home. Why? It is because the soul has now become tired while playing its part. So, where does it have to go? When you get tired, then you go to sleep in the night, don’t you? Hm? Yes, so this soul has become tired, so, where will it go? It will go into deep sleep (sushupti). Will good and bad thoughts be created there? Will the organs work there? There are no organs at all there. Is there awareness of the organs in deep sleep? No.

So, you have to definitely go home. And you have to go naked only. It means that you have to remove this body-like dress and go. Hm. You have to go after becoming pure. This dress (body) is impure, isn’t it? Hm? If you haven’t made the impure dress pure, then what will happen? So, you will definitely have to suffer punishments. You have to go after suffering punishments. So, then you will go after becoming pure. You will go home. Then you have to come here from there. However you will come naked only from there or will you come from the home wearing clothes? Yes. So, this is a topic to be completely understood that we have to go naked and come naked. They even say that you departed naked, you come naked, you go naked. Hm? So, you have to go naked in the end. When that old world ends, then we come to the new world. So, you children explain that you keep on coming from above. Hm? When you start coming then first of all will the good ones come or will those souls who haven’t made purusharth nicely come first? No. They keep on coming. So, they keep on coming numberwise. In which numberwise? They come numberwise as per the purusharth of this time.

So, now the Paristaan (abode of angels) keeps on revolving in your intellect. Hm? What will Delhi become? A place of angels. It should revolve, shouldn’t it because you study only for the Paristaan. Hm? So, definitely the Paristaan should revolve, shouldn’t it? That too you know that those of us who study now, we study for how many births? Hm? We study for 21 births. So, the Paristaan should remain with you forever. Especially now in the end. When you are studying this knowledge. And you also know that the Father has explained that you keep on studying. While studying you will go to the abode of angels. And it is said ‘angel of heaven’. But there are no other angels, are there daughter? There are no other angels. It is shown in the scriptures also that there was a kingdom of Indra in heaven. There used to be angels there. Now tell, are there angels in the Golden Age, Silver Age? Where did the angels with the wings of knowledge and Yoga emerge there? Hm? Are there deities with knowledge and Yoga there? With whom do they have Yoga? Do they have knowledge? No. So, there is no topic of wings of knowledge and Yoga there at all.

And then later the Copper Age (Dwapur) arrived, the Iron Age (Kalahyug) arrived. Hm? Dwapur means two abodes (do pur), four abodes. Hm? So, the disputes and despair (kalah-klesh) go on increasing. Yes. So, then these human beings, who were deities, weren’t they? They then became Kshatriyas; from Kshatriyas they became Vaishyas; from Vaishyas they became Shudras in the Iron Age. So, these human beings just keep on changing. They keep on transforming. If you become truest angels, then you know that we are becoming angels of Paristaan. How? Now look, you are becoming like this. Nobody else has a higher dress than these at all. So wealthy! So this much! Whatever you see in this world, this is nothing daughter. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2813, दिनांक 08.03.2019
VCD 2813, dated 08.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning Class dated 14.11.1967
VCD-2813-Bilingual-Part-2

समय- 25.43-49.26
Time- 25.43-49.26


ये तो बच्चों को अच्छी तरह से विचार करना चाहिए कि ये जो दुनिया में देखते हो ये तो कुछ भी नहीं है। हीरा-वीरा। अरे, ये ऐसे हीरे तो वो देवता लोग बड़े-बड़े पत्थर उठाकरके उसमें मकानों में, हँ, उनमें डाल देते हैं, हँ, जो उनकी रोशनी आपेही आती रहती है। इनके जो दरवाजे बनते हैं ना अंदर जाने के लिए उसमें भी इतना बड़ा-बड़ा मणियां, पत्थर बहुत लगाते हैं। और उनकी झिरमिर-झिरमिर होती रहती है। तो परिस्तान तो पीछे क्या, इतना तो तुम ऊँच पद पाय रही हो। क्योंकि वो बड़े-बड़े पत्थर होते हैं। तुम तो जानते हो ना कि जबकि गजनबी आया था लूट करके ले गए। फिर आकरके यहाँ अपने ये कब्रों और कहाँ-कहाँ लगाए हैं। तो फिर ये इनको गोर्मेन्ट निकालकरके ले गई। ये अंग्रेज गोर्मेन्ट आई ना। वो सब जो कुछ रहा बचा सारा ले गई। क्या निकालकरके ले गई? ये तो तुम बच्चे समझ सकते हो। अभी अगर वो चीज़ होगी, अभी यहाँ होती तो कितना दाम हो जाता! तो तुम कहेंगे भला वो तो कट गए ना सभी। हाँ, वो तो कट गए। वो तो सभी हीरे बन गए, माणिक बन गए। फिर सतयुग में इतने वरी और ये बड़े-बड़े आएंगे। कहाँ से आएंगे? ऐसे-ऐसे तुम्हारे से वो लोग बहुत प्रश्न पूछते हैं। हँ? अरे, वहाँ तो जन्नत में कारुण का खजाना था। उसको तो परिस्तान ही कहेंगे ना। पीछे फिर वो राजाई और वो धन। इतना सब कहाँ से आएंगे?

तो बाप कहते हैं बच्ची जो चीज़ भी खाली हो जाती है जब ये बाइस्कोप देखते हो तो देखते हो कि ये सब लड़ाई में टूट-फूट गया। ये बाइस्कोप वाइस्कोप कुछ भी नहीं रह गया। फिर भी जभी शुरू होगा तो वो तैयार होते रहते हैं अपने-अपने टाइम पर। तो ये भी ऐसे ही है। ऐसे नहीं है कि जैसे अभी ये इन्सॉल्वेन्सी है। ऐसे सतयुग में भी इन्सॉल्वेन्सी बनी रहेगी। कभी वहाँ ऐसा हो सकता है? नहीं। क्योंकि फिर से ये रिपीट होते हैं, होते जाते हैं। इसलिए ऐसे-ऐसे ख्यालात दिल में नहीं ले आना कि वहाँ ये इतने बड़े-बड़े हीरे कहाँ से आवेंगे? अरे, अब विनाश होगा, एटम बम्ब फटेंगे, हँ, ये जो सूरज तपेगा, तो धरणी हिलेगी कि नहीं? हँ? और भूकम्प बड़े-बड़े आएंगे तो अंदर जो कुछ भी है पृथ्वी के अंदर, वो शास्त्रों में लिखा हुआ है – रत्नगर्भा वसुंधरा। वसुंधरा माने पृथ्वी में बड़े-बड़े रतन छुपे हुए हैं। जब ज्वालामुखी फूटते हैं ना तो सब पिघला हुआ निकलता है। तो कहीं सोना पिघला हुआ निकलता, कहीं चांदी के निकलते हैं, कहीं पत्थर ही पिघलते हुए निकलते हैं। तो वो सब बाहर आकरके, हाँ, ऐसे भी होता है। पहले सोने के पहाड़ भी थे। हाँ। तो ये मैटल के होते हैं। तो ये हो गया। तो ये नहीं सोचना चाहिए कि पीछे ये कहाँ से आएंगे इतना?

14.11.67 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। अभी तो कुछ भी नहीं है पीछे क्योंकि कलियुग का अंत अभी आकर हुआ ना पीछे। अरे, पर था तो ना। तो जो था वो तो फिर जरूर होगा। और तुम पुरुषार्थ कर रहे हो राजधानी के लिए। तुमको तो राजधानी जरूर मिलने की है। तो वो खयाल नहीं रखना चाहिए। ये बात उठानी नहीं चाहिए। क्या बात? हँ? कि ये कहाँ से आएंगे? फिर ड्रामा बिल्कुल काम में आता है अच्छी तरह से। बैठकरके समझाते हैं। ये सभी ख्याल उड़ायकरके ये फिर कैसा होगा, हँ, कहाँ होगा, कैसा हो गया? नहीं-नहीं। पहले तो तुम सतोप्रधान तो बन जाओ। तो पीछे जो भी था कलप पहले, कल्प-कल्प जो होता आया है सो ही होता रहेगा। राज्य तो इन लक्ष्मी-नारायण का ही होगा ना। दूसरा तो कोई नहीं होगा। तो जो इनके राज्य में होगा सो तो फिर भी होगा ही होगा। स्वर्ग तो होगा ही। अब स्वर्ग तो स्वर्ग ही है ना। और नरक तो नरक ही है। हँ? स्वर्ग आकरके, हँ, कौन स्थापन करता है? हँ? कहते हैं हैविनली गॉड फादर आकरके, हँ, स्वर्ग बनाने का रास्ता बताते हैं। तो तुम बच्चे ही अपने लिए क्या करते हो? अपना स्वर्ग बनाते हो। और नरक? हँ? नर नरक बनाता है। तो नरक अलग है। स्वर्ग अलग है। हँ? नर मनुष्य को कहा जाता है। मनुष्य थोड़ेही भगवान हो सकता है? हँ? क्यों? क्योंकि मनुष्य को तो मन होता है। ‘मननात् मनुष्य’ शास्त्रों में लिखा हुआ है ना। हँ? मनन-चिंतन करने से मनुष्य कहा जाता है। मनुष्य की औलाद मनुष्य।

तो वो तो नई दुनिया है। हँ? वहाँ तो सब कुछ नया परिस्तान। और ये दुनिया तो कब्रिस्तान है। हँ? जहाँ देखो वहाँ कब्र दाखिल हुए पड़े हैं। तो कब्रिस्तान तो पीछे कब्रिस्तान ज़रूर बनेगा। हँ? बाप आकरके परिस्तान बनाते हैं। हँ? और फिर देवताएं जब नीचे गिरते हैं; हँ? देवता से क्या बन जाते? देवताओं के सुख स्वर्ग में भोग करके, हँ, मनुष्य बनते हैं तो फिर दूसरे धरमपिताएं आते हैं, उनके प्रभाव में आ जाने से वो मनुष्य बन जाते हैं। नहीं तो तुमको तो कोई बुद्धि चलाने की, मन चलाने की कोई दरकार नहीं थी स्वर्ग में। क्यों? क्योंकि सारा काम कौन करता था? सारा काम प्रकृति दासी करती थी। तो उनमें कभी भी, कभी भी संशय नहीं लाना चाहिए। क्योंकि बाप ने समझाया है कि वर्ल्ड की हिस्ट्री और जॉग्राफी रिपीट ज़रूर होती है। अभी दुनिया की हिस्ट्री, जॉग्राफी तो तुम्हारी बुद्धि में आ गई ना। बच्चे, अभी तो कैसे ये रिपीट होती है, कैसे पास्ट सो प्रेज़ेन्ट हो जाता है, फिर पास्ट सो प्रेज़ेन्ट हो जाता है। हँ? प्रेज़ेन्ट से फिर फ्यूचर। तो ये तो बाप ने तुमको समझाय दिया है। बच्चों को अच्छी तरह से समझाया है कि इसमें कोई संशय लाने की दरकार नहीं है। क्योंकि हिस्ट्री और जॉग्राफी तो एक ही होती है ना दुनिया की। तो जो एक ही है वो ही फिर रिपीट होती रहती है। वो कोई दूसरी तो नहीं होगी ना। क्योंकि आत्मा तो अविनाशी है। हँ? ये आत्मा तो विनाश होने की नहीं है। और फिर न उसमें जो पार्ट भरा हुआ है, वो कोई विनाश होने का है। तुम्हारा जो पार्ट है देवी-देवता बनने का, तो देवी-देवता बनते हो तो स्वर्ग में। हँ? मनन-चिंतन-मंथन करने वाले ऋषि-मुनि मनुष्य बनते हो तो फिर द्वापरयुग आता है। जितनी-जितनी मुँह, उतनी-उतनी बातें। वो एक का ज्ञान हुआ क्या? एक का हुआ द्वापर में? हाँ, दो-दो बातें, दो-दो कुल, दो-दो मतें, दो-दो भाषाएं।

तो तुम जानते हो कि स्वर्ग विनाश हुआ। फिर ये पुरानी दुनिया बनना शुरू। बाकि आत्माएं तो वो ही होंगी ना। तो उनमें जो पार्ट है वो ही चलेगा। सो ही फिर रिपीट करेंगे क्योंकि दुनिया में ये क्या है? इस दुनिया में तो हर चीज़ चार अवस्थाओं से पसार होती है। सतोप्रधान, सतोसामान्य, रजो और तमो। तो आत्मा भी? पहले सतोप्रधान थी सतयुग में, तो तुम 16 कला संपूर्ण देवताएं थे। फिर सुख भोगते-भोगते, जन्म लेते-लेते पीढ़ी दर पीढ़ी नीचे उतरे तो फिर चौदह कला। क्षत्रीय बन गए। हँ? तो इन बातों की इतनी डीप में जाना है बच्चों को अच्छी तरह से कि पहले तो उतरना धीरे-धीरे होता है। फिर? फिर स्पीड उतरने की बढ़ जाती है। नीचे गिरते हैं। फिर तो ये समझते हो ना बच्चे। यहाँ जो बाप आते हैं, हँ, यहाँ आकरके, शूटिंग कराते हैं तो रिहर्सल होगी तो अच्छाई-बुराई दोनों की रिहर्सल होगी ना। हाँ। तो जितना जो सन्मुख रहते हैं; हँ? किसके? मामेकम याद करो। तो एक के जितना अंदर-बाहर से सन्मुख रहते हैं, तो वो तो सुनते ही रहते हैं। हँ? सुनते ही रहते हैं। तो फिर उसका रिजल्ट क्या होगा? हँ? वो सतयुग में भी सुखी, तो त्रेता में भी सुखी, और द्वापर, कलियुग में भी औरों के मुकाबले जास्ती सुखी रहते हैं, हँ, कि वो कोई धर्म ऐसा होता है दुनिया में जो एक बार स्थापन हो जाए तो बीच में खलास हो जाए? हँ? ऐसा तो कोई धरम नहीं होता। सब धरम अंत तक चलते रहते हैं जब तक इस सृष्टि का विनाश न हो। हाँ, लेकिन वो और धरम वाले तो इतना एक बाप की बात को सुनते नहीं ना। तो तो अपने-अपने धरमपिताओं को फिर भी पूर्वजन्मों के कर्मों के हिसाब से पकड़ लेते हैं।

तो ये नई-नई अच्छी-अच्छी बातें हैं याद करने की जैसी बातें तुम सुनते रहते हो। अगर सुनते ही जाएं, सुनते ही जाएं, हँ, और फिर दूसरों को सुनाते भी जाएं। किसको सुनावें? सुनाने के लिए तो फिर यहाँ से बाहर जाना पड़ता है। कि यहाँ बैठकरके सुनावेंगे? हँ? और जितना सुनाएंगे उतना तुम्हारी प्रजा बनेगी। प्रजा राजाओं को थोड़ी होती है कि बहुत होती है? हाँ। राज परिवार वाली आत्माएं थोड़ी होती हैं और प्रजावर्ग वाली बहुत होती हैं। फर्स्टक्लास प्रजा, उसमें भी, सेकण्ड क्लास, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास प्रजा भी होती है। तो सुनाने के लिए तो ज़रूर बाहर जाना पड़े। कि बाप के सामने ही सन्मुख बैठे रहेंगे? नहीं। तो फिर सुनावें कैसे? तो जाना पड़ता है। कहाँ? गांव-गांव में, शहर-शहर में जाना पड़ेगा क्योंकि बाप आकरके राजयोग सिखाते हैं राजा बनने के लिए। और तो दुनिया में कोई धरमपिताएं राजा नहीं बनाते। राजा माने स्वाधीन या पराधीन? हँ? राजा माने स्वाधीन। दुनिया में तो और जितने भी धरम हैं वो सब क्या बनाते हैं? हँ? चाहे चंद्रवंशी हों, चाहे इस्लामवंशी हों, कोई भी हों वंशी, क्या बनावेंगे? पराधीन बनाते हैं। राजा तो स्वाधीन होता है। किसी के आधीन होता है क्या? नहीं। तो बाप तो कहते हैं अब यहाँ जितनी सुनाएंगे दूसरों को एक बाप का ज्ञान, हाँ, तो उतनी तुम्हारी प्रजा बनेगी। तो प्रजा बहुत बनानी है। हाँ। उन धरमपिताओं की भी जब बहुत प्रजा बन जाती है कई जन्मों के बाद, क्योंकि जब आते हैं तो उनके तो धरम वाले होते ही नहीं हैं दुनिया में। तो वो तो जो भारतवासी हैं जिन्हें मातृ देश कहा जाता है, माताओं का देश, तो उनमें प्रवेश करके वो फिर अपनी जेनरेशन की शुरुआत करते हैं। तो पहले तो थोड़े होंगे ना। तो पहले थोड़े होते हैं। फिर कई पीढ़ियों के बाद जब उनकी संख्या बढ़ती है तब फिर उनमें भी राजाई चलती है। कि पहले-पहले राजाई करेंगे? नहीं।

तो बताया प्रजा तो बहुत बनानी पड़ती है। हँ? बहुत माने क्यों? हँ? कितने होंगे सतयुग में? हँ? सतयुग में 9 लाख ही तो होंगे शुरुआत में। तो बहुत प्रजा क्यों? बहुत माने कितनी? अरे, अब जो जितनी प्रजा बनावेंगे। हँ? कितनी? बहुत माने कितनी? हँ? बहुत प्रजा बनावेंगे तो एक ठिकाने पर रह भी नहीं सकेंगे। हँ? तो तुम्हारी बुद्धि में सारा ऊपर से लेकरके देखो, देखो बाप को भी जान गए और बाप की, रचयिता की रचना को भी जान गए। किसको जान गए? हँ? बाप को जान गए माना किसको जान गए? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, हाँ, बाप दो हैं ना बेहद के। हाँ, बेहद के दो बाप हैं तो उनके बच्चे भी बेहद के होंगे या थोड़े होंगे? बेहद के बच्चे। तो दोनों बाप एक निराकार आत्माओं का बाप, एक साकार मनुष्यों का बाप। दोनों जब इकट्ठे होते हैं एक ही शरीर में क्योंकि शिव बाप को तो अपना शरीर है ही नहीं। तो, तो जिस विश्व के पिता में प्रवेश करते हैं तो उसको क्या बनाते हैं? विश्व का मालिक बनाते हैं। सारे विश्व का मालिक बनेगा तो प्रजा कितनी बनेगी? कितनी बनेगी? हँ? अरे, प्रजा फिर उसकी बात मानेगी या नहीं मानेगी? मानेगी। और नहीं मानेगी तो मुक्ति और जीवनमुक्ति भी नहीं मिलेगी।

तो बताया वो बड़े ते बड़ा राजा विश्व का मालिक बनने के लिए तो फिर कितनी प्रजा बनानी पड़ती है! तो और भी तो छोटे-छोटे राजाएं होंगे, छोट होंगे, बड़े होंगे, नंबरवार होंगे ना। तो प्रजा तो बनानी पड़ती है। ये बात तुम जान गए। तो तुम्हारा तो उठते-बैठते, हँ, तुम वास्तव में जैसे कि एक बोलता-चालता, फिरता लाइट हाउस। हँ? और लाइट हाउस माने? ज्ञान की रोशनी छोड़ने वाले लाइट हाउस बन गए। हाँ, लाइट हाउस हो। लाइट हाउस हो गया। क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में तो किसको भी मैसेज देने के लिए ये बुद्धि में सारी ज्ञान की लाइट आ गई ना। हँ? आ गई कि नहीं आ गई? आ गई। तो उस लाइट को काम में लावेंगे? नहीं लावेंगे? कैसे लावेंगे? हँ? जितनों को वो लाइट, वो ज्ञान की रोशनी देंगे उतनी तुम्हारी प्रजा बन जावेगी। हँ। क्योंकि वो पहुँचाने के लिए वो लाइट, हँ, पहुँचाएंगे तो फिर वो शांतिधाम, सुखधाम भी जाएंगे, जिनके-जिनके पास एक बाप की लाइट माइट पहुँचावेंगे। नहीं तो? नहीं तो वो नहीं जाय सकते। तो ज़रूर लाइट हाउस हो गया ना तुम। हाँ। ओमशान्ति। (समाप्त)

Children should nicely think over that whatever you see in the world is nothing. Diamonds, etc. Arey; such diamonds are picked and embedded by those deities in their houses like big stones so that automatic light keeps on emanating from them. Even their doors for entrance are embedded with such big gems, [precious] stones. And they keep on shining. So, later not just the abode of angels (paristaan), you are achieving such high posts. It is because they are big stones. You know that when Gaznavi came he looted and took away. Then they came here and embedded them in these graves and elsewhere. So, then the [British] government took these away. This British Government came, didn’t it? It took away whatever remained. What did it remove and take away? You children can understand this. Had that thing existed now, had it existed now here, then its price would have increased so much! So, you will say that all those were cut away, were they not? Yes, they were cut. All of them became diamonds, gems. Then, in the Golden Age so many and these big, big ones will emerge. From where will they emerge? Those people ask you a lot of questions like this. Hm? Arey, there was a treasure of Karun in Jannat (heaven). That will be called Paristaan only, will it not be? Later that kingship and that wealth. Where will all that come from?

So, the Father says – Daughter, when anything becomes empty, when you see this bioscope, then you observe that all this broke in the war. This bioscope, etc. did not remain. However, whenever it starts then they keep on getting prepared at their destined time. So, this is also like this. It is not as if just as there is insolvency now, similarly, there will be insolvency in the Golden Age as well. Can such thing ever happen there? No. It is because this repeats, keeps on repeating. This is why such thoughts should not be brought into your heart that where will such big diamonds come from there? Arey, now destruction will take place, atom bombs will explode, hm, this Sun will heat up; so, will this Earth shake or not? Hm? And when big Earthquakes occur, whatever is inside, within the Earth, it has been written in the scriptures – Ratnagarbha vasundhara. Vasundhara means big, big gems are hidden in the Earth. When volcanoes erupt, then everything emerges in a molten form. So, somewhere melted gold emerges, somewhere melted silver emerges, somewhere melted stones emerge. So, all that comes out, yes, it happens like this also. Earlier there were golden mountains as well. Yes. So, they are made up of metals. So, this happened. So, you should not think that where will all this come from later on?

Seventh page of the morning class dated 14.11.67. Now there is nothing later because now in the end it is the end of the Iron Age, isn’t it? Arey, but it did exist, didn’t it? So, whatever existed will exist again. And you are making purusharth for the capital (raajdhaani). You are definitely going to get the capital. So, you should not have those thoughts. You should not raise this topic. What topic? That where will all these emerge from? Then the drama proves completely useful, very nicely. He sits and explains. All these thoughts should be removed that how will this happen again, hm, where will it happen, how did it happen? No, no. First you become satopradhan. Then, later, whatever was there Kalpa ago, whatever has been happening every Kalpa, will keep on happening. There will be the rule of these Lakshmi and Narayan only, will it not be? There will not be anyone else. So, whatever existed in their kingdom, will however definitely exist. Heaven will definitely exist. Well, heaven is heaven only, isn’t it? And hell is hell only. Hm? Who comes and establishes heaven? Hm? It is said that the Heavenly God Father comes and shows the path of establishing heaven. So, hell is different. Heaven is different. Hm? A human being is called ‘nar’. Can a human being be God? Hm? Why? It is because a human being has mind. It has been written in the scriptures – Mananaat manushya, isn’t it? Hm? A human being is called manushya as he thinks. The progeny of a human being is a human being.

So, that is a new world. Hm? There everything will be new, Paristaan (abode of angels). And this world is a graveyard (kabristaan). Hm? Wherever you see people have entered into graves. So, the graveyard, so, later it will definitely become a graveyard. Hm? The Father comes and makes Paristaan. Hm? And then when the deities fall; Hm? What do they become from deities? After enjoying the happiness of deities in heaven, when they become human beings, then when other founders of religions come, they get influenced by them and become human beings. Otherwise, you were not required to use your intellect, use your mind in heaven. Why? It is because who used to do the entire work? The maid nature used to perform all the tasks. So, you should never get a doubt in that. It is because the Father has explained that the history and geography of the world definitely repeats. Now the history, geography of the world has come in your intellect, hasn’t it? Children, well, how this repeats, how the past becomes present, then past becomes present. Hm? Present then becomes future. So, the Father has explained this to you. Children have been explained nicely that there is no need to get doubts in this. It is because the history and geography of the world is only one, isn’t it? So, that which is one, keeps on repeating. It will not be anything else, will it be? It is because the soul is imperishable. Hm? This soul is not going to be destroyed. And then neither the part that is recorded in it is going to be destroyed. Your part is to become deities in the heaven; so, you become deities in heaven. Hm? When you become sages and saints, human beings who think and churn, then the Copper Age arrives. There are as many topics as the number of mouths. Is that the knowledge of one? Is it the knowledge of one in the Copper Age? Yes, two topics, two clans, two opinions, two languages.

So, you know that the heaven was destroyed. Then this old world started forming. But the souls will be the same, will they not? So, they will play the same part that is recorded in them. They will repeat the same because what is this in the world? Everything in the world passes through four stages. Satopradhan, satosaamanya, rajo and tamo. So, the soul also? Initially, when it was satopradhan in the Golden Age, you were deities perfect in 16 celestial degrees. Then while enjoying the pleasures, while getting births, you declined generation by generation and then you were left with 14 celestial degrees. You became Kshatriyas. Hm? So, the children should go so deep into these topics very well that first we have to descend gradually. Then? Then the speed of descent increases. You fall down. Then children you understand this, don’t you? The Father who comes here, hm, after coming here, when He enables the shooting, then when the rehearsal takes place then the rehearsal of both good and bad will take place, will it not? Yes. So, the more someone remains face to face; hm? With whom? Remember Me alone. So, those who remain face to face with One within and without, they keep on listening. Hm? They keep on listening. So, then what would be its result? Hm? They remain happy in the Golden Age also, they remain happy in the Silver Age also and they remain happier when compared to others in the Copper Age and Iron Age also, hm, or is there any such religion in the world which perishes in between after getting established once? Hm? There is no such religion. All the religions continue till the end, until this world is destroyed. Yes, but those who belong to the other religions do not listen to the topic of one Father to that extent, do they? So, so, they catch their individual founders of religions as per the karmic accounts of their past births.

So, these are new, nice topics to remember, which you keep on listening. If you go on listening, go on listening, hm, and then go on narrating to others as well. To whom should you narrate? You have to go out from here to narrate. Or will you sit and narrate here? Hm? And the more you narrate, the more you will generate subjects. Do the kings have a few subjects or many subjects? Yes. The souls of the royal family are a few and those from the subjects’ category are many. First class subjects, even in that there are second class, third class, fourth class subjects also. So, you will definitely have to go out to narrate. Or will you continue to sit face to face with the Father? No. Then how will you narrate? So, you have to go. Where? You will have to go to every village, every city because the Father come and teaches rajyog so that you could become kings. And no other founder of the religion in the world makes anyone a king. Does a king mean independent (swaadheen) or subservient (paraadheen)? Hm? A king means independent. What do all the religions in the world make? Hm? Be it the Chandravanshis, be it the Islamvanshis, be it any vanshi, what do they make? They make subservient. A king is independent. Is he subservient to anyone? No. So, the Father says – The more you narrate the knowledge of one Father here now, yes, then you will get subjects to that extent. So, you have to prepare a lot of subjects. Yes. When even those founders of religions gather a lot of subjects after many births because when they come, there are no people of that religion in the world. So, the residents of India, who are said to belong to the mother land (maatri desh), so, they enter in them and start their generation. So, initially there will be very few, will they not be? So, initially there will be very few. Then after many generations when their numbers increase, then kingship also starts among them. Or will they rule initially? No.

So, it was told that you have to prepare a lot of subjects (praja). Hm? What is meant by many? Hm? How many people will there be in the Golden Age? Hm? There will be only 9 lakhs in the Golden Age in the beginning. So, why many subjects? ‘Many’ refers to how many? Arey, well, whoever prepares whatever number of subjects; Hm? How many? ‘Many’ refers to how many? Hm? If you prepare many subjects, then you will not even be able to live at one place. Hm? So, look, your intellect knows entirely from the above, look, you came to know the Father also and you also came to know of the creation of the Father, of the Creator. Whom did you get to know? Hm? Knowing the Father means knowing whom? Hm?
(Someone said something.) Yes, yes, there are two unlimited Fathers, aren’t there? Yes, there are two unlimited Fathers; so, will His children also be unlimited or a few? Unlimited children. So, both the fathers; one is the Father of the incorporeal souls; one is the Father of the corporeal human beings. When both of them come together in one body, because Father Shiv doesn’t have a body of His own at all. So, so, what does He make the Father of the world in whom He enters? He makes him the master of the world. If he becomes the master of the entire world, then how many subjects will be formed? How many will be formed? Hm? Arey, then, will the subjects accept his words or not? They will accept. And if they do not accept, they will not get mukti and jeevanmukti as well.

So, it was told that in order to become the biggest king, the master of the world, you have to then prepare so many subjects. So, there will be other small kings also; there will be small ones, big ones; they will be numberwise, will they not be? So, the subjects have to be prepared. You have come to know of this topic. So, while standing and sitting, your, hm, you are actually like a talking, walking, moving light house. Hm? And what is meant by light house? You became the light house that emanates the light of knowledge. Yes, you are a light house. You are a light house. It is because in your intellect, in order to give message to anyone, the entire light of knowledge emerged in your intellect, didn’t it? Hm? Did it emerge or not? It emerged. So, will you use that light? Will you not use? How will you use? Hm? To all those whom you give that light, that light of knowledge, they will become your subjects (praja). Hm. It is because in order to give out that light; hm, if you give out [the light] then they will go to that abode of peace and the abode of happiness also, to whomsoever you give that light, might of one Father. Otherwise? Otherwise, they cannot go. So, definitely you are light house, aren’t you? Yes. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2814, दिनांक 09.03.2019
VCD 2814, dated 09.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
Morning class dated 14.11.1967
VCD-2814-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.10
Time- 00.01-20.10


प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को सातवें पेज के मध्य के बाद छठी लाइन में बात चल रही थी कि तुम बच्चे तो वास्तव में जैसे एक बोलता-चालता, फिरता लाइट हाउस हो गया। हँ? तो तुमको तो उठते-बैठते, कर्म करते हर समय लाइट हाउस बनके रहना है। क्योंकि बुद्धि में तुम्हारे ये किसको भी मैसेज देने ये बुद्धि में आ गया; क्या मैसेज देने को? क्योंकि वो मैसेज पहुंचाने के लिए वो शांतिधाम और सुखधाम तो ज़रूर लाइट हाउस हो गया ना। कौन? कौन हो गया सुखधाम, शांतिधाम, लाइट हाउस? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, परमब्रह्म है वो शांतिधाम हो गया। और सुखधाम? एक ही बात है, एक ही पर्सनालिटी है। एक ही पर्सनालिटी में वो तुरीया पार्टधारी परमब्रह्म भी है। है तो ना माता का पार्ट। तो फिर पिता भी है। इसलिए कहते हैं तुम्हारा बाप भी है; क्या है? सुखधाम भी है। टीचर भी है। सदगुरु भी है। तो ज़रूर लाइट हाउस हो गया ना। तो याद करो। किसको? शांतिधाम को याद करो, सुखधाम को याद करो। तो बच्ची लाइट हाउस हो गया ना।

ये तुम्हारा लाइट हाउस जैसे फिरता ही रहता है। हँ? फिरता ही रहता है? सदाकाल फिरता रहता है क्या? हँ? सदाकाल फिरता रहता है? कहीं ठहरता नहीं?
(किसी ने कुछ कहा।) ठहरता है? अच्छा? अरे, लाइट हाउस बाबा आत्मा को बता रहे हैं न कि शरीर को बताय रहे। आत्मा तो मन-बुद्धि रूप। तो मन-बुद्धि कहीं ठहरती है क्या? नहीं। तो फिरता ही रहता है। जैसे स्वदर्शन चक्र है ना। हँ? चित्र बनाए विष्णु के भक्तिमार्ग वालों ने, शास्त्रकारों ने, चित्रकारों ने। तो विष्णु के हाथ में, हँ, हाथ में कि उंगली में? हँ? हाँ, तर्जनी उंगली में दे दिया है। तर्जनी नाम क्यों दिया? हँ? तर्जनी माने सबको फटकार लगाती रहती है। हँ? तर्जन करती। ए? ऐसे। तो वो तर्जनी उंगली में वो दिखाते हैं विष्णु को घूमता ही रहता है, घूमता ही रहता है। रुकता है क्या? नहीं। रुकता नहीं। तो क्या है वो? हँ? वो है अर्जुन दिखाते हैं ना। तो अर्जुन हुआ पांच पांडवों की जो यादगार हाथ में दिखाई जाती है वो अर्जुन हुआ। हँ? क्या? वो अर्जुन रूपी अंगुली में सुदर्शन चक्र फिरता ही रहता है। अपनी आत्मा के 84 का चक्र, चक्कर ही लगाता रहता है। हाँ। जैसे सुदर्शन चक्र फिरता है ऐसे लाइट हाउस भी ऐसे ही फिरता रहता है। दोनों में अंतर क्या है? हँ? स्वदर्शन चक्र माना ज्ञान का चक्र, 84 जन्मों का ज्ञान बुद्धि में बैठे माना ज्ञान। 84 जन्मों की सच्चाई क्या है उस हीरो पार्टधारी की वो बात बुद्धि में अच्छी तरह से बैठे। हाँ। फिर? लाइट हाउस क्या है? लाइट किसे कहते हैं? लाइट है ही पवित्रता की लाइट। पवित्रता से ही सारे काम दुनिया के होते हैं। फिर उसे लाइट हाउस कहो, योगबल कहो।

तो वो योग ऊर्जा रूपी लाइट हाउस फिरता ही रहता है। फिरता है ना बच्चे। हाँ, ये जरूर कहेंगे कि फिरते-फिरते थोड़ा समय के लिए अंधियारा हो जाता है। हँ? कब? सतयुग से लेकर त्रेता, द्वापर, कलियुग, चारों युगों में 84 का चक्र तो लगाता है लेकिन अंतिम जनम में थोड़े समय के लिए अंधेरा हो जाता है। तो अंधेरा तो सूर्य में होता है या चंद्रमा में होता है? हँ? चंद्रमा में अंधेरा होता है। तो नाम रख दिया है कृष्ण चंद्र। और फिर? है तो, कहते तो हैं राम सूर्यवंशी। लेकिन फिर पीछे से क्या लगाय देते? राम चन्द्र। तो वो टाइटल लगा हुआ है। इससे साबित होता है कि थोड़ा समय अंधियारा होता तो ज़रूर है। बाप भी बताते हैं। तुम बच्चों को बताते हैं ना। दुनिया की ऐसे कोई बात नहीं जो तेरे पर लागू न हो। तो चंद्रमा लागू होगा कि नहीं उसके ऊपर? हँ? भले गीता में भी लिखा हुआ है, बाप भी कहते हैं कि मैं जब आता हूँ तो सूर्य को ज्ञान देता हूँ। हँ? हाँ। क्योंकि सूर्य सूर्य को ही देगा ना। हाँ। तो बताया सूर्य क्या करता है? सूर्य का धंधा क्या है? हँ? सूर्य तपता रहता है। खुद भी तपता है और सारी दुनिया को भी तपत देता है। हाँ, तो बताया, थोड़े समय के लिए अंधियारा होता है। फिर चक्कर दिखलाते हो। तो ये भी ऐसे ही है कि थोड़ा समय तो अंधियारा रहता ही है। हँ? तो उन्होंने शास्त्रों में दिखाय दिया कि हनूमान ने क्या किया? हँ? सूरज को निगल लिया। तो क्या होगा फिर? हँ? अंधियारा होगा ना। हाँ। तो बंदर को दिखलाते हैं। क्या? हँ? पीछे बंद हो जाते हैं। क्या बंद हो जाते हैं? हँ? जब अंधियारा हो जाएगा तो चक्कर चलना थोड़ा बंद होगा या नहीं होगा? हँ? स्वदर्शन चक्र, जो 84 का चक्र है, बुद्धि में चलना बंद होगा कि नहीं? बंद हो जाता है। तो पीछे बंद हो जाते हैं तो नाम रख दिया है बंदर। कौनसा बंदर? हनूमान बंदर। हाँ। पीछे फिर दिखलाते हैं कि बंद हो जाते हैं।

तो तुम भी जैसे लाइट हाउस हो। हँ? तुम जाकरके सबको बताते हो कि शांतिधाम को याद करो। सुखधाम को याद करो। भई शांतिधाम को याद करो, सुखधाम को याद करो तो तुम्हारी बुद्धि में तो ये होना ही चाहिए दोनों चीज़ें। क्या? सुखधाम और शांतिधाम। है ना? तो उसको ही तो मनमनाभव कहा जाता है। किसको? कि बुद्धि में शांत स्टेज रहे और सुख की स्टेज भी रहे। मनमनाभव और फिर मध्याजीभव। किसमें मनमनाभव? मेरे मन में भव, समा जा। और मेरे मन में समा जाएगा क्योंकि; ये कहता कौन है मनमनाभव? हँ? कौन कहता है? हाँ। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) राम कहता है? अरे? उसका मन-बुद्धि तो पत्थर बना पड़ा है। वो कैसे कहेगा? हँ? वो कहेगा? अरे, बाप कहते हैं मनमनाभव। आत्माओं का बाप। क्या कहते हैं? मेरा मन जो है, मेरा दिल किसके ऊपर आ गया? हँ? हाँ। जो मनुष्य सृष्टि का हीरो पार्टधारी है ना उसके ऊपर मेरा दिल आया। तो मेरा मन कहो, मेरा दिल कहो, मेरे मन में समा जा। जो जिस पर मेरा दिल आ गया, मन आ गया, उसके अंदर जो संकल्प चल रहे हैं, उन संकल्पों में समा जा। अब क्या संकल्प चल रहे हैं उसके मन में? हँ? आखरीन संपन्न स्टेज बनेगी तो क्या संकल्प चल रहे हैं जो चित्रों में दिखाते हैं? हँ? वो हीरो पार्टधारी शंकर को चित्र भी दिखाते हैं ना। तो क्या दिखाते हैं? हँ? तीसरा नेत्र दिखाते हैं। तीसरा नेत्र? माना? हँ? बुद्धि में क्या है? बुद्धि में अपनी आत्मा की वो यादगार है तीसरे नेत्र की। तो आत्मिक स्टेज में टिकना माना निःसंकल्प हो जाना। फिर संकल्प-विकल्प चलना चाहिए? नहीं।

तो जब सारे संकल्प एक के संकल्प में मैं आत्मा ज्योतिबिन्दु उसमें समा जाते हैं तो फिर क्या करना है? हँ? मत् याजि भव। जो कुछ भी करना है उस ‘मत’ माने मेरे लिए ही यजन कर। यजन कर माने जो भी सेवा कर, तन की, धन की, मन की, समय की, संबंध की, संपर्कियों की ताकत लगाकरके वो सब ‘मत’ मेरे लिए कर। किसने कहा? हँ? हाँ, वो ही मुकर्रर शरीरधारी जो आत्मा है, जो आत्मिक स्थिति में टिकती है बीजरूप स्टेज में, तो कहते हैं मत् याजी भव। मेरे लिए यजन कर। यजन कर माने यज्ञ कर। मेरे लिए यज्ञ सेवा कर। कोई भी प्रकार की सेवा कर, किसके लिए कर? हँ? अपने लिए न कर। किसके लिए कर? हँ? हाँ, मेरे लिए कर। मेरे लिए माने? जो विश्व कल्याणकारी है उसके लिए कर। क्योंकि मैं आता हूँ तो जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता हूँ उसको आप समान बनाता हूँ ना। तो इस दुनिया में ऐसी कौनसी आत्मा है जो भले थोड़े समय के लिए आती है, सौ साल के लिए ही आए, तो जब तक सौ साल रहे तो सदाकाल शिव माना कल्याणकारी बनकरके रहे या कभी अकल्याण का संकल्प चलाए? नहीं। सदा शिव। सदा कल्याणकारी। तो मैं आकरके आप समान बनाके जाता हूँ। किसको? जिस मुकर्रर रथधारी में प्रवेश करता हूँ उसको आप समान कल्याणकारी बनाकर जाता हूँ। कैसा कल्याणकारी? सतयुग आदि से लेकरके कलियुग अंत तक जो भी 500-700 करोड़ बच्चे हैं आदम के; हँ? बाप क्या चाहता है? मेरे बच्चे सुखी रहें या दुखी हो जाएं? हाँ, बाप तो यही चाहता है कि मेरे बच्चे सुखी रहें। तो बस सुखी रहें माना कल्याण हो। हँ? हाँ।

तो ये तुम्हारी बुद्धि में भी जरूर रहना चाहिए। हँ? तुम्हारी बुद्धि में भी। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘भी’ माने कोई दूसरा भी है। हँ? क्यों लगा दिया? अरे? कुछ जवाब नहीं? क्यों लगा दिया बुद्धू बुद्धि में ये बात? तुम्हारी बुद्धि में भी ये जरूर रहना चाहिए। हँ? अरे? शिव बाप की तो बुद्धि में है ही सुप्रीम सोल। नहीं? वो तो सदाकाल है ही। रहती ही है। लेकिन तुम्हारी बुद्धि में भी, हँ, ये ज़रूर रहना चाहिए। क्या? सबका कल्याण हो। हाँ। सदा कल्याणकारी। तो हमको पैगाम देना है। क्या? किसका? पैगम्बर का पैगाम दिया जाता है। क्या? तो वो जो धरमपिताएं आते हैं उनको पैगम्बर कहते हैं ना। पैगाम देने वाले। हँ? कहते हैं खुदा का पैगाम लेकरके आए हैं। तो ये भी क्या हुआ आदम? हँ? अर्जुन क्या हुआ? हाँ, पैगाम देने वाला हुआ ना प्रैक्टिकल में। हाँ।

तो हमको पैगाम देना है। कहाँ का पैगाम देना है? सुखधाम और शांतिधाम का पैगाम देना है। अच्छा? किसको देना है? हँ? अरे, इस सृष्टि में जो भी जीव आत्माएं हैं सबको ये पैगाम देना है। क्या? क्या? कि हाँ, सुखधाम और शांतिधाम सबको जाना है। कोई भी यहाँ प्राणी ऐसा नहीं बचेगा जो सुखधाम और शांतिधाम की यात्रा न करे। जीवात्माओं को देना है। जीवात्मा माने? जो जीवित हैं उनको देना है या जिन्होंने शरीर छोड़ दिया या छोड़ देंगे उनको देना है? हँ? जीवित हैं उनको कहेंगे जीवात्माएं। अब उनमें कुछ आत्माएं तो ऐसी हैं जो कि जिनको बुद्धि ही नहीं, जिनको मन ही नहीं। तो वो तो मनन-चिंतन-मंथन कर ही नहीं सकतीं। वो तो बस जैसे पशु-पक्षी होते हैं ना, उनका झुंड होता है, हँ, उनके झुंड में कोई मुखिया होता है। होता है कि नहीं? तो उसके पीछे-पीछे भाग खड़े होते हैं। हँ? जैसे भेड़-बकरियां हैं ना। तो उनका जो मुखिया होगा वो जिधर जाएगा उधर, भले गड्ढे में गिर जाए पहली, तो सारे गड्ढे में घुस पड़ेंगी। अकल नहीं है, बुद्धि? बुद्धि नहीं है। तो वो क्या करती है? वो सिर्फ फालो करती हैं। जैसा बड़ा करेगा वैसे ही वो करेंगे। तो उनको तो संग करना है। और नंबरवार संग करने वाले। जैसे कबूतर होते हैं ना। तोते होते हैं। उड़ते हैं ना। तो उनका जो मुखिया आगे-आगे उड़ेगा, हँ, और पीछे-पीछे नंबरवार उड़ते जाएंगे। तो बताया जीवात्माओं को ये सबको संदेश तो मिलना है।

A morning class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the sixth line after the middle portion of the seventh page on Tuesday was that you children are like a speaking, walking, moving light house. Hm? So, you have to remain a light house all the time while standing, sitting and performing actions because it has entered your intellect to give this message to anyone; to give what message? It is because in order to deliver that message that abode of peace and the abode of happiness definitely became a light house, didn’t it? Who? Who became the abode of happiness, abode of peace, light house? Hm?
(Someone said something.) Yes, there is Parambrahm; he became the abode of peace. And the abode of happiness? It is the same thing; it is the same personality. That unique actor Parambrahm is also present in the same personality. It is a mother’s part, isn’t it? Then he is the Father also. This is why it is said that he is your Father also; what is he? He is the abode of happiness also. He is the teacher too. He is the Sadguru, too. So, definitely he is the light house, isn’t he? So, remember. Whom? Remember the abode of peace, remember the abode of happiness. So, daughter, he is the light house, isn’t he?

Your light house keeps on moving. Hm? Does it keep on moving? Does it keep on moving forever? Hm? Does it keep on moving forever? Does it not stop anywhere?
(Someone said something.) Does it stop? Achcha? Arey, Baba is describing the soul as the light house and not the body. The soul is in the form of mind and intellect. So, does the mind and intellect stop anywhere? No. So, it keeps on moving. For example, there is the swadarshan chakra, isn’t it? Hm? The people on the path of Bhakti, the writers of the scriptures, the artists have prepared the pictures of Vishnu. So, in the hand of Vishnu; hm, in the hand or in the finger? Hm? Yes, they have depicted it on the middle finger (tarjani ungli). Why was the name tarjani given? Hm? Tarjani means that it keeps on scolding everyone. Hm? It scolds. Ai? Like this. So, they depict it on the middle finger of Vishnu that it keeps on rotating, keeps on rotating. Does it stop? No. It doesn’t stop. So, what is it? Hm? It is; Arjun is depicted, isn’t he? So, Arjun is; the memorial of the five Pandavas is depicted in the hand; that is Arjun. Hm? What? The Sudarshan Chakra keeps on rotating on the Arjun-like finger. He keeps on rotating the cycle of 84 [births] of his soul. Yes. Just as the Sudarshan Chakra keeps on rotating, similarly the light house also keeps on rotating. What is the difference between both of them? Hm? Swadarshan Chakra means the cycle of knowledge; if the knowledge of 84 births sits in the intellect, then it means knowledge. What is the truth of 84 births of that hero actor should sit nicely in his intellect. Yes. Then? What is light house? What is called light house? Light itself is the light of purity. All the tasks of the world are carried out through purity. Then call it a light house, call it the power of Yoga.

So, that light house in the form of Yoga energy keeps on rotating. It rotates, doesn’t it children? Yes, it will definitely be said that it becomes dark for some time while it keeps rotating. Hm? When? It does rotate through the cycle of 84 from the Golden Age to the Silver Age, Copper Age, Iron Age, all the four Ages, but it becomes dark for some time in the last birth. So, is there darkness in the Sun or in the Moon? Hm? There is darkness in the Moon. So, the name has been coined as Krishna Chandra. And then? He is; it is said that Ram is Suryavanshi. But what do they add in the end? Ram Chandra. So, that title has been added. It proves that it definitely becomes dark for some time. The Father also tells. He tells you children, doesn’t He? There is no topic in the world which does not apply to you. So, will the Moon be applicable to him or not? Hm? Although it has been written in the Gita also, the Father also says that when I come, I give knowledge to the Sun. Hm? Yes. It is because the Sun will give to the Sun only, will He not? Yes. So, it was told that what does the Sun do? What is Sun’s business? Hm? The Sun keeps on burning. It burns itself and gives heat to the entire world as well. Yes, so, it was told that it becomes dark for some time. Then you show the cycle. So, it is also like this only; it does become dark for some time. Hm? So, they have shown in the scriptures as to what did Hanuman do? Hm? He gobbled the Sun. So, then what will happen? Hm? It will become dark, will it not? Yes. So, they show the monkey. What? Hm? Later it stops. What stops? Hm? When it becomes dark, will the rotation of the cycle stop or not? Hm? Will the Swadarshan Chakra, the cycle of 84 stop revolving in the intellect or not? It stops. So, later it stops. So, the name has been coined as monkey. Which monkey? Monkey Hanuman. Yes. Later they show that it stops.

So, you too are like a light house. Hm? You go and tell everyone that you remember the abode of peace. Remember the abode of happiness. Brother, remember the abode of peace, remember the abode of happiness, then both these things should definitely be in your intellect. What? The abode of happiness and the abode of peace. It is not? So, that itself is called Manmanaabhav. What? That the intellect should remain in a peaceful stage and in a stage of happiness also. Manmanaabhav and then Madhyajibhav. Manmanaabhav in what? Merge into My mind. And you will merge into My mind because; who says Manmanaabhav? Hm? Who says? Yes. Hm?
(Someone said something.) Does Ram say? Arey? His mind and intellect has become stone. How will he say? Hm? Will he say? Arey, the Father says Manmanaabhav. The Father of souls. What does He say? To whom have I lost My mind, My heart? Hm? Yes. I have lost My heart to the hero actor of the human world. So, call it My mind, call it My heart, merge into My mind. So, merge into the thoughts of the one to whom I have lost My heart, My mind. Well, what thoughts are emerging in his mind? Hm? Ultimately, when he achieves the perfect stage, then what are the thoughts that are going on that are depicted in the picture? Hm? A picture of that hero actor Shankar is also shown, isn’t it? So, what do they depict? Hm? They show the third eye. Third eye? What does it mean? Hm? What is in the intellect? There is a memorial of the third eye of the soul in the intellect. So, to become constant in the soul conscious stage means to become thoughtless. Should then good and bad thoughts emerge or not? No.

So, when all the thoughts merge into the thought of one, I am a point of light soul, then what is to be done? Hm? Mat yaaji bhav. Whatever is to be done, do for that ‘mat’, i.e. for Me only. ‘Yajan kar’ means whatever service you do, through the power of body, wealth, mind, time, relations, contacts, do all that for ‘mat’ [i.e.] Me. Who said? Hm? Yes, the same soul of the permanent Chariot-holder soul, which becomes constant in soul conscious stage, in the seed-form stage; then it is said – Mat yaaji bhav. Make efforts for Me. ‘Yajan kar’ means ‘do Yagya’. Perform Yagya service for Me. Whatever kind of service that you do, for whom should you do? Hm? Don’t do for yourself. For whom should you do? Hm? Yes, do for Me. What is meant by ‘for Me’? Do for the sake of the one who is world benefactor. It is because when I come, then the one in whom I enter in a permanent manner, I make him equal to Myself, don’t I? So, which is that soul in this world which although comes for a short time, it may come for hundred years only, so, until it remains for hundred years should it be forever Shiv, i.e. benefactor or should it create any thought of causing harm also ever? No. Forever benevolent (Sadaa Shiv). Forever benevolent. So, I come and make equal to Myself. Whom? The permanent Chariot-holder in which I enter, I make him equally benevolent like Me and go. What kind of benevolent? From the beginning of the Golden Age to the end of the Iron Age, all the 500-700 crore children of Aadam; hm? What does the Father want? Should my children remain happy or should they become sorrowful? Yes, the Father wants that My children should remain happy. So, that is it; they should remain happy means that they should be benefited. Hm? Yes.

So, this should definitely remain in your intellect also. Hm? In your intellect also. Why was ‘also’ added? Hm? ‘Also’ means that there is someone else also. Hm? Why was it added? Arey? Is there no reply? Why was this topic added to the foolish intellect? It should definitely remain in your intellect also. Hm? Arey? This topic definitely exists in the intellect of Father Shiv, the Supreme Soul. Is it not? He is forever [benevolent]. It definitely remains [in His intellect]. But this should definitely remain in your intellect also. What? Everyone should be benefited. Yes. Forever benevolent. So, we have to give message. What? Whose? The message (paigaam) of the Messenger (Paigambar) is given. What? So, those founders of religions who come are called Paigambars, aren’t they? Hm? They say that they bring the message of Khuda (God). So, what is this Aadam as well? Hm? What is Arjun? Yes, he is the one who gives the message in practical, isn’t he? Yes.

So, we have to give the message. You have to give the message of which place? You have to give the message of the abode of happiness and the abode of peace. Achcha? To whom do you have to give? Hm? Arey, you have to give this message to all the living souls (jeev aatmaen) in this world. What? What? That yes, everyone has to go to the abode of happiness and the abode of peace. No such living being will survive here who does not perform the journey to the abode of happiness and the abode of peace. You have to give [the message] to the living souls (jeevatma). What is meant by jeevatma? Should you give to the ones who are alive or to those who have left their bodies or to those who are to leave their bodies? Hm? Those who are alive will be called jeevaatmaaen (living souls). Well, some souls among them are such that they do not have intellect at all, do not have mind at all. So, they cannot think and churn at all. Just as there are animals and birds, they have their groups; there is a head of their group. Do they have or not? So, they run behind him. Hm? For example, there are sheep and goats, aren’t there? So, wherever their head moves they will move there; if the first one falls in a pit, all of them will fall into the pit. Don’t they have wisdom, intellect? They do not have the intellect. So, what do they do? They just follow. They will do as the eldest one does. So, they have to just keep the company. And they keep the company numberwise. For example, there are pigeons, aren’t there? There are parrots. They fly, don’t they? So, their chief flies in the front and others keep flying behind it numberwise. So, it was told that this message is to be received by all the jeevatmas (living souls).

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2815, दिनांक 10.03.2019
VCD 2815, dated 10.03.2019
रात्रि क्लास 14.11.1967
Night class dated 14.11.1967
VCD-2815-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.20
Time- 00.01-22.20


आज का रात्रि क्लास है 14.11.1967. बच्चों को बाप को भूलना नहीं है। क्यों? क्योंकि बाप को भूलने से ही ये हालत हो गई है। कब से भूले हुए हैं? हँ? ढाई हजार साल हो गए, आधा कल्प। हँ? उससे पहले भूले हुए नहीं थे? हँ? उससे पहले कहें कि जो हमारी आत्मा का रूप ज्योति बिंदु, तो बाप का अभी हमने जान लिया ज्योति बिंदु। कुछ तो समानता है? हँ? फिर भी कहेंगे इस चतुर्युगी में तो भूल ही जाते हैं। इसलिए तो नीचे गिरते हैं। हँ? जो हालत होती है खराब हालत; क्यों होती है? क्योंकि बाप को भूलने से हालत खराब हो जाती है। ये भी बच्चे समझते हैं कि आस्तिक बनने से फिर विश्व के मालिक बनते हो। आस्तिक माने? आस्था रखने वाला। किसके ऊपर आस्था रखने वाला? हँ? बिंदी के ऊपर आस्था रखने वाला। बिंदी को तो जब चाहे जितना छोटे से छोटा बना दो। हँ? इतना छोटा कि देखने में भी नहीं आयेगा। तो उसके ऊपर आस्था का कोई मतलब हुआ? आत्मा ज्योति बिंदु, हँ, जब तक आत्मा साकार शरीर धारण ना करे तब तक आस्था का क्या मतलब? किसके ऊपर आस्था? हँ? (किसी ने कुछ कहा) हां, स्वयं के ऊपर आस्था? स्वयं माने अपनी आत्मा के ऊपर आस्था जिसकी दुर्गति हो गई हालत खराब हो गई उसके ऊपर आस्था? हँ? अरे, उसके ऊपर क्या आस्था? अपनी आत्मा माने अपनी मन बुद्धि के ऊपर आस्था विश्वास रखेंगे, श्रद्धा रखेंगे तो मन तो गड्ढे में ले जाएगा। मन क्या करता है? हँ? मन तो जो बुद्धि तत्व है ज्यादा पावरफुल उसको भी गड्ढे में ले गया।

तो बताया, हां, जो शिव बाप है निराकार आत्म ज्योति वो कोई ना कोई मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है और उसी को पहचानना है खास। क्योंकि जो और नॉन-मुकर्रर रथ हैं, टेंपरेरी रथ हैं; ब्रह्मा के तो चार मुख दिखाए जाते हैं ना। उन चार में से कोई को पहचान करके बार-बार याद करेंगे तो कल्याण नहीं होगा? हँ? क्यों? अरे? उनमें भी तो शिव बाप आते हैं ना। नहीं आते हैं? आते तो हैं। तो उसमें आस्था रखें तो क्या बुरा है? क्योंकि वो तो, हाँ, बाप के मुकर्रर रथ नहीं हैं। सदाकाल इस सृष्टि पर बाप सुप्रीम सोल जो पार्ट बजाता है, वो सदा काल तो पार्ट नहीं बजाता। तो जब सदा काल पार्ट बजाएगा तो जिम्मेवारी उसकी हो जाएगी। क्या? कि अगर कुछ मुकर्रर रथधारी उलट-पुलट पार्ट बजाये तो जिम्मेवारी उसकी। और जिनमें टेंपरेरी प्रवेश करता है, तो कभी प्रवेश किया, कभी नहीं किया। तो जब नहीं किया तो उसकी जिम्मेवारी? जिम्मेवारी है? तब नहीं जिम्मेवारी है।

तो बताया कि बच्चे ये तो समझते हैं कि आस्तिक बनने से विश्व के मालिक बनते हैं। किसके ऊपर आस्था रखने से? हँ? हां, जो मुकर्रर रथधारी है, उस मुकर्रर रथधारी में शिव बाप प्रवेश करके सुप्रीम सोल जो पार्ट बजाते हैं, जो श्रीमत देते हैं, उस पर आस्था रखने से हम विश्व के मालिक क्योंकि वो ही एक है जो विश्व का मालिक बनता है। तो फिर वो मालिक तो मालिक बनाता है। क्या बनाता है? आधीन बनाता है या स्वाधीन बनाता है? स्वाधीन बनाता है। और रावण आके फिर क्या बनाय देता है? रावण आकरके नास्तिक बनाए देता है। रावण कौन? वो ही 10 सिर मिलकर के एक हो जाएं तो क्या हो गया? रावण हो गया। तो वो आस्था को तोड़ देता है। क्या आस्था? उस एक की आस्था को, एक के ऊपर जो श्रद्धा विश्वास बैठता है, हँ, बाप जो आकर के रास्ता बताते हैं, उस रास्ता के अनुसार एक के ऊपर श्रद्धा विश्वास तुड़वाय देता है, नास्तिक बनाए देता है।

तो नास्तिक बनने से तुम्हारी यह हालत हो जाती है। क्या हालत हो जाती है? हँ? क्या हालत हो जाती है? हां, दूसरे-दूसरे धर्मों के, धर्म पिताओं के, उनके फॉलोअर्स के प्रभाव में आते रहते हैं। हँ? कोई इस्लाम धर्म में कन्वर्ट होते, कोई बौद्धी धर्म में कन्वर्ट होते, कोई क्रिश्चियन धर्म में कन्वर्ट होते। हां, ये जरूर है कोई कम जन्मों के लिए, कोई एक-दो जन्म के लिए कन्वर्ट होते हैं। कन्वर्ट जरूर होते हैं। और जो कन्वर्ट होते हैं, हँ, वो भी तो स्वर्ग के भांती होते हैं कि नहीं? स्वर्ग के भांती होते हैं। और बाप आकर, हँ, जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं, उसके द्वारा स्वर्ग की स्थापना कराते हैं, कि खुद करते हैं? हँ? खुद तो अकर्ता है। तो उसके द्वारा जो स्वर्ग की स्थापना कराते हैं वो तो जो स्वर्ग नई दुनिया है, वो भी उसी की दुनिया है। और पुरानी दुनिया? जिसमें धर्म पिताएं आकरके, हँ, वो स्वर्गवासी देवताओं की भी हालत खराब कर देते हैं। तो जो नरक की दुनिया है; हँ? नरक की क्यों बताया? क्योंकि वो देवताओं की दुनिया नहीं है। नर किसे कहा जाता है? नर माने नर तो मनुष्य को कहा जाता है। जिनका मन चलता है वो नर।

तो बताया तुम्हारी यह हालत खराब हो जाती है। क्योंकि ऐसी ये खराब हालत तो अभी हुई ना। अभी माने? हां, ये कलियुग में हालत खराब हो गई ना। बाप जब आए हैं। बाप कब आए? बाप तो आते ही हैं कि इस दुनिया की हालत खराब हो गई, हँ, मेरे बच्चों की भी हालत खराब हो गई, और जो धर्म पिताओं के बच्चे हैं उनकी तो हालत खराब रहती ही है नंबरवार। तो बाप जब आए हैं ये देख कर के कि हालत दुनिया की खराब हो गई है। हँ? कब आए हैं? ड्रामा के प्लैन अनुसार आए हैं। ऐसे थोड़े ही कि तुम्हारे बुलाने से आए हैं। ढाई हजार साल से तुम बुलाते आए। तब तो नहीं आए। ड्रामा के प्लैन में उनका आना जब नुंधा हुआ है, तब आते हैं।

तो ड्रामा प्लैन अनुसार आए हैं कि दुनिया की, हँ, सारी दुनिया की; क्या कहा? क्या नाम दिया? दोनिया। हां, दोनिया की, भारत खास की और दोनिया की आम, इन सबकी दुर्गति हो गई है। कौन-कौन बताए दो? एक भारत, हँ, वो आत्माएं जिनकी बुद्धि ‘भा’ माने ज्ञान की रोशनी धारण करने वाले भारत में रमी रहती है। वो भारतवासी खास और दुनिया आम। माने उस एक में दुनिया वालों की बुद्धि नहीं रमी रहती है। दूसरे-दूसरे धर्मपिताएं आते हैं, देहभान में रहते हैं, कभी ज्ञान में रहते हैं; थोड़ा बहुत ज्ञान तो सुनाते हैं ना। हां। तो दुनिया आम इन सब की दुर्गति हो चुकी है। दुनिया नाम क्यों दिया? हँ? अरे? द्वैतवादी हुए न हुए? द्वैतवाद हुए। जबसे 2-2 धर्मपिताएं, 2-2 धर्म, 2-2 राज्य, 2-2 भाषाएं, 2-2 कुल, 2-2 मतें चलना शुरू हुई तो दोनिया हो गई। हां। पहले तो, पहले तो एक ही दुनिया कहे? अद्वैत कहे? कि दो कहें? क्या कहें? एक कहें। हां। तो इन सब की दुर्गति हो चुकी है।

अभी ऐसे तो मनुष्य कोई नहीं है यहां बाहर में सिवाय तुम थोड़े से बच्चों के जो यहां भी आते हो और बाहर में भी जाते हो। तो हां तुम तो दुनिया के मुकाबले एक मुट्ठी बच्चे हो। क्या? कितने बच्चे हो? हां, एक मुट्ठी में कितने? पांच पांडव। पांच ही हुए ना। हां। पांच माने जो उंगलियों पर गिने जा सकें। इससे ज्यादा तो नहीं है कि जो उनकी गिनती? गिनती ही ना हो सके। एक मुठ बच्चे जो कोई ऐसे जानते हो; कैसे? कि ये भारत की दुर्गति हुई पड़ी है। कैसे जानते हो? कि जो भारत एकदम ऊँच-ते-ऊँच सदगति में था, वो अब क्या हुआ? उसकी दुर्गति हुई पड़ी है। और यह भी भूल गए हैं कि दुर्गति के समय ही बाप आ करके सद्गति करते हैं। जब पूरी दुर्गति का ग्रहण लगता है तब ही बाप आते हैं। कौन सा बाप? मनुष्य सृष्टि के बाप की बात नहीं। वो तो इसी सृष्टि पर रहता है आदि से लेकर अंत तक। हां, उस बाप की बात है जो इस सृष्टि का वासी नहीं है। कहां का वासी है? हँ? वहां का वासी है जहां सब सामान्य आत्माएं रही पड़ी हैं। हाँ। तो वो है सबका सद्गति दाता। चाहे उसके विशेष बच्चे हैं, हँ, और चाहे दूसरे धर्म पिताओं के बच्चे हैं या उन धर्मपिताओं के प्रभाव में आने वाले हैं, भारत वासी बच्चे हैं। वो सब का सद्गति दाता है। वो आते हैं।

अभी दुर्गति होने में बच्चे समझते हैं कि अभी चार, 40,000 वर्ष अभी पड़े हुए हैं। कोई-कोई बच्चे ज्ञान में आए। वो ऐसे ही समझते हैं ना? हां। और यहां बाप आ करके बताते हैं कि अरे 40,000 वर्ष कहां से? ये तो पूरी सृष्टि का ही, चारों युगों का चक्र सिर्फ 5000 वर्ष का है। हर युग 1250 वर्ष, 1250 वर्ष का है। अब ये थोड़े बहुत जो बच्चों के ऊपर प्रभाव पड़ा हुआ है दूसरों का कि अभी तो सृष्टि बहुत लंबे समय चलेगी, अभी कोई 10-20 साल की दुनिया थोड़े ही है? हँ? अभी तो, अभी तो जो मजे लेने हो सो ले लो इंद्रियों के। हां, तो ये जो थोड़े बहुत बच्चे हैं ना उनके ऊपर जो प्रभाव पड़ा हुआ है ना। किसका? वो जो ऋषि, मुनि, सन्यासियों ने शास्त्रों में लिखा हुआ है लाखों वर्ष की सृष्टि है, लाखों वर्ष की चतुर्युगी है, तो ये प्रभाव कैसे निकले? हँ? क्योंकि भक्ति के ऊपर प्रभाव निकलना है। हां। किसके ऊपर? हां, ज्ञानियों के ऊपर तो जल्दी प्रभाव बैठ जाता है। शिव बाप जो बातें बोलते हैं उसका प्रभाव ज्ञानियों के ऊपर जल्दी होता है कि भक्तों के ऊपर जल्दी होता है? हां, ज्ञानियों के ऊपर जल्दी प्रभाव बैठता है। और भक्तों के ऊपर प्रभाव बैठा बहुत है। वो निकलना है। क्या? भक्ति का है अभी राज्य। राज्य किसका है? हँ?ज्ञान मार्ग वालों का राज्य है? जो बाप का, एक बाप से ज्ञान मिलता है ना। तो एक के जो ज्ञान पर चलते हैं, सुनते हैं, एक के ज्ञान को मानते हैं, मानते भी हैं, जानते भी हैं और चलने के लिए भी तैयार हैं, हँ, उनका अभी राज्य है या भक्ति का राज्य है, भक्तों का राज्य है? भक्तों का राज्य है। हँ?

और भगत कितने हैं? हँ? बताओ, भगत कितने हैं? और तुम ज्ञानी कितने हो? हँ? थोड़ा फर्क तो करो कितने-कितने का?
(किसी ने कुछ कहा।) क्या? 750 सौ करोड़ भक्त? अच्छा? वो भक्त कहां से हो गए उनका? नास्तिक नहीं है? वो भक्ति करते हैं किसी की? हँ? 750 करोड़ नाम ले दिया। अरे? 700-750 करोड़ में नास्तिक भी तो हैं। वो भक्त हैं? भक्ति करते हैं? श्रद्धा विश्वास रखते हैं किसी के ऊपर? नहीं। तो हां, उनको निकाल दो। तो और जो भी हैं, जो श्रद्धा विश्वास रखते हैं भगवान के ऊपर, चाहे निराकार हो, चाहे साकार। अरे? हां, तो वो उनकी संख्या तो है जो निराकार के ऊपर विश्वास बहुत रखते हैं, साकार को नहीं मानते, उनकी संख्या तो बहुत है। बाकी जो ज्ञानी हैं; क्या ज्ञानी? कि भई आत्मा ही बिना साकार शरीर के कुछ काम नहीं कर सकती। क्या? कुछ काम कर सकती हैं? जैसे मुसलमान कहते हैं अल्लाह मियां ने जमीन बनाई, अल्लाह मियां ने आफताब माने सूर्य बनाया, अल्लाह मियां ने सागर, समंदर बनाया, तो अल्लाह मियां ने चांद बनाया। तो बनाया कैसे? अरे बनाना बिगाड़ना वो शरीर के द्वारा होगा, हँ, कि वो निराकार आत्मा करेगी? कैसे करेगी? नहीं। आत्मा ही शरीर के द्वारा सारा काम करती है ना। तुम्हारी आत्मा बिना शरीर के काम करती है? आत्मा शरीर में से निकल जाती है कोई काम होता है? नहीं होता।

तो वो भी तो आत्मा है ना सुप्रीम सोल। वो इस सृष्टि पर आते हैं तो जरूर कोई, हँ, कोई आत्मा को चुनेंगे ना। हां, कोई खास आत्मा को चुनेंगे। और फिर आम आत्मा को भी चुनेंगे अपना काम पूरा करने के लिए, परिवार बनाने के लिए। जैसे दुनिया में परिवार बनाते हैं। चाहे कोई भी धर्म वाले हों, चाहे देवी-देवता सनातन धर्म वाले हों। देवी देवता सनातन धर्म वाले होंगे तो वो एक माता को जरूर, क्या, मुकर्रर करेंगे। क्या? माता के द्वारा देवी-देवताओं का जन्म देंगे या नहीं देंगे? देंगे। बाकी जो और धरम वाले हैं वो एक से उनका काम नहीं चलता। तो वो फिर दो-दो, चार-चार, ज्यादा से ज्यादा कितना भी उनकी तो कोई लिमिट ही नहीं है। तो फिर बताया, हां, वो फिर काम बिगाड़ेंगे कि नहीं? जो और माताएं होंगी वो परिवार में झगड़ा करेंगी कि नहीं? हां, झगड़ा करती। चलो वाचा से ना करें, कर्मेंद्रियों से ना करें, मनसा में तो वाइब्रेशन जरूर खराब करेंगे।

तो तुम बच्चे जो, जो एक परम ब्रह्म की संतान हो; कि अनेकों ब्रह्मा की संतान? हँ? अनेकों ब्रह्मा की संतान नहीं। एक परम ब्रह्म की संतान। कितने थोड़े हो! हँ? और उसका फर्क करो कितने थोड़े हो! विचार करो। तो ये सारी, क्या, खास भारत और ये सारी दुनिया, हँ, ये सारी दुनिया अभी क्या है? हँ? क्या है? क्या है? भगत है या ज्ञानी है? हँ? अरे क्या है? सारी दुनिया भगत। सारी दुनिया में तुम हो कि नहीं? हां। बच्चे भी सारी दुनिया में आ गए। क्यों? रावण राज्य है ना। यथा राजा तथा प्रजा। तो जब तक रावण राज्य है तब तक भगत हैं। हां।

तो सभी भगत हैं, भगत हैं तो किसकी बात मानते हैं? रावण के 10 सिरों की बात मानते। कम से कम दस और ज्यादा से ज्यादा फिर उनके फॉलोअर्स ढेर सारे। कोई किसी की मत पर चल पड़ता, कोई किसी की मत पर चल पड़ता। हँ? खान में, पान में, रहन मे, सहन में, आने में, जाने में, आहार में, व्यवहार में, एकमत पर चलते हैं कि अनेकों की मत पर चलते है? अनेकों की मत पर। अच्छा, जिस मुकर्रर रथ में मैं आता हूं वो तो नहीं चलता होगा। हँ? चलता होगा कि नहीं चलता होगा? अरे बताओ। हां, बिल्कुल चलता होगा क्योंकि वो भी तो कहां है? राम राज्य में या रावण राज्य में? रावण राज्य में है ना। राम राज्य में तो तब कहा जाए जब राम वाली आत्मा, जो बताया बाप ने राम बाप को कहा जाता है, वो राम बाप अपने 84 जन्मों को पूरा-पूरा जान ले। कि बिना जाने? बिना जाने थोड़ेही बाप हो गया। क्या? 83 जन्म का बाप कहेंगे? नहीं। 84 जन्म का बाप। तो 84 जन्मों में वो पूरी हिस्ट्री उसकी बुद्धि में अपने पार्ट की आनी चाहिए या नहीं? पार्ट धारी अपने पार्ट को ना जाने और रंगमंच पर पार्ट बजाये तो उसे बुद्धू कहेंगे ना। बेवकूफ। तो सभी भगत हैं। माने जो मुकर्रर रथधारी आत्मा है वो भी क्या है? भगत है। एक की बात मानती या अनेकों की बात मानती? क्या? अनेकों की बात मानती है ना। हां, अनेकों की बात मानती है।

Today’s night class is dated 14.11.1967. Children shouldn’t forget the Father. Why? It is because the present condition is only because of forgetting the Father. Since when have you forgotten? Hm? It has been 2500 years, half a Kalpa. Hm? Hadn’t you forgotten before that? Hm? Before that it will be said that the form of our soul is point of light, so, we have now come to know about the Father that He is a point of light. There is some similarity? Hm? However, it will be said that we forget in this cycle of four Ages. This is why we undergo downfall. Hm? The condition that becomes bad; why does it become? It is because the condition becomes bad due to forgetting the Father. Children also understand that you become the master of the world by becoming theist. What is meant by theist (aastik)? The one who has faith (aastha). The one who keeps faith on whom? Hm? The one who keeps aastha on the point. The point can be made howevermuch small whenever you wish. Hm? So small that it will not even be visible. So, is there any meaning in having faith in it? The soul is point of light, hm, until the soul assumes a corporeal body, what is the meaning of the faith? Faith on whom? Hm?
(Someone said something.) Yes, faith on oneself? Faith on self, i.e. the one’s soul, which has undergone degradation, whose condition has become bad; faith on that? Hm? Arey, where is the faith on it? If you have faith on your soul, i.e. the mind and intellect, then the mind will take you into a pit. What does the mind do? Hm? The mind took even the more powerful element intellect into the pit.

So, it was told, yes, the Father Shiv, the incorporeal spiritual light enters in one or the other permanent Chariot and we have to especially recognize it. It is because the non-permanent Chariot, the temporary Chariot; Brahma is shown to have four heads, isn’t he? Among those four, if you recognize any one of them and remember it again and again, then will you not be benefited? Hm? Why? Arey? The Father Shiv comes in them as well, doesn’t He? Doesn’t He come? He does come. So, what is wrong if you have faith in him? It is because, yes, they are not the permanent chariots of the Father. The part that the Father, the Supreme Soul plays forever in this world; He doesn’t play a part forever. So, when He plays the part forever, then it will be His responsibility. What? If the permanent Chariot-holder plays any untoward part, then it is His responsibility. And the ones in whom He enters in a temporary manner, then sometimes He enters, sometimes He doesn’t enter. So, when He doesn’t enter, then is it His responsibility? Is it His responsibility? Then it is not His responsibility.

So, it was told that children understand that we become masters of the world by becoming theists (aastik). By having faith on whom? Hm? Yes, by having faith on the permanent Chariot holder in which the Father Shiv enters, the Supreme Soul enters and plays the part, gives Shrimat, then we become masters of the world because it is He alone who makes us the masters of the world. So, then that Master makes us masters. What does He make? Does He make us subservient or independent? He makes us independent. And what does Ravan come and make us? Ravan comes and makes us atheist. Who is Ravan? When the same 10 heads come together to become one, then what happened? It became Ravan. So, he breaks the faith. What faith? The faith on that One, the faith that is developed on the One, the faith that one develops as per the path shown by the Father, he causes that faith to break, makes us atheist.

So, you reach this condition by becoming atheists. What is the condition that you reach? Hm? What is the condition that you reach? Yes, you keep on getting influenced by the other religions, other founders of religions and their followers. Hm? Some convert to Islam, some convert to Buddhism, some convert to Christianity. Yes, it is certain that some convert for fewer births, some convert for one or two births. They definitely convert. And are even those who convert members of heaven or not? They are members of heaven. And the permanent Chariot in which the Father comes and enters, does He cause establishment of heaven through him or does He establish Himself? Hm? He Himself is non-doer (akarta). So, the heaven which He causes to be established through him, that heaven, the new world is also His world only. And the old world? The one in which the founders of religions come and spoil the condition of the deities, the residents of heaven also; so, the world of hell; hm? Why was it described as hell (narak)? It is because it is not the world of deities. Who is called ‘nar’? Nar means a human being is called nar. Those who use their mind are human beings.

So, it was told that your condition becomes bad. It is because such bad condition has emerged now, hasn’t it? What is meant by ‘now’? Yes, this condition has worsened in the Iron Age, hasn’t it? It is when the Father has come. When did the Father come? The Father comes only because the condition of the world has become bad, hm, the condition of My children has also become bad and the condition of the children of the founders of religions does remain bad numberwise. So, when the Father has come after observing that the condition of the world has become bad; hm? When has He come? He has come as per the drama plan. It is not as if He has come on being called by you. You have been calling since 2500 years. He did not come then. He comes when He is destined to come as per the drama plan.

So, He has come as per the drama plan that the world (duniya), the entire world; what has been said? What is the name coined? Doniya. Yes, the world (doniya), India in particular and the world in general, all of them have undergone degradation. Which two were mentioned? One is India, hm, those souls whose intellect remains busy in Bhaarat, i.e. the one who holds ‘bha’, i.e. the light of knowledge. Those residents of India in particular and the world in general. It means that the intellect of the people of the world does not remain busy in that ‘one’. Other founders of religions come; they remain in body consciousness; sometimes they live in knowledge; they do narrate a little knowledge, don’t they? Yes. So, in general the world, all of them have undergone degradation. Why was the name ‘duniya’ coined? Hm? Arey? Are they dualists or not? They are dualists. Ever since 2-2 founders of religions came, 2-2 religions, 2-2 kingdoms, 2-2 languages, 2-2 clans, 2-2 opinions started, it became ‘doniya’. Yes. Initially, initially would you call it one world only? Would you call it monist (adwait)? Or will you call it two? What should we call it? We should call it one. Yes. So, all these have undergone degradation.

Now there are no such human beings here, outside, except you few children who come here and go outside as well. So, yes, you are handful of children when compared to the world. What? How many children are you? Yes, how many in a fist (mutthi)? Five Pandavas. There are only five, aren’t there? Yes. Five means those who can be counted on fingers. Are they more than that they cannot be counted at all? A handful of such children that you know; how? That this Bhaarat has undergone degradation. How do you know? That the Bhaarat who was in the highest on high true salvation, what has he become now? He has undergone degradation. And you have also forgotten that the Father comes only at the time of degradation to cause true salvation. When you are eclipsed by complete degradation, only then does the Father come. Which Father? It is not a topic of the Father of the human world. He remains in this world from the beginning to the end. Yes, it is about that Father who is not a resident of this world. He is a resident of which place? Hm? He is a resident of that place where all the ordinary souls are living. Yes. So, He is the bestower of true salvation upon everyone. Be it His special children, hm, and be it the children of other founders of religions or be it those who get influenced by those founders of religions, they are the children, who are residents of India. He is the bestower of true salvation upon everyone. He comes.

Children, people think that there are still 40,000 years left for degradation to happen. Some children entered the path of knowledge. They think like this only, don’t they? Yes. And here the Father comes and tells that arey, how are there 40,000 years? The cycle of the entire world, all the four Ages is of just 5000 years. The duration of every Age is 1250 years each. Well, the little bit of influence of others on the children that the world will continue for a very long time; well, the world is not going to exist only for 10-20 years. Hm? Now, now derive whatever pleasures of organs that you want to derive. Yes, so, there are some children who are under the influence, aren’t they? Whose? That which the sages, saints, sanyasis have written in the scriptures that the world’s age is lakhs of years, the four Ages are lakhs of years long, then how will this influence be removed? Hm? It is because the influence is to be cast over Bhakti. Yes. On whom? Yes, the knowledgeable ones get influenced soon. Do the knowledgeable ones get influenced more by the topics uttered by Father Shiv or do the devotees get influenced more? Yes, the knowledgeable get influenced more. And the devotees have been influenced a lot. That is to be removed. What? Now it is the rule of Bhakti. Whose rule is it? Hm? Is it the rule of those who follow the path of knowledge? The Father; knowledge is received from one Father, isn’t it? So, those who follow and listen to the knowledge of One, those who believe in the knowledge of One, they believe as well as know it and they are even prepared to follow it, hm, is it their rule now or is it the rule of Bhakti, is it the rule of the devotees (bhakt)? It is the rule of the devotees. Hm?

And how many devotees are there? Hm? Speak up, how many devotees are there? And what is the number of you, the knowledgeable ones? Hm? Enumerate the difference in numbers.
(Someone said something.) What? 750 crore devotees? Achcha? How did they become devotees? Aren’t there atheists? Do they do the Bhakti of anyone? Hm? You have mentioned 750 crores. Arey? The atheists are also included among 700-750 crores. Are they devotees? Do they do Bhakti? Do they have faith and devotion on anyone? No. So, yes, exclude them. So, others, those who have faith and devotion on God, be it incorporeal or corporeal. Arey? Yes, so, their numbers, those who have a lot of faith on the incorporeal, do not believe in the corporeal, their number is high. As regards those who are knowledgeable; what knowledgeable? That brother, the soul itself cannot do any work without a body. What? Can it do any work? For example, the Muslims say that Allah Miyaan made the land, Allah Miyaan made Aaftaab, i.e. the Sun, Allah Miyaan made the ocean, the sea, so, Allah Miyaan made the Moon. So, how did He make? Arey, will making and destroying happen through the body or will the incorporeal soul do? How will it do? No. The soul itself performs all the tasks through the body, doesn’t it? Does your soul work without a body? When the soul comes out of the body, then is any task performed [by the body]? It isn’t.

So, He, the Supreme Soul too is a soul, isn’t He? When He comes to this world, then definitely He will choose a soul, will He not? Yes, He will choose a special soul. And then He will choose a common soul also to complete His task, to establish His family. For example, people establish families in the world. Be it a person of any religion, be it those who belong to the ancient deity religion. If they belong to the ancient deity religion, then they will certainly fix a mother. What? Will He give birth to deities through a mother or not? He will give. As regards those who belong to other religions, they cannot manage with one. So, then they adopt two, four, at the most any number, there is no limit. So, then it was told, yes, will they spoil the task or not? Will other mothers quarrel in the family or not? Yes, they quarrel. Okay, they many not fight through words, they may not fight through the organs of action; [but] they will definitely spoil the vibrations in their mind.

So, you children, who are the children of one Param Brahm; or are you children of many Brahmas? Hm? Not the children of many Brahmas. Children of one Param Brahm. You are so few! Hm? And just differentiate as to how few you are! Just think. So, this entire, what, India in particular and this entire world, hm, what is this entire world now? Hm? What is it? What is it? Is it a devotee or knowledgeable? Hm? Arey, what is it? The entire world is a devotee. Are you included in the entire world or not? Yes. The children are also included in the entire world. Why? It is a kingdom of Ravan, isn’t it? As is the king, so are the subjects. So, until there is the kingdom of Ravan, you are devotees. Yes.

So, all are devotees (Bhagat); when they are devotees, then whose words do they obey? They obey the words of the ten heads of Ravan. At least ten and at the most then they have numerous followers. Someone follows someone’s opinion and someone follows someone else’s opinion. Hm? Do they follow the opinion of one or the opinion of many in their eating, drinking habits, living styles, coming and going, in eating habits, in behaviour or do they follow the opinions of many? The opinions of many. Achcha, the permanent Chariot in which I come, he must not be following [many]. Hm? Does he follow or doesn’t he follow? Arey, speak up. Yes, he must be definitely following because where is he too? In the kingdom of Ram or in the kingdom of Ravan? He is in the kingdom of Ravan, isn’t it? He will be said to be in the kingdom of Ram when the soul of Ram, for which it has been said by the Father that the Father is called Ram. That Father Ram should know his 84 births completely. Or without knowing? Does he become the Father without knowing? What? Would he be called the Father for 83 births? No. Father for 84 births. So, should the entire history of 84 births’ part enter in his intellect or not? If an actor does not know about his part and plays the part on the stage, then he will be called a fool, will he not? A fool. So, all are devotees. It means that what is the permanent Chariot holder as well? He is a devotee. Does it obey the words of one or the words of many? What? It obeys the words of many, doesn’t it? Yes, it obeys the words of many.

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