Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2854, दिनांक 18.04.2019
VCD 2854, dated 18.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2854-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.02
Time- 00.01-17.02


प्रातः क्लास चल रहा था 20.11.1967. सोमवार का छठे पेज की पहली लाइन की बात क्लीयर हो रही थी दो दिन से; क्या? कि राधा और कृष्ण, इनमें क्या ख़ास फर्क बताया? हं? कृष्ण को कहते हैं श्यामसुंदर। परन्तु राधा को श्यामसुंदरी नहीं कहते हैं। तो फर्क हुआ ना। हं? कृष्ण को झुलाते हैं झूले में, राधा को तो नहीं झुलाते। तो देखो, उनको नहीं कहेंगे श्यामसुंदरी। और कह भी नहीं सकेंगे। क्योंकि श्यामसुंदर कहना तो एक के ऊपर ही शोभता है। तो ये सभी बातें बैठकरके बच्चों को समझाते रहते हैं कि बच्चों ये सभी अच्छी तरह से समझ जाएँ और किसको भी समझाने में समर्थ हो जाएँ। तो जो समझते हैं, लिखते हैं, नोट करते हैं, समझाते हैं। ऐसे प्रैक्टिस करते रहते हैं। तो इसमें समझाने की भी प्रैक्टिस चाहिए ना। तो जिसकी जास्ती प्रैक्टिस होती है समझने की, समझाने की और वो इंग्लिश में भी समझाते हैं, हिंदी में भी समझाते हैं, और जो-जो कोई जो-जो भाषा जानते हैं अच्छी तरह से उस भाषा में समझाते हैं। अभी इंग्लिश में भी समझाते हैं। हँ? ऐसे क्यों कहा कि ‘अभी’? पहले क्यों नहीं? हँ? पहले की जो पुरानी-पुरानी दीदी-दादियां हैं, वो इतनी पढ़ी-लिखी नहीं होती थी और बाद में अभी, हाँ, पढ़ी-लिखी कन्याएं आने लगी, तो वो अंग्रेजी भी जानती हैं। तो वो इंग्लिश में समझाते हैं।

अभी देखो वहाँ जाओ। कहाँ? कनाडा में। तो कनेडी में भी समझाते हैं। अभी जिस-जिस गांव में जाओ, लैंग्वेज तो अलग-अलग है ना। गुजराती में भी तो समझाना पड़ता है। उर्दू में इतना नहीं मुंझते। क्यों? क्योंकि उर्दू वाले हिंदी समझ जाते हैं। यहाँ मुसलमानों का राज्य सैंकड़ों साल चला ना भारत में। तो उनकी भाषा भी आ गई। यथा राजा तथा प्रजा। वैसी भाषा भी चलती है। तो जो उर्दू वाले हैं वो हिंदी समझ जाते हैं। इंग्लिश भी समझ जाते हैं। हँ? बाकि जो ये मद्रासी होवें, क्योंकि वो वहाँ माइयां-वाइयां नहीं जानती हैं बिल्कुल ही। आजकल तो अभी तो कितने साल हो गए? हँ? 50-60 हो गए, 70 साल हो गए। अभी तो वहाँ अंग्रेजी खूब चल रही है। पहले की बात बताई 67 की। तो वहाँ मद्रासी लोग में माइयां नहीं जानती हैं बिल्कुल। उनको फिर ट्रांसलेटर चाहिए। तो जो ट्रांसलेट करते हैं उनका पता है कितना मान होता है! हँ? जो 8-10 लैंग्वेज जानते हैं, अरे, उनकी तो बहुत कीमत होती है। फर्स्टक्लास लैंग्वेज टीचर हो गए ना। देखो, वो यहाँ भी होते हैं दिल्ली में। ये काउंसिलों में आकरके बैठते हैं। तो जब काउंसिलर्स के भाषण होते हैं तो सभी भाषाओं में वो समझाते रहते हैं। उनका ट्रांसलेट करते रहते हैं ना। तो वो भी प्रबंध तो रखा है ना बच्ची। अब उसका पगार भी कितना होगा ट्रांसलेटर का? क्योंकि ऐसे ट्रांसलेटर बहुत भाषाएं जानने वाले बहुत तो मिलेंगे नहीं। अरे, बहुत अच्छा पघार उनको मिलता होगा।

ऐसे तो पघार एक-दो से जास्ती होती ही है। क्योंकि इन सबसे जास्ती पघार तो इन साइंस घमंडियों को मिलता है। क्या? बहुत पघार मिलता है। क्योंकि खर्चा उनको मिलता है। और जो ये बॉम्ब बनाते हैं। समझा ना? क्या? यहाँ फिर शूटिंग होती है ब्राह्मणों की दुनिया में। बॉम्ब्स बनाने वालों की शूटिंग होती है ना। हँ? जैसे उन बॉम्ब्स में ऐसा भरते हैं जब वो फूटते हैं तो उनकी बदबू सूंघने मात्र से तुरंत खलास हो जाते हैं। ऐसे ये बड़े-बड़े बॉम्ब्स बनाते हैं। क्या? और उन बॉम्ब्स में ऐसी ग्लानि भरते हैं कि सूंघा और ये खेल खलास। चाहे कितना भी ज्ञान सुनाओ। हँ? ज्ञान की खुशबू होती है ना। वो सब बेकार। ग्लानि का बाम्ब फटता है। पता है बडे ते बड़ा बॉम्ब कौनसा है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, परमात्म प्रत्यक्षता बॉम्ब। परमपिता प्रत्यक्षता बॉम्ब नहीं।

पहले तो मुकर्रर रथ जिसे गीता में बताया – परमात्मा इति उदाहृतः। उसे परमात्मा कहा जाता है क्योंकि परमपिता तो एक ही आत्मा है जो अक्षर है और सदा अक्षर है। कभी क्षरित होता ही नहीं, और क्षीण होता ही नहीं। तो वो, वो तो एक ही है। लेकिन वो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है उसको भी आप समान तो बनाता है ना। तो वो जो कहा जाता है परमात्मा माने जो भोगी आत्माएं हैं उनके बीच में परम पार्टधारी। हँ? क्या? भोग भोगने में भी परम पार्टधारी। कैसा-कैसा भोग? एक तो होता है श्रेष्ठ इन्द्रियों का भोग। और उससे भी ऊँचा? इंद्रियातीत भोग। कौनसा? हँ? इन्द्रियों से परे का भोग होता है ना।
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं? क्या? हँ? अरे, सूर्य कलातीत है ना। तो कलातीत सुख देगा ना। चन्द्रमा तो 16 कलाओं में बंधा हुआ होता है। तो जो ज्ञान चन्द्र का पार्ट है, कृष्ण चन्द्र कहते हैं तो वो तो लिमिटेड सुख देगा ना, 16 कला में बंधा हुआ सुख देगा। और सूर्य तो? सूर्य तो अखूट ज्ञान की रोशनी का भण्डार है। तो अखूट सुख देगा ना।

तो वो जड़ सूर्य की बात नहीं है। ये चैतन्य ज्ञान सूर्य परमपिता हैविनली गॉड फादर शिव की बात है जो सदा शिव है। तो वो इस सृष्टि पर आते हैं तो वो परमात्मा के रूप में जो पार्ट बजाने वाली आत्मा हीरो पार्टधारी है; किस बात में पहले हीरो बनाता है? ऊँच ते ऊँच सुख भोगने में। कौनसा ऊँच ते ऊँच सुख? एक होता है भ्रष्ट इन्द्रियों का सुख। कर्मेन्द्रियां कहते हैं। हँ? ऊँचा होता है ज्ञानेन्द्रियों का सुख। उसमें भी तो नंबरवार हैं ना। हँ? ज्ञानेन्द्रियों में भी सबसे ऊंचा आँखों का, दृष्टि का सुख। और उससे भी ऊँचा इंद्रियातीत। ज्ञानेन्द्रियों से भी ऊँचा है, हाँ, जिसे कहें; क्या कहें? हँ? अतीन्द्रिय सुख। इन्द्रियों से अतिरेक में जाने वाला। जैसे इन्द्रियों का सुख भूल जाता है। वो अतीन्द्रिय सुख जिनको मिलता है, तो इन्द्रियों का सुख भूल (जाता है)। इतनी ऊँची कोटि का सुख है। तो वो जो हीरो पार्टधारी होगा वो तो फिर ऊँचे ते ऊँचा सुख भोगेगा ना। हँ? हाँ। तो उसकी तो फिर बहुत महिमा होगी संसार में।

फिर ये कोई नहीं जानता कि जो ऊँच ते ऊँच बनता है वो फिर चार अवस्थाओं से पसार होने के बाद इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर क्योंकि सारी सृष्टि का बीज है ना, बाप है, तो ऊँच ते ऊँच कर्म में भी बाप है, ऊँच ते ऊँच सुख भोगने में भी बाप है, शांति भोगने में भी बाप है और नीच ते नीच दुख और अशांति भोगने वालों का भी बाप है या नहीं है? हँ? है। तो जब नीच ते नीच सुख भोगता है भ्रष्ट इन्द्रियों का और सबसे जास्ती सुख भोगता है। दुनिया में क्रिश्चियन्स वगैरा होंगे यादव, उनमें तो फ्री है, हँ, उनके सरकार से कानून बना हुआ है तुम कितनी भी शादियां करो, कितने भी डायवोर्स दो। कितनों के साथ भी इन्द्रियों का सुख भोगो। छूट है कि नहीं? हाँ, छूट है। और सरकारी तौर पर नियम के मुआफिक शादी करो तो करो, नहीं करो तो गुप्त रूप में चाहे जितने के साथ सुख भोगो। तो व्यभिचारी हुआ सुख या अव्यभिचारी हुआ? व्यभिचारी सुख हुआ। तो ये भारत में तो इसे बहुत बुरा मानते हैं। क्यों? क्योंकि भारतवासी जो आत्माएं, मनुष्यात्माएं, उनमें जास्ती संख्या तो देवात्माओं की है ना। तो देवात्माओं ने तो ऊँच ते ऊँच सुख भोगा है। हँ? ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगा, 16 कला संपूर्ण सुख भोगा, इन्द्रियातीत सुख भोगा। तो उनको ये बात बहुत खराब लगती है कि अच्छी लगती है? हँ? बहुत ग्लानि की बात आती है। और वो ग्लानि है वो सुनकरके एकदम फां हो जाते हैं। कौन? भारतवासी या विदेशी? भारतवासी फां हो जाते हैं। तो ये जो बॉम्ब्स बनाते हैं ग्लानि के, हँ, व्यभिचार की ग्लानि सबसे बड़ी ग्लानि हुई ना भारतीयों के हिसाब से। समझा ना?

तो ये बॉम्ब्स हैं। बेहद के ब्राह्मणों की दुनिया में ग्लानि के बॉम्ब्स। किसकी ग्लानि? ऊँच ते ऊँच पार्टधारी, जो विश्वपिता है, सारी दुनिया का जो बीज है, बाप है, उसकी भी ग्लानि। तो, तो जो उनकी भावना बैठी हुई है, हँ, भगवान के ऊपर वो भावना टूट जाएगी या रह जाएगी? भावना टूटती है। और धड़ाधड़ टूटती है। ग्लानि सूंघी और बस अनिश्चयबुद्धि बने। तो अभी बॉम्ब्स जिसको नाम कहते हैं बॉम्ब, हँ, वो तो किस बात के लिए है? हँ? वो हद के बॉम्ब हद की मौत करते हैं। और ये बेहद का बॉम्ब? बेहद की मौत करता है। बेहद की मौत क्या होती है? हँ? बेहद की मौत होती है अनिश्चयबुद्धि विनश्यते।

The morning class dated 20.11.1967 was being narrated. On Monday, the topic on the first line of the sixth page was being cleared for two days; what? What special difference was mentioned between Radha and Krishna? Krishna is called Shyam-Sundar but Radha isn’t called Shyam-Sundari. So, there is a difference, isn’t there? They swing Krishna in a cradle. They certainly don’t swing Radha. So look, she won’t be called Shyam-Sundari. They won’t be able to call her [that] either. It is because calling someone Shyam-Sundar only befits only one. So, He sits and explains all these topics to the children, so that the children understand them all properly and become capable to explain to anyone. Those who understand, they write, note down [and] explain. They keep practicing like this. So, you need the practice to explain for this, don’t you? Those who have a lot of practice to understand and to explain; and they explain in English as well as in Hindi. And whoever knows whichever language well, they explain in that language. Now, they explain in English as well. Why was it said ‘now’? Why not earlier? Earlier, the old Didis, Dadis weren’t much educated and later on [i.e.] now, educated maidens started coming and they know English too. So, they explain in English.

Now look, go there. Where? To Kanada (Karnataka). So, they explain in Kanedi as well. Well, go to any village, the language is different, isn’t it? They have to explain in Gujarati too. They don’t get so confused in Urdu. Why? It is because those who speak Urdu understand Hindi. The Muslims ruled here, in India for hundreds of years, didn’t they? So, they learnt their language as well. As is the king, so are the subjects. The language in use is also accordingly [as that of the king]. So, those who speak Urdu understand Hindi. They understand English as well. As for the rest, there are these Madrasis. It is because the mothers there don’t know [Hindi] at all. Arey, nowadays, how many years have passed? 50-60 years have passed. 70 years have passed. Now English is very much in practice there. The time of the past, of 67 was mentioned. So there, the mothers among the Madrasis don’t know [Hindi] at all. Then, they need a translator. Do you know how much respect a person who translates commands? Those who know eight–ten languages, arey, they are valued a lot. They are first class language teachers, aren’t they? Look, they are also present here, in Delhi. They come and sit in councils. So, when councillors give speech, they (the translators) keep explaining in all the languages. They keep translating [their speeches], don’t they? This has also been arranged, hasn’t it daughter? Now, what must be the salary of a translator? It is because you won’t find many translators who know many languages. Arey, they might be very well-paid.

As far as the salary is concerned, one receives more than the other. It is because these egotistic scientists earn the most. What? They get a high salary. It is because they get money. And those who make these bombs; You did understand, didn’t you? What? The shooting happens here, in the world of Brahmins. The shooting of those who make bombs happens, doesn’t it? Hm? Just like they fill such [things] in those bombs that when they explode, [people] die immediately just by smelling their odour. Similarly, they make very big bombs like them. What? And they fill such defamation in those bombs that as soon as you smell them, the game is over. No matter how much knowledge you narrate. Hm? There is the fragrance of knowledge, isn’t there? All that goes in vain. The bomb of defamation explodes. Do you know what the biggest bomb is? Hm?
(Someone said something.) Yes, the bombof the revelation of the Supreme Soul. It isn’t the bomb of the revelation of the Supreme Father.

First of all, the permanent Chariot, who has been mentioned in the Gita: Parmaatamaa itii udaahrirah [meaning] he is called the Supreme Soul. It is because only One Soul is the Supreme Father, who is Akshar (one who doesn’t get discharged) and always Akshar. He never loses vigour at all. And He doesn’t become weak at all. That is just the One. But the permanent Chariot in which He enters, He makes him equal to Himself, doesn’t He? So, the one who is called the Supreme Soul, it means, the supreme actor among all the pleasure-seeking (bhogi) souls. Hm? What? He is the supreme actor in seeking pleasures too. What kinds of pleasure? One is the pleasure of the elevated indriyaan (organs). And even higher than that? It is the pleasure beyond the indriyaan. Which one? Hm? There is pleasure beyond the indriyaan, isn’t it there?
(Someone said something.) No? What? Hm? Arey, the Sun is beyond celestial degrees, isn’t He? So, He will give joy that is beyond celestial degrees, won’t He? The Moon is indeed bound in 16 celestial degrees. So, the part of the Moon of Knowledge who is called Krishnachandra will certainly give limited happiness, won’t he? He will give happiness that is bound in 16 celestial degrees. And [what about] the Sun? The Sun is in fact the store house of inexhaustible light of knowledge, so He will give inexhaustible happiness, won’t He?

So, it isn’t about that inert Sun. It is about the living Sun of Knowledge, the Supreme Father, the Heavenly God Father, Shiva who is Sada Shiva (forever beneficial). So, when He comes in this world, the soul that plays the part in the form of the Supreme Soul, who is the hero actor… In which aspect does He make him the hero first? In experiencing the highest of the high happiness. Which highest of the high happiness? One is the pleasure of corrupt indriyaan (organs), they are called karmendriyaan (organs of action). Hm? The happiness of the gyaanendriyaan is higher [than that]. Even among them (the gyanendriyaan), they are numberwise, aren’t they? The happiness of the eyes, of the vision is the highest among the gyaanendriyaan as well. And higher than that is [the happiness] beyond the indriyaan. [The happiness] higher than even the gyaanendriyaan is, yes, which should be called… What should it be called? Hm? The super sensuous joy, the happiness that takes you beyond the indriyaan. It is as if you forget the pleasures of the indriyaan. Those who experience the super sensuous joy, they forget the pleasures of the indriyaan. It is the happiness of such high category. So, the one who is the hero actor will experience the highest of the high joy, won’t he? Hm? Yes. So he will be glorified a lot in the world.

Then, no one knows that the one who becomes the highest of the high, after passing through the four stages on this stage like world… It is because he is the seed of the whole world, isn’t he? He is the Father. So, he is the Father in [performing] the highest of the high actions also and in experiencing the highest of the high joy as well as peace. And is he the Father of those who experience the lowliest sorrow and restlessness or not? Hm? He is. So, when he experiences the lowliest pleasure of the corrupt indriyaan (organs) and he experiences it the most. The Christians, etc the Yadavas in the world are free. Their government has made a law: you may marry and divorce as many times as you want. Experience the pleasure of the indriyaan with as many [people] as you wish. Do they have [this] freedom or not? Yes, they have. And marry according to the government, legally if you want to, otherwise you may experience pleasure with as many as you wish secretly. So, is it pleasure adulterous or non-adulterous? It is adulterous pleasure. This is considered [to be] very bad in India. Why? It is because there is a majority of the deity souls among the Bharatvaasi souls, the human souls, isn’t it? So, the deity souls have experienced the highest of the high happiness. Hm? They experienced the happiness of the gyaanendriyaan, they experienced the happiness complete with 16 celestial degrees [and] the happiness beyond the indriyaan. So, do they dislike this concept [of adultery] a lot or do they like it? Hm? It is a matter of great defamation for them. And they become very upset listening to that defamation. Who? The Bharatvaasis or the foreigners? The Bharatvaasis become upset. So, the bombs of defamation that are made… The defamation of adultery is the biggest defamation according to the Indians, isn’t it? You did understand, didn’t you?

So, these are the bombs, the bombs of defamation in the unlimited Brahmin world. Whose defamation? It is the defamation of even the highest of the high actor who is Vishvapita (World Father), who is the seed, the Father of the whole world. So, so, the ones who have feelings for God, will they lose that feeling or will it be intact? They lose that feeling. And they lose it rapidly. They smell the defamation and they immediately become the ones with a doubting intellect. So now, the things that are called bombs, bomb... For what purpose are they [made]? Those limited [physical] bombs cause limited [physical] death. And this unlimited bomb? It causes unlimited death. What is the unlimited death? Hm? The unlimited death means to have a doubting intellect and to be destroyed (anishchaybuddhi vinashyate).

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2855, दिनांक 19.04.2019
VCD 2855, dated 19.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2855-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.43
Time- 00.01-18.43


प्रातः क्लास चल रहा था- 20.11.1967 सोमवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी, हां, ये जो अलग-अलग भाषाओं के ट्रांसलेटर्स होते हैं ना उनको बहुत पगार मिलता है। लेकिन इन सबसे ज्यादा पघार तो साइंस घमंडियों को मिलता है जो बाम्ब्स बनाते हैं। वो हैं हद के बॉम्ब्स और ये हैं बेहद के बाम्ब्स। नाम है ना। ये मौत के लिए हैं ना। एरोप्लेन की तो बात ही छोड़ दियो। वो तो वरी घूमने के लिए हैं। पर ये जो बाम्ब्स सब कहते हैं वो तो तभी तो समझेंगे ना। ये बाम्ब्स की तो ये ही है मिसाइल जो शास्त्रों में लिखा है कि वो जो वृष्णवंशी यादव थे उनके पेट से, बुद्धि रूपी पेट से मिसाइल निकले, मूसल निकले, मूसल। मिसाइल्स को मूसल लिख दिया है। उनका आकार मूसलों जैसा होता है ना। तो एक-दो को लड़ाते हैं, टकराते हैं। तो मनुष्य तो समझते हैं ना कि विनाश तो होने का ही है। और बाम्ब्स विनाश, भई अच्छा एरोप्लेन, चलो भाई ये स्वर्ग की निशानी है। अभी ये बाम्ब्स तो स्वर्ग की निशानी नहीं है ना। ये बाम्ब्स नहीं स्वर्ग में होते हैं। वो तो संगम युग में ही होते हैं। चाहे हद के चाहे बेहद के।

तो ये तो जरूर समझना चाहिए ना बच्चे कि भई वहां स्वर्ग में एरोप्लेन तो होते हैं सुख देने के लिए। हँ? परंतु ये बाम्ब्स तो नहीं होते हैं पूरी दुनिया का विनाश करने के लिए। ये तो दुखदाई है ना। अभी बनाए हैं तो भी देखो कितना भय फैला हुआ है। संसार में भय फैला हुआ है ना। किसके लिए? कि बाम्ब्स बन चुके हैं। दुनिया का विनाश का बारूद तैयार हो गया है। अब क्या होगा? तो अब तुम बच्चों को मालूम पड़ गया कि सतयुग में विनाश तो नहीं होगा बाम्ब्स से। बाम्ब्स वहां गिरेंगे नहीं मौत के लिए। ये तो विनाश की निशानी है। अच्छा, तो ये भी तो समझ जाना चाहिए ना कि अभी इनसे विनाश जरूर होना है। माना ये कोई दुनिया की सजावट के लिए नहीं बनाए गए हैं। हँ? जैसे घर में खिलौने बनाते हैं सजावट के लिए। नहीं। तो विनाश तो होता ही है इनसे। ये पक्का है बनाए गए हैं। इसलिए तो बनाए गए हैं। तो मनुष्य को समझना चाहिए ना कि भई अब दुनिया का विनाश तो सामने खड़ा है क्योंकि ये कोई 1, 2, 4 तो नहीं हैं। या 1, 2 देशों ने तो नहीं बनाके रखे हैं। ढेर के ढेर देश हैं। और गुप्त रूप से भी बनाते रहते हैं।

एक तो ये निशानी है विनाश की। और दूसरे तुम स्थापना के लिए ज्ञान सीख रहे हो। किससे? हँ? ज्ञान तो एक बाप से आता है। तो बाप यहां आया हुआ है ना। फिर जब ज्ञान पूरा होगा, स्थापना होगी तो विनाश तो जरूर होगा। हँ? पहले क्या होगा? पहले विनाश होगा कि स्थापना होगी? पहले स्थापना फिर विनाश। हाँ। देखो, ये भी तो बुद्धि का काम है ना समझने का। परंतु अभी देखो इतना बैठ करके लोगों को समझाते हैं तो कुछ ना कुछ तो बुद्धि में बैठता है क्योंकि जब सुनते हैं तो उस समय बुद्धि में बैठता है। फिर बाहर जाते हैं तो दुनिया की चकाचौंध में सब भूल जाते हैं। यहां आते हैं तो उस समय सुनते हैं, समझते हैं। फिर जो गाया जाता है वहां की वहां रही। तो बस फिर वहाँ, बस यहां से उठे, बाहर निकले और ये जो अभी ताजी समझ होती है ना वो पावती बन जाती है। हँ? जो यहां से समझ मिलती है वह गुम हो जाती है एकदम। अगर गुम ना हो जाए, और धारणा हो जाए, तो पीछे वो तो सर्विस करते रहेंगे। परंतु वो फिर सर्विस कर नहीं सकते। हँ? तो कितना इनका हिस्सा, हं, नई दुनिया में सुख भोगने का हिस्सा चट्ट हो जाता है, खत्म हो जाता है। नहीं तो कितना पूरा बाबा समझाते हैं अच्छी तरह से।

ये जो समझानी बाबा देते हैं बैठकरके, कोई भाषण भी करो कहां तो भी तुम्हारा हियर-हियर होवे। ये तो बिल्कुल क्लियर बात बताते हैं। समझा ना? और है तो ये गीत का अर्थ। अर्थ तो निकला है ना। तो देखो, परंतु देखो गीत का अर्थ कितना सारा रचता, रचना के आदि, मध्य, अंत समझाय दिया है। बच्चों को सारा राज़ समझाया है। परंतु होता क्या है कि ये तो जरूर है, जैसे टीचर हैं, पढ़ाते हैं, पीछे सुनते तो सभी स्टूडेंट्स हैं, पर कोई के अंदर में धारणा होती है, कोई के अंदर में नहीं होती है। तो कोई पास हो जाते हैं, तो कोई फेल हो जाते हैं। हां, बिल्कुल फेल हो जाते हैं एकदम। समझा ना? क्योंकि ये तो बड़ी नॉलेज है ना एकदम। इसमें तो भला बहुत करोड़ों को नॉलेज मिलने की होती है। 20.11.67 की प्रातः क्लास का सातवां पेज, दूसरी लाइन। तो इसमें तो फिर प्रजा में तो आ जाते हैं ना। कौन? जो थोड़ा भी सुनते हैं वो प्रजा में तो आ जाते हैं। हँ? बाकी पुरुषार्थ तो नहीं करते हैं। जो सुनते हैं उसका मनन-चिंतन-मंथन करें और बाप को याद करें, राजयोग से राजाई लें। तो राजाई तो नहीं पाते हैं। प्रजा वर्ग में तो आ ही जावेंगे क्योंकि अभी सुना है तो कभी तो ये कहेंगे ना कि इसने नॉलेज तो लिया है जरूर। कुछ ना कुछ सुना है तो तभी तो प्रजा में आते हैं ना।

बाकी जो समझते हैं कि हम कोई ये लक्ष्मी-नारायण बनें, अरे, उनके तो नैन-चैन, बातचीत करना, ये तो बिल्कुल ही न्यारा होता है। और वो कोई छुपे थोड़े ही रहते हैं। ना बच्ची। वो तो अपना शो करते ही हैं। हँ? और शो करते हुए भी आया कि माया के तूफान तो क्या करेंगे? किसकी बात हो रही है? अरे? लक्ष्मी-नारायण की बात हो रही है ना। तो उनके सामने तूफान आएगा तो क्या करेंगे? हटाय दिया एकदम पूरा। क्योंकि इसमें तो बहुत तूफान में गिरते हैं एकदम। ये जो काम का शत्रु है ना तो उसमें तो एकदम लिटाय देते हैं। वो बड़ा तीखा दुश्मन है। जैसे दो पहलवान लड़ते हैं ना। तो जो तीखा होगा क्या करेगा? धक से, हां, जमीन पर लिटाय देगा। हां। तो अरे उस दुश्मन के कारण कौन हैं काम महाशत्रु के? किसे कहेंगे? कहेंगे ये आंखें।

ये सभी जो बाप बैठकरके समझाते हैं ये समझानी इसको तो ज्ञान कहा जाएगा ना बच्चे। तभी तो ये गीत है ना - हे भगवान। तो बस हम तो भगवान के लिए ही कहते हैं कि आओ और आकरके हम घोर अंधेरे में पड़े हैं, आकरके हमारे ज्ञान का दीपक जगाओ। तो किसको कहते हैं, हँ, ज्ञान का दीपक, हँ, जगाओ? भगवान को कहते हैं। और भगवान कब आएंगे वो तो बिचारे घोर अंधेरे में पड़े हुए हैं। किसने डाला? हँ? इन शास्त्रकारों ने, विद्वान, पंडित, आचार्यों ने जो शास्त्रों में लिख दिया ना ये सृष्टि लाखों वर्ष की है। और अभी तो कलियुग के हजारों वर्ष पड़े हुए हैं। अभी तो बच्चा है, कलयुग रेगड़ी पहन रहा है। तो समझते हैं विनाश तो बहुत लंबे समय के बाद होगा। हँ? तो वो तो अभी बोलता है 40000 वर्ष के बाद भगवान आवेंगे। हँ? तो भई वो सब तो घोर अंधियारे में हैं। वो शास्त्र बनाने वाले विद्वान, पंडित, आचार्य और जो उनकी बातों पे विश्वास करने वाले हैं, वो दुनिया वाले भी घोर अंधियारे में हैं। हँ?

और इस बात की भी ब्राह्मणों की दुनिया में शूटिंग होती है कि नहीं? हँ? हां, यहां भी रिहर्सल होती है। घोर अंधियारे में पड़े हैं। यहां कौन सी रिहर्सल होती है? यहाँ कौनसे वेद, शास्त्र हैं? यहां जो, प्रैक्टिकल में जो कहते हैं, विनाश सामने खड़ा है, वो बड़े-बड़े अंडरग्राउंड महल-माडियां, अटारियां बनाते रहते हैं। तो लोगों की बुद्धि में बैठेगा कि विनाश होने वाला है? हँ? क्या समझेंगे? ये हमको पैसा कमाने के लिए बेवकूफ बना रहे हैं और खुद तो कंक्रीट के मजबूत-मजबूत मकान बनाते चले जाते हैं। तो देखो घोर अंधियारे की शूटिंग हो रही है कि नहीं हो रही है? नहीं? हो रही है। इसलिए जो कुछ भी कलप पहले हुआ है ये सभी कौरव विनाश काले विपरीत बुद्धि। हँ? क्यों कौरव नाम दिया? कहते हैं कुरु की संतान थे। किसकी संतान? हँ? कुरु की संतान। कुरु माने करो। क्या करो? अरे, कर्मेंद्रियों से कर्म करो। तो कर्मेंद्रियों से कर्म करेंगे, हँ, तो ये नहीं समझते हैं कि कर्मेंद्रियों में मुख्य कर्मेंद्रिय कौन सी है जो पहले कर्म करने के लिए आगे आ जाएगी? हँ? जो बाप कहते हैं, बताते हैं, ये महाशत्रु है। कौन सी कर्मेंद्रिय? हँ? सब कहेंगे कि कामेन्द्रिय। तो कर्म करो। उनका ये करम है सबसे बड़ा। मन-बुद्धि में घूमता ही रहता है। तो वो जो कुरु है, कहते हैं करो-करो। कुरु की संतान हुए कौरव। उनके लिए फिर शास्त्रों में लिखा है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। जब विनाश का काल आता है तो बुद्धि विपरीत हो जाती है। कहते भी हैं जाए विधाता दारुण दुख देई ताकी मति बुद्धि पहले हरि लेई। तो हैं फिर विपरीत बुद्धि। तो ये ही ख्याल से हैं, घोर अंधियारे में हैं।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Monday was, yes, these Translators of different languages get a lot of salary. But the egotistic scientists, who produce bombs, get more salary than all these people. Those are limited bombs and these are unlimited bombs. They are famous, aren’t they? They are for the purpose of death, aren’t they? Leave alone the topic of aeroplanes. They are for travelling. But these bombs, which everyone speaks about, they will understand only at that time, will they not? These bombs are the same missiles which have been mentioned in the scriptures that missiles, moosal emerged from the abdomen, intellect-like abdomen of the Vrishnavanshi Yadavas. Missiles have been mentioned as moosal. Their shape is like the moosals, isn’t it? So, they make each other fight, they clash. So, human beings understand that destruction is bound to happen. And as regards destruction through bombs, brother, okay aeroplane, okay brother, this is an indication of heaven. Now these bombs are not the indicators of heaven, are they? These bombs don’t exist in the heaven. They exist only in the Confluence Age. Be it the limited ones or the unlimited ones.

So, children, you should definitely understand that brother, the aeroplanes exist there in heaven to give happiness. Hm? But these bombs do not exist [there] to cause the destruction of the entire world. These are givers of sorrow, aren’t they? Now they have been produced, yet, look, there is so much fear everywhere. There is fear all over the world, isn’t it? Why? The bombs have been produced. The explosives for the destruction of the world are ready. What will happen now? So, now you children have come to know that destruction will not take place in the Golden Age through bombs. The bombs will not fall there for destruction. This is a symbol of destruction. Achcha, so, you should also understand that now destruction is definitely going to take place through these [bombs]. It means that these [bombs] haven’t been produced for the decoration of the world. Hm? For example, toys are produced at home for decoration. No. So, destruction takes place only through these [bombs]. It is sure that they have been produced. This is why they have been produced. So, human being should understand that brother, now the destruction of the world is staring at you because these are not just one, two, four [in numbers]. Or one or two countries haven’t produced. There are numerous countries. And they keep on producing stealthily as well.

Firstly, this is an indication of destruction. And secondly, you are learning knowledge for establishment. From whom? Hm? Knowledge comes from one Father. So, the Father has come here, hasn’t He? Then, when the knowledge is completed, when the establishment takes place, then destruction will definitely take place. Hm? What will happen first? Will destruction take place first or will establishment take place? First establishment, then destruction. Yes. Look, this is also a task of the intellect to understand. But now look, you sit and explain so much to the people, then it sits in the intellect to some extent or the other because when they listen then it sits in their intellect at that time. Then, when they go out, then they forget everything in the glitz of the world. When they come here, then they listen at that time and understand. Then it is sung that the topics of that place remained there only. So, that is it; then there, that is it, they get up from here, go out and whatever they have understood freshly, haven’t they, that is lost. Hm? Whatever wisdom they get from here vanishes completely. If it doesn’t vanish and if it is inculcated, then later they will keep on doing service. But then they cannot do service. Hm? So, their large share, hm, the share of experiencing happiness in the new world becomes nil, ends. Otherwise, Baba explains so much completely and nicely.

This explanation that Baba sits and gives, wherever you deliver any lecture, people should say ‘hear, hear’ for you. He narrates a completely clear topic. You understood, didn’t you? And this is the meaning of the song. The meaning has been derived, hasn’t it been? So, look, but look, the meaning of the song, the entire knowledge of the Creator and the beginning, middle and end of the creation has been explained so much. The entire secret has been explained to the children. But what happens is that it is sure that for example, the teacher teaches; later all the students listen, but some inculcate and some don’t. So, some pass and some fail. Yes, they fail completely. You understood, didn’t you? It is because this is a completely big knowledge, isn’t it? Many crores have to get this knowledge. Seventh page of the morning class dated 20.11.67, second line. So, they are then included among the subjects in this, aren’t they? Who? Those who listen even a little are included in the subjects (praja). Hm? But they do not make purusharth. They should think and churn whatever they listen and should remember the Father, obtain kingship through rajyog. So, they do not obtain kingship. They will indeed come in the subjects category because now they have heard; so, at some point of time it will be said that this one has definitely obtained knowledge. He has heard to some extent or the other; only then is he included among the subjects, isn’t he?

But as regards those who think that we should become this Lakshmi-Narayan, arey, their eyes, their expressions, their conversation is completely unique. And they do not remain hidden. No daughter. They show themselves. Hm? And even while showing [themselves], if the storms of Maya emerge, then what will they do? Whose topic is being mentioned? Arey? The topic of Lakshmi-Narayan is being discussed, isn’t it? So, what will they do when they face storms? They remove it completely. It is because many fall completely in the storms. This enemy of lust causes them to lie down completely. That is a very strong enemy. For example, two wrestlers fight, don’t they? So, what will the one who is stronger do? He will suddenly, yes, make him lie on the floor. Yes. So, arey, what is the reason for that enemy, the biggest enemy lust? Whom would you say? We would say – These eyes.

All this that the Father sits and explains, this explanation will be called knowledge, will it not children? Only then is there this song – O God! So, that is it; we say only for God that come; and after coming; we are lying in complete darkness; come and light our lamp of knowledge. So, whom do they say – Light the lamp of knowledge? They say to God. And those poor people are lying in complete darkness as to when God will come. Who put them [in darkness]? Hm? These writers of the scriptures, the scholars, pundits, teachers who wrote in the scriptures that this world’s duration is lakhs of years. And still there are thousands of years for the Iron Age to be over. It is still a child; the Iron Age is crawling. So, they think that destruction will take place after a long time. Hm? So, he now says that God will come after 40000 years. Hm? So, brother all of them are in complete darkness. Those scholars, pundits, teachers who write the scriptures and those who believe in their words, those people of the world are also in complete darkness. Hm?

And does the shooting for this topic also take place in the world of Brahmins or not? Hm? Yes, the rehearsal takes place here as well. People are in complete darkness. Which rehearsal takes place here? Which Vedas and scriptures exist here? Here, those who say in practical that destruction is staring at you, keep on building big underground palaces and buildings. So, will it sit in the intellect of the people that destruction is going to take place? Hm? What will they think? These people are making us fools to earn money and they themselves are going on building strong buildings of concrete. So, look, is the shooting of complete darkness taking place or not? No? It is taking place. This is why whatever has happened Kalpa ago all these Kauravas have an opposite intellect at the time of destruction. Hm? Why was the name Kaurava given? It is said that they were the children of Kuru. Whose children? Hm? Children of Kuru. Kuru means ‘karo’ (do). What should you do? Arey, perform actions through the organs of action. So, they will perform actions through the organs of action; so, they do not understand that which is the main organ of action among the organs of action which will come ahead of everyone in acting? Hm? The Father says, tells, this is the biggest enemy. Which organ of action? Hm? Everyone will say – The organ of lust. So, perform actions. This is their biggest action. It keeps on revolving in their mind and intellect. So, those Kurus say – Karo, karo (do, do). Children of Kuru are Kauravas. Then it has been written for them in the scriptures that they have an opposite intellect at the time of destruction. When the time of destruction comes then the intellect turns opposite. It is also said – Jaye vidhaataa daarun dukh dei taaki mati buddhi pehley hari leyi (the one whom God gives extreme sorrows, He first takes away their wisdom, intellect). So, then they have an opposite intellect. So, they have this thought only; they are in complete darkness.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2856, दिनांक 20.04.2019
VCD 2856, dated 20.04.2019
रात्रि क्लास 20.11.1967
Night class dated 20.11.1967
VCD-2856-extracts-Bilingual

समय- 00.01-26.17
Time- 00.01-26.17


आज का रात्रि क्लास है - 20.11.1967. त्रिमूर्ति है और उसके नीचे भी जो लिखा हुआ है और जो फिर बाबा समझाते रहते हैं। पहले क्या? पहले त्रिमूर्ति साक्षात्कार से तैयार हुई। फिर लिखत बाद में लिखी गई या साथ ही? हँ? लिखत तो बाद में लिखी गई क्योंकि लिखा हुआ है वो उसको बाबा समझाते हैं कि गीता का भगवान वो नहीं है। वो नहीं है, वो है। उसका भी तो वो ये जैसे बनकरके आते हैं ना। जैसे ये रखा है सामने त्रिमूर्ति का चित्र। हँ? तो बात हुई गीता के भगवान की। त्रिमूर्ति में कौन हुआ गीता का भगवान? वो नहीं है। वो नहीं है, वो है। हँ? और वो जो है उसका भी तो वो। हँ? तो ये चित्र जैसे बनकरके आते हैं ना। तो ये तुम्हारे सामने रखा है। और दूसरी वाणी में क्या बोला? हँ? ये त्रिमूर्ति का चित्र एक्यूरेट है? हां। एक्यूरेट नहीं है। तुम बच्चों को यथार्थ चित्र निकालना चाहिए। हं? तो त्रिमूर्ति में जो बोला इशारा करके गीता का भगवान वो नहीं है, तो कौन नहीं है? हँ? त्रिमूर्ति में ध्यान से देखो। देखा कभी? हँ? कि वो नहीं है। कौन नहीं है? कौन? लिखो, एक अक्षर लिखो। वो नहीं है, वो है। (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा, ब्रह्मा नहीं है। वो है। कौन है वो? हं? (किसी ने कुछ कहा।) शंकर है? अरे, उसका भी तो वो। हँ? ये जैसे बनकरके आते हैं ना चित्र साक्षात्कार से, हं, जैसे ये सामने रखा है त्रिमूर्ति का चित्र।

अभी अखबार में तो इतने नहीं पड़ते हैं, हं, जितने आगे चलकरके पडेंगे। तो जो आगे चलके पडेंगे, अखबारों में पडेंगे चारों ओर, सारी दुनिया में, तो वो यथार्थ चित्र पडेगा या जो अभी त्रिमूर्ति में चित्र डाले गए हैं वो पडेंगे? हं? जो यथार्थ हैं सो डाले जाएंगे। अभी इतने क्यों नहीं पड़ते हैं? क्योंकि ये अयथार्थ हैं, तो न समझाने वाले समझते हैं और न समझने वाले समझेंगे। तो अखबार में इतने नहीं पड़ते हैं बड़े-बड़े। और अक्षर भी पतले ही होते हैं अखबार में। हँ? तो अभी माने 1967 में इन बच्चों को काम देते हैं। ये जो श्यामकिशोरी है ना। किसकी किशोरी? श्याम की किशोरी। कौन श्याम? अरे, श्याम माने पतित। काला माने पतित। तो कौन पतित? हँ? कौन पतित? अरे, पतित से पतित कामी कांटे में आते हैं ना। मुकर्रर रथ। तो उसकी किशोरी। कौन हुई किशोरी? हँ? जो किशोरी है जो अंग्रेजी भी जानती है या हिंदी भी जानती है कि बाबा को एक कॉलम बना कर दियो। क्योंकि अखबार का कॉलम है 2 इंच का। कॉलम होता है ना अखबार का। वो 2 इंच का होता है। हँ? क्यों? 2 इंच का क्यों होता है? 1-1 कॉलम 2-2 इंच का होता है। क्यों? क्योंकि अखबार तो लंबा-चौड़ा होता है 10, 12 15 पेज का होता है, 16-16 पेज का भी आ जाता है। तो अगर ऐसे पढ़ेंगे, दूसरे को सुनाएंगे बैठके, तो सुबह से शाम अखबार पढ़ने में ही हो जाएगी। तो कालम छोटा इसलिए बनाया जाता है कि वो दो इंच का कालम एक लाइन फटाक से एक ही नज़र में समझ में आ जाए। कोई पढने की दरकार है ही नहीं। हाँ। तो पीछे चाहिए तो डेढ़ इंच भी ले सकते हैं। इंच भी ले सकते हैं। अरे, चार भी ले सकते हैं। मैं तो समझता हूँ अखबार का कितने भी चाहे तो ले सकते हैं। हाँ।

और ब्लाक बनाना पडेगा। त्रिमूर्ति का तो ब्लॉक अपना अच्छा है। जो अच्छा किलियर है क्योंकि कम लिखत है। और उसके नीचे वो भी लिखना है जरूर। वो भी लिखना है। क्या लिखना है वो नहीं बताया। ऊपर भी वो-4 कर दिया। हाँ, लिखना जरूर है वो। और ये जो कृष्ण का है वो जो लिखा हुआ है लिखत क्योंकि अखबार में पढ़ेंगे तो अखबार तो अक्सर करके बहुत पढते भी हैं ना। बाबा का तो विचार है कि अखबार का जांच करके ये ऐसे कांट्रैक्ट किया जाता है कि भइ हजार इंच हम लेंगे। हँ? तो जब चाहिएगा तब डालेगा। जितना चाहिएगा उतना डालेगा। उनका जो रेट होवे अगर उनको अच्छी तरह से एडिटर को समझाएंगे; हँ? सुनाने की बात नहीं है। क्या? सुनाया तो ब्रह्मा के द्वारा, ब्रह्माकुमार-कुमारियों के द्वारा। लेकिन तुम बच्चों को क्या करना है? समझाना है गहराई से।

तो जो नामीग्रामी अखबार हैं ही वास्तव में; कौनसा नामीग्रामी अखबार? हँ? उस समय भी नामीग्रामी था सन् 67 में; अभी भी नामीग्रामी है। हँ? अरे, 50 साल पहले भी नामीग्रामी था, अभी भी नामीग्रामी। कौनसा अखबार? हिन्दी का, अंग्रेजी का। अरे? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, हिन्दुस्तान टाइम्स, हाँ। है। और फिर दूसरा? टाइम्स आफ इंडिया है। हाँ। कोई एक दूसरी अखबार है। तो किसी ने कहा - स्टेट्समैन। हाँ, स्टेट्समैन शायद बंगाल में अच्छी चलती है। तो किसी ने कहा – हाँ। तो थोड़ा-थोड़ा एक बरस के लिए 2-3 हजार रुपये का ले लेवें। जो कभी-कभी ये सब डालते रहें अखबार में अच्छी जगह। तो ये जो बिगर देखे चिल्लाय पड़ते हैं ना लोग, ये निंदा करते हैं, ये फलाना करते हैं। अब अपनी निंदा-विंदा तो कोई होती नहीं है। हँ? और राय करके फिर वो बाबा समझाते रहते हैं कि ये भी डालो। ये भी डालो वा तो अखबार अपनी निकालनी ही चाहिए। हँ? हिसाब करके निकालनी चाहिए। क्या होगा? अरे, 10, 20, 50 हज़ार खर्चा होगा। उस समय की बात। और क्या होगा? वो जो अपन को चाहे सो हम लिखते रहें। अपनी अखबार होगी तो हम जो चाहेंगे सो, सो लिखेंगे। और हम तो लिखते हैं सब राइट। क्योंकि बाप बच्चों को सब राइट सिखलाते हैं। राइटियस बाप तो क्या सिखलाएगा? राइटियस ही सिखलाएगा ना।

जैसे वो भक्तिमार्ग में नाभि कमल से वो नेहरू को निकाला। किसकी नाभि कमल से? हँ? नाभि कमल से वो नेहरू को निकाला। वो गांधी से वो निकाला। हँ? गांधी से नेहरू को निकाला। तो तैसे तुम भी लिख सकते हो कि ये है विष्णु। हँ? और ओम मंडली में, यज्ञ के आदि में ये विष्णु की नाभि कमल से निकला। कौन? कौन निकला? हाँ, लिखो।
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा निकला। हाँ। तो तुम लिख सकते हो। जैसे वो कुछ भी लिख देते हैं, तो तुम भी लिख सकते हो। अपना अखबार कुछ भी लिखो। तो ये तो है ही है। फिर ब्रह्मा की नाभी कमल से। तो ये लिखत तो बहुत है ना बच्ची। अखबार के लेख निकल पड़ेंगे। हँ?

तो अगर अखबार भी निकालें और 2-3 बड़े सेंटर्स भी खुल जाएं तो फिर कोई ऐसे नहीं समझेंगे कि ये कोई छोटी है कोई संस्था। क्या? समझेंगे। कबकी बात बताई? भविष्य की कि 67 की? हाँ, भविष्य की बात बताई कि ऐसे नहीं समझेंगे कि ये कोई छोटी संस्था है। नहीं तो क्या समझें? समझेंगे ये छोटी संस्था है। भविष्य की बात बताई। हाँ। छोटी संस्था है तो इनको कोई उड़ाय सकेंगे। कोई माने? बड़ी संस्था वाले। हँ? जैसे आज, आज क्या है? हँ? आज तो 50 साल के बाद आध्यात्मिक विद्यालय छोटी संस्था है या बड़ी संस्था है ब्रह्मा कुमारी विद्यालय के मुकाबले? छोटी संस्था है। तो बाबा ने तो पहले से ही इशारा दे दिया। हाँ। वो समझेंगे कि कोई छोटी संस्था है तो इनको तो कोई भी यूं, यूं चुटकी में उड़ाय देंगे। ब्रह्माकुमारियां इनको उड़ाय देंगी। या उनके ऊपर कोई जोर रखा ही सकेंगे। हँ? कोई जोर-जबरदस्ती रखेंगे, भई, तुम अपने विद्यालय के नाम में से यूनिवर्सिटी हटा दो। जबरदस्ती हटाएंगे हाइकोर्ट से बुलवा के। हटाओ। तो कोई जोर रखाय सकेंगे। अब हाइ कोर्ट का तो जोर होता है ना। हाँ, अरे, ऐसे नहीं होगा। क्या? कैसे? कि तुमको हाइ कोर्ट बोल दे और तुम हटाय दो, विश्वविद्यालय या यूनिवर्सिटी। ऐसे नहीं होगा। हँ? हाँ, थोड़ा हो-हल्ला न मचाएं तो विश्व के ऊपर त्रिमूर्ति का चित्र लटका दो, गोले का चित्र लटका दो। दिखाई नहीं पड़ेगा। तो समझेंगे हाँ, इन्होंने मिटाय दिया।

तो ये ही ख्यालात कर-करके क्योंकि बाहर में नाम तो, प्रभाव तो निकालना होता है ना। तो बाबा तो कहते हैं अखबार से भी प्रभाव निकालेंगे। क्या? अब ये तो ठीक है। बच्चे रोज़ प्वाइंट्स सुनते रहते हैं। सो बच्चे जानें और बाप जाने। फिर बच्चों के अलावा और बाप के अलावा और दुनिया में कोई जानें नहीं। और कोई जानेगा? नहीं। और न जाने कोय। हँ? भक्तिमार्ग में कहते थे ना – तुम्ही तुम्हरी गति-मति तुम ही जानो। और न जाने कोय। अभी और कैसे जानें? और कैसे जानें? तो उसकी युक्ति रचनी चाहिए।

तो अभी बाबा तो देते हैं ऐस्से (essay), निबंध कि ये करना चाहिए। फिर बच्चों को या प्रदर्शनी कमेटी को; हँ? उस समय कौनसी प्रदर्शनी कमेटी? ज़ड़ चित्रों की। हँ? और इस समय? इस तरफ, इस समय अब 50 साल के बाद भी जो जड़ चित्रों की कमेटी? नहीं। हाँ। अब तो चैतन्य चित्र तैयार होने चाहिए ना। हाँ। तो प्रदर्शनी कमेटी को, जो आजकल के समय में देखा जाता है कि कोई सोई पड़ी है कमेटी। क्योंकि सुनते तो रहेंगे ना। बाबा कहते हैं, बाबा कहते हैं तब प्रदर्शनी कमेटी या म्यूजियम कमेटी सोई पड़ी है। हँ? तब। तब। अब की बात, अब की अभी छोड़ो। तबकी बात बताई। ए। हाँ। प्रदर्शनी कमेटी सोई पड़ी है। क्या? नींद बहुत आती है। तो सोएगी ना। हाँ। सोई पड़ी है। कोई इतना ध्यान नहीं देती है। इतना माने? जितना देना चाहिए उतना ध्यान नहीं देती है कि बाबा का क्या विचार है? और जब बाबा कुछ कहते हैं तो जरूर बाबा लिखा-पढ़ी से बाबा, वो लिखा-पढी बाबा से करेंगे कि बाबा ये, ये हम इनको दृष्टि दिया है। इनको अच्छी तरह से समझाया है। और इनसे किफायत से मिल सकते हैं। तो कुछ अखबार में भी लिखे होवें, लिखोवें। और कुछ अपनी कोशिश को, कोशिश करें अखबार बनाने की।

लिखा है जयपुर वालों ने। हँ? भले बाबा मुरली में चलाया है। परन्तु जयपुर वाले कुछ लिखा है कि फलाने-फलाने अखबार वाले जो छपते हैं वो बोलते हैं। खाली खर्चा जास्ती नहीं होगा। इस थोड़े खर्चे में ही छपाय सकते हो। एक अखबार जहाँ छपती है वहां दूसरी भी छप सकती है। तीसरी भी छप सकती है। तो ऐसे सोए पड़े नहीं रहना चाहिए। कुछ न कुछ ठक-ठक करनी चाहिए। या कोई ऐसी बात होवे तो उनको क्योंकि तुम्हारे पास तो सभी सत्य ही सत्य है। और वहाँ तो उस दुनिया में फिर सभी असत्य है। हँ? बताया ना झूठ ही झूठ, सच की रत्ती भी नहीं। जैसे तुलसीदास ने क्या लिख दिया? झूठै लेना, झूठै देना, झूठै भोजन, झूठ चबैना। कलियुग की बात लिखी। तो वो सत्य की भी तो एडवर्टाइज़मेन्ट चाहिए। तो कुछ तो चाहिए ना कुछ न कुछ। क्योंकि इतने बच्चे हैं। अभी बाबा कहते हैं ना बच्चों ने अभी इतने जोर नहीं भरे क्योंकि हिसाब किया जाए तो क्योंकि संपूर्ण तो कोई, हँ, सम्पूर्ण तो कोई, कोई तो बनता है ना। हाँ। तो अभी कितने बरस हो गए। तो आहिस्ते-3 हल चलता ड्रामा के अनुसार। तो देखने में आते हैं कि अभी कुछ थोड़ी तीखी ये पुरुषार्थ चलना चाहिए। धीमे पुरुषार्थ से नहीं चलेगा।

Today’s night class is dated 20.11.1967. There is Trimurti and below it whatever is written and then Baba keeps on explaining on it. What first? First Trimurti was prepared through visions. Then was the write-up written later on or simultaneously? Hm? The write-up was written later on because Baba explains about the write-up that ‘that one’ is not the God of Gita. It is not that one, it is that one. Even that of that one also comes prepared like this, doesn’t it? For example, this picture of Trimurti is placed in the front. Hm? So, the topic is about the God of Gita. Who is the God of Gita in Trimurti? It is not that one. It is not that one, it is that one. Hm? And that one; that one of that one also. Hm? So, these pictures get ready and come, don’t they? So, this is placed in front of you. And what was said in another Vani? Hm? Is this picture of Trimurti accurate? Yes. It is not accurate. You children should bring out the accurate picture. Hm? So, in Trimurti, He said by making a gesture that ‘that one’ is not the God of Gita; so, who is not? Hm? Look at the Trimurti carefully. Have you ever seen? Hm? That it is not that one. Who isn’t? Who? Write; write one alphabet. It is not that one; it is that one.
(Someone said something.) Achcha, Brahma is not. It is that one. Who is that one? Hm? (Someone said something.) Is it Shankar? Arey, that of that one also. Hm? For example, these pictures get prepared through visions and come, hm, for example, this picture of Trimurti is placed in the front.

Now it is not published that much in the newspapers as much as it will be published in future. So, whatever will be published in future, it will be published everywhere, in the entire world in the newspapers, so, will that accurate picture be published or will the pictures that have been inserted in Trimurti now be published? Hm? The accurate ones will be published. Why aren’t they published that much now? It is because these are inaccurate; so, neither those who explain understand, nor will those who have to understand will understand. So, such big ones are not published that much in the newspapers. And the letters are also very thin in the newspapers. Hm? So, now, i.e. in 1967 these children are given a task. There is this Shyamkishori, isn’t she? Whose Kishori (young lady)? Shyam’s kishori. Who Shyam? Arey, Shyam means sinful. Black means sinful. So, who is sinful? Hm? Who is sinful? Arey, He comes in the most sinful, lustful thorn, doesn’t He? The permanent Chariot. So, his kishori. Who is kishori? Hm? Kishori knows English also or knows Hindi also. Prepare a column for Baba. It is because the newspaper column is 2 inches wide. There is a column in the newspaper, isn’t it? That is 2 inches wide. Hm? Why? Why is it 2 inches wide? Each column is 2 inches wide. Why? It is because the newspaper is long and wide; it consists of 10, 12, 15 pages; there are 16 pages as well. So, if you read like this; if you sit and narrate to others, then you will be occupied in reading the newspaper from morning to evening. So, the column is made small because that 2 inches column, a line of it can be understood immediately at one glance. There is no need to read it at all. Yes. So, later if we want we can take one and a half inches also. We can take one inch also. Arey, we can take four also. I think we can take as many as we wish in the newspaper. Yes.

And block will have to be made. Our block of Trimurti is good. It is nice and clear because the write-up is less. And below that you should also write that without fail. You should write that also. What is to be written was not told. Above also He said ‘that-4’. Yes, you should definitely write that. And this one of Krishna, the write-up that has been written because when people read in the newspaper, then many people often read newspapers, don’t they? Baba thinks that we should check the newspaper and a contract is signed like this that brother, we will take a thousand inches. Hm? Then they will publish whenever you wish. They will publish whatever volume that you wish. Whatever is its rate, if you explain to the Editor nicely; hm? It is not about narrating. What? It was narrated through Brahma, through the Brahmakumar-kumaris. But what should you children do? You have to explain deeply.

So, the newspapers which are actually well-known; which well-known newspaper? Hm? It was well-known at that time also in 67; It is well-known even now. Hm? Arey, it was famous 50 years ago as well; it is famous even now. Which newspaper? In Hindi, in English. Arey?
(Someone said something.) Yes, Hindustan Times, yes. It is. And then the other? There is Times of India. There is another newspaper. So, someone said – Statesman. Yes, perhaps Statesman is more popular in Bengal. So, someone said – Yes. So, we may take little portions for 2-3 thousand rupees for a year. We should keep on publishing all this nicely in the newspaper sometimes. So, these people who shout without seeing, they defame, they do such and such things. Well, we cannot be defamed. Hm? And by seeking advice Baba keeps on explaining that publish this as well. Publish this also or we should publish our own newspaper. Hm? You should publish after making calculations. What will happen? Arey, it may involve an expenditure of 10, 20, 50 thousands. It is about that time. What else will happen? We can keep on writing whatever we wish. If we have our own newspaper, then we will write whatever we wish. And we write everything right. It is because the Father teaches the children everything right. What will the righteous Father teach? He will teach righteous only, will He not?

For example, on that path of Bhakti they made Nehru to emerge from the lotus-like navel. From whose lotus-like navel? Hm? They made Nehru to emerge from the lotus-like navel. Hm? They made [Nehru] to emerge from Gandhi. So, similarly, you can also write that this is Vishnu. Hm? And in the Om Mandali, in the beginning of the Yagya this one emerged from the lotus-like navel of Vishnu. Who? Who emerged? Yes, write.
(Someone said something.) Brahma emerged. Yes. So you can write. Just as they write anything, so, you can also write. It is our newspaper, you may write anything. So, this is definitely there. Then, from the lotus-like navel of Brahma. So, daughter there is a lot of write-up, isn’t it? Newspaper articles will emerge. Hm?

So, even if you publish a newspaper and even if 2-3 centers open, then nobody will think that this is a small organization. What? They will think. It is about which time? Is it about the future or about 67? Yes, a topic of future was mentioned that they will not think that this is a small organization. Otherwise what would they think? They will think that this is a small organization. A topic of future was mentioned. Yes. If it is a small organization, then someone will be able to make it to vanish. What is meant by someone? Those from the bigger organization. Hm? For example, today; what is it today? Hm? Today, after 50 years, is Adhyatmik Vidyalay a small organization or a big organization when compared to the Brahmakumari Vidyalaya? It is a small organization. So, Baba has already given a hint. Yes. They will think that this is a small organization; so, anyone will make it to vanish like this, like this in a wink. Brahmakumaris will make these vanish. Or they may pressurize these. Hm? They may pressurize, brother, you remove university from the name of your school (vidyalaya). They will make you remove forcibly by making the High Court to pronounce [an order]. Remove. So, they may pressurize. Well, there is a pressure of the High Court, isn’t it? Yes, arey, it will not happen like this. What? How? That the High Court tells you and you remove Vishwavidyalay or University. It will not happen like this. Hm? Yes, if you don’t create a little noise, then hang the picture of Trimurti, hang the picture of the Wheel on [the word] ‘Vishwa’. It will not be visible. So, they will think that yes, they have removed it.

So, by thinking like this, because the name, the effect has to be spread outside, isn’t it? So, Baba says – The effect will spread through newspapers also. What? Now this is correct. Children keep on listening to the points every day. So, children know and the Father knows. Then except the children and except the Father nobody else in the world knows. Will anyone else know? No. Nobody else knows. Hm? On the path of Bhakti also people used to say – You alone know Your ways (tumhi tumhri gati-mati tum hi jaano). Nobody else knows (aur na jaaney koy). Well, how can others know? And how can they know? So, tactics should be created for it.

So, now Baba gives you an essay, a nibandh (Hindi word for essay) that you should do like this. Then children or the exhibition committee; hm? At that time which exhibition committee existed? That of non-living pictures. Hm? And at this time? On this side, at this time, now even after 50 years, is it the committee of non-living pictures? No. Yes. Now the living pictures should get ready, shouldn’t they? Yes. So, the exhibition committee, which, now-a-days it is observed that the committee is sleeping. It is because they keep on listening, don’t they? Baba says, Baba says at that time the exhibition committee or the museum committee is asleep. Hm? At that time. At that time. The topic of now; leave the topic of present now. A topic of that time was mentioned. A. Yes. The exhibition committee is sleeping. What? It feels very sleepy. So, it will sleep, will it not? Yes. It is asleep. It does not pay that much attention. What is meant by ‘that much’? It doesn’t pay as much attention as it should that what is Baba’s thought? And when Baba says something, then definitely you will correspond with Baba that Baba this, this, I have given drishti to this one. I have explained nicely to this one. And we can get at cheap rates from this one. So, we can write something in the newspaper also. And we can try to bring out our newspaper.

Those from Jaipur have written. Hm? Although Baba has mentioned in the Murli, yet those from Jaipur have written something that such and such newspaper persons who publish, speak. The expenditure will not be much. You can publish with a little expenditure only. The amount with which we publish one newspaper we can publish a second one also. A third one also can be published. So, you should not remain asleep like this. You should keep on doing something or the other. Or if any such thing happens then they; because you now have only the truth. And there everything is false in that world. Hm? It was told, wasn’t it that there is just falsehood; there is not even an ounce of truth. For example, what did Tulsidas write? Jhoothai lena, jhoothai dena, jhoothai bhojan, jhooth chabaina (Taking lies, giving lies, eating lies, chewing lies). He wrote a topic of the Iron Age. So, that truth also requires advertisement. So, something or the other is required. It is because there are so many children. Now Baba says, doesn’t He that children have not shown so much force so far because if you make calculations, then because someone becomes complete, someone does become perfect, doesn’t he? Yes. So, so many years have passed now. So, gradually, the plough moves as per drama. So, it is observed that this purusharth should move a little fast. It will not do if the purusharth is slow.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2857, दिनांक 21.04.2019
VCD 2857, dated 21.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2857-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-26.00
Time- 00.01-26.00


आज का प्रातः क्लास है 21.11.1967 मंगलवार। रूहानी बच्चों प्रति। उनको कहा ही जाता है ज्ञान गुलाब, रूहे गुलाब। गुल तो बहुत हैं। बच्चों को समझाते हैं। दुनिया तो नहीं जानती है बच्चे कि कब रूहानी बाप आकरके रूहानी बच्चों को समझाते हैं। हँ? कब समझाते हैं और कब सुनाते हैं? क्या कहेंगे? हँ? कहेंगे 76 के बाद समझाते हैं। क्योंकि बाप प्रत्यक्ष हो तो बाप समझाए टीचर बनकर। मां तो लोरी सुनाती है। तो बताया ये बात दुनिया के मनुष्य नहीं जानते हैं कि बाप ब्रह्मा के तन में सुनाते हैं माता के रूप में। और राम बाप जिसे कहा जाता है, कृष्ण तो बच्चे को कहा जाता है ना। कृष्ण की पूजा मंदिर में बच्चे के रूप में होती है। तो बाप समझाते हैं तुम कलयुगी दुनिया के नहीं हो। कहां के हो? पुरुषोत्तम संगमयुगी दुनिया के हो। ये बात भूलना नहीं चाहिए, लेकिन भूल जाते हो। बहुत भूल जाते हो। बुद्धि दुनिया में चली जाती है। तो कलियुगी दुनिया याद आ जाती है।

तुम तो संगमयुगी, सो भी पुरुषोत्तम बनने वाले हो। संगम में भी जो भी आत्माएं हैं पुरुषार्थ करने वाली उनमें उत्तम पुरुष बनने वाले। तो पुरुषोत्तम ऐसे फूल। लक्ष्मी नारायण की तरफ इशारा किया। ऐसे फूल। ये तो अक्षर सुनते तो हो। अनेक बार सुनते हो बाप द्वारा कि हमको फूल बनाने का है अर्थात हम अभी क्या हैं? कांटे हैं क्योंकि वो फूलों का बगीचा है, हँ, इन पुरुषोत्तम का। तो फूल तो सुखदाई होते हैं ना। खुशबू वाले होते हैं। दुर्गुणों की बदबू तो नहीं आती है। और हल्के-फुल्के भी होते हैं क्योंकि देहभान होता है तो भारी हो जाते हैं। आत्मा समझते हैं तो आत्मा तो हल्की है ना। अति सूक्ष्म है। देह भारी होती है। तो देहभानी से फिर हल्के-फुल्के फूल बनते जरूर हैं। परंतु कोई तो सजाएं खाकरके, ये सभी करके बनते हैं। तो फिर उनको? उनको फूल नहीं कहा जाता है। नहीं कहेंगे। अच्छा? ये तो जानते हो कि सजाएं खाते हैं तो पद कम हो जाता है।

जानते हो कि बुद्धि में समझते हो और कहते भी हो मुख से और तुम यहाँ सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनने के लिए बैठे हो। तो सुनाते कौन हैं? जरूर सत्य बाप ही सुनाते हैं। कहा जाता है सत चित आनंद। सत्य बाप आकरके सतयुग की रचना करते हैं। तो यहां क्या बनने आते हो? कथा मात्र सुनने के लिए आते हो? अरे, ये है नर से नारायण बनने की कथा। तो यहां तो आते ही हो नर से नारायण बनने की सच्ची कथा सुनने के लिए आते हो। क्योंकि उस दुनिया में खास भारत में घर-घर में नारायण, सत्यनारायण की कथा सुनते हैं। वो तो झूठी कथा है। नाम लिख दिया है चौपड़ी के ऊपर सत्यनारायण की कथा। और पंडित जी से कोई पूछता भी नहीं नाम लिख दिया है सत्यनारायण की कथा और सुनाते हो लीलावती, कलावती, लकड़हारा, लकड़बग्घा की कथा। और यहां तुम कौनसी कथा सुनते हो? भई ये वो ही गीता की कथा है।

अच्छा, तो ये गीता की कथा आगे कब सुनी है? वो पंडित जी तो बोलेंगे कि इन सत्यनारायण को लाखों वर्ष हुए। ये गीता सुनाई। कहते हैं द्वापर के अंत में सुनाई 5000 वर्ष में। और अभी 5000 वर्ष के बदली में ये जो भी पत्थरबुद्धि मनुष्य हैं अभी उसको पत्थरबुद्धि तो कहना पड़े ना क्योंकि गीता का एपिसोड या गीता का भगवान राजयोग सिखाने कब आए? हँ? जरूर नर को नारायण बनाया था। तो नारायण का राज्य तो सतयुग में होता है ना। तो द्वापर में कैसे कथा सुनाई? जरूर सतयुग के आदि में कथा सुनाई होगी। अभी देखो आए हैं तो कितने बरस के बाद? 5000 वर्ष हुआ। किसको? हँ? कथा सुनाने वाला बाप है। उसको 5000 वर्ष हुआ। पहले भी आया था। अभी फिर आया है। अगर कोई मनुष्य कह दें कि उनको लाखों वर्ष हुए तो अब भला उनको क्या कहा जाए? क्योंकि अपना धर्मशास्त्र भारत का है। ये तो विदेशी आए हैं ढाई हजार वर्ष के अंदर। तो ये इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन आदि आए तो उन्होंने अपना-अपना धर्म की धारणा शुरू कर दी देहभान की बातें। और अपना तो है ही गीता शास्त्र। श्रीमद भगवत गीता। भगवान की सुनाई हुई गीता।

तो ये है ड्रामा के अनुसार। परंतु जो भी भूल है वो समझाई तो जाएगी ना। तो ये समझाया जाता है कि ड्रामा के प्लैन अनुसार भारतवासी खास और जनरल ये सारी दुनिया। भारत है पर्टिकुलर। तो भारतवासी खास गीता का एपिसोड यानी गीता का एपिसोड कहा ही जाता है पुरुषोत्तम संगम युग। बाकी ऐसे थोड़े ही है कि द्वापर के अंत में गीता का एपिसोड। उस समय तो सब धर्म थोड़े ही होते हैं। अरे, गीता में भी लिखा हुआ है सर्व धर्मान् परित्यज्य। सब धर्मों को छोड़कर मामेकम शरणम् व्रज। तो सब धर्म तो कलयुग के अंत में होते हैं ना क्योंकि ये तो समझते हो ना कि गीता के एपिसोड अभी गीता सुनाई जाती है। तो ये युग गीता का है। तो गीता के युग को ही पुरुषोत्तम संगमयुग कहा जाता है। संगम तब कहेंगे पुरुषोत्तम जब कनिष्ठ मनुष्य से पुरुषों में उत्तम बनें। उत्तम तो होते हैं नई दुनिया में। पुरानी दुनिया में तो नीच मनुष्य होते हैं ना, कनिष्ठ मनुष्य होते हैं। तो ज़रूर पुरानी दुनिया और नई दुनिया। पुरानी दुनिया है कलियुग, पाप का युग, पापी युग। और नई दुनिया है पुण्य आत्माओं का युग। तो बरोबर ये नई और पुरानी दोनों दुनिया का संगम है। अभी पुरानी दुनिया नई दुनिया लाखों वरष तो नहीं हो सकती है। क्यों? क्योंकि ये जो विधर्मी आए हैं ना विदेशी, ये तो ढाई हजार वर्ष के अंदर आए ना। उससे पहले तो भारत में एक ही धर्म, एक ही राज्य, एक ही भाषा होती थी। एक ही कुल होता था, एक ही मत होती थी। ये दूसरे धर्म वाले आए तो उन्होंने द्वैतवाद फैलाय दिया। तो शास्त्रों में भी तो लिखा है द्वैतवाद से दैत्यों की दुनिया। कहा जाता है दिति की औलाद। दिति माने खंडित माता।

तो ये तुम बच्चों को समझाया जाता है। और बाप ने समझाय दिया है तो ये जो बिल्कुल सहज ते सहज। इसको कहते हैं बहुत सहज से सहज बातें। नाम ही है सहज राजयोग, सहज ज्ञान। अगर पुरानी और नई दुनिया का भी हिसाब करें तो भी सतयुग, फिर त्रेता, फिर द्वापर, फिर कलयुग। तो ये इतने तो ये 4 युग पसार हो गए ना। और नई दुनिया को इतना समय से इतना समय हो गया। नई दुनिया कितना लंबे समय से खलास हो गई। कहेंगे जब एक धर्म होता है तो नई दुनिया। एक राजा होता है तो नई दुनिया। तो वो तो ढाई हजार वर्ष से खलास हो गई ना। एक और अनेक। तो अभी मनुष्य तो समझते हैं कि लाखों वर्ष हो गए। तुम्हारे बुद्धि में बाप ने आकर के डाला है कि नहीं बच्चे, गीता के युग को लाखों वर्ष नहीं हुए। जबकि भगवान ने आकरके गीता सुनाई थी, राजयोग सिखलाया था। क्योंकि गीता में है ही राजयोग। राजाई प्राप्त कराने का योग है। अभी तो इस दुनिया में क्या है? ये कोई राजाई है? आज राजाई करने बैठे और कल उतार दिया। अरे, अब ये नर से नारायण बनना ये तो देखो इनकी राजाई कितना लंबा समय चली। हँ? कहेंगे कि इन आदि नारायण का राज्य कितने साल चलता है? ढाई हजार साल चलता है।

तो देखो कितनी बिल्कुल सहज बात है। ये गीता ही सत्यनारायण की कथा है। नर से नारायण बनने की कथा है। नर अर्जुन को ये कथा सुनाकर नारायण बनाया। अच्छा, अगर कहें कि राजयोग सिखाय राजाओं का राजा बनाया तो ये है तो जरूर क्योंकि राजाओं का राजा बनने का अभी, अभी ये बनना तो है ना। नारायण तो राजाओं का भी राजा है। बरोबर है। तो राजाओं का राजा बनने की कथा 5000 वर्ष बाद सुनाते हैं, हर 5000 वर्ष बाद। अच्छा वो तो हर 5000 वर्ष के बाद हो जाती है नई दुनिया। तो अभी फिर नई दुनिया हो जाएगी। हो जाएगी ना। ऑटोमेटिकली। नर, सत्यनारायण की, नर से सत्यनारायण बनने की कथा। तो सत्यनारायण के लिए सतयुग भी चाहिए। हँ? झूठ युग थोड़े ही चाहिए? ये कलियुग को कहेंगे झूठ युग।

तो पीछे ये समझ कर के भी तो नई दुनिया और पुरानी दुनिया में भी भेंट तो पड़ जाती है ना। गीता का एपिसोड को इतना दूर फेंकने से देखो सब बिल्कुल ही साफ हो गया। बिल्कुल बेहद सफेद झूठ हो गया। घोर अंधियारे में आ गए। तो जब झूठ के लिए कोई को बैठकरके समझाया जाता है तो देखो वो कितना गुरूर-गुरुर करते हैं। हँ? हाँ, मनुष्य गुर्र-गुर्र न करें; समझा ना? क्योंकि बंदर ही गुर्र-गुर्र करते हैं। तो इसलिए मनुष्य में जो ये पांच विकार होने के कारण ये फिर गाया जाता है ये बंदर से भी बदतर हो गए। हँ? रामायण में बंदर गाए गए हैं ना। मनुष्य इन बातों को नहीं समझते हैं कि ये बंदर क्यों गाए जाते हैं? जरूर गाए जाते हैं। ये भी गाया जाता है कि मनुष्य की सूरत मनुष्य की और सीरत माना चलन बंदर की। कब? सतयुग में थोड़े ही कहेंगे? जरूर कहेंगे कलियुग में। हां, तो ये महिमा जो सत्यनारायण की है वो सतयुग की महिमा है। हाँ। ये बंदरों की महिमा तो नहीं सतयुग की कहेंगे। क्योंकि लक्ष्मी और नारायण का राज्य ये तो सतयुग में था। नाम ही है सत्यनारायण। तो जरूर इस समय के मनुष्य को कहेंगे झूठ। झूठ खंड के हैं।

जरूर मनुष्य एक दो की जो तुम हैं जिनको दृष्टि मिली है ज्ञान की, तीसरे नेत्र की दृष्टि मिली है ना। तो तुम जान सकते हो ना अच्छी तरह से। भले ब्राह्मण की सूरत अभी बदल गई है। तो भी देखते हो कि बरोबर ब्राह्मण की सूरत, मनुष्य की भी तो ब्राह्मण की ही होती है ना। मनुष्य ही ब्राह्मण बनते हैं। और वो ही सीरत। फिर कहां से आ गए? जैसे बंदर की। फिर भी तो सीरत बंदर की देखने में आती है ना। क्योंकि पत्थर बुद्धि हैं। पत्थर बुद्धि हैं यानी कितना भी सुनाओ, कितना भी समझाओ सुधरते नहीं है बिल्कुल। 21.11. 1967 के प्रातः क्लास का दूसरा पेज। कितना भी वो जो गाया जाता है ना कि इसकी, इसकी बुद्धि ऐसी है कि जो भगवान भी आए तो भी इसकी बुद्धि कोई सुधार नहीं सकते, समझाए भी नहीं सके। अभी तो भगवान आया है ना। तो भी देखो नहीं सुधरती है ना। तो देखो इनका है ना बरोबर कि ये कहते आए हैं कि भगवान भी आ जाए तो भी ये बंदर से चेंज होकरके मंदिर लायक बन न सकें। भगवान, भगवान और बराबर ऐसे होता है कि बरोबर नहीं बनते हैं। मंदिर लायक बनते ही नहीं। क्यों? क्योंकि भगवान से प्रीति लगती ही नहीं जैसे भगवान चाहते हैं। क्या चाहते हैं? मामेकम याद करो। मेरे से प्रीति लगाओ। अब तो प्रीति क्यों नहीं लगती है? क्योंकि जन्म-जन्मांतर से व्यभिचारी बने पड़े हैं। देखो, लिखा हुआ है बिल्कुल किलियर। (क्रमशः)

Today’s morning class is dated 21.11.1967, Tuesday. To the spiritual children. They are called rose of knowledge, spiritual rose. There are many flowers. Children are explained. The world doesn’t know children as to when the spiritual Father comes and explains to the spiritual children. Hm? When does He explain and when does He narrate? What would you say? Hm? It would be said that He explains after 76. It is because when the Father is revealed then the Father will explain in the form of a teacher. The mother narrates lullaby (lori). So, it was told that the people of the world don’t know that the Father narrates in the body of Brahma in the form of a mother. And Ram who is called the Father; a child is called Krishna, isn’t he? Krishna is worshipped in the temple in the form of a child. So, the Father explains that you do not belong to the Iron Age world. To which place do you belong? You belong to the Purushottam Sangamyugi (elevated Confluence Age) world. You shouldn’t forget this topic, but you forget. You forget often. The intellect goes into the world. So, the Iron Age world comes to your mind.

You are Sangamyugi (Confluence-Aged), that too you are going to become Purushottam (highest among the souls). Even in the Confluence Age, you are the ones who become the best (uttam) among the souls which make purusharth. So, such Purushottam flowers. A gesture was made towards Lakshmi-Narayan. Such flowers. You do hear these words. You hear many times from the Father that we have to become flowers, i.e. what are we now? We are thorns because that is a garden of flowers of these Purushottams. So, flowers give joy, don’t they? They are fragrant. They do not emanate bad odour of vices. And they are also very light because if you have body consciousness you become heavy. If you consider yourself to be souls, then the soul is light, isn’t it? It is very subtle. Body is heavy. So, you definitely become light flowers from body conscious ones. But some become after suffering punishments and doing all this. So, then they? They are not called flowers. They will not be called. Achcha? You know that when you suffer punishments, then the post is reduced.

You know that you understand in the intellect and you even say through the mouth and you are sitting here to listen to the story of true Satyanarayana. So, who narrates? Definitely the true Father Himself narrates. It is said – Sat Chit Anand. The true Father comes and creates the Golden Age. So, you come here to become what? Do you come just to listen to the story? Arey, this is the story of becoming Narayan from nar (man). So, you come only to listen to the true story of becoming Narayan from nar. It is because in that world people listen to the story of Narayana, Satyanarayana in every home especially in India. That is a false story. The name written on the book is ‘Satyanarayan’s story’. And nobody asks the Punditji that you have written the name ‘Satyanarayan’s story’ and you are narrating the story of Leelawati, Kalawati, Lakadhara, Lakadbaggha. And which story do you listen here? Brother, this is the same story of the Gita.

Achcha, so, have you heard this story of the Gita earlier? That Punditji will tell that it has been lakhs of years since this Satyanayana [existed]. This Gita was narrated. They say that it was narrated in the end of the Copper Age (Dwapar) in 5000 years. And now, instead of 5000 years, these human beings with stone-like intellect; well, they will have to be called stone-like intellect because when was the episode of Gita enacted or when did the God of Gita come to teach RajYoga? Hm? Definitely He had transformed nar (man) to Narayan. So, the rule of Narayan exists in the Golden Age, doesn’t it? So, how was the story narrated in the Copper Age? Definitely the story must have been narrated in the beginning of the Golden Age. Now look He has come after how many years? It has been 5000 years. Who? Hm? The narrator of the story is the Father. It has been 5000 years since He came. He had come earlier also. He has now come again. If any human being says that it has been lakhs of years since He came, then well, what should he be called? It is because our religious scripture is of India. It is these foreigners who have come within 2500 years. So, when these Islamic people, Buddhists, Christians, etc. came, they started the inculcations of their individual religion, the topics of body consciousness. And ours is the Gita scripture. Shrimad Bhagwat Gita. Gita narrated by God.

So, this is as per the drama. But the mistake will be explained, will it not be? So, it is explained that as per the drama plan the residents of India in particular and this entire world in general; India in particular; so, the residents of India in particular; the episode of Gita, i.e. the Purushottam Sangamyug is called the episode of Gita. But it is not as if the episode of Gita was in the end of the Copper Age. At that time all the religions do not exist. Arey, it has been written in the Gita also – Sarva dharmaan parityajya. Leave all the religions and Maamekam sharanam vraj (be seated in My asylum alone). So, all the religions exist only in the end of the Iron Age because you understand that the episode of Gita, the Gita is narrated now. So, this is the Age of Gita. So, the Age of Gita itself is called Purushottam Sangamyug. It will be called Purushottam sangam (confluence) when you become highest among the souls from lowly human beings. The highest ones exist in the new world. There are lowly human beings in the old world, aren’t there? There are lowly human beings. So, definitely there is an old world and a new world. Old world is the Iron Age, an Age of sins, a sinful Age. And the new world is an Age of noble souls. So, rightly this is a confluence of both new and old world. Well, the old world and the new world cannot be lakhs of years old. Why? It is because these vidharmis (heretics), the videshis (foreigners) who have come, haven’t they? They have come within 2500 years, haven’t they? Before that there was only one religion, only one kingdom, only one language in India. There used to be only one clan, only one opinion. When the people of these other religions came, then they spread dualism. So, it has been written in the scriptures also that a world of demons (daitya) was created through dualism. They are called children of Diti. Diti means impaired mother.

So, this is explained to you children. And the Father has explained that this is very easiest of all. These are called very easiest of all topics. The name itself is easy RajYoga and easy knowledge. Even if you make calculations of the old and the new world, then there is the Golden Age, then the Silver Age, then the Copper Age and then the Iron Age. So, these many four Ages have passed, haven’t they? And it has been so much time since the new world existed. The new world has ended such a long time ago. It will be said that when there is one religion there is new world. When there is one king, then there is new world. So, that has ended 2500 years ago, hasn’t it? One and many. So, now people think that it has been lakhs of years. The Father has come and put in your intellect that no children, it has not been lakhs of years since the Age of Gita when God had come and narrated the Gita, taught the RajYoga. It is because there is a mention of RajYoga in the Gita. It is a Yoga which causes the attainment of kingship. What is there in this world now? Is this any kingship? Today you sit to rule and tomorrow you are made to come down. Arey, well, becoming Narayan from nar (man), look their rule lasted so long. Hm? It will be said that how many years does the rule of this first Narayan last? It continues for 2500 years.

So, look, it is such an easy topic. This Gita itself is the story of Satyanarayana. It is the story of becoming Narayan from nar (man). Man Arjun was narrated this story and made Narayan. Achcha, if we say that he was taught rajyog and made the king of kings, then this is definitely true because now, now he is to become the king of kings, isn’t he? Narayan is the king of kings as well. He rightly is. So, the story of becoming king of kings is being narrated after 5000 years, after every 5000 years. Achcha, that new world comes after every 5000 years. So now the world will become new again. It will become, will it not? Automatically. The story of man, of Satyanarayana, [the story of] becoming Satyanarayan from nar (man). So, the Golden Age (Satyug) is also required for Satyanarayana. Hm? Is a false Age required? This Iron Age will be called a false Age.

So, later, even after understanding this, a comparison is made between the new world and the old world, isn’t it? By throwing the Gita episode so far away look, everything has become completely clear. It has become completely white lie. People have entered into complete darkness. So, when you sit and explain to someone about lies, then look, they become so angry. Hm? Yes, people shouldn’t growl; You have understood, haven’t you? It is because it is the monkeys who growl. So, this is why because of the existence of five vices in the human beings it is sung that they have become worse than the monkeys. Hm? Monkeys are famous in the Ramayana, aren’t they? Human beings don’t understand these topics that why these monkeys are praised? They are definitely praised. It is also praised that human beings have the face (soorat) of a human being but they have a character (seerat) of a monkey. When? Will it be said to be in the Golden Age? It will definitely be said to be in the Iron Age. Yes, so this praise which is of the true Narayana is a praise of the Golden Age. Yes. This praise of the monkeys will not be said to be of the Golden Age. It is because the rule of Lakshmi and Narayan was in the Golden Age. The name itself is Satyanarayan (true Narayan). So, definitely the human beings of the present time will be called false. They belong to the false land.

Definitely the human beings, each other; you have received the vision (drishti) of knowledge, you have received the vision of the third eye, haven’t you? So, you can know very well. Although the face of the Brahmin has now changed. Yet, you see that rightly it is the face of a Brahmin; that of the human beings is also that of the Brahmins only. Human beings only become Brahmins. And the same character. Then where did they come from? It is like that of monkeys. However, the character of monkeys is visible, isn’t it? It is because they have a stone-like intellect. They have stone-like intellect means that howevermuch you narrate, howevermuch you explain, they do not reform at all. Second page of the morning class dated 21.11.1967. Howevermuch it is sung that the intellect of this person is such that even if God comes, nobody cannot reform the intellect of this person; He cannot even explain. Now God has come, hasn’t He? However, look, it doesn’t reform, does it? So, look, they are right that they have been telling that even if God comes, they cannot change from monkeys to worthy of being worshipped in the temples. God, God and rightly it happens that they rightly do not become. They do not become worthy of temples at all. Why? It is because they do not develop love for God at all, just as God wants. What does He want? Remember Me alone. Love Me. Well, why doesn’t the love emerge? It is because you have become adulterous since many births. Look, it has been written in a very clear manner. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2857, दिनांक 21.04.2019
VCD 2857, dated 21.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2857-Bilingual-Part-2

समय- 26.01-47.34
Time- 26.01-47.34


तुम बच्चे समझते हो अच्छी तरह से कि इतने ढेर के ढेर हैं जिनकी विनाश काले विपरीत बुद्धि हुई पड़ी है। विपरीत बुद्धि हैं तो कोई भी बाप को नहीं जानते हैं। तो रिजल्ट क्या होता है? हँ? विपरीत बुद्धि विनश्यते। विनश्यते? माना? क्या मर जाते हैं? देह से मर जाते हैं? हँ? नहीं। क्या? हाँ, बाप मिला और विपरीत बुद्धि बने तो पद क्या बनेगा? पद खलास हो जाता है। विनाश हो जाता है। तो देखो फिर रिजल्ट क्या होगा? हँ? फिर अभी उसको कयामत का समय भी कहा जाता है। हँ? कयामत नाम क्यों दिया? हँ? एक तो होती है मनुष्य की मत। एक होती है भगवान की मत। और एक फिर होती है कयामत। हँ? लोग कयामत में वायरे हो जाएंगे। हँ? क्योंकि जब भगवान आते हैं तो ढेर के ढेर भगवान निकल पड़ते हैं। तो मुगालते में पड़ जाते हैं। अरे क्या मत है? हँ? श्रेष्ठ मत क्या है? तो कयामत-कयामत करते-करते खलास हो जाते हैं। अब हिसाब-किताब भी तो उनका खलास करना है ना। हँ? हिसाब-किताब कैसे खलास करेंगे? जन्म-जन्मांतर के हिसाब-किताब हैं पापों के। तो रिजल्ट क्या होता है? सजाएं भी तो काटनी है। और जितनी-जितनी जो सजाएं काटेंगे, क्या होगा उसका रिजल्ट? उतना-उतना उनका पद भ्रष्ट होता जाएगा। होना जरूर है। क्योंकि ये तो बादशाही स्थापन होती है। हँ? ऊँच ते ऊँच पद। बाप कहते हैं मैं तुम्हें विश्व की बादशाही देने आया हूं।

तो अब है तो सब पुरुषार्थ अनुसार, पढ़ाई के अनुसार। तो उन स्टूडेंट्स में वैरायटी पद हैं। जैसी-जैसी पढ़ाई जैसा-जैसा पुरुषार्थ वैसा-वैसा पद। जैसे अज्ञान काल में वैरायटी है ना। इस दुनिया में वैरायटी पद है ना। ऐसे ज्ञान काल में भी वैरायटी हैं। तो ये तो समझते हो ना कि बादशाही एक जैसी नहीं बन सकती। बादशाह भी एक जैसे बनेंगे क्या? नहीं। महाराजा, कोई राजा, कोई छोटे, कोई बड़े। कोई की थोड़े समय की रजाई। कोई की लंबे समय की रजाई।

तो बाप बैठकर के समझाते हैं। हर एक बात समझाते हैं। बच्चे, पुरुषार्थ करके, हँ, अब तुम कितना भी पुरुषार्थ करो लेकिन पुरुषार्थ करके सभी को तुम फूल नहीं बनाए सकते हो वास्तव में। नहीं। क्योंकि जो बनते हैं सो ही यहां आते हैं सतयुग में। जो नहीं बनते या जो, जो फिर यहां आते ही नहीं हैं या आकरके चले जाते हैं, सुनते ही कुछ नहीं है। बुद्धि में जैसे कुछ बैठता ही नहीं। तो वह तो फिर आएंगे भी नहीं। अब तुम्हारे पास सब तो नहीं आएंगे। ना। हँ? क्योंकि इस दुनिया में और सब धर्म वाले देवता तो नहीं है ना सभी। वो तो अपने-अपने धर्म के हैं। देवता धर्म के तो हैं नहीं। क्योंकि बच्चों को समझाया गया है कि बहुत हैं जो ज्ञान मार्ग में ठहरते ही नहीं। वहां भक्ति मार्ग में भी तो आते हैं ना ढाई हजार साल भक्ति मार्ग, ढाई हजार साल ज्ञान मार्ग। ज्ञान मार्ग की प्रारब्ध ढाई हजार साल सतयुग, त्रेता। और भगत हैं, बुद्धि इधर भागती है, उधर भागती है, यहां टिकती, वहां टिकती। परमानेंट कहीं टिकते ही नहीं। तो भक्ति माना भागना-करना। वो भक्ति फिर ढाई हजार साल चलती है।

तो जो भक्ति मार्ग में क्योंकि शुरू भक्ति मार्ग होती है तो ज्ञान मार्ग के जो भी जिज्ञासु जो आकरके ज्ञान लेते हैं, थोड़ा भी लेते हैं, बड़ा भी लेते हैं। जैसे पढ़ाई होती है। कुछ भी नहीं पढते हैं कोई। समझा ना? और कोई तो बिल्कुल थोड़ा पढ़ते हैं। तो वहां कोई को कह दियो अलफ कहो, बे कहो या आओ, हम तुम्हें बताएं कहो। तो लोग यहां पढेंगे। और कोई देखो तो आईसीएस भी पढ़ते हैं। हँ? ऊंची-ऊंची पढ़ाई पढ़ते हैं तो ऊंचा-ऊंचा पद पाते हैं। अब यहां भी देख लियो। बाबा ने समझाया था ना, जब गए थे यहां वो जहां पांच पति करती हैं। हँ? कहां? हँ? देहरादून की तरफ कोई गांव है चकराता। तो सभी ने कहा - हां चकराता। चकराता? ये नाम क्यों रखा गांव का? बुद्धि चकराती है तो एक छोड़ दूसरा, दूसरा छोड़ तीसरा, चौथा, पांचवा। तो वहां तो वो मास्टरनी टीचर पढ़ करके फिर पढ़ाते थे तो बोलते थे बात मत पूछो बच्चों को बिठाया जाता है स्कूल में। तो वो फिर बैठते ही नहीं है। उनको वहां बैठने में सुख ही नहीं आता है। फिर उनसे पूछा तो बोला, अरे, हम तो घास काटने वाले हैं। हमको तो घास काटना पसंद आता है। हम ये तुम्हारी गिटपिट-गिटपिट, ए-बी-सी-ड, अलफ और बे, हमको ये अच्छी नहीं लगती है। हम अपना पेट का प्रबंध पहले करें ना। तो वो तो पढ़ते ही नहीं हैं। हँ?

तो विचार करो कि वो तो नहीं पढते हैं। फिर अगर पढ़ेंगे तो क्या पढ़ेंगे? ये भी समझ की बात हुई ना। क्या पढ़ते हैं और क्या फिर मनुष्य कितना बड़ा इम्तेहान जाकरके पढ़ते हैं। फर्क तो है ना। फर्क रहेगा पढ़ाई का। तो ये तो है ऐसा है बरोबर कि धंधे-धोरी में मनुष्यों को लाखों-करोड़ों रुपए आ जाते हैं। पढ़ाई वाले को इतना नहीं आ सकता है। व्यापार में और नौकरी में फर्क तो होता है ना। कोई-कोई तो नौकरी में भी बहुत बड़े बन जाते हैं। है ना? बाबा ने नहीं समझाया था? वो ही डॉक्टर कोई लाख रुपया महीने में कमाए लेंगे। कोई एक केस का भी लाखों कमाए लेते हैं। देखो, अब कोई साहूकार होते हैं, बहुत साहूकार। क्योंकि अभी तो पिछाड़ी आ गई है। परंतु ये ख्याल करो जब जिसने ये बनाया होगा सोमनाथ का मंदिर और वो होगा। वो तो भक्ति मार्ग में आ गए ना, तब बनाया जब वाम मार्ग में आ गए। तो उनमें धनवान भी तो बहुत होगा ना जिसने सोमनाथ मंदिर बनाया होगा। तो धनवान जब भी होते हैं, वाम मार्ग में आते हैं, तब ही आते हैं जब विकार में जाते हैं। और विकार में जाते हैं तो बीमारियां भी आ जाती हैं। हँ? कुछ ना कुछ बीमारियां जरूर आ जाती हैं।

तो वो बड़े-बड़े साहूकार होंगे। तो वो क्या देते हैं? हँ? बहुत देते होंगे ना बच्ची। उस समय में पैसे तो बहुत थे। जब वाम मार्ग में गए ना शुरू में उस समय में भी सोने के सिक्के चलते थे। तो धनवान थे ना। अरे, अभी तो ये देखो ठिक्कर-भित्तर सिक्के बनते रहते हैं। कागज के बनते रहते हैं। ये तो अभी हो सकते हैं। हां। चमड़े के भी पैसे बन जावें। कोई नियम तो नहीं है ना। जब ये टीन का बना है, एलुमिनियम का या फलाने का बना है। देखो, ये एलुमिनियम के भी सिक्के बने। तो ये वजन के भी हल्के होते हैं। तो इनसे भी कोई और नीचे चले जाएंगे। हँ? लोहे का भी नहीं। हँ? मिट्टी मिला हुआ लोहे का बनाएंगे। तो फर्क बाबा समझाते हैं कि तुम जो पढ़ते हो, हँ, तो कितना तुमको नशा चढ़ना चाहिए।

21.11.1967 के प्रातः क्लास का तीसरा पेज। अगर अपने उसमें दुकान घर में भी तो ऐसे फूल का गुलदस्ता नहीं रखते हैं ना। तो बड़े आदमी होते हैं तो बहुत अच्छे-अच्छे फूलों के गुलदस्ते रखते हैं। कोई तो उसमें सब मिक्सचर करके रखते जाते हैं। पत्ते भी, धूरछाई सब। तो वो भी तो एक नमूना होता है ना। तो कोई तो ये धूलछाई बनाएंगे ना। उसमें टालियां-वालियां, कचड़ा-वचड़ा सब कुछ डाल देंगे। कोई आएगा तो नहीं। अब लीली तो लीली ही होंगे। ये होगा तो यही होंगे। एकदम ऐसे ही। और लिली का फूल देखा है? सिर्फ फूल ही फूल। तो अभी ज्ञान तो उनमें है नहीं कोई में भी। इसमें कोई में ज्ञान हो फिर तो ये गुलदस्ता कभी भी तुम लोगों का वो जो गुलदस्ता बनाओ तो ये तुम टांगर और ये, ये रतनज्योति, अक के फूल तुम डालेंगे? बिल्कुल नहीं डालेंगे। तुम डालेंगे ही नहीं। अगर ज्ञान होगा तो नहीं डालेंगे। तो ऐसे हैं तुम्हारे में जिनमें ज्ञान ही नहीं है। वो क्या करेंगे? वो तो फिर कुछ भी डाल सकते हैं। बाकी जिनमें ज्ञान होगा वो क्या करेगा? लिली का फूल ले आएंगे। भल रखा रहे। 15-20 रोज रखा रहे। खुशबुएं उनकी चलती रहेंगी क्योंकि मुखड़ियां होती हैं ना। वो मुखड़ियां फिर पीछे-पीछे खुलती जाती हैं और खुशबू फैलती जाती है। खुलती जाती हैं खुशबू निकलती जाती है। तो जो फूल होंगे ना तुम्हारे में भी उनको फूलों का शौक होगा। खुद ही फूल नहीं होंगे, कांटे होंगे, तो क्या करेंगे? क्योंकि देखने के लिए कि हम, हम फूल बनेंगे। एक तो वहां देखेंगे। दूसरा फूलों को देखेंगे। बाबा नहीं कहते हैं। मैं कभी-कभी यहां देख करके फिर जाता हूं बगीचे में देखने के लिए कि देखो हमारे पास भी ऐसे हैं। देखो, ये टीचर है, ये रतनज्योत है। और ये तो कांटे वाला है। जरा भी फूल की खुशबू नहीं है। हँ? खुशबू नहीं है पर बांस है। तो बांस भी आती होगी। बदबू आती होगी ना। अभी बांस कोई तो नहीं है। परंतु ये तो अज्ञान की बदबू है।

तो वो तो तुम समझते हो ना बच्चे कि बरोबर यहां फूलों का बगीचा तो बन ही जाता है। इसमें तो कोई शक नहीं है। पर तुम जानते हो सतयुग में सब ऐसे फूल होते हैं क्या? वो जो गाया जाता है ना कि जो यहां से फारकती दे देते हैं तो वो चांडाल का जन्म लेते हैं। छोड़ करके चले जाते हैं। क्यों चांडाल का जन्म लेते? हँ? कि पहले बने, पहले दिया तन-मन-धन। फिर वापस लेके चले गए। तो ये है जो देकरके फिर वापस लेते हैं तो चांडाल का जन्म मिलता है। तो फिर वो क्या होंगे? हँ? कहां देखो वो बड़े-बड़े आदमी और कहां वो शमशान में चांडाल। समझा ना? इसलिए तुमने देखा होगा कि बड़े आदमियों का शाही शमशान अलग ही बनाते हैं। जैसे यहां है ऐसे फर्क तो वहां भी होगा ना। ऐसे तो नहीं है फिर सभी कोई ऐसे फूल बन जाएंगे। नहीं। फर्क तो जरूर रहता है। ओम शांति। (समाप्त)

You children understand nicely that there are numerous people whose intellect has turned opposite at the time of destruction. When they have an opposite intellect, none of them know the Father. So, what is the result? Hm? Vipreetbuddhi vinashyate (people with intellect opposite to God get destroyed). Get destroyed? What does it mean? Do they die? Do they die physically? Hm? No. What? Yes, if you found the Father and if your intellect turns opposite to Him, then what post will you achieve? The post is finished. It is destroyed. So, look, then what will be the result? Hm? Then now it is called the time of destruction (kayaamat) also. Hm? Why was the name kayaamat given? Hm? One is the opinion (mat) of the human beings. One is the opinion of God. And one then is Kayaamat. Hm? People will become mad in kayaamat. Hm? It is because when God comes, then numerous Gods emerge. So, they get confused. Arey, what (kya) is the opinion (mat)? Hm? What is the righteous opinion? So, they get finished while doing kayamat, kayamat. Well, their karmic account also has to be finished, isn’t it? Hm? How will the karmic account be finished? There are karmic accounts of sins of many births. So, what is the result? Their post will continue to be destroyed to the same extent. It is definitely going to happen. It is because this is an emperorship that is going to be established. Hm? The highest on high post. The Father says that I have come to give you the emperorship of the world.

So, well, everything is as per the purusharth, as per the studies. So, there are variety posts among those students. As is the level of studies, as is the level of purusharth, so is the post. For example, there is variety in the period of ignorance (in the outside world), isn’t it? There are variety posts in this world, aren’t there? Similarly there is variety in the period of knowledge also. So, you understand that the emperorship cannot be achieved equally. Will you become equal emperors? No. Some become Maharaja, some become Raja, some small ones, some big ones. Some rule for a short period. Some rule for a long period.

So, the Father sits and explains. He explains each and every topic. Children, by making purusharth, hm, well, howevermuch purusharth you make, but by making purusharth, you cannot make everyone a flower in reality. No. It is because only those who become [flowers] come here in the Golden Age. Those who do not become or those, those who don’t come here at all or come and go, do not listen anything. It is as if nothing sits in their intellect at all. So, they will not even come. Well, all will not come to you. No. Hm? It is because in this world the people belonging to other religions are not deities; are they? They belong to their individual religions. They do not belong to the deity religion. It is because children have been explained that there are many who do not stay on the path of knowledge at all. They also come there on the path of Bhakti also, don’t they? The path of Bhakti for 2500 years; the path of knowledge for 2500 years. The fruits of the path of knowledge for 2500 years in the Golden Age and the Silver Age. And there are devotees (Bhagat) whose intellect runs here, runs there; it becomes stable here, it becomes stable there. They do not become stable permanently anywhere at all. So, Bhakti means running around. That Bhakti then continues for 2500 years.

So, those on the path of Bhakti because when the path of Bhakti begins, then all the students of the path of knowledge who come and obtain knowledge, they may obtain a little, they may obtain more as well. For example, there is education. Some don’t study anything. You understood, didn’t you? And some study very little. So, if you tell anyone there that say Alaf, say Be or come, we will tell you. So, people will study here. And look, some study even ICS. Hm? When they study higher education, then they achieve high posts. Well, look here as well. Baba had explained, hadn’t He? When we had gone here, to the place where women have five husbands. Hm? Where? Hm? There is a village called Chakrata near Dehradun. So, everyone said – Yes, Chakrata. Chakrata? Why was the village given this name? When the intellect wonders (chakrati), then it leaves one to have the second, leaves second for the third, fourth, fifth. So, there the Masterni, the Teacher used to read out and then teach; so, they used to say, just do not ask; children are made to sit in the school. So, they do not sit at all. They do not feel happy sitting there at all. Then, when they were asked, they said, arey, we are grass-cutters. We like cutting grass. We do not like your gitpit-gitpit, ABCD, Alaf and Be. We will make arrangements to fill our stomach first, will we not? So, they do not study at all. Hm?

So, just think that they do not study. Then, if they study, what will they study? This is also a topic to be understood, isn’t it? What do they study and then what do human beings go and study for such a big examination. There is a difference, isn’t it? There will be a difference of education. So, it is right that people earn lakhs and crores of rupees in business. Those who study cannot earn that much. There is a difference in business and job, isn’t it? Some grow very big in job as well. Is it not? Hadn’t Baba explained? The same doctor earns lakh rupees in a month. Some earn lakhs in one case itself. Look, well, some are rich, very rich. It is because now it is the end. But just think that when someone had built this temple of Somnath and it must be there. They entered the path of Bhakti, didn’t they? Then they built that when they entered the leftist path. So, the one who built the temple of Somnath must have been very prosperous as well. So, when someone is prosperous and when they enter the leftist path, they enter it only when they indulge in lust. And when they indulge in lust, then the diseases also emerge. Hm? Some or the other diseases definitely emerge.

So, they must be big prosperous persons. So, what do they give? Hm? They must be giving a lot, don’t they daughter? At that time there was a lot of wealth. When they entered the leftist path in the beginning, at that time, gold coins were in vogue. So, they were prosperous, weren’t they? Arey, now look, these coins of clay and stone are produced. Those of paper are produced. This can be possible now. Yes. It may be possible that they produce coins of leather also. There is no rule, isn’t it? When this has been made of tin, of aluminium or of such and such thing. Look, these coins of aluminium were also produced. So, they are light weight as well. So, they may go to a lower level. Hm? Not even of iron. Hm? They may produce with iron mixed with clay. So, Baba explains the difference that whatever you study, you should feel so intoxicated.

Third page of the morning class dated 21.11.1967. We don’t keep such bouquet of flowers at shop, home also, do we? So, big people keep bouquets of very nice flowers. Some keep a mixture in it. They add leaves, etc. everything. So, that is also a sample, isn’t it? So, some make it a dhoolchaai, don’t they? They put everything like branches, wastage, etc. Nobody will come. Well, if it’s Lily, there will be lilies only. If there is this thing, then there will be these things only. Completely like this only. And have you seen the Lily flower? Only flowers. So, well, there is no knowledge in any of them. If in this one, if there is knowledge in someone, then this bouquet of you people, if you prepare a bouquet, then will you put Taangar, and this, this flower of Ratanjyoti, Ak? You will not put at all. You will not at all put. If you have knowledge you will not put. So, there are such ones among you who don’t have knowledge at all. What will they do? They can then add anything. But what will the one who has knowledge do? He will bring Lily flower. It can be kept. It can be kept for 15-20 days. It will continue to emanate fragrance because they are buds, aren’t they? Those buds keep on opening later on and the fragrance keeps on spreading. It goes on opening and the fragrance keeps on emerging. So, those who are flowers among you also will have a liking for flowers. If they themselves are not flowers, if they are thorns, then what will they do? It is because in order to see that we, we will become flowers. On the one hand we will see there. And on the other hand we will see the flowers. Baba doesn’t say. I sometimes see here and then go to the garden to see that look, we too have such ones. Look, this teacher is a Ratanjyot. And this one has thorns. There is no fragrance of flower at all. Hm? There isn’t fragrance, but there is bad odour. So, you must be getting bad odour also. You must be getting bad odour, don’t you? Now there is no bad odour. But it is the bad odour of ignorance.

So, you understand children, don’t you that rightly here the garden of flowers is definitely formed. There is no doubt in it. But you know that is everyone such flower in the Golden Age? It is praised that those who give faarkati (cutting of relationship with Father) here get the birth of Chaandaal (those who help in the cremation of dead bodies). They leave and go. Why do they get the birth of Chaandaal? Hm? First they became, first they gave body, mind and wealth. Then they took it back and went away. So, those who give and take it back get the birth of a Chaandaal. So, then what will they be? Hm? On the one hand look, those big personalities and on the other hand the Chandaals in the cremation grounds. You understood, didn’t you? This is why you must have seen that the royal cremation ground of big personalities is built separately. Just as it exists here, there will be a difference there as well, will it not be there? It is not as if everyone will become such flowers. No. The difference definitely exists. Om Shanti. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2858, दिनांक 22.04.2019
VCD 2858, dated 22.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2858-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.18
Time- 00.01-18.18


प्रातः क्लास चल रहा था 21.11.1967. मंगलवार को तीसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि जो फारकती देते हैं उनको चांडाल का जनम मिलता है। छोड़ करके चले जाते हैं तो फिर वो क्या बनेंगे? हँ? राजकुल में रहेंगे? राजकुल के भांती कहे जाएंगे जो राजयोग सीखते हैं? कितने सीखते हैं राजयोग वास्तव में? और सीख करके पद पाते हैं। कितने हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हां, 16108. तो उनमें से ढेर के ढेर छोड़ कर के चले जाते हैं। तो बताया कहां देखो वो बड़े-बड़े आदमी। हँ? राजा, महाराजा, महामंत्री, सेनापति। और कहां वो शमशान में चांडाल। इसलिए बड़े आदमियों का शमशान ही अलग बनाते हैं। हँ? वो भक्ति मार्ग में शिवबाबा को कहां का वासी दिखाते हैं? हँ? कहां का वासी? हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) कैलाशीवासी? कैलाश में शमशान नहीं है? वहां तो बहुत बड़ा शमशान है। बहुत जाते हैं काशी की यात्रा करने के लिए। हां, कैलाश पर्वत पर भी बड़ा शमशान है। वाणारसी में भी है। तो उनका शमशान ही अलग। बहुत ऊंची स्टेज में बनाते हैं। क्या? शमशान माने? शांति का स्थान या अशांति का स्थान? शांति। तो तुम्हारा शांतिधाम अलग होता है कि सामान्य आत्माओं के शांतिधाम की तरह है? हँ? हां, अलग बनाते हैं।

जैसे यहां है ऐसे स्वर्ग तो वहां भी होगा ना। यहां तुम बच्चे क्या करेंगे? तुम अपना परमधाम अपनी सृष्टि पर उतार लेंगे। क्या? हां, स्पेशल घर बनाएंगे ना। तो ऐसे तो नहीं है सभी कोई ऐसे फूल बन जाएंगे। कैसे फूल? किंग फ्लावर। हँ? क्वीन फ्लावर। सब बन जाएंगे? नहीं। फर्क तो रहता है जरूर। हाँ। भले फूल रहे होते हैं वहां। पर तो भी फर्क तो जरूर रहेंगे ना वहाँ। जैसे यहां फ़र्क, वैसे वहां फर्क। सिर्फ ये ज़रूर है कि वहां दुख नहीं होता है। लेश मात्र भी दुख नहीं। और रावण राज्य में दुख बहुत बढ़ता जाता है और सुख? क्षणभंगुर होता जाता है। ये अंतर है। बाकी ऐसे नहीं है कि वहां सब महाराजाएं बन जाएंगे, राजाएं बन जाएंगे। हँ? कोई प्रजा वर्ग में होगा ही नहीं। नहीं। प्रजा भी चार प्रकार की। फर्स्ट क्लास, सेकंड क्लास, थर्ड क्लास और फोर्थ क्लास। तो बस बात ही थोड़ी है, हँ, कि रावण का राज्य में तो कोई सुख नहीं। काग विष्टा समान सुख कहा जाता है। बाकी सब कुछ सुख है कहां? कहेंगे नई दुनिया में जो बाप आकर स्थापन करते हैं।

तो बाप कहते हैं तुम बच्चों को। क्या? तुम बच्चों को माने? इन बच्चों को नहीं जो बाजू में बैठे हैं ब्रह्मा बाबा की तरह। या इनके फॉलोवर्स की तरह। नहीं। तुम बच्चे जो सन्मुख बैठकरके सुप्रीम टीचर से पढ़ाई पढ़ते हो। अम्मा से पढ़ते हो कि सुप्रीम टीचर से? हां, सुप्रीम टीचर से पढ़ाई पढ़ते हो। क्या अम्मा और सुप्रीम टीचर अलग-अलग हैं? हँ? हां, अम्माएं तो अनेक हो जाती हैं। भारत में खास ये मानते हैं कि एक स्त्री गई तो दूसरी जूती, तीसरी ली, चौथी जूती ले लो। तो अम्माएं तो अनेक हो सकती हैं लेकिन बाप तो एक ही है। और एक ही बाप की जो फर्स्ट क्लास अम्मा होगी, हँ, जिसको वो अपने सारे जीवन का तंत्, सार अर्पण कर देता है। कौन? कौन? हां, पति अर्पण करता है ना माताओं को। अपना जो देह का, अपनी आत्मा का, मन-बुद्धि का जो सार है। क्या है? हां, सार है ना, मक्खन है, वो अर्पण कर देता है, सौंप देता है। तो सबसे पहले किसको सौंपता है? पहली माता को, दूसरी को, तीसरी को, चौथी, पांचवी को? किसको सौंपता है? हां, कहेंगे जिस पहली माता को सौंपता है वो है परम ब्रह्म। छोटा-मोटा ब्रह्मा नहीं। क्या? परम ब्रह्म। फिर ब्रह्मा क्यों नहीं कहते? परम ब्रह्मा। परम ब्रह्म क्यों कह दिया? अरे, फिर भी तो चोला तो पुरुष का है ना। स्वभाव-संस्कार से पलटने की बात है। माता के रूप में सहनशक्ति धारण करने की बात है। तो माता के रूप में सहनशक्ति धारण कर ली। माने परम ब्रह्मलोक तैयार हो गया। लोक है ना। अरे, जो भी बच्चे जन्म लेते हैं दुनिया में वो मां से ही जन्म लेते हैं ना। तो उनका मूल रूप में घर कौन सा हुआ? हँ? अम्मा हुई कि नहीं? हाँ। तो लोक हुआ ना। हाँ। वो ही उनका संसार है शुरू-शुरू का। कि कोई दूसरा संसार है? आत्मा जब गर्भ में आती है तो वो ही उसका संसार है ना।

तो बताया, हां, तो फर्क जरूर होता है। नई दुनिया में दुख नहीं होता है। तो ऐसे ही जो माता नाम धारिणी हैं जिन्हें ब्रह्मा कहा जाता है, पांच मुखों वाला ब्रह्मा, पंचमुखी, चतुर्मुखी ब्रह्मा। तो मुख नंबरवार होंगे कि एक जैसे होंगे? नंबरवार। तो बताया कि जो अव्वल नंबर मुख है वो कौन सा है? अव्वल नंबर उर्ध्वमुखी मुख, परमब्रह्म। तो बताया उस परम ब्रह्म लोक में शांति ही शांति। और जो अकूट शांति का अनुभव करने वाली आत्माएं होंगी तो वो अकूट सुख का अनुभव करेंगी या नहीं करेंगी? करेंगे। तो बस बताया कि नई दुनिया में एकदम नई दुनिया में। कौनसी? विष्णु लोक। क्या कहते हैं? वैकुंठ। अतींद्रिय सुख वाली दुनिया। हँ? उस दुनिया में सुख ही सुख। सौ परसेंट सुख। किसको? देह को? हँ?कि मन-बुद्धि रूपी आत्मा को? मन-बुद्धि सुखी है तो देह भी सुखी। और मन-बुद्धि दुखी तो देह भी दुखी ही कही जाएगी। सुख में कैसे रह सकती है?

तो बताया कि जो दुनियावी लोगों का, जो नीचे कैटेगरी के हैं उनका श्मशान घाट अलग होता है। हँ? और रावण राज्य का नाम है तो जरूर। बस, बाकी थोड़ी कि रावण का राज्य। बाकी सब कुछ है। तो बाप कहते हैं तुम बच्चों को। क्या? और बच्चों को नहीं कहते हैं। न इनको बाजू वालों को। बताया ना न ब्रह्मा को, न ब्रह्मा दादा लेखराज को; चतुर्मुखी ब्रह्मा ना। हां। और न दुनिया वालों को। दुनिया वाले भी तो बच्चे आत्मा के; आत्मा रूप में हैं तो बच्चे हैं कि नहीं फिर बाप के? नहीं हैं? हैं। तो ये तो अभी बच्चों ने एक दे दिया। हँ? तो बाबा खुश हुआ। तुम तो ये नहीं तो ये जाकर के अच्छा, आज इनके, इसके ऊपर इन बच्चों को समझाते हैं। हां। वास्तव में तुम यहां आए हो। यहां आए हो क्या बनने के लिए? तुम यहां आए हो ये बनने के लिए। हँ? क्या बनने के लिए? आए तो हो ये माने आदि लक्ष्मी आदि नारायण बनने के लिए। समझा ना? कांटे से, हँ, बिल्कुल कांटे से बिल्कुल बड़ा फूल। हँ? पुरुष चोले में तो किंग फ्लावर। स्त्री चोले में तो क्वीन फ्लावर। गुलाब का फूल कहा जाता है ना। रूहे गुलाब। हाँ। वो भी भारतीय। ऐसे नहीं विदेशी। देखने का चमक-दमक। हां। दिखावा बहुत बढ़िया। आंखें एकदम चली जाती हैं लाल-लाल उसी तरफ, दिखावे की तरफ। सारी दुनिया जाती है। नहीं। दिखावा कम और खुशबू? खुशबू भारतीय फूल में, गुलाब में, रूहानी गुलाब में बहुत ज्यादा। समझे ना? हां।

तो तुम समझ गए कि तुम यहां फूल बनने के लिए आए। कांटे थे, जो बिल्कुल कांटे थे दुखदाई, उससे फूल बनाने के लिए आए। तुम लोगों ने कांटा देखा है? छोटा या बड़ा वाला कांटा देखा है? हाँ। मुंबई वालों ने तो जरूर देखा होगा। वहां तो यादगार है। क्या? कोई यादगार है मुंबई में? हँ? बड़े से बड़े कांटे वाले की यादगार है। बबूलनाथ का मंदिर है। सबसे बड़ा कांटा कौनसे पेड़ का होता है? बबूल का कांटा। हाँ। तो तुम लोगों ने देखा है? ऐसे बहुत है यहां बच्चियां जिन्होंने कांटा भी नहीं देखा है। क्या? हां, यहां ऐसी बच्चियां बहुत हैं। कौन सी माला की होंगी? हँ? कौन सी माला की? 16000 की माला की होंगी, हँ, या जो 500-700 करोड़ की रूद्र माला है उसकी होंगी या रूद्र माला की होंगी? कौन सी होंगी? हां, विजय माला की, वो भी राइट साइड की। हां, लेफ्ट साइड की नहीं। हां। बहुत हैं यहां बच्चियां जिन्होंने कांटा कभी नहीं देखा है। क्या? कभी माने? इस सृष्टि में चारों युगों में कभी नहीं देखा? हाँ, चारों युगों में उन्होंने कांटा कभी देखा ही नहीं। तो बिचारियों को कांटे का क्या अनुभव? कांटा माने? दुखदाई। दुख काहे से होता है? हँ? कोई हिंसा करता है तो दुख होता है। हँ? अहिंसक होगा तो दुख देगा?
(किसी ने कुछ कहा।) हां।

तो बताया कांटा ऐसे वो दो होते हैं कांटे वो। समझा ना? 1-2 को कांटा लगाते हैं तो दो चाहिए ना। क्या? हँ? ऐसे नहीं कि पुरुष ही कांटा लगाते हैं। क्या? हँ? पुरुष; मान लो कन्या है, उसको कांटा लगाया। तो शुरुआत में तो उसको दुख होगा। लेकिन जब आदी हो जाएगी तो? ये खुजली होती है ना। तो खुजली का कोई आदी हो जाता है, उसकी खुजली ठीक नहीं होती है, तो खुजलाने में मजा आता है कि नहीं? हां, बहुत मजा। तो वो नाम रख दिया है। जैसे जिस्म को सुख देने की ताकत देने वाली चीज होती है। क्या होती है? वह रोज क्या खाते हो? अरे क्या खाते हो? अरे, कुछ भी पता नहीं। अरे, कुछ खाते हो रोज कि नहीं? क्या खाते हो? रोज खाते हो। क्या खाते हो? हँ? रोटी। क्या नाम रखा? पहले रो ओ, फिर टी की तरह पी ली। पहले तो रोती है। फिर बाद में? बाद में तो अभ्यासी हो जाती है। तो फिर चस्का लग जाता है। चाय पीने वालों को, शराब पीने वालों को चस्का लग जाता है ना। तो बिना शराब के, आहा, रह ही नहीं सकते। रह सकते हैं? नहीं, नहीं।

तो देखो वो दोनों कांटे बन पड़ते हैं। कांटा लगाने वाला पुरुष दुर्योधन-दुशासन भी; सब पुरुष इस दुनिया में दुर्योधन दुशासन हैं ना। कांटा लगाने वाले हैं कि नहीं? हाँ। काम का कांटा तो सब लगाते हैं। कोई ऐसा है जो काम का कांटा कभी ना लगाता हो? है कोई इस दुनिया में? इस दुनिया में? कलियुगी दुनिया में? वो कलियुगी दुनिया में जो ऊपर से आता है उसके तो कांटे की बात ही नहीं। वो तो देह ही नहीं है उसको। हां। उसकी तो बात नहीं है। तो बताया जो भी इस दुनिया में पुरुष मात्र हैं वो तो सब कांटे हैं ही। लेकिन जिसको कांटा लगाते हैं उसको भी आप समान संग के रंग से हां कांटा ही बना देते हैं। तो दो चाहिए ना। क्या? कांटा लगाने वाला भी चाहिए, हँ, और शुरु-शुरु में कांटा सहन करने वाला भी चाहिए। फिर बाद में वो भी काँटा। वो और बड़ा कांटा।

A morning class dated 21.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the third page on Tuesday was that those who give faarkati (end of relationship between Father and son) get the birth of a Chaandaal (those who help in the task of cremation). What will those who leave and go become? Hm? Will they remain in the royal clan? Will they be called members of the royal clan who learn RajYoga? How many learn RajYoga in reality? And they learn it and achieve the post. How many?
(Someone said something.) Yes, 16108. So, many among them leave and go. So, it was told – look, on the one hand are those big personalities. Hm? Raja (king), Maharaja (emperor), Mahamantri (prime minister), Senapati (commander of the army). And on the other hand are those Chaandaals of the cremation grounds (shamshaan). This is why the cremation grounds of the big personalities are built separately. Hm? ShivBaba is shown to be the resident of which place on the path of Bhakti? Hm? He is a resident of which place? Arey? (Someone said something.) Resident of Kailash? Isn’t there any cremation ground in Kailash? There is a very big cremation ground there. Many go to perform the pilgrimage of Kaashi. Yes, there is a big cremation ground on the Mount Kailash also. It is in Varanasi also. So, their cremation ground itself is separate. They build it on a very high stage. What? What is meant by shamshaan? A place of peace (shaanti) or a place of disturbance (ashaanti)? Peace. So, is your abode of peace separate or is it like the abode of peace of ordinary souls? Hm? Yes, it is built separately.

Just as it exists here, it will exist there in the heaven also, will it not? What will you children do here? You will bring your Supreme Abode down to your world. What? Yes, you will build a special home, will you not? So, it is not as if everyone will become flowers like this. What kind of a flower? King flower. Hm? Queen flower. Will everyone become? No. There is definitely a difference. Yes. Although you are a flower there, yet there will definitely be a difference there, will it not be there? Just as there is a difference here, there is a difference there. The only difference is that there is no sorrow there. There is not even a trace of sorrows. And sorrow keeps on increasing a lot in the kingdom of Ravan; and happiness? It goes on becoming momentary. This is the difference. But it is not as if everyone will become Maharajas or Rajas there. Hm? There will not be anyone in the subjects’ category at all. No. The subjects are also of four kinds. First class, second class, third class and fourth class. So, the topic itself is small that there is no happiness in the kingdom of Ravan. It is called a pleasure like the excreta of the crow. But where is all the happiness? It will be said that it exists in the new world which the Father comes and establishes.

So, the Father tells you children. What? What is meant by ‘you children’? Not to ‘these children’ who are sitting beside [Him], like Brahma Baba. Or like his followers. No. You children who sit face to face and study the knowledge from the Supreme Teacher. Do you study from the mother or from the Supreme Teacher? Yes, you study from the Supreme Teacher. Are the mother and the Supreme Teacher different? Hm? Yes, mothers are many. Especially in India it is believed that if one wife departs (dies), then take a second shoe (wife), third one, fourth shoe. So, mothers can be many but the Father is only one. And the first class mother (wife) of the only Father, whom he dedicates the essence of his entire life; who? Who? Yes, the husband dedicates it to the mothers (wives), doesn’t he? The essence of his body, his soul, his mind and intellect. What is it? Yes, the essence is there, isn’t it? There is the cream; he dedicates, entrusts that. So, to whom does he entrust first of all? To the first mother, to the second one, to the third one, to the fourth one, to the fifth one? Whom does he entrust? Yes, it will be said that the first mother to whom he entrusts is Param Brahm. Not a small and sundry Brahma. What? Param Brahm. Then why doesn’t He say Brahma? Param Brahma. Why did He say – Param Brahm? Arey, however the body is of a male, isn’t it? It is about transforming the nature and sanskaars. It is about inculcating the power of tolerance in the form of a mother. So, he inculcated the power of tolerance in the form of a mother. It means that the abode of Param Brahm got ready. It is an abode, isn’t it? Arey, all the children who get birth in the world get birth from a mother only, don’t they? So, which is their home in the original form? Hm? Is it the mother or not? Yes. So, it is the abode, isn’t it? Yes. That itself is their world in the very beginning. Or is there any other world? When the soul enters into the womb, then that itself is its world, isn’t it?

So, it was told, yes, there is definitely a difference. There is no sorrow in the new world. So, similarly, the holders of the name of mother, who are called Brahma, the five-headed Brahma, the five-headed, the four-headed Brahma. So, will the heads be numberwise or alike? Numberwise. So, it was told that which is the number one head? Number one is the upward facing head (oordhwamukhi mukh), Parambrahm. So, it was told that there is just peace in that abode of Parambrahm. And will the souls that experience inexhaustible peace experience inexhaustible happiness or not? They will. So, that is it; it was told that in the new world, in the completely new world. Which one? The abode of Vishnu. What do you call it? Vaikunth. A world of super sensuous joy. Hm? There is just happiness in that world. Hundred percent happiness. For whom? For the body? Hm? Or for the mind and intellect like soul? If the mind and intellect is happy, then the body is also happy. And if the mind and intellect is sorrowful, then the body is also said to be sorrowful only. How can it be in happiness?

So, it was told that the cremation ground of the worldly people belonging to the lower category is separate. Hm? And the name of the kingdom of Ravan is certain. That is it; as regards the kingdom of Ravan; everything else is there. So, the Father tells you children. What? He doesn’t tell other children. Neither these sitting beside. It was told, wasn’t it that neither Brahma, neither Brahma Dada Lekhraj; he is the four headed Brahma, isn’t he? Yes. And nor the people of the world. People of the world are also children in the form of soul; when they are in the form of a soul, are they children of the Father or not? Aren’t they? They are. So, now the children have given one. Hm? So, Baba felt happy. You, if not this, achcha, today I explain to these children on these, this. Yes. Actually, you have come here. What have you come to become here? You have come to become this. Hm? To become what? You have come to become this, i.e. Lakshmi-Narayan. You have understood, haven’t you? From a thorn, from a complete thorn to a completely big flower. Hm? King flower in the male body. Queen flower in a female body. It is called rose flower, isn’t it? Spiritual rose. Yes. That too Indian. It is not as if the foreign one. Shining in appearance. Yes. Very nice show-off. The eyes immediately turn that side, towards the red one, towards the show-off. The entire world goes. No. Less show-off and fragrance? There is a lot of fragrance in the Indian flower, in the rose, in the spiritual rose. You understood, didn’t you? Yes.

So, you have understood that you have come here to become flowers. You were thorns, which were completely givers of sorrows; from being that you have come to become flowers. Have you people seen a thorn? Have you seen a small or big thorn? Yes. Those from Mumbai must have definitely seen. There is a memorial there. What? Is there a memorial in Mumbai? Hm? There is a memorial of the one with the biggest thorn. There is a temple of Baboolnath. Which tree has the biggest thorn? The thorn of Babool. Yes. So, have you people seen? There are many daughters here who haven’t seen a thorn as well. What? Yes, there are many such daughters here. They belong to which rosary? Hm? Of which rosary? Will they be from the rosary of 16000 or will they be from the Rudramala of 500-700 crores or will they be from the Rudramala? Which one will they be? Yes, from the Vijaymala, that too from the right side. Yes, not of the left side. Yes. There are many daughters here who haven’t seen a thorn ever. What? What is meant by ‘ever’? Haven’t they seen at anytime in the four Ages in this world? Yes, they have never seen a thorn in the four Ages. So, how will the poor ladies have an experience of thorns? What is meant by a thorn? Giver of sorrows. How does one get sorrow? Hm? If someone indulges in violence, then you get sorrow. Hm? If he is non-violent will he give sorrows?
(Someone said something.) Yes.

So, it was told that those thorns are two. You understood, didn’t you? They prick each other with a thorn, so, two are required, aren’t they? What? Hm? It is not as if men alone prick with a thorn. What? Hm? Men; suppose there is a virgin; she was pricked with a thorn. So, in the beginning she will feel the pain. But when she becomes habituated? There is this itching (khujli), isn’t it? So, if someone becomes habituated to itching, if his itching is not cured, then does he feel happy in itching or not? Yes, a lot of joy. So, that name has been coined. For example, there is a thing to give pleasure, give strength to the body. What is it? What do you eat every day? Arey, what do you eat? Arey, you don’t know anything. Arey, do you eat something or not every day? What do you eat? You eat every day. What do you eat? Hm? Roti (Indian bread). What is the name assigned? First ro o (cry), then drink it like tea. First she cries (roti hai). Then later on? Later on, she becomes habituated. So, then one gets addicted. Those who drink tea, those who drink wine get addicted, don’t they? So, they cannot live without wine at all. Can they live? No, no.

So, look, both of them become thorns. The man, Duryodhan-Dushasan also, who pricks; all men in this world are Duryodhans and Dushasans, aren’t they? Do they prick with a thorn or not? Yes. All of them prick with the thorn of lust. Is there anyone who never pricks with a thorn of lust? Is there anyone in this world? In this world? In the Iron-Aged world? There is no question of thorn in case of the one who comes from above in the Iron-Aged world at all. He doesn’t have a body at all. Yes. It is not about Him. So, it was told that all the men in this world are thorns only. But those whom they prick with the thorn, they make them also equal to themselves through the colour of company, yes, they make them thorns only. So, two are required, aren’t they? What? The one who pricks with the thorn is also required and in the beginning the one who tolerates the thorn is also required. Then later she too becomes a thorn. She becomes a bigger thorn.
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Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2859, दिनांक 23.04.2019
VCD 2859, dated 23.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2859-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.40
Time- 00.01-14.40


प्रातः क्लास चल रहा था 21.11.1967. मंगलवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - ये जो सुदर्शन चक्र जो देवताओं को दिखाते हैं वो राइट बात है या रांग बात है? हँ? हां, देवताएं थोड़े ही वहां मनन-चिंतन-मंथन करके बैठते हैं? या मन चलाते हैं। मन से ही मनन-चिंतन होता है। मन के ऊपर तो उन्होंने जीत पा ली ना। हां। मन तो स्थिरियम हो गया ना आत्मा में। तो आत्मा को याद करते हैं। हँ? मनन-चिंतन-मंथन की बात ही नहीं। तो ये स्वदर्शन चक्र जो नाम है, बाबा कहते हैं जो भी नाम होते हैं काम के आधार पर होते हैं। स्व माने आत्मा। दर्शन माने आत्मा के 84 का चक्र का दर्शन। हँ? तो ये आत्मा के 84 चक्र का जो मन में मनन-चिंतन-मंथन किया जाता है वो ही तो सुदर्शन चक्र है। हँ?

ये सुदर्शन चक्र जो जास्ती घुमाएगा, जास्ती मनन-चिंतन-मंथन करेगा तो जिन लोगों के मुकाबले, जिन पुरुषार्थियों के मुकाबले जास्ती मनन-चिंतन-मंथन करेगा तो अपने पद को जल्दी पहचानेगा ना। जल्दी पहचानेगा। तो जब पहचानेगा तो वो प्रत्यक्ष भी करेगा कि नहीं? हँ? अपनी आत्मा का पद अपने आप ही प्रत्यक्ष करेगा ना। बाप क्या करता है? शिव बाप हैवनली गॉडफादर जब इस सृष्टि पर आते हैं तो क्या करते हैं? अपना परिचय अपने आप ही देते हैं कि कोई दूसरा देता है? तो फिर सारी दुनिया किसको फॉलो करेगी? हां, बाप को सारी दुनिया फालो करती है। तो ये ऐसे ही है। जो जितना मनन-चिंतन-मंथन करेगा और जिनके मुकाबले जास्ती करेगा तो उनके सामने अपना पद जो है वो डिक्लेअर करेगा। अब जिनके सामने पद डिक्लेअर हो गया और उनको पता चला ये हमसे ऊंचा है तो उनका अहंकार खत्म हो गया ना। हां। माथा झुकाएंगे कि नहीं झुकाएंगे? हां, झुकाएंगे। तो फिर माथा झुकाए दिया माना माथा कट गया। उनका देह भान क्या हुआ? खलास हो गया।

अब यही बात है जो विष्णु को दिखाया है। अब विष्णु को स्त्री-पुरुष के स्वभाव-संस्कार के मेल को विष्णु कहा जाता है। लेकिन उसमें भी तो नंबरवार होंगे कि एक जैसे होंगे? अरे नंबरवार। तो जो अव्वल नंबर विष्णु का पार्टधारी आत्मा है वो है आदि लक्ष्मी और आदि नारायण। तो उन्होंने स्वभाव-संस्कार को, अपने पार्ट को पहचान करके, जब से पहचान हुई तब से लेकर के अपने पुरुषार्थी जीवन में, एडवांस की पढ़ाई में और बेसिक में भी जब तक पढ़ते हैं तब तक ऊंच पद बुद्धि में बैठा हुआ है तो ऊंचा ही पार्ट बजाएंगे या नीचा पार्ट बजाएंगे? हां।

तो बताया चाहे लक्ष्मी, चाहे आदि लक्ष्मी हो, चाहे आदि नारायण हो, उनके अंदर तो वो स्वाभिमान रहेगा ना। हां। कि हम बाप के ऊंचे ते, ऊंचे ते ऊंचे बच्चे हैं। तो जब बेसिक ज्ञान से उठकर के आदि लक्ष्मी जिसे कहा जाता है एडवांस ज्ञान भी पकड़ती है तो जल्दी पकड़ेगी या देर में पकड़ेगी? क्यों? जल्दी क्यों पकड़ेगी? और क्यों देर में पकड़ेंगे? कारण? कुछ कारण होगा ना। क्या कारण? अरे? जानबूझ के कितनी देर लगाते हैं। एक अक्षर नहीं लिखा जाता।
(किसी ने कुछ कहा।) कारण पवित्रता। प लिखो तो भी समझ जाएंगे। हां। तो वो पवित्रता को पुरुषार्थी जीवन में बेसिक में रहते हुए भी, चंद्रवंश में रहते हुए भी; ठंडा होता है ना चंद्रमा, तो ठंडा दिमाग; हँ? गर्मी तो आती नहीं। अरे, गर्मी तो दुर्योधन-दुशासन पुरुषों को आती है कि कन्याओं-माताओं को आती है? नहीं। तो बताया वो ठंडा दिमाग होने के कारण अच्छी तरह से पवित्रता का पुरुषार्थ पालन करती है पुरुषार्थी जीवन में बेसिक में भी। और उसी पावर के आधार पर वो लास्ट में आती है एडवांस में और फिर फास्ट चली जाती है। कारण तो चाहिए ना। अरे, बाबा ने बोल दिया - लास्ट सो फास्ट। फास्ट सो फर्स्ट। अरे, क्यों भई? जो लास्ट में आएंगे वो सब फास्ट चले जाएंगे फर्स्ट आ जाएंगे? कुछ हिसाब-किताब होगा ना? तो क्या हिसाब किताब बताया? ये ही। हां, दुनिया के सारे काम पवित्रता की पावर से होते हैं। क्या? जो राजाओं को विजय भी मिलती है किस आधार पर मिलती है? जो उनकी राजधानी है ना। चैतन्य राजधानी या जड़ राजधानी? चैतन्य राजधानी। राजधानी माने राजाओं की धारणा शक्ति। हँ? जो सहयोगिनी शक्ति है ना तो वो पवित्रता का सहयोग देती है, हँ, तो उस पवित्रता के वाइब्रेशन से उनकी विजय हो जाती है। बताया।

तो ये स्वदर्शन चक्र हुआ। अपनी आत्मा के 84 के चक्र को पहचानने वाली बात है। तो जब देवता बन गए फिर तो ये मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार ही नहीं 84 जन्मों के बारे में। हँ? उनको तो देवताओं को तो ये भी दरकार नहीं कि आगे क्या जन्म होगा, आगे क्या होगा हमारी आत्मा का? उन्हें पहचान रहती है? कुछ भी नहीं। हाँ। वो तो जैसे बुद्धू। क्या? ये ज्ञान किनमें होता है? देवताओं में होता है या देवता बनने से पहले ब्राह्मण बनते हैं तब ज्ञान होता है? ब्राह्मण बनते हैं तो उनका काम ही है ज्ञान लेना और ज्ञान देना। और जितना ज्ञान देंगे दूसरों को उतना अपना मननचिंतन-मंथन ज्यादा चलेगा या कम चलेगा? हँ? अपना मनन-चिंतन-मंथन ज्यादा चलता है। जब मनन-चिंतन-मंथन ज्यादा चलता है तो क्या होता है? हँ? मनन-चिंतन-मंथन ज्यादा चलने से अपनी आत्मा का जो है, हां, अपनी आत्मा का पार्ट प्रत्यक्ष होता है।

तो बताया कि देवताओं को सतयुग, त्रेता में राम-कृष्ण की दुनिया में ये सुदर्शन चक्र देने की बात ही नहीं है। कहां की बात है? ये तो संगमयुग में कलियुग के अंत में सतयुग की आदि में जब पुरुषोत्तम संगम में बाप आते हैं सुप्रीम सोल गॉडफादर तब वो रास्ता बताते हैं कि बच्चे तुम अपन को आत्मा समझो और जितना आत्मा समझेंगे उतनी सूक्ष्म बनेंगे। आत्मा तो सूक्ष्म ज्योति बिंदु है ना। बिंदु तो चाहे जितना सूक्ष्म बनाए दो। मोटा गोल बिंदु भी बना दो और फिर सूक्ष्म करते-करते अति सूक्ष्म, इतना सूक्ष्म बनाय दो कि जैसे वो क्या होते हैं ना कि अणु होते हैं ना मलेरिया के तो वो आंखों से दिखाई पड़ते हैं? दिखाई भी नहीं पड़ते। अरे, वो तो फिर भी कीटाणु, प्राणी है। लेकिन जो अणु बम्ब बनाया जाता है उसमें जो अणु से भी अणु, अणु से भी अणु काट-काट के तैयार, वो तो कितना सूक्ष्म और उसमें कितनी पावर? सारी दुनिया को भस्म कर दे इतनी पावर होती है। तो वो भी तो स्थूल चीज है ना। और ये तो है आत्मा की बात। और आत्मा भी कोई स्थूल चीज नहीं। ज्योति है। प्रकाश का कण है। जैसे सूर्य की किरण होती है ना। ऐसे किरण है। हां।

तो बताया कि ये अति सूक्ष्म के ऊपर जितना कांसंट्रेशन मन का, बुद्धि का करेंगे तो बुद्धि सूक्ष्म बनेगी या भैंस बुद्धि बनेगी, हाथी की बुद्धि? नहीं। हाँ। सूक्ष्म बनेगी। और सूक्षम बुद्धि में मनन-चिंतन-मंथन ज्यादा चलेगा या कम चलेगा? ज्यादा चलेगा। और जो मनन-चिंतन-मंथन चलेगा वो ज्ञान तुम्हारा अपना हो जाएगा सदा काल के लिए। शिव बाप तो सबको एक जैसा ज्ञान देते हैं। क्या? क्या देते हैं? तुम ज्योति बिंदु आत्मा हो। ये बाप सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर का ज्ञान है। हाँ। लेकिन अब उसको विस्तार में ले जाना, जितना जो प्रैक्टिस करेगा आत्मिक स्थिति में स्थित होने का उतना वो मनन-चिंतन-मंथन करें, करके विस्तार में ले जाएगा।

तो बताया कि ये विष्णु को, जो विष्णु जो देवता होता है ना अतींद्रिय सुख भोगने वाला, उसको ही मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार है? कि उसे पता चल गया कि मेरा पद ऊंचे से ऊंचा इस दुनिया में ये है। तो फिर तो दरकार ही नहीं। हाँ। तो ये किसकी बात है? समझा अच्छी तरह से? ये किसकी बात है सुदर्शन चक्र बुद्धि रूपी हाथ में घुमाना? अरे, एक अक्षर लिखो किसकी बात है?
(किसी ने कुछ कहा।) अंहं। एक की ही बात है? बस? एक ही सुदर्शन चक्र घुमाके अपने जन्मों को जानेगा 84 के चक्कर को? वाह भाई? अरे, 84 जन्म लेने वाली कोई एक ही आत्मा होती है क्या? 84 के चक्कर में जितनी भी बीज रूप आत्माएं हैं संसार की वो सारी तो 84 के चक्कर में आती हैं। कितनी हैं? जो भी रुद्र माला के मणके जिनकी यादगार रुद्राक्ष के मणके दिखाए जाते हैं ना। रुद्राक्ष की माला। हां। तो वो रुद्राक्ष के मणके वो सारे यादगार हैं किस बात की? उन बीजों की यादगार हैं। हां, जो बीज पूरे 84 जन्मों के चक्कर; कौन सा जन्म? शरीर का जनम कि सिर्फ आत्मा बनने वाली बात है? कौन सा 84 जन्म? शरीर के 84 जन्म। तो वो चक्र जो है वो तब ही घूमता है जब अच्छे से प्रैक्टिस हो आत्मिक स्थिति में टिकने की। अपनी देह को, देह के पदार्थों को, देह के संबंधियों को याद करने की प्रैक्टिस ही खत्म हो जाए। तो बस फिर क्या होगा? एकदम ज्योति बिंदु आत्मा ऐसी बन जावेंगे जिसमें अपने 84 के चित्र का पूरा ज्ञान, हां, आ जाएगा। या तो जितने जन्म लिए होंगे उतने का ज्ञान आ जावेगा।

तो ये ब्राह्मण बच्चों को होता है सुदर्शन चक्र। देवताओं को नहीं होता है। हां। ये ब्राह्मणों के लिए है सुदर्शन चक्र। कि तुम बच्चों को अभी मालूम है नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। क्या? ये जो ब्राह्मण होते हैं वो भी एक जैसे होते हैं क्या? अगर एक जैसे हुए होते तो शास्त्रों में क्यों लिखा हुआ है? क्या? नौ कुरी के ब्राह्मण होते हैं। तो जरूर जो नौ कुरी के ब्राह्मण होते हैं और फिर ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। बनते हैं कि नहीं? अरे ब्राह्मणों की पूजा होती है कि नहीं? ब्राह्मणों को भोजन खिलाते हैं कि नहीं? दान दक्षिणा देते हैं कि नहीं? देते हैं ना। हां। क्यों? क्या वो देवता हैं? अरे, देवता नहीं हैं। लेकिन उन्होंने देवताई का पुरुषार्थ किया है ना। चलो कोई नंबर का पुरुषार्थ किया। नौवीं कुरी का ब्राह्मण बना। ब्राह्मण तो बना ना। ब्राह्मण बना तो देवता बना। तो जो भी नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार ये 84 का चक्र या उससे कम जन्मों का चक्र घुमाते हैं तो उतने ही जन्म लेते हैं। तो यह बात किसी को मालूम नहीं है।

A morning class dated 21.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page on Tuesday was – This Sudarshan Chakra that is depicted for deities, is it a right topic or wrong topic? Hm? Yes, do the deities sit and think and churn there? Or do they use their mind? Thinking and churning takes place through the mind only. They have conquered the mind, haven’t they? Yes. The mind has become constant in the soul, hasn’t it? So, they remember the soul. Hm? There is no question of thinking and churning at all. So, as regards this name Swadarshan Chakra, Baba says all the names are based on the tasks performed. Swa means the soul. Darshan means to see the cycle (chakra) of 84 [births] of the soul. Hm? So, thinking and churning about the cycle of 84 of the soul in the mind itself is the Sudarshan Chakra. Hm?

The one who rotates this Sudarshan Chakra more, the one who thinks and churns more, then the people, the purusharthis (effort-makers) in whose comparison he thinks and churns more, then he will recognize his post faster, will he not? He will recognize quickly. So, when he recognizes, then will he reveal as well or not? Hm? He will reveal the post of his soul himself, will he not? What does the Father do? When Father Shiv, the Heavenly God Father comes to this world, then what does He do? Does He give His introduction Himself or does anyone else give? So, then whom will the entire world follow? Yes, the entire world follows the Father. So, it is like this only. The one who thinks and churns more and those people in whose comparison he thinks and churns more, then he will declare his post in front of them. Well, those people in front of whom his post has been declared and they got to know that this one is higher than us, then their ego ended, didn’t it? Yes. Will they bow their forehead or not? Yes, they will bow. So, then, when they bowed their forehead means their forehead has been cut. What happened to their body consciousness? It ended.

Now the same topic has been depicted for Vishnu. Well, as regards Vishnu, the combination of the nature and sanskars of female and male is called Vishnu. But even in that will they be numberwise or equal? Arey, numberwise. So, the actor soul playing the part of number one Vishnu is Aadi (first) Lakshmi and Aadi (first) Narayan. So, they realized their nature and sanskar, their part and ever since they realized in their purusharthi life, as long as they study the advance knowledge and the basic [knowledge], a high post is sitting in their intellect; so, will they play a high part or a low part? Yes.

So, it was told, be it Lakshmi, be it Aadi Lakshmi, be it Aadi Narayan, they will have self-respect (swabhimaan), will they not? Yes. That we are highest on high children of the Father. So, when the one who is called Aadi Lakshmi comes out of basic knowledge and grasps advance knowledge, then will she catch quickly or will she catch it late? Why? Why will she catch quickly? Why will others catch late? Reason? There must be some reason, isn’t it? What is the reason? Arey? You take so much time deliberately. You are not able to write one alphabet.
(Someone said something.) The reason is purity. I will understand even if you write P. Yes. So, as regards purity, she, in her purusharthi life, despite being in basic [knowledge], despite being in the Moon dynasty; the Moon is cool, isn’t it? So, her intellect is cool; Hm? She doesn’t become hot (vicious). Arey, do men like Duryodhans and Dushasans become hot or do the virgins and mothers become hot? No. So, it was told that because of having a cool intellect she makes nice purusharth of purity in the purusharthi life in basic [knowledge] also. And on the basis of the same power she comes in the last in advance and then goes fast. A reason is required, isn’t it? Arey, Baba has said – Last becomes fast. Fast becomes first. Arey, why brother? Will all those who come in the last go fast and come first? There must be some karmic account, will it not be? So, what is the karmic account mentioned? The same. Yes, all the tasks of the world take place through the power of purity. What? The victory that the kings get, on what basis do they get? Their kingdom (raajdhaani) is there, isn’t it? Living kingdom or non-living kingdom? Living kingdom. Raajdhaani means the power of inculcation (dhaarnaa shakti) of kings (raja). Hm? The helper power (sahyogini shakti) extends the cooperation of purity, doesn’t she? So, they gain victory through that vibration of purity. It was told.

So, this is the Swadarshan Chakra. It is a topic of realizing the cycle of 84 [births] of one’s soul. So, when you become a deity, then there is no need at all to think and churn about the 84 births. Hm? They, the deities do not need to think as to what will be the next birth, what will happen to my soul in future? Do they realize? Nothing. Yes. They are like fools. What? Who has this knowledge? Do the deities have it or do the Brahmins have it before becoming deities? When they become Brahmins then their task itself is to obtain knowledge and give knowledge. And the more you give knowledge to others, will you think and churn more or less? Hm? You will think and churn more. When you think and churn more then what happens? Hm? When one thinks and churns more, then one’s soul, yes, the part of one’s soul is revealed.

So, it was told that there is no question of giving this Sudarshan chakra to the deities in the Golden Age, the Silver Age, in the world of Ram and Krishna. It is about which place? In this Confluence Age, in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age, when the Father, the Supreme Soul, God Father comes in the Purushottam Sangam, then He shows that path that children, consider yourselves to be souls and the more you consider yourselves to be souls, the subtler you will become. The soul is a subtle point of light, isn’t it? The point can be made as much subtle as possible. You can make a big, round point also and then while making it subtler you can make it very subtle, so subtle that what are they, the atoms of malaria, are they visible to the eyes? They are not even visible. Arey, they are however insects, living beings. But the atom bomb that is produced, in it atoms are cut into atoms, those atoms are further cut into atoms; that is so subtle and how much power does it have? It has the power to burn the entire world. So, that is also a physical thing, isn’t it? And this is a topic of the soul. And the soul is also not a physical thing. It is a light. It is a particle of light. For example, there is sunlight, isn’t it? It is a spark of light like this. Yes.

So, it was told that the more you maintain concentration of the mind, the intellect over this very subtle one, will the intellect become subtle or will it become buffalo-like intellect, elephant’s intellect? No. Yes. It will become subtle. And will there be more thinking and churning in a subtle intellect or will it be less? It will be more. And the thinking and churning that you do, that knowledge will become yours forever. Father Shiv gives equal knowledge to everyone. What? What does He give? You are a point of light soul. This is the knowledge of the Father, the Supreme Soul, the Heavenly God Father. Yes. But well, to take it into elaboration (vistaar), the more someone practices to become constant in soul conscious stage, the more he will think and churn and take it into elaboration.

So, it was told that this Vishnu, the Vishnu who is a deity, isn’t he, the one who experiences super sensuous joy, does he need to think and churn? Or did he come to know that this is my highest on high post in this world? Then there is no need [to churn] at all. Yes. So, whose topic is this? Did you understand nicely? Whose topic is it to rotate the Sudarshan Chakra in the intellect-like hand? Arey, write one alphabet as to whose topic it is?
(Someone said something.) Amhm. Is it the topic of only one? Is that all? Will only one person rotate the Sudarshan Chakra and know about his births, about the cycle of 84? Wow brother? Arey, is there only one soul which gets 84 births? All the seed-form souls of the world pass through the cycle of 84. How many? All the beads of the Rudramala, whose memorial the beads of Rudraksh are depicted, aren’t they? The rosary of Rudraksh. Yes. So, all those beads of Rudraksh are memorials of which topic? They are memorials of those seeds. Yes, the seeds who pass through the entire cycle of 84 births; which birth? Birth of the body or is it a topic of becoming just a soul? Which 84 births? 84 births of the body. So, that cycle revolves only when you have a good practice of becoming constant in soul conscious stage. The practice of remembering your own body, the things related to the body, the relatives of the body should end. So, that is it; then what will happen? Yes. You will become such a complete point of light soul in whom the complete knowledge of the picture of your 84 [births] emerges. Or you will get the knowledge of as many births as you have got.

So, these Brahmin children have the Sudarshan Chakra. The deities don’t have. Yes. This Sudarshan Chakra is for the Brahmins. That you children now know numberwise as per your purusharth. What? Are these Brahmins also alike? Had they been alike, then why has it been written in the scriptures? What? There are nine categories of Brahmins. So, definitely the nine categories of Brahmins and then the Brahmins become deities. Do they become or not? Arey, are the Brahmins worshipped or not? Are the Brahmins fed food or not? Are they given donation and dakshina or not? They are given, aren’t they? Yes. Why? Are they deities? Arey, they aren’t deities. But they have made purusharth for becoming deities, haven’t they? Okay, they may have made purusharth of any number. He might have become a Brahmin of ninth category. He did become a Brahmin, didn’t he? When he became a Brahmin, he became a deity. So, as per numberwise purusharth when they rotate this cycle of 84 or the cycle of fewer number of births, then they get the same number of births. So, nobody knows this topic.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2860, दिनांक 24.04.2019
VCD 2860, dated 24.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2860-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.20
Time- 00.01-17.20


प्रातः क्लास चल रहा था 21.11.1967 मंगलवार को पांचवे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - अभी तो बिंदी को ज्ञान वाला तो गाते तो बहुत हैं ज्ञान का सागर है, सुख का सागर है। देखो बनाया है ना। कितनी महिमा की है उनकी। हँ? क्या बनाया है? हँ? किसने बनाया है? हँ? अरे, शिव बाप ने बनाया है और क्या बनाया है? ज्ञान का सागर बनाया है। वो तो शास्त्रकारों ने लिख दिया है कि बाप आते हैं तो सूर्य को ज्ञान देते हैं, विवस्वत को। लेकिन वास्तव में वो कोई सूर्य होता है क्या? हँ? सूर्य तो डिटैच रहता है। अटैच रहता है? (किसी ने कुछ कहा।) हां। तो सागर को कहेंगे कि वो डिटैच रहता है? वो तो सबसे ज्यादा अटैचमेंट में आने वाला है। एकदम प्रवृत्ति मार्ग का पक्का। हँ? छोड़ के रह ही नहीं सकता। तो देखो बनाया है ना। वो जो बच्चों को दिखलाया है, हँ, वो कितनी महिमा की है उनकी। और ये तो फोटो आया था। पर शायद जरूर बड़ी कोई इतनी इनसे भी बड़ी होगी। क्या? फोटो। समझा ना? पर अभी बहुत छोटा भी नहीं लिखना चाहिए। मुख्य-मुख्य जो बातें हैं, लिखी हैं, जो मनुष्य समझें। हँ? क्या? अरे, शिवलिंग का चित्र बनाया है ना कागज के ऊपर। बनाया ना? हां। उसके 32 गुण दिखाए हुए हैं। तो बताया उसमें बहुत छोटा-छोटा अक्षर भी नहीं लिखना चाहिए। मोटा-मोटा अक्षर लिखना चाहिए। हाँ, जो भी मुख्य, मुख्य-मुख्य बातें लिखी हैं।

देखो, तुम तो उनकी महिमा करते हो ना। हं? उनकी। इनकी नहीं। तुम। कौन तुम? जो सन्मुख पढाई पढने वाले बच्चे हैं उनकी कहा, उनके लिए बोला तुम तो उनकी महिमा करते हो ना। है ना। और फिर देखो, ये जो पत्थरबुद्धि शंकराचार्य क्योंकि पुजारी हैं ना फिर भी। तो बच्चे ये हमेशा लिख दियो कि ये पूज्य पुजारी नहीं हो सकते। हं? क्या? कौन? जिनकी पूजा होती है ये पूज्य। पुजारी पूज्य नहीं हो सकते हैं। तो पुजारी कौन हैं? शंकराचार्य के लिए बताया ना। हां, वो तो पूजा करते हैं शिवलिंग की। हां। और पुजारी पूज्य नहीं हो सकते। किसकी पूजा करते हैं शंकराचार्य? हां, शिवलिंग की पूजा करते हैं। तो जिसकी पूजा करते हैं वो पूज्य हुआ या पुजारी हुआ? और दुनिया का सबसे बड़ा पूज्य हुआ कि पुजारी हुआ? हँ? सबसे बड़ा पूज्य।

तो बताया कि जो पूज्य होते हैं वो पुजारी नहीं हो सकते। और जो पुजारी पूज्य नहीं हो सकते हैं क्योंकि सतयुग में, नई दुनिया में पूज्य होते हैं। और पुजारी होते ही नहीं हैं वहां। हँ? फिर पुरानी दुनिया में पुजारी होते हैं। वहां पूज्य होते ही नहीं है। हँ? अभी शंकराचार्य को भी तुम कहेंगे। क्या? कहेंगे। अभी नहीं कहते हैं। हाँ। अभी उनके सामने कहेंगे कि तुम पुजारी हो? हँ? हां? पुजारी कभी पूज्य नहीं हो सकते। तो आगे चलके कहेंगे। ये पुजारी है। पूजा करता है। इसको पूज्य कहना एकदम मिथ्या है। एकदम झूठी बात। क्यों? क्योंकि जो खुद पूजा करता है वो पूज्य हुआ क्या? हो ही नहीं सकता है। तो पूज्य कह करके कितने-कितने फॉलोअर्स बनाए हुए हैं। और कितने जाकरके उनके चरणों में गिरते हैं। हँ? अब है ये बात कहां की? फिर असली पूज्य कौन है? अव्वल नंबर? अरे वो तो शंकराचार्य तो ऐसे झूठे पूज्य बनके बैठ गए। असली पूज्य कौन हैं? हँ? कोई है इस सृष्टि पर? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ऑलराउंड पार्ट बजाने वाला कोई है? तुम बच्चे तो ऑलराउंड पार्ट बजाते हो ना। हँ? हां, बजाते हो। लेकिन नंबरवार हैं बच्चे। तो अव्वल नंबर भी कोई है या नहीं है, हँ, जहां शूटिंग होती है कि सब जाकरके चरणों में गिरते हैं? वो स्थूल चरण नहीं, देह के चरण। क्या? बाप तो कहते हैं तुम अपन को क्या समझो? आत्मा समझो। तो स्थूल चरण की तो बात ही नहीं। कौन से चरण? हां, बुद्धि रूपी चरणों में मत्था झुकाय देते हैं। सारी दुनिया उनकी बात मानती है कि नहीं मानती है? हां।

तो ये तो सहज बात है ना। बाबा कहते हैं ना इसलिए अखबारें निकालो। क्या? या ये जो मैगजीन तो सिर्फ जो मांगते हो उनके पास जाती है ना। किनके पास? शंकराचार्य के पास जाती है ना। और तो किसको नहीं भेजते हो ना। हां। नहीं। जैसे ये मैगजीन निकली थी ना अभी। जो भगवान ये कहते हैं, मनुष्य ये कहते हैं। कितना अंतर है। हँ? तो वो ऐसी मैगज़ीन तुम ऐसे को भेज दियो। और जो ऐसे हैं; कैसे? श्री श्री 108 जगत गुरु महाराज अपन को कहते हैं। हां। उनको ये मैगजीन भेज देना चाहिए। भले फ्री भी भेज देना चाहिए। हां। इसमें क्या है? हां, चलो सौ रुपए की मैगजीन। दो सौ रुपये। अरे, ये कोई बहुत जास्ती थोड़ेही है। हँ? शंकराचार्य कहां हैं? शंकराचार्य कहां हैं? अरे, इस दुनिया में, बाहर की दुनिया में शंकराचार्य नहीं है? अरे, कुमारका दादी अपने को शंकराचार्य कहके चित्र नहीं बनवाए? अरे? पोस्टर बनवाए कि नहीं? उनमें त्रिमूर्ति का चित्र बनाया? हँ? दादियों को रखा ना। ब्रह्मा, ये है विष्णु, ये है शंकर। तो शंकराचार्य हुआ कि नहीं? ब्राह्मणों की दुनिया में भी शूटिंग हुई कि नहीं? तो पूज्य हैं कि पुजारी हैं? वो भी तो ब्रह्मा की पूजा करती थी ना। नहीं करती थी? हँ? ब्रह्मा की पूजा करती थी। तो पूजा करती थी तो पुजारी हुई या पूज्य हुई? नहीं।

तो ये बताया कितना भी पैसा लगे ये जो शंकराचार्य बनकरके बैठे हैं गद्दी नशीन बनकरके, हां, इनके जो भी हैं फॉलोअर्स मोटे-मोटे, हां, गद्दीनशीन क्योंकि आदि शंकराचार्य की गद्दी पे ढेर सारे बैठते रहे ना। और अभी भी बैठे हुए हैं ना ढेर सारी गद्दियां बना करके। हां, तो मैगजीन भेजो। भले 100, 200, 400 रुपये बहुत जास्ती थोड़े ही हैं। अरे, जो-जो नामीगिरामी शंकराचार्य हैं, हँ, जिनकी बहुत ही गीता के ऊपर बहुत ही म्याऊं-म्याऊं करते रहते हैं; हँ? सबसे बड़ी गीता किसकी प्रसिद्ध है? हँ? सबसे बड़ी गीता प्रसिद्ध है शंकराचार्य, आदि शंकराचार्य की। हाँ। बाबा कहते हैं वो तो म्याऊं-म्याऊं करते रहते हैं। मैं आऊं? मैं आऊँ पूजा लेने के लिए? आऊं कि न आऊं? आऊँ। कोई बुलाए कि न बुलाए लेकिन वो, हां, पूजा लेने के लिए तैयार हो जाते हैं।

तो बाबा कहते हैं कि सन्यासी ये कदाच्च राजयोग नहीं सिखलाय सकते। क्यों? क्यों नहीं सिखलाय सकते? हँ? क्योंकि ये तो पुजारी बनाते हैं, अपना भगत बनाते हैं कि राजा बनाते? राजयोग से तो राजा बनाए जाते हैं। भगवान आते हैं तो अर्जुन को राजयोग सिखाया तो विश्व की बादशाही दी ना। अर्जुन ने सारे विश्व के ऊपर विजय प्राप्त की ना। की ना? हां, की। तो ये शंकराचार्य किसी को राजयोग नहीं सिखाय सकते, राजयोग सिखा करके राजाई नहीं दे सकते। समझा? जरूर कुछ गपोड़े मारेंगे। क्या? हां, क्या-क्या गपोड़े मारेंगे? अरे, इस सृष्टि की आयु लाखों वर्ष है। क्यों गपोड़ा मारा? इसलिए कि कोई पूछे ही नहीं वो लाखों वर्ष का हिसाब-किताब तो बताओ कितने जन्म कहां-कहां लिए? गपोडा ही मारते रहते हैं। सो मार रहे हैं।

गीता का भगवान कृष्ण। अरे, एक तरफ कृष्ण के मंदिर बनवाए हुए हैं जिनमें बच्चा बैठाया हुआ है। उसकी पूजा हो रही है हर मंदिर में। और दूसरी तरफ तुम कहते हो वो गीता का भगवान है। अरे, बच्चा कैसे गीता का भगवान बनेगा? हँ? बच्चा राज़ की बातें समझाएगा? नहीं समझाएगा। समझेगा? समझेगा भी नहीं। अरे, बच्चा तो जब बड़ा होता है तब पति-पत्नी के बीच में क्या राज़ की बातें होती है वो ही समझता है। समझता है कि नहीं? हां। छोटा बच्चा थोड़े ही समझता है? हाँ, तो जो खुद नहीं समझता वो दूसरों को क्या समझाएगा कर्मयोग क्या होता है? कर्मेंद्रियों से कर्म भी करो और कर्म करते-करते बाप की याद में रहो। तो क्या होगा? हँ? कर्मों से जो किया हुआ, कर्मेंद्रियों से जो किया हुआ उससे फल मिलता है, क्या मिलता है? कर्मेंद्रियों से सुख भी मिलता है, कर्म इंद्रियों से दुख भी मिलता है। तो जो सुख मिलता है वो, वो जो वो सुख जब बाप की याद में रहेंगे तो सुख भासेगा? भासेगा? नहीं। भासेगा ही नहीं। तो ये बात उनकी बुद्धि में आ ही नहीं सकती है। इसलिए गपोड़े मारते रहते हैं।

तो उनको ये लिख देते हैं। ये मैगजीन में लिख करके ये, ये भेज देनी चाहिए। बाबा डायरेक्शन देते हैं ना। क्या? बड़े ते बड़ा डायरेक्टर कौन है? हँ? हां, नीचे वाला कि ऊपर वाला? नीचे वाला नहीं। नीचे वाला तो रंगमंच पे पार्ट बजाता है। डायरेक्टर तो, हां, डायरेक्टर तो ड्रामा में पर्दे के पीछे रहकरके प्रांप्टिंग करते हैं। हाँ। डायरेक्शन देता रहता है। तो हर्जा नहीं है। मैगजीन में, अखबार में। ऐसे अखबार भेजने में 100-200 के अखबार भेज देंगे तो कोई खर्चा नहीं। उनके नाम पर भेज देवें। और उनमें ये सभी लिखा हुआ है। हँ? फर्क वाली बात। क्या? कि पूज्य में और पुजारी में क्या फर्क होता है? क्या? पूज्य कभी पुजारी नहीं बन सकते हैं। और पुजारी कभी पूज्य नहीं। पूज्य देवताएं होते हैं। वो तो सतयुग, त्रेता में होते हैं। द्वापर, कलियुग में उतरते हैं तो पुजारी बन जाते हैं कि पूज्य रहते हैं? पुजारी बन जाते हैं। तो ये जो कंट्रास्ट वाली चीज है ना वो बताओ। उनको, उसको उठाय करके भेज देना चाहिए। किसको? वो ही शंकराचार्य को। बल्कि तुम्हारे, तुम्हारे पास जो भी समझू, सयाने बच्चे हैं, हँ, जो ज्ञान की गहराई को समझते हैं ना एडवांस; एडवांस में समझते हैं, वो शंकराचार्य को भेज सकते हैं। जिसमें ये कंट्रास्ट है। क्या कंट्रास्ट? हँ? सभी कंट्रास्ट है ना मेगजीन में। उसमें बहुत कंट्रास्ट है। बहुत करके है।

तो ऐसे-ऐसे काम करो। उनको भेज दियो वो। हां। क्योंकि वो उस, उसी बात के ऊपर ये इसने ग्लानि की है और ये गालियां देते हैं। क्या? किस बात के ऊपर? हँ? जो काम वो नहीं कर सकते हैं उसी बात के ऊपर उन्होंने ग्लानि की। उनका क्या कहना है? आग कपूस इकट्ठे नहीं रह सकते। और बाप कहते हैं कि आग, हँ, और कपूस। कपूस क्या? भूसा। आग माने पुरुष के अंदर आग होती है। हां। और स्त्री ठंडी स्वभाव की होती है। तो वो तो एक तरह से उसमें आग ना लगे, दोनों साथ-साथ मिलें, तो ये हो सकता है? वो कहते हो ही नहीं सकता। और बाप क्या कहते? ये हो ही तब सकता है जब बच्चे बाप को पहचानें और अपन को आत्मा समझकरके बाप को याद करें। याद करते हुए कर्म करें। तो ये बिल्कुल हो सकता है। हाँ।

A morning class dated 21.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle of the fifth page on Tuesday was – Now many people with [basic] knowledge sing a lot that the point is the ocean of knowledge, ocean of happiness. Look, they have made, haven’t they? They have praised Him so much! Hm? What have they made? Hm? Who has made? Hm? Arey, Father Shiv has made. And what have they made? They have made Him the ocean of knowledge. The writers of scriptures have written that when the Father comes He gives knowledge to the Sun, to Vivaswat. But is he a Sun in reality? Hm? The Sun remains detached. Does it remain attached?
(Someone said something.) Yes. So, will it be said for the ocean that it remains detached? He is the one who comes in attachment the most. He is completely firm on the path of household. Hm? He can not at all live by leaving [the household]. So, look, it has been made, hasn’t it been? That which has been shown to the children; He is praised so much. And this photo had come. But perhaps definitely it must be large, larger than this. What? Photo. You have understood, haven’t you? But now you shouldn’t write very small as well. The main topics which you have written so that people understand. Hm? What? Arey, you have made the picture of Shivling on a paper, haven’t you? You have made, haven’t you? Yes. You have shown its 32 qualities. So, it was told that you shouldn’t write in very small letters on it. You should write in bold letters. Yes, whatever main-3 topics that have been written.

Look, you praise that one (unki), don’t you? Hm? That one. Not this one (inki). You. Who you? It was said for the children who study face to face, it was said for them that you praise that one, don’t you? Is it not? And then look, this Shankaracharya with stone-like intellect because however he is a worshipper, isn’t he? So, children, always write that these worshippers (pujaari) cannot be worshipworthy (poojya). Hm? What? Who? Those who are worshipped are worshipworthy. Worshippers cannot be worshipworthy. So, who are the worshippers? It was said for Shankaracharya, wasn’t it? Yes, he worships the Shivling. Yes. And a worshipper cannot be worshipworthy. Whom does Shankaracharya worship? Yes, he worships the Shivling. So, the one whom he worships, is he worshipworthy or a worshipper? And is He the biggest worshipworthy in the world or a worshipper? Hm? The biggest worshipworthy.

So, it was told that those who are worshipworthy cannot be worshippers. And those who are worshippers cannot be worshipworthy because the worshipworthy exist in the Golden Age, in the new world. And the worshippers don’t exist there at all. Hm? Then there are worshippers in the old world. Worshipworthy don’t exist there at all. Hm? Now you will tell Shankaracharya also. What? You will tell. You don’t tell now. Yes. Will you now tell in front of him that you are a worshipper? Hm? Yes? Worshippers can never be worshipworthy. So, you will say in future. This one is a worshipper. He worships. Calling him worshipworthy is a complete illusion. Completely false topic. Why? It is because can the one who himself worships be worshipworthy? He cannot be at all. So, you have made so many followers by calling [yourself] worshipworthy. And so many people go and fall at their feet. Hm? Well, it is about which place? Then who are the real worshipworthy ones? Hm? Number one? Arey, those Shankaracharyas have sat as the false worshipworthy ones. Who are the real woshipworthy ones? Hm? Is there anyone in this world? Is there anyone who plays allround part on this world stage? You children play allround part, don’t you? Hm? Yes, you play. But children are numberwise. So, is there anyone number one or not where the shooting takes place that everyone goes and falls at their feet? Not those physical feet, body’s feet. What? The Father says – What should you consider yourself to be? Consider yourself to be souls. So, there is no question of the physical feet at all. Which feet? Yes, they bow their forehead at the feet-like intellect. Does the entire world accept their words or not? Yes.

So, this is an easy topic, isn’t it? This is why Baba says, doesn’t He that publish newspapers. What? Or this magazine that you seek goes to them, doesn’t it? To whom? It goes to the Shankaracharya, doesn’t it? You don’t send it to anyone else, do you? Yes. No. For example, this magazine was released now, wasn’t it? God says this, human beings say this. There is so much difference. Hm? So, you send such magazine to such persons. And those who are like this; how? Those who call themselves Shri Shri 108 Jagatguru Maharaj. Yes. You should send this magazine to them. You may send them free of cost. Yes. What is in it? Yes, okay, it may be a magazine worth 100 rupees. Two hundred rupees. Arey, it is not a very big amount. Hm? Where is the Shankaracharya? Where is the Shankaracharya? Arey, isn’t there Shankaracharya in this world, in the outside world? Arey, didn’t Kumarika Dadi get her pictures prepared calling herself Shankaracharya? Arey? Did they get posters prepared or not? Did they make a picture of Trimurti in it? Hm? They placed the Dadis, didn’t they? Brahma; this is Vishnu; this is Shankar. So, is he Shankaracharya or not? Did the shooting take place in the world of Brahmins also or not? So, are they worshipworthy or worshippers? She too used to worship Brahma, didn’t she? Didn’t she used to [worship]? Hm? She used to worship Brahma. So, when she used to worship, then was she a worshipper or worshipworthy? No.

So, it was told that whatever the amount that may be required, those who are sitting as Shankaracharyas, those who have occupied the seats, yes, all their fat followers, yes, occupying their seats because numerous people have been occupying the seat of Aadi Shankaracharya, haven’t they? And even now they are sitting by establishing numerous seats (guddis). Yes, so, send the magazine. 100, 200, 400 rupees are not much. Arey, the well-known Shankaracharyas, who keep on meowing a lot on the Gita; Hm? Whose biggest Gita is famous? Hm? The biggest Gita that is famous is of Shankaracharya, the Aadi (first) Shankaracharya. Yes. Baba says – They keep on meowing. Mai aaun (should I come)? Should I come to get worshipped? Should I come or not? I should come. Anyone may call or not call, but they, yes, get ready to be worshipped.

So, Baba says that Sanyasis cannot teach this rajyog under any circumstance. Why? Why can’t they teach? Hm? It is because do they make you worshippers, do they make you their devotees or do they make you kings? Rajyog makes you kings. When God comes, He taught rajyog and gave him the emperorship of the world, didn’t He? Arjun gained victory over the entire world, didn’t he? He gained, didn’t he? Yes, he gained. So, this Shankaracharya cannot teach rajyog to anyone. They cannot give kingship by teaching rajyog. Did you understand? They will definitely bluff to some extent. What? Yes, what all will they bluff? Arey, the age of this world is lakhs of years. Why did they bluff? It is because nobody should ask them at all as to tell us the calculation of the lakhs of years that where all and how many births did we get? They keep on bluffing. So, they are bluffing.

God of Gita, Krishna. Arey, on the one hand you have built the temples of Krishna in which a child has been made to sit. He is being worshipped in every temple. And on the other hand you say that he is the God of Gita. Arey, how can a child become the God of Gita? Hm? Will a child explain the topics of secret? He will not explain. Will he understand? He will not understand either. Arey, only when a child grows up that he understands what are the topics of secret between a husband and a wife. Does he understand or not? Yes. Does a very small child understand? Yes, so, the one who himself doesn’t understand, then how will he explain to others as to what is karmayoga? Perform actions through the organs of action also and while performing actions remain in the remembrance of the Father. Then what will happen? Hm? Through the actions, through whatever you perform through the organs of action you get fruits; what do you get? You get pleasure as well as pains from the organs of action. So, the pleasure that you get, will you like that pleasure when you remain in the remembrance of the Father? Will you like? No. You will not like at all. So, this topic cannot enter into their intellect at all. This is why they keep on bluffing.

So, we write this to them. You should write this in the magazine and send it. Baba gives directions, doesn’t He? What? Who is the biggest director? Hm? Yes, the below one or the above one? Not the below one. The below one plays a part on the stage. The Director, yes, the Director does the prompting while remaining behind the curtain in the drama. Yes. He keeps on giving directions. So, it doesn’t matter. In the magazine, in the newspaper. While sending such newspapers, if you send newspapers worth 100-200, then it is not a big expenditure. We should send it in their name. And all this has been written in it. Hm? The topic of difference. What? That what is the difference between worshipworthy and a worshipper? What? Worshipworthy can never become worshippers. And worshippers can never become worshipworthy. Deities are worshipworthy. They exist in the Golden Age, the Silver Age. When they descend to the Copper Age, the Silver Age, do they become worshippers or remain worshipworthy? They become worshippers. So, tell this topic of contrast. You should pick it up and send it to them, him. To whom? To the same Shankaracharya. Rather, the intelligent, wise children that you have, those who understand the depth of advance knowledge, understand in advance, they can send to the Shankaracharya. It contains the contrast. What contrast? Hm? All the contrast is there in the magazine, isn’t it? A lot of contrast is there in it. It is mostly there.

So, perform such tasks. Send them that. Yes. It is because this person has defamed on that topic only and they hurl abuses. What? On which topic? Hm? They have defamed on the same topic which they cannot do. What is their statement? Fire and hay (kapoos) cannot live together. And the Father says that fire and kapoos; what is kapoos? Hay. Fire means that there is fire within a man. Yes. And a woman is cool-natured. So, in a way, it shouldn’t catch fire, both should remain together, so, is this possible? They say that it is not possible at all. And what does the Father say? This can be possible only when the children recognize the Father and consider themselves to be a soul and remember the Father. They should perform actions while being in remembrance. So, this is completely possible. Yes.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2861, दिनांक 25.04.2019
VCD 2861, dated 25.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2861-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-14.37
Time- 00.01-14.37


प्रातः क्लास चल रहा था 21.11.1967 मंगलवार को सातवें पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी कि रावण ने आकर के अंगद के पांव को हिलाया। भक्ति मार्ग में पांव दिखाय दिया है। है बुद्धि रूपी पांव की बात। जैसे पांव से कहीं पहुंचना होता है, वैसे ही बुद्धि से भी पहुंचना होता है। कहां पर? कहते हैं ना अरे, तुम हमारी गुरुजी की बुद्धि तक नहीं पहुंचोगे, हमारे गुरुजी तक तुम पहुंच ही नहीं सकते। पहुंचना क्या बुद्धि से है या पांव से? हँ? बुद्धि से पहुंचने की बात है। तो अभी है देखो आखानी कितनी झूठी, और कितनी बड़ी है। है सब झूठ। रामायण की आखानी है ना? हाँ। झूठ, मिरइ झूठ, सच की रत्ती नहीं। फिर भी बाबा कह देते हैं कि भई एकदम आटे में लून थोड़ा जरूर रहता है। बाकी ये नाम तो है। राम नाम है। तो नाम हुआ ना? नाम का अर्थ होता है। हँ? तो भीति भी राम नाम तो है ना। किसकी? सीता की। तो त्रेता के हैं। त्रेता में भी तो स्वर्ग तो है। ऐसे लिख दिया है। कोई ये थोड़ेही समझते हैं कि सतयुग, त्रेता में कोई स्वर्ग होता है। तो ये तो सच है ना बरोबर। बाकी जो उसमें हैं ये सभी, रामायण में वो सब देखो कितनी लंबी-चौड़ी, झूठी बातें हैं। और कितना बड़ा पुस्तक पोथन्ना बना हुआ है। हँ?

रामायण कहना तो सब ठीक है भई कि ये रामायण है‌। अरे, पर तुम याद करो, पढ़ते रहो। कितना समय लगता है वो पढ़ने में? और फिर देखो वो कितने रामायण बने हुए हैं। एक बाल्मीकि रामायण। हँ? और एक सूरदास का अद्वैत रामायण, हँ, बरवै रामायण। ये अद्वैत रामायण-वामायण कोई होती नहीं है। अद्वैत माने दूसरी नहीं हो। द्वैत माने दूसरी हो। अरे, अद्वैत तो तुम देवता बनते हो। बस। एक ही धर्म। तुम ये ज्ञान सीखते हो, अद्वैत देवता बनने का। नहीं तो वो अद्वैत-वद्वैत कुछ है नहीं‌। सब झूठ है। कहते हैं अद्वैत शिक्षा या अद्वैत विद्या। अद्वैत माना ही देवता बनने की विद्या। सो तो मानुष से देवता सिवाय बाप के, रूहानी बाप के कोई और तो सिखलाय ही नहीं सकता। समझा ना बच्चे‌। जो कोई कह देते हैं अद्वैत, अद्वैत। अरे, अद्वैत का ही उल्टा अक्षर देवता हो जाता है। कि सुल्टा हो जाता है? अद्वैत का उल्टा अक्षर द्वैत। तो, तो वहां तो दो-दो हो गए। उसे देवता कहेंगे? नहीं। अद्वैत का सुल्टा अक्षर कहेंगे देवता।

अभी देवता बनने का ज्ञान तो कोई देते ही नहीं हैं। हँ? हिस्ट्री देख लो उठा के। अगर ज्ञान देते होते, तो कोई देवता बनता ना। हँ? क्या देवता बनते हैं कि राक्षस बनते जा रहे हैं? हँ? देवता कि लेवता? नहीं। तो जब कोई ज्ञान देने वाला ही नहीं है, जो आते हैं सो द्वैतवाद फैलाते हैं। दूसरा धर्म, दूसरा, दूसरी ज्ञान की बातें, दूसरी धारणाएं, दूसरी भाषा। हँ? अब धर्मपिताएं ही दूसरे-दूसरे आते जाते हैं तो द्वैत ही फैलाएंगे ना। तो अब बताओ फिर अद्वैत ज्ञान कहां से आए? अभी देवता बनने का तो ज्ञान नहीं देते हैं। तो अद्वैत ज्ञान तो सिर्फ तुम दे सकते हो। दे सकती हो; देती हो या नहीं देती हो? दे सकती हो कि देती हो? क्या कहेंगे? हँ? दूसरा तो कोई के पास है ही नहीं बिल्कुल। अरे, अद्वैत ज्ञान तो कोई भी नहीं दे सकता सिवाय एक के। क्यों? कुछ ना कुछ दूसरा मिक्स जरूर करेगा। हँ? कोई भी ज्ञान की बात हो, दूसरा सुनाएगा, फिर तीसरा सुनाएगा, चौथा कुछ ना कुछ मिक्स; क्या करेगा? मिक्स करता ही रहेगा‌।

तो तुम्हारे में भी बहुत नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार चल रहे हैं। एक जैसे तो चल ही नहीं सकते हैं। जबकि तुम बिल्कुल ही पक्के होशियार हो जाओ। और अच्छी तरह से हो जाओ। नहीं तो अद्वैत का अर्थ कोई थोड़ी ही समझते हैं। अद्वैत का मतलब ही है पूरे परिवार में जो भी भांतीं हैं सब के मुख से एक ही बात निकले। कोई मिक्सचर्टी नहीं। कोई समझता नहीं है। बाकी तो यहां बहुत ही ये ट्रांई-ट्रांई करते रहते हैं, बात मत पूछो बच्चे। तभी तो गाया जाता है ना "झूठी माया, झूठी काया, झूठा सब संसार"। तो ये कबकी बात है? कबके लिए गाया जाता है? तबके लिए ही गाया जाता है जब सच बाप को इस दुनिया में आकर के सचखंड स्थापन करना होता है। झूठी माया अभी के लिए तो कहेंगे ना - झूठी माया, झूठी काया, झूठा सब संसार। बाप के लिए तो कोई नहीं कहेंगे कि वो झूठ है‌ क्योंकि उनका तो, उनका तो नाम लिखा हुआ है। हँ? ट्रुथ गॉडफादर। ट्रुथ यानि सत्य। वो फिर नाम धराए लेते हैं अपना सत्य साईं बाबा। हँ? एक कि दो-दो? दो-दो सत्य साईं बाबा। देखा? तो द्वैतवाद हो गया ना।

बताया सत्य को ही तो याद करते हैं। कोई झूठ को याद करेगा क्या? बुलाते हैं ओ सत्य बाबा! आ करके हमें सच्ची बात बताओ। सच्ची कथा सुनाओ। वो तो चाहे रामायण की कथा हो, चाहे भागवत की कथा हो, चाहे सत्य नारायण की कथा हो, सब झूठी कथाएं हैं कि सच्ची कथाएं हैं? सब झूठी। तो तुम सच्ची कथा सुनते हो ना अभी। देखो कितनी सहज बातें हैं। सत्य आकर के बाप कथा सुनाते हैं‌, बताते हैं। तो देखो वो दुनिया में तो कितनी झूठी कथाएं सुनाय देते हैं। और कोई एक जन्म की बात नहीं, जन्म-जन्मांतर सुनाते आए हैं। और घर-घर में वो सत्यनारायण की कथा चली आ रही है। और यहां देखो एक ही जनम में तुम सच्चे-सच्ची कथा सुनकरके सच्चे, क्या, नर से, हाँ, नर से क्या बन जाते हैं? सत्य नारायण बन जाते हैं, नारी से लक्ष्मी बन जाते हैं। अब देखो हम कभी भी पूछते हैं यहां, कितने भी आते हैं, पूछते हैं, हाथ सब जरूर उठावेंगे। क्या बनेंगे? कोई से पूछते हैं तुम क्या बनेंगे? कहते हैं हम तो जरूर नारायण बनेंगे नर से नारायण। बच्चियां कहेंगी हम तो लक्ष्मी बनेंगी, जरूर बनेंगी। अब कोई ऐसे ही थोड़ी लक्ष्मी बन जाएंगे। हँ? यहां सुने और बाहर में जाकर के झरमुइ-झगमुइ करने लग पड़ें। क्या? बाहर जाकरके क्या करना चाहिए? यहां सत्य बात सुनें तो बाहर सच्चाई ही सुनानी चाहिए ना। सत्य को ही ज्ञान कहा जाता है। तो झरमुइ-झगमुइ करके कोई की दिल खराब कर देते हैं।

अरे, इस दुनिया में तो कोई की मां मर गई, किसी का पापा मर गया, कोई का फलाना मर गया, अरे, फिर तो बात मत पूछो। तुमको तो कोई कथाएं नहीं सुनाएंगे ना उन्हों की। बाकी ये बताए रहे हैं कि ऐसे-ऐसे होते हैं उस दुनिया में। तो देखो क्या रड़ापा लगाते हैं? खुद भी रोते हैं और जो आने वाले हैं वो भी रोने लग पड़ते हैं। तो ऐसे-ऐसे होता है। अब जब जो तुम नई दुनिया में जा रहे हो वहां कोई ऐसा रड़ापा लगेगा क्या? कोई मरता रहे। हँ? और वहां मरने की तो बात ही नहीं होती। हँ? क्या कहते हैं? शरीर छोड़ता है, शरीर बदलता है कि मरता है? वहां तो क्या करता है? हां, शरीर, कपड़ा बदलता है। शरीर को वस्त्र कहते हैं ना। (क्रमशः)

A morning class dated 21.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the seventh page on Tuesday was – Ravan came and shook the leg of Angad. A leg has been depicted on the path of Bhakti. It is about the leg-like intellect. For example, one reaches somewhere through legs, similarly one reaches anywhere through the intellect. Where? It is said, isn’t it that arey, you will not reach [to the level of] our Guruji’s intellect; you cannot reach [to the level of] our guruji at all. Do you reach through the intellect or through the legs? Hm? It is about reaching through the intellect. So, now look, the story is so false and so big. Everything is false. There is a story of Ramayana, isn’t it? Yes. Lies, complete lies, there is not even an ounce of truth. However Baba says that brother, there is definitely a little [truth] like a pinch of salt in wheat flour. But there is a name. Ram is the name. So, it is a name, isn’t it? There is a meaning of the name. Hm? So, there is a fear of the name of Ram, isn’t it? Whose? Sita’s. So, they belong to the Silver Age (Treta). There is heaven in the Silver Age as well. It has been written like this. Nobody understands that there is heaven in the Golden Age, the Silver Age. So, this is rightly true, isn’t it? As regards all this which is mentioned in that, in the Ramayana, look, all those are long and wide, false topics. And such a big book, volume has been prepared. Hm?

As regards saying ‘Ramayana’, brother, all that is correct that this is Ramayana. Arey, but you remember; keep on studying. How much time does it take to study that? And then look so many of those Ramayanas have been made. One is Balmiki Ramayana. Hm? And one is an Adwait Ramayana of Soordas, hm, Barvai Ramayana. This Adwait Ramayana is nothing. Adwait means ‘there should not be another one’. Dwait means there should be another one. Arey, it is you who become Adwait deities. That is it. Only one religion. You learn this knowledge of becoming adwait deities. Otherwise, Adwait-vadwait is nothing. Everything is false. They say ‘Adwait education’ or ‘Adwait learning’. Adwait itself means the art of becoming deities. Except for the Father, except the Spiritual Father nobody else can teach the art of becoming deities from human beings. Children, you have understood, haven’t you? Some people say – Adwait, adwait. Arey, the word opposite to adwait is devata (deity). Or is it a synonym? The antonym of adwait is dwait (dualism). So, so, two, two emerged there. Will he be called a deity? No. The synonym of the word adwait is devata (deity).

Now nobody gives the knowledge of becoming a deity at all. Hm? Pick up the history and see. Had they been giving knowledge, then someone must have become a deity, musn’t he? Hm? Do they become a deity or are they going on becoming demons? Hm? Devata (deity or givers) or levata (takers)? No. So, when there is nobody to give knowledge, whoever comes spreads dualism. Another religion, another, topics of another knowledge, other inculcations, another language. Hm? Well, when other, other founders of religions keep on coming, then they will spread dualism only, will they not? So, now tell, where will the adwait (monist) knowledge come from? They do not give the knowledge of becoming deities. So, you alone can give the adwait knowledge. You ladies can give; Do you give or not? Can you ladies give or do you give? What would you say? Hm? Nobody else has it at all. Arey, nobody except One can give the adwait knowledge. Why? Another person will definitely mix something or the other. Hm? Be it any topic of knowledge, a second person will narrate, then the third person will narrate, fourth will mix something or the other; what will he do? He will keep on mixing.

So, even among you many are treading numberwise as per their purusharth. They cannot tread alike. Whereas you become completely, firmly intelligent. And become nicely. Otherwise, nobody understands the meaning of adwait. The meaning of adwait itself is that the same topic should emerge from the mouth of all the members of the entire family. There should not be any mixturity. Nobody understands. Many people keep on uttering ‘traain, traain’, children, just do not ask. Only then is it sung doesn’t it that ‘Wealth (Maya) is false, body (kaya) is false, the entire world is false’. So, it is about which time? It is sung about which time? It is sung for that time when the true Father has to come and establish the true land in this world. False Maya; it will be said for the present time, will it not be? False Maya, false kaya, the entire world is false. Nobody will say for the Father that He is false because His name has been written. Hm? Truth God Father. Truth means satya. They then assume names ‘Satya (true) Sai Baba’. Hm? One or two, two? Two, two Satya Sai Baba. Have you seen? So, it is dualism, isn’t it?

It was told – It is truth alone that people remember. Will anyone remember falsehood? What? They call – O true Baba. Come and tell us the true topic. Narrate the true story. Be it the story of Ramayana, be it the story of Bhaagwat, be it the story of Satya Narayana, are all of these false stories or true stories? All are false. So, you listen to the true story now, don’t you? Look, these are such easy topics. The Father comes and narrates, tells the true story. So, look, they narrate such false stories in the world. And it is not just about one birth, they have been narrating birth by birth. And that story of Satyanarayana has continued in every home. And here, look, in the same birth you listen to the true story and become true, what, from nar (man), yes, from man what do you become? You become true Narayan; you become Lakshmi from naari (woman). Now look, whenever we ask here, howevermany people come, ask, everyone will definitely raise his hand. What will you become? If anyone is asked – What will you become? They say – We will definitely become Narayan; Narayan from nar (man). Daughters will say – We will become Lakshmi; We will definitely become. Well, will anyone become Lakshmi like this? Hm? They listen here and start talking wastefully outside. What? What should you do by going outside? If you listen to true topic here, then you should narrate truth only outside, shouldn’t you? Truth itself is called knowledge. So, they speak wastefully and spoil someone’s heart.

Arey, in this world someone’s mother died, someone’s Father died, someone’s someone died, arey, then just do not ask. We will not narrate their stories to you, will we? But I tell that such things happen in that world. So, look, how they cry! They themselves cry and the visitors also start crying. So, it happens like this. Well, when you are going to the new world, will anyone cry like this there? Anyone may die [there]. Hm? And there is no question of dying there at all. Hm? What do you say? Does one leave the body, change the body or die? What does one do there? Yes, he changes the body, the dress. Body is called a dress, isn’t it? (Continued)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2861-Bilingual-Part-2

समय- 14.38-34.21
Time- 14.38-34.21


तो बाबा कहते हैं कि अगर रूप और बसंत हो तो अपना बताओ। वो तो रतन ही मुख से निकालेंगे। कौन? कौन? जो रूप और बसंत बनेंगे वो मुख से रतन ही निकालेंगे। पत्थर कभी नहीं निकालेंगे। बस। ये अपन को सब समझ लेवें कि अगर हम कुछ भी पत्थर निकालते हैं या किसी को झरमुइ-झगमुइ सिवाय ज्ञान की और दूसरी बातें बताते हैं तो हम वो ही पुराने पत्थर हैं। और फिर ऐसे करते-करते झरमुइ-झगमुइ पत्थर बुद्धि बनते जाएंगे‌। और पत्थर तो मिरइ पत्थर ही होते हैं ना। संगमरमर का पत्थर भी होते हैं। हँ? उन संगमरमर के पत्थर को भी तो पत्थर ही कहा जाता है ना। जवाहर को भी कहा जाता है। उसको भी कहेंगे। हीरा जवाहर है ना। उसको भी क्या कहेंगे? पत्थर। हँ? तो हीरा, मोती, माणिक, पन्ना, ये सब पत्थर ही पत्थर हैं। हँ? किसकी मिसाल दी? अरे यहां 9 कुरी के ब्राह्मण बनते हैं ना। तो उनकी मिसाल उन नौ रत्नों से दी जाती है। तो सब क्या हैं अभी? हँ? सब पत्थरबुद्धि है। कोई पारस बुद्धि नहीं बना है। हँ? तो अभी ये लक्ष्मी-नारायण तो पत्थरबुद्धि नहीं हैं। न तो वो जो स्वर्ग में होंगे। और ये तो वो बनने हैं रतन, जिन रत्नों से तुमको इतनी साहुकारी मिलती है।

तो वहां तो तुम उन रत्नों से खेलते-करते हो। अरे वहां तो भित्तियों में लगाते हो। हँ? रतन कब, कब कोई होता है भित्तियों में लगा हुआ देखा? इस दुनिया में कहीं देखा? नहीं। अरे, वहां तो भित्तियों में रतन लगे रहते हैं। कहां? कौन सी भित्ति? भित्ति माने दीवार। कौन सी भित्तियों में रतन लगे रहते हैं? हँ? वहां तो जो प्राकृतिक रूप से पहाड़ों की गुफाओं में जो प्रकृति महल बनाएगी ना, उन महलों में भी उनकी रोशनी आती रहेगी। अब इस दुनिया में तो गले में पहनते हैं या भित्तन में पहनते हैं? हँ? भित्तन में लगाते हैं, इतना तुम्हारे पास होते हैं क्या? कारीगर रखना पड़ता है भित्ति में लगाने के लिए‌। हां, जैसे यहां भी कोई अच्छी जगह है। तुम देखते हो मंदिर तो बहुत ही हैं। ये जैनियों के मंदिर भी देखे होंगे कलकत्ते में जिसमें शीशे-शीशे जड़े रहते हैं‌। खंबले बनाते हैं किसम-किसम के। और ये रतन जोड़ते हैं उनमें। उन खंभों को सुहैना बनाने के लिए जोड़ते हैं। तो ये तो पत्थर और जिसके बनाते हैं, बनते हैं ना शीशे के। हाँ, तो वहां ऐसे-ऐसे खंबले में हीरे, मोती, जवाहर लगे रहते हैं।

21.11.1967 का प्रातः क्लास, आठवां पेज, मंगलवार। हां, तुम कोई काम नहीं समझे। नाम तो देखो। क्या नाम है वहां? स्वर्ग, पैराडाइज, जन्नत। अरे, तुम उनके मालिक बनते हो। तो वो मालिक बनने के लिए फिर ऐसी शिकल चाहिए ना। बोल अच्छे चाहिए। और कोई को बोल सुनना होवे तो आकरके यहां सुने। तो बोल कैसे सुनते हैं? नहीं, तो लॉ क्या कहते हैं? जब हम वानप्रस्थ में जाते हैं वाणी से परे, तो हमारा आवाज बहुत जैसे सूक्ष्म वतन में क्योंकि वो सूक्ष्म वतन तो इस दुनिया से पार हो गया ना। हँ? पहले सूक्ष्म पीछे फिर निर्वाण धाम में जावेंगे। तो ये तो लॉ है, कायदा है। ये इतना सूक्ष्म क्योंकि ये प्रैक्टिस करके आई है। ऐसे सूक्षम। हां, आहिस्ते-आहिस्ते। देखो, रोटी ले आओ, खाना बनाओ, भाजी बनाओ। ऐसे-ऐसे वो रडियां-वार्ता नहीं। उनको तो रडियां कहेंगे। जो यहां से बात करे, आवाज करे, तो बाहर में, दरवाजे के बाहर में सुनने में आवे। नहीं। जो यहां बात करें और बाहर के दरवाजे में सुनने आवे तो वो तो जानवर हो गए। और जानवर का आवाज देखो कितना दूर से सुनने में आता है। हँ? अब बंदर जब जंगल में कूक मचाते हैं तो बहुत दूर से आता है आवाज सुनने में, जब आवाज करते हैं तो। तो यहां भी आवाज जो जोर से चलता है ना वो तो फिर बंदर मिसल हो गए। यहां तो आवाज भी जोर से नहीं करना चाहिए। नहीं। यहां बहुत करके कभी-कभी बच्चों को शिक्षा दी जाती है। अरे, तुम इस दुनिया को सूक्ष्म वतन बनाओ। हँ? आहिस्ते-आहिस्ते बनाओ। पीछे एक, दो, तीन रोज थोड़ा चलते हैं फिर वो ही जोर से बोलना, कूक मारना बंदरों की। ऐसे-ऐसे है। क्योंकि ऐसे मेजॉरिटी हैं वो। अब ऐसी आवाज करने वाले माइनॉरिटी बनने ही हैं।

अभी माइनॉरिटी हो ना तुम बच्चे। दुनिया के हिसाब से तो माइनॉरिटी हुए ना। तो देखो, कितने मुट्ठ भर हो। हां, बस अभी ब्राह्मण हो। लेकिन अभी तो बहुत ब्राह्मण बनने के है। हँ? कितने ब्राह्मण बन जावेंगे? हँ? अरे, कितने बनेंगे? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) बस, 4.5 करोड़? लाख? अच्छा? बाकी ब्राह्मण नहीं बनेंगे? अरे, दुनिया में जितने मनुष्य मात्र हैं सबको ब्राह्मण तो बनना ही पड़ेगा। हां, कोई निची कुरी के ब्राह्मणों से जन्म लेंगे। कोई ऊंची कुरी के ब्राह्मण बनेंगे। सारी दुनिया को ब्रह्मा की औलाद नहीं बनना है? हँ? जब ब्रह्मा के द्वारा सारी सृष्टि रची गई तो क्या सिर्फ स्वर्ग की ही सृष्टि रची गई? नर्क की नहीं रची गई? कहते हैं ब्रह्मा को ज्ञान चंद्रमा। तो जब रोशनी से भरपूर होता है तो वैसी दुनिया बनेगी। और जब काला, कलाहीन हो जाता है तो दुनिया कैसी बनाएगा? काली दुनिया बनाएगा ना? हां।

तो बताया बहुत ब्राह्मण बनेंगे। तो जब मेजॉरिटी बनेंगे ना, तब फिर ज्ञान भी अच्छी तरह से समझेंगे‌। पीछे इन बातों को समझेगा। अभी मैनॉरिटी है थोड़ी। अच्छा चलो बच्ची, टोली ले आओ। ले आकर लेकर बोलते हैं हम खा लेते हैं। नहीं तो उठा कर चाखरी-वाखरी लगा देते हैं कि अभी, अभी आपस में भेंट करो। नहीं तो बाबा ऐसे भी कोई राय देते हैं कि जाओ, भेंट करो कि हम कैसे हैं? नहीं तो हम ही तुमको बता देवें। फूलों में से भी देख करके बाबा बताय देंगे। हँ? इस समय में अगर तुम मर जाओ तो तुम ये फूल बनेंगे।

मीठे-मीठे रूहानी सीकिलधे बच्चों प्रति, पुरुषार्थी बच्चों के प्रति। अब पुरुषार्थी तो कोई है नहीं। अरे, पुरुषार्थी कोई नहीं है तो क्या है? हँ? धनार्थी हैं सारी दुनिया में? अरे, बाहर की दुनिया में धनार्थी होंगे, हँ, धन के अर्थ सब कुछ करने वाले। यहां तो ब्राह्मणों की दुनिया में धनार्थी होंगे या पुरुषार्थी होंगे? हँ? हां, देह याद आती है घड़ी-घड़ी। अपनी भी देह याद आती है, देह के संबंधी याद आते हैं जिनसे संबंध जुड़ा है जन्म-जन्मांतर। जोड़ा है ना। हां, वो याद आते हैं। तो पुरुषार्थी तो कोई है ही नहीं। क्या कहेंगे? कोई भी नहीं है। तो कहेंगे देह अर्थी है। काहे के लिए सब कुछ करते हैं? और ज्यादातर किस लिए करते हैं? देह के लिए करते हैं, स्वार्थ के लिए। स्व। स्व माने अपना; रथ माने शरीर। तो अपने शरीर के लिए करते हैं। तो सारे ही दुनिया मैं स्वार्थी हो गए ना। हँ? ब्राह्मणों की दुनिया में भी ज्यादा टाइम स्वार्थ में लगाते हैं कि पुरुषार्थ में लगाते हैं, परमार्थ में? कोई भी नहीं है परमार्थी, न पुरुषार्थी। ऐसे भी पुरुषार्थी होते हैं। कहां छूटें जाकरके कोई-कोई कहें हम अपन तो, अपना घर बनावेंगे। घर फूटा हुआ है। घर, यहां बैठे भी घर याद आता रहता है। ऐसे भी पुरुषार्थी हैं। अरे, बाबा कहते हैं विनाश सामने खड़ा है। और वो क्या कहते हैं वो क्या सोचते हैं? घर बनावें। अभी उनको पुरुषार्थी कहेंगे, हँ, कि देह की सुरक्षा के लिए घर बनाय रहे? विनाश होगा, भूकंप आएंगे, बड़े-बड़े भूकंप आएंगे, महल-माड़ियां, अटारियां, फ्लैट, सारे सौ-सौ, दो-दो सौ माल के बनाए रखे हैं और वो ताश के पत्तों की तरह टूटेंगे तो फिर शरीरों की रक्षा होगी? हँ? बनाने से फायदा है? तो बताओ, अब उनको क्या पुरुषार्थी कहेंगे? और ऐसे नहीं समझो कि बाबा झूठ बोलते हैं, बाबा दस्सा मारते हैं। बाबा रियल बात कहते हैं। और तुम बच्चों के सामने मुंह पर ही कहते हैं। क्या? यहां अभी कोई पुरुषार्थी बने नहीं हैं।

अब बाबा कहते हैं रूहानी मीठे-मीठे पुरुषार्थी, आज्ञाकारी, वफादार। अभी आज्ञा किससे करेगा बाबा? हँ? आज्ञा करें, गईबराई कर देते हैं। ध्यान नहीं देते। फिर दुबारा आज्ञा करो, तिबारा करो। अरे, ऊपर से तू तडाक ताली भी बजती है, रड़ियां मारेंगे, प्रेरणा भेजेंगे। भेजेंगे ना? अरे, आज्ञा करेंगे तो जरूर साकार द्वारा करेंगे ना। हँ? नहीं तो निराकार हैविनली गॉडफादर, सुप्रीम सोल आज्ञा कैसे करेंगे? फिर ये भी किसी को नहीं मालूम है बच्ची। ऐसे-ऐसे हमारे पास बहुत हैं। हँ? अच्छे-अच्छे बहुत फर्स्टक्लास, फर्स्टक्लास जिनको ये मालूम ही नहीं है, हँ, कि साकार बिगर बाबा कुछ भी आज्ञा कैसे करेंगे, बताएंगे कोई कुछ कैसे? समझा ना? ये तो ठीक है। हम बाप को याद करते हैं। याद करना है। पर अगर उनको समझाना होगा तो फिर किस द्वारा समझावेंगे? हँ? हँ? जिस द्वारा समझाएंगे उसके साथ तो तू-ताली बजेगी, बजाएंगे? कई समझते हैं कि नहीं, हमको तो प्रेरणा से सब कुछ मिल जावेगा। हँ? बाप बोले धूर भी नहीं मिलेगा। कोई को कुछ भी नहीं मिलेगा। अच्छा, मीठे-मीठे सीकिलधे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का दिल व जान सिक व प्रेम से यादप्यार और गुडमॉर्निंग। (समाप्त)

So, Baba says – If you are Roop (beauty) and Basant (spring), then tell about yourself. They will cause only gems to emerge from their mouths. Who? Who? Those who become Roop and Basant will cause only gems to emerge from their mouths. They will never cause stones to emerge. That is it. Everyone should realize that if we cause some stones to emerge or if we speak wastefully or if we speak of topics other than knowledge, then we are those old stones only. And then while doing like this, while speaking wasteful topics, we will go on developing stone-like intellect. And stones are stones only, aren’t they? There are stones of marble also. Hm? Those marble stones are also called stones only, aren’t they? Gems are also called [stones]. That will also be called. Diamond is a gem, isn’t it? What will that also be called? Stone. Hm? So, diamond, pearl, ruby (maanik), emerald (panna), all these are stones only. Hm? Whose example was given? Arey, Brahmins of 9 categories develop here, don’t they? So, they are compared with those nine gems. So, what is everyone now? Hm? All have stone-like intellects. Nobody has developed elixir-like intellect (paarasbuddhi). Hm? So, now these Lakshmi and Narayan don’t have stone-like intellect. Neither those who will be in heaven. And these are to become those gems, the gems through which you get such prosperity.

So, there you play with those gems. Arey, there you fix them on the walls. Hm? Have you ever seen gems embedded on the walls? Have you seen anywhere in this world? No. Arey, there gems are embedded on the walls there. Where? Which wall (bhitti)? Bhitti means wall. Gems are embedded on which walls? Hm? The palaces that nature will build there in the caves of mountains in a natural form, will it not? In those palaces also their light will keep on emerging. Now in this world do you wear them around your neck or do you fix them on walls? Hm? Do you have so many [gems] that you fix them on the walls? You have to employ an artisan to embed on the wall. Yes, for example, there is some nice place here as well. You observe that there are many temples. You must have also seen the Jain temples in Calcutta where glasses are embedded. They erect pillars (khambley) of different kinds. And they embed these gems on them. They embed them to make those pillars beautiful. So, these are made up of stones and they build with glass, don’t they? Yes, so the diamonds, pearls, gems are embedded on the pillars there.

Morning class dated 21.11.1967, eighth page, Tuesday. Yes, you did not understand any task. Look at the name. What is the name there? Swarg, Paradise, Jannat. Arey, you become masters of that. So, in order to become that master you need such face, don’t you? The speech should be good. And if anyone wants to hear speech they can come here and listen. So, how do you listen to speech? Otherwise, what does the law say? When we reach the stage of vaanprasth, beyond speech (Vani se parey), then our voice will become very, just like in the Subtle Region because that Subtle Region is beyond this world, isn’t it? Hm? First subtle, then later you will go to the nirvaandhaam (abode of silence). So, this is the law, the rule. It is so subtle because this one has come after practicing. Such subtle. Yes, gradually. Look, bring a roti, cook food, cook vegetables. Do not cry like this. That will be called cries. If someone speaks here, creates a sound, then it should not be audible outside, outside the door. No. If someone speaks here and if it is audible outside the door, then they are animals. And look, the sound of the animals is audible from such a distance. Hm? Well, when monkeys shout in the jungle, then their voice is audible very far away, when they shout. So, even here those who speak loudly are like monkeys. Here the voice too shouldn’t be loud. No. Here, mostly sometimes children are given teachings. Arey, you make this world a Subtle Region. Hm? Make it gradually. Later, they follow for one, two, three days; then they start speaking loudly, start shouting like the monkeys once again. It is like this. It is because they are in majority. Now those who create such sound are going to be in minority.

Now you children are in minority, aren’t you? From the point of view of the world you are in minority, aren’t you? So, look, you are just handful. Yes, that is it; you are now Brahmins. But now a lot of Brahmins are to get ready. Hm? How many Brahmins will get ready? Hm? Arey, how many will get ready? Hm?
(Someone said something.) Is that all? 4.5 crores? Lakhs? Achcha? Will the remaining people not become Brahmins? Arey, all the human beings in the world will certainly have to become Brahmins. Yes, some will get birth from the Brahmins of lower category. Some will become Brahmins of higher category. Will not the entire world become Brahms’s children? Hm? When the entire world was created through Brahma, was just the world of heaven created? Wasn’t that of hell created? Brahma is called the Moon of knowledge. So, when he is full of light, then the world will be formed accordingly. And when he is dark and devoid of celestial degrees, then what kind of a world will he create? He will create a dark world, will he not? Yes.

So, it was told that many Brahmins will be created. So, when majority become [Brahmins], then they will understand the knowledge also nicely. Later he will understand these topics. Now you are in minority. Achcha, daughter, bring tolii. They bring and say – We eat. Otherwise, they pick it up and apply chaakhri that now, now you compare each other. Otherwise, Baba gives such an advice also that go and compare that how are we? Otherwise, I will tell you. Baba will tell by observing from among the flowers. Hm? If you die at this time, you will become this flower.

To the sweet, sweet, spiritual, seekiladhey children, to the purusharthi (those who make efforts for the sake of purush, i.e. soul) children. Well, nobody is a purusharthi. Arey, if nobody is a purusharthi, then what are they? Hm? Are they dhanaarthi (those who make efforts to earn wealth) in the entire world? Arey, there will be dhanaarthi, those who do everything for the purpose of wealth (dhan) in the outside world. Here, in the world of Brahmins will there be dhanarthis or purusharthis? Hm? Yes, the body comes to the mind every moment. Our own body also comes to the mind, the relatives of the body with whom a relation has been established since many births come to the mind. You have established, haven’t you? Yes, they come to the mind. So, nobody is a purusharthi at all. What would you say? Nobody is [purusharthi]. So, it will be said that they are deh arthi (those who make efforts for the body). What do they do everything for? And for whom do they do most of the time? They do for the body, for the self (swaarth). Swa. Swa means our; rath means body. So, they do for their body. So, people in the entire world are swaarthi, aren’t they? Hm? Even in the world of Brahmins do they spend more time in selfishness (swaarth) or in purusharth (making efforts for the soul), parmaarth (making efforts for others)? Nobody is either a parmaarthi or a purusharthi. There are such purusharthis also. Some say - How should I get free so that I can build my own house? The house is broken. Even while sitting here, the house keeps on coming to the mind. There are such purusharthis also. Arey, Baba says – Destruction is staring at you. And what do they say, what do they think? Let us build a house. Well, will they be called purusharthis or are they building a house for the safety of the body? When destruction takes place, when earthquakes occur, when big earthquakes occur, when palaces, buildings, flats, all the hundred storeys, two hundred storeys that have been built and they will break like a [house built with a] pack of cards; then will their bodies be protected? Hm? Is there any benefit in constructing? So, tell, now will they be called purusharthis? And do not think that Baba speaks lies, Baba bluffs. Baba speaks the real thing. And He says on the face of you children. What? Nobody has become a purusharthi here now.

Now Baba says – Spiritual, sweet, sweet, purusharthi, obedient, loyal; Well, whom will Baba order? Hm? He orders, they ignore. They do not pay attention. Then order second time, third time. Arey, over and above that they speak disrespectfully, they clash, they cry, they send inspiration. They will send, will they not? Arey, when He orders, then He will definitely order through the corporeal, will He not? Hm? Otherwise, how will the incorporeal Heavenly God Father, Supreme Soul order? Then nobody knows this as well daughter. There are many such people with us. Hm? Nice ones, very first class, first class, those who do not know at all that how will Baba issue any orders without the corporeal, how will He tell anything? You have understood, haven’t you? This is correct. We remember the Father. We have to remember. But if He has to explain, through whom will He explain? Hm? Hm? The one through whom He will explain, will you talk disrespectfully to him? Many think that no, we will get everything through inspiration. Hm? Father said – You will not even get ash. Nobody will get anything. Achcha, Father (Baap) and Dada’s remembrance, love and good morning from His heart and with love and affection to the sweet, sweet, seekiladhey (found after a long gap of time), spiritual children. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2862, दिनांक 26.04.2019
VCD-2862, dated 26.04.2019
रात्रि क्लास 21.11.1967
Night Class dated 21.11.1967
VCD-2862-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.58
Time- 00.01-22.58


आज का रात्रि क्लास है – 21.11.1967. बताया – तो इनको समझाने के लिए बाप भी अड़ जाते हैं। किनको? सन्यासियों को। ‘भी’ क्यों लगा दिया? जैसे ये हठयोगी अड़ जाते हैं, तो बाप भी अड़ जाते हैं। कौनसा बाप अड़ जाते हैं? दो बेहद के बाप हैं। आत्माओं का बेहद का बाप हैविनली गॉड फादर शिव सुप्रीम सोल। और मनुष्य सृष्टि का, साकार सृष्टि का बाप, साकार मनुष्यधारी, तनधारी। कौन अड़ जाते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जैसे वो अड़ जाते हैं तो ये भी अड़ जाते हैं। क्यों? अड़ जाना अच्छी बात है क्या? नहीं। अरे, वो तो उन लोगों ने भक्तिमार्ग में दिखाय दिया है ना कि शिव की सवारी किसके ऊपर? वो दिखाते हैं बैल के ऊपर। तो बैल अड़ जाता है कि नहीं? हाँ।

वो कहावत है ना जट्ट पढ़यो अल्लाह अड़यो। हँ? जट बुद्धि होते हैं ना। हरियाणा में कौनसे होते हैं? जाट। हाँ। ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं होते हैं। बताया – जट्ट पढ़यो, अल्लाह अड़्यो। जो ऊँच ते ऊँच है उसको अल्लाह गाया जाता है। किससे ऊँच ते ऊँच? किससे टैली किया? हँ? कोई से टैली किया ना। हाँ। जो भी धरमपिताएं हैं उन धरमपिताओं में सबसे ऊँच। ये बात तुमने कभी सुनी है कि जट्ट अड़यो, अल्लाह; वो जट्ट पढ़्यो, अल्लाह अड़्यो? नहीं सुना है ना। कहा जाता है कोई जट्ट पढ़ जाता है ना तो बस वो ट्रां-ट्रां करते रहते हैं। हँ? और फिर अल्लाह भी बिचारे तंग हो जाते हैं। अल्लाह को बिचारा कह दिया? हँ? हाँ, वो देखो, वो देखो, वो। हाँ। ये नहीं कहा – मुझे देखो। वो, हँ, वो देखो। किसको देखो? हाँ। वो देखने में आता है? फिर? वो देखो बाप भी कितना तंग हो जाते हैं। ये शास्त्र बहुत पढ़े हैं।

बाप ने समझाया था ये पढ़ाई इतनी है भक्तिमार्ग की। जितना ये मनुष्य सृष्टि का झाड़ बड़ा है। और ये झाड़ है ना बच्ची। देखो, इस झाड़ में कितने पत्ते हैं। हँ? वो बनियन ट्री का मिसाल दिया जाता है। बहुत बड़ा झाड़ है। कितना चारों तरफ फैल गया। तो कोई पत्ते गिनेगा? हँ? पत्ते भी हैं, मनुष्य भी हैं। बहुत कुछ है। और फिर देखो इस झाड़ को कितना लंबा-चौड़ा लगता है। अच्छा, उसके नीचे में देखो। नीचे क्या है? नीचे में कुछ है ही नहीं। हँ? जो मुख्य जड़ है वो तो बहुत पहले ही सड़ गई। तो क्या होगा? जहाँ जड़ें होंगी वहाँ फिर तना भी दिखाई पड़ेगा। तो मुख्य जड़ भी गायब और तना भी गायब। कुछ है ही नहीं। अब है वो बीज रूप। बीज माने? बीज माने बाप। सो तो एक सेकण्ड की बात है ना। क्या एक सेकण्ड की बात? हँ? कि वो बड़ा रूप जो है इतना बड़ा झाड़ का रूप दिखाई देता है; हँ? भक्तिमार्ग में दिखाते हैं ना भगवान का विराट रूप। तो उसमें सारा झाड़ समाया हुआ है। बीजरूप बनने में देर लगती है। बाप बताते हैं कि तुम बड़ा, इतना बड़ा, जो शरीर है इतना बड़ा दुंब थोड़ेही हो। तुम क्या हो? तुम तो ज्योतिबिन्दु बीज आत्मा हो।

तो भक्तिमार्ग का कितना प्रस्ताव हो गया है देखो। विस्तार कितना हो गया है। हँ? जैसे भारत, स्वर्ग में भारत तो बहुत छोटा था। और फिर जब द्वैतवादी द्वापरयुग से दूसरे-दूसरे धर्म आए, हँ, दूसरे-दूसरे राज्य स्थापन हुए, भाषाएं आईं, हँ, दूसरे-दूसरे कुल बने, अनेकों मतें बनीं। तो देखो, वो धरणी का कितना विस्तार हो गया। तो विस्तार को क्या कहेंगे? भक्ति या सार? भक्ति कहेंगे। ख्याल करो कितना वेद, शास्त्र, ग्रंथ, उपनिषद, ट्रां-4. अभी इतना जो पढ़े हुए हैं कितना झाड़ जितना, अभी उनको एक सेकण्ड में पढ़ाने में अभी वो जब भूलें ना सभी इतना जो पढ़े हुए हैं। पढ़े बैठे हैं ना। तभी बाबा कहते हैं भक्तिमार्ग में ये सभी जट बन पड़े। जट्ट बुद्धि। और हम हार जाते हैं। समझा ना? और इनको फिर सुधारने के लिए; हँ? ये हार जाते हैं। कौन हार जाते हैं? इस मनुष्य सृष्टि का जो बीज रूप बाप है वो हार जाते हैं कि जीत जाते हैं? हँ? हार जाते हैं। हँ? समझा ना?

तो फिर इनको फिर सुधारने के लिए मुझे वहाँ ऊपर से आना पड़ता है। मुझे माने किसे? हँ? सुप्रीम सोल बाप को, हँ, वो आत्माओं का जो धाम है, जहाँ ढ़ेर की ढ़ेर आत्माएं रही पड़ी हैं। मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच की सामान्य आत्माएं ढ़ेर की ढ़ेर होती हैं कि स्पेशल ढ़ेर की ढ़ेर होती हैं? सामान्य। तो मुझे वहाँ छोड़करके आना पड़ता है इन जटों को, हँ, सुधारने के लिए। परन्तु कितना मत्था मारना पड़ता है! कितना? हँ? कितना मत्था मारना पड़ता है? अरे, कम से कम कितना? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) सौ साल? अरे? वो मत्था आकरके एक से मारता है बड़े ते बड़ा जटबुद्धि से कि 500-700 करोड़ से माथा मारता है? मारता है? हँ? सुप्रीम सोल शिव आता है तो इस दुनिया में बड़े ते बड़ा जट्ट बुद्धि कौन है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 50 साल बाद? अच्छा? 36 से लेकरके 50 साल कब हुए पूरे? हँ? 50 साल तो सन् 87 में ही हो गए। हँ? तो मत्था मारने का काम बंद हो गया? हँ? जब 50 साल पूरे होते हैं, हँ, तो असली मत्था मारने का काम शुरू होता है। हाँ। तो बताया कितना मत्था लगता है।

अभी ऐसे जो शंकराचार्य हैं, हँ, वो हो गया सन्यासियों का हैड। हँ? ऐसे। ऐसे माने कैसे? जैसे ये जट्ट बुद्धि हैं ना। कौन? कौन जट्ट बुद्धि है? अरे, बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा जट बुद्धि है? अच्छा? हँ? ब्रह्मा बाबा की जो आत्मा है उस आत्मा को सतयुग में जन्म देने वाला जट्टबुद्धि नहीं है? हँ? मत्था जास्ती किसको मारना पड़ता है? और किसके साथ? अरे? पूछा तो क्या करने लगे? हाँ। जास्ती मत्था किसको मारना पड़ता है? अरे, सुप्रीम सोल बाप को, हैविनली गॉड फादर को मत्था मारना पड़ता है ना। किसके साथ? हाँ, जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं उसके साथ मत्था मारना पड़ता है। मत्था मारने में; क्या? समझाना पड़ता है ना। हाँ। तो किसको समझाए? समझाए किसको? हँ? हाँ, आकरके बताते हैं कि तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। और आत्मा बनने में कितनी देर लगती है? शरीर को भूलो और मैं ज्योतिबिन्दु आत्मा। तो शंकराचार्यों के लिए मिसाल दिया। जो शंकराचार्य कैसे? ऐसे। जैसे ये जट बुद्धि है, ये तो मनुष्य सृष्टि में सबका बाप है ना। तो शंकराचार्यों का भी बाप है कि नहीं? और सभी धरमपिताओं का बाप है कि नहीं? सभी धरमपिताओं का भी पिता। तो वो हो गया सन्यासियों का हैड। कौन? कौन हो गया सन्यासियों का हैड? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं उसके द्वारा बोलते हैं – बच्चे, तुम्हारा बाप आया हुआ है। तो क्या सन्यासियों का बाप नहीं आया हुआ है? हाँ, सबका बाप आया हुआ है। सभी धरमपिताओं का, सभी धरमपिताओं के सहयोगी धरमपिताओं का, उनके फालोअर्स का, सबका बाप आया हुआ है।

तो इन सबमें ये तीखा है। क्या कहा? सबमें माने किसमें? इन सब सन्यासियों में सबसे जास्ती ये तीखा है। कितने सन्यासियों में? बड़े ते बड़े सन्यासी कौन हैं और कितने हैं? हँ? बताओ। अरे?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो, लो, और दस में पहले को भी शामिल कर लिया? इन सबमें। किसमें? हाँ, सारे ही धरमपिताएं जितने भी हैं वो सब सन्यासी हैं। हँ? सम्पूर्ण न्यासी, सम्पूर्ण त्यागी। किसको त्याग देते हैं? बाप आकरके जो सुख की दुनिया स्थापन करते हैं ना 100 परसेन्ट उस 100 परसेन्ट सुख की दुनिया को भी त्याग देते हैं। हमें सुख स्वरग के नहीं चाहिए। तो बाप कहते हैं ये उनसे भी जास्ती तीखा है। तुम्हें तो वो 16 कला संपूर्ण स्वरग के सुख नहीं चाहिए। हँ? और वो अतीन्द्रिय सुख जो विष्णु लोक में विष्णुवंशी आत्माएं भोगती हैं, वो भी नहीं चाहिए। वो तो सब छोड़ के चले जाते हैं। धरमपिताएं कोई जाते हैं विष्णु लोक में या 16 कला संपूर्ण स्वर्ग में? नहीं जाते ना। नहीं जाते। तो ये उन सबसे कैसे तीखा है? ऐसे तीखा है कि जब तक 500-700 करोड़ ये सब न भाग जाएं। क्या? इस दुनिया को छोडें कि नहीं छोड़ें? सब छोड़ जाएं। और उनमें ज्यादा संख्या किसकी है? विधर्मियों की या स्वधर्मियों की? विपरीत धर्म वालों की। तो जो भी विपरीत धर्म वाले हैं, चाहे; कौन? चाहे चन्द्रवंशी हों, चाहे इस्लामवंशी हों, चाहे बौद्धी, क्रिश्चियन वंशी या उनके सहयोगी धरमपिताएं हों, हँ, वो सब जब तक न त्याग दें इस दुनिया के सुख को; हाँ, तो वो तो इस दुनिया के सुख को त्यागते हैं। विष्णु लोक का भी सुख नहीं चाहिए, स्वरग का भी सुख नहीं चाहिए। त्याग देते हैं ना? हाँ।

तो देखो ये किसको नहीं मानता है। ये माने कौन? ये इतने बड़े-बड़े जो दुनिया को छोड़करके सुख को छोड़के चले जाते हैं जो बाप आकरके 100 परसेन्ट सुख की दुनिया स्थापन करते हैं, हँ, ये उनको भी नहीं मानता। मानता है? नहीं। ये द्वारका का शंकराचार्य है। क्या कहा? दो अरिका। एक अरिका नहीं। हाँ। और किसी ने कहा – पुरी का है। हाँ, पुरी का तो शायद ये है। माने पुरी है पूरब में। हँ? और द्वारिका? द्वारिका है पश्चिम में। तो पुरी का ये शायद है। किसी ने कहा – पुरी का ये है। पुरी का ये है। द्वारिका का है। और हाँ। किसी ने कहा – श्रृंगेरी का है। हँ? श्रृंग गिरि का है। श्रृंग माने सींग। पता नहीं कहां का है। कहां-कहां के हैं। परन्तु इन सबमें, जो भी हिस्ट्री में आदि शंकराचार्य हुए ना, उन्होंने जो चार भारत के कोनों पे चार मठ स्थापन किये ना उन सबमें ये सबसे मगरूर है। कौन? हँ? उन सबमें ये सबसे मगरूर है। ये माने कौन? हँ? मगरूर माने अडियल। हाँ।

अभी देखो पढ़ा क्या हुआ है? कितना पढ़ा है? ये क्या-क्या बोलते हैं? क्या? ऐसे नहीं कि ये अंग्रेजी बिल्कुल नहीं जानते हैं। अंग्रेजी भी जानते हैं। जब बोलें तो बहुत अच्छा बोलें। तो इतना पढ़ा है जो बाप समझे क्या इनको समझाकर करेगा? ये जट कभी भी नहीं सुधरेगा। हँ? सुधरेगा? हँ? हाँ? सुधरेगा? कुछ भी हो जाए ये सुधरेगा कभी नहीं। इतना पढ़ा है! अब बाप की पढ़ाई तो सेकण्ड की। क्या सेकण्ड की पढ़ाई? अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो। कोई भी छोटा बच्चा कलम पकड़े और यूं रख दे। तो बिन्दु हो जाएगा कि नहीं? हाँ। हँ? तो इतना पढ़ा है जो बाप समझे कुछ भी हो जाएगा, ये सुधरेगा नहीं। अब बाप की पढ़ाई सेकण्ड की है। क्या? कि बीजरूप है ना। कौन? हँ? जो सुप्रीम सोल बाप है वो तो है ही परमानेन्ट बीज। कभी देह भान में आता है? नहीं। तो सेकण्ड की पढ़ाई पढ़ाते हैं। बीजरूप की पढ़ाई। तो बीज रूप तो देखो तुम बच्चे अभी बीज को जानने से तुम सारे झाड़ को जान गए हो ना बच्चे। बाप भी कहते हैं कि मुझे बीज को जानने से सारे झाड़ का ज्ञान आ जाता है।

Today’s night class is dated 21.11.1967. It was told – So, the Father also becomes stubborn on explaining to these. To whom? To the Sanyasis. Why was ‘also’ added? Just as these hathyogis become stubborn, the Father also becomes stubborn. Which Father becomes stubborn? There are two unlimited fathers. The unlimited Father of the souls is the Heavenly God Father Shiv, the Supreme Soul. And the Father of the human world, the corporeal world is the corporeal human being having a body. Who becomes stubborn?
(Someone said something.) Yes, just as they become stubborn, this one also becomes stubborn. Why? Is it good to be stubborn? No. Arey, those people have shown on the path of Bhakti that on what does Shiva ride? They show him on a bull. So, does a bull become stubborn or not? Yes.

There is a saying, isn’t it? Jatt padhyo allah adyo (if a Jat becomes educated, Allah becomes adamant). Hm? There are people with Jat-like (adamant) intellect, aren’t there? Which types of people live in Haryana? Jat. Yes. They are not much educated. It was told – Jatt padhyo, Allah adyo. The highest of high is sung as Allah. Highest on high compared to whom? With whom was he tallied? Hm? He was tallied with someone, wasn’t he? Yes. Highest among all the founders of religions. Have you heard this topic at any time that Jatt adyo, Allah; No, Jatt padhyo, Allah adyo? You haven’t heard; have you? It is said that if a Jatt becomes educated, then that is it; he keeps on uttering something wastefully. Hm? And then Allah, the poor fellow too becomes helpless. Was Allah termed ‘a poor fellow’? Hm? Yes, look at that, look at that, that. Yes. It was not said – Look at me. That, hm, look at that. Whom should you see? Yes. Is that one visible? Then? Look, that Father also becomes so helpless. This one has read a lot of scriptures.

The Father had explained that this study of the path of Bhakti is as extensive as this human world tree. And there is this tree, isn’t it daughter? Look, there are so many leaves in this tree. Hm? An example of that Banyan tree is given. It is a very big tree. It has spread so much everywhere. So, will anyone count the leaves? Hm? There are leaves as well as human beings. There are many things. And then look at this tree; it appears so tall and wide. Achcha, look at it below. What is below? There is nothing at all below. Hm? The main root has already become rotten long ago. So, what will happen? Wherever the roots exist, the stem will also be visible. So, the main root has also vanished and the [main] stem has also vanished. Nothing exists. Well, it is seed-form. What is meant by seed? Seed means Father. That is a topic of a second, isn’t it? What is the topic of a second? Hm? That the big form appears to be such a big form of a tree; hm? On the path of Bhakti the gigantic form (viraat roop) of God is depicted, isn’t it? So, the entire tree is contained in it. It takes time to become seed-form. The Father tells that you are not a big, such a big body, such a big tail. What are you? You are a point of light, seed soul.

So, look, the path of Bhakti has expanded so much! It has expanded so much! Hm? For example, India, in heaven India was very small. And then, when other religions came from the dualist Copper Age, hm, when other kingdoms were established, when other languages started, hm, when other clans were established, when numerous opinions emerged, then look, that Earth expanded so much! So, what will you call the expanse? Bhakti or essence? It will be called Bhakti. Just think over, there are so many Vedas, scriptures, books, Upanishads, tran-4; Well, all that you have studied like the tree, now teaching that in a second, now when you forget all that you have studied; You have studied, haven’t you? Only then does Baba say that all these have become Jats on the path of Bhakti. Jatt-like intellect. And we lose. You have understood, haven’t you? And in order to reform them; hm? This one loses. Who loses? Does the seed-form Father of this human world lose or does he win? Hm? He loses. Hm? You have understood, haven’t you?

So, then in order to reform these people I have to come from there, up above. ‘I’ refers to whom? Hm? The Supreme Soul Father, hm, that abode of the souls, where numerous souls live. Are the ordinary souls of the human world stage numerous or are the special ones numerous? Ordinary ones. So, I have to leave that place and come to reform these Jats. But I have to spoil My head so much! How much? Hm? How much do I have to spoil My head? Arey, at least how much? Hm?
(Someone said something.) Hundred years? Arey? Does He come and spoil His head on one, the one with the biggest Jat-like intellect or does He spoil His head with 500-700 crores? Does He spoil? Hm? When the Supreme Soul Shiv comes, then who has the biggest Jatt-like intellect in this world? Hm? (Someone said something.) After 50 years? Achcha? When were 50 years completed from [19]36? Hm? 50 years were completed in 87 itself. Hm? So, was the task of spoiling the head completed? Hm? When 50 years are completed, hm, then the real task of spoiling the head starts. Yes. So, it was told that so much intellect has to be used!

Now such Shankaracharya is the head of the Sanyasis. Hm? Such. Such means of which kind? Just as these have Jatt-like intellect, don’t they? Who? Who has Jatt-like intellect? Arey, speak up.
(Someone said something.) Does Brahma Baba have Jat-like intellect? Achcha? Hm? Doesn’t the one who gives birth to the soul of Brahma Baba in the Golden Age have a Jatt-like intellect? Hm? Who has to spoil his head more? And with whom? Arey? What did you start doing when you were asked? Yes. Who has to spoil his head more? Arey, the Supreme Soul Father, the Heavenly God Father has to spoil His head, doesn’t He? With whom? Yes, the permanent Chariot in whom He enters, He has to spoil His head with him. While spoiling His head; what? He has to explain, doesn’t He? Yes. So, whom should He explain? Whom should He explain? Hm? Yes, He comes and tells that you are a point of light soul. And how long does it take to become a soul? Forget the body and I am a point of light soul. So, an example was given for the Shankaracharyas. How are those Shankaracharyas? Such. Just as this one has a Jat-like intellect; this one is the Father of everyone in the human world, isn’t he? So, is he the Father of the Shankaracharyas also or not? And is he the Father of all the founders of religions or not? He is the Father of all the founders of religions. So, he happens to be the head of the Sanyasis. Who? Who is the head of Sanyasis? (Someone said something.) Yes, the permanent Chariot in which He enters, He says through him – Children, your Father has come. So, hasn’t the Father of the Sanyasis come? Yes, everyone’s Father has come. The Father of all the founders of religions, Father of all the helper founders of religions of all the [main] founders of religions, Father of their followers, everyone’s Father has come.

So, this one is intelligent among all these. What has been said? ‘All these’ refers to whom? Among all these Sanyasis this one is most intelligent. Among how many sanyasis? Who are the biggest Sanyasis and how many are they? Hm? Speak up. Arey?
(Someone said something.) Yes, the one, look, and among the ten have you included the first one also? Among all these. Among whom? Yes, all the founders of religions are Sanyasis. Hm? Complete nyasis (trustees), complete tyaagi (those who sacrifice). What do they sacrifice? The world of 100 percent happiness that the Father comes and establishes, they renounce even that world of 100 percent happiness. We don’t want the pleasures of heaven. So, the Father says that this one is more intelligent than all those. You do not want the pleasures of that heaven perfect in 16 celestial degrees. Hm? And that super sensuous joy, which the Vishnuvanshi souls enjoy in the abode of Vishnu, you don’t want that either. All of them leave and depart. Do any of the founders of religions go to the abode of Vishnu or to the heaven perfect in 16 celestial degrees? They don’t go, do they? They don’t go. So, how is this one more intelligent than all those people? He is intelligent because until all these 500-700 crore run away; what? Should they leave this world or not? All of them should leave. And among them whose number is more? Is it of the vidharmis or of the swadharmis? Those of the opposite religions. So, all those who belong to the opposite religions, be it; who? Be it the Chandravanshis, be it the Islamvanshis, be it the Buddhists, be it the Christianvanshis or be it their helper founders of religions, until all of them renounce the pleasures of this world; yes, so, they renounce the pleasures of this world. [They say] We don’t want the pleasures of the abode of Vishnu also; we don’t want the pleasures of heaven also. They renounce, don’t they? Yes.

So, look, this one does not believe in anyone. This one refers to whom? These big ones who leave the world, leave the pleasures and go, the world of 100 percent happiness that the Father comes and establishes, this one does not believe even in them. Does he believe? No. This one is a Shankaracharya of Dwarika. What has been said? Do arika. Not one arika. Yes. And someone said – He belongs to Puri. Yes, perhaps he belongs to Puri. It means that Puri is in the East (poorab). Hm? And Dwarika? Dwarika is in the West (pashchim). So, perhaps this one belongs to Puri. Someone said – This one belongs to Puri. This one belongs to Puri. He belongs to Dwarika. And yes. Someone said – He belongs to Shringeri. Hm? He belongs to Shring Giri. Shring means horn (seeng). Who knows to which place he belongs. They belong to different places. But among all these, the Aadi (first) Shankaracharya who existed in the history, he established four ‘math’ (sects) in the four corners of India, among all those, this one is most stubborn. Who? Hm? Among all of them this one is most stubborn (magroor). This one refers to whom? Hm? Magroor means stubborn (adiyal). Yes.

Now look, what has he studied? To what extent has he studied? What all does he say? What? It is not as if he doesn’t know English at all. He knows English as well. Whenever he speaks he speaks very well. So, he has studied so much that the Father thinks that what He will do by explaining to him. This Jat will never reform. Hm? Will he reform? Hm? Yes? Will he reform? Whatever may happen this one will never reform. He has studied so much! Well, the Father’s teaching is of one second. What is the teaching of a second? Consider yourself to be a point of light soul. Any small child can hold a pen and place it like this. So, will a point be formed or not? Yes. Hm? So, he has studied so much that the Father thinks that whatever may happen, this one will not reform. Well, the Father’s teaching is of one second. What? He is seed-form, isn’t He? The Supreme Soul Father is anyways a permanent seed. Does He ever become body conscious? No. So, He teaches the knowledge of a second. The knowledge of seed-form. So, as regards the seed-form, look, you children have come to know the entire tree by knowing the seed, haven’t you children? The Father also says that by knowing Me, the seed, you get the knowledge of the entire tree.

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arjun
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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2863, दिनांक 27.04.2019
VCD 2863, dated 27.04.2019
रात्रि क्लास 21.11.1967
Night Class dated 21.11.1967
VCD-2863-Bilingual

समय- 00.01-27.43
Time- 00.01-27.43


रात्रि क्लास चल रहा था 21.11.1967 पहले पेज के एकदम मध्यांत में बात चल रही थी - बाप आते ही हैं स्थापना करने, सो तो स्थापना होगी और मुख्य कहते भी रहते हैं कि बच्चे कल्प-कल्प तुम आकरके मिलते हो। और आयकरके अपना राज-भाग पाते हो। तुम बच्चों को कोई तकलीफ है ये कर्मातीत अवस्था में पहुंचने की? और तो कोई गड़बड़ नहीं है बच्चों को। तो बाप समझाते रहते हैं कि कितने भी तूफान आवें; बॉक्सिंग में तो ये तूफान तो आवेंगे ही ना। बॉक्सिंग में हो। कितने भी तूफान आएं, ये आए, वो आए, उनको उड़ाए दिया। तुम ऐसे समझो ये तूफान कुछ भी नहीं हैं। ये तो बाबा के सामने तो पहले आएंगे, क्योंकि ये बाबा ही तो फ्रंट में है ना। किसके? माया के फ्रंट में पहले तो बाबा है ना। रुस्तम है ना बच्चे। बाबा ने कहा है कि रुस्तम से रुस्तम होकरके जरूर लड़ती है। और बाप भी अपना अनुभव बताते हैं। तुम जितना याद की यात्रा में रहते हो, उतना ये नहीं रह सकते हैं। कौन? ब्रह्मा बाबा नहीं रह सकते हैं क्योंकि इनको तो ढेर चिट्ठियां ये, वो, बहुत बच्चे, बहुत खिटपिट। है ना? ये सेंटर खुलवाना और उनको सपोर्ट करना, ये करना, वो करना।

21.11.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। तो ये तो समझ गए ना बच्चे है ये थोड़ी सी बात। परंतु सिर्फ बीज और झाड़ का ज्ञान देना है। झाड़ भी साकार, बीज भी साकार। सो तो बच्चों को एकदम सेकंड में बुद्धि में आवे क्योंकि वो बीज नहीं है। जिसे जैसे आम का होता है। इसमें आम आएंगे, केले का होगा तो केले आएंगे। नहीं, ये तो एक ही बीज है सारी सृष्टि का। और ये मनुष्य सृष्टि में, वैराइटी मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। क्योंकि गाया भी ऐसा जाता है कि वैरायटी विराट लीला भी कहते हैं। वैरायटी मनुष्यों की लीला है। और है भी ऐसे बरोबर। कैसे आते हैं? मनुष्यों का झाड़ देखो, थोड़ा विचार करो कि कितने ये 500 करोड़ और ये एक न मिले दूसरे से। एक के फीचर्स नहीं मिल सकते दूसरे से। एक के स्वभाव-संस्कार एक-दूसरे से मिल ही नहीं सकते। हँ? झाड़ इतना बड़ा हो गया। अब इतने देखो काले लोग ही देखो। वहां देखो तो काले ही काले। परंतु दो एक जैसे काले, तुम देखेंगे तो उनको फीचर्स नहीं देखेंगे। चीनी हैं तो सब मुनमुने-सुनमुने तुम देखेंगे। सभी एक भी एक से नहीं मिलेगा। दो एक जैसा होता ही नहीं है। ये नाटक दिखाते हैं ना बनाए करके। दो एक जैसा बना करके। परंतु कितना उनको मुंझारा हो जाता है। तो ये दिखलाते हैं कि अगर दो एक जैसे होवें तो इतना मुंझारा पड़ जावे। इनका नाटक बना करके दिखलाते हैं। बाकी होता तो कभी भी नहीं है ऐसे। अभी बच्चों को भी नहीं है।

बुद्धि में ये ही है कि वो तो भक्तिमार्ग खलास हो गया। वैसे वेद, शास्त्र, ग्रंथ, ये पढ़ना, ये इतना जो कुछ इतना भक्ति मार्ग में हम लोग पढ़ें, करें ये सब बस, सब भूल जावें। अभी जो इतना पढ़ा है उनको सब को भुलाना पड़ता है। अभी भुलाना भी जरूर पड़ता है। किसको? बस जो-जो है इस भूलने वाले शास्त्रों को सब भूलकर कर-करके बाप को याद करना। बाकी भूलते थोड़ेही हैं सब। बाप तो कहते रहते हैं। लिखा है ना "विनाश काले विपरीत बुद्धि विनश्यते"। वो तो खत्म हो जाते हैं। तुम कोई विजय नहीं पाते हैं, विजय माला में नहीं पिरोते हैं। क्योंकि विजयमाला भी तो दोनों चाहिए ना बच्ची। वो तो हुई रूद्र माला, भई चलो शांतिधाम में चले गए। फिर सुखधाम में भी तो चाहिए ना। तो फिर सुखधाम में है विष्णु की माला। तो बस ये तुम बच्चों की बिल्कुल ही इज़ी है समझना कि हमको जाना है। हमको पहले जाकरके विजय माला में पिरोना है। पहले रूद्र माला में और पीछे नंबरवार आना है सुखधाम में। विष्णुपुरी में तो पहले ही आना है। हँ। किससे पहले आना है? हँ? सुखधाम से भी पहले विष्णुपुरी में आना है। तो ये तो समझानी तो बाप बिल्कुल हीं सहज देते हैं ना। तो कहा भी जाता है सहज याद और सहज ज्ञान। ज्ञान भी तो समझा ना। क्या? बीज और झाड़। बस। बुद्धि में है बरोबर ऊपर में बीज है और नीचे झाड़ है। बस, ज्ञान आ गया। तुम लोग सब कुछ बाप जो भी कहते हैं कि मेरे को जानने से, मुझ बीज बाप को जानने से तुम बच्चे सब कुछ जान जाएंगे। हँ? बाकी जानने का कुछ भी रहेगा ही नहीं। सब जानने का रहेगा नहीं। और मैं भी चला जाऊंगा। और तुम कर्मातीत अवस्था को पहुंच जाएगा। फिर क्या होगा? फिर तो लड़ाई शुरू हो जाएगी। आखरीन लड़ाई, लड़ाई और रिहर्सल तो होगी। परंतु आखरीन लड़ाई शुरू हो जाएगी।

तो देखो बच्चों को समझ तो आ गई। आ गई ना सारी अच्छी तरह से बीज और झाड़। तो बाप कहते हैं जब तुम जो लोग जान लिया अभी बाकी तुमको क्या जानने का रहा? तो क्या बैठकर के सुनाऊँ? इसलिए जो मूल बात है पिछाड़ी तक चलने की है। क्या? मनमनाभव। सो मेरे को याद करते रहो। याद करते करते-5 कर्मातीत; कर्मातीत अवस्था आकरके पहुंच जाएगी। तो कितना शॉर्ट में ज्ञान! इतना शार्ट में! फिर मुंझते क्यों हैं? बच्चे इतना क्यों मुंझते हैं? यहां से जाकरके फिर वहां से भी मुंझते हैं, गिरते हैं। देखो, वहां बाहर की दुनिया में जाते हैं तो आसक्ति में, विकार में चले जाते हैं। झगड़ा लग पड़ते हैं। हंगामा वहां बहुत हो जाते हैं। यहां तो कोई हंगामे की बात नहीं है। वहां मित्र-संबंधी फलाना, टीरा, वातावरण, सब कुछ होता रहता है ना। यहां तो कुछ भी नहीं है। यहां तो बाप और बच्चे। और अकेले बाप। बच्चे ज्ञान को जान जाते हैं। बिल्कुल ही शांत में रहते हैं। परंतु इसमें फिर टाइम लगता है। बहुत आना है। तभी बाप धीरज देते हैं बच्चों को कि बच्चे धीरज धरो। अभी तो दर पर खड़ा, खड़े आकर के हुए हो सुखधाम के। हँ? दरवाजे पर हो। दर माने दरवाजा। ये तो समझते हो ना? कभी-कभी तो तुम ऐसे भी कहते हो कि अभी चलो, दर खुले तो हम घुस जावें। परंतु नहीं। दरवाजा तो टाइम पर ही खुलेगा। उसके लिए ठहरना है। और कर्मातीत अवस्था को भी पाना है।

बाकी ये नॉलेज तो देखो कितनी सिंपुल है। साधारण, बिल्कुल साधारण। सिर्फ बीज को और झाड़ को याद करो। और आदि, मध्य, अंत, जिसको कहा जाता है, सभी धर्मों का आदि, मध्य, अंत, सो सब तुम्हारी बुद्धि में बैठा हुआ है। और ये सारा झाड़ तुम्हारी बुद्धि में आ गया। ऐसे मत समझो कोई हम बीज और झाड़ को भले झाड़ के सभी डिटेल बुद्धि में है क्योंकि ये तो डिटेल है ना। जो देखते हो झाड़ में कि भई ये पहले-पहले हम हैं ब्राह्मण। सो देवता बनते हैं। फिर इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन, इनकी मल्टीप्लिकेशन होती रहती है। 21.11.1967 का तीसरा पेज, रात्रि क्लास, तीसरी लाइन। अब देखो इस मनुष्य सृष्टि के झाड़ में कितने ढेर मनुष्य हैं। तो ये तो सबकी बुद्धि में है ही। कुछ भी चीज मुंझने की, कुछ भी नहीं है। पीछे पता नहीं बच्चे क्यों भूल जाते हैं, मुंझते हैं। बाहर में जाते हैं तो मुंझते हैं, चिट्ठियां लिखते हैं, ये करते हैं, वो करते हैं। अरे, ये चने वाला तो कभी मुंझता नहीं है। चने बेचता रहता है और हंसता, सदैव हंसता रहता है। तो देखो, उनकी प्रैक्टिस हो जाती है ना। प्रैक्टिस किसकी हो जाती है? समझाने करने में प्रैक्टिस हो जाती है। अरे, कोई चना बेचता है। बेचते रहो। और जिनको बेचते हो उनको ये समझाते भी रहो। तो फिर कौन है सभी थोड़ी समझते हैं। फिर भी ये तो बहुत बनाते हैं ना। क्या? प्रजा। प्रजा तो बहुत बनाय सकते हैं। तो बस, उसी काम में लगे रहें। और ये ध्यान रखना है कि कहां माया की रास्ते में चोट न लग जावे। पर वहां बहुत करके गिट-गिट पिट-पिट लिखते रहते हैं। पूछते हैं ऐसे क्यों यहां लगता है? हँ? और देखो यहां तो कुछ भी नहीं लगता है। यहां बैठे हैं।

बाबा रोज समझाते हैं अच्छी तरह से। पढ़ाने वाला टीचर है। उनको तो जरूर बात करेंगे। बाप को भी याद करेंगे, गुरु को भी याद करेंगे जरूर। ऐसे थोड़ेही है कि कोई तीनों ही भूल जाएंगे। कोई तो ऐसा होगा जो अच्छा कायम रहेगा। बस। तो कोई कायम रहेगा, कोई नहीं। तो बस वो ही तो बात है ना। कोई भी कायम रहे याद किसकी भी वो ही तो मनमनाभव हुआ ना। इसमें मुंझने की भी तो कोई बात, कोई यानी तीनों में कोई भी याद आवे क्योंकि बात तो एक ही है ना। वो ही हमारा बाप, वो ही टीचर, वो ही गुरु। इसलिए ये सहज कर दिया है। भला ब्राह्मण हैं वो तो बुद्धि में भला याद है। तभी भी ये स्टूडेंट्स हैं हम बाप के। कोई भी बात उठाओ बहुत सहज लगती है। बाकी ये ज़रूर होता है जो दिल में या कहां भी जाते हैं तो ये खुशी रहनी चाहिए बच्चों को। जो गाया हुआ है अतींद्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो। तो सुख होना चाहिए ना। परंतु जब जाते हो वहां, बाहर की दुनिया में, तभी सबका तो नहीं होता है। कोई का तो होता रहता है कुछ ना कुछ परसेंटेज में। अब 70 परसेंट सत्य पाठ, 50 या 40 ये ऐसे करते-करते हैं, ऐसे-ऐसे रहते हैं ना। बाकी जाकर के 1, 2 पर्सेंट में रहते हैं। ये रहते हैं। याद रहती जरूर है। बाकी कहेंगे 1, 2 परसेंट।

अच्छा, चलो बच्ची। म्यूजिक बजाया कि हम को घर जरूर जाना है। दुनिया की तो किसको मालूम नहीं है कि हमको घर जाना है। तुम बच्चों को सिर्फ याद है कि हमको घर जाना है। इसलिए घर याद आवे तो अच्छा ही है। अंत मते सो घर में जाकरके पहुंचेंगे। बाबा का घर है। वो जो हैं ना सन्यासी, वो बोलते हैं कि ब्रह्म घर है। वो ऐसे नहीं कहते हैं कि ब्रह्म में रहने वाले बाबा का घर है। वो तो जानते नहीं हैं। अगर तुम ये समझते हो, जानते हो कि बाप घर में रहते हैं और आप भी घर में रहते हैं। बाबा कहते हैं कि मुझे घर को, हँ, और अपने-अपने अपनी याद करो आत्मा की। अगर वो कहें कि नहीं, घर को याद करो। तो भी उस में कुछ फर्क नहीं रहता है। क्योंकि ज्ञान तो बच्चों में है ना कि घर में बाबा है। बाबा के पास चले जाएंगे। और वहां कौन बैठा होगा घर में? बाप आया है। सो तो साथ में ही ले जाएंगे ना। इसलिए इसको शिव की बारात कहते हैं। समझा ना?

और आत्माओं को ही शिव की बरात कहते हैं। हाँ। जो आत्मिक स्थिति में स्थित नहीं होते हैं उनके लिए नहीं कहते हैं। आत्मा बनते हैं। नहीं तो शंकर के लिए, पार्वती के लिए तो, तो फिर बरात फिर चाहिए देवताओं की। वो फिर ये आत्माओं की थोड़ी कहेंगे। तो वो देवताओं की बरात तो होती नहीं है। वो तो होती है आत्माओं की। बहुत सूक्ष्म वतन में तो अब कोई बरात होती नहीं है। हां, स्वर्ग में हो सकती है। सुखधाम में बरात हो सकती है। बाकी सूक्ष्म वतन में तो बरात हो ही नहीं सकती। हां, हो सकते हैं तब जब भक्ति मार्ग में हैं। जबकि बहुत ज्ञान में मजबूत हो जाते हैं, भक्ति में मजबूत हो जाते हैं और उनको ये निश्चय हो जाता है कि हां, शंकर पार्वती को जाकर के वर सकेंगे, वर पाएंगे। वर के आएंगे तो बरात नहीं आएगी। तो बस, अगर किसको निश्चय होगा और बहुत निश्चय होगा तो साक्षात्कार हो जाएगा। और उस साक्षात्कार से तो कुछ फायदा ही नहीं है। ऐसे ही जैसे हनुमान को, गणेश को, फलाने को होते हैं, साक्षात्कार हो जाते हैं वहाँ पर। ऐसे तैसे उसमें भी फायदा नहीं है कोई। अच्छा, मीठे-मीठे सीकिलधे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का दिल वा जान सिक व प्रेम से यादप्यार, गुड नाइट। (समाप्त)

A night class dated 21.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the very end of the middle portion of the first page was – The Father comes only to establish; so, that establishment will take place and He mainly keeps on telling that children, you come and meet [Me] every Kalpa. And you come and obtain your fortune of kingship. Do you children face any difficulty in reaching this karmaateet stage? There is no other confusion for the children. So, the Father keeps on explaining that you may face any number of storms; you will definitely face these storms in boxing, will you not? You are in boxing. You may face any number of storms, this [storm] may come, that [storm] may come; you remove them. You just think that these storms are nothing. Baba will face these storms first because this Baba alone is in the front, isn’t He? In front of whom? Baba is in front of Maya first, isn’t He? Children, He is rustom, isn’t He? Baba has said that she [Maya] definitely fights with rustoms like a rustom. And the Father also narrates his experience. This one cannot remain on the journey of remembrance as much as you remain. Who? Brahma Baba cannot remain [on the journey of remembrance] because he gets numerous letters, this, that, many children, many problems. Is it not? Getting this center opened and extending support to them, doing this, doing that.

Second page of the night class dated 21.11.1967. So, children, you have understood this little topic, haven’t you? But you have to just give the knowledge of the seed and the tree. The tree is also corporeal and the seed is also corporeal. So, that should come into the intellect of the children in a second because it is not that seed. For example, there is the seed of mango. It will produce mangoes. If it is of banana, it will produce bananas. No. This is only one seed of the entire world. And in this human world, it is a tree of variety human world. It is because it is also sung that it is also called a variety gigantic (viraat) drama (leela). It is a drama of variety human beings. And it is also rightly like this. How do they come? Look at the tree of the human beings; just think a little that these are 500 crores and these do not match with each other. The features of one cannot match with the other. The natures and sanskars of one cannot match with those of another at all. Hm? The tree has grown so huge! Now, look, so many, look at the black people only. If you look there, everyone is black only. But no two blacks are alike; if you see, you will not see their features [to be alike]. If there are Chinese people, then you will find all of them to be munmuney-sunmuney. All of them, not even a single person will be like another one. Two persons are not alike at all. These dramas are produced and depicted, aren’t they? They make two persons alike. But they get confused so much. So, it is shown that if two persons are alike then there will be so much confusion. Their dramas are produced and depicted. But it never happens like this. Now children also are not like that.

It is in our intellect that that path of Bhakti has ended [for us]. Reading the Vedas, scriptures, books, all that we read, did on the path of Bhakti, we have to forget all this. Now we have to forget all that we have studied. Now we also have to forget without fail. Whom? That is it; we have to forget all the scriptures and remember the Father. But does everyone forget [these things]? The Father keeps on telling. It is written isn’t it? Vinaashkaaley vipreetbuddhi vinashyate (those who have an intellect opposite to God at the time of destruction get destroyed). All of them perish. You don’t achieve victory, you don’t get threaded in the rosary of victory because both are required in the Vijaymala, aren’t they daughter? That is Rudramala (rosary of Rudra); okay brother, they went to the abode of peace. Then people are required in the abode of happiness as well, aren’t they? So, then there is a rosary of Vishnu in the abode of happiness. So, that is it; it is very easy for you children to understand that we have to go. First we have to go and get threaded in the rosary of victory. First in the Rudramala and then later we have to come numberwise in the abode of happiness. We have to come first in the abode of Vishnu. Hm. Before whom do we have to come? Hm? We have to come first to the abode of Vishnu before the abode of happiness. So, the Father gives this completely easy explanation, doesn’t He? So, it is also said – Easy remembrance and easy knowledge. You have understood the knowledge as well, haven’t you? What? The seed and the tree. That is it. It is in your intellect that rightly the seed is above and the tree is below. That is it; you got the knowledge. You people, everything, whatever the Father says that by knowing Me, by knowing Me, the seed-form Father you children will know everything. Hm? There will not be anything else to know at all. There will not be any need to know everything. And I will also depart. And you will reach the karmaateet stage. What will happen after that? Then the fight will begin. Ultimately fighting, fighting and then rehearsal will take place. But ultimately the fighting will begin.

So, look, children have understood. You have understood everything nicely, the seed and the tree, haven’t you? So, the Father says – When you people have understood, then what else is there for you to know now? So, what should I sit and narrate? This is why the original topic is to continue till the end. What? Manmanaabhav. So, keep on remembering Me. While remembering-5 you will reach the karmaateet stage. So, the knowledge is so short! It is so short! Then why do you get confused? Why do children get confused so much? After going from here, they get confused from there also and fall. Look, when you go there to the outside world, then you fall into attachment, into lust. Fights erupt. A lot of uproar takes place there. Here, there is no question of uproar. There, the friends, relatives, etc., the atmosphere, everything keeps on happening, doesn’t it? Here, there is nothing. Here, it is the Father and the children. And the Father alone. Children get to know the knowledge. You remain in complete peace. But then it takes time. A lot has to come. Only then does the Father gives patience (assurance) to the children that children, have patience. Now you are standing at the doorstep of the abode of happiness. Hm? You are at the entrance (dar). Dar means door. You understand this, don’t you? Sometimes you also say that now let’s move; let us enter as soon as the door opens. But no. The door will open at its time only. You have to wait for it. And you also have to achieve the karmaateet stage.

But look, this knowledge is so simple. Simple, completely simple. Remember just the seed and the tree. And that which is called the beginning, middle and the end; the beginning, middle and the end of all the religions; so, that has sat in your intellect. And this entire tree has come in your intellect. Do not think that the seed and the tree; although all the details of the tree are in our intellect because this is a detail, isn’t it? You see that in the tree that brother, first of all it is we brahmins. We become deities. Then Islamic, Buddhists, Christians; their multiplication keeps on taking place. Third page of [Vani dated] 21.11.1967, night class, third line. Now look, there are so many human beings in this human world tree. So, this is indeed in the intellect of everyone. There is nothing to be confused; nothing. Later, who knows why children forget, get confused? When they go out they get confused, write letters, do this, do that. Arey, this one who sells peas never gets confused. He keeps on selling the peas and laughs, he always keeps laughing. So, look, he develops the practice, doesn’t he? Who develops the practice? He develops the practice in explaining, etc. Arey, someone sells peas. You may keep selling. And to those to whom you sell, you also keep on explaining to them. So, then does everyone understand as to who is he? However, they make a lot, don’t they? What? Subjects (praja). They can make a lot of praja. So, that is it; they should remain busy in that task only. And you have to keep this in mind that you shouldn’t suffer any injury by Maya on the way. But there mostly they keep on writing git-pit, pit-pit (wasteful things). They ask – Why do we feel like this here? Hm? And look, we don’t feel anything here. We are sitting here.

Baba explains everyday nicely. The one who teaches is the teacher. You will definitely talk to him. You will remember the Father also and you will remember the Guru also without fail. It is not as if anyone will forget all the three. There must be someone who remains steadfast nicely. That is it. Some will remain steadfast, some will not. So, that is it; it is the same topic, isn’t it? You may remain steadfast in the remembrance of anyone; it is Manmanaabhav only, isn’t it? There is no question of confusion in this; ‘Anyone’ means that any of the three should come to the mind because the topic is one and the same, isn’t it? He alone is our Father, He alone is our Teacher, and He alone is the Guru. This is why it has been made easy. We are Brahmins; your intellect remembers that. However, we are students of the Father. You may raise any topic, it appears very easy. But it is certain that in the heart or wherever you go, children should have this joy. It is sung that if you wish to ask about super-sensuous joy, then ask the Gop-Gopis. So, there should be happiness, shouldn’t it be there? But when you come there, in the outside world, then everyone doesn’t have. Some experience it in some or the other percentage. Well, 70 percent true lesson, 50 or 40, they do like this; they live like this, don’t they? Ultimately it remains 1, 2 percent. It remains. The remembrance is definitely there. But it will be said 1, 2 percent.

Achcha, let’s move daughter. Music was played that we have to definitely go home. Nobody in the world knows that we have to go home. Only you children remember that we have to go home. This is why it is good if the home comes to your mind. As will be your thoughts in the end, you will reach the home accordingly. It is Baba’s home. Those Sanyasis are there, aren’t they? They say that Brahm is home. They do not say that it is the home of Baba who lives in Brahm. They do not know. If you understand this, know that the Father lives in the home and you also live at home. Baba says - Remember Me, the home, and remember your soul. If they say that no, remember the home. Yet, there is no difference in it. It is because children have the knowledge that there is Baba at home. We will go to Baba. And who else will be sitting there at home? The Father has come. So, He will take us along, will He not? This is why it is called Shiv’s marriage party (baaraat). You have understood, haven’t you?

And it is the souls who are called Shiv’s marriage party. Yes. It is not said for those who don’t become constant in soul conscious stage. You become souls. Otherwise, for Shankar, for Parvati a marriage party of deities is required. That will not be said to be that of these souls. So, the marriage party of the deities doesn’t exist. That [marriage party] is of the souls. There is no marriage party in the Subtle Region. Yes, it can exist in the Golden Age. The marriage party can exist in the Golden Age. But there cannot be a marriage party in the Subtle Region. Yes, it is possible when you are on the path of Bhakti. When you become very strong in knowledge, when you become strong in Bhakti and when they develop faith that yes, we will be able to marry Shankar-Parvati. If you marry and come, then the marriage party will not come. So, that is it, if someone has faith and a lot of faith, then he will have vision. And there is no benefit from that vision at all. It is same as if you have the vision of Hanuman, of Ganesh of such and such one there. Similarly, there is no benefit in that as well. Achcha, remembrance, love and good night of spiritual Father and Dada from His heart and life, with love and affection to the sweet-sweet, seekiladhey (found after a long time), spiritual children. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

Dear jaycdp,

Om Shanti.

Please note that this thread is not for discussion, but for just posting the Murlis.

I request the Admins to please move the posts of jaycdp to another appropriate topic.

OGS,
Arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2864, दिनांक 28.04.2019
VCD 2864, dated 28.04.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.1967
VCD-2864-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.45
Time- 00.01-19.45


आज का प्रातः क्लास है - 22.11.1967. बुधवार को रिकार्ड चला है – तूने रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय के। हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाए। हँ? किसने बोला गीत? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? ऊपरवाला गीत भी गाता है? हँ? हम बच्चों से कहता है गीत गाना नहीं है, गीत सुनना नहीं है। हँ? हँ। वो गीत गाता नहीं है। ये ड्रामा ऐसा बना हुआ है। जो गीत गाने वाले हैं या जो भी कवि कविता करने वाले हैं वो भाव-विभोर होकरके, भावना में भरकरके जो बोलते हैं वो सत्य बोलते हैं। ठीक है ना। यहाँ बात है - किसको बोला रात गंवाई सोय के? तूने रात गंवाई सोय के। अच्छा। चलो, तो जो गीत बनाने वाले हैं वो खुद रात नहीं गंवाते हैं सोय के? हँ? हाँ, तो इसका मतलब, ये असली भावना पहले-पहले, हँ, उनकी नहीं है। तो किसकी है? सुप्रीम सोल बाप ही जब आते हैं इस सृष्टि पर, हाँ, तो उनकी भावना है बच्चों के प्रति। भावना नहीं, सच्चाई है। क्या? जो बताते हैं - तूने रात गंवाई सोय के। तूने। एक ने या अनेक ने? सबसे जास्ती रात किसने गंवाई सोय के? हँ? वो हद की नींद सोने की बात नहीं करता है। वो तो बेहद का बाप है। तो कौनसी नींद की बात करता है? हँ? बेहद की अज्ञान नींद में सोने की बात है। हँ? कौनसी रात गंवाई? जो बेहद की रात है ब्रह्मा की रात। ब्रह्मा का दिन। शास्त्रों में गाया हुआ है ना। आधा टाइम ब्रह्मा का दिन। आधा टाइम ब्रह्मा की रात। जैसे वो स्थूल रात होती है – 12 घंटे की रात और 12 घंटे का दिन।

तो बताया – कि बाप तो आते ही हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, हँ, जब रात पूरी होना होती है, घोर अंधियारी रात, तब आकरके बच्चों को जगाते हैं। कहते हैं, बच्चे तूने रात गंवाई सोय के। कौनसी अज्ञान नींद में सोय के गंवाई? हँ? अरे, ये ज्ञान नहीं है। किस बात का? हाँ, आत्मा का ज्ञान नहीं है। अपन को देह समझते हैं। तो देह समझना माना अज्ञान। क्योंकि देह तो जलाय दी जाती है। मिट्टी में मिलाय दी जाती है। ये देह कोई रहती है क्या? नहीं। तो आत्मा तो अजर, अमर, अविनाशी है। वो कोई खत्म होने वाली तो नहीं है। तो अपन को आत्मा समझने की बात पहले। आत्मा समझेंगे तो जैसे यहाँ अज्ञान की नींद से जाग गए। और जब जाग गए, तो देह तो नहीं समझेंगे; और जो देह है उसमें तो इन्द्रियां होती हैं सुख भोगने के लिए; ज्ञान इन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां। तो जो ज्ञानेन्द्रियों से सुख तो देवताएं भी भोगते हैं। ज्ञान की इन्द्रियां हैं ना। ज्ञान से सुख होता है या दुख होता है? ज्ञान से सुख होता है। तो ज्ञानेन्द्रियों से भी सुख ही होगा या दुख होगा? सुख ही होगा।

तो वो ब्रह्मा का दिन हो गया। कौनसा? स्वर्ग। आधा समय सृष्टि रूपी रंगमंच पर स्वर्ग, सुख की दुनिया, जहाँ दुख का नाम-निशान नहीं है। और आधा समय ये दुख की दुनिया। द्वापर और कलियुग। द्वैतवादी युग, जहाँ दो-दो धरमपिताएं, दो-दो से चार-चार, धरमपिताओं की संख्या बढ़ती जाती है। धर्मों की संख्या बढ़ती जाती है। फालोअर्स की संख्या बढ़ती जाती है। राज्य दो-दो से चार-चार बढ़ते हैं ना। अनेक राज्य हो जाते हैं। अनेक धर्म हो जाते। अनेक भाषाएं हो जाती। अनेक कुल हो जाते। अनेक मत-मतान्तर। तो, तो ये द्वैतवादी दुनिया में फिर दुख होता है। क्या? अरे, दो बर्तन होंगे तो टकराएंगे ना। हाँ।

तो बताया ये जो है द्वापरयुग से ब्रह्मा की रात है। इस ब्रह्मा की रात में जो भी प्राणी मात्र हैं इस दुनिया में सब; क्या? भोगी तो हैं। देवताएं भी भोगी होते हैं। लेकिन वो तो ज्ञानेन्द्रियों से सुख भोगते हैं। हँ? अपन को आत्मा समझते हैं। आत्मिक स्थिति में स्थित रहते हैं इसलिए दुख की कोई बात होती नही। लेकिन जब द्वैतवादी द्वापरयुग में आते हैं तो धरमपिताएं तो ये जानते ही नहीं हैं कि आत्मा का भी कोई सुख होता है। आत्मा स्थिति में रहकरके सुख भोगा जा सकता है। वो तो फिर अपन को देह समझते हैं। और देह में भी जो मुख्य कामेन्द्रिय है, उस कामेन्द्रिय का ही सुख; सुख शुरुआत में नहीं। शुरुआत में सतोप्रधान हर चीज़ होती है इस दुनिया की। तो जो भी धरमपिताएं आते हैं पहले-पहले तो सतोप्रधान होते हैं। और कर्मेन्द्रियां हैं उन कर्मेन्द्रियों में भी तो नंबरवार हैं ना। कि सब एक जैसी हैं? नहीं हैं। हिंसक इन्द्रियां भी हैं, अहिंसक भी हैं। नंबरवार हैं।

तो बताया देह समझने के कारण वो अज्ञान आ जाता है। क्या? किस बात का अज्ञान? कि कोई को दुख नहीं देना है। दुख काहे से होता है? हिंसा करने से दुख होता है। हिंसा को ही दुख कहा जाता है। दुख देना माना हिंसा करना। तो ये अज्ञान है जिसके कारण ये दुख होता है। तो दुख देने वालों में भी और इन्द्रियों का सुख लेने वालों में भी कर्मेन्द्रियों का, अव्वल नंबर है, दोयम नंबर है, नंबरवार ही होंगे ना। तो कोई अव्वल नंबर होता है या नहीं होता है? हँ? इन्द्रियों का सुख लेने में, जन्म-जन्मान्तर ब्रह्मा की रात्रि में अज्ञान अंधकार की रात्रि में, कोई सबसे जास्ती इन्द्रियों का सुख भोगता है कामेन्द्रिय के द्वारा? कहते हैं राजाओं ने बहुत सुख भोगा है ढ़ाई हज़ार वर्ष की हिस्ट्री में। बहुत-बहुत रानियां रखते थे। तो ये ज्ञान हुआ कि अज्ञान हुआ? अपन को देह समझकरके देह की इन्द्रिय से और कामेन्द्रिय से सुख भोगा। दूसरे का दुख नहीं देखा। अपना सुख भोगा। स्वार्थी हो गए। रथी। रथी माने देह के ऊपर कन्सन्ट्रेशन रहता है। आत्मा को तो जानते ही नहीं।

तो बताया, जो अव्वल नंबर सुख भोगने वाली आत्मा है इस सृष्टि रूपी रंगमंच की वो कौन? कहेंगे इस मनुष्य सृष्टि का बाप। हँ? वो मनुष्य सृष्टि का बाप मनुष्य से देवता भी बनता है सतयुग-त्रेता रूपी स्वर्ग में, राम-कृष्ण की दुनिया में। और वहाँ ज्ञानेन्द्रियों का सुख भी सबसे जास्ती भोगता है। और वो ही आत्मा जब द्वैतवादी द्वापरयुग में आती है धरमपिताओं के संसर्ग-संपर्क में, संग के रंग में आती है ना, तो वो आत्मा तो मां का पार्ट है कि बाप का ही पार्ट है? क्या है? दोनों का ही पार्ट है। वो परमब्रह्म भी है परम ब्रह्मा। परन्तु परमब्रह्मा कहा नहीं जाता है। क्योंकि तन तो पुरुष का है ना। इसलिए परमब्रह्म कहा जाता है। हाँ। जो भी ब्रह्मा नामधारी हैं, अम्मा नामधारी हैं, अम्मा के रूप में सहनशक्ति का पार्ट बजाने वाली माताएं हैं उनमें अव्वल नंबर माता। तो माता जो है वो तो मोह की कीड़ी होती है द्वापरयुग में। हँ? हाँ, और जो जितने भी परिवार के सगे-संबंधी देह के हैं, उनके प्रति, हाँ, उनके प्रति सबसे जास्ती त्याग की भावना किसमें होती है? कौनसे संबंध में? माता में होती है। तो वो माताओं में सबसे बड़ी माता भी है और मनुष्य सृष्टि का बाप भी है। क्या? कौन? जिसको कहा जाता है, भारतवासी लोग मानते हैं, जानते हैं, जगतम पितरम वंदे। जगत का पितर है, पिता। पिता है कि माता भी है? माता भी है। क्योंकि शिव जिस तन में प्रवेश करते हैं वो उस मनुष्य सृष्टि के बाप का मुकर्रर तन है जिसे कहते हैं अर्जुन का रथ। तो वो रथ हो गया; क्या? हँ? क्या हो गया? रथ हो गया पांच तत्वों का पुतला। पांच तत्वों का पुतला माना धरणी। धरणी में पांचों तत्व होते हैं ना। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश।

तो ये जो परमब्रह्म है एक ही आत्मा और वो एक ही आत्मा जो जगतपिता भी है इस मनुष्य सृष्टि का, जिसे भारत में कहते हैं शंकर, जगतपिता। हाँ। तो वो एक ही है। देह के रूप में है तो माता का पार्ट। और आत्मिक रूप में है तो आत्मा तो पुरुष है कि स्त्री है? क्या है? पुरुष है। तो पुरुष भी है अव्वल नंबर इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल पार्ट बजाने वाला और वो स्त्री के रूप में भी है। परन्तु जनम तो जास्ती पुरुष के लेता है कि स्त्री के लेता है? जास्ती जनम पुरुष के लेता है क्योंकि अपन को आत्मा समझने में एक्सपर्ट हो गया ना। तो जब एक्सपर्ट हो गया तो पुरुष जन्म जास्ती और स्त्री जन्म कम। फिर भी है भोगी आत्मा। चाहे स्त्री के रूप में पार्ट बजाए, चाहे पुरुष रूप में पार्ट बजाए। भोगी आत्माएं जो हैं उनको क्या कहेंगे? वास्तव में देव आत्माओं के रूप में पार्ट बजाती हैं। तो भी तो भोगी हैं। और भोगी हैं तो नीचे गिरेंगे कि ऊपर उठेंगे? नीचे गिरेंगे।

तो जो नीचे गिरते हैं जैसे कि फाउण्डेशन तो उनका उसी समय से लग जाता है। क्या? अज्ञानता का। लेकिन पता नहीं चलता है क्योंकि इतनी धीमी गति से नीचे गिरना होता है कि कोई को पता ही नहीं चलता है कि हम नीचे गिर रहे हैं। बाकि हां, जब द्वैतवादी द्वापरयुग आ जाता है, दूसरे-दूसरे धरमपिताओं का जो देह अभिमानी होते हैं, तो उनके संग के रंग में आकरके वो देह का समझने का अज्ञान अच्छी तरह से बढ़ जाता है। और देह की इन्द्रियों से सुख भोगना वो पहले-पहले शुरु करता है। कौन? हाँ, वो ही जगत का पिता और जगत की माता जिसे, जिसकी यादगार जो है वो दुनिया की खुदाइयों में भी मिली है शिवलिंग के रूप में। सबसे जास्ती से जास्ती लिंग मूर्तियां मिली ना। तो सार्वभौमिक सत्ता हो गई ना। और भारत में तो गांव-गांव में, शहर-शहर में और वो शिवलिंग के मन्दिर बने ही हुए हैं। भारत में तो मानते ही हैं कि वो ही; क्या? वो ही मात-पिता है। और मन्दिर में जाके बोलते भी हैं – तुमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव सर्वम मम देव देव। तुम मेरे सब कुछ हो। सर्व संबंधी हो।

तो वो समझते तो ये हैं कि वो भगवान है। अरे, भगवान तो एक होता है। भगवान अनेक नहीं होते हैं। और वो भगवान जो एक है वो तो हैविनली गॉड फादर है। हैविन की रचना करने वाला है और हैविन की रचना करने वाला किस तरह से है? सुनाकरके, समझा-बुझाकरके है। ऐसे नहीं कि वो प्रैक्टिकल में हैविन रचता है। नहीं। वो रचयिता नहीं है। वो तो रास्ता बताता है। हँ? ज्ञान सुनाता है। जानकारी देता है। तो वो ज्ञान का अखूट भंडारी है। कौन? आत्माओं का बाप शिव सुप्रीम सोल। तो आत्माओं में जो भोगी आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर हैं प्राणी मात्र की, तो उनमें जो अव्वल नंबर आत्मा है, भोगी आत्माओं के बीच में सभी प्राणियों का बाप, खास करके मनुष्य सृष्टि का बाप, तो उसके लिए ये गीत पहले लागू होता है। क्या? कि तूने रात गंवाई सोय के। क्या किया? जबसे ब्रह्मा की रात शुरू हुई ढ़ाई हज़ार वर्ष से द्वैतवादी द्वापरयुग से जबसे-जबसे दूसरे-दूसरे धरमपिताएं आए दूसरे-दूसरे राज्य स्थापन हुए, दूसरी-दूसरी भाषाएं चलीं इस दुनिया में, दूसरे-दूसरे मत-मतान्तर कुल स्थापन हुए, तबसे इस दुनिया में घोर अज्ञान की रात शुरू हुई और उस रात में तूने वो अज्ञान का काम करना शुरू कर दिया जो भगवान बाप ने तो नहीं सिखाया था।

भगवान बाप तो सिखाते हैं कि बच्चे तुम आत्मा हो। आत्मा माने मन-बुद्धि की शक्ति से संपन्न आत्मा हो। तो मन-बुद्धि का जो उपयोग है वो खराब बात नहीं है। वो ही बाप सिखाते हैं कि तुम मन से, बुद्धि से कौनसा सुख भोगो? अतीन्द्रिय सुख भोगो। क्योंकि इन्द्रियों का सुख तो देह का सुख है ना। चाहे वो ज्ञानेन्द्रियों का सुख हो जो देवताएं भोगते हैं। हँ? वो देह का सुख होने से नीचे गिरेगा, नीचे ले जाएगा या ऊपर ले जाएगा? नीचे गिराएगा। तो तुम इन्द्रियों से अतीत, परे का सुख भोगना सिखाता है। हाँ। वो है वैकुण्ठ का सुख, हँ, जिसे कहते हैं विष्णु लोक का सुख। तो उसे थोड़ेही कहेंगे रात अज्ञान की। हँ? वो तो आत्मा का सुख है कि देह का सुख है? हँ? काहे का सुख है? प्योर आत्मा का सुख है। उसमें देह की इन्द्रियों का, ज्ञानेन्द्रियों का भी लेश मात्र सुख है ही नहीं। तो बताया अब ये जो रात गंवाई सोय के अज्ञान की नींद में सोय के कि मैं देह हूँ, हँ, अब इस अज्ञान की नींद से तू जाग जा।

Today’s morning class is dated 22.11.1967. The record played on Wednesday is – Tooney raat ganvaai soy ke, divas ganvaaya khaay ke. Heera janam amol tha, kauri badley jaaye. [You wasted the night in sleep; you wasted the daytime in eating. Your birth was priceless like a diamond; you are wasting it for cowries (shells)]. Hm? Who uttered the song?
(Someone said something.) Achcha? Does the above one (God) also sing songs? Hm? He tells us children that you should not sing songs; you should not listen to songs. Hm? Hm. He does not sing songs. This drama itself is such. The singers of the songs or the poets who pen the songs, whatever they speak out of emotions, full of sentiments, they speak the truth. It is correct, isn’t it? Here the topic is – Who was told that you have wasted the night in sleep? You wasted the night in sleep. Achcha. Okay, so, those who write the song, don’t they themselves waste their night in sleep? Hm? Yes, so it means that this actual feeling does not belong to them first of all. So, to whom does it belong? When the Supreme Soul Father Himself comes to this world, yes, then it is His feeling towards the children. It is not a feeling, it is a truth. What? He tells – You wasted the night in sleep. You. Is it one or many? Who wasted the night the most in sleep? Hm? He doesn’t speak of sleeping in the limited slumber (physical sleep). He is an unlimited Father. So, which sleep does He talk about? Hm? It is a topic about sleeping in the unlimited sleep of ignorance. Hm? Which night did you waste? The unlimited night, the night of Brahma. Brahma’s day. It is sung in the scriptures, isn’t it? Half the time is Brahma’s day. Half the time is Brahma’s night. For example, there is that physical night – Night for 12 hours and day for 12 hours.

So, it has been told that the Father comes to this world stage only when the night, the completely dark night is about to end; and then He comes and awakens the children. He says – Children, you lost the night in sleep. In which sleep of ignorance did you lose? Hm? Arey, you don’t have this knowledge. Of what? Yes, you don’t have the knowledge of the soul. You consider yourselves to be a body. So, to consider oneself to be a body means ignorance. It is because the body is burnt. It is mixed with the soil. Does this body survive? No. So, the soul is ajar (one who doesn’t grow old), amar (imperishable), avinaashi (eternal). It does not perish. So, the topic of considering oneself to be a soul is first. If you consider yourselves to be a soul, then it is as if you woke up from the sleep of ignorance here. And when you awakened, then you will not consider yourselves to be a body; and the body has organs to enjoy pleasures; the sense organs, the organs of action. So, even the deities enjoy pleasures through the sense organs. They are organs of sense (knowledge), aren’t they? Does knowledge lead to happiness or sorrows? Knowledge leads to happiness. So, will the sense organs also lead to happiness or sorrows? It will lead to happiness only.

So, that is Brahma’s day. Which one? Heaven. For half the time on this world stage there is heaven, the world of happiness where there is no trace of sorrows. And half the time there is the world of sorrows. The Copper Age and the Iron Age. The dualistic Ages where two founders of religion, two lead to four, the number of founders of religions keeps on increasing. The number of religions keeps on increasing. The number of followers keeps on increasing. The kingdoms increase from two to four, don’t they? Numerous kingdoms emerge. Numerous religions emerge. Numerous languages emerge. Numerous clans emerge. Numerous opinions and differences of opinion. So, so, then there is sorrow in this dualistic world. What? If there are two utensils, they will clash, will they not? Yes.

So, it was told that it is Brahma’s night from the Copper Age. In this night of Brahma all the living beings in this world; what? They indeed are bhogis (pleasure-seekers). Deities are also bhogis. But they enjoy pleasures through the sense organs (gyanendriyaan). Hm? They consider themselves to be souls. They remain constant in soul conscious stage; this is why there is no topic of sorrow. But when they enter the dualistic Copper Age, then the founders of religions do not know that there is a joy of the soul as well. One can enjoy happiness by being in soul conscious stage. They then consider themselves to be a body. And even in the body, the main organ of lust, the pleasure of that organ of lust only; Pleasure is not in the beginning. In the beginning everything in this world is satopradhan (pure). So, all the founders of religions who come are first of all satopradhan. And in case of the organs of action, those organs of action are also numberwise, aren’t they? Or are they alike? No. There are violent organs as well as non-violent organs. They are numberwise.

So, it was told that that ignorance emerges because of considering [oneself to be] a body. What? Ignorance in which topic? That one should not give sorrows to anyone. How is sorrow caused? Sorrow is caused by indulging in violence. Violence itself is called sorrow. Giving sorrows means to indulge in violence. So, it is due to this ignorance that this pain is caused. So, even among those who give pain and among those who obtain the pleasure of the organs, of the organs of action, there is number one, there is number two; they will be numberwise only, will they not be? So, is there anyone number one or not? Hm? In case of deriving pleasure of the organs birth by birth in the night of Brahma, in the night of darkness of ignorance, does anyone enjoy maximum pleasure of the organs through the organ of lust? It is said that the kings enjoyed a lot of pleasure in the history of 2500 years. They used to have many, many queens. So, is this knowledge or ignorance? They enjoyed pleasure through the organ of the body and through the organ of lust by considering themselves to be a body. They did not see the sorrow of the other person. They enjoyed their pleasure. They became selfish (swaarthi). Rathi. Rathi means that the concentration remains on the body. They do not know the soul at all.

So, it was told, the soul that enjoys number one pleasure on this world stage; who is it? It will be said – the Father of this human world. Hm? That Father of the human world also becomes a deity from a human being in the Golden Age and Silver Age like heaven, in the world of Ram and Krishna. And there he enjoys the maximum pleasure of the sense organs also. And the same soul, when it enters the dualistic Copper Age, when it comes in contact with the founders of religions; it gets coloured by the company, doesn’t it? So, does that soul play the part of a mother or does it have only the part of a Father? What is it? It has the parts of both of them. He is Parambrahm also, Parambrahma. But people don’t say Parambrahma. It is because the body is that of a male, isn’t it? This is why he is called Parambrahm. Yes. Among all the titleholders of Brahma, all the titleholders of Amma (mother), among all those mothers who play the part of tolerance in the form of a mother, he is the number one mother. So, the mother is an insect of attachment in the Copper Age. Hm? Yes, and among all the relatives of the body in a family, who has the maximum feeling of sacrifice towards them, yes, towards them? In which relation? It is in the mother. So, he is the biggest mother among the mothers and he is the Father of the human world also. What? Who? The one who is called, the residents of India believe, know him as ‘Jagatam pitaram vandey’. He is the pitar, Father of the world (jagat). Is he the Father or the mother as well? He is the mother also. It is because the body in which Shiv enters is the permanent body of that Father of human world which is called Arjun’s Chariot. So, he happens to be the Chariot. What? Hm? What is he? He is the Chariot, the effigy of five elements. An effigy of five elements means the land. There are all the five elements in the land, aren’t they there? Earth, water, air, fire, sky.

So, this Parambrahm is only one soul and that only soul, which is Jagatpita (Father of the world) also of this human world, who is called Shankar, Jagatpita in India. Yes. So, he is only one. If he is in the form of a body, then he plays the mother’s part. And when he is in the spiritual form, then is a soul male or female? What is it? It is a male. So, he is also a number one male playing a part forever on this human world stage and he is in the form of a female also. But does he get more births as a male or a female? He gets more births as a male because he has become expert in considering himself to be a soul, hasn’t he? So, when he became an expert, then he gets more male births and less female births. However he is a bhogi (pleasure-seeking) soul. He may play a part in the form of female or he may play a part in the form of a male. What will be the bhogi souls called? Actually, they play a part in the form of deity souls. Yet, they are bhogis. And if they are bhogis, will they fall or rise? They will fall down.

So, those who fall down, it is as if their foundation is laid from that time itself. What? Of ignorance. But they do not know because they fall at such slow speed that nobody gets to know at all that we are falling down. But yes, when the dualistic Copper Age of other founders of religions, who are body conscious starts, then by getting coloured by their company, that ignorance of considering oneself to be a body increases nicely. And he starts the enjoyment of pleasures through the organs of the body first of all. Who? Yes, the same Father of the world and the Mother of the World, who, whose memorial has been found in the excavations of the world also in the form of Shivling. It is the ling-form idols that have been found the most, haven’t they been? So, his is the universal power, isn’t it? And in India the temples of that Shivling have been built in every village, every city, haven’t they been? In India, people do believe that he himself is; what? He himself is the mother and the Father. And they go to the temple and also say – Tumev mata cha pita twamev (You are my mother as well as Father). Twamev sarvam mam dev dev. You are everything for me. You are all my relatives.

So, they do think that he is God. Arey, God is one. Gods are not many. And that God who is one is Heavenly God Father. He is the creator of heaven and how is He the creator of heaven? He is that by narrating, by explaining. It is not as if He creates heaven in practical. No. He is not the Creator. He shows the path. Hm? He narrates knowledge. He gives information. So, He is an inexhaustible store house of knowledge. Who? The Father of souls, Shiv, the Supreme Soul. So, among the bhogi souls of living beings among the souls on this world stage, the number one soul among the bhogi souls, the Father of all the living beings, especially the Father of the human world, this song applies to him first. What? You lost the night in sleep. What did you do? Ever since Brahma’s night started 2500 years ago, from the dualistic Copper Age, ever since other founders of religions came, ever since other kingdoms were established, ever since other languages started in this world, ever since other opinions and differences of opinion and clans started, the night of complete ignorance started in this world and in that night you started performing that task of ignorance which God, the Father had not taught.

God, the Father teaches that children you are a soul. Soul means that you are a soul with the power of mind and intellect. So, the use of mind and intellect is not a bad thing. The Father teaches that itself that which pleasure should you enjoy through the mind and intellect? You should enjoy the super sensuous joy. It is because the pleasure of the organs is a pleasure of the body, isn’t it? Be it the pleasure of the sense organs which the deities enjoy. Hm? Will that pleasure of the body cause downfall, take you down or take you up? It will cause your downfall. So, He teaches you to enjoy the happiness that is beyond the organs. Yes. That is a happiness of Vaikunth, which is called the happiness of the abode of Vishnu. So, that will not be called the night of ignorance. Hm? Is that happiness of soul or the pleasure of the body? Hm? What kind of joy is it? It is the joy of the pure soul. There is not even a trace of pleasure of the organs of the body, the sense organs. So, it was told – Now this night that you lost in sleep, in the sleep of ignorance that I am a body, hm, now you wake up from this slumber of ignorance.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2865, दिनांक 29.04.2019
VCD 2865, dated 29.04.2019
प्रातः क्लास 22.11.1967
Morning class dated 22.11.1967
VCD-2865-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-16.58
Time- 00.01-16.58


प्रातः क्लास चल रहा था 22.11.1967. बुधवार को रिकॉर्ड चला था - तूने रात गंवाई सोय के, दिवस गवाया खाय के। हीरा जन्म अमोल, कौड़ी बदले जाए। दुनियावाले तो इसका अर्थ पहले तो सोचते ही नहीं होंगे। सोचते होंगे तो सामान्य रूप से सभी आत्माओं के लिए लगाय देते हैं। लेकिन रूहानी बाप बैठकरके इसका सही अर्थ समझाते हैं। क्योंकि वो तो सिर्फ एक ही बार आते हैं। हँ? एक ही बार आकरके समझाते हैं। और हर 5000 वर्ष के बाद आते हैं क्योंकि ये सृष्टि का चक्कर ही 5000 वर्ष के बाद फिरता है। ऐसे कोई प्रश्न नहीं उठता है कि ये जो मनुष्य सृष्टि का ये जो चक्कर है, 84 का चक्कर, ये कबसे शुरू हुआ? कोई पूछे तो बस यही रिस्पॉन्ड करना है कि इसको 5000 वर्ष हुआ। और वो शास्त्रोंकारों ने तो लाखों, करोड़ों, पद्मों, ये सभी शास्त्र के गपोड़े लगाय दिए। बच्चों को बाप ने आकरके समझाया है। उन शास्त्रो में तो है भक्तिमार्ग की समझानी। बुद्धि को भगाते रहते हैं, ठहरने की बात ही नहीं। बाप आकरके तुम्हारी मन-बुद्धि को स्थिर करते हैं। वो तो जंगल में जाकरके पड़े रहते हैं। है ना? बहुत-बहुत पड़े हैं। जाकरके जंगल में पड़े हैं। नहीं तो ज्ञान अरे, अक्षर ही एक है बस, ज्ञान। ज्ञान किसके पास है? मनुष्य नहीं समझते हैं।

बाप ने समझाया है बच्चों को कि भगवानुवाच कि एक भगवान ही आकरके ज्ञान बताते हैं। मनुष्यमात्र में तो ज्ञान ही नहीं है। कोई भी देहधारियों में ज्ञान नहीं है। कोई पूछेगा - भला शंकर, विष्णु, ब्रह्मा, इन तीनों में भी ज्ञान नहीं है? नहीं, उनमें भी ज्ञान नहीं है। भले जो गाए हुए हैं "गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्साक्षात महेश्वरः"। ऐसे कहते हैं ना। परंतु नहीं। ब्रह्मा हो सकते हैं। परंतु फिर भी देने वाला फिर भी बाप चाहिए। हो सकते हैं तो गाया हुआ है परम ब्रह्मा। उस परम ब्रह्म को भी तो देने वाला परमपिता चाहिए ना? देखो, ब्राह्मण ज्ञानी होते हैं जरूर। परंतु ब्राह्मणों को सिखलाने वाला कौन? ब्राह्मण तो ब्रह्मा की ही औलाद। तो प्रैक्टिकल में कहें कि ब्रह्मा के मुख से ही सिखलाया। परंतु क्या ब्रह्मा की आत्मा ने सिखलाया? हां, नहीं। तो ब्रह्मा को भी कोई तो सिखाने वाला चाहिए ना। वो ब्रह्मा में ज्ञान कहां से आया? मूल रूप में कहां से आया ज्ञान? कोई एक तो ज़रूर चाहिए ना समझाने वाला, सिखलाने वाला।

तो ऐसे नहीं कहेंगे कि प्रजापिता ब्रह्मा, प्रजापिता ब्रह्मा ज्ञान सिखलाते हैं। किसको भी वो ज्ञान सिखलाते हैं? नहीं। क्योंकि वो तो मनुष्यों में नंबर वन है प्रजापिता ब्रह्मा। मनुष्य तो मनुष्य हैं। कोई भगवान थोड़ेही कहा जाएगा। मनुष्य को तो देवता भी नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि देवताओं का मन तो फिर भी स्थिर होता है। हँ? नहीं? देवताओं का मन तो स्थिरियम होता है। अपन को आत्मा समझते हैं। मनुष्य का मन? मनुष्यों का मन तो चलायमान रहता है। चंचल मन वाले होते हैं। हां, ये है, उन चंचल मन वाले मनुष्यों में नंबर वन है प्रजापिता ब्रह्मा। ऐसे नहीं कहेंगे कि मनुष्यों में नंबर वन लक्ष्मी-नारायण या विष्णु। हँ? किसमें नंबर वन? उनको कहेंगे देवताओं में नंबर वन। बाकी मनुष्यों में नंबर वन तो नहीं कहेंगे ना। नहीं, प्रजापिता ब्रह्मा यानी जो पीयू। प्रजा है मनुष्य मात्र। उनका बड़ा बाप। तो सिवाय प्रजापिता ब्रह्मा के और कोई तो हो नहीं सकता।

तो ये भी तो याद कर लेना चाहिए ना बच्चे कि प्रजापिता ब्रह्मा तो एक ही है। और ऐसे नहीं कहेंगे कि प्रजापिता ब्रह्मा के ब्राह्मण और इनको कोई मल्टी-मिलियन वर्ष हुआ है जो ये, ये आकरके ये जन्म लिया। अगर वो कहें मनुष्य कि मल्टीमिलियन हुआ। अच्छा, तो कैसे हुआ? वो भी तो भला बताओ। मल्टी मिलियन। अरे, कितना बरस होगा? मल्टी मिलियन ये बात तो फिर किसी को याद भी नहीं रहेगी एकदम। तो ये सभी हो जाते हैं शास्त्रों के गपोड़े। और शास्त्रों में है ही सभी गपोड़े। सारी अंधश्रद्धा, अंधविश्वास की बातें भरी हुई हैं। उसमें नंबर वन बाप ने समझाया है कि ये देखो कितने गपोड़े मारते रहते हैं।

बाप ने समझाया कि बच्चे ये जो गाया जाता है "आपे ही पूज्य, आपे ही पुजारी" ये कहा किसने? अरे, ये बाप ने तो अपने लिए नहीं कहा कि मैं ही पूज्य, मैं ही पुजारी। ऐसे तो कभी है नहीं। बाप ने कहा तुम बच्चों को। क्या? क्या कहा? हँ? आपे ही पूज्य, आपे ही पुजारी। माना तुम ही पूज्य तुम ही पुजारी। तुम सो पूज्य देवता, तुम सो पूज्य जो देवता थे सो पुजारी मनुष्य। क्योंकि हम सो का अर्थ तो निकालना ही है ना। हम सो। कौन सो? जो हम देवता थे सो अब पुजारी मनुष्य। तो फिर तुम क्या कहेंगे? हां, हम सो पूज्य, हम सो पुजारी। बाबा फिर क्या कहेंगे तुमको? तुम सो पूज्य, तुम सो पुजारी। तुम, तुमको कहेंगे। तो बच्चों को या तो अपने से कहेंगे हम सो पूज्य हम सो पुजारी? तुम किसको, तुम तो नहीं कह सकते हो ना। नहीं। तुम एक-दो में कह सकते हो कि भई तुम सो पूज्य, तुम सो पुजारी 84 जन्म के लिए बने हो। बाकी बाप को तो नहीं कहेंगे ना तुम सो पूज्य, तुम सो पुजारी। बाप को कभी तुम कहेंगे? नहीं। बाप तुम सब बच्चों को कहेंगे तुम सो पूज्य, तुम सो पुजारी। अभी बाप कहेंगे जरूर ब्रह्मा के तन द्वारा। क्यों? ऐसा क्यों? कारण? ब्रह्मा के तन द्वारा क्यों कहेंगे? अरे, कोई कारण होगा? कुछ कारण नहीं ऐसे ही? हँ? अरे, इसलिए कहेंगे कि वो तो निराकार है। उसको अपना शरीर है ही नहीं। वो तो कर्म बंधन में ही नहीं बंधता है। हँ? वो तो अभोक्ता है। भोगी तो है ही नहीं जो कर्म बंधन में बंधे। तो उसे तो मुख चाहिए ना। हाँ। तो ब्रह्मा के तन द्वारा कहेंगे। अब ब्रह्मा नहीं कह सकते हैं बच्चे। क्या? कि तुम ही पूज्य सो तुम ही पुजारी। नहीं, ये तो बाप कहते हैं क्योंकि भक्ति मार्ग में भी तो ब्रह्मा को पूजा करते हैं। हँ? तो ब्रह्मा पूज्य हुआ क्या? नहीं हुआ। मनुष्य ही तो हुआ ना? हां।

तो बाप कहते हैं क्योंकि ब्रह्मा को भी तो कहते हैं कि तुम सो पूज्य सो तुम पुजारी। फिर तुम सो अभी तुम पूज्य बन रहे हो। तुम सो पुजारी बन जाते हो। कोई एक जन्म की बात नहीं कहते हैं। नहीं। जन्म-जन्मांतर के लिए पुजारी बन जाते। ये तो शुरू से लेकरके कहते हैं। यानी पूज्य तो सतयुग में होते हैं। और पुजारी द्वापर, कलियुग में होते हैं। तो ऐसे तो किसको नहीं कहेंगे कि तुम भी तुम सो पूज्य, तुम सो पुजारी। हँ? तुम कह ही नहीं सकेंगे। कोई को नहीं कह सकेंगे। (क्रमशः)

A morning class dated 22.11.1967 was being narrated. The record played on Wednesday was - Tooney raat ganvaai soy ke, divas ganvaaya khaay ke. Heera janam amol, kauri badley jaaye. [You wasted the night in sleep; you wasted the day in eating. Your birth is priceless like a diamond; you are wasting it for cowries (shells)]. First of all the people of the world must not be thinking about its meaning at all. Even if they think, they apply it to all the souls in an ordinary way. But the spiritual Father sits and explains its correct meaning. It is because He comes only once. Hm? He comes only once and explains. And He comes after every 5000 years because this cycle of the world repeats only after 5000 years. No such question arises as to when this cycle of the human world, the cycle of 84 [births] start? If someone asks, then you should give the only respond (response) that it has been 5000 years. And those writers of the scriptures have mentioned lakhs, crores, padma (multimillions); they have bluffed all this from the scriptures. The Father came and explained to the children. In those scriptures there is an explanation of the path of Bhakti. They keep on making the intellect run; there is no question of stopping at all. The Father comes and makes your mind and intellect stable. They go and lie in the jungles. Is it not? Many, many are lying there. They have gone to lie in the jungles. Otherwise, the knowledge, arey, there is only one word, that is it; knowledge. Who has knowledge? People don’t understand.

The Father has explained to the children that God says that God alone comes and narrates the knowledge. No human being has knowledge at all. No bodily being has knowledge. Someone may ask – Don’t Shankar, Vishnu, Brahma, all these three have knowledge? No, they too don’t have knowledge. Although it is sung – “Gururbrahma Gururvishnu Gurursaakshaat Maheshwarah.” They say like this, don’t they? But, no. They can be Brahma. But however the giver the Father is required. They can be; so, it is sung – Param Brahma. The Supreme Father is required to give to that Param Brahm also, isn’t He? Look, Brahmins are definitely knowledgeable. But who teaches the Brahmins? Brahmins are the children of Brahma only. So, we can say in practical that He taught through the mouth of Brahma only. But did the soul of Brahma teach? Yes, no. So, someone is required to teach Brahma as well, isn’t He required? Where did knowledge emerge from in that Brahma? Where did knowledge emerge from [in him] originally? Someone is definitely required to explain, to teach.

So, it will not be said that Prajapita Brahma, Prajapita Brahma teaches knowledge. Does he teach knowledge to anyone? No. It is because number one among the human beings is Prajapita Brahma. Human beings are human beings. They will not be called God. A human being will not be called a deity as well. Why? It is because however the mind of deities is stable. Hm? No? The mind of the deities is constant. They consider themselves to be souls. The mind of the human being? The mind of the human beings is inconstant. They have an inconstant mind. Yes, it is true that number one among those human beings with inconstant minds is Prajapita Brahma. It will not be said that number one among the human beings are Lakshmi and Narayan or Vishnu. Hm? [They are] Number one among whom? They will be said to be number one among the deities. But they will not be said to be number one among the human beings, will they be? No. Prajapita Brahma, i.e. Piu. Praja (subjects) are the human beings. Their senior Father. So, it cannot be anyone other than Prajapita Brahma.

So, children, you should also remember that Prajapita Brahma is only one. And it will not be said that it has been multi million years since these Brahmins of Prajapita Brahma existed and that they have come and got birth. If those human beings say that it has been multi million [years]. Achcha, so how did that happen? Tell that also. Multi million. Arey, how many years is it? The topic of multi million will then not be remembered by anyone at all. So, all these are the bluffs of scriptures. And everything in the scripture is a bluff. They are full of all the topics of blind faith. In that the Father has explained that number one is that look they keep on bluffing so much.

The Father has explained that children, the phrase that people sing, ‘You yourself are worship worthy (poojya), you yourselves are worshippers (pujaari)’, who said this? Arey, the Father did not say for Himself that I Myself am worship worthy and I Myself am a worshipper. It is never so. The Father said to you children. What? What did He say? Hm? Aapey hi poojya, aapey hi pujaari. It means that you yourself were worship worthy, you yourselves are worshippers. You were worship worthy deities, you, who were worship worthy deities, have now become worshippers, human beings. It is because you have to derive the meaning of ‘ham so’, will you not? Ham so (we were that). Who were those? We who were deities have now become worshippers, human beings. So, then what would you say? Yes, we were worship worthy, we are worshippers (ham so poojya, ham so pujaari). What will then Baba say to you? You yourselves were worship worthy, you yourselves are worshippers. You; He will say to you. So will He say to the children or will He tell to Himself that I was worship worthy and I become a worshipper? You cannot say to anyone, can you? No. You can tell each other that you yourselves were worship worthy, you yourselves have become worshippers for 84 births. You will not tell the Father that you were worshipworthy and you have become a worshipper. Will you ever tell the Father? No. The Father will tell you all children that you were worship worthy and you have become worshippers. Now the Father will definitely tell through the body of Brahma. Why? Why is it so? What is the reason? Why will He say through the body of Brahma? Arey, there must be some reason. Is there no reason? Is it without any reason? Hm? Arey, He will say because He is incorporeal. He doesn’t have a body of His own at all. He doesn’t get bound in the karmic bondages. Hm? He is abhokta (one who doesn’t enjoy any pleasures). He is not at all a bhogi (pleasure seeker) that He gets bound in karmic bondage. So, He requires a mouth, doesn’t He? Yes. So, He will say through the body of Brahma. Well, Brahma cannot say children; what? That you yourselves were worshipworthy and you yourselves are worshippers. No, it is the Father who says because on the path of Bhakti also Brahma is worshipped. Hm? So, is Brahma worshipworthy? He isn’t. He is a human being only, isn’t he? Yes.

So, the Father says because He tells Brahma also that you yourself were worshipworthy and you yourself have become a worshipper. Then you are now becoming worshipworthy. You become worshippers. He doesn’t speak about one birth. No. You become worshippers for many births. He says this from the beginning. It means that worshipworthy ones exist in the Golden Age. And the worshippers exist in the Copper Age and the Iron Age. So, you will not tell anyone that you too, you were worshipworthy and you have become worshippers. Hm? You will not be able to say at all. You cannot tell anyone. (Continued)

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