Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2826, दिनांक 21.03.2019
VCD 2826, dated 21.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2826-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.05
Time- 00.01-18.05


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को ग्यारह पेज की अंतिम लाइन में बात चल रही थी - जिज्ञासु को बैठकर बताओ कि तुम अभी कुख वंशावली हो। चाहे बाहर की दुनिया वाले हों, चाहे बीके की दुनिया वाले हों, दोनों को बताओ अभी तुम कुख वंशावली हो। अभी तुम मुख वंशावली बन जाओ। सच्चे ब्राह्मण बन जाओ ना। तो ब्राह्मण से फिर तुम देवता बन जाएंगे। देवता किसको कहा जाता है? हँ? 16 कला संपूर्ण को देवता कहा जाता है या कम कलाओं वालों को देवता कहा जाता है? हँ, 16 कला संपूर्ण लक्ष्मी-नारायण मंदिरों में पूजे जाते हैं। अनेक प्रकार के लक्ष्मी-नारायण मंदिरों में पूजे जाते हैं क्या? नहीं। तो अभी उनको भी कितना समझाने की युक्ति बाबा बताते हैं। 15.11.1967 की प्रातः क्लास का 12वां पेज। कहां-कहां बाबा समझाते हैं किसको पकड़ते ही नहीं हैं, ढूंढते ही नहीं हैं। नहीं तो बतावें कि ब्राह्मण लोग कहां रहते हैं? हँ? कहां रहते हैं? अरे, ब्राह्मण लोग तो जरूर ब्रह्मपुरी में रहते होंगे, ब्रह्मा की पुरी में। अगर तुम लोग को जास्ती देखने में आना है तो भक्तिमार्ग में यादगार बना हुआ है। कहां? अजमेढ़। कहां यादगार बना हुआ है? अज माने बकरा-बकरी। मेढ़ माने मेढ़ा, जिसमें उन निकलती है ना। क्या? मेढ़ा होता है ना। उसमें साल बाई साल उसके बालों की उन निकलती है। हां, तो आज और मेढ़। क्या? भेड़ बकरियों का देश।

तो ये यादगार वहां क्यों बनाई है? हां, भेड़ बकरियों की क्या खासियत होती है? कि एक भेड़ बकरी गड्ढे में जाएगी तो सारी गड्ढे में गिर पड़ेंगी जाके। फॉलो करती हैं पक्का-पक्का। तो कहां की यादगार हुई? हँ? ये ही ब्रह्माकुमारी विद्यालय की यादगार। एक कौन सी भेड़ गड्ढे में गई? अरे, गड्ढा कहां से शुरू होता है? द्वैतवादी।
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा? ब्रह्मा से? अरे गड्ढ़ा शुरू होता है द्वैतवादी द्वापरयुग से। इस्लाम धर्म में कन्वर्ट होते हैं ना। हां। तो जो भी हैं ढेर के ढेर, हँ, उस बकरे को या मेढ़े को फॉलो करने लग पड़ते हैं। क्या? बाबा ने बताया ना त्रिमूर्ति में क्या है? एक घोड़ा है, एक बकरी है और एक शेर है। हां। तो कुछ तो उस बकरी को फॉलो करने लग पड़ते। और दूसरी होती है भेड़। क्या? हां। जो भेड़ होती है ना, जिसमें से ऊन निकलती है, हां, तो उसको फॉलो करने लग पड़ते हैं।

तो अजमेर में जाओ भला। उस अजमेर में ब्राह्मणों का ये बहुत बड़ा अड्डा है। क्या? यादगार की बात बताई अजमेर में। हां। तो कहां की यादगार है? वो तो भक्ति मार्ग में बाद में यादगार बनाई। यादगार पहले होती है कि बाद में होती है? बाद में होती है। तो उसमें ब्राह्मणों का बहुत बड़ा अड्डा। उसमें माने कहां? कहां की यादगार? अरे कोई स्थान की यादगार बनाई होगी ना। हँ?
(किसी नो कुछ कहा।) हां, माउंट आबू की यादगार। तो वहां बहुत बड़ा ब्रह्माकुमारियों का जखीरा है, अड्डा है। और हैं सब पुष्करणी ब्राह्मण। क्या कहा? पुश करते हैं ना, धक्का मारते हैं, फिर उठ जाते। कोई गाड़ी होती है ना ऐसी, हां, ठर्रा गाड़ी होती है ना। हां। तो उसका धक्का मारके चलाना होता है। तब स्टार्ट होती है। नहीं तो स्टार्ट ही नहीं। हां। तो वो पुष्कर्णी ब्राह्मण वहां रहते हैं। कहां? अजमेढ़ में कहो या माउंट आबू ब्रह्माकुमारियों का जो अड्डा है वहां ऐसे पुष्कर्णी ब्राह्मण। कौन पुश करता है? अरे एडवांस पार्टी निकलती है ना शंकर पार्टी वो कहते हैं उसे, हँ, और वो ऐसे-ऐसे ज्ञान के पॉइंट निकालते हैं कि वो हां भक्ति मार्ग के ढेर सारे दिखावे के आडंबर शुरू कर देते हैं। क्या? ये कान्फ्रेंस करो, ये मेला करो, ये मलाखड़ा करो। हां। तो सेवा करने के लिए उनको पुश करना पड़ता है कि भई, अरे, बेसिक ज्ञान ही देना है तो वो भी वहां माउंट आबू में बैठकरके थोड़े ही हो जाएगा? या सेंटरों में बैठे-बैठे थोड़े ही हो जाएगा? बाहर तो निकल ना पड़े ना। तो फिर निकलती हैं।

पुष्करणी ब्राह्मण किसको कहा जाता है वो तो तुमने समझ लिया। जिनको धक्का देके चलाया जाए उनको क्या कहेंगे? पुष्कर्णी। तो जो गीता सुनाते हैं। कौन? पुष्कर्णी ब्राह्मण गीता सुनाते हैं। समझाते नहीं हैं? सिर्फ गीता सुनाते हैं। समझाते? समझाते कुछ भी नहीं हैं। कोई पूछे भी तो ए, तुम शंकर पार्टी हो क्या? निकलो बाहर। हां। कोई प्रश्न का जवाब भी नहीं देते। तो सिर्फ गीता सुनाते हैं। एक होते हैं सारसिद्धि। हँ? अभी बताया ना। कौनसे ब्राह्मण? पुष्कर्णी। और पुष्कर्णी के मुकाबले दूसरे ब्राह्मण होते हैं सारस्वत, सारसिद्ध। सारस्वत माना? किससे बना सारस्वत शब्द? हँ? सरस्वती के पुत्र। जैसे सरस्वती थी ना। तो मुरली का एक पॉइंट उठा करके उसका ढेर सारा विस्तार सुना देती थी। हँ? कि पढ़के सुनाती थी? नहीं। विस्तार सुनाती थी। तो एक होते हैं सारसिद्ध और दूसरे होते हैं पुष्कर्णी।

तो पुष्कर्णी ब्राह्मण गीता सुनाते हैं। जो गीता सुनाने वाले हैं ना वो धामा खाते हैं। हां। खाना खाते हैं। वह गीता-वीता उतनी नहीं सुनाते हैं। क्या? धामा खाने वाले ज्यादा। और गीता सुनाने वाले कम। हां। तो जो गीता-वीता नहीं सुनाते हैं, नहीं सुनाते। वो टाइम हुआ और खाना खाने के लिए आ जाएंगे। आकरके बैठेंगे, पत्तल बिछाई और कोई गीता-वीता सुनाते हैं क्या? नहीं। धामा खाते हैं। गीता सुनाने वाले बहुत थोड़े होते हैं या ज्यादा होते हैं? बहुत थोड़े। और धामा खाने वाले? धामा खाने वाले बहुत होते हैं। तुम्हारे पास ब्राह्मण आते हैं। गीता सुनाते हैं। हँ? नहीं। पूछा जो तुम्हारे पास ब्राह्मण आते हैं, कोई-कोई आते हैं ना उधर से टूट के, तो वो क्या करते हैं? गीता सुनाते हैं? नहीं। वो शास्त्र तो कच्छ में ले करके आएंगे गीता। और आकरके बैठकरके सुनेंगे। तो उनको पुष्करणा कहते हैं। हँ? तुमको जो आकर के सुनाते हैं पुष्कर्णी नहीं। क्या कहते हैं? पुष्करणा। ऐसे क्यों कह दिया पुष्करणा? कि उनको भी ज्ञान में तुम एडवांस ज्ञान में धक्का देकर चलाओगे तो चलेंगे। और नहीं तो? नहीं तो अपना खाएंगे, पिएंगे, मस्ती मारेंगे। हाँ। तो उनको पुष्कर कहा जाता है। हँ? कहां के? अजमेढ़ के। वहां से निकले। तो वो बिल्कुल अलग हैं। कौन? धामा खाने वाले बिल्कुल अलग और गीता पढ़करके सुनाने वाले बिल्कुल अलग हैं। बाबा ने बताया ना। अभी क्या कहेंगे? गीता ज्ञान कहेंगे कि गीता ज्ञान अमृत कहेंगे? क्या कहेंगे? 1967 की वाणी में बताया। क्या कहेंगे? हँ? गीता ज्ञान कहेंगे। गीता ज्ञान अमृत नहीं कहेंगे। अमृत कब कहा जाता है? अमृत जब मंथन किया जाए, मनन-चिंतन-मंथन बुद्धि में किया जाए तो उसको मनन-चिंतन-मंथन करने के बाद जो मक्खन निकले, सार निकले तो उसको कहा जाता है कि भई ये सारस्वत ब्राह्मण हैं सार सिद्धि करने वाले।

तो तुमको ढूंढना दोनों को चाहिए। क्या? ऐसे नहीं तुम सिर्फ गीता सुनाने वालों को पकड़ो। हँ? और जो धामा खाने वाले हैं उनको छोड़ दो। नहीं। चाहे धामा खाने वाले हों, चाहे गीता सुनाते, दोनों को पकड़ना चाहिए। हां। और ढूंढना चाहिए। तो दोनों ही ब्राह्मण हैं ना। क्या? ब्रह्मा की औलाद हुए ना। कौन से ब्रह्मा की औलाद? ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा की औलाद या चतुर्मुखी ब्रह्मा की औलाद? क्या कहेंगे? चौमुखी ब्रह्मा की औलाद। हां। उनको 4 मुख होते हैं। 4 मुख होते हैं माने? चारों मुख कुछ ना कुछ, जो बाबा बोलते हैं ना, उसको एक्यूरेट नहीं सुनाय सकते। जब कुछ अलग से सुनाएंगे, डायरेक्शन देंगे तो कुछ न कुछ उसमें मिक्स करेंगे। जैसे बाबा बोलते हैं ना – बच्चे, शादी बर्बादी। हां। फिर जो, जो मुख्य ब्रह्मा है चौमुखी ब्रह्मा में से, उससे कोई बच्चे आकर पूछते हैं बाबा घर में बहुत प्रेशर पड़ रहा है। माता है घर में, बुड्ढी है, कोई खाना बनाने वाला नहीं है। हँ? बड़े भाई की बहू आई है। वो बीमार रहती है। तो, तो हमको शादी तो करनी पड़ेगी। तो ब्रह्मा बाबा क्या कहते थे? अच्छा, हां बच्चे, हां, बाबा तो चाहते हैं कोई ऐसा बच्चा निकले शादी कर दिखावे और पवित्र रहकर भी दिखावे। कर लो, कर लो। नहीं तो कह देते थे कि हां, वो ब्रह्माकुमारी हो जिसके मां-बाप बहुत प्रेशर डालते हों कि तुम शादी करो तो ऐसी ब्रह्माकुमारी को ढूंढो तो तुम गंधर्व विवाह कर लो। तो कईयों के गंधर्वी विवाह कराय दिए। अब बाबा क्या कहते हैं? पहले ही दिन ढेर हो पड़ेंगे। मुरली में क्या बोला? मुरली में बोला अगर शादी की, तो शादी करने के बाद पहले ही दिन आपस में मिलेंगे और ढेर हो जाएंगे। तो देखो हैं तो सब प्रकार के वो चतुर्मुखी ब्रह्मा के ब्राह्मण। कोई किस मुख के, कोई किस मुख के। चार मुख होते हैं ना। कोई पूरब की ओर कोई पश्चिम की ओर, कोई उत्तर की ओर, कोई दक्षिण की ओर।

तो वो गीता पाठी, हँ, और वो गीता पाठी नहीं। फिर क्या पाठी? धामा खाने वाले धामा पाठी। धामा खाने वाले। चलो। दोनों को पकड़ लो अच्छी तरह से। एडवांस ज्ञान सुनाके अच्छी तरह से पकड़ लो। तो भी कितने तुम्हारे तरफ आ जाएंगे। क्या? दोनों को पकड़ेंगे तो तुम्हारे तरफ संख्या बढ़ेगी कि घटेगी? हँ? तुम्हारी संख्या, हां, बहुत आ जाएगी। बढ़ जाएगी संख्या। ब्राह्मणों को तो पहले तुमको पकड़ना है। क्या? दुनियावालों को बाद में पकड़ना है। वो कोई ब्राह्मण थोड़े ही हैं। न कोई ब्रह्मा को जानते हैं। वो तो कह देते हैं सूक्ष्म वतन में है। हँ? ऐसे तो यहां भी कह देते हैं कि कहां है? सूक्ष्मवतनवासी है। भले सूक्ष्मवतनवासी है फिर वो पुरानी हिस्ट्री जानते हैं कि नहीं? अरे, पहले स्थूल वतन में था या नहीं था? कहते हैं - हां, था तो।

तो पहले तुमको पकड़ना है कि तुम्हारी हमजिंस भी हैं। हँ। वो हैं हमजिंस कुख वंशावली। क्या? कैसी वंशावली? गोद की वंशावली। उन्हें गोद का, ब्रह्मा बाबा की जो गोद ली है ना, उसका बड़ा फखुर है। और तुम बच्चे हो मुख वंशावली। कैसे? तुमने ब्रह्मा के मुख से जो शिव बाप की, शिव बाबा की वाणी निकली ना, उस वाणी को ध्यान से सुना। उस पर मनन-चिंतन-मंथन। हँ? मनन-चिंतन-मंथन किया। और जो सार की बातें निकली वो खुद भी समझी और दूसरों को भी? दूसरों को भी समझाई। तो देखो मेहनत चाहिए हर बात की। ऐसे नहीं कि गीता सुन ली, सुना ली और धामा खा लिया, दूसरों को बैठाकर धामा खिलाय दिया, ये कोई मेहनत थोड़ेही हुई? मेहनत क्या हुई? जो ब्रह्मा के मुख से शिवबाबा ने वाणी बोली है, जिसे हम मुरली कहते हैं, उस मुरली का मनन-चिंतन-मंथन करके तुम तो पक्के मुख वंशावली ब्राह्मण बनते हो। हां, तो वो मनन-चिंतन-मंथन की नई-नई बातें, सार की बातें सारसिद्ध ब्राह्मण हो ना। तो तुम दूसरों को सुनाते हो। समझे ना?


A morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the eleventh page on Wednesday was – Sit and tell the seeker of knowledge (jigyasu) that you are now womb born progeny (kukh-vanshavali). Be it those who belong to the outside world or be it those who belong to the BK world, tell both of them that now you are womb born progeny. Now you become mouth-born progeny (mukh-vanshavali). Become true Brahmins, will you not? So, then you will become deities from Brahmins. Who is called a deity? Hm? Is someone who is perfect in16 celestial degrees called a deity or will the one with fewer celestial degrees called a deity? Hm, Lakshmi and Narayan perfect in 16 celestial degrees are worshipped in the temples. Are numerous kinds of Lakshmi-Narayans worshipped in the temples? No. So, Baba narrates the method of explaining to them. 12th page of the morning class dated 15.11.1967. Sometimes Baba explains that you do not catch anyone at all, you do not search anyone at all. Otherwise, they should tell where do the Brahmins live? Hm? Where do they live? Arey, Brahmins will definitely be living in Brahmpuri, the abode of Brahma. If you people want to see more, then a memorial has been formed on the path of Bhakti. Where? Ajmedh. Where is the memorial formed? Aj means he-goat and she-goat. Medh means medha (sheep), from which wool is extracted, isn’t it? What? There is medha, isn’t it? Wool is extracted from its hairs year by year. Yes, so aaj and medh. What? A country of sheep and goats.

So, why has this memorial been built there? Yes, what is the specialty of sheep and goats? If one sheep or goat falls into a pit, then all of them will go and fall it into it. They follow them firmly. So, it’s a memorial of which place? Hm? It is the memorial of this very Brahmakumari Vidyalaya. Which one sheep went into the pit? Arey, where does the pit start? Dualist.
(Someone said something.) Brahma? From Brahma? Arey, the pit begins from the dualist Copper Age. People convert to Islam religion, don’t they? Yes. So, numerous people start following that he-goat or sheep. What? Baba told, didn’t He that what is in the Trimurti? One is a horse, one is a goat and one is a lion. Yes. So, some start following that goat. And the other is sheep. What? Yes. Wool emerges from the sheep, isn’t it? Yes. So, they start following it.

So, you may go to Ajmer. There is a very big den of Brahmins in that Ajmer. What? A topic of memorial was mentioned in Ajmer. Yes. So, it is a memorial of which place? That memorial was built later on the path of Bhakti. Is the memorial first or is it later? It is later. So, there is a very big den of Brahmins in it. What is meant by ‘in it’? It is a memorial of which place? Arey, a memorial of some place must have been built, wasn’t it? Hm?
(Someone said something.) Yes, a memorial of Mount Abu. So, there is a very big gathering, den of Brahmakumaris there. And all are Pushkarni Brahmins. What has been said? When they are pushed, they stand up. There are some such vehicles, yes, there are non-functional vehicles. Yes. So, they have to be pushed to be started. Then it starts. Otherwise it doesn’t start at all. Yes. So, those Pushkarni Brahmins live there. Where? Call it Ajmedh or Mount Abu, the den of Brahmakumaris, there are such Pushkarni Brahmins there. Who pushes? Arey, when the Advance Party emerges, which they call as Shankar Party, and they cause such points of knowledge to emerge that yes, they start numerous rituals of the path of Bhakti for showing-off. What? Organize this conference, organize this fair. Yes. So, they have to be pushed for service that brother, arey, if you want to give the basic knowledge only, then will that too happen only by sitting there in Mount Abu? Or will it happen just by sitting in the Centers? You will have to go out, will you not? So, then they go out.

You have understood as to who is called Pushkarni Brahmin. What will those who are made to walk by pushing called? Pushkarni. So, those who narrate the Gita; who? The Pushkarni Brahmins narrate the Gita. Don’t they explain? They just narrate the Gita. Do they explain? They do not explain anything. Even if anyone asks [then they will reply] – Hey, do you belong to the Shankar Party? Get out. Yes. They do not give reply to any question. So, they just narrate the Gita. One kind are Saarsiddhi. Hm? It was told just now, wasn’t it? Which Brahmins? Pushkarni. And when compared to the Pushkarnis, the other Brahmins are Saaraswat, Saarsiddh. What is meant by Saaraswat? How was the word Saaraswat formed? Hm? Sons of Saraswati. For example, there was Saraswati, wasn’t she? So, she used to pick up one point of the Murli and used to narrate it in detail. Hm? Or did she used to read it out? No. She used to narrate in detail. So, one kind are Saarsiddh and the other are Pushkarni.

So, the Pushkarni Brahmins narrate the Gita. Those who narrate the Gita eat dhama (food offered by the hosts), don’t they? Yes. They eat food. They do not narrate the Gita that much. What? Those who are interested in eating food are more. And those who narrate the Gita are less. Yes. So, those who don’t narrate the Gita; as soon as the time starts, they will come to eat food. They will come and sit; lay the pattal (plates made up of leaves) and do they narrate any Gita, etc.? No. They eat dhama. Are those who narrate the Gita very few or more? Very few. And those who eat dhama? Those who eat dhama are many. Brahmins come to you. They narrate the Gita. Hm? No. It was asked – The Brahmins who come to you, some of them break away from there and come, what do they do? Do they narrate the Gita? No. They bring the Gita in their armpit. And they come and sit and listen. So, they are called Pushkarna. Hm? Those who come and narrate to you are not Pushkarni. What are they called? Pushkarna? Why were they called Pushkarna? That they will follow the knowledge, the advance knowledge if you push them. And otherwise? Otherwise, they will eat, drink and enjoy. Yes. So, they are called Pushkar. Hm? Of which place? Of Ajmedh. They emerged from there. So, they are completely different. Who? Those who eat dhama are completely different and those who narrate the Gita by reading it out are completely different. Baba told, didn’t He? What will you say now? Will it be called the knowledge of the Gita or will it be called the nectar of the knowledge of the Gita? What will you call it? It was told in the Vani dated 1967. What will you call it? Hm? It will be called the knowledge of the Gita. It will not be called the nectar of the knowledge of the Gita. When is it called nectar (Amrit)? When it is churned, when thinking and churning takes place in the intellect, then the cream that emerges after thinking and churning, the essence that emerges is called nectar that brother these are Saaraswat Brahmins who achieve the success of essence (saar siddhi).

So, you should search both of them. What? It is not as if you catch only those who narrate the Gita. Hm? And that you leave those who eat dhaama. No. Be it those who eat dhama, be it those who narrate the Gita, you should catch both of them. Yes. And you should search. So, both are Brahmins, aren’t they? What? They are the children of Brahma, aren’t they? Children of which Brahma? Children of the Oordhwamukhi Brahma (the one with his face upwards) or children of the Chaturmukhi (four-headed) Brahma? What will you say? Children of the four-headed Brahma. Yes. He has four heads. What is meant by having four heads? All the four heads cannot narrate accurately to some extent or the other whatever Baba speaks. When they narrate something differently, when they give directions, then they will mix something or the other in it. For example Baba says, doesn’t He? Children, marriage means ruination (shaadi barbaadi). Yes. Then if any child comes and asks the main Brahma among the four-headed Brahma – Baba, I am facing a lot of pressure at home. I have a mother at home, she is old, there is nobody to cook food. Hm? Elder brother’s wife has come. She remains ill. So, so, I will have to get married. So, what did Brahma Baba used to say? Achcha, yes, child, yes, Baba desires that one such child should emerge who gets married and also leads a pure life. Get married, get married. Otherwise, he used to say that yes, if there is a Brahmakumari whose parents are exerting a lot of pressure on her to get married, then search for such a Brahmakumari and undergo Gandharva marriage. So, he solemnized the Gandharva marriage of many people. Well, what does Baba say? You will be ruined on the first day itself. What has been said in the Murli? It has been said in the Murli that if you get married, then after getting married, on the very first day, you will meet each other and you will be ruined. So, look, the Brahmins of that four-headed Brahma are of all types. Some belong to some head; some others belong to some other head. There are four heads, aren’t there? Some facing east, some facing west, some facing north and some facing south.

So, those readers of the Gita (Gitapaathi), hm, and not those Gitapaathis. Then what paathi? Dhamapaathi who eat dhama (food). Those who eat dhama. Okay. Catch both of them nicely. Narrate the advance knowledge to them and catch them nicely. Even then many will come to your side. What? If you catch both of them, then will your number increase or decrease? Hm? Your number will, yes, increase a lot. The number will increase. You have to catch the Brahmins first. What? You have to catch the people of the world later. They are not Brahmins. Neither do they know Brahma. They say that he is in the Subtle Region. Hm? Similarly, what do people say here also as to where he is? He is the Subtle Region dweller. Although he is a Subtle Region dweller; then, do they know the old history or not? Arey, was he first in the physical world or not? They say – Yes, he was indeed.

So, first you have to catch that you have your humjins (peers) also. Hm. Those humjins are womb born progeny. What? What kind of progeny? Progeny of the lap. They are very proud of the lap; they have enjoyed Brahma Baba’s lap, haven’t they? And you children are mouth-born progeny. How? You have heard carefully the Vani (speech) of Father Shiv, ShivBaba’s Vani which emerged through the mouth of Brahma, didn’t it? Thinking and churning on that. Hm? You thought and churned. And you yourself understood the topics of essence that emerged and you explained to others as well. So, look, hard work is required in every topic. It is not as if you heard the Gita, narrated it and ate the dhama, made others to sit and eat the dhama; is this hard work? What is the hard work? The Vani that ShivBaba has spoken through the mouth of Brahma, which we call as Murli, you think and churn that Murli and become firm mouth-born progeny Brahmins. Yes, so, those newer topics of thinking and churning, the topics of essence; you are Saarsiddh Brahmins, aren’t you? So, you narrate to others. Did you understand?

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2827, दिनांक 22.03.2019
VCD 2827, dated 22.03.2019
रात्रि क्लास 15.11.1967
Night Class dated 15.11.1967
VCD-2827-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.41
Time- 00.01-18.41


आज का रात्रि क्लास है 15.11.1967. सुनने वाले हैं उनको खुशी होती है। सुनने से भी खुशी होती है। ये नहीं कहा कि सुनने के साथ समझते भी हैं। क्या? सुन भी लेते हैं तो भी उनको खुशी होती है। और जो कोई पॉइंट उनकी बुद्धि में नहीं है तो उनकी बुद्धि में वो बैठ जाती है पॉइंट। सुनती है तो। सुनती है। सुनता है तो? हँ? सुनता है तो, तो नहीं बैठता? हँ? तो अनुभव तो सुनना। और तो कोई सत्संग में अनुभव कोई सुनाता ही नहीं होगा। अनुभव कोई सत्संग में सुनाता है क्या? हँ? गुरुओं के सत्संग होते हैं उनमें कोई उस सभा में उस सत्संग में जो अनुभव होते हैं वो सुनाता है? हँ? नहीं सुनाता है। लेकिन बाबा को पक्का निश्चय नहीं है। नहीं सुनाता होगा। माना ब्रह्मा बाबा ने अनुमान लगाया कि कोई नहीं सुनाता होगा। माना कौन से सत्संग में? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) बेसिक ज्ञान के सत्संग में कोई अनुभव नहीं? वहां तो खूब अनुभव सुनाते हैं। पहाड़ों की यात्रा करके आते हैं, हँ, हां, पंडे जी महाराज, पंडिया जी महाराज ले जाती हैं, तो तुम्हारी पंडिया भी ले जाती है। हां, तो बहुत खुश होते हैं। संदली पर बैठकर के खूब सुनाते हैं।

तो बताया - और सत्संगों में नहीं सुनाते हैं। माना तुम जो बेसिक ब्राह्मणों का सत्संग है ना उसमें तो सुनाते हैं। अच्छा, एडवांस पार्टी में? एडवांस पार्टी में वो भट्टी-वट्टी करके आते हैं, 7 दिन की भट्टी तो वहां भी होती है ना। जाते हैं कि नहीं? हां जाते हैं। योग शिविर में जाते हैं 7 दिन। तो क्लास में खड़े होके अनुभव सुनाते हैं? हँ? सुनाते हैं? हां। तो बाबा को पक्का निश्चय नहीं कि शायद सुनाते हैं या नहीं सुनाते हैं। नहीं सुनाते होंगे। क्या अनुभव सुनाएंगे? हँ? हां, अच्छा, माताजी ने कहा - कभी-कभी सुनाते हैं कोई-कोई। हमेशा नहीं सुनाते। क्या अनुभव सुनाएंगे? हँ? कभी वो पूछते भी नहीं होंगे कि अनुभव सुनाओ। उसमें भी अनुमान। पूछते नहीं होंगे। कि पक्का है पूछते होंगे? हाँ। यहां कायदा है। कहां? यहां बीके में कायदा है। क्या? कि हां, हर एक अपना-अपना अनुभव सुनावे। बीके में गए कि नहीं? गए। सुनाते हैं कि नहीं? वहां होके आते हैं, हँ, पहाड़ पर तो आके अनुभव सुनाते हैं ना। सुनाते हैं। जितना रिफ्रेश होते हैं, जितनी पॉइंट्स सुनाते हैं, वो बैठकरके सुनावें। क्या? यहां तो कायदा है। सबको, हां, कायदा है कि क्या करें? अपना-अपना अनुभव सुनावें। जो-जो पॉइंट्स सुनी हैं उनका।

तो बैठकर के क्योंकि और तो कोई सत्संग में ये तो बातें ही नहीं हैं। क्या बातें? अनुभव करने और अनुभव सुनाने की बातें ही नहीं हैं। क्या अनुभव करने? हँ? अरे भक्ति मार्ग में अंधश्रद्धा बैठ जाती है ना। भक्तिमार्ग में अंधश्रद्धा बैठती है गुरुओं के ऊपर, शास्त्रों के ऊपर, तो भावना में उद्रेक होता है ना। हां, तो बाबा ने कहा, और सत्संगों में तो ये बातें नहीं हैं कि वहां कोई राजाई प्राप्त होती है। और यहां तो? यहां तो राजाई प्राप्त होती है। तो जिनको राजाई प्राप्त होती है, अनुभव होता है वो अपना गुप्त करके रखें। किसी को न बतावें। जब तक प्रैक्टिकल में ना मिले तब तक बताना ठीक है? हँ? थोथा चना बाजे घना। हां। तो भई बोल-बोल करना, बोल-बोल करके दूसरों को सुनाना, इससे ज्यादा असर पड़ेगा कि पहले पूरा अनुभव कर लो कि हां, हमको कुछ कंट्रोलिंग पावर मिल रही है, वशीकरण की शक्ति मिल रही है, राजाई प्राप्ति हो रही है।

तो देखो, बाबा कहते हैं और सत्संगों में ये बातें नहीं हैं। यहां तो; क्या? सुनाते हैं अनुभव। क्या सुनाते हैं? हाँ, कि राजाई प्राप्त करने की जो अनुभव है हमने वहां अनुभव किया माउंट आबू में। तो उन सत्संगों में वहां तो और ही नीचे गिरने की बातें सुनाते रहते हैं। क्या? कि ऊँचा उठने की बातें सुनाते हैं? क्या सुनाते हैं उन सत्संगों में? तुम इस तरफ में ऊपर चढ़ते जाते हो। तुम। किससे कहा? हां, जो रूद्र माला के मणके हैं शिव बाप ने उनसे कहा - तुम। तुम किससे कहा जाता है? सन्मुख वालों को तुम कहा जाता है ना। तो बाबा उन बच्चों को, शिव बाबा उन बच्चों को इमर्ज करके, सामने रख करके बोलते थे। हँ? तो तुम इस तरफ में ऊपर चढ़ते जाते हो। कैसे? कैसे? ऊपर कैसे चढ़ते जाते? अरे, आत्मा आत्मिक स्थिति तुम्हारी बीज रूप स्टेज बनती है तो तुम ऊपर चढ़ेंगे कि नीचे उतरेंगे? ऊपर चढ़ेंगे। देहभान होगा, देह की याद आएगी, तो देह की इंद्रियां भी याद आएंगी और इंद्रियां तो नीचे ले जाएंगी।

तो इस तरफ में तुम ऊपर चढ़ते जाते हो। तुम। क्या? ये नहीं। और इनके जो फॉलोवर हैं वो नहीं। तुम। हां। दुनिया वाले नीचे उतरते जाते हैं। बाकी जो हैं तुम्हारे अलावा वो सब क्या हैं? वो दुनिया वाले हैं या तुम्हारे अंदर के हैं रूद्र माला के मणके? नहीं। तो उनमें वो सुनी-सुनाई बातों में विश्वास करने वाले हैं कि नहीं? सुनने वालों को बताया ना खुशी होती है। अल्पकालिक खुशी होती है कि सदाकाल की खुशी होती है? अरे, जो सुना उसको मनन-चिंतन-मंथन करके, उसमें से सार निकाल करके वो मक्खन खाएंगे, दूसरों को खिलाएंगे तो ताकत आएगी ना? हां। तो सुनने वालों को खुशी होती है या सुन कर के जो मनन-चिंतन-मंथन करके समझते हैं और दूसरों को समझाते हैं, हां, तो उनकी उन्नति होगी? हां, उनकी उन्नति होगी।

तो बाबा कहते हैं कि दुनिया वाले तो नीचे उतरते जाते हैं और तुम? तुम मनन-चिंतन-मंथन का जो मक्खन निकलता है, सार निकलता है। क्या सार? सार क्या है? हँ? बेसिक ज्ञान का सार, एडवांस ज्ञान का सार क्या है?
(किसी ने कुछ कहा।) आत्मा। अरे, वो आत्मा तो बेसिक ज्ञान में भी बताते तुम आत्मा हो, ज्योति बिंदु हो। हँ? हां, एक बात। सार है जो गीता में भी लिखा हुआ है। क्या? जो ज्ञान का सार है, बस दो ही बातों में है - क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ। क्षेत्र माना शरीर रूपी क्षेत्र, जिसमें आत्मा बैठती है, रहती है, कर्म करती है। और दूसरा? हँ? उस आत्मा के 84 जन्मों की सारी डीटेल जानने वाला क्षेत्रज्ञ। क्षेत्र को ज्ञ माने जानने वाला। कौन हुआ? कोई भी आत्मा के अनेक जन्मों के या एक जन्म के भी या जो भी जन्म हों कोई आत्मा के उनकी सारी डिटेल जानने वाला वो कौन? हां, वो ऊंच ते ऊंच आत्माओं का बाप सुप्रीम सोल, हैविनली गॉडफादर, जो हैविन बनाने का रास्ता बताता है।

तो दुनिया वाले और वो सुनने वाले, बेसिक ज्ञान वाले वो नीचे उतरते जाते हैं। और तुम? तुम ऊंचे चढ़ते जाते हो, उन्नति होती जाती है। हां। तुम्हारी उन्नति कराने वाला तो बाप बैठा हुआ है ना। क्या? कराने वाला एक है या चार-पांच ब्रह्मा के मुख हैं? हँ? हां, एक है। कौन? नाम लिखो। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? कराने वाला एक शिवबाबा? अगर कहें परम ब्रह्म, तो परम ब्रह्म तो जब बनेगा। कब बनेगा? जब संसार में प्रत्यक्षता होगी कि बड़े ते बड़ी अम्मा सहनशील जो इस दुनिया में सहन करने वाली सबसे बड़ी आत्मा है वो तो ये है। क्या? तो वो दुनिया का विनाश होगा पहले कि पहले वो सहनशील बनेगी? क्या होगा? पहले क्या होगा? हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) पहले सहन करेगी? अच्छा? और सहन की इंतहा हो जाएगी, हँ, हां, अति हो जाएगी ना। जब अति होती है ना तो अति का क्या होता है? अति का अंत हो जाता है। हां। तो बताया फिर वो विकराल रूप धारण करती है। कौन? हँ? विकराल रूप किसके द्वारा? हँ? असुर संघारकारिणी शक्तियां गाई हुई हैं या पुरुष बाप गाया हुआ है? हँ? शक्तियां गाई हुई हैं। तो परमब्रह्म शक्ति है या बाप है? परम ब्रह्मा? हँ? क्या है? शक्ति है। हां।

तो तुमने जाना कि तुम्हारी उन्नति करने वाला तो बाप बैठा हुआ है। कि अम्मा? बाप को सहन करने की दरकार है या अम्मा को सहन करने की दरकार है? हँ? कौन सहन करे? अम्मा सहन करेगी क्योंकि माताएं जितनी भी होती हैं संसार में उनके शरीर का स्ट्रक्चर ही ऐसा होता है कि वो अबला हो जाती हैं कलियुग के अंत में। हो जाती हैं कि नहीं? हाँ। तो तन की शक्ति नहीं है तो मन की शक्ति होगी? मन की भी शक्ति उतनी नहीं क्योंकि खास करके जो मूल रूप में माता है वो तो भारत माता है ना। हँ? भारत माता है वो, वो कन्या के रूप में है या जो जगतमाता है वो कन्या का रूप है? है तो कन्या का रूप वो भी लेकिन मनसा में वो सहन करती है? कि विकराल रूप धारण करती है? और वो विकराल रूप धारण करने का काम उसको प्रेरक कौन है? हँ? जैसे रामायण में लिखा है सबके उर प्रेरक ह्रदय दीनबंधु रघुनाथ। उन्होंने तुलसीदास जी ने रघुनाथ तो राम को मान लिया। अब वो राम, रघुनाथ की बात थोड़े ही है? वो तो त्रेतायुग के रघुनाथ की बात है, राम की बात है या संगम युग में निराकारी स्टेज धारण करने वाले राम की बात है? हँ? कौन सूर्यवंश का शिरोमणि है? सूर्यवंशी का शिरोमणि तो सूर्य ही होगा ना। तो कौन हुआ? हँ? हां, कौन हुआ?
(किसी ने कुछ कहा।) संगमयुगी कृष्ण? वो बच्चा है। बच्चे में ताकत होती है क्या?

अभी बताया - बाप बैठे हुए हैं ना। कौन सा बाप? सुप्रीम सोल बाप, हँ, वो मुकर्रर रथ में बैठे हुए हैं ना। जो तुम्हारी उन्नति कराने के लिए बैठे हैं। घड़ी-घड़ी कहते रहते हैं। क्या कहते रहते हैं? घड़ी-घड़ी क्या करना है?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? अरे कान काटना है? उन्होंने कान की तरफ इशारा किया और उंगली कट कर दिया। क्या करना है? किसको याद करना है? हँ? उल्लू, पाजी, गधा को? हँ? अरे, किसको याद करना है? (किसी ने कुछ कहा।) हां, कहते हैं। वो भी कब याद आएगा? शिव बाबा कब याद आएगा? कब याद नहीं आएगा? हँ? हां, तो मुख्य बात क्या हुई? हँ? जो मूल बात है वो शिवबाबा नहीं है। मूल बात है अपन को ज्योतिबिंदु आत्मा समझो। घड़ी-घड़ी कहते हैं। क्या समझो? हँ? ज्योति बिंदु भ्रकुटी के मध्य में जहां यादगार दिखाई जाती है कि भारत की माताएं खास अभी भी और बाहर की दुनिया में भी और शूटिंग पीरियड में भी और एडवांस पार्टी में भी मस्तक में क्या लगाती हैं? हँ? हां, बिंदु लगाती हैं। लगाती हैं ना। अरे, दूसरों को क्या देखते हो? अपने को देखो। हां? कहते हैं, मैं तो पुरुष हूं। मैं क्यों लगाऊं? बताया कि आत्मिक स्थिति की घड़ी-घड़ी याद दिलाते रहते हैं। अपन को आत्मा समझो। और फिर? फिर क्या करो? हँ? हँ? हां, मुझे माना आत्मा के बाप को याद करो।

Today’s night class is dated 15.11.1967. The listeners feel happy. They feel happy even by listening. It was not said that they understand along with listening. What? Even if they listen they feel happy. And the point which is not in their intellect, that point sits in their intellect. If she listens. She listens. What if he listens? Hm? Doesn’t it sit [in the intellect] if he listens? Hm? So, listen to the experience. In no other spiritual gathering (satsang) does anyone narrate his/her experience. Does anyone narrate experience in any satsang? Hm? There are satsangs of the gurus; in those satsangs, in that gathering, does anyone narrate his/her experiences of the satsang? Hm? He doesn’t narrate. But Baba doesn’t have firm faith. He must not be narrating. It means that Brahma Baba must have guessed that nobody must be narrating. It refers to which satsang? Hm?
(Someone said something.) Doesn’t anyone narrate experience in the satsang of the basic knowledge? There they narrate a lot of experience. They visit the mountains and come, hm, yes, Pandeyji Maharaj, Pandiyaji Maharaj (guides) take them; so your pandiya (guide sister) also takes. Yes, so they feel very happy. They sit on the sandali and narrate a lot.

So, it was told – They don’t narrate in other satsangs. It means that you narrate in the satsang of the basic Brahmins. Achcha, what about the Advance Party? People undergo that bhatti-vatti in the Advance Party; seven days bhatti is organized there as well, isn’t it? Do they go or not? Yes, they go. They go for Yoga shivir (camp) for seven days [among BKs]. So, do they stand up in the class and narrate their experiences? Hm? Do they narrate? Yes. So, Baba does not have firm faith that perhaps they narrate or they don’t narrate. They must not be narrating. What is the experience that they will narrate? Hm? Yes, achcha, mataji said – Sometimes some people narrate. They do not narrate always. What is the experience that they will narrate? Hm? They must not even be asking anyone to narrate the experience. There is doubt even in that. They must not be asking. Or is it sure that they ask? Yes. It is a rule here. Where? Here, it is a rule among the BKs. What? That yes, each one should narrate his/her experience. Did you go to BKs or not? You went. Do they narrate or not? When they go there and come from the mountain, then they narrate their experiences, don’t they? They narrate. The extent to which they get refreshed, the extent to which they narrate points, they should sit and narrate. What? Here it is a rule. Everyone, yes, it is a rule that what should you do? You should narrate individual experiences. Those related to the points which you have heard.

So, while sitting, because these topics do not exist in any other satsang. Which topics? The topics to be experienced and the topics of experience to be narrated do not exist at all. To experience what? Hm? Arey, people develop blind faith on the path of Bhakti, don’t they? People develop blind faith on the gurus, on the scriptures on the path of Bhakti, so, their feelings increase, don’t they? Yes, so Baba has said that these topics don’t exist in other satsangs that they get kingship there. And here? Here you get kingship. So, those who get kingship, those who experience should keep it secret. They should not narrate it to anyone. Is it right to reveal until you get it in practical? Hm? Thotha chana baajey Ghana (an empty pea creates a lot of sounds in the fry pan). Yes. So, brother, talking a lot, talking a lot and narrating to others; will this have more effect on others or should your first experience completely that yes, we are getting some controlling power, we are getting some power to control (vashikaran shakti), we are getting kingship.

So, look, Baba says that these topics don’t exist in other satsangs. Here; what? You narrate the experience. Do you narrate? Yes, the experience of obtaining kingship, we have experienced it there in Mount Abu. So, in those satsangs, there they keep on narrating topics of undergoing further downfall. What? Or do they narrate topics of rising high? What do they narrate in those satsangs? You keep on rising up on this side. You. To whom was it said? Yes, those who are beads of the Rudramala, Father Shiv said to them – You. Who is addressed as ‘you’? Those who are face to face are called ‘you’, aren’t they? So, Baba used to cause those children to emerge, place them in front of Himself and speak. Hm? So, you keep on rising high on this side. How? How? How do you keep on rising? Arey, the soul, when you develop soul conscious stage, the seed-form stage, then will you rise or will you come down? You will rise upwards. If there is body consciousness, if there is remembrance of the body, then the organs of the body will also come to the mind and the organs will take you down.

So, you keep on rising on this side. You. What? Not this one. And not the followers of this one. You. Yes. The people of the world keep on descending. What are all others except you? Are they the people of the world or are they one among you, the beads of the Rudramala? No. So, do they include those who believe in hearsay or not? It was told that the listeners feel happy, don’t they? Do they experience temporary joy or permanent joy? Arey, by thinking and churning whatever you heard, by causing the essence to emerge from it, if you eat the cream from it and offer it to others to eat then you will get strength, will you not? Yes. So, do those who listen feel happy or do those who listen, think, churn and understand and explain to others, yes, will they progress? Yes, they will progress.

So, Baba says that the people of the world go on declining and you? You; the cream, the essence that emerges from thinking and churning; what essence? What is the essence? Hm? What is the essence of basic knowledge? What is the essence of the advance knowledge?
(Someone said something.) The soul. Arey, it is told in the basic knowledge also that you are a soul, you are a point of light. Hm? Yes, one thing. The essence has been written in the Gita also. What? The essence of knowledge is only in two topics – Kshetra and Kshetragya. Kshetra means the body-like field (kshetra) in which the soul sits, lives, acts. And the other? Hm? Kshetragya, the one who knows the entire detail of the 84 births of that soul. ‘Gya’, i.e. the one who knows the ‘kshetra’. Who is it? Who is that one who knows the details of many births or even one birth or any number of births of any soul? Yes, that highest on high Father of souls, the Supreme Soul, the Heavenly God Father, who shows the path of establishing heaven.

So, the people of the world and those who listen, those who follow the basic knowledge keep on declining. And you? You go on rising, progressing. Yes. The Father is sitting to enable you to progress, isn’t He? What? Is the enabler one or are there four-five heads of Brahma? Hm? Yes, there is one. Who? Write the name. Hm?
(Someone said something.) Hm? Is the enabler one ShivBaba? If we say Parambrahm, then he will become Parambrahm when; When will he become? When the revelation takes place in the world that this is the biggest tolerant mother, the highest soul in this world in terms of tolerance; what? So, will that world be destroyed first or will she become tolerant first? What will happen? What will happen first? Hm? Arey? (Someone said something.) Will she tolerate first? Achcha? And there will be extremity of tolerance, hm, yes, it will be in extreme, will it not be? When anything is in extreme, then what happens to that extremity? The extremity ends. Yes. So, it was told that then she assumes a ferocious form. Who? Hm? Ferocious form through whom? Hm? Are the Shaktis praised as the slayers of demons or is the male Father praised? Hm? The Shaktis are praised. So, is Parambrahm a Shakti or the Father? Param Brahma? Hm? What is he? He is a Shakti. Yes.

So, you have known that the Father is sitting to enable you to progress. Or the Mother? Does the Father need to tolerate or does the Mother need to tolerate? Hm? Who should tolerate? The mother will tolerate because the structure of the bodies of all the mothers in the world itself is such that she becomes weak (abla) at the end of the Iron Age. Do they become or not? Yes. So, if there is no power of the body, then will there be the power of the mind? The power of the mind will also not be to that extent because especially the one who is a mother in original form is Mother India, isn’t she? Hm? Is the Mother India in the form of a virgin or is the World Mother (Jagatmata) in the form of a virgin? She too is in the form of a virgin but does she tolerate in her mind? Or does she assume a ferocious form? And who inspires her to assume the ferocious form? Hm? For example, it has been written in the Ramayana – Sabke ur prerak hriday deenbandhu raghunath (the one who inspires everyone’s heart is Raghunath). He, Tulsidasji accepted Ram as Raghunath. Well, is it about that Ram, Raghunath? Is it the topic of the Raghunath, Ram of the Silver Age (Tretayug) or is it about Ram who assumes incorporeal stage in the Confluence Age? Hm? Who is the highest gem (shiromani) of the Sun dynasty (Sooryavansh)? The highest gem of the Sun dynasty will be the Sun only, will it not be? So, who is it? Hm? Yes, who is it?
(Someone said something.) The Confluence Age Krishna? He is the child. Does the child have power?

It was told just now – The Father is sitting, isn’t He? Which Father? The Supreme Soul Father is sitting in the permanent Chariot, isn’t He? He is sitting to enable you to progress. He keeps on telling every moment. What does He keep on telling? What should you do every moment?
(Someone said something.) Hm? Arey, should you cut your ear? He pointed towards the ear and cut his finger. What should you do? Whom should you remember? Hm? Owl, fool, donkey? Hm? Arey, whom should you remember? (Someone said something.) Yes, He says. When will He also come to our mind? When will ShivBaba come to our mind? When will He not come to our mind? Hm? Yes, so, what is the main topic? Hm? The original topic is not about ShivBaba. The original topic is that you should consider yourself to be a point of light soul. He says every moment. What should you think? Hm? A point of light in the middle of the bhrikuti where a memorial is shown that especially the mothers of India even now and in the outside world also and in the shooting period also and in the Advance Party also what do they apply on the forehead? Hm? Yes, they apply a bindu. They apply, don’t they? Arey, why do you look at others? Look at yourself. Yes? He says – I am a male. Why should I apply? It was told that He keeps on reminding of soul conscious stage every moment. Consider yourself to be a soul. And then? What should you do then? Hm? Hm? Yes, remember Me, i.e. the Father of the soul.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2828, दिनांक 23.03.2019
VCD 2828, dated 23.03.2019
रात्रि क्लास 15.11.1967
Night class dated 15.11.1967
VCD-2828-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.32
Time- 00.01-17.32


रात्रि क्लास चल रहा था 15.11.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी - कभी-कभी बाबा ओम मंडली की शुरुआत की बातें बैठ करके समझाते हैं। तो उन बातों को भी सुनने में तुम बच्चों को मजा आता है। शुरुआत में कैसे-कैसे हुआ, कैसे भट्टी बनी, कैसे-कैसे घरबार छोड़ करके भागे, कैसा सहन किया, कोई कच्चा लेके भागी, कोई बच्चा लेके भागी। जो हाथ में आया सो लेके भाग गई। जैसे कोई घरबार छोड़ते हैं तो भाज पड़ती है ना। ऐसे भागना पड़ा पाकिस्तान से। तो भाज पड़ गई। तो जो चीज हाथ में आई, उठाया और ये भागा-भागी छोड़ा। तो इन्होंने भी ऐसे ही किया। किन्होंने? इन्होंने कहके किधर? तुमने नहीं। इन्होंने। इन्होंने माने किन्होंने? हँ? ब्रह्मा बाबा और उनके जो भी जो सरपरस्त सहयोगी थे उन्होंने भी ऐसे ही किया। जो थीं सहयोगी तो वहां से भागी। कोई ने कुछ छोड़ा, कोई ने पति को छोड़ा, कोई ने ससुर को छोड़ा। और कोई देखो तो ससुर के साथ ही चली जा रही है। ससुर को लेके आ गई।

तो ये भी सब सुनने की बातें अच्छी हैं ना बच्ची कि इन बच्चों ने कैसे त्याग किया। हँ? कब किया? आदि में किया कि मध्य में किया कि अंत में किया? हँ? कबके त्याग की ज्यादा विशेषता है, ज्यादा वैल्यू है? कब किया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, चाहे एडवांस में हो, चाहे बेसिक में हों, जिन्होंने आदि में किया, जब कोई सहयोगी नहीं था, सारी दुनिया दुश्मन, तो उस समय की वैल्यू हुई ना। हाँ। फाउंडेशन का टाइम है। तो क्या आया उनके दिल में ऐसा जो घरबार को, बच्चों को बाहर में ही सबको छोड़ करके और उठके भागी? कोई डर नहीं आया। समझा ना? कुछ भी नहीं। फिर ऐसी पक्की जो आपस में आते ही आवें ही नहीं। वापस जाने के लिए ही मना कर दे। छोटी-छोटी कन्याएं वो भी कहें, नहीं, हम छोटी नहीं हैं। हम बड़ी कन्या हैं। भले तुम तब तक प्रूफ इकट्ठा करो। हम नहीं चलेंगे। तो ये भी तो वंडरफुल बातें हैं ना। कब की? कब की बातें? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, एक अक्षर लिख दिया करो। (किसी ने कुछ कहा।) आदि की। हां। तो बाप भी तो वंडरफुल है। और फिर बच्चे भी वंडरफुल।

तो गाया भी जाता है कि उनकी एक्टिविटी भी वंडरफुल है। हँ? किनकी? जो बाप और बाप के बच्चे हैं उनकी एक्टिविटी भी वंडरफुल। तो सारी गत-मत न्यारी है। तो बच्चे समझते भी हैं बरोबर बाबा वंडरफुल है। और इस दुनिया के 7 वंडर मनुष्यों ने बनाए हैं और ये मोस्ट वंडरफुल क्या है? बाबा की बनाई हुई, हां, नई दुनिया, स्वर्ग जैसा वंडरफुल तो कोई भी, हां, वंडर हो ही नहीं सकता। तो देखो, हँ, ऐसी वंडरफुल हैविन की दुनिया बनाते हैं, जिसका हमको मालिक बनाय देते हैं। सो भी समझते हैं कि ये कोई नई बात तो है नहीं। कल्प-कल्प ऐसे होता आया है। बाप आते रहे कल्प-कल्प और हमको आकरके मोस्ट वंडरफुल, हां, मोस्ट वंडर ऑफ द वर्ल्ड। क्या? हैविन। हैविन की रचना कराते रहे। और हमको सौंपते रहें।

तो ये तो पुरानी बात है। नई बात? नई बात नहीं है। हां। अरे, हम तो अनेक बार इस वंडरफुल स्वर्ग के मालिक बने हैं। और ये बात तो अभी पता चली है बच्चों को क्योंकि वहां तो सिर्फ कहते हैं कि ऋषि-मुनि आगे नहीं जानते थे। कुछ नहीं जानते। हँ? कहते थे नेति-नेति। हम उसका इति माने अंत, हम उसका सृष्टि का आदि और अंत नहीं जानते। हम रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अंत को जानते ही नहीं। तो देखो, उन ऋषियों-मुनियों की बातों से भी कोई इतनी टेस्ट अब हमको? हमको नहीं आती। जबकि हम सुनते हैं कि हम फिर से स्वर्ग के मालिक बनते हैं। कलप पूर्व के मुआफिक। तो वो तो हुआ रचयिता। और वो रचता रचना के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान हमको सुनाते हैं। पर यहां तो तुम बच्चे जानते हो कि हमको बैठकरके राजयोग सिखलाया जाता है। हँ? क्या कहा? हमको राजयोग सिखलाया जाता है। आदि, मध्य, अंत का ज्ञान सुनाना ये तो सुनने-सुनाने की बात हुई। लेकिन इससे भी ऊंची बात क्या? हमको राजयोग सिखाते। क्या राजयोग? जिस योग में राज़ भरा हुआ है। क्या? राजाई पाने का राज़ भरा हुआ है। जो राजाई दुनिया में कोई भी बड़े-बड़े संत, महात्मा, ऋषि-मुनि, धर्मपिताएं नहीं दे सके। राजाई देके शरीर छोड़ा धर्मपिताओं ने, ऋषि-मुनियों ने या आधीन बनाके छोड़ा? क्या किया? आधीन बनाया। किन बातों में? वो ही सुनी-सुनाई बातों में। हां। और बाबा भी तो बताते हैं भारतवासियों ने सुनी-सुनाई बातों से दुर्गति पाई। हां।

तो यहां राजयोग सिखलाया जाता है जिससे तुम बच्चों कितनी खुशी में आ जाते हो। किस बात की खुशी? प्रजा में आने की खुशी? अच्छा? काहे की खुशी? हां, राजाई की खुशी में आ जाते हो। तो ये तो तुम जानते हो ना कि अब हम फिर चक्कर पूरा करके, बाप समझाते हैं कि 84 का भी चक्कर पूरा हुआ। अभी हम, हाँ, ये शरीर रूपी वस्त्र छोड़ करके, नंगा बनकरके जाना है। क्या? इस देह को धारण करने से इस दुनिया में क्या हुआ? नीचे गिरे कि ऊपर उठते रहे सतयुग के आदि से लेकरके कलियुग के अंत तक? कलाएं खलास होती रहीं या बढ़ती रहीं? आत्मा की शक्ति क्षीण हुई या बढी? क्षीण हुई।

तो अब हमें पता चल गया कि ये देह लेकरके जो सुख-दुख की दुनिया में सुख-दुख भोगे, भले पहले हमने सुख ज्यादा भोगे आधा कल्प, फिर दुख भी तो भोगे ना। तो जो भी सुख-दुख भोगे ये शरीर के कारण ही तो भोगे ना। तो अब हम ये शरीर छोड़ देते हैं। शरीर छोड़ देंगे तो हम फिर ऊंची स्टेज में। कहां? ऊंचे ते ऊंचे धाम के वासी बन जाएंगे। तो क्या करना पड़े? इस शरीर रूपी वस्त्र मन बुद्धि से; मन बुद्धि आत्मा है ना। तो मन-बुद्धि से त्यागना पड़े। अब जो जितनी जल्दी त्यागे। क्या? ऊतना ऊंचा पद पाएगा। नहीं तो? नहीं तो जो बड़े राजाएं होंगे छोटे राजाओं को उनके अधीन होकर के रहना पड़ेगा कि नहीं? हां, अधीन होके रहना पड़ेगा। आधीन ना भी रहे तो भी डर तो रहेगा कि हमारी प्रजा का कोई भांती वहां बड़े राजा को जाके रोना-पीटना ना करे कि हमारा राजा इतना दुख देता है। हम राज परिवार के भगत रहे, हमारा पूरा परिवार जन्म-जन्मांतर से राजाओं का भक्त रहा। और ये राजा तो ऐसा है। हँ? तो डर रहता है ना कहीं बड़ा राजा हमारे ऊपर हमला न कर दे। हाँ, अगर हम उसकी बात नहीं मानेंगे तो क्या करेगा? हँ? हमला करेगा।

तो, तो नंगा करके अब हमें जाना है। जितनी जल्दी जाएंगे उतने अच्छे हम बड़े क्या बनेंगे? राजा बनेंगे। परंतु क्या करें? नंगे जा नहीं सकते। क्यों भई? हँ? शर्म आती है? देहभान आता है? हँ? देहभान आता है इस शरीर रूपी वस्त्र उतारने से? अच्छा? तो शिव बाप को तो बड़ी शर्म लगती होगी? हँ? शिव बाप को शर्म लगती होगी कि नहीं हमने कोई कपड़े नहीं पहने कभी भी और पहने भी तो हम कपड़ों में कभी वो मन-बुद्धि से, बुद्धि से कभी उलझे ही नहीं। उलझे? नहीं। तो शरीर छोड़ करके क्योंकि आत्मा तो पतित बन गई ना। हँ? कैसे? हँ? ये जो शरीर के संग के रंग में आने से आत्मा का क्या हाल हुआ? पतित बनी या पावन बनी? पतित बनी। कलाएं कम होती गई। कलाहीन हो गए अंत में जाके। तो अब उस आत्मा को तो पावन बनाना ही है। बनना है कि नहीं? हां, बनना है। ऐसे नहीं, फिर ऐसे भी नहीं। क्या? कि सभी एक जैसे पावन बन जावेंगे। क्या? बनेंगे? नहीं। जो जैसा पुरुषार्थ करेंगे देहभान छोड़ने का ये देह रूपी वस्त्र उतार लें, जितना जल्दी उतार लें। और लंबे टाइम के लिए उतारें या कम टाइम।

बाबा तो बताते रहते हैं। क्या? कि मेरे सामने आकरके तुम आत्मा शरीर रूपी वस्त्र उतारकरके मन-बुद्धि से मेरे सामने एक घंटा बैठ के देखो। बाप, बाबा जो है चैलेंज करते तुम बैठ ही नहीं सकेंगे। तो बच्चे उदास हो जाते हैं। अरे सोचते नहीं हैं कि बाबा ने बोला है संगमयुग है; क्या? क्या? असंभव को संभव करने का युग। तो ये बात संभव हो सकती है कि नहीं? क्या? कि हम बाबा के सामने ये शरीर रूपी वस्त्र का भान छोड़ करके और 1 घंटे तो क्या लगातार बैठे रहें। नाक खुजलाने लगा, कान खुजलाने लगा। बाबा कहते, हं, कि सभी तो पावन इतने नहीं बन सकेंगे। नहीं। कोई पूरा पावन बनाएंगे, हँ, कोई कम पावन बनाएंगे। जितना खुद बनेंगे उतना ही तो बनाएंगे किसी एक को। हँ? कि उससे भी ज्यादा बनाय देंगे? नहीं। कोई कम बनेंगे कोई ज्यादा। हँ? कोई तो पतित ही जाएंगे हिसाब-किताब चुक्तू करके। क्या कहा? पूर्व जन्म के जो भी पाप-पुण्यों के हिसाब-किताब हैं वो सब खलास करके कैसे जाएंगे? हाँ। पूरे पावन बन करके नहीं जाएंगे। हां।

तो सभी बातें ये सुनने में बच्चों को मजा भी आता है। पुरुषार्थ भी करते हैं बहुत अच्छी तरह से। कौन? जो-जो निश्चयबुद्धि हैं। किस बात के ऊपर निश्चय बुद्धि? बाप का जो मुकर्रर शरीरधारी प्रैक्टिकल पार्ट है उसके ऊपर पक्का निश्चयबुद्धि हैं और याद की यात्रा में भी अच्छे रहते हैं। जिसके ऊपर निश्चय है, विश्वास है बाप के ऊपर प्रैक्टिकल पार्ट के ऊपर, तो अच्छे से याद की यात्रा में भी रहते हैं। तो फिर उनको, हां, अतींद्रिय सुख भासता है। अंदर ही अंदर आत्मा हर्षित होती रहती है।

A night class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was – Sometimes Baba sits and explains the topics of the beginning of the Om Mandali. So, you children enjoy listening to those topics also. What all happened in the beginning, how the bhatti was formed, how you ran away from your households, how your tolerated, some ladies ran with their child in the womb, some ladies ran with their child. They ran away with whatever they could lay their hands on. For example, when someone leaves the household, then they face difficulties (bhaaj), don’t they? Similarly, they had to run away from Pakistan. So, they faced difficulties. So, whatever they could lay their hands on, they picked them up and ran away, left. So, these too did like this only. Who? In which direction did He make a gesture by uttering ‘these’? Not you. These. ‘These’ refers to whom? Hm? Brahma Baba and all his chief helpers also did like this only. The ladies who were helpers ran away from there. Some left something, some left the husband; some left their Father-in-law. And look, some are going with their Father-in-law only. They came with their Father-in-law.

So, all these topics are also nice to listen, aren’t they daughter that how these children sacrificed. Hm? When? Did they sacrifice in the beginning or in the middle or in the end? Hm? Sacrifice of which time is more special, holds more value? When did they sacrifice? Hm?
(Someone said something.) Yes, be it in the advance, be it in the basic, those who sacrificed in the beginning when there were no helpers, the entire world was an enemy, then that time holds value, doesn’t it? Yes. It is the time for foundation. So, what occurred in their heart that they left the household left the children outside and stood up and ran away? They did not fear anything. Did you understand? Nothing. Then they were so firm that as soon as they came, they were not willing to come [back]. They declined to go back. Even the young girls would say, no, we are not young. We are grown-up virgins. You may collect proofs until then. We will not go. So, these are also wonderful topics, aren’t they? Of which time? These are topics of which time? Hm? (Someone said something.) Yes, write one alphabet. (Someone said something.) Of the beginning. Yes. So, the Father is also wonderful. And then the children are also wonderful.

So, it is also sung that their activity is also wonderful. Hm? Whose? The activity of the Father and Father’s children is also wonderful. So, the entire dynamics and directions (gat-mat) are unique. So, children also understand correctly that Baba is wonderful. And human beings have built seven wonders of this world and what is this most wonderful? There cannot be, yes, any wonder as wonderful as the new world, heaven, yes built by Baba. So, look, hm, He builds such world of wonderful heaven whose master He makes us. That too you understand that this is not a new topic. It has been happening every Kalpa. The Father continued to come every Kalpa and He comes and gives us most wonderful, yes, most wonder of the world. What? Heaven. He continued to cause the creation of heaven. And He continued to entrust it to us.

So, this is an old topic. New topic? It is not a new topic. Yes. Arey, we have become masters of this wonderful heaven many times. And children have come to know this topic now because there they just say that sages and saints did not used to know earlier. They don’t know anything. Hm? They used to say ‘Neti-Neti’. We don’t know its ‘iti’, i.e. end; we don’t know the beginning and the end of the world. We do not know the Creator and the beginning, middle and end of the creation at all. So, look, we don’t get any taste (interest) from the topics of those sages and saints. We hear that we become the masters of heaven once again. Just like Kalpa ago. So, He is the Creator. And that Creator narrates to us the beginning, middle and end of the creator. But here you children know that He sits and teaches rajyog. Hm? What has been said? We are taught rajyog. Narrating the knowledge of the beginning, middle and end is the topic of listening and narrating. But what is higher than this? He teaches us rajyog. What rajyog? The Yoga which is full of secrets (raaz). What? It is filled with the secret of obtaining kingship. It is the kingship which big saints, mahatmas, sages and saints, founders of religions couldn’t give in the world. Did the founders of religions, sages and saints give kingship and leave their bodies or did they make you subservient? What did they do? They made you subservient. In which topics? In the same topics of hearsay. Yes. And Baba also tells that the residents of India have achieved degradation through hearsay. Yes.

So, rajyog is taught here through which you children feel so joyful. Joy of what? Joy of being included among the subjects (praja)? Achcha? Joy of what? Yes, you feel joyful about the kingship. So, you know that now we again complete the cycle, don’t we? The Father explains that the cycle of 84 births is also about to be over. Now we, yes, we have to leave this body like dress and become naked and go. What? What happened by assuming this body in this world? Did you fall or did you keep on rising from the beginning of the Golden Age to the end of the Iron Age? Did the celestial degrees keep on declining or increasing? Did the power of the soul decrease or increase? It decreased.

So, now we have come to know that by taking up this body, the pleasures and pains that we experienced in this world of pleasures and pains; although we experienced more joy for half a Kalpa, then we experienced sorrows as well, didn’t we? So, whatever pleasures and pains that we experienced, it was because of this body only, wasn’t it? So, now we leave this body. If we leave the body, then we will be in the high stage. Where? We will become residents of the highest on high abode. So, what do we have to do? We have to leave this body like dress through the mind and intellect; the mind and intellect is the soul, isn’t it? So, you will have to renounce through the mind and intellect. Well, whoever leaves the earlier; what? He will achieve a higher post to that extent. Otherwise? Otherwise, will the smaller kings have to remain subordinate to the bigger kings or not? Yes, they will have to remain subservient. Even if they are not subservient, they will have the fear that a member of our subjects (praja) may go and cry before the bigger king that our king gives us such sorrows. We have been devotees of the royal family, our entire family has remained a devotee of the kings since many births and this king is like this. Hm? So, there is a fear [in the mind of the smaller king] that the bigger king may attack us. Yes, if we don’t obey his words, then what will he do? He will attack.

So, we have to now go naked. The sooner we go, what will we become in a better and bigger way? We will become kings. But what should we do? We cannot go naked. Why brother? Hm? Do you feel shy? Do you feel body conscious? Hm? Do you feel body conscious in shedding this body like dress? Achcha? So, Father Shiv must be feeling very shy? Hm? Does Father Shiv feel shy or not that I have never worn any clothes ever and even if I wore, I never got entangled in the clothes through the mind and intellect, through the intellect. Did He get entangled? No. So, by leaving the body because the soul has become sinful, hasn’t it? Hm? How? Hm? What happened to the soul by getting coloured by the company of the body? Did it become sinful or pure? It became sinful. The celestial degrees went on decreasing. You became devoid of celestial degrees in the end. So, now that soul has to be made pure. Do you have to become or not? Yes, you have to become. It is not so; then, it is not so as well. What? That everyone will become equally pure. What? Will they become? No. It depends on each one’s purusharth of leaving the body consciousness, shedding this body like cloth, the sooner he/she sheds. And it also depends whether one sheds it for a longer time or lesser time.

Baba keeps on telling. What? That by coming in front of Me, you souls shed the body like cloth through the mind and intellect and sit in front of Me for an hour and see. The Father, Baba gives a challenge that you will not be able to sit at all. So, the children feel sad. Arey, they do not think that Baba has said that it is the Confluence Age; what? What? It is an Age to transform impossible to possible. So, can this be possible or not? What? That we leave the consciousness of this body-like cloth and sit continuously for one hour in front of Baba. This one started pricking his nose, started pricking his ears. Baba says that all will not be able to become pure. No. Some will make completely pure, some will make less pure. The extent to which someone becomes himself, he will make others to the same extent. Hm? Or will they be able to make others to a greater extent? No. Some will become to a lesser extent, some to a greater extent. Hm? Some will clear their karmic accounts and go as sinful ones only. What has been said? How will they go after clearing the karmic accounts of sins and noble acts of the past births? Yes. They will not go after becoming completely pure. Yes.

So, children feel happy in listening to all these topics. You also make purusharth very nicely. Who? All those who have faith. Faith on what? You remain firmly faithful (nishchaybuddhi) towards the permanent bodily being of the Father, the practical part and remain nicely on the journey of remembrance. If you have faith on the Father, on the practical part, then you also remain nicely on the journey of remembrance. So, then they, yes, like the super-sensuous joy. The soul keeps on feeling joyful within.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2829, दिनांक 24.03.2019
VCD 2829, dated 24.03.2019
रात्रि क्लास 15.11.1967
Night class dated 15.11.1967
VCD-2829- Bilingual-Part-1

समय- 00.01-23.45
Time- 00.01-23.45


रात्रि क्लास चल रहा था 15.11.1967. दूसरे पेज की अंतिम लाइन में बात चल रही थी जितनी प्रजा बनाएंगे, जितनों को ज्ञान देंगे, उतने बड़े राजा बनेंगे। ये तो है। तो हर एक अपने दिल से पूछे कि हमने कितनों को आप समान बनाया है, कितनों को ज्ञान दिया है। 15.11.1967 की रात्रि क्लास का तीसरा पेज। कितनों को रास्ता बताया है। ये अपने दिल से पूछो। फिर पूछे, हां, ये देखो रुकमणी अपने दिल से पूछे - हमने कितने आप सामान बनाए? हँ? कौनसी रुकमणी? हँ? एक तो ब्राह्मणों की दुनिया में बेसिक ज्ञान में रुक्मणी दादी जो अभी भी दिल्ली की इंचार्ज मानी जाती हैं। और एक है एडवांस की रुकमणी दादी। वो कौन? हँ? रुक मणि। क्या कहेंगे? मणि बनते-बनते रुक गई। बताओ। (किसी ने कुछ कहा।) हां। यमुना। तो वो भी अपने दिल से पूछे हमने कितनों को आप समान बनाया है। पूछेगी ना दिल से तो मालूम पड़ेगा कि हमने तो बहुत बनाया है। इसलिए हम जरूर महारानी बनेंगे। क्योंकि महारानी या महाराजा बनने का ऊँच पद, ऊंच ते ऊंच पद पाने का टाइम तो ये ही है ना पुरुषोत्तम संगमयुग। इस समय में अगर, अगर इसमें ठीक दौड़ी नहीं पहनी, हँ, इधर-उधर लटकते-फटकते रहे, रास्ते में चलते-चलते सीन देखने लग जाते हैं।

तो बताया ठीक दौड़ी पहनने की बात याद की यात्रा में और आप समान बनाने में। तो फिर कस खाएंगे। पद कम हो जावेगा। और वो कम वरी ऐसा पद होगा जो कल्प-कल्प कम ही होता जाएगा। कल्प-कल्प कम होता जाएगा? माने अगले कल्प में और कम होता जाएगा? हँ? फिर?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, हर कल्प में अभी जितना पुरुषार्थ करेंगे सेवा करने का, हँ, प्रजा बनाने का, संदेश देने का, कल्प-कल्प उतने ही बनेंगे। है ना। इस समय की कमाई ये साक्षी हो करके देखते हैं ना बच्ची। फिर समझ जाते हैं। सब समझ जाते हैं कलप पहले भी इसने यही पद पाया था। अभी भी यही पद पाया है। तो ऐसे नहीं कि आगे चलके भविष्य में साक्षात्कार नहीं होगा। साक्षात्कार तो होगा। जैसे उन स्कूलों में साक्षात्कार होते हैं, कॉलेजों में, इसमें भी पिछाड़ी में साक्षात्कार होते हैं। और फिर वो बहुत साक्षात्कार। और इसमें भी जास्ती में जास्ती जो राजाएं बनेंगे उनके साक्षात्कार बनेंगे। या तो उनके बनेंगे जो राजाओं के आगे अनपढ़ होकरके भरी ढोएंगे? अरे, उन भरी ढोने वालों का भी वो साक्षात्कार होगा। कुछ तो होगा ना बच्ची, जरूर होगा। इसलिए बाबा कहते हैं बच्चों को कि बच्चे, हँ, पुरुषार्थ करो। पुरुष माने आत्मा के अर्थ मेहनत करो। अच्छी तरह से मेहनत करो। कौन-कौन सी मेहनत आत्मा के अर्थ? हँ? क्या? ज्ञान लेना, ज्ञान देना। ज्ञान का मनन-चिंतन-मंथन करना। और मनन-चिंतन-मंथन करके, मक्खन निकाल करके दूसरों को भी बताना, समझाना। जितना सेवा करेंगे।

अब इस बात में गफलत नहीं करो। क्या गफलत? सेवा करते हैं, याद नहीं करते, या आत्मिक स्थिति में रह करके सेवा नहीं करते हैं। देहभान में आ जाते हैं। नहीं। एक्यूरेट बनो। हँ? क्या बनो? लीवर घड़ी बनो। लीवर घड़ी क्या करती है? यूं, यूं, यूं फुदकती रहती है ना लगातार। तो घड़ी में घड़ियां होती हैं ना। कोई घड़ी होती है लीवर घड़ी। और वो उसमें लिखा हुआ होता है घड़ियों के ऊपर कि भई ये लीवर घड़ी है। हँ? क्या मतलब हुआ लीवर का? ली वर। वर माने? श्रेष्ठ। हां। किसको चुना? श्रेष्ठ को चुना। इसमें, इस लीवर घड़ी में इतने ज्वैल्स हैं। कोई घड़ी को कहेंगे ये सिलेंडर है। इसमें इतने कम ज्वैल्स हैं। तो वो टाइम में भी गड़बड़ करेंगे कुछ ना कुछ। हँ? घड़ी क्या करेगी? नीचे ऊपर? नीचे ऊपर होती रहेगी। तो लीवर घड़ी एक्यूरेट होती है। क्या? जो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ को वरण करने वाली होती है। बेहद में लीवर का क्या अर्थ हुआ? ली वर। श्रेष्ठ को वरण करने वाली होती है वो एक्यूरेट।

तो तुम बच्चों को भी लीवर बनना है ना। हँ? और एक्यूरेट पढ़ाई पढ़नी है अच्छी तरह से। रजिस्टर वगैरह सब जो बच्चों के पास होते हैं ना। जो बच्चे स्कॉलरशिप लेते हैं उनका तो कभी भी एब्सेंट नहीं होगा। किनका? स्कॉलरशिप। वो हद की बात बताई, मिसाल दिया। और यहां? यहां स्कॉलरशिप लेने वाले कितने हैं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) नौ? आठ। तो बताया वो रेगुलर और पंक्चुअल रहेंगे। हां। सिवाय कोई बीमारी वगैरा के। हां, बीमारी वगैरह हो जाती है तो बात दूसरी है। अगर बीमारी में भी एब्सेंट होंगे तो भी फिर बाद में स्वस्थ होने के बाद क्या करेंगे? गैलप कर लेंगे। मेकअप करेंगे। और बिलकुल अच्छी तरह से करेंगे।

देखो, यहां बच्ची वो जो बीमार हुई है ना जिसकी आंखें खराब हुई पड़ी हैं। अचानक ही खराब हो गई। तो शायद वो 15 रोज एब्सेंट रही। अभी इम्तेहान उनका नजदीक आ गया। आज, आज आना शुरू होगा उनका इम्तेहान। तो देखो सात रोज हुआ। और वो गई है स्कूल में। तो वो टीचर कहे कि नहीं, तुमको हम एग्जाम में बिठाय नहीं देंगी। हम ऐसा करेंगे। तो वो बोले – अरे, हम क्यों नहीं बैठेंगे? हम ये अपना एक बरस ऐसे ही थोड़े ही गंवाय देंगे? हम तो ये एग्जाम करेंगे। बड़ी लड़ी होती, हँ, लड़ाई होती अपने टीचर से। तो वे जो टीचर से उनसे भी वे हिसाब पूछे, जो उसने बोला। अच्छा तुम कोशिश करो। भले बैठो आकर के। अपने आंख की संभाल कर लेना। कहीं फिर न खराब हो जाए। बोला - आंखें हमारी ठीक हैं। हम तो आकर के पढेंगे। तो देखो, आंखें खराब भी हुईं तो भी बिचारी लगी पड़ी है। तो लगी पड़ी है ना पास होने के लिए। देखो, फिर भी तो कितना पुरुषार्थ करती है! कितना उसने टीचर से आर्ग्यू किया! एकदम फ्रंट होकर के कि हम थोड़ेही अपना 12 महीना ऐसे बर्बाद कर देंगे, गुमाय देंगे। अगर तुम यहां हमें एग्जाम में नहीं बैठने देंगे तो हम दूसरे स्कूल में चले जाएंगे। अरे? तुम्हारे पास हमें एग्जाम नहीं देंगे तो हमको बताओ। तो मैं और स्कूल में प्रबंध करूं। हम तो तुम्हारा छोड़ देंगे। देखो, इतनी श्रूड बच्ची! तो देखा कि नहीं? जाकरके अभी आंखें ठीक हो गईं क्योंकि आंखें भी तो बहुत तकलीफ दे रही थी ना। हँ? रड़ी नीचे, रड़ी ऊपर। रड़ियां ऐसी मारने लगी बात मत पूछो। किसी की भी बात नहीं सुनती। तो देखो वे पढ़ाई के ऊपर अटेंशन दिया ना।

तो बच्चों को भी ऐसे अटेंशन देना है कि अगर टीचर कहती भी है क्योंकि बीच में ऐसी बहुत सी टीचर होती हैं। क्या? कह देती हैं हम तुमको पढ़ाई नहीं पढ़ाएंगे, एग्जाम तुम नहीं दे सकते, यहां नहीं आ सकते, ये नहीं कर सकते, वो नहीं कर सकते। तो फिर वो दूसरे स्कूल को देखेगी ना। कहां जाएगी? हँ? हां, एडवांस पढ़ाई भी तो होती है ना। तो बढ़ेगी आगे। तो जैसे इस बच्ची का बाबा मिसाल देते हैं तो बाबा यहां भी बच्चियों को कहते हैं - तुमको पढ़ना है। बिलकुल अच्छी तरह से पढ़ना है। और पढ़ाई करने के लिए मुरली तो सबको मिलती है। हँ? कोई यहां आए या ना आए मुरली का तो प्रबंध जिसको चाहना होगी उसके लिए तो हो ही जाएगा। तो कई तो यहां कोर्स लेकर के पीछे जाकरके मुरली पढ़ते रहते हैं। उनको सहज होता है। और कोई-कोई मुरली सात रोज का वो न कोर्स उठा करके फिर मुरली पर आधार रखते हैं। हँ? कोर्स नहीं उठाएंगे और मुरली पर ही आधार रखेंगे तो क्या होगा? समझ में आएगी? समझ में नहीं आएगी। हां, कच्ची रह जावेंगी क्योंकि सात रोज का कोर्स तो वो उठाय ना सके। फिर मुरली पर ही आधार रहती है तो कच्ची तो जरूर बन जाती है।

तो ये तो पढ़ाई है ना। तुम बच्चे सभी समझते हो। यहां बैठे हो। और ये जानते हो कि हम सभी स्टूडेंट हैं। और बेहद के सुप्रीम टीचर के स्टूडेंट हैं। समझा, किसके स्टूडेंट हैं? फादर के, गॉडफादर के, सुप्रीम गॉड फादर के। तो कितनी खुशी होनी चाहिए बच्चे कि भगवान हमको पढ़ाते हैं! परंतु सब बच्चों को ये इतनी खुशी क्यों नहीं रहती है जितनी होनी चाहिए? हँ? इतना खुशी क्यों नहीं आती है? भूल जाते हैं। इतनी अच्छी लंबी-चौड़ी बातें, हँ, बाप भी है, टीचर भी है, गुरु भी है, भगवान भी है। और वो ऊँचे ते ऊँचा भगवंत बैठ करके हमको पढ़ाते हैं। तो भी देखो माया भुलाय देती है। और कोई-कोई तो एकदम, कोई-कोई तो एकदम पूरा भुलाय देती है। बाप को भी भुलाय देती है, टीचर को भी भुलाय देती है। हँ? गुरु को भी भुलाय देती है। 15.11.1967 की रात्रि क्लास का चौथा पेज। फिर तो क्या होता है वो अपने ही धंधे-धोरी में। कौन सा धंधा-धोरी? लौकिक दुनिया की धंधेधोरी में वहां ही वो अपना टाइम वेस्ट कर देते हैं। फिर तो कभी थोड़ा भी याद नहीं करते हैं या कभी-कभी क्लास में भी नहीं आते हैं। तो देखो यहां ऐसे भी बहुत बच्चे हैं। पांच-पांच, चार-चार रोज़ क्लास में भी नहीं आते हैं। तो बच्चों को समझ होनी चाहिए ना। तो ये ऐसे ही होते हैं जैसे वो छोटे-छोटे स्कूलों में भी कोई-कोई चार-पांच रोज एब्सेंट रहेगा। फिर बाद में आएंगे। और फिर आकरके चुपचाप पिछाड़ी में बैठ जावेंगे। डल हेडेड कहेंगे ना। तो देखो ऐसे डल हैडेड भी तो बाबा के पास हैं ना। हैं तो सही जरूर। डल हेडेड हैं।

अभी तो बाबा कहते हैं ना भई जो पढ़ेंगे, लिखेंगे; दुनिया में भी तो बोलते हैं ना पढ़ेंगे, लिखेंगे तो बनेंगे नवाब। रुलेंगे, पिलेंगे तो होंगे खराब। तो क्या करेंगे? क्या बनेंगे फिर? उनको फिर दास-दासियां बनना पड़े। दास-दासियां भी होंगी ना। प्रजा भी होगी। हां। और प्रजा भी तो कोई साहूकार कोई? कोई गरीब। एक जैसी प्रजा तो होती नहीं है। हां। तो वहां की इतनी प्रजा होगी जरी। जो साहूकार होंगे, हां, वो प्रजा उनके पास नौकरी भी करती होगी। माना प्रजा के भी दास-दासी बनेंगे बहुत से। वो नहीं करते हैं कि जो फारकती देगा वो चांडाल का भी जन्म ले लेगा। क्या? फारकती माने? छोड़के, त्यागपत्र देकर के हमेशा के लिए चले जाते हैं। तो वो चांडाल बनते हैं पढ़ते-पढ़ते अगर पढ़ाई को छोड़ देते हैं। माया की ग्रहचारी इतनी रहती है ना। (क्रमशः)

A night class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the second page was that the more praja you prepare, the more number of people you give knowledge, the bigger king you will become. This is true. So, each one should ask his heart that how many people did we make equal to ourselves, to how many people have we given knowledge. Third page of the night class dated 15.11.1967. How many people have we shown the path? Ask this to your heart. Then ask, yes, look, this Rukmani should ask her heart – How many did I make equal to myself? Hm? Which Rukmani? Hm? One is the Rukmani Dadi in basic knowledge in the world of Brahmins who is even now considered to be the incharge of Delhi. And one is the Rukmani Dadi of Advance. Who is she? Hm? Ruk mani. What would you say? She stopped (ruk gayi) while becoming a gem (mani). Speak up.
(Someone said something.) Yes. Yamuna. So, she should also ask her heart that how many people I have made equal to myself. If she asks her heart, then she will know that I have made many. This is why I will definitely become a Maharani (empress). It is because this Purushottam Sangamyug is the time to achieve the high post, the highest on high post of Maharani or Maharaja (emperor), isn’t it? At this time if, if you do not run properly, hm, if you keep on stopping here and there; you start looking at the side scenes on the way.

So, it was told that the topic of running properly is in the case of journey of remembrance and in making others equal to you. So, then you will suffer. Your post will decline. And the post will be so low that it will go on reducing in every Kalpa. Will it go on reducing every Kalpa? Does it mean that it will decrease further in next Kalpa? Hm? Then?
(Someone said something.) Yes, in every Kalpa, the more purusharth you make now to do service, to make praja, to give message, you will be able to make that much only in every Kalpa. Is it not? Daughter, we see the income of this time in a saakshi (detached observer) manner, don’t we? Then we understand. We understand everything that even in the previous Kalpa this one had achieved this post only. Even now he has achieved this post only. So, it is not as if you will not have visions in future. You will indeed have visions. For example, people have visions in those schools, colleges; in this one also you will have visions in the end. And then many visions. And even in this at the most those who become kings will have visions. Or will those who will carry the burden in front of those kings have [visions]? Arey, even those who carry the burden will have visions. Daughter, they will have some vision, will they not? They will definitely have. This is why Baba tells the children that children, hm, make purusharth. Work hard for the purush, i.e. the soul. Work hard nicely. Which all hard work for the sake of the soul? Hm? What? Obtaining knowledge, giving knowledge. To think and churn the knowledge. And after thinking and churning, after causing the cream to emerge, telling others, explaining others. The more you serve;

Well, do not commit mistake in this topic. What mistake? You do service, you don’t remember [the Father] or do not do service in soul conscious stage. You enter into body consciousness. No. Become accurate. Hm? What should you become? Become lever clock. What does lever clock do? It keeps on jumping like this continuously, doesn’t it? So, there are different kinds of clocks, aren’t there? Some clocks are lever clocks. And it is written on those clocks that brother, this is a lever clock. Hm? What is meant by lever? Lee var. What is meant by ‘var’ [in Hindi]? Righteous. Yes. Whom did she choose? She chose the righteous one. There are so many jewels in this, in this lever clock. Some clocks are called cylinders. It has these many fewer jewels. So, they will commit some or the other mistake in showing time, will they not? Hm? What will the clock do? Down and up? It will keep on oscillating up and down. So, the lever clock is accurate. What? The one who marries the most righteous one. What is the meaning of lever in an unlimited sense? Lee var. The one who marries (varan karney vaali) the righteous one is accurate.

So, you children also have to become lever, will you not? Hm? And you have to study accurate knowledge nicely. Children have register, etc. everything, don’t they? The children who take scholarship will never be absent. Who? Scholarship. That is a topic, an example in a limited sense. And here? How many obtain scholarship here? Hm?
(Someone said something.) Nine? Eight. So, it was told that they will be regular and punctual. Yes. Except in case of illness, etc. Yes, if they suffer from illness, then that is a different matter. Even if they remain absent in illness, what will they do after they recover? They will gallop. They will make-up. And they will do it very nicely.

Look, here the daughter who fell ill, whose eyes are not working. They stopped functioning suddenly. So, perhaps she remained absent for 15 days. Now her exams were nearing. Her exam will begin today, today. So, look, it has been seven days. And she has gone to the school. So, that teacher said – No, I will not allow you to sit for the exam. I will do like this. So, she said – Arey, why will I not appear? Will I lose one year like this? I will appear for this exam. She fought with her teacher. So, she answered the mathematical calculations that the teacher asked her. Okay, you try. You may come and sit. Take care of your eyes. They should not stop functioning again. She said- My eyes are alright. I will come and study. So, look, although her eyes were not functioning, still the poor girl is making efforts. So, she is making efforts to pass, isn’t she? Look, however she is making so much purusharth. She argued so much with her teacher! She confronted her saying that I will not spoil, lose my 12 months like this. If you don’t allow me to sit for the exam here, then I will go to another school. Arey? If you don’t allow me to sit for the exam, then tell me. Then I will make arrangements in another school. I will leave you. Look, she is such clever daughter. So, did you see or not? Her eyes are alright now because her eyes were also troubling her a lot, weren’t they? She cried below, she cried up. She started crying so much that just don’t ask. She doesn’t listen to anyone. So, look, she paid attention to the studies, didn’t she?

So, children should also pay such attention that even if the teacher says because there are many such teachers in between. What? They say that I will not teach you; you cannot appear for the exam; you cannot come here; you cannot do this; you cannot do that. So, then she will look for another school, will she not? Where will she go? Hm? Yes, there is advance knowledge also, isn’t it? So, she will move ahead. So, just as Baba gives the example of this daughter, so Baba tells the daughters here also – You have to study. You have to study very nicely. And everyone gets Murli for studying. Hm? Whether someone comes here or not, for those who have a desire, arrangements for Murli will be done for him/her without fail. So, many undergo the course here and later keep on reading the Murlis. It is easy for them. And some people study Murlis no, undergo the course for seven days and then take the support of the Murlis. Hm? What will happen if they don’t undergo the course and take only the support of the Murlis? Will they understand? They will not understand. Yes, they will remain weak because they cannot undertake the seven days course. Then, if they take only the support of the Murlis then they definitely become weak.

So, this is a study, isn’t it? All of you children now understand. You are sitting here. And you know that we all are students. And we are the students of the unlimited Supreme Teacher. Did you understand as to whose students are we? Of the Father, the Grandfather, the Supreme God Father. So, you should feel so joyful children that God teaches us. But why don’t all children feel as joyful as they should? Hm? Why don’t they feel so happy? They forget. Such nice, long and wide topics, hm, He is the Father also, Teacher also, Guru also and God also. And that highest on high God sits and teaches us. However look, Maya makes you forget. And she makes some forget completely, she makes them forget completely. She makes them forget the Father also and she makes them forget the Teacher also. Hm? She makes them forget the Guru also. Fourth page of the night class dated 15.11.1967. Then what happens is that they get busy in their business and occupation. Which business and occupation? They waste their time in the businesses and occupations of the lokik world. Then they do not even remember [the Father] for some time or do not come to the class sometimes. So, look, here there are many such children also. They do not come to the class even once in five, four days. So, children should have the wisdom, shouldn’t they? So, it is same as in those small schools where some remain absent even for four-five days. Then they will come later on. And then they come and sit silently in the backside. They will be called dull-headed, will they not be? So, look, such dull headed ones are also with Baba, aren’t they? They are definitely there. There are dull-headed ones.

Now Baba says, doesn’t He that brother, those who read, write; people in the world also say, don’t they that if you read and write you will become Nawabs (kings). If you cry and fight you will get spoilt. So, what will they do? What will they then become? They will then have to become servants and maids. There will be servants and maids also, will there not be? There will be subjects also. Yes. And even among the subjects some will be rich and some? Some will be poor. Subjects are not alike. Yes. So, there will be some subjects there. Those who will be prosperous, yes, the subjects must be working under them. It means that many will become the servants and maids of the subjects also. The one who gives a faarkati [divorce to the Father] will also get birth as a chaandaal (members of a lowest caste among Hindus who perform the tasks of cremating the dead bodies). What? What is meant by faarkati? They leave; they submit their resignations and leave forever. So, if they leave the studies while studying, then they become chaandaals. The planetary effect (grahachaari) of Maya is such, isn’t it? (Continued)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2829, दिनांक 24.03.2019
VCD 2829, dated 24.03.2019
रात्रि क्लास 15.11.1967
Night class dated 15.11.1967
VCD-2829- Bilingual-Part-2

समय- 23.46-45.04
Time- 23.46-45.04


तो बच्चों को समझाया है इस बेहद की पढ़ाई में भी ग्रहचारी रहती है। बाकी देखो कहते हैं ना भक्तिमार्ग में शुक्र की दशा, बृहस्पति की दशा। शुक्राचार्य को तो जानते हो ना। कौन? हँ? राक्षसों के गुरु। जब राक्षसों के गुरु की दशा बैठेगी तो क्या बनाएगा? अपना चेला बनाएगा राक्षस को? हां। बृहस्पति की दशा। कौन? बृहस्तपति, हां। बड़े से बड़े जो देवताएं होते हैं ना उनके भी गुरु बन कर बैठते हैं। तो क्या बनावेंगे? उनके पास जो चेले-चपाटे होंगे तो क्या बनेंगे? देवता ही बनेंगे। फिर कहते हैं राहु की दशा। अरे, ये तो बहुत बुरी दशा है। फिर? शनीचर की दशा। क्या? तो ये दशाएं ढेर की ढेर बैठती हैं ना। तुमने सुना है ना। क्या? 9 ग्रह होते हैं ना। हँ? तो नौ ग्रहों की; सब एक जैसे होते हैं? नंबरवार होते हैं। तो ग्रहचारी बैठती है। नहीं सुना होवे तो हम फिर बहुतों को बताय देवें। ये दशाओं का कोई को तो बिल्कुल ही अब्सोल्युटली अभी देखेंगे तो एकदम राहु की दशा बैठ गई। है ना? हँ? वो जैसे पहले था वैसे ही जाकर के हो गया। है ना। अब वो उसमें ही खुश है। तो भी है वंडरफुल बात।

जभी सुनते हैं ऐसी-ऐसी बातें बच्ची कि कितनी वो होशियार बच्ची थी। हँ? कितने अच्छे ध्यान में जाती थी। और कितना दूसरों को डायरेक्शन देती थी। और उनके डायरेक्शन पर हम चलते थे। कौन चलते थे? मम्मा और बाबा। हम माने? मम्मा-बाबा भी चलते थे। हँ? तो मम्मा-बाबा सभी चलते थे। ऐसा ऊंच पुरुषार्थ करने वाली, कराने वाली दूसरों को, वो आज है नहीं। आज माने कब? 1967 में है ही नहीं। किसके लिए बोला होगा? हँ? बताओ। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) पीछे के लिए बोला होगा? अरे कोई पर्सनालिटी होगी ना। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) प्रजापिता के लिए बोला होगा? वो प्रजापिता जिसे बाबा कहते हैं मुकर्रर रथ, जो मेरे साथ ही रहता है? हत तेरे की। कहता है प्रजापिता के लिए बोला। अरे? वाह भाई। सबसे नीच प्रजापिता ही गिरा जाके? ऐसे? तुम्हारी बुद्धि में क्या बैठा? हँ? उसने पूर्व जन्म में ऐसा क्या बुरा कर दिया जो सबसे नीचे गिर गया? अरे बाबा तो कहते हैं इस जन्म में कोई पढ़ाई पढ़ता है, तो ब्राह्मण बनता है, तो अगले जन्म में, अगले जन्म में जैसी यहां पढ़ाई पढेगा, जैसी हिम्मत रखेगा तो हिम्मत तोड़ के आया या हिम्मत बराबर रखकर के शरीर छोड़ा प्रजापिता ने? हां, हिम्मत रखी ना। भले देहम वा पातयामी, लेकिन शरीर छोड़ने के बाद भी अगले जन्म में फिर? फिर पुरुषार्थ करेगा।

तो बताया। किसके लिए बताया वो आज है नहीं? अरे मुकर्रर रथधारी प्रजापिता की वाली आत्मा तो वो सदा शिव बाप के साथ ही रहती है। हँ? किसके लिए बताया?
(किसी ने कुछ कहा।) जगत माता के लिए बताया। वो आज है नहीं जो सबको डायरेक्शन देती थी, मम्मा बाबा को भी डायरेक्शन देती थी। हँ? ये भी बताया एक मुरली में, हँ, उनमें बाप प्रवेश करते थे। क्या? माने ब्रह्मा के कई मुख होते हैं ना। चार-पांच मुख होते हैं। तो ये तो ब्रह्मा का मुख भी है जिस ब्रह्मा के मुख में बाप प्रवेश होकरके डायरेक्शन देते थे। वो आज? आज है नहीं। चली गई। जाकर के शादी-वादी की होगी। जाकरके फिर भी ऐसे कि जैसे, जैसे थी तैसे जाकरके बन गई। जैसे माने क्या थी जैसे? क्या थी? अरे? कैसे थी? क्या थी? ओम मंडली में जब ब्राह्मण बनने का काम शुरू हुआ, बनाने का काम, तो ओम मंडली में आने से पहले क्या थी? हँ? अरे? ये भी पता नहीं? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? गृहस्थी थी? कैसी गृहस्थी थी? गृहस्थी थी या गृहस्थी में टांग अड़ाने वाली थी? हँ? क्या थी? गृहस्थी थी या गृहस्थी में टांग अड़ाने वाली, विघ्न डालने वाली थी? गृहस्थी किसे कहा जाता है?

एक होते हैं गृहस्थ और एक होते हैं सन्यासी। क्या अंतर है? ये धर्मपिताएं हैं जितने भी मनुष्य गुरु वो सब हैं सन्यासी। तो उन सन्यासियों में और जो सतयुग त्रेता के देवताएं होते हैं उनमें क्या अंतर है? कोई अंतर नहीं? कुछ पता नहीं? हम क्या करेंगे पता-वता करके? जो होता होगा सो होता देखा जाएगा। अरे हां, देवताओं की प्रवृत्ति पक्की एक के साथ होती है। क्या? जो पक्के देवता होंगे उनकी पक्की 21 जन्म की प्रवृत्ति लगातार एक आत्मा के साथ होती है। उसको कहेंगे पक्की प्रवृत्ति, गृहस्थी। और अपनी प्रवृत्ति को तोड़ दे और दूसरे की प्रवृत्ति में टांग अड़ाके घुस पड़े, हँ, पाउडर, लिपिस्टिक-विपिस्टिक लगाकर के। तो? गृहस्थी तोड़ने वाली हुई, प्रवृत्ति को तोड़ने वाली हुई या बरकरार रखने वाली हुई? हां, तोड़ने वाली हुई। तो जैसी थी वैसी ही हो गई।

तो बाप सावधानी देते हैं और बच्चों को समझाते भी हैं। जो भी बच्चे चले जाते हैं, उनके लिए भी समझाते हैं, देखो, हँ, तो फारकती दे दिया। कोई फारकती दिया, कोई ने डाइवोर्स दिया। बच्चे होते हैं वो बाप को फारकती दे देते हैं। या बच्चा बाप को फारकती दे देता है। जो पति-पत्नी होते हैं वो आपस में डायवोर्स दे देते हैं। तो बच्चियां भी तो बहुत छोड़ देती है ना बच्ची। यहां भी ऐसी बहुत बच्चियां हैं। पहले; क्या? संबंध जोड़ती हैं। फिर? फिर तोड़ देती हैं। अरे कुमारियां भी बहुत छोड़ जाती हैं। ऐसे नहीं कि बाबा माता को ही याद करते हैं कि जैसी थी वैसे हो गई। माता की अकेले की बात नहीं। कुमारियां भी बहुत छोड़ जाती हैं। अरे अच्छी-अच्छी, फर्स्ट क्लास-फर्स्टक्लास कुमारियां कितनी इतनी बड़ी कुमारी वो भी चलते-चलते। क्या? रफूचक्कर। तो ये तो अभी भी होने का ही है। क्या? आदि में हुआ तो अंत में भी होगा या नहीं होगा? होगा। तो अभी तो कौन सा सन् चल रहा है? पहले तो 1967 की बात। यज्ञ के आदि में ओम मंडली की बात। हां। और अभी? अभी तो दो हजार, क्या चल रहा है? हां, 2019 शुरू हो गया। तो अभी उनका क्या हाल होगा? हँ? गृहस्थी की पक्की होंगी कि धड़ाधड़-धड़ाधड़ गृहस्थी चेंज करती जाएंगी? अरे, एक के साथ गृहस्थी निभाएं या अनेकों के साथ निभाने वाली उसको गृहस्थी कहेंगे? नहीं।

तो बताया ये अभी भी होने का ही है। माने 67 में ही बताय दिया कि अभी भी उन आत्माओं का जो पार्ट है वो अभी भी ऐसे ही होने का है। तो देखो, चाहे बेसिक से, चाहे एडवांस में हों, चाहे माताएं हों, चाहे कुमारियां हों, हँ, चलते-चलते अचानक रफूचक्कर हो जाती हैं या नहीं? हां, हो जाती हैं। चली जाती हैं। फारकती दे दिया। कुमारियां बहुत छोड़ जाती हैं। माताएं कम छोड़ती हैं। कुमारियां बहुत छोड़ती हैं। क्यों? ऐसा क्यों?
(किसी ने कुछ कहा।) जा, सिक्ख धर्म एक नारी सदा भ्रष्टाचारी? ये क्या लिख दिया? हत् तेरे कि नहीं कि। भ्रष्टाचारी नहीं, ब्रह्मचारी। हां। क्योंकि हर धर्म जो है पहले सतोप्रधान, फिर बाद में क्या बनता है? तमोप्रधान बनता है कि नहीं? हां। और तमोप्रधान बनाने वाले कौन होते हैं? देहधारी धर्मगुरु जो आकरके भगवान बनके बैठते हैं जैसे गुरु नानक। तो तमोप्रधान युग में आया या सतोप्रधान युग में आया? हां, तो उसने क्या बनाया? वो क्या बनाएगा? तमोप्रधान बनाएगा? ये तो गायन है एक नारी सदा ब्रह्मचारी। लेकिन वो जो देहधारी धर्मगुरु आते हैं वो नीचे गिर आते हैं या ऊंची स्टेज में रखते हैं? बाप आते हैं तो ऊंची स्टेज में। और गुरु लोग आते हैं तो वो चाहे जिस धर्म के गुरु हों, वो नीचे? नीचे जरूर गिराते हैं। मुख से कुछ बोलते हैं और करते? करते कुछ और हैं। तो बताया वो गुरु नानक कौन से युग में आता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, कलियुग में आता है। और कलियुग में भी आदि में आता है कि मध्य में आता है कि मध्य के भी बाद आता है? हां। मध्य के भी बाद आता है। तो फिर जैसा युग होगा गिरती कला का वैसी ही पढ़ाई पढ़ाएगा ना। नहीं? हां।

तो वो भी चलते-चलते रफूचक्कर हो जाती हैं। कौन? कुमारियां। बहुत रफूचक्कर हो जाती हैं। माताएं कम। तो हम कहेंगे कि कलप पहले भी ऐसे ही हुआ था। क्या? जो अभी हो रहा है, पहले भी हुआ था। बस। बात ही थोड़ी कि कलप पहले भी ऐसे ही हुआ था। तो मीठे मीठे बच्चों को कम से कम और कुछ भी नहीं तो भला बाप को तो याद करें। भल छोड़ करके चले जाते हैं तो कम से कम बुद्धि से तो याद करते रहें। चलो, मुरली भी नहीं पढ़ते हैं। हँ? कहीं क्लास भी अटेंड नहीं करते हैं तो कम से कम क्या करें? बाप को तो याद करते रहें। म्यूजिक बजा। कोशिश करेगी हां कि और कोई और धंधा तो नहीं है? यहां तो कोई और धंधा नहीं है ना कोई। ये बहुत रिफ्रेश है। कुछ ट्राई करके देखो। तो बरोबर होता है ना। ट्राई करेंगे, कोशिश करेंगे, तो रिफ्रेशमेंट आती है ना। बस। अंदर आया, यहां खड़ा हुआ, बड़ी खुशी हो जाएगी। तो ये है यहां हमारा आब्जैक्ट। बस। खुश होकरके एक को भी चित्र को देख करके थोड़ा बाहर जाओ, थोड़ा चक्कर-वक्कर लगाओ, तुमको फिर बाहर जाने से भी भूल जावेगा। ये क्यों हुआ? जैसा संग वैसा रंग। किसको? हँ? सुप्रीम सोल बाप को? सुप्रीम सोल को नहीं हो सकता। किसको? वो तो अभोक्ता है। वो एक ही आत्मा है जो सदा अभोक्ता है। बाकी तो जितनी आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली हैं सब क्या हैं? भोगी हैं। तो उनकी ये खासियत है कि जैसा संग वैसा रंग लगेगा।

तो, तो सीढ़ी को देखो। ओहो! हम 84 जन्म का चक्कर ऐसे-ऐसे लगाते हैं। तो फिर याद आ जाएगा ना। कि अभी हम नीचे गिर गए। अभी हम फिर? फिर उस उंची स्टेज में जाएंगे जितनी ऊंची स्टेज में हम ओम मंडली में सबसे उंची स्टेज में बैठी हुई थी। कौन? हां, वो ही जगदंबा। तो फिर याद आ जाएगा ना। तो थोड़ा यहां-वहां बातों में जाएंगे बाहर की दुनिया में तो भूल जाएंगे। हां, तो ये तो मधुबन है ना। फिर भी मधुबन तो कहते ही हैं जहां मधुबन में मुरलिया बाजे मधुसूदन की। तो यहां तो रखे हैं चित्र-वित्र कुछ ना कुछ तो रखे हैं ना। तो रिफ्रेशमेंट हो जाएगी। देखें कृष्ण के और देखेंगे शिव बाबा के चित्र। बोलेगा हां, तो आगे जन्म-जन्मांतर हम कृष्ण भगवानुवाच। अभी तुम क्या करेंगी? हँ? कृष्ण भगवानुवाच के चक्कर में नहीं पड़ेगी। किसमें? शिव भगवानुवाच। हां। अभी शिव भगवानुवाच। मगज में तुम्हारे ठुस गया। क्या? कृष्ण भगवानुवाच खलास। लेकिन फिर अगर बाहर की दुनिया में गया, हँ, भई वहां जाकरके थोड़ा ठंडा हुआ, करके देखो। बाबा कहते हैं ना। अंदर घुसो और फिर बाहर निकलो। फिर बाहर से अंदर आओ। फिर बाहर जाओ। फिर अंदर आओ। अनुभव करके देखो। दिन में 5-7 दफा ऐसा करो। क्या? तो देखो, यहां आने से रिफ्रेशमेंट कितनी अच्छी आती है।

मीठे-मीठे सीकिलधे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का। याद आया ना? क्या याद आया? कौन याद आया? एक याद आया कि दो याद आया? बाप दादा दो याद आया? व्यभिचारी याद आई? हँ? रूहानी बाप। कौन याद आए? रूहानी बाबा। जो रूहानी बाबा इस समय प्रैक्टिकल में दादा के तन में मुकर्रर रूप से आकरके पार्ट बजाय रहा है। पतित तन में पार्ट बजाय रहा है ना। भले। लेकिन वो पतित तन धारण किसने कर लिया? हां। एवर प्योर ने धारण किया। तो रूहानी बाप व दादा का। हँ? ऐसे तो दोनों प्यार करते हैं तुम बच्चों को। रूहानी बाप भी और? और? जिस्मानी दादा भी, हां, प्यार तो करेंगे क्योंकि वो सारे विश्व का पिता है ना। तो पिता तो है तो पिता कभी बच्चों को छोड़ता है क्या? अरे, कैसा भी बच्चा है तो भी बच्चों में आस? आस बनी रहती है। अरे, आज नहीं तो कल ये सुधर ही जाएंगे। तो बाप व दादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से यादप्यार और गुड नाइट। ओम शांति। (समाप्त)

So, children have been explained that there is grahachaari (planetary effects) in this unlimited study also. Look, people on the path of Bhakti talk about the effect of Shukra (Venus), effect of Brihaspati (Jupiter). You know Shukracharya, don’t you? Who? Hm? Guru of the demons. When you are under the influence of the guru of demons then what will he make you? Will he make the demon his disciple? Yes. Influence of Brihaspati. Who? Brihaspati, yes. He sits as the guru of even the biggest deities. So, what will he make? What will the disciples that he has become? They will become deities only. Then they say – influence of Rahu. Arey, this is a very bad planetary influence. Then? Shanichar’s (Saturn’s) influence. What? So, these numerous influences are seen, aren’t they? You have heard, haven’t you? What? There are nine planets, aren’t there? Hm? So, of the nine planets; are all of them alike? They are numberwise. So, the planetary influence is seen. If you haven’t heard, then I will tell many. As regards these planetary influences, some absolutely, we will now observe that they are under the complete influence of Rahu. Is it not? Hm? He became as he was earlier. Is it not? Well, he is happy in that only. However, it is a wonderful topic.

Daughter, when we listen to such topics that that daughter was so intelligent. Hm? She used to go into trance so nicely. And she used to give so many directions to others. And we all used to follow her directions. Who used to follow? Mama and Baba. What is meant by ‘we’? Mama and Baba also used to follow. Hm? So, everyone including Mama and Baba used to follow. Such ladies who used to make such high purusharth themselves and used to enable others to make are not present today. ‘Today’ refers to which time? They do not exist in 1967 at all. For whom must it have been told? Speak up. Hm?
(Someone said something.) Would it have been told for the past? Arey, there must be a personality, will it not be there? Hm? (Someone said something.) Would it have been told for Prajapita? That Prajapita, whom Baba calls the permanent Chariot, who lives with Me only? Damn it. This one says that He said for Prajapita. Arey? Wow brother! Did Prajapita alone fall to the lowest level? Is it so? What sat in your intellect? Hm? What bad thing did he do in the past birth that he fell to the lowest level? Arey, Baba says that if anyone studies knowledge in this birth, then he becomes a Brahmin, then in the next birth, in the next birth, the kind of knowledge that he studies here, the extent to which he shows courage, then did Prajapita come after losing courage or did he keep up his courage while leaving his body? Yes, he showed courage, didn’t he? Although it is said ‘deham va paatayami’, but even after leaving the body, in the next birth? He will make purusharth again.

So, it was told. For whom was it told that he is not present today? Arey, the soul of the permanent Chariot holder Prajapita remains with Father Shiv forever. Hm? For whom was it told?
(Someone said something.) It was told for Jagatmata (Mother of the World). The lady who used to give directions to everyone is not present today; she used to give directions even to Mama-Baba. Hm? It was also told in a Murli that Father used to enter in them. What? It means that there are many heads of Brahma, aren’t there? There are four-five heads. So, this is Brahma’s head also in which the Father used to enter and give directions. Are they present today? They are not present today. She departed. She must have gone and got married. She went and became as she was in the past. How was she? What was she? Arey? How was she? What was she? When the task of becoming, the task of making Brahmins began in Om Mandali, then what was she before coming to Om Mandali? Hm? Arey? Don’t you know even this? (Someone said something.) Hm? Was she a householder? What kind of a householder was she? Was she a householder or did she used to create obstacles in the household? Hm? What was she? Was she a householder or was she someone who pokes her leg, creates obstacles in household? What is meant by householder (grihasthi)?

One are householders (grihasth) and one are Sanyasis (renunciates). What is the difference? All these founders of religions who are human gurus are Sanyasis. So, what is the difference between those Sanyasis and the deities who exist in the Golden Age and Silver Age? Is there no difference? Don’t you know anything? What will I do by knowing? Whatever happens will be seen. Arey, yes, the firm household of the deities is with one. What? Those who are firm deities will have firm household of 21 births with one soul. That will be called firm household, grihasthi. And if someone breaks his household and pokes his legs in someone else’s household by applying powder, lipstick, etc. then? Is she someone who breaks the household, breaks the pravritti or is she the one who keeps it intact? Yes, she is the one who breaks. So, she became as she was.

So, the Father cautions and also explains to the children. He also explains for all the children who depart that look, they gave faarkati. Some give faarkati, some give divorce. The children give faarkati to the Father. Or the child gives faarkati to the Father. The husband and wife give divorce to each other. So, many daughters also leave, don’t they daughter? Even here there are many such daughters. First; what? They establish a relationship. Then? Then they break. Arey, many Kumaris also leave. It is not as if Baba remembers only the mother that she became as she was. It is not a topic of the mother alone. Many Kumaris (virgins) also leave. Arey, nice, first class, first class Kumaris, such big Kumaris, they too, while treading; what? Rafoochakkar (vanish). So, this is bound to happen even now. What? When it happened in the beginning, then will it happen in the end also or not? It will happen. So, which year is going on now? Earlier it was a topic of 1967. It was a topic of the beginning of the Yagya. Yes. And now? Now it is two thousand; which year is going on? Yes, 2019 started. So, what will be their condition now? Hm? Will they be firm in their households or will they keep on changing the household in quick succession? Arey, will those who maintain the household with one called householders (grihasthis) or will those who maintain with many called householders? No.

It was told that this is bound to happen even now. It means that it was told in 67 itself that now the part [that is recorded] in those souls will happen like that even now. So, look, be it from basic or be it in advance, be it the mothers or be it the virgins, do they vanish suddenly while treading or not? Yes, they vanish. They depart. They gave faarkati. Many virgins leave. Mothers leave in less numbers. Many virgins leave. Why? Why so?
(Someone said something.) In Sikhism – Ek naari sadaa bhrastaachaari (having relationship with one woman makes you unrighteous)? What is it that you wrote? Damn it. Not bhrastaachaari (unrighteous), it is brahmachaari (celibate). Yes. It is because every religion is initially satopradhan (pure), then what does it become later? Does it become tamopradhan (impure) or not? Yes. And who are the ones who make you tamopradhan? The bodily religious gurus who come and sit as Gods, for example, Guru Nanak. So, did he come in a tamopradhan Age or did he come in a satopradhan Age? Yes, so, what did he make? What will he make? Will he make tamopradhan? It is sung that ‘ek naari sadaa brahmachaari’ (the one who has relationship with only one woman in his married life is a celibate person). But those bodily religious gurus who come, do they fall down or do they keep you in a high stage? When the Father comes He is in a high stage. And when the gurus come, then they may be gurus of any religion, they definitely make you fall down. They speak something through the mouth and what do they do? They do something else. So, it was told that in which Age does that Guru Nanak come? Hm? (Someone said something.) Yes, he comes in the Iron Age. And even in the Iron Age, does he come in the beginning, does he come in the middle or does he come after the middle period? Yes. He comes after the middle period. So, then as is the Age of decreasing celestial degrees, the knowledge that he teaches will also be accordingly, will it not be? No? Yes.

So, they too vanish while treading; who? The Kumaris (virgins). Many vanish. Mothers to a lesser extent. So, we will say that it had happened like this in the previous Kalpa as well. What? Whatever is happening now had happened in the past as well. That is it. The topic itself is very small that it had happened like this in the previous Kalpa as well. So, sweet, sweet children should at least remember the Father if they cannot do anything else. Even if they leave, they should at least keep on remembering through the intellect. Okay, they may not even read the Murli. Hm? Even if they do not attend the class anywhere, so, what should they do at the least? They should continue to remember the Father. Music was played. She will try, yes, that there is no other business? Here, there is no other business. Here you are very refreshed. Try a little and see. So, it correctly happens, doesn’t it? If you try, if you make effort, then you get refreshment, don’t you? That is it. If you come in, stand here, you will feel very happy. So, this is our object here. That is it. Feel happy and see even one picture and go out a little, move around a little; you will forget even when you go out. Why did it happen so? As is the company, so is the colour that is applied. To whom? Hm? To the Supreme Soul Father? It cannot apply to the Supreme Soul. Whom? He is abhokta (non-pleasure seeker) He is the only soul which is abhokta forever. What are all other souls which play their parts on this world stage? They are bhogis (pleasure-seekers). So, it is their specialty that as is their company, so will be the colour that is applied to them.

So, so, look at the Ladder. Oho! We pass through the cycle of 84 births like this. So, then it will come to your mind, will it not? That we have now fallen down. Now we again? Once again we will reach that high stage, the highest stage in which we were sitting in the Om Mandali. Who? Yes, the same Jagdamba. So, then it will come to the mind, will it not? So, if you go out a little in the outside world in the topics of here and there, then you will forget. Yes, so this is Madhuban, isn’t it? However, Madhuban is said to be the place, the Madhuban where the flute of the Madhusudan is played. So, here some pictures are placed, aren’t they? So, you will enjoy refreshment. You will see Krishna and you will see the picture of ShivBaba. He will say, yes, so, in the past, birth by birth we used to say ‘Krishna Bhagwaanuvaach’ (God Krishna speaks). What will you do now? Hm? You will not get entangled by ‘Krishna Bhagwaanuvaach’. In whom [will you be busy]? Shiv Bhagwaanuvaach. Yes. Now Shiv Bhagwaanuvaach. It has entered your brain. What? ‘Krishna Bhagwaanuvaach’ is over. But if you go to the outside world, brother, if you go there, you become a little cold; you may try and see. Baba says, doesn’t He? Come inside and then go out. Then come in from outside. Then go out. Then come in. Experience and see. Do 5-7 times like this in a day. What? So, look, you get so nice refreshment by coming here.

To the sweet, sweet, seekiladhey, spiritual children; from the spiritual Father and Dada. Did you recollect? What did you recollect? Whom did you recollect? Did you recollect one or two? Did you remember two, i.e. Baap (Father) and Dada? Did you recollect in an adulterous manner? Hm? Spiritual Father. Who should come to the mind? Spiritual Baba. The Spiritual Baba who has come at this time in practical in the body of Dada in a permanent manner and is playing His part. He is playing His part in a sinful body, isn’t He? Although. But who assumed that sinful body? Yes. The Ever Pure assumed. So, from the Spiritual Baap (Father) and Dada. Hm? In a way both of them love you children. The spiritual Father as well as? As well as? As well as the physical Dada, yes, will love [you] because he is the Father of the entire world, isn’t he? So, he indeed is the Father; so, does the Father ever leave the children? Arey, howsoever the child may be, still he continues to have hope in the children. Arey, if not today, they will definitely reform tomorrow. So, remembrance, love and good night from the Baap (Father) and Dada from His heart and life, with love and affection. Om Shanti. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2830, दिनांक 25.03.2019
VCD 2830, dated 25.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning class dated 16.11.1967
VCD-2830-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.52
Time- 00.01-20.52


आज का प्रातः क्लास है 16.11.1967. रिकॉर्ड चला है तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो। तुम्हीं हो बंधु, सखा तुम्हीं हो। माना एक ही हो। एक ही संबंधी माता के रूप में, पिता के रूप में, बंधु के रूप में, सखा के रूप में। फिर उसमें कहते हैं त्वमेव सर्वं मम देव देव। तुम हमारे सर्व संबंधी हो। तो ये गीत की लाइन सुनी। तुम सखा हो, बंधु हो। ऐसे कहते हैं ना बच्चे। वास्तव में सखा तो इनको कहा भी नहीं जा सकता। क्यों? इनको माने किनको? हँ? किनको? (किसी ने कुछ कहा।) राम और कृष्ण को? अच्छा? अभी तो कहते तुम ही हो माता, तुम ही हो पिता, तुम ही एक हो बंधु। तुम ही एक हो सखा। अभी दो हो गए? हँ? अभी फटाक से दो हो गए? बताया कि इनको सखा नहीं कहा जा सकता है। इनको माने? शिव को और मनुष्य सृष्टि के बाप, दोनों को सखा नहीं कहा जा सकता है। क्यों? जो सखा होते हैं वो आपस में सखी और सखी, भाई और बहन या भाई-भाई।

तो ये जो गाया जाता है तो, तो है तुम्हारी गीता में। तब की बात है जब विराट रूप का साक्षात्कार किया। ऐसे कहेंगे ना। कोई अर्जुन तो है नहीं। हँ? ज्ञान का अर्जन करने वाला अर्जुन नहीं है? उसको साक्षात्कार हुआ? हँ? हां, अर्जुन नहीं है। तो सखों ने जब विराट रूप का दीदार किया है, दिखलाया है उनको, तो वो चकित हुए। तो फिर उस समय में कहते हैं बच्ची। तो बाबा आपको तो हम सखा कहते थे, फलाना कहते थे। अर्जुन ने भी कहा ना। हँ? तो सखा समझ करके खेल में, खाने में अगर कहीं भूल हो गई हो तो क्षमा कर दो क्योंकि हम तो आपको सखा समझते थे, मित्र समझते थे, ये समझते थे, फलाना समझते थे। अरे, आप तो बेहद का बाप हो। तो वे ऐसे-ऐसे समझते हैं जो दिल में कोई के कुछ थोड़े ही अपमान करते हैं ना। या कोई कुछ बेकायदे कुछ कह देते हैं।

तो जब देखते हैं विराट स्वरूप तो फिर कहते हैं बाबा हमें क्षमा कर देना। हमने तो बहुत भूल कर दी। हमने आपको ये समझा, वो समझा। अरे, आप तो हमारे मालिक हो। अरे, आप तो सारे विश्व का मालिक हो। तो हमसे भूल हो गई, भूल कर दिया। हमको क्षमा करना। तो ऐसे है ना बच्चे। एक जगह में ऐसे जब उनको रूप दिखाते हैं। गीता में है ना। अभी तो ये उसमें लिखा हुआ है। और रूप तो ये बच्चों को मालूम ही है, हँ, कि रूप बच्चों का विराट रूप है नंबरवार या तुम आत्मा रूपी बच्चों के बाप का विराट रूप है? हँ? किसका है? हां। तो बात तो कहेंगे कि बच्चों का ही है विराट रूप नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार क्योंकि जैसे कहते हैं ना हर एक सितारे में अपनी-अपनी एक दुनिया है। तो कोई सितारे की बड़ी दुनिया, कोई सितारे की छोटी दुनिया। हँ? कोई सितारे के आसपास थोड़े, कोई के आसपास ज्यादा। तो बड़े से बड़ा सितारा तो उसे कहते हैं जिसके पास बहुत हों चक्कर काटने वाले। हँ? ध्रुव तारा। क्यों नाम दिया ध्रुव तारा? ध्रुव माना अटल। अटल माना? अरे, तुम्हारा यादगार है ना अचलगढ़। अटल कहो, अचल कहो। हँ? चलायमान नहीं हुआ। बाकी सब उसके आसपास घूमते रहते हैं लेकिन वो चलायमान नहीं हुआ।

तो ऐसे नहीं है कि ये कोई आत्माओं के बाप का विराट रूप है। वो तो विराट रूप है ही नहीं। तो बाप तो ये समझाते हैं बच्चों को बैठकरके कि ये तुम्हारा विराट रूप है। तो जब वो कुछ देखते हैं कोई चमत्कार पीछे-पीछे, आगे-पीछे, देखते हैं ना, समझते तो हैं ना। तो फिर जब समझ जाते हैं तो पीछे क्षमा मांगते हैं कि हमने बड़ी भूल कर दी। अरे, हमने आपको पहचाना ही नहीं। जो करना था सो नहीं किया। ये नहीं किया, वो नहीं किया। तो देखो ऐसे तो बहुत ही बच्चे हैं यहां जो पहचानते ही नहीं हैं बिल्कुल। और वो तो फिर बिना पहचाने ऐसे ही जो मन में आया सो चलते रहते हैं। कौन? जो कुछ भी नहीं समझते हैं। न कोई ऐसे अदब से देखते हैं। न अदब से उनको रखते हैं क्योंकि अभी बहुत साधारण रूप में है ना। बाप खुद कहते हैं मैं आता ही हूं बहुत साधारण तन में। हँ? कौन बाप कहते हैं? हँ? शिव बाप कहते हैं मैं बहुत साधारण तन में आता हूं, साधारण रूप में। तो मुझे, मुझे तो जो मैं जैसा हूं, जो हूं, मुझे तो कोई विरला ही पहचानते हैं। कहेंगे इस रूप में हमको कोई विरला ही पहचानते हैं। हमको? अभी मुझे। मुझे माने एक। फिर कह दिया हमको। और जो पहचानते हैं तो उस हिसाब से चलते हैं। और यहां तो कोई क्या कहते हैं, कोई क्या कहते हैं, कोई क्या समझते हैं। तो अभी देखते तो हो ना। है तो बहुत साधारण तन में ना। नहीं तो, नहीं तो ये है बहुत बड़े ते बड़े आसामी। और बाप तो खुद कहते हैं देखो कि कितनी बड़ी आसामी है। पीछे आगे चलकर के वो कहते हैं बाबा हमें क्षमा कर दो। हमने ऐसा नहीं समझा जैसा हमने व्यवहार किया कि आप इतना हो एकदम क्योंकि है तो ना बड़ी आसामी।

तो ये बाप भी समझाते रहते हैं। हँ? ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘भी’ क्यों लगाया? इसलिए लगाया कि कोई और भी विशेष बच्चे हैं जो वास्तव में बड़ा आसामी समझते हैं। और बाप भी समझते हैं, तो बच्चों को समझाते रहते हैं। तो ये गीत तो है भले कि सखा है, माता है, पिता है, बंधु है, फलाना है, टीरा है। परंतु वो है तो बहुत बड़ी-बड़ी आसामी ना। तो वो समझते नहीं हैं। तो फिर बाद में क्षमा मांगते हैं। भले कोई अभी क्षमा मांगते हैं पर देखते तो कुछ भी नहीं हैं। क्या है? कुछ है? उन्होंने शास्त्रों में फिर क्या यादगार दिखाय दी? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) विराट रूप? नहीं, भगवान का कोई अवतार दिखाया। पता है? नहीं? हँ? वामन अवतार। कहते हैं बाउन अंगुल का। क्या? ये चार अंगुल हुए ना। ऐसे गिन-गिन करके 52 अंगुल का बोना। बहुत छोटा। तो, जो बड़ा-बड़ा राक्षसों का जो राजा था। हँ? कौन? बली। उसने समझा अरे ये तो बहुत छोटा है। क्या मांगेगा? थोड़ा बहुत रहने के लिए मकान की जमीन मांगेगा। दे देंगे। तो जैसे वो बलि देखते हैं ये तो कुछ भी नहीं है। कोई साधारण ब्राह्मण है।

तो यहां बच्चे भूल जाते हैं। समझे? क्योंकि जभी भी साधु, संत, महात्माओं, अरे वो शास्त्रों में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य। अब ये जो उन्होंने द्वापर युग में दिखाए हैं ये तो अभी सभी हैं ना। शास्त्रों में जो बड़े-बड़े दिखाए हैं विद्वान, पंडित, आचार्य, सन्यासी, बड़े-बड़े पावरफुल, तो ये सब सन्यासी लोग भी तो हैं ना। अभी हैं। कोई द्वापर की बात थोड़े ही है। तो देखो, कितना कुछ कोई भी कुछ बोलते हैं, हँ, कुछ भी बोल देते हैं। तो कुछ बोलता थोड़े ही है। तो बोलता है बिचारे भूले हुए हैं। हँ? कबके भूले हुए हैं? अरे, भूल हुई, भूले हुए कितना टाइम हो गया? अरे? ये भी बताना बड़ा मुश्किल है? अरे, 5000 साल पहले पहचाना था। तो 5000 साल पहले की बात कोई को याद रहेगी क्या? हँ? भूले हुए हैं। पहचानते नहीं हैं। हँ?

तो बाप भी कहते हैं कि इनको बच्चे पहचानते नहीं हैं। जब पहचानेंगे। अभी नहीं पहचानते हैं वर्तमान में। भविष्य में जब पहचानेंगे तब फिर वो भी ऐसे ही कहेंगे कि हम लोग तो इतना नहीं जानते थे कि ये जो ब्रह्माकुमारियों में ज्ञान है सो कोई आपने बैठ करके उनको दिया है। किसने आपने? हँ? ब्रह्माकुमारियों में जो ज्ञान है वो आपने हमको बैठ कर दिया है। वो भविष्य में कहेंगे। आपने माने कौन ने? अरे, एक अक्षर नहीं लिख सकते। आपने माने किसने?
(किसी ने कुछ कहा।) शिव ने? लो। वो विराट रूप शिव का है जिसको कहेंगे कान पकड़के हमसे भूल हुई? हँ? पता नहीं हमने क्या-क्या व्यवहार कर दिया? हँ? उससे कहेंगे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) संगमयुगी कृष्ण से कहेंगे? अच्छा? कृष्ण तो छोटा बच्चा होता है, बेसमझ। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, प्रजापिता, जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, उसको पहचानेंगे और फिर कहेंगे कि आपने बैठ करके ये जो ब्रह्माकुमारियों का जो ज्ञान है, तो आपने दिया है।

Today’s morning class is dated 16.11.1967. The record played is – Tumhi ho mata, pita tumhi ho. Tumhi ho bandhu, sakhaa tumhi ho (You are my mother as well as Father. You alone are my relative and friend.) It means that you are the only one. You are the only relative in the form of a mother, in the form of a Father, in the form of a relative, in the form of a friend. Then it is said in it – Twamev sarvam mam dev dev (You are my everything, O deity). You are all my relatives. So, you heard the line of this song. You are the friend, you are the relative. Children say like this, don’t they? Actually these cannot be called friends. Why? ‘These’ refers to whom? Hm? Whom?
(Someone said something.) Ram and Krishna? Achcha? Now you say that you alone are the mother, you alone are the Father, you alone are the relative. You alone are the friend. And now is it two? Hm? Have they become two immediately? It was told that these cannot be called friend. What is meant by ‘these’? Shiv and the Father of the human world cannot be called a friend. Why? The friends are girl friends (sakhi) for each other, brother and sister or brother and brother.

So, this song which is sung is in your Gita. It is about that time when he had the vision of the gigantic form (viraat roop). It will be said so, will it not be? It is not about any Arjun. Hm? Is it not the Arjun who earns knowledge? Did he have visions? Hm? Yes, it is not Arjun. So, when the friends had the vision of the gigantic form, when it was shown to them, then they were surprised. So, then daughter, it is said at that time. So, Baba we used to call you as a friend or something else. Arjun also said, didn’t he? Hm? So, please pardon me if I have committed any mistake while playing, eating with you as a friend because I used to consider you as a friend. I used to consider you to be this, something else. Arey, you are unlimited Father. So, they think like this in the heart that they insult like this, don’t they? Or they say something against the rules.

So, when he sees the gigantic form, then he says – Baba, pardon me. I have committed a lot of mistakes. I considered you to be this, that. Arey, you are my master. Arey, you are the master of the entire world. So, I have committed mistake, I have committed a mistake. Pardon me. So, it is like this child, isn’t it? When the form is shown to him like this at a place. It is mentioned in the Gita, isn’t it? Now this has been written in it. And the children know the form that is gigantic form the numberwise form of the children or is the gigantic form the form of the Father of you soul-form children? Hm? Whose form is it? Yes. So, it will be said that the gigantic form is of the children only numberwise as per their purusharth because for example, it is said that there is a world in each star. So, one star has a big world and one star has a small world. Hm? There are a few around some stars and there are more around some. So, the biggest star is said to be the one who has many to revolve around it. Hm? Pole star (dhruv tara). Why was the name coined as ‘dhruv tara’? Dhruv means unshakeable (atal). What is meant by unshakeable? Arey, your memorial is Achalgarh, isn’t it? Call it atal, call it achal (immovable). Hm? He did not shake. All others move around him, but he did not move.

So, it is not as if this is a gigantic form of the Father of souls. That is not a gigantic form at all. So, the Father sits and explains to the children that this is your gigantic form. So, when they see some miracle later, sooner or later, they see, don’t they? They do understand, don’t they? So, then, when they understand, then later they seek pardon that we have committed a big mistake. Arey, we didn’t recognize you at all. We did not do whatever we should have done. We did not do this, we did not do that. So, look, there are many children here who do not recognize at all. And then they do not recognize and keep on treading as per their mind. Who? Those who do not understand anything. Neither do they view with respect. Neither do they keep them with respect because now He is in a very ordinary form, isn’t He? The Father Himself says that I come only in a very ordinary body. Hm? Which Father says? Hm? Father Shiv says that I come in a very ordinary body, in an ordinary form. So, rarely anyone recognizes Me as I am, whatever I am. It will be said that hardly anyone recognize us (hamko) in this form. Us? Now Me. Me means one. Then He said – Us. And those who recognize tread that way. And here someone says something, someone says something, someone thinks something. So, now you look, don’t you? He is in a very ordinary body, isn’t He? Otherwise, otherwise, this one is the biggest Aasaami (personality). And the Father Himself says that look, He is such a big Aasaami. Later, in future they say – Baba, pardon us. We did not think that the way we behaved that you are such and such completely because He is a big Aasaami, isn’t He?

So, this Father also keeps on explaining. Hm? Why was ‘also’ added? Hm? Why was ‘also’ added? It was added because there are other special children also who actually consider Him to be a big Aasami. And the Father also understands; so, He keeps on explaining to the children. So, this song does exist that He is the friend, Mother, Father, relative, such and such. But He is a very big Aasaami, isn’t He? So, they don’t understand. So, then later they seek pardon. Although some seek pardon now, but they do not see anything. What is He? Is He anything? What is the memorial that they have shown in the scriptures? Hm?
(Someone said something.) Viraat roop (the gigantic form)? No, they showed some incarnation of God. Do you know? No? Hm? Vaaman avatar (incarnation as Vaaman). It is said that he was 52 fingers tall. What? These are four fingers, aren’t they? In this manner, when you go on counting, then he is a dwarf whose height is equal to 52 fingers. Very short. So, the king of big demons. Hm? Who? Bali. He thought arey, this one is very small. What will he ask? He may seek some land for building a house to live. I will give. So, that Bali observes that this one is nothing. He is an ordinary Brahmin.

So, here children forget. Did you understand? It is because whenever the sages, saints, mahatmas, arey, that Bhishma Pitamah, Dronachaarya in the scriptures. Well, these persons who have been depicted in the Copper Age, all of these are present now, aren’t they? The big ones who have been shown in the scriptures, the scholars, pundits, teachers, sanyasis, the big powerful ones, so, all these sanyasis also exist, don’t they? They are present now. It is not a topic of the Copper Age. So, look, someone may speak anything, they may utter anything. So, does he speak anything? So, He says that poor fellows have forgotten. Hm? Since when have they forgotten? Arey, they committed a mistake; since how much time have they forgotten? Arey? Is it difficult to tell this as well? Arey, they had recognized 5000 years ago. So, will anyone remember a topic of 5000 years ago? Hm? They have forgotten. They do not recognize. Hm?

So, the Father also says that children, these people do not recognize. When they recognize. They do not recognize at present. When they recognize in future, then they too will say like this only that we people did not know this much that it is You who sat and imparted this knowledge that the Brahmakumaris have. Who You? Hm? The knowledge that the Brahmakumaris have has been given to us by You. They will say in future. You refers to whom? Arey, you cannot write one word. You refers to whom?
(Someone said something.) Shiv? Look. Is that gigantic form of Shiv whom they will say holding their ears that we have committed a mistake? Hm? I don’t know what all activities have I done? Hm? Will they tell Him? Hm? (Someone said something.) Will they tell the Confluence Age Krishna? Achcha? Krishna is a young, innocent child. Hm? (Someone said something.) Yes, Prajapita, the Father of the human world, they will recognize him and then tell that you sat and gave the knowledge that the Brahmakumaris have.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2831, दिनांक 26.03.2019
VCD 2831, dated 26.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning Class dated 16.11.1967
VCD-2831-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.00
Time- 00.01-19.00


प्रातः क्लास चल रहा था 16.11.1967. गुरुवार को दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि बाप को पहचानने में जिन्होंने गफलत की, बाद में पछतावा करते हैं; अभी पछताने से तो किसका भी काम नहीं होगा। ये तो शुरूआत में ही समझ लेना चाहिए अच्छी तरह से। तो यही कहेंगे कि ड्रामा का पार्ट है इनका ऐसा। पार्ट जब खुलने का होता है, जब ड्रामा बढ़ने को होता है, उस समय ही बढ़ेगा। अभी कैसे महिमा बढ़ेगी? अभी तो देखो करोड़ों में। ये भारतवासी तो फिर भी कम से कम गाया जाता है; कितने? कितने भारतवासी? हँ? भारतवासी 33 करोड़ करोड़। 33 करोड़? अभी तो भारतवासियों की आबादी 135 करोड़ है, 30 करोड़ है, 130 करोड़। 33 करोड़ कैसे कह दिया? हँ? क्यों कह दिया 33 करोड़? हां (किसी ने कुछ कहा।) 33 करोड़ त्रेता के अंत में? ये क्या कहते हो? त्रेता के अंत में 8-10 करोड़ आबादी होती है। अगर त्रेता के अंत में ही 33 करोड़ हो जाएं फिर तो देवी-देवता सनातन धर्म बीच में ही खलास हो गया। ये तो अविनाशी धर्म है बाप के द्वारा स्थापन किया हुआ या बीच में ही विनाश हो जाता है? और धर्म अंत तक चलते रहते हैं वृद्धि होती रहती है। हँ? और ये त्रेता में ही 33 करोड़ पूरे होकरके खेल खलास हो जाएगा? नहीं। 33 करोड़ जो देवी देवता धर्म की आत्माएं हैं, हँ, अव्वल नंबर देवता कौन? महादेव। उसको जो फॉलो करने वाले हैं उनकी संख्या 33 करोड़ कलियुग के अंत में जाकर पूरी होती है। जैसे और धर्म पिताओं के फॉलोअर्स कलयुग के अंत तक बढ़ते ही रहते हैं जब तक टोटल महाविनाश दुनिया का न हो जाए।

तो बताया तुम भारतवासी कितने? 33 करोड़। तो अभी तो बताया अभी तो भारतवासियों की संख्या 130 करोड़ लगभग है। तो ये 33 करोड़ क्यों कह दिया? अरे, वो जड़ भारत जमीन की बात नहीं है। वो चैतन्य भारत जो भा माने रत अर्थात ‘भा’ माने ज्ञान की रोशनी में ‘रत’ माने ‘लगा रहने वाला’। जो सदा ज्ञान की रोशनी में लगा रहने वाला भारत है, उसके दिल में बसे हुए, दिल में समाए हुए। कहते हैं ना, मुसलमान कहते हैं बच्चे को - अरे, मेरे लख्ते जिगर बच्चे। हँ? हां। तो ये 33 करोड़ हैं। बाकी ऐसे नहीं कि आज भारत में 2018-19 में 130 करोड़ हो गए तो कोई वो सब भारत के दिल में बसे हुए हैं। नहीं। अभी तुम कितने थोड़े हो। ये तो 67 की वाणी है ना। हां। जब पहले ही थोड़े होंगे तो क्या समझ सकते होंगे कि ये कौन हैं? ऐसा समझते हो ना कि जब शुरुआत थी तब कोई इतने नहीं हम समझते थे। क्या? कब शुरुआत हुई? सिंध, हैदराबाद में जो ओम मंडली की शुरुआत हुई तब कोई इतना नहीं समझते थे। कुछ समझ में ही नहीं आता था ये बाबा कौन है? क्या होगा आगे चलकर के? ये क्या होगा? हँ? अंदर-अंदर धड़कते होंगे, कोई धड़क-धड़क करके भाग करके, छोड़ करके भी गए। ऐसे होता है ना। बोलते हैं ना धड़क-धड़क के कह रहा है दिल। अरे, भगवान को पहचानते नहीं हैं। छोड़ करके भाग गए। फारकती दे करके चले गए क्योंकि बहुतों ने पूरा पहचाना नहीं। अभी तक भी भागते रहते हैं कि नहीं? हँ? अभी तक भी भागते रहते हैं।

तो, तो जब आगे चलेंगे तो वो भी तो, हँ, आगे जब चलेंगे तो वो भी तो पहचानेगा ना। अब एक के ऊपर आ गए। अभी बहुतों की बात कर रहे थे। पहचानेगा माने एक या बहुत? हां, वो भी पहचानेगा। हँ? वो माने कौन? अभी नहीं पहचानता। आगे चलकरके वो भी पक्का निश्चय करेगा कि वो सुप्रीम सोल, हैविनली गॉडफादर, निराकार, अकर्ता, अभोक्ता, सदाशिव, सदा कल्याणकारी, हँ, वो किसमें लगातार मुकर्रर रूप से पार्ट बजाय रहा है। हँ? आगे चलके समझेगा या सन् 67 में समझा पूरा? या जब बाप का प्रत्यक्षता वर्ष 76 में मनाया या संपूर्णता वर्ष 77 में मनाया तब समझा? समझा अभी तक भी या नहीं समझा? हँ? उस एक ने भी नहीं समझा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) समझा? कोई कहता समझा, कोई कहता नहीं समझा। अरे, मुरली में जो बताया भगवान ने जो मुरलिया बजाई, वो तो कृष्ण के लिए कह देते हैं मुरलिया बजाई। वो तो काठ की मुरलिया थी। हँ? उसमें क्या बताया? भगवान जो कुछ बताएंगे वो तो सच्चा ही बताएंगे। तुम बच्चों को; क्या? क्या बताया? तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में कितना टाइम लगता है? 40 से 50 वर्ष लगता है। तो 40 कब पूरे होते? 2018 में 40 पूरे होते हैं ना। तो क्या कहेंगे? जिस एक के लिए बताया कि वो भी तो पहचानेगा ना। तो पहचाना होगा या नहीं पहचाना होगा? हँ? अरे, बाबा की मुरली के महावाक्य के अनुसार पहचाना होगा या नहीं पहचाना होगा? अरे, अभी तो कहने लगे, हां, पहचाना होगा। बाकी तो अभी पूरा क्लास पड़ा हुआ है। हँ?

तो बोला पहचानेगा। हँ? ना लगाय दिया। पहचानेगा ना? फिर हमने क्या किया? हमने माने एक ने या बहुतों ने? हां। दो ने? हमने माने बहुतों ने या दो ने कम से कम क्या किया? वो पहचानेगा। हमने क्या किया? बड़ी भूल की। हँ? कौन कहेंगे? जो छोड़-छोड़ करके जा रहे हैं; लगातार जा रहे हैं कि जाना बंद हो गया? हँ? जा रहे हैं। तो कहेंगे बड़ी भूल की हमने छोड़ दिया। किस को छोड़ दिया? हँ? निराकार आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल निराकार ज्योति बिंदु को छोड़ दिया? छोड़ दिया? उसको नहीं छोड़ दिया? उसको पकड़ लिया? अरे, वो बिंदी तो पकड़ में आती नहीं। अपनी आत्मा ही पकड़ में नहीं आती। अपनी आत्मा भी तो ज्योति बिंदु है। वो पकड़ में आती है, हँ, कि उसको पकड़ के बांध के रख लो मन की डोरी से? नहीं। तो वो तो और सूक्ष्म है सुक्ष्मातिसूक्ष्म है सुप्रीम सोल। तो किसकी बात है? किस को छोड़ दिया? हँ? उस सुप्रीम सोल के तो पकड़ने, न पकड़ने की तो बात ही नहीं। किसकी बात है? वो जो जिस मुकर्रर रथधारी में प्रवेश करके पुरुषोत्तम संगमयुग में पार्ट बजाता है उसके लिए सोचेंगे कि अरे, हमने मुफ्त में छोड़ दिया। बड़ी भूल की। ऐसे बाबा को फारकती दे दी।

अरे, ये तो अपने तकदीर को ही हमने लकीर लगाय दिया। ये हमने पीछे समझा। अभी नहीं समझा। क्यों? क्यों नहीं समझा? कारण क्या? अरे, कुछ तो कारण होगा। हँ? अरे, कारण का पता ही नहीं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) कौनसा ज्ञान? कौन सी पहचान? हँ? इसलिए नहीं समझा कि अभी तो देखो कितना साधारण है। इसलिए कोई ने नहीं समझा। फिर क्या होगा? फिर क्या होगा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नौकर समझा? अरे वो तो एक ने समझा ब्रह्मा बाबा ने कि हमारा नौकर है। हँ? अरे, जो सभी छोड़के चले गए उन्होंने क्या समझा? उन्होंने नौकर समझा? नौकर तो नहीं समझा। क्या समझा? क्यों छोड़के चले गए? कारण क्या? बताया कितना साधारण!

तो है तो दो ना। कौन दो? एक तो त्रिकालदर्शी और सदा त्रिकालदर्शी। जिसको कहते हैं असली भगवान। तो वो आत्मा सुप्रीम सोल। और दूसरा? दूसरा जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता है वो, जिसको कहते हैं अर्जुन का रथ। कौन सा? अर्जुन का शरीर रूपी रथ। तो दो हुए ना। तभी तो कहते हैं ना कि वो कृष्ण-वृष्ण की तो कोई बात ही नहीं है। हँ? न कृष्ण की बात है, न वृष्ण की। वृष्ण क्यों नाम लगा दिया? फालतू बोलते रहते हैं? हँ? क्योंकि भक्ति मार्ग में तो बताया है ना शास्त्रों में कि वो कृष्ण वृष्णवंशी था। कौन सा वंशी? वृष्ण वंशी माने यादववंशी था। तो वो कृष्ण वंशी की तो कोई वृष्णवंशी की तो कोई बात ही नहीं कृष्ण की।

ये तो गुप्त रथ है। हँ? ये शरीर रूपी रथ कैसा है? गुप्त है। भले साधारण है। फिर भी गुप्त है। और बाबा बैठकरके इसमें पढ़ाते हैं। पढ़ाने वाला कौन है? हँ? वो रथधारी आत्मा पढ़ाने वाली नहीं है। अर्जुन नहीं पढ़ाने वाला; अर्जुन, आदम, अर्जुन, एडम, आदिनाथ, कहते हैं ना सृष्टि के आदि पुरुष को। हां। वो नहीं। जिसमें प्रवेश करता है वो नहीं; प्रवेश करने वाला पढ़ाने वाला है। उसको हम कहते हैं बाबा। अरे, बाबा क्यों कहते हो? बाप कहो ना। वो तो आत्माओं का बाप है ना। निराकार आत्माओं का निराकार बाप। वो निराकार बाप तो सिर्फ आत्माओं का बाप है। दूसरा कोई संबंध बनता ही नहीं। वो जब साकार शरीर में प्रवेश करता है तो वो बच्चों के साथ सर्व संबंध निभाता है। तो बाबा भी है। हँ? मुख्य संबंध क्या हुआ? और जो संबंध हैं उनसे वर्सा मिले न मिले सुख का लेकिन किससे मिलना कंपलसरी? जो बाबा है ग्रैंडफादर जिसे कहा जाता है उससे तो सब बच्चों को वर्सा मिलता ही मिलता है। तो वो बाबा बैठकर के पढ़ाते हैं। हँ?

बच्चे, आत्माओं को कहते रहते हैं अरे अपन को आत्मा समझो। क्या? क्यों नहीं पहचान पाते? क्योंकि घड़ी-घड़ी देह भान में आते हैं तो नहीं पहचान पाते। तो ये बाप कहते हैं अपन को आत्मा समझो, आत्मा समझो। और बाप बैठकर के पढ़ाते हैं। किसको? हँ? देह को? देहधारियों को? देह अभिमान में रहने वालों को? नहीं। बाप बैठकर के, आत्माओं का बाप बैठ करके पढ़ाते हैं। बैठकरके माना शरीर में प्रवेश करके। शरीर में, अर्जुन के मुकर्रर रथ में, कहां बैठकर के? रथ में दिखाया उन्होंने तो भक्ति मार्ग में। हँ? घोड़ों को चलाने वाला। कौन बनाय दिया? बग्घीवान। क्या कहते हैं उसे? हँ? जो रथ को चलाता है उसे क्या कहते हैं? सारथी। हां। रथ के साथ रथ हांकने वाला बनाय दिया। अरे, बाप कहते हैं कि मैं तो भृकुटी के मध्य में बैठता हूं। जो शरीर रूपी रथ है उसमें कहां बैठता हूं? जो कहा जाता है उत्तमांग। जहां आत्मा इस शरीर का राजा उत्तम जगह पर बैठता है उसे कहते ही हैं उत्तमांग। कैसा अंग? उत्तम से उत्तम शरीर का अंग; वहां मैं भी बैठता हूं। बैठकरके पढ़ाता हूं। तो तुम्हारा ये विकर्म, तुम ये आत्मा समझ करके और बाप को याद करेंगे तो तुम्हारा विकर्म सभी विनाश हो जावेगा। ऐसे नहीं कि सिर्फ आत्मा को याद करेंगे तो सभी विकर्म विनाश हो जाएंगे। या रथ को याद करेंगे तो सभी विकर्म विनाश हो जाएंगे। नहीं। उस रथ में कौन याद आए? वो सुप्रीम सोल याद आए। रथ में बैठा है तो रथ भी तो याद आएगा ना। भले याद आए। रथ भी याद आए तो सुप्रीम सोल भी याद आए।

A morning class dated 16.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page on Thursday was that those who committed a mistake in recognizing the Father repent later; well, nobody’s task will be accomplished by repenting. This should have been understood nicely in the beginning itself. So, it will be said that the part of this one is like this in the drama. When the part is to be revealed, when the drama is to progress, it will progress at that time only. How will the glory increase now? Now look they are in crores. These residents of India are however at the least sung to be; how many? How many residents of India? Hm? The residents of India are 33 crores. 33 crores? Now the population of the residents of India is 135 crores, 30 crores, 130 crores. How did He utter 33 crores? Hm? Why did He utter 33 crores? Yes
(Someone said something.) 33 crores in the end of the Silver Age? What do you say? The population is 8-10 crores in the end of the Silver Age. If the population reaches 33 crores at the end of the Silver Age itself, then the ancient deity religion perished in the middle itself. Is this an imperishable religion established by the Father or does it get destroyed in between? Other religions continue till the end, they keep on growing. Hm? And will the game of this one be over with 33 crores in the Silver Age itself? No. The 33 crore souls of the deity religion, hm, who is the number one deity? Mahadev. Those who follow him, their number reaches 33 crores in the end of the Iron Age. Just as the followers of other founders of religions keep on increasing till the end of the Iron Age, until the total mega-destruction of the world takes place.

So, it was told – What is the number of you residents of India? 33 crores. So, it was told just now, the number of residents of India is about 130 crores. So, why was it mentioned to be 33 crores? Arey, it is not about that non-living land of India (Bhaarat). That living Bhaarat, who ‘rat’, i.e. remains engaged in ‘bha’, i.e. the light of knowledge. Those who live, remain merged in the heart of the Bhaarat who always remains engaged in the light of knowledge. It is said, isn’t it? Muslims tell their child – Arey, my ‘lakhtey jigar’ (dearest) child. Hm? Yes. So, these are 33 crores. But it is not as if when there are 130 crore people in India in 2018-19, then all of them are living in Bhaarat’s heart. No. Now you are so few. This is a Vani dated 67, isn’t it? Yes. When they are few in the beginning itself, then do you understand who these are? You understand that when it was the beginning, then we did not used to understand so much. What? When did the beginning take place? When the Om Mandali started in Sindh, Hyderabad, then nobody used to understand so much. You did not used to understand anything as to who this Baba is. What will happen in future? What will happen? Hm? They must be shaking inside; some shook and ran away, left. It happens like this, doesn’t it? People say, don’t they that this heart beats to say. Arey, they do not recognize God. They left and ran away. They gave faarkati (divorce between Father and child) and left because many did not recognize completely. Do they still keep on running away or not? Hm? They keep on running even now.

So, when you move further, then that too, hm, when you move further, then he will also recognize, will he not? Now He has come to ‘one’. Just now He was talking of many. ‘He will recognize’ (pehchaanega) refers to one or many? Yes, he will also recognize. Hm? ‘He’ refers to whom? He doesn’t recognize now. In future he too will develop firm faith that who is the one in whom the Supreme Soul, Heavenly God Father, incorporeal, akarta, abhokta, Sadaashiv, forever benevolent is playing a part. Hm? Will he understand in future or did he understand completely in 67? Or did he understand when the year of revelation of the Father was celebrated in 76 or when the year of perfection was celebrated in 77? Has he still understood or hasn’t he understood? Hm? Did that one also not understand? Hm?
(Someone said something.) Did he understand? Someone says that he understood and someone says that he did not understand. Arey, it was mentioned in the Murli that the flute that God played, they say for Krishna that he played the flute. That was a wooden flute. Hm? What was mentioned in it? Whatever God tells He will tell the truth only. To you children; What? What has been mentioned? How much time does it take for you to become satopradhan from tamopradhan? It takes 40 to 50 years. So, when are 40 years completed? 40 [years) are completed in 2018, aren’t they? So, what will you say? The one for whom it was mentioned that he too will recognize, will he not? So, has he recognized or hasn’t he recognized? Hm? Arey, as per the sentence of Baba’s Murli would he have recognized or wouldn’t he have recognized? Arey, now you have started telling that yes, he must have recognized. Now the entire class is there. Hm?

So, it was told – He will recognize. Hm? ‘Will he not’ was added. He will recognize, will he not? Then what did we do? Does ‘we’ refer to one or many? Yes. Is it two? Does ‘we’ mean many or did at least two do what? He will recognize. What did we do? We committed a big mistake. Hm? Who will say? Those who are departing; are they departing continuously or has the departure stopped? Hm? They are departing. So, it will be said that we committed a big mistake that we left. Whom did you leave? Hm? Did you leave the Father of the incorporeal souls, the Supreme Soul, incorporeal point of light? Did you leave? Didn’t you leave Him? Did you catch Him? Arey, that point does not come into your grasp. You cannot grasp your soul itself. Our soul is also a point of light. Can it be grasped that you will hold it, bind it with the thread of mind? No. So, He is subtler, subtlest of all, the Supreme Soul. So, whose topic is it? Whom did you leave? Hm? There is no topic of catching, not catching that Supreme Soul at all. Whose topic is it? The permanent Chariot holder in which He enters and plays His part in the Purushottam Sangamyug, people will think about him that arey, we left him for free. We committed a big mistake. We gave faarkati (divorce) to such Baba.

Arey, we have spoiled our own fortune. We understood this later. We did not understand now. Why? Why didn’t we understand? What is the reason? Arey, there must be a reason. Hm? Arey, don’t you know the reason at all? Hm?
(Someone said something.) Which knowledge? Which realization? Hm? You did not understand because now, look, He is so ordinary. This is why nobody understood. Then what will happen? Then what will happen? Hm? (Someone said something.) Did he consider him to be a servant? Arey, that was considered by one, by Brahma Baba that he is my servant. Hm? Arey, what did all those who left think? Did they consider him to be a servant? They did not consider him to be a servant. What did they think? Why did they leave? What was the reason? It was told – He is so ordinary!

So, it is two, isn’t it? Which two? One is Trikaaldarshi (knower of past, present and future) and one is forever Trikaaldarshi. The one who is called true God. So, that soul is the Supreme Soul. And the other? The other one in whom He enters in a permanent manner, who is called the Chariot of Arjun. Which one? The body like Chariot of Arjun. So, they are two, aren’t they? Only then is it said that there is no topic of Krishna-Vrishna at all. Hm? Neither is it the topic of Krishna, nor Vrishna. Why was the name Vrishna added? Does He keep on talking wastefully? Hm? It is because it has been told on the path of Bhakti in the scriptures that Krishna was Vrishnavanshi. Which dynasty was he from? Vrishnavanshi means he belonged to the Yadava dynasty. So, there is no topic of Krishna, the Krishnavanshi, Vrishnavanshi.

This is an incognito Chariot. Hm? How is this body-like Chariot? It is incognito. Although it is ordinary, yet it is incognito. And Baba sits and teaches in this one. Who is the teacher? Hm? That soul of the Chariot is not the teacher. Arjun is not the teacher; the first man of the world is called Arjun, Aadam, Arjun, Adam, Aadinath, isn’t he? Yes. Not him. Not the one in whom He enters. The one who enters is the teacher. We call Him Baba. Arey, why do you call Him Baba? Call Him Father, will you not? He is the Father of the souls, isn’t He? Incorporeal Father of the incorporeal souls. That incorporeal Father is just the Father of souls. No other relationship can be established at all. When He enters in a corporeal body, then He maintains all the relationships with the children. So, He is Baba as well. Hm? What is the main relationship? One may or may not get the inheritance of happiness from other relationships, but it is compulsory to get from whom? All the children definitely get inheritance from Baba, who is called the grandfather. So, that Baba sits and teaches. Hm?

Children, He keeps on telling the souls – Arey, consider yourself to be a soul. What? Why are you not able to recognize? It is because when you become body conscious every moment you are unable to recognize. So, this Father says – Consider yourself to be a soul, consider yourself to be a soul. And the Father sits and teaches. Whom? Hm? To the body? To the bodily beings? To those who remain in body consciousness? No. The Father, the Father of souls sits and teaches. ‘Sits’ means ‘by entering in a body’. In the body, in the permanent Chariot of Arjun; by sitting where? They have shown in the Chariot on the path of Bhakti. Hm? The one who drives the horses. What was he made? The charioteer (bagghivaan). What is he called? Hm? What is the charioteer called? Saarathi. Yes. Along with the Chariot, he has been made the charioteer. Arey, the Father says that I sit in the middle of the bhrikuti (in the middle of the forehead between the eyebrows). Where do I sit in the body like Chariot? It is called the uttamaang (the best organ). The best place where the king of this body, the soul sits is called uttamaang. What kind of ang (organ)? Best of all organs of the body. I too sit there. I sit and teach. So, this sin of yours, if you consider yourself to be a soul and remember the Father then all your sins will be destroyed. It is not as if all the sins will be destroyed if you remember only the soul. Or if you remember the Chariot all the sins will be destroyed. No. Who should come to the mind in that Chariot? That Supreme Soul should come to the mind. When He is sitting in the Chariot, then the Chariot will also come to the mind, will it not? It may come to the mind. The Chariot should also come to the mind and the Supreme Soul should also come to the mind.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2832, दिनांक 27.03.2019
VCD 2832, dated 27.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning class dated 16.11.1967
VCD-2832-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.45
Time- 00.01-18.45


प्रातः क्लास चल रहा था 16.11.1967. गुरुवार को तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी - देह के सभी धर्म; कितने धर्म हैं देह के? हँ? अरे, देह के धर्म; ढेर सारे धरमपिताएं हैं; दुनिया में मुख्य-मुख्य धर्म तो 10 हैं। फिर उनके छेड़े ढेर सारे हैं। लेकिन मुख्य-मुख्य ही तो गिनाए जाते हैं। हां। तो सभी धर्म; कोई एक तो नहीं कहते हैं ना। जैसे गीता में कहा - सर्व धर्मान् परित्यज्य। सब धर्मों को छोड़ दे। छोड़ करके; धर्मों को छोड़ेगा तो धर्मपिताओं को भी छोड़ेगा। मेरी शरण में आ जा। मामेकम शरणं व्रज। अनेकों को छोड़ दे। सभी देह के धर्म छोड़करके अपन को आत्मा समझो। वो सब देह अभिमानियों के धर्म हैं। चारों युगों में जो भी हैं। क्या? हां। ब्रह्मा, दादा लेखराज ब्रह्मा वाली आत्मा जो चार मुखों को संगठित कर लेती है अपने साथ। चार मुख संगठित रूप में दिखाए जाते हैं ना। हां। तो वो आत्मा भी; क्या? वो आत्मा भी देह का धर्म है कि आत्मा का धर्म है? हँ? देह का धर्म है। क्यों देह का धर्म? कारण? हँ? अरे, देह का धर्म कैसे? धत् तुम्हारा भला हो। अरे, दृष्टि से लेन-देन करते हैं आपस में पति-पत्नी, लक्ष्मी-नारायण। तो क्या हुए? देह का धर्म हुआ कि नहीं? आंख देह का अंग नहीं है? हां। तो ऐसे ही सभी ज्ञानेंद्रियां जो भी हैं। त्रेता के अंत तक वो ज्ञानेंद्रियों का, मुख का प्यार रहता है। तो वहां से लेकरके फिर द्वैतवादी द्वापरयुग में जबसे दैत्यों की दुनिया शुरू होती है इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन और उनके सहयोगी धर्म, ये सारे ही तो देह के धर्म हैं ना। तो कोई भी अपन को आत्मा थोड़े ही समझते हैं? हां।

तो अभी बाप बताते हैं अपन को आत्मा समझो। स्वधर्म मे टिको। हँ? तुम नंगे आए थे कि शरीर लेके आए थे? शरीर रूपी वस्त्र लेकर आए थे इस दुनिया में क्या? नहीं, नंगे आए थे। और प्योर आए थे। पवित्र आत्मा आई थी। अभी आकरके 84 जन्म के बाद तुम प्योर इम्प्योर बन गए हो 84 जन्म के बाद। क्या? माने 83वें जन्म में इम्प्योर नहीं बने इतने। पूरे इम्प्योर कब बने? हँ? जब 84वां जन्म आया तो तुम इम्प्योर बन गए हो अभी। अभी माने? अभी माने कब? इस 100 साल के पुरुषोत्तम संगमयुग में पूरे पतित बन गए हो। अभी फिर तुमको प्योर बनाके; देखो है ही ये नई बात ना। सब नई बातें हैं। ऐसी बातें कोई शास्त्रों में हैं? कुछ गीता में ऐसी बात लिखी? हँ? क्या? कि 84 जन्म के बाद पतित होते हो। और तुम पतितों को, इम्प्योर को पावन बनाकर नई दुनिया में ले जाता हूं। ये जरूर है, अक्षर तो जरूर है। कैसे ले जाता हूं? मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। हँ? कौन कहता है? किसने कहा? अरे, एक अक्षर लिखने में इतनी देर करते।
(किसी ने कुछ कहा।) साकार? साकार का मन तो सत्यानाशी है। हँ? साकार का मन अच्छा है? साकार तमोप्रधान है कि सतोप्रधान है? (किसी ने कुछ कहा।) हां? शिव? शिव को मन होता है? वाह भाई? शिव को मन होता है? हँ? शिव बाबा। क्या कहेंगे? शिव बाबा। जब कितनी बार बताया कि शिव ज्योति का नाम है। हँ? बिंदु का नाम है निराकार का नाम है। वो कब बदलता नहीं है। जब शरीर लेते हैं तब है मुख्य संबंध शिवबाबा।

तो बताया वो कहते हैं मनमनाभव। शरीर में आकर कहते हैं ना। मेरे मन में समा जा। अब तेरा मन कहो तेरा दिल कहो किसके ऊपर आ गया? आज मेरा दिल आ गया। गीत गाते हैं ना? हां। तो ये जो दुनिया में ऐसे-ऐसे कर रहे हैं ये किसको फॉलो कर रहे हैं? शिवबाबा को फॉलो कर रहे हैं। तो शिव बाबा का दिल किसके ऊपर आ गया? अरे बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, कौन साकार? सारे ही तो साकार 500-700 करोड़? हां, परमब्रह्म कहो, परम आत्मा कहो, हं, परम पार्टधारी आत्मा, हीरो पार्टधारी कहो। हँ? हां। तो मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। ये भी अक्षर है। मामेकम याद करो। मुझ एक को याद करो। किस एक को याद करो? लिखो-लिखो एक अक्षर लिखो। किस एक को याद करो? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। शिव बाबा को याद करो। ऐसे नहीं शिव बाप को याद करो, शिव को याद करो। अरे, शिव तो निराकार है। वो तो धर्मपिताएं भी निराकार को याद करते हैं। तो क्या उन्हें नई दुनिया में जाना होता है? हैविन में जाते हैं? स्वर्ग में जाते हैं? नहीं जाते।

तो मामेकम याद करो तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि तुम्हारा सभी पाप मिट जाएंगे। सभी माने कौन से पाप? सभी पाप मिट जाएंगे माने पास्ट में जो पाप किए इस जन्म में या पीछे के 63 जन्मों में जो भी पाप किए वो सब मिट जाएंगे। वो सब मिट जाएंगे। मिट जाएंगे। भविष्य में कि अभी? भविष्य में मिट जाएंगे। ज्ञान में आने के बाद; अभी ज्ञान में आए ही नहीं? मामेकम याद करो तो मिट जाएंगे। एकम की जगह कोई दूजम को याद किया तो पाप चढ़ेंगे जाएंगे कि घट जाएंगे? क्या होगा? चढ़ जाएंगे। हाँ। तो जैसे बाबा अभी कहते हैं ऐसे कोई लगता थोड़े ही है तीर एकदम कि कोई मामेकम को ही याद करे, कोई दूजम को याद इस दुनिया में ना करे। ऐसा तीर लगता है किसी को? लगता है? किसको लगता है? हमें तो कोई ऐसा दिखाई नहीं पड़ता कि वो एक को ही याद करता हो, कोई दूसरे की याद ही नहीं आती हो। सारा कारोबार बंद हो जाएगा। चाहे लौकिक कारोबार हो, चाहे अलौकिक कारोबार हो, कारोबार बंद होगा कि नहीं होगा? हँ? फिर?

तो जैसे बाबा कहते हैं ऐसे कोई लगता थोड़े ही है एकदम? क्या नहीं लगता? कि एक को ही याद करें। नहीं। फिर भी गफलत में, अपने ही अपने धंधे-धोरियों में; क्या? अपने-अपने धंधे-धोरियों में? हां, फलाना धंधा, टीरा धंधा, उनमें लग जाते हैं। हँ? लौकिक में ही लग जाते हैं कि जिसे अलौकिक कहते हैं उसमें भी लग जाते हैं? हँ? हां, अलौकिक में भी लग जाते हैं। वो ही चाल चलते हैं जो दुनिया वाले चलते हैं। क्या? नहीं तो अलौकिक कर्म उसे कहा जाता है कि कर्म इंद्रियों से कोई भी कर्म करें, ज्ञानेंद्रियों से कुछ भी कर्म करें शिव बाबा की याद हो। अगर शिव बाबा की याद में सेवा भी करते हैं दूसरी आत्माओं, की ज्ञान सुनाते हैं और उन आत्माओं को सकाश देते हैं तो बाबा की याद में देंगे तो फायदा होगा। कि ऐसे ही सकाश देंगे अपनी आत्मा को तो फायदा होगा? होगा? नहीं होगा।

तो जो कुछ झूठ, सच, चोरी-चकारी, फलानी, तरारी ये जैसे कि कुछ जानते ही नहीं हैं जो बाप बताते हैं। क्या? क्या बताते हैं? अरे? बाप बताते हैं मामेकम याद करो। मुझे एक को याद करो। हँ? कोई ना कोई ऐसी अंदर में शैतानियां चलती रहती हैं। चोरी करेंगे, चकारी, फलानी, तरारी करेंगे। अब बैठे हैं यहां। कहां? यहां। यहां माने कहां? ये भी समझते हैं कि हां, हम बैठे हैं। हँ? भला तभी किसके पास बैठे हैं? हँ? अरे बताओ। कहेंगे शिव बाबा के पास बैठे हैं। ठीक है शिव बाबा के पास बैठे हैं। कोई दादा के पास तो नहीं बैठे हैं ना। दादा के पास बैठे हैं? हँ? दादा देह अभिमानी सांढा या दादा रूहानी बाबा? हँ? रूहानी कहेंगे? नहीं। अगर रूहानी होता तो रोज याद प्यार में कहते रूहानी दादा का याद प्यार नमस्ते। ऐसे कहते हैं? कभी कहते हैं? कभी नहीं कहते हैं। हमेशा कहते हैं रूहानी बाबा का याद प्यार और नमस्ते।

16.11.67 की प्रातः क्लास का चौथा पेज, गुरुवार। ये तो जवाहरी था। हम यहां वरी कहां से आ गए? हँ? किसने कहा? अरे, किसने कहा ये हम यहां वरी कहां से आ गए? अरे, भौचक्के रह जाते हैं।
(किसी ने कुछ कहा।) परमधाम से आ गए? अच्छा? ये तो जवाहरी था। जवाहरी की बात हो रही है। परमधाम से आ गए। कहां से आ गए? यहां वरी कहां से आ गए? हम तो कलकत्ते में हीरो की दुकान रखके बैठे हुए थे। तो कुछ ना कुछ कोई वक्त में थोड़ा समझते हैं। फिर भूल जाते हैं। ये यहां जो हम सब कुछ छोड़-छाड़ के इतना ऊंचा हीरों का धंधा, फर्टाइल धंधा छोड़ दिया और यहां सत्संग करने लगे। तो यहां कहां से आ गए? तो बुद्धि में कुछ आता है, थोड़ा समझते हैं। क्या समझते हैं थोड़ा? हँ? कि हमको कोई ने समझाया था, साक्षात्कारों का अर्थ समझाया था, बताया था, तब हम यहां आ गए कि ऐसे ही आ गए? हँ? हां। तो थोड़ा समझते, फिर भूल जाते। थोड़ा बुद्धि में आता है फिर गहराई से मनन-चिंतन-मंथन नहीं करते, फिर भूल जाते।

भूल कर के फिर बहुत ही हैं; क्या? ये अकेले नहीं हैं। बहुत हैं, विकरम भी करते रहते हैं। विकरम माने? विकरम माने क्या? विकरम माने कुकर्म। कु माने खराब। वि माने विपरीत। काहे के विपरीत? जो बाबा बताते हैं ये कर्म करना है और मेरी याद में करना है, आत्मिक स्थिति में रहकरके करना है, हां,
(किसी ने कुछ कहा।) और क्या लिखा? काम विकार? बस वो ही एक विकरम है? अच्छा? और लोभ आ जाए तो वो विकरम नहीं है? हँ? क्या? हां, ढेर सारे विकरम हैं। तो विकरम भी करते रहते हैं। कोई हैं बहुत जो अच्छे बच्चे हैं। कभी भी झूठ-वूठ नहीं बोलते हैं। क्या? हाँ। कभी भी चोरी-चकारी नहीं करते हैं। हां। ये किसके काम हैं? ये राक्षस-राक्षसियों के काम हैं कि देवी-देवता धर्म में जो जाने वाली आत्माएं हैं पक्की-पक्की वो भी कच्ची नहीं कि दूसरे धर्म में कन्वर्ट हो जाएं। पक्की-पक्की आत्माओं के काम हैं या दैत्यों के काम हैं? राक्षस-राक्षसियों के काम हैं? किसके हैं? हँ? हां, जो देवता धर्म के पक्के हैं, देव आत्माएं हैं पक्की, 16 कला संपूर्ण से भी ऊंची। कितनी? अतींद्रिय सुख भोगने वाली।

तो वो कभी भी चोरी-चकारी नहीं करेंगे। कोई भी हबश नहीं। कोई भी हबश नहीं? क्यों? हबश नहीं? अच्छा-अच्छा खाने पीने की हबश नहीं रहती? रहती है कि नहीं? अरे? नहीं रहती? रहती तो है। क्योंकि हैं तो सभी। लोभ भी तो खराब आदत होती है एकदम। बताया खान-पान वगैरा में देखो कितना समझाया जाता है कि बच्ची तुम्हारा खाना-पीना तमोप्रधान नहीं होना चाहिए। क्या? कैसा होना चाहिए? हां। एकदम सात्विक होना चाहिए। खाना तुम्हारा रॉयल होना चाहिए। हँ? और? बेसिक में ब्रह्माकुमार-कुमारी क्या कर रहे हैं? और एडवांस में ब्रह्माकुमार-कुमारी क्या कर रहे हैं? और चोरी से कुछ खाते हैं कि नहीं कि सबके साथ मिलकरके खाते हैं? नहीं खाते? क्यों? तुम्हें अच्छा नहीं लगता? अरे, तुम्हें अच्छा लगता है कि नहीं? तुम बताओ अपनी बात। हँ? हां, चोरी से खाते हैं। अकेले खाय लेते हैं। छुप-छुप के खाय लेते हैं। अपने सगे-संबंधियों को, जिनमें लगाव है, उनको खिलाएंगे। दूसरों को? दूसरों को नहीं खिलाएंगे। हँ माताजी? ठीक बात है ना? ठीक बात नहीं है? अरे, सच्चे को सच्चा कहना चाहिए, झूठे को झूठा कहना चाहिए। चोर को कह दो, नहीं, ये तो बड़ा अच्छा साहूकार है, तो अच्छी बात है? कसाई को कह दो, नहीं, ये कसाई थोड़े ही है। ये तो बड़ा बढ़िया आदमी है। कोई हत्या-वत्या नहीं करता। तो अच्छी बात है? अरे, तो तुम्हारा खाना बहुत रॉयल होना चाहिए।

A morning class dated 16.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the third page on Thursday was – All the religions of the body; how many religions of the body are there? Hm? Arey, religions of the body; there are numerous founders of religions; there are ten main religions in the world. Then they have many branches. But only the main ones are counted, aren’t they? Yes. So, all the religions; We don’t talk about one, do we? For example, it has been said in the Gita – Sarva dharmaan parityajya. Leave all the religions. After leaving them; If you leave the religions, then you will leave the founders of the religions also. Come to My asylum. Maamekam sharanam vraj. Leave many. Leave all the religions of the body and consider yourself to be a soul. All those are religions of the body conscious ones. All those who exist in the four Ages. What? Yes. Brahma, the soul of Dada Lekhraj, which gathers the four heads with it. Four heads are shown in united form, aren’t they? Yes. So, that soul also; what? Is that soul also a religion of the body or is it a religion of the soul? Hm? It is the religion of the body. Why is it a religion of the body? Reason? Hm? Arey, how is it a religion of the body? Damn, God bless you. Arey, husband and wife, Lakshmi and Narayan exchange glances. So, what are they? Is it a religion of the body or not? Isn’t eye an organ of the body? Yes. So, similarly, all the sense organs. Till the end of the Silver Age, that love of the sense organs, mouth exists. So, from there, ever since the world of demons starts in the dualist Copper Age, Islam, Buddhism, Christian and their helper religions; all these are religions of the body only, aren’t they? So, do any of them consider themselves to be a soul? No.

So, now the Father tells – Consider yourself to be a soul. Be constant in swadharma (dharma of the soul). Hm? Had you come naked or had you come with the body? Did you bring the body like cloth to this world? No, you had come naked. And you had come pure. The soul had come in a pure form. Now after getting 84 births, you have become impure from pure, after 84 births. What? It means that you had not become impure to that extent in the 83rd birth. When did you become completely impure? Hm? When the 84th birth arrived, then you have become impure now. What is meant by ‘now’? ‘Now’ refers to which time? In this 100 years old Purushottam Sangamyug, you have become completely sinful. Now after making you pure once again; Look, this is a new topic, isn’t it? All the topics are new. Are there such topics in the scriptures? Has any such topic mentioned in the Gita? Hm? What? That you become sinful after 84 births. And I make you sinful ones, impure ones pure and take you to the new world. It is definite, the words are for sure. How do I take? Manmanaabhav. Merge into My mind. Hm? Who says? Who said? Arey, you take so much time to write one alphabet.
(Someone said something.) Corporeal? The mind of the corporeal is ruinous. Hm? Is the mind of the corporeal good? Is the corporeal tamopradhan or satopradhan? (Someone said something.) Yes? Shiv? Does Shiv have a mind? Wow brother! Does Shiv have mind? Hm? ShivBaba. What would you say? ShivBaba. When it has been told several times that Shiv is the name of the light. Hm? It is the name of the point, the name of the incorporeal. That never changes. When He assumes a body, then the main relationship is ShivBaba.

So, it was told – He says – Manmanaabhav. He comes in a body and says, doesn’t He? Merge into My mind. Well, call it your mind, call it your heart, to whom was it lost? Today I lost my heart (aaj mera dil aa gaya). They sing the song, don’t they? Yes. So, people who are doing so in the world, whom do they follow? They follow ShivBaba. So, to whom did ShivBaba lose His heart? Arey, speak up.
(Someone said something.) Yes, who corporeal? All the 500-700 crore are corporeal. Yes, call him Parambrahm, call him Param Aatma (Supreme Soul), hm, call him the supreme actor soul, hero actor. Hm? Yes. So, Manmanaabhav. Merge into my mind. This word is also mentioned. Remember Me alone. Remember Me, the one. Which ‘one’ should you remember? Write, write one word. Which ‘one’ should you remember? Hm? (Someone said something.) Yes. Remember ShivBaba. It is not as if remember Father Shiv, remember Shiv. Arey, Shiv is incorporeal. Even the founders of religions remember the incorporeal. So, do they have to go to the new world? Do they go to heaven? Do they go to heaven? They do not go.

So, if you remember Me alone, then I pledge that all your sins will be wiped out. ‘All’ refers to which sins? ‘All the sins will be wiped out’ means that all the sins that were committed in the past in this birth or in the past 63 births will be wiped out. All of them will be wiped out. They will be wiped out. In future or now? They will be wiped out in future. After entering the path of knowledge; haven’t you entered the path of knowledge yet? If you remember Me alone, then they (the sins) will be wiped out. Instead of one, if you remember anyone else, then will the sins increase or decrease? What will happen? They will increase. Yes. So, just as Baba says now – Does the arrow hit immediately that anyone remembers Me alone, does not remember anyone else in this world. Does any such arrow hit anyone? Does it hit? Whom does it hit? I don’t see anyone that he remembers only one and the thoughts of anyone else does not come to the mind. The entire business will stop. Be it the lokik business, be it alokik business, will the business stop or not? Hm? Then?

So, does it hit immediately in the manner Baba says? What doesn’t hit? That we remember only one. No. Even then mistakes; in our own businesses; what? In our own businesses? Yes, we become busy in such and such occupations. Hm? Do you become busy in lokik only or in alokik also? Hm? Yes, you become busy in alokik also. You walk in the same way as the people of the world walk. What? Otherwise, alokik action is said to be that in which we should remember ShivBaba while performing any action through the organs of action, through the sense organs. Even if you serve other souls in ShivBaba’s remembrance, narrate knowledge and give sakaash to those souls, then there will benefit if you give in Baba’s remembrance. Or will your soul be benefited if you give sakaash just like that? Will it [be benefited]? It will not be.

So, whatever lies, truth, theft, etc, this one doesn’t know anything at all which the Father narrates. What? What does He narrate? Arey? The Father tells – Remember Me alone. Remember Me, the one. Hm? Some or the other mischief keeps on emerging inside. They will steal, do this, do that. Now you are sitting here. Where? Here. ‘Here’ refers to which place? You also understand that yes, we are sitting. Hm? Then, with whom are you sitting? Hm? Arey, speak up. It will be said that you are sitting with ShivBaba. It is correct that you are sitting with ShivBaba. You are not sitting with Dada, are you? Are you sitting with Dada? Hm? Is Dada body conscious bull or is Dada spiritual Baba? Hm? Will he be called spiritual? No. Had he been spiritual then He would say everyday while conveying remembrance and love – Remembrance, love and Namaste of spiritual Dada. Does He say like this? Does He ever say? He never says. He always says – Remembrance, love and Namaste of spiritual Baba.

Fourth page of the morning class dated 16.11.67, Thursday. This one was a jeweler. Where did we come from here? Hm? Who said? Arey, who said that where did we come from here? Arey, you are astonished.
(Someone said something.) Did you come from the Supreme Abode? Achcha? This one was a jeweler. The topic of a jeweler is being discussed. You came from the Supreme Abode. Where did you come from? Where did you come from here? We were sitting in a diamonds’ shop in Calcutta. So, you understand something or the other at some point in time. Then you forget. We left everything, such a high business of diamonds, we left a fertile business and started attending satsang (spiritual gathering) here. So, where did we come from here? So, something comes to the intellect, we understand a little. What do you understand a little? Hm? That someone had explained to me, explained the meaning of visions; he had told; did I then come here or did I simply come? Hm? Yes. So, you understand a little. Then you forget. Something comes to the intellect; then you do not think and churn deeply. Then you forget.

Then there are many who after committing mistakes; what? This one is not alone. There are many; they also keep on committing sins (vikaram). What is meant by vikaram? What is meant by vikaram? Vikaram means sinful actions (kukarma). Ku means bad. Vi means vipreet (opposite). Opposite to what? Baba tells that you have to perform this action and perform it in My remembrance; you have to do by remaining in soul conscious stage; yes;
(Someone said something.) What else did you write? The vice of lust? Is that the only sin? Achcha? And if you become greedy, is that not a sin? Hm? What? Yes, there are numerous sins. So, you also keep on committing sins. There are many who are good children also. They never speak lies. What? Yes. They never steal. Yes. Whose tasks are these? Are these the tasks of demons and demonesses or the souls which go firmly to the deity religion, that too not the weak ones who convert to other religions; are these the tasks of the firm souls or the tasks of the demons? Are these the tasks of the demons and demonesses? Whose tasks are these? Hm? Yes, those who are firm in the deity religion, those who are firm deity souls, higher than the 16 celestial degrees; how much? Those who experience super-sensuous joy.

So, they will never steal. They will not have any greed. Is there no greed? Why? No greed? Is there no greed to eat and drink nice things? Is it there or not? Arey? Is it not there? It does exist. It is because everyone is. Greed is also a completely bad habit. It was told that in eating and drinking, etc, look, it is explained so much that daughter your eating and drinking should not be tamopradhan (impure). What? How should it be? Yes. It should be completely pure. Your food should be royal. Hm? And? What are Brahmakumar-kumaris doing in basic? And what are Brahmakumar-kumaris doing in advance? And do they eat anything stealthily or do they eat with everyone? Don’t they eat? Why? Don’t you like? Arey, do you like or not? You tell about yourself. Hm? Yes, they eat stealthily. They eat alone. They eat in hiding. They will feed their relatives in whom they have attachment. Others? They will not feed others. Hm, mataji? It is correct, isn’t it? Is it not a correct topic? Arey, you should describe the true person as true person and you should describe a liar as a liar. If you tell about a thief that no, this one is a very good prosperous person, then it is a good thing? If you tell about a butcher that no, this one is not a butcher. This one is a very good person. He does not kill anyone. Then, is it a good thing? Arey, so, your food should be very royal.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2833, दिनांक 28.03.2019
VCD 2833, dated 28.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning class dated 16.11.1967
VCD-2833-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.35
Time- 00.01-20.35


प्रातः क्लास चल रहा था 16.11.1967 सद्गुरुवार को छठे पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी बांधेली माताओं की। बताया कि बांधेली माताओं का पार्ट है मार खाने का। तुम्हारा जो पार्ट है और बाबा इसको कर ही क्या सकते हैं? तुम्हारे अपने कर्मों का हिसाब-किताब तुमने ही लगाव लगाया है जिनसे तो वो लगाव खत्म होने के लिए ये भी जरूरी है। क्या जरूरी है? पिटाई-धुनाई। तो तुमको समझाते तो रहते हैं। तो तुम क्या करो? तुम करो कि उनके ऊपर फूल चढ़ाती रहो प्यार से। अगर उनको वश करना है तो जभी कोई क्रोध करते हैं या मारते हैं तो बहुत उनको निजारी से कि अबलाएं तो हो ना। तुम प्यार से पेश नहीं आओगी और बल तुम्हारे शरीर में नहीं है तो तुम और मार खाओ। तो प्यार से क्योंकि अबलाएं हो। बहुत निजारी से हाथ जोड़ो, पांव पड़ो, अभी हम क्या करें? हमको भगवान बाप कहते हैं कि काम महाशत्रु है। वो पूछेंगे - तुम्हें कैसे कहते हैं? अरे, हमको साक्षात्कार होते हैं तो भगवान हमसे कहते हैं काम महाशत्रु है। और देखो तुमने गीता भी पढ़ी है। उसमें लिखा भी है काम महाशत्रु है। काम, क्रोध बड़े दुश्मन हैं। अच्छा, ये भी तो देखते हो कि पतित पवित्र के आगे देखो माथा झुकाते रहते हैं। हँ? तो तुम पवित्र बनती हो। और वो पतित बनते हैं। तो अंजाम क्या होगा? पता चला? क्या अंजाम होगा? कि आगे आने वाला जो समय है इसी जिंदगी में वो तुम्हारे पांव पड़ेंगे, माथा झुकाएंगे। तो उनको बताओ अभी हमको आवाज आती है। तो ये युक्ति है। क्या? ये झूठ बोलना नहीं है। यह युक्ति है क्योंकि युक्तियां भी तो चाहिए ना किसको हाथ में करने के लिए।

तो ये युक्तियां बहुत चाहिए। हां। रमज बहुत चाहिए ना। हां। क्योंकि ये तो इसका नाम ही है रमतु रमजबाज। क्या? बाबा का नाम क्या है? रमतु रमजबाज। रांझू कहा जाता है ना ब्राइड ग्रूम को। उन्होंने तो कहानी बनाय दी - हीर रांझा। तो रांझू माना ब्राइड ग्रूम। समझा ना? तो और तो युक्तियां भी बहुत समझाते हैं कि ऐसे-ऐसे करो बच्चियों। तुमको बहुत ही हाथ जोड़ना पड़ेगा किमाना पड़ेगा, ये करना पड़ेगा जो उनको तुम्हारे ऊपर तरस आ जावे। कोई कुछ भी ये तुम को मारते हैं मानो, बहुत ही मारते हैं ना। तो अब ये तो जैसे काम कटारी चलाते हैं। जैसे खून करते हैं। हँ? तो जो खून अभी करते हैं उनको निजारी करनी चाहिए कि मैं मेरे को ये नहीं करो। अभी भी मेरे को कान में आवाज आ रही है। पावन बनो। ये पावन दुनिया की ये मालिक बनेंगी तुम। अभी पावन दुनिया आने वाली है। ये मूत-पलीती दुनिया खलास होने वाली है। बताओ भगवानुवाच है, गीता में भी तो लिखा है काम महाशत्रु है। तो बाबा भी हमको कान में आवाज करते रहते हैं कि अभी तो पवित्र बनो। जन्म-जन्मांतर से तो अपवित्र बनते आए। हँ? उसका इतना बड़ा पाप नहीं बनता है क्योंकि और जन्मों में तो मैं आता नहीं हूं। ऐसे नहीं सतयुग, त्रेता, द्वापर में आता हूं, कलियुग कोई मध्य में आ जाता हूं। नहीं। ये तो जब दुनिया पूरी पतित बन जाती है, ऐसे दुर्योधन-दुशासन बन जाते हैं कि बाल पकड़-पकड़ कर खींच-खींच के घसीट-घसीट के मारते हैं।

तो बाबा हमको कहते हैं हमको आवाज आ रही है पवित्र बनो। तो तुम पवित्र दुनिया की मालिक बनेंगी। नारी से क्या? लक्ष्मी बनेंगी। तुम मुझे पवित्र रहने दो। अब मुझे क्षमा करो। ये अच्छा है दूसरी शादी कर लो। हँ? हां। क्या? भले दूसरी शादी कर लो। हमको कोई उससे ईर्ष्या द्वेष नहीं आवेगा। हम उसकी सेवा करेंगे बेटी समझकर, बहन समझकर सेवा, छोटी बहन समझकर उसकी सेवा करेंगे। तुम कर लो दूसरी शादी। दूसरी करो। वो मर जाए तो तीसरी करो। 4-4 करो, 5-5 करो, मेरे को छोड़ दो। हँ? तुम्हें जो शूटिंग करनी हो सो तुम करो। क्या? अंदर-अंदर समझेगी कि हां, ये तो ऐसी शूटिंग कर रहा है। ज्ञान भी मेरे से बहुत सुनता रहता है। मैं तो भूं-भूं करती रहती हूं। तो मैं बताती रहती हूं कि इस्लामी जो होते हैं वो तो पांच 4-4, 5-5 बीवियां रखते हैं। तो भले तुम रखो। मेरे को मत छुओ। तो निजारी चाहिए। हँ? प्रेम से सो भी क्योंकि जो काम विकार है ये बड़ा राक्षस है। क्या? बड़ा शत्रु है। है ना। क्योंकि ये राक्षस; और देख रही हो तुम ये है भी राक्षस। तो बहुत ही ऐसे राक्षस बनेंगे जरूर। क्या? अभी संगम युग में चेहरे राक्षस-राक्षसियों के, राक्षसियों के तैयार हो रहे हैं। तो वो बनेंगे तो जरूर।

और धर्म स्थापना तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म की होनी है। जरूर होनी है। और सावधान भी करते रहते हैं कि बच्चे भूलो मत क्योंकि माया झट भुलाए देती है। हँ? और तुमको भी एकदम भुलाए देती है। बांधली माताओं को कहा। भुलाए देती है तो बस तुम पति के आगोश में आ जाती हो और एकदम ऐसा भुलाए देती है, हँ, जो पढ़ाई के बगैर सब छोड़ देते हो। मुरली सुनते रहते हो, दूसरों को सुनाते रहते हो, लेकिन वो धंधा? पति के साथ बड़े आराम से करते रहते हो मूत-पलीती बनने वालों के साथ। पढ़ाई वगैरह फिर तो क्या होगा जब धंधा चलता रहेगा लगाव ज्यादा लग जाएगा तो पढ़ाई भी? पढ़ाई भी छोड़ देते हैं।

तो देखो, नहीं तो कैसे यहां आते हैं। हँ? बाबा से मिलते हैं, जुलते हैं। पक्का निश्चय भी करते हैं। क्या कहा? जुलते हैं माना क्या? हँ? जुलते हैं, मिलते हैं माना क्या? मिलते तो गले होके मिलते हैं गले से। लेकिन जुलते हैं को क्या होता है? गोद में बैठते हैं तो झूलते हैं। झूलते हैं। पक्का निश्चय भी है। हां। कि बाबा आया हुआ है। सन् 67 की बात बताय रहे हैं ना। पक्का निश्चय भी है। हँ? कितनों की है। और ये भी समझते हो कि बहुत बनते रहेंगे। क्या? क्या बनते रहेंगे? माया के आगोश में आकरके बहुत विकारी बनते रहेंगे। और बहुत फिर बाबा को क्या करते रहेंगे? छोड़ते रहेंगे। लिखते रहेंगे निश्चय पत्र। बाबा को छोड़ते रहेंगे। ये सब चलता रहता है। अभी देखा तो है ना बच्चे ने कि कितने आए, हँ, आए और फिर क्या हुआ? कितने चले गए। और फिर देखो कितने नए-नए आते भी रहते हैं। तो झाड़ वृद्धि को तो पाता रहता है कि नहीं? नहीं? हां। घटते तो नहीं है ना। दुनिया में क्या होता है? अरे, दुनिया में चारों युगों में जनसंख्या बढ़ती रहती है या घटती जाती है? और मरने वाले मरते रहते हैं कि नहीं? हँ? हां। अब यहां है शूटिंग की बात। यहां देह से मरने की बात नहीं है। यहां है आत्मा और आत्मा के बाप को पहचान करके निश्चय से मरने की बात। क्या? अनिश्चय में आ जाते हैं। माया अनिश्चय में लाय देती है।

तो देखो यहां भी ये जो झाड़ है ना ब्राह्मणों का यहां शूटिंग हो रही है। चारों युगों की दुनिया, चारों सीन की। क्या शूटिंग हो रही है? यहां भी घटते तो? घटते हैं? घटते तो नहीं हैं। वृद्धि पाती ही रहती है। तहां तक कि जब प्रभाव बढ़ेगा तो झाड़ बड़े होगा। क्या? प्रभाव जितना निकलता जाएगा, हँ, तो क्या होगा? झाड़ बड़ा होगा या छोटा होगा? बड़ा होगा। वो भी तो बाप समझाते हैं ना कि भई जभी पत्ते ये हजार हो जाएंगे, हँ, ये पत्ते; ये हजार हो जाएंगे; किसी की तरफ इशारा किया अच्छे बच्चे की तरफ। तो धक से 2,000 हो जाएंगे। क्या? ब्रह्मा की हजार भुजाएं कही जाती है ना। ऐसी ब्रह्मा की हजार भुजाएं सहयोगी ऐसी अगर बन जाएं तो फिर क्या होगा धक से? 2000 बन जाएंगे। अच्छा? 2000 होगा तो 4000 भी हो जाएगा। तो झाड़ वृद्धि को पाएगा ना। अभी है छोटा, हँ, जिसको तूफान लगते हैं। कौन सा छोटा झाड़ 67 में? कौन सा छोटा झाड़? अरे इतनी देर? एक अक्षर नहीं लिखते। बेसिक का छोटा झाड़ है 67 में। और अभी तो 40 से ऊपर वर्ष हो गए। तो 40-50 वर्ष होने जा रहे हैं तो अभी वो झाड़ तो बहुत बड़ा हो गया होगा बेसिक का। फिर छोटा झाड़ है या नहीं अभी कोई? कौन सा?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, एडवांस झाड़, हां, जो बताया बाप का प्रत्यक्षता वर्ष सन 76 से। तो बाप का तो एडवांस झाड़ ही होगा। अम्मा का क्या होगा? अम्मा का एडवांस झाड? अम्मा माने ब्रह्मा दादा लेखराज। भले चार मुखों वाला है, संगठित है। तो भी उसे एडवांस कहेंगे? नहीं। एडवांस नहीं कहेंगे। वो छोटा झाड़ फिर भी उनमें दम नहीं है। भले संख्या बहुत बढ़ गई। हाँ।

तो जो एडवांस झाड़ है ना बाप से डायरेक्ट कनेक्टेड। कौन से बाप से? हां वो निराकार बाप शिव से भी कनेक्टेड और वो निराकार बाप जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करके एडवांस पार्टी में पार्ट बजाय रहा है प्रैक्टिकल में उससे भी कनेक्टेड। किससे? मुकर्रर रथधारी से भी कनेक्टेड। तो वो झाड़ छोटा है कि बड़ा है अभी? अरे इतनी देर? छोटा झाड़ है। तूफान बहुत लगते हैं। हँ? बेसिक को भी तूफान लगते थे कि नहीं? लगते थे। वो शंकराचार्य और वो सन्यासी आकर के चित्र-वित्र फाड़ देते थे प्रदर्शनी के। है ना। तो अब यहां भी तूफान लगते हैं कि नहीं? यहां भी तूफान। यहां कौन करता है लफड़ा? वहां तो दुनिया वाले साधु-सन्यासी लफड़ा करते थे। चित्र-वित्र फाड़ देते थे। और यहां? हां, यहां जो हैं जो बीके की, ब्राह्मणों की दुनिया बेसिक ज्ञान लेने वालों की है, अधूरे ज्ञानी हैं नीम हकीमे खतरे जान, तो न समझने के कारण वो क्या करते हैं? वो फिर इस छोटे झाड़ को जो भी, हां, उन्हें लगते हैं कि ये बड़े पहलवान हैं, महारथी हैं, महावीर हैं, उनको चोट पहुंचाने के लिए बड़े-बड़े तूफान लाते रहते हैं। कैसे? कैसे? कैसे तूफान लाते रहते हैं? हां, और बड़े लंबे टाइम से तूफान चल रहे हैं। कब से? सन 98 से ही चल रहे हैं। हँ? उल्टे-उल्टे काम करके। कैसे उल्टे काम करके? क्या?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, रिश्वत देके, चोरी करके, चकारी करके। क्योंकि जो बेसिक ब्राह्मण में, जो बेसिक ब्राह्मणों की दुनिया में जो बाहर से नए-नए जिज्ञासु आते हैं वो पैसा तो देते हैं ना। उस पैसे की चोरी करके खर्चा करते हैं कि नहीं रिश्वत-विश्वत देने में? कि उनको बताके करते हैं हम रिश्वत दे रहे हैं? वो देंगे फिर? नहीं देंगे।

तो ऐसे-ऐसे बहुत तूफान लगते हैं। पीछे तो तुम तूफान से। तुम। क्या कहा? पीछे तो तुम। तुम माना जो बाबा ने बच्चों को सामने इमर्ज करके बैठाया हुआ है उस समय 67 में बोला। और अभी? अभी प्रैक्टिकल में सामने बैठे होंगे कि नहीं बैठे होंगे? हां, उनको बोला तुमको तूफान तो अभी लगते तो है ना। परंतु पीछे तो तुम तूफानों से बहुत मजबूत हो जाएंगे। क्या? हां। इतने मजबूत हो जाएंगे। पीछे। कब पीछे? हँ? पीछे कब? कुछ टाइम निश्चित है? बहुत मजबूत हो जाएंगे। और स्थिरियम हो जाएंगे।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, 2028 तक तुम बच्चे। तुम बच्चे माने बहुत या तू बच्चा? हां, तुम सभी बच्चे चाहे 8 हों, चाहे 108 हों, चाहे 16108 हों। चाहे साढ़े चार लाख, वो सवा दो लाख हों। वो सब तुम बच्चे क्या होगा? स्थिरियम हो जाएंगे। साढे चार लाख भी तो स्थिरियम हो जाएंगे। कैसे होगा? कैसे स्थिरियम हो जाएंगे? जैसे वो आसमान के सितारे होते हैं वो तो चलते रहते हैं। चलते रहते हैं कि नहीं? अपनी जगह छोड़ते रहते हैं कि नहीं? नहीं छोड़ते? छोड़ते रहते हैं। लेकिन तुम ऐसे स्थिरियम हो जाएंगे जैसे पहले-पहले तुम्हारा बाप स्थिरियम हो जाता है। कौन है बाप? उन सितारों में कौन है बाप? आत्माओं में? हां। (किसी ने कुछ कहा।) ध्रुव तारा।

तो ध्रुव तारा। ध्रुव माने अचल। तुम्हारी यादगार है ना अचलगढ़। यहां यादगार तुम्हारी बनी हुई है। तो तुम अचलगढ़ की तरह अटल हो जाएंगे स्थिरियम हो जाएंगे। हिलेंगे नहीं। माया तुमको कितना भी हिलाती रहे तुम अंगद के समान क्या हो जाएंगे? जैसे अंगद ने अपना पांव कहां रख दिया? रावण की सभा में, हां, रख दिया कि तुम में ताकत हो तो हमारे पांव को हिला के देखो। नाम रख दिया अंगद। अंग द। कैसा? क्या मतलब? हां, ये जो अंग हैं ना शरीर के ये अंग हमने भगवान को दे दिए। अब इनकी हमें परवाह नहीं है। परवाह थी पारब्रह्म परमेश्वर की। वो मिल गया गया, तो अब हमें इनकी, हमें इस देह और देह के, जो दुनिया दुख देती है उनकी भी हमें कोई चिंता नहीं है। तो फिर अडोल हो जावेंगे, अचल भी हो जावेंगे। हां। (20.35)

A morning class dated 16.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the sixth page on Thursday was about the bandheli matas (mothers in bondage). It was told that the part (role) of the bandheli mothers is to suffer beatings. It is your part and what can Baba do about it? It is your own karmic account; you have developed attachment with people; so, this is also necessary to end that attachment. What is necessary? Beatings. So, He keeps on explaining to you. So, what should you do? What you should do is you keep on showering flowers upon them with love. If you want to control them, then whenever anyone becomes angry or beats you, then deal with them with a lot of love because your are ablaas (weaker sex), aren’t you? If you do not deal lovingly and your body doesn’t have the strength, then you will suffer more beatings. So, with love because you are the weaker sex. Very lovingly, fold your hands, touch their feet; what should I do now? God, the Father tells me that lust is the biggest enemy. He [the husband] will ask – How does He tell you? Arey, I have visions; so, God tells me that lust is the biggest enemy. And look, you have read the Gita as well. It has also been written in it that lust is the biggest enemy. Hm? So, you become pure. And they become sinful. So, what will be the result? Did you know? What will be the result? That in the coming time in this birth itself they will fall at your feet, they will bow their foreheads. So, tell them that now I hear a voice. So, this is tact. What? This is not called speaking lies. This is tact because tactics are also required to control someone.

So, a lot of these tacts are required. Yes. A lot of wisdom is required, isn’t it? Yes. It is because its name itself is ‘ramtu ramajbaaj’. What? What is Baba’s name? Ramtu Ramajbaaj. Bridegroom is called Raanjhu, isn’t he? They have made a story – Heer-Ranja. So, Rajhu means bridegroom. Did you understand? So, and He explains a lot of tactics that daughters, do like this and like this. You will have to fold your hands a lot, you will have to do this so that they feel pity upon you. If anyone beats you, suppose he beats you a lot, doesn’t he? So, well, it is as if they use the axe of lust. It is as if they murder. Hm? So, the murder that he commits now, so, you should plead with him that do not do this to me. Even now I hear a sound in my ears. Become pure. You will become master of the pure world. Now the pure world is going to arrive. This world which has become dirty with the urine of lust is going to end. Tell – God says; it has been written in the Gita as well that lust is the biggest enemy. So, Baba also keeps on telling me in my ears that become pure at least now. You have been becoming impure since many births. Hm? That does not accrue as much sins because I do not come in other births. It is not as if I come in the Golden Age, Silver Age, Copper Age or that I come in the middle of the Iron Age. No. It is when the world becomes completely impure, when they become such Duryodhans and Dushasans that they drag you by your hairs and beat you.

So, Baba tells me; I hear a voice – Become pure. Then you will become the master of the pure world. What from a woman? You will become Lakshmi. You allow me to remain pure. Now pardon me. It is better if you remarry. Hm? Yes. What? You may marry for the second time. I will not feel jealous of her. I will serve her as a daughter, I will serve her as a sister, as a younger sister. You may marry for the second time. Marry for the second time. If she dies, marry for the third time. You may marry four times, five times, but leave me. Hm? You may perform any shooting that you wish. What? Within her mind she will think, yes, this one is performing such shooting. He also keeps on listening to a lot of knowledge from me. I keep on murmuring [like a bumblebee]. So, I keep on telling that the Islamic people maintain five, four, five wives. So, you may also keep. Do not touch me. So, appeasement (nijaari) is required. Hm? That too with love because this vice of lust is a big demon. What? It is a big enemy. It is, isn’t it? It is because this demon and you are observing that you are a demon, too. So, many will definitely become such demons. What? Now the faces of demons and demonesses, of demonesses are getting ready in the Confluence Age. So, they will definitely get ready.

And the religion of Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma is going to be established. It is definitely going to be established. And He also keeps on cautioning – Children, do not forget because Maya makes you forget immediately. Hm? And it makes you also forget immediately. It was said to the bandheli mothers. When it makes you forget then that is it; you get hugged by the husband and it makes you forget [the Father] completely in such a manner that you leave the studies. You keep on listening to the Murli, you keep on narrating to others, but that business? You keep on indulging in that business very comfortably with the husband, with those who become dirty in the urine of lust. What will happen to studies, etc. when that business will continue? When you develop more attachment, then the studies too? You leave the studies too.

So, look, otherwise, how you come here! Hm? You meet (miltey-jultey) Baba. You also develop firm faith. What has been said? What is meant by jultey? What is meant by ‘jultey hain, miltey hain’? As regards ‘miltey’ (meeting) you meet by embracing. But what happens in ‘jultey hain’? You dangle when you sit in the lap. You dangle. You also have firm faith. Yes. Baba has come. The topic of 1967 is being mentioned, isn’t it? You also have firm faith. Hm? There are so many. And you also understand that many will keep on becoming. What? What will they keep on becoming? They will keep on becoming very vicious by embracing Maya. And then what will many keep doing to Baba? They will keep on leaving. They will keep on writing letters of faith. They will keep on leaving Baba. All this keeps on happening. Now the child has seen that so many came, hm, they came and then what happened? So many left. And then look so many new ones also keep on coming. So, does the tree keep on growing or not? No? Yes. You don’t decrease in numbers, do you? What happens in the world? Arey, in the world does the population keep on increasing in the four Ages or does it keep on decreasing? And do those who are to die keep on dying or not? Hm? Yes. Well, here it is a topic of shooting. Here it is not about dying through the body. Here it is about recognizing the soul and the Father of the soul and dying from faith. What? You develop doubts. Maya brings you in doubts.

So, look, even here shooting is taking place here in the tree of Brahmins. Of the world of four Ages, four scenes. What shooting is taking place? Even here do you decrease? Do you decrease? You don’t decrease. You keep on increasing. To the extent that when the influence increases then the tree will grow. What? The more the influence, what would happen? Will the tree grow big or will it become small? It will grow big. The Father explains that brother, when these leaves become a thousand, hm, when these leaves become a thousand; a gesture was made towards someone, towards a nice child. Then they will immediately grow to 2000. What? Brahma is said to have thousand arms, isn’t he? If such thousand arms of Brahma become helpers, then what will happen immediately? They will grow to 2000. Achcha? If they become 2000, then they will become 4000 as well. So, the tree will grow, will it not? Now it is small, hm, it faces storms. Which small tree in 67? Which small tree? Arey, you take so much time! You don’t write one word. There is a small tree of basic (BKs) in 67. And now it has been more than 40 years. So, when it is going to be 40-50 years since then, that tree of basic (BKs) must have grown very big by now. Then is there any small tree or not now? Which one?
(Someone said something.) Yes, the advance tree, yes, it was told that the year of revelation of the Father is from 76. So, the Father’s tree will be advance tree only. What will be in case of mother? Will it be advance tree of the mother? Mother means Brahma Dada Lekhraj. Although he has four heads, they are united. Still, will it be called advance? No. It will not be called advance. However, there is no strength in that small tree. Although the number has increased a lot. Yes.

So, the advance tree is direct connected with the Father. With which Father? Yes, it is connected with the incorporeal Father Shiv also and it is also connected with the permanent Chariot in which that incorporeal Father has entered and is playing His part in the Advance Party in practical. With whom? It is connected with the permanent Chariot-holder as well. So, is it a small tree or a big one now? Arey, you take so much time! It is a small tree. It faces a lot of storms. Hm? Did the basic [tree] also face storms or not? It used to. That Shankaracharya and those Sanyasis used to come and tear the pictures of the exhibition. Is it not? So, now here too do you face storms or not? There are storms here as well. Who creates troubles here? There the people of the world the sages and saints used to create troubles. They used to tear pictures. And here? Yes, here the world of BKs, the Brahmins, those who obtain basic knowledge, those who are incompletely knowledgeable, neem-hakim-e-khatre jaan (incomplete medical knowledge puts the life in danger); so, what do they do when they don’t understand? They then, whoever belongs to this small tree, yes, whoever appears to them to be wrestlers (pehelwaan), maharathis, bravest ones, they keep on bringing big storms to cause injury to them. How? How? How do they keep on bringing storms? Yes and the storms have been brewing since a long time. Since when? They have been brewing since 1998 itself. Hm? By performing opposite tasks. By performing which kind of opposite tasks? What?
(Someone said something.) Yes, by paying bribes, by stealing. It is because among the basic Brahmins, the new students who come in the basic world of Brahmins, they give money, don’t they? They steal from that money and spend it in paying bribes or not? Or do they tell them that we are paying bribes? Will they then give? They will not give.

So, many such storms emerge. Later you will face storms. You. What has been said? Later you. You means the children whom Baba made to emerge and sit, He said at that time in 67. And now? Would they be sitting in front of Him now in practical or not? Yes, it was said to them that you now face storms, don’t you? But later you will become very strong through storms. What? Yes. You will become so strong. Later. When later? Hm? When later? Is any time fixed? You will become very strong. And you will become stable.
(Someone said something.) Yes, you children till 2028. Does ‘you children’ mean many or you child? Yes, all you children, be it eight, be it 108, be it 16,108. Be it four and a half lakhs, no, be it 2.25 lakhs. What will happen among all of you children? You will become stable. Four and a half lakhs would also become stable. How will that happen? How will they become stable? Just as those stars of the sky keep on moving. Do they keep on moving or not? Do they keep on leaving their place or not? Don’t they leave? They keep on leaving. But you will become as stable as your Father who becomes stable first of all. Who is the Father? Who is the Father among those stars? Among the souls? Yes. (Someone said something.) Pole Star (Dhruv tara).

So Pole Star. Dhruv means unshakeable. Your memorial is the Achalgarh, isn’t it? Here your memorial has been built. So, you will become unshakeable like Achalgarh, you will become stable. You will not shake. Maya may keep on shaking you to any extent, what will you become like Angad? For example, where did Angad place his leg? In the Court of Ravana, yes, he placed it there saying that if you have strength try moving my leg. The name was coined as Angad. Ang da. How? What does it mean? Yes, we gave these organs (ang) of the body to God. We no longer care for them. We cared for the Paarbrahm Parmeshwar (God). We found Him; so now we do not worry about these, about this body and the physical sorrows that the world causes. So, then you will become unshakeable, immovable as well. Yes. (20.35)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
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वीसीडी 2834, दिनांक 29.03.2019
VCD 2834, dated 29.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning class dated 16.11.1967
VCD-2834-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.44
Time- 00.01-16.44


प्रातः क्लास चल रहा था 16.11.1967. गुरुवार को सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि अभी तो सब आपस में लड़करके, मरकरके खतम हो जाएंगे। एकदम रक्त की नदियां आकरके बहेंगी। और फिर वो बाप तो कहते हैं। ये बाप नहीं कहते। वो बाप कहते हैं। वो बाप तो कहते हैं। क्या कहते? कि तुम मलूक हो, शिकारी हो। और जो मरेंगे वो तो मिरुआ मौत। जानवर हैं। उनकी तो मौत होनी है। मलूक को शिकार मिलेगा। वो मरते रहेंगे। और तुमको तो बाबा ने खातरी दी है। ये सब कुछ हमारे लिए ही तो है। हँ? तो सब मरेंगे। तब क्या होगा? तभी हमारे लिए नई बादशाही वहां से स्थापन होगी। हँ? कहां से? हां, तो तुमको तो कोई परवाह ही नहीं रहेगी। क्योंकि तुम तो अच्छी तरह से इस ज्ञान में भरे हुए हो ना। अच्छी तरह से कि हमको क्या है ये? हमारे लिए तो बाबा को तो नई दुनिया चाहिए। हम कल जाकरके राज्य करेंगे। कोई नई बात थोड़े ही है। ये तो कल्प-कल्प ये पुरानी दुनिया खतम होती है। नई; नई से पुरानी, पुरानी से नई। कल्प-कल्प ऐसे ही होता आया। अरे ये तो चक्कर चलता ही रहता है। 5000 वर्ष का चक्कर है। बार-बार चलता रहता है।

16.11.1967 की प्रातः क्लास का आठवां पेज। गुरुवार। तो देखो, कितना तुम्हारे लिए सहज कर देते हैं कि सुदर्शन चक्र चलाते रहो। देखो, तुम्हारा 84 का चक्कर तो चलता ही रहता है। तो ऐसी-ऐसी बातों में अगर कोई विचार-सागर-मंथन करते रहें उठते-बैठते, घूमते-फिरते तो ये नालेज है ना। नॉलेज है। अभी तुम क्या जानो कि अच्छा बाबा सुनाते ये सभी या ये दादा ब्रह्मा सुनाते हैं। ये भी तो तुम समझ नहीं सकेंगे कि ये कौन सुनाते हैं? तो तुम कहेंगे कभी कि कभी बाबा सुनाते हैं कभी दादा सुनाते हैं। अब हैं तो दोनों ही इकट्ठे। बाबा कहते हैं ना बच्चू बादशाह पीरू वज़ीर। क्या मतलब? हँ? बच्चू बादशाह माने बच्चे को बादशाह बनाते हैं और खुद क्या बनके बैठते हैं? वज़ीर बनके बैठते हैं। मंत्रणा देने के लिए। मंत्री को वजीर कहा जाता है ना।

तो नाम तो सुना है ना बच्ची सिंध का। करने को देखो बैठे-बैठे क्या-क्या डायरेक्शन देते रहते हैं। हँ? ऐसे-ऐसे डायरेक्शन देते रहते हैं ये करो। म्यूजियम बनाओ, बड़े-बड़े म्यूजियम बनाओ। समझते हो दिन-प्रतिदिन, दिन-प्रतिदिन ये हम वृद्धि को कहते रहेंगे। बड़े-बड़े म्यूजियम खुलते रहेंगे और बड़े-बड़े सेंटर्स खोलते रहेंगे। सबको ये, ये तो जरूर बताना ही है। सबको माने कितनों को? हँ? कितनों को बताना है? हँ? अरे, संदेश कितनों को देना है?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, 750 करोड़ को भी संदेश देना है। बताना ही है कितना मूढ़पाई, पाई-पैसे की चीज नहीं समझते हैं। इतनी बुद्धि पाई-पैसे की बन गई है कि उनको समझाते हैं कि नहीं भई भगवान तो एक है। और तुम गाते भी हो गॉड इज़ वन। तुम खुद मुख से कहते हो वी ऑल आर ब्रदर्स। भई ब्रदर हुड है तो ब्रदर्स। तो जो ब्रदर्स हैं तो उनका तो एक बाप होगा ना। और ये भी बरोबर सभी ब्रदर्स का यानी आशिकों का एक माशूक बाप। एक माशूक बाप ठहरा ना। क्योंकि याद करते रहते हैं। तभी तो आशिक, माशूक। अब याद एक दो को करेंगे तभी तो उनको नाम लेंगे ना आशिक, माशूक।

तो तुम्हारा भी सभी का नाम लेते हैं ना कि तुम सब हैं भक्ति मार्ग के बाबा के आशिक। और बाबा को याद करते आए हो। याद करते आए हो ना। याद करते आए हो। याद करते आए हो। अभी तो देखो मैं आया हुआ हूं। भक्ति मार्ग में तुमने इतना लंबा ढाई हजार साल याद किया। उसमें मैं आया थोड़े ही था? अभी आया हुआ हूं। भले कोई गाली देते हैं। कोई क्या करते हैं। अरे, हमको तो कुछ भी, जरा भी फर्क नहीं पड़ता। तुम गाली दो या कुछ भी करते रहो, ग्लानि करो क्योंकि वो तो गाली देंगे ना। हँ? 5000 वर्ष पहले भी तो गाली दिया था ना। तो अभी भी दिया ना। भगाने, करने, ये फलाने का, ये, ये गालियां देने का। अभी कृष्ण को भला गाली दी ना। अब बताओ कृष्ण को गाली कौन देंगे? तो ये बेचारे सन्यासी-उदासी ये तो समझते ही नहीं है कि कृष्ण को गाली दिया हुआ है। जो वो बिगड़ते हैं कृष्ण के लिए। ऐसे कहते हैं। हँ? क्या बिगड़ते हैं? जब तुम बताते हो कृष्ण गीता का भगवान नहीं है तो फिर वो बिगड़ पड़ते हैं।

तो देखो, तुम तो कृष्ण के लिए बड़ी महिमा करते हो। तो वो तो क्रोध के मारे समझते कुछ भी नहीं है क्योंकि ये लोग दुर्वासा लोग तो हैं ही। हँ? दुर्वासा माने? जिनके मुख से ऐसी बातें निकलती थी कि शाप ही शाप देते थे। तो इनको कहा जाता है दुर्वासा। हां, ऐसे करेंगे, ऐसे करेंगे, ऐसे करेंगे तो बाप अंदर में बैठा है। हां। वो बैठकर के अंदर में हंसते हैं। मुस्कुराते रहते हैं। और वो प्लानिंग बनाते रहते हैं ऐसे करेंगे, वैसे करेंगे। हँ? तो देखो, ये क्या हैं बिचारे। ये जो प्लानिंग बनाते हैं हम ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे। जानते तो कुछ भी नहीं है कि आगे चलके होना क्या है? अब इन बिचारों को क्या मालूम? ये तो समझते हैं अभी कलियुग रेगड़ी पहन रहा है। जैसे बच्चा होता है ना घुटने से चलता है तो समझता है अभी तो बच्चा है, बड़ा होने में अभी टाइम लगेगा। हँ? नौजवान होगा, फिर बूढा होगा, बहुत लंबा टाइम है। हँ? तो कलियुग को 40000 वर्ष देते हैं। अभी देखो कितने आएंगे ये सन्यासी। अभी ढेर के ढेर आएंगे। हँ? अभी। कौन सा सन चल रहा है था तब? हँ? 67 की वाणी है। तो बोला अभी। माना बाबा शरीर छोड़ने वाले थे एक साल के बाद और बस सन्यासियों का धमाकडा शुरू। कहां? बेसिक में शुरू हुआ कि नहीं? हां। तो बेसिक में जो शुरू होता है एडवांस में भी शुरू होता है कि नहीं? हाँ, होता ही है। अभी कितने आएंगे सन्यासी। अरे, ढेर के ढेर आएंगे। तो कितना जन्म हो जाएगा। 40000 वर्ष कहते हैं कलियुग को। तो लाखों जनम जो समझते हैं तो देखो कितने गपोड़े लंबे-चौड़े लगाते हैं।

अभी किसको भी तुम कहो अरे भई तुम लिखते हो यहां 5000 वर्ष का, तो देखो बहुत से तो मानते भी हैं। कैसे मान लेते हैं? तुम उन्हें समझाते हो ना। देखो, हिस्ट्री तुम्हारी 5000 वर्ष, ढाई हजार वर्ष की है ना। तो ढाई हजार वर्ष की हिस्ट्री में दुख बढ़ा है? घटा है? दुनिया में दुख ज्यादातर पब्लिक को तो बढ़ता गया। थोड़े से लोग हैं जो कंट्रोल करने वाले, राजाई की स्टेज पर बैठते हैं या उनके सहयोगी वो होते हैं क्या, अधिकारी वो मस्ती मारते रहते हैं। बाकी तो सारी प्रजा ढेर की ढेर होती है ना। वो दुखी हो रही है कि उनका दुख बढ़ता जाता है कि घटता जाता है? बढ़ता जा रहा है।

तो देखो, तुम सभी मान कर के यहां आते हो ना। क्या? कि हां, भई ढाई हजार साल से जबसे ये इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरू आए हैं ना, देहधारी धर्मगुरु तबसे दुनिया में दुख बढा है। इनसे दुनिया दुख बनती है दुख की। ये क्या हैं? नर हैं ना। तो ये नर मनुष्य के रूप में देह अभिमानी सांढे दुनिया को नर नर्क बनाते हैं। और भगवान नर को क्या बनाते हैं? भगवान नर को नारायण बनाते हैं। तो भगवान जब आते हैं तो नर को नारायण कब बनावेंगे? ये तो ढाई हजार साल से आते ही रहे हैं इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, उनके सहयोगी धर्मपिताएं, ढाई हजार साल हो गए हिस्ट्री को। तो जरूर जब ये सब धरमपिताएं आ जाते हैं, सब धर्म फैल जाते हैं अच्छी तरह से इस दुनिया में, इनके फॉलोवर्स भी ढेर के ढेर हो जाते हैं तब फिर मैं आता हूं। जब कोई के बूते संभालने से नहीं संभलता है, दुनिया गड्ढे में जाती रहती है।

तो तुम तो सभी यहां मान करके आते हो कि हां, ढाई हजार साल नरक की दुनिया। ढ़ाई हजार साल जो भगवान आता है वो स्वर्ग की दुनिया। कैसी? हँ? कैसी दुनिया? जहां सुख ही सुख है। और नरक की दुनिया में? जहां कोई ऐसा मनुष्य नहीं जिसको दुख न हो। क्या? चलो धन बहुत होगा। तन पहलवान होगा। तो मन में विकार तो आते रहेंगे। मन में दुखी होते हैं कि नहीं? अच्छा बीमारी आती है कि नहीं? बीमारी आती है तो दुखी होते हैं। हाय दैया तौबा। तो देखो तुमने तो मान लिया कि हाँ, आधा समय इस दुनिया में नरक नरों का बनाया हुआ और आधा समय जो नर को नारायण बनाता है भगवान वो नारायण की दुनिया जिसे स्वर्ग कहा जाता है 16 कला संपूर्ण वो ढाई हजार वर्ष की दुनिया। तो आधा समय स्वर्ग की दुनिया, आधा समय नरक की दुनिया।

A morning class dated 16.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the seventh page on Thursday was that now everyone will fight with each other, die and perish. Rivers of blood will come and flow. And then that Father says. This Father doesn’t say. That Father says. That Father says. What does He say? That you are malook, hunter (shikari). And those who will die, that is ‘mirua maut’ (animal’s death). They are animals. They are bound to die. Hunter will get a prey. They will keep on dying. And Baba has given you assurance (khaatri). All this is for us only. Hm? So, everyone will die. What will happen then? Only then will the new emperorship be established from there. Hm? From where? Yes, so, you will not care at all. It is because you are full of this knowledge, aren’t you? Nicely that what is this for us? Baba wants a new world for us. Tomorrow we will go and rule. It is not a new thing. This old world ends every Kalpa. New; old from new. New from old. It has been happening like this every Kalpa. Arey, this cycle keeps on revolving. It is a cycle of 5000 years. It keeps on revolving again and again.

Eighth page of the morning class dated 16.11.1967. Thursday. So, look, He makes it so easy for you that keep on rotating the Sudarshan Chakra. Look, your cycle of 84 keeps on rotating. So, if anyone keeps on churning the ocean of thoughts in such topics while standing, sitting, moving; so, this is knowledge, isn’t it? It is knowledge. Now you don’t know that well, does Baba narrate all this or does this Dada Brahma narrate? Well, both are together. Baba says, doesn’t He that Bachchu Baadshah Peeru Wazir. What does it mean? Hm? Bachchu Baadshaah means that the child is made emperor and what does he himself become? He sits as a Minister (Wazir). In order to give advice. A Minister is called Wazir, isn’t he?

So, you have heard the name of Sindh, haven’t you daughter? Look, He sits and gives what all directions for you to do. Hm? He gives such directions – Do this. Build a museum, build big museums. You understand that we will keep on speaking about growth day by day, day by day. Big museums will keep on opening and big centers will keep on opening. Everyone has to be definitely told about this. ‘Everyone’ refers to how many? Hm? How many do you have to tell? Hm? Arey, how many people do you have to give message?
(Someone said something.) Yes, message has to be give to 750 crores as well. They have to be told that there is so much foolishness (moodhpaai); they don’t understand things worth pie-paisa. The intellect has become worth a pie-paisa that they are explained that no, brother, God is one. And you even sing that God is one. You yourself utter through your mouth that we all are brothers. Brother, if there is a brotherhood, then you are brothers. So, the brothers will have one Father, will they not? And this one is also rightly one beloved (maashook) Father of all the brothers, i.e. lovers. He is one beloved Father, isn’t He? It is because you keep on remembering. Only then are you lovers and He is the beloved. Well, if you remember each other, only then will you name them as lover and beloved, will you not?

So, everyone utters your name that you all are lovers of Baba ever since the path of Bhakti started. And you have been remembering Baba. You have been remembering, haven’t you? You have been remembering. You have been remembering. Now look, I have come. You have remembered for so long on the path of Bhakti for 2500 years. Had I come in that? I have come now. Although some abuse Me. Some do something else. Arey, it doesn’t affect Me even a little. You may abuse Me or you may do anything, you may defame Me because they will abuse, will they not? Hm? They had abused 5000 years ago as well, hadn’t they? So, they abused even now, didn’t they? Making people run away, doing this, that, hurling these, these abuses. Well, abuses were hurled at Krishna, were they not? Well, tell, who will hurl abuses at Krishna? So, these poor people, the Sanyasis, udasis do not understand at all that abuses were hurled at Krishna. That is why they get angry for Krishna. They say so. Hm? How do they get angry? When you tell that Krishna is not the God of Gita, then they get angry.

So, look, you praise Krishna a lot. So, they do not understand anything due to anger because these people are Durvasas only. Hm? What is meant by Durvasa? The ones from whose mouths such topics used to emerge that they used to just curse. So, these are called Durvasas. Yes, we will do like this, we will do like this, we will do like this. So, the Father is sitting inside. Yes. They sit and laugh inside. They keep on smiling. And they keep on planning that we will do like this, we will do like that. Hm? So, look, what are these poor people? These people make planning that we will do like this, we will do like that. They do not know anything that what is going to happen in future? Well, what do these poor people know? They think that the Iron Age is still crawling. For example, when a child starts moving on his knees, he thinks that he is still a child; it will take time to grow up. Hm? He will grow young; then become old; there is a very long time. Hm? So, 40000 years are given to the Iron Age. Now look, so many of these Sanyasis will come. Now numerous people will come. Hm? Now. Which year was going on at that time? Hm? It is a Vani dated 67. So, it was said – Now. It means that [Brahma] Baba was going to leave his body after one year and that is it; the uproar of the Sanyasis started. Where? Did it start in basic or not? Yes. So, whatever starts in basic, does it start in advance also or not? Yes, it definitely starts. Now so many Sanyasis will come. Arey, numerous Sanyasis will come. So, how many births will take place? It is said that the Iron Age is of 40000 years. So, those who think that there are lakhs of births, then look, they boast so much.

If you tell anyone that arey, brother, you write that here, of 5000 years, so, look, many even believe. How do they believe? You explain to them, don’t you? Look, your history is of 5000 years, 2500 years, isn’t it? So, have sorrows increased in 2500 years history or have they decreased? Mostly sorrows for the public have increased in the world. There are very few people, the controllers, who sit in the stage of kingship or their helpers, the officers who enjoy. The subjects are numerous, aren’t they? Are they becoming sorrowful or does their sorrow go on increasing or does it go on decreasing? It is increasing.

So, look, you all come here with belief, don’t you? What? That yes, brother, ever since 2500 years, ever since these Ibrahim, Buddha, Christ, Gurus, the bodily gurus came, didn’t they, sorrows have increased in the world. Through them the world becomes a world of sorrows. What are these? They are men, aren’t they? So, these men (nar), the body conscious bulls in the form of human beings make the world a hell (narak). And what does God make nar (man)? God transforms nar to Narayan. So, when God comes, then when will He transform nar to Narayan? These Ibrahim, Buddha, Christ, their helper founders of religions have been coming since 2500 years; there is a history of 2500 years. So, definitely, ever since all these founders of religions come, when all the religions spread nicely in this world, when their followers also become numerous, then I come. When it is beyond the capacity of anyone to control this world, the world keeps on moving into a pit.

So, you all come here with a belief that yes, the world of hell is for 2500 years. God who comes establishes a heavenly world for 2500 years. Of what kind? Hm? What kind of world? The place where there is just happiness. And in the world of hell? The place where there is no human being who doesn’t experience sorrows. What? Okay, they may have a lot of wealth. The body may be very strong. So, the vices must be definitely emerging in the mind. Do they become sorrowful in the mind or not? Achcha, do they fall sick or not? When they fall sick, they feel sorrowful. They cry in despair. So, look, you have believed that yes, for half the time in this world, there is hell established by the men and for half the time, God who transforms man to Narayan, there is that world of Narayan which is called heaven, perfect in 16 celestial degrees for 2500 years. So, there is a world of heaven for half the time and there is a world of hell for half the time.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2835, दिनांक 30.03.2019
VCD 2835, dated 30.03.2019
प्रातः क्लास 16.11.1967
Morning class dated 16.11.2019
VCD-2835-Bilingual

समय- 00.01-23.38
Time- 00.01-23.38


प्रातः क्लास चल रहा था 16.11.1967. गुरुवार को नौवें पेज में मध्य में बात चल रही थी - ये, ये दुनिया है ये एक भूल-भुलैया का खेल बन गई है। नहीं तो जितनी मेहनत पावन बनने की क्योंकि मेहनत तो बहुत करनी चाहिए ना। नहीं तो फिर बाबा कह भी देते हैं ऐसे मत समझो कि कोई बिल्कुल जोर से बैठकरके कर सकेंगे। या, या कहेंगे अच्छा हम झाड़ के नीचे जाकरके 6 घंटा, 5 घंटा, 8 घंटा कुछ कर सकेंगे। अरे, नहीं कर सकेंगे। क्यों? अगर अभी कर्मातीत बन जाए। ‘अभी’ माने? 1967 की बात बताई। अभी तो और भी 40-47 वर्ष हो गए। तो बताया - अगर अभी कर्मातीत बन जाए, पुरुषार्थ एकदम जोर से करें। वो तो शरीर छोड़ देवे। वो तो हो ही ना सके कि कोई वापस चला जाए। मेरे, मेरे जाने के बगैर कोई वापस कैसे जाएंगे वहां? ये भी तो नहीं होगा। वो भी बताय देते हैं। कोई कितना भी कोशिश करे एकदम हम ये करें, नहीं कर सकते हैं। ये ड्रामा में ही नहीं है पार्ट। कोई का ऐसा पार्ट नहीं है। उसका ऐसा कि हम कर्मातीत बनकरके पहले से भाग जावें। पहले से कोई भाग ही नहीं सकेंगे। अरे, जंजीरें पड़ी हुई हैं। ऐसे थोड़े ही भाग सकते हैं कोई।

कौन सी जंजीरें पड़ी हुई हैं? हँ? हां।
(किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? सोने की जंजीर लगी पड़ी हैं। और लोहे की? हँ? लोहे की भी हैं? डबल हैं? अरे? लोहे की जंजीर क्या होती है? सोने की जंजीर क्या होती है? हँ? जब ज्ञान में ही नहीं आए थे तब लोहे की जंजीरों में थे। ज्ञान में आने के बाद भी लौकिक संबंधी, देह के संबंधी याद आते रहते हैं पुराने, तो भी कहेंगे कि लोहे की जंजीरें हैं। फिर अलौकिक ब्राह्मण परिवार में आते हैं तो फिर अलौकिक ब्राह्मण परिवार में लगाव लग जाता है तो कहेंगे सोने की जंजीरें। तो कहेंगे ये जंजीरें पड़ी हुई हैं। ऐसे कोई थोड़े ही भाग सकते हैं? कहां भागेंगे? कहां भागने की बात हो रही है? कि कोई परमधाम चले जावें। हँ? आत्माओं के लोक में भाग जावेंगे।

तो बाप बैठकर के बच्चों को अच्छी तरह से समझाते हैं कि बच्चे फिर भी कहते हैं अपन को आत्मा समझो। और बाप को याद करो। ऐसे नहीं कि सिर्फ अपनी आत्मा समझने से जंजीरें कट जाएंगी। बाप को याद करेंगे तो जंजीरें कटेंगी। बाबा सिर्फ ये नालेज अभी खुद ही आकरके देते हैं। हँ? ये नॉलेज बाबा के सिवाय और कोई दे ही नहीं सकता। और फिर ये नॉलेज कोई हमेशा के लिए तो है ही नहीं। ये तो सिर्फ संगमयुग के लिए है। कहेंगे पुरुषोत्तम संगमयुग। बाद में तो नई दुनिया स्थापन हो जाएगी तुम्हारी पक्की प्रेक्टिस पड़ जावेगी आत्मिक स्थिति में टिकने की तो तुम तो देवता बन जाएंगे। बाकि मैं यहां थोड़े ही नॉलेज देने के लिए बैठा रहूंगा। तो वो तो बात कह ही देते हैं - ये नॉलेज तुमको अभी के लिए देता हूं। अभी माने? ये पुरुषोत्तम संगमयुग के लिए देता हूं जो तुम जबकि पतित हो गए तो पावन बन जाओ। बस। फिर पावन हो फिर तो तुमको फिर पतित बनना नहीं है ढाई हजार साल। तो फिर तो डिग्री धीरे-धीरे कम होगी ना। जरी-4। अरे बच्चे, मिनट बाई मिनट तुम्हारी जो भी एक्टिविटी है सारी दुनिया की मिनट बाई मिनट कम होती जाएगी। क्या? आत्मा की शक्ति जो अभी योग बल भरा है, जो पवित्रता की पावर भरेंगे, धीरे-धीरे खत्म होती जाएगी।

देखो, अभी घड़ी में कितना बजा है? ये देखो, अभी 1 मिनट पास होगा तो ये टाइम पास हो गया ना। वो लिखते नहीं हैं देखो। अभी 10 बज करके 10 मिनट 5 सेकंड हुए। है ना? अच्छा। फिर 1 मिनट हुए। अभी 10 बजकर 11 मिनट। और कुछ सेकेंड हुए। तो माना ये तो चलती जा रही है। क्या? क्या चलती जा रही है? ये जो दुनिया की घड़ी है ये तो रुकने वाली नहीं है। चलती जा रही है। है ना। सूक्ष्मता से अच्छी तरह से बैठकरके समझाओ। तो ये बरोबर ड्रामा बड़ा आहिस्ते-आहिस्ते टिक-टिक करते जाते हैं। ऐसा टिक-टिक करते जाते-जाते, आज शुक्रवार है, कल फलाना वार होगा। तो ये कल हुआ ना। वो पास होते जाते हैं। तो सेकंड बाइ सेकंड ये पास होते जाते हैं। तभी बाबा कहते हैं जो बीती सेकंड के बाद उसको चितवो नहीं। जो हो गया सो हो गया।

देखो, अभी कितनी मेहनत की बात है। कितना मुख से निकल पड़ते हैं। अरे, ये कितना अच्छा मिलता था। ये मकान, ये दुकान। अच्छा, अरे कितना अच्छा मिला, पास्ट हो गया। अब तुम उसकी बात क्यों करते हो? 16.11.67 की प्रातः क्लास का दसवां पेज। कितनी फुलस्टॉप चाहिए। हँ? घड़ी-घड़ी पास्ट होता जाता है। कोई नुकसान हुआ तो फुलस्टॉप लगाना चाहिए ना। हो गया। पास्ट हुआ। है ना। तो ये ड्रामा का राज़ है। टाइम पास हो जाते हैं, निकल जाते हैं और फिर ये बातें मुख से निकलती हैं अरे, ये मकान, ये दुकान, ये कारखाना हाथ से निकल गया। बहुतों से ऐसी बातें मुंह से निकलती रहती हैं। बाबा से इनसे भी निकल पड़ती हैं। ऐसे नहीं कि इनसे ये बातें नहीं निकलती हैं। ये सभी बातें बाप सुनाते हैं। ये बाबा नहीं सुनाते। ये बाप किसलिए सुनाते करते हैं? किसलिए? एक तो कभी भी कोई बात हो गई है तो जो हो गई सो पास्ट हो गई, उसको फिर जुबान पर नहीं लाओ। नहीं तो जो समझू होगा ना, खड़ा होगा तुम पास्ट की बातचीत, बाबा ने कहा यहां नहीं। बीती को बीती देखो, चितवो नहीं।

तो वो समझू कहेगा तुम ऐसे क्यों करते हो? अब ये करता तो अच्छा था। ऐसे मुख से निकलता है ना। हँ? ये उसी समय कर लेता, तुरंत का तुरंत कर लेता तो अच्छा था। या ये ले लेता तो अच्छा था। ये करता, वो करता। अच्छा, ये दवाई करता था, अगर ये दवाई उस समय मिल जाती तो ये बच जाता। ये ऐसा करता। उसी समय ये दवाई दे देता। अरे, कितनी याद करेंगे। अनेक बातें ऐसे जीवन में होती रहती हैं। और बाबा कहें बीती को चितवो नहीं। आगे और कोई भी आशा मत रखो। दोनों बातें। हँ? जो बीत गया उसको चितवो नहीं। और आगे के लिए कोई आशा रखो नहीं। तुमको लाख चाहिए? करोड़ चाहिए? ये करना है, वो करना है। अरे नहीं, नहीं, नहीं। क्या करो? शरीर निर्वाह के लिए, हँ, काम करते चलो। शरीर निर्वाह क्या? अरे तन पे लपेटने के लिए एक कपड़ा और दो रोटी। हँ? शरीर निर्वाह नहीं होगा? मर जाएगा? नहीं मरेगा। तो जो टाइम मिले उठते-बैठते, चलते-फिरते बाबा को याद करते रहो। यह फुर्ना लगी रहे मेरे विकर्म विनाश हो जावे।

ये बांधलियां मार खाती हैं उनके लिए भी तो डायरेक्शन देते आते हैं ना। बहुत अभी बड़ों के आगे, लाठी के आगे तो झुकना ही पड़ता है ना। तो बहुत नम्रता से, प्यार से बोलो हमारा बाबा ऐसे कहते हैं। मेरे को आवाज आ रही है, अभी भी आ रही है, हम मर जाएंगी, कुछ भी करो, मार डालो, हमारे टुकड़ा-टुकड़ा कर दो भले, हम कभी भी नहीं कहेंगे। तो ऐसे-ऐसे बोलने की युक्ति रचनी चाहिए। युक्तियां सब देखें। समझाते तो रहते हैं ना। कोई मारे तो क्या करो? क्या बताया? हँ? तुम उनके ऊपर फूल चढ़ाओ। फूल चढ़ाओ माने? हँ? मार्केट से फूल खरीद के रखें? अरे नहीं, मीठी-मीठी बातों के फूल चढ़ाओ। समझा ना? रोओ, झूठ बोलो। अगर आंख में आंसू नहीं आवे तो वो, वो भी थोड़ा निकाल करके थोड़ा लगाए लो। मुख में से लगायके लगाय लो। नहीं तो पानी से लगाए लो। हँ? रोओ। समझा ना? तो युक्तियां बहुत चाहिए समझाने के लिए। क्योंकि यही बात कड़ी है ना। क्या? हँ? काम महाशत्रु है। इनको जीतना पड़े। हँ? तो काम; ये काम विकार अपने अंदर होता है कोई दूसरा कोई शत्रु होता है? हां। इनको जीतना पड़े। तो कितनी शीतल हो जानी चाहिए। माताएं हो ना। कोई पुरुष तो नहीं हो दुर्योधन-दुःशासन। किससे, कभी भी किसको न देखें। कभी भी कोई से मिलें नहीं। तो ये तो पिछाड़ी की बात है ना। तभी तो ये बैठकरके हनुमान का दृष्टांत दिया। देखो अडोल रहा। हिला नहीं। तो हनुमान भी तो ये महावीर हैं। है ना? और महावीर कौन है? है ना महावीर। देखो, बहुत महावीर और महावीरनी बैठी हैं। कुमार और कुमारियां। परंतु कोई मनुष्य समझते थोड़े ही हैं जो तुम समझते हो इस मंदिर के लिए। सिवाय तुम्हारे और तो कोई समझते भी नहीं हैं।

रिकॉर्ड बजा। चल उड़ जा रे पंछी अब ये देश हुआ बेगाना। अब लगने का है ना। तो पूरा लगेगा ही। जब कर्मातीत पहले नंबर की होगी तब फिर नंबरवार सब पास हो जाएंगे। नंबरवार कब पास हो जाएगा? जब पहले नंबर की कर्मातीत अवस्था होगी, तो फिर सब नंबरवार पास हो जाएंगे। इम्तेहान जभी पूरा होगा तभी तो वो ट्रांसफर होगा ना। तो वो तो अभी टाइम पड़ा हुआ है। ये बातें तो बच्चा भी समझ सकते हैं। बाकी आफतें आती रहेंगी। और तुमको गुप्त मेहनत करनी है। तो देखो, कोई-कोई सब तुमको पहचानते थोड़े ही हैं कि तुम कौन हो? प्यारे ते प्यारी वस्तु है ना बच्ची। एकदम प्यारे ते प्यारी। क्या देते हैं? देखो, बस, इनसे जास्ती तो तुमको कोई आशा ही रखने की दरकार नहीं है। तुमको आशा किस चीज की रखने की है? क्या चीज की आशा रखनी है? मनमनाभव, मध्याजी भव। मेरे में मन लगाओ। मेरे लिए यजन करो, सेवा करो, यज्ञ सेवा करो। तो बेड़ा पार है। तो दो, ये दो अक्षर हैं मनमनाभव, मध्याजीभव। बेड़ा पार। कहां भक्ति और कहां ये दो अक्षर। अरे, वो भक्ति का तो कितना लंबा-चौड़ा विस्तार है। पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाना और उनके लिए कितना है वशीकरण मंत्र ये। बस, ये तो सिर्फ एक जन्म के लिए है। मनमनाभव का वशीकरण। मामेकम याद करो। अब सोचो तुमने कितने जन्म काटे हैं। कितना समय पास किया है। और बाप तो यहीं आते हैं इस समय में पुरुषोत्तम संगमयुग में। और फिर इस युग में आकरके, छोटे से युग में तुमको क्या से क्या बनाय देते हैं। सभी रूहानी सेंटर्स के ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुल भूषणों को रूहानी बाप व दादा व बच्चों का, सभी सर्विसेबल बच्चों के प्रति, रूहानी बच्चों के प्रति यादप्यार और गुड मॉर्निंग। मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार, गुड मॉर्निंग। ओम शांति। हँ? 30 तारीख?

A morning class dated 16.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the ninth page on Thursday was – This, this world has become a game of ‘bhool-bhulaiyya’ (labyrinth). Otherwise, the hard work involved in becoming pure, because you should work very hard, shouldn’t you? Otherwise, Baba even says – Do not think that someone will be able to sit and do vigorously. Or, or they may say – Achcha, we will go below the Tree and will be able to do something for 6 hours, 5 hours, 8 hours. Arey, you will not be able to do. Why? If you become karmaateet now. What is meant by ‘now’? The topic of 1967 was mentioned. Now, it has been 40-47 years. So, it was told – If you become karmaateet now, if you make vigorous purusharth, then you will leave the body. That cannot be possible at all that someone goes back. How can anyone go back without Myself going there? This will also not happen. That is also told. Someone may try to any extent that I should do this, but he cannot do. This part is not at all there in the drama. Nobody has such part. He may think that I should become karmaateet and run away before time. Nobody can run away before time. Arey, there are chains. How can one run away?

Which chains are there? Hm? Yes.
(Someone said something.) Achcha? There are chains of gold. And of iron? Hm? Are there those of iron as well? Are they double? Arey? What is an iron chain? What is a golden chain? Hm? When you had not entered the path of knowledge at all, you were in iron chains. Even after entering the path of knowledge if you continue to remember the worldly relatives, old relatives of the body, it will be said that you are in chains of iron. Then, when you enter into the alokik Brahmin family, then if you develop attachment in the alokik Brahmin family, then it will be called chains of gold. So, it will be said that there are these chains. Can anyone simply run away? Where will you run away? The topic of running away to which place is being discussed? That someone goes to the Supreme Abode. Hm? You will run away to the abode of souls.

So, the Father sits and explains to the children nicely that children, however He says – Consider yourself to be a soul. And remember the Father. It is not as if the chains will be cut just by considering yourself to be a soul. The chains will be cut by remembering the Father. Baba gives this knowledge only by coming Himself now. Hm? Nobody except Baba can give this knowledge. And then this knowledge is not forever. It is just for the Confluence Age. It will be said Purushottam Sangamyug. Later the new world will be established; you will develop firm practice of becoming constant in soul conscious stage; then you will become deities. But I will not remain sitting here to give knowledge. So, He tells the topic – I give this knowledge to you for the present. What is meant by present? I give for this Purushottam Sangamyug so that you, who have become sinful, could become pure. That is it. Then after becoming pure, you don’t have to become sinful for 2500 years. So, then the degree will decrease gradually, will it not? Little-4. Arey, children, minute by minute all your activity of the entire world will go on decreasing minute by minute. What? The power of the soul, the power of Yoga that has been filled now, the power of purity that you will fill, gradually it will perish.

Look, what is the time now in the clock? Look this, now when one minute will pass, then this time has passed, hasn’t it? Look, they do not write. Now it has been 10 minutes, five seconds past 10 O’clock. Is it not? Achcha. Then one minute passed. Now it is 11 minutes past 10 O’clock. And it has been a few seconds since then. So, it means that this is going on moving. What? What is moving on? This clock of the world is not going to stop. It continues to move. Is it not? Sit and explain nicely in a subtle way. So, this drama rightly moves ahead gradually, tik-tik. It keeps on moving tik-tik; today it’s Friday, tomorrow it will be some other day. So, this is yesterday, isn’t it? That passes on. So, this passes on second by second. Only then does Baba say – Do not think of the second that has passed. Whatever happened is past.

Look, now it is a topic involving such efforts. So many things emerge from the mouth. Arey, this one used to meet so nicely. This house, this shop. Achcha, arey, he met so nicely, he became past. Why do you now talk of him? Tenth page of the morning class dated 16.11.67. Such full stop is required. Hm? Every moment becomes past. A full stop should be applied if a loss occurs, shouldn’t it? It happened. It became past. Is it not? So, this is the secret of the drama. The time goes on passing, slips past and then these topics emerge from the mouth; arey, this house, this shop, this factory slipped away from the hand. Such topics keep on emerging from the mouth of many people. It emerges from the mouth of Baba, this one also. It is not as if these topics do not emerge from this one. The Father narrates all these topics. This Baba does not narrate. Why does this Father narrate? Why? One thing is that whenever anything happens, whatever happened has become past; do not bring it in your speech. Otherwise, the one who is wise, standing, you are speaking of the past; Baba said – Not here. Look at past as past; do not think of it.

So, that wise one will tell – Why do you do like this? Well, it would have been better if I had done this. It emerges like this from the mouth, doesn’t it? Hm? It would have been better if I would have done this at that time only, on the spot. Or it would have been better if had I taken this. I would have done this, I would have done that. Achcha, I was giving this medication, had I got this medicine at that time, then this one would have been saved. I would have done this. I would have given this medicine at that time itself. Arey, how much will I remember. Many such things keep on happening in the life. And Baba says – Do not think of the past. Do not nurture any more desires. Both the topics. Hm? Do not think of the past. And do not nurture any desire for the future. Do you want a lakh? Do you want a crore? I want to do this, I want to do that. Arey, no, no, no. What should you do? Go on working for survival of the body. What survival of the body? Arey, one cloth to cover the body and two roties. Hm? Will the body not survive? Will it die? It will not die. So, whatever time you get, keep on remembering Baba while standing, sitting, walking, moving. You should keep worrying that my sins should be burnt.

These bandhelis suffer beatings; directions are being given for them also, are they not? Now you have to bow before the bigwigs, before the stick, don’t you have to? So, tell very humbly, lovingly that our Baba says like this. I hear a voice; I hear it even now; I will die; do anything, kill me, chop me into pieces, I will never complain. So, you should adopt tact of speaking like this. Look at all the tactics. He keeps on explaining, doesn’t He? What should you do when someone beats you? What has been told? Hm? You shower flowers upon him. What is meant by showering flowers? Hm? Should you buy flowers from the market and keep them? Arey, no, shower the flowers of sweet words. Did you understand? Cry, speak lies. Even if you don’t get tears, cause them to emerge a little and apply. Apply them to your face. Otherwise, apply water. Hm? Cry. Did you understand? So, a lot of tactics are required to explain. It is because this topic itself is strict, isn’t it? What? Hm? Lust is the biggest enemy. You have to conquer it. Hm? So, lust; this vice of lust is within us; is there any other enemy? Yes. It has to be conquered. So, you should become so cool. You are mothers, aren’t you? You are not men, the Duryodhans and Dushasans. Never see anyone. Do not meet anyone. So, this is a topic of the end, isn’t it? Only then He sat and gave the example of Hanuman. Look, he remained unshakeable. He did not shake. So, Hanuman is also this bravest one (Mahavir). Is it not? And who is Mahavir? He is Mahavir, isn’t he? Look, many Mahavirs and Mahavirnis are sitting. Kumars and Kumaris. But human beings do not think of this temple as you think. Nobody except you understands.

A record was played. Chal ud jaa re panchchi ab ye desh hua begana (Fly away O bird, this country has become alien for you). Now it is going to appear so, isn’t it? So, it will appear completely. When the first number will become karmaateet, then all will pass numberwise. When will you pass numberwise? When the first number achieves the karmaateet stage, then all will pass numberwise. When the exam will be over only then will he get transferred, will he not? So, that time is still left. Even a child can understand these topics. But problems will keep on emerging. And you have to make incognito efforts. So, look, does everyone recognize you as to what you are? It is the dearest thing, isn’t it daughter? Completely dearest. What do you give? Look, that is it; there is no need for you to nurture more desires than this. Which thing should you desire? Which thing should you desire for? Manmanaabhav, madhyaajibhav. Focus your mind on Me. Make efforts for Me, do service, do Yagya service. Then your ship will cross over. So, two, these are the two words – Manmanabhav, Madhyaajibhav. The ship will sail across. On the one side is Bhakti and on the other side are these two words. Arey, that Bhakti has such long and wide elaboration. To go from the old world to the new world. And this vashikaran mantra is for that. That is it; this is for just one birth. The vashikaran of Manmanaabhav. Remember Me alone. Now just think how many births have you spent. You have passed so much time. And the Father comes only here at this time in the Purushottam Sangamyug. And then after coming to this Age, He transforms you so much in this small Age. To the Brahma’s mouth born progeny of all the spiritual centers, jewels of the Brahmin clan, from the Spiritual Father and Dada and children, to all the serviceable children, to the spiritual children, remembrance, love and good morning. Remembrance, love, good morning of sweet, sweet, seekiladhey children from the spiritual Father and Dada. Om Shanti. Hm? Is it 30th today?

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2836, दिनांक 31.03.2019
VCD 2836, dated 31.03.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2836-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-15.09
Time- 00.01-15.09


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967. शुक्रवार को दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - बाबा ने समझाया कि तुम अबलाएं, कुब्जाएं, गणिकाएं, फलाने ऐसे-ऐसे को जाकरके बाबा का संदेश दो। बोलो बाबा देखो कहते हैं आओ बच्चे तुम जाकर के गणिकाएं हैं ना उनको जाकरके कुछ समझाओ। बिचारी ये जो वेश्यालय नाम पड़ गया है ना वो इसलिए तो पड़े हैं ना बच्चे, गलियों-गलियों में वैश्यालय लगे पड़े हैं। तो गरीब भी ये ही हैं, अबला भी यही हैं। तो तुम गुप्त से जाकरके ये काम करते रहो जिससे मनुष्य समझ जावें कि ये तो बहुत कुछ अच्छा काम कर रहे हैं। ये सेवा बड़ी अच्छी करती हैं। बाबा ने बहुत दफा समझाया कि सबसे अच्छी सेवा कौन सी है? बस, यही नामीग्रामी वेश्याएं ही हैं। हँ? तो कोशिश कर-करके, बिचारे कोशिश तो करते हैं, तो भी बहुत थोड़ी कोशिश करते हैं। किस बात की? हँ? इन गणिकाओं को, कुब्जाओं को, हँ, वेश्यालय में जो पड़ी हुई हैं वो तो नामीगिरामी हैं। कोशिश कर-करके बिचारे वो थोड़ी कोशिश करते हैं। ये जो बाबा ने प्रदर्शनी और वगैरा-वगैरा किया है ना ये तो इनमें जास्ती ध्यान देते जाते हैं। अरे, वहां भी तो ध्यान देना है कि ऐसे-ऐसे बड़े-बड़े सेंटर निकलें। तो उनको भी कोई कशिश आवे कुछ। वो समझें कि ये तो फलाना जो म्यूजियम बना है ये उनसे ये आए हैं समझाने के लिए।

तो गुप्त, तुम सब बच्चों को गुप्त। रडियां, वार्ता मचाने का भी समय नहीं है बिल्कुल। अभी भी इस समय है ही नहीं। या पे ये शांत से। जो बाप ने समझाया है कि तुम बच्चों को याद का बल है। और ज्ञान को तो बल नहीं कहा जाता है। वो तो पढ़ाई है। ये तो पढ़ाई तो सारे इस भारत में तो क्या सारी दुनिया में कॉलेजों में बहुत निकली हुई है। वो तो पढ़ाते ही रहते हैं। पढ़ाई कोई बड़ी बात नहीं है बच्ची। ना। वर्ल्ड की हिस्ट्री और जाग्राफी। सो तो बाप ही समझाते हैं। क्योंकि मनुष्यों के पास तो प्रूफ और प्रमाण सहित ढाई हजार वर्ष की हिस्ट्री है। उससे पहले की दुनिया की हिस्ट्री तो है ही नहीं। और जो हिस्ट्री है वो भी दुख की दुनिया की हिस्ट्री है। जो सुख की दुनिया बाप स्थापन करके गए थे स्वर्ग वो तो हिस्ट्री किसी के पास है ही नहीं। तो वो हिस्ट्री जाग्राफी आदि से लेकर अंत तक पूरे 5000 वर्ष की बाप ही समझाते हैं। और वो तो सेकंड का काम है।

तुम बच्चे जानते हो कि ये जो भी तकलीफें होती हैं, हं, समझ होती है सो बाबा की याद करने में। ये खुद कहते हो कि बाबा घड़ी-घड़ी हम तो भूल जाते हैं। खुद देखो यहां आते हो, किस लिए आते हो? बाबा के आगे जाएंगे कुछ बाबा सन्मुख होगा तो सन्मुख जाने से नशा चढ़ेगा। बाप के आगे जभी जाएंगे तो वो तो भला होते हैं ना कि बाप के आगे आएंगे तो हम क्रॉउन प्रिंस बनेंगे। अभी बाप तो कोई क्रॉउन प्रिंस नहीं है ना। नहीं। उनके ऊपर तो ताज नहीं है ना। सो भी लेना है डबल क्राउन प्रिंस। अभी तो देखो जानते हो शहजादे होते हैं तो उनको ताज चढ़ाए देते हैं। लाखों, करोड़ों, पदमों खर्च करते हैं। ऐसे मत समझो कि थोड़ा खर्च करते हैं। नहीं। ये जभी क्राउन जब लगाते हैं ना प्रिंस को, सेरिमनी करते हैं, बहुत इनकी सेरिमनी करते हैं। सबसे बड़े ते बड़ी ये है उत्सव क्रॉउन। अभी ये भी तो तुम बच्चे जानते हो कि ये भी जो पाई-पैसे का क्राउन है, कहेंगे पाई-पैसे का है ना क्योंकि वो पवित्रता तो है ही नहीं जिस पवित्रता से दुनिया के सारे काम होते हैं। बाकी है, न है ये ताज सो तो चढ़ाते हैं। तुम बच्चे जानते हो अच्छी तरह से वो पवित्र तो हैं ही नहीं। यही निशानी है। और बाप तुमको यहां पवित्र बनाए रहे हैं क्योंकि तुम जानते हो कि हमको तो डबल सिरताज बनना है। तो पवित्र बनना है। देवताओं को पवित्रता का ताज होता है ना। मस्तक के चारों ओर ताज दिखाया जाता है लाइट का। अभी ताज अगर नहीं आते हैं तो भी पवित्र तो सब रहते हो ना।

ये तो तुम्हारा ये, ये बाप का वर्सा है ना पवित्रता का। तो पवित्र तो बनना ही पड़ेगा। सजाएं भी खा करके ये पिछाड़ी में पवित्र तो जरूर बनेंगे। हां, चाहे कोई प्रजा में जाए, चाहे कोई बनो, कुछ भी बनो। वहां पवित्र तो सबको, पवित्रता का ताज तो सबको होता है। पवित्र जरूर बनेगा ना। पवित्रता के लिए ही तो फिर तुमको ये सजाएं खानी पड़ती है क्योंकि अगर पाप रह जाएंगे तो ये पाप कैसे कटेंगे? पढ़ाई है। हां। और पढ़ाई के लिए कोई सजा तो नहीं है। कभी भी कोई सजा नहीं है। तो जो जितना पढ़े। 17.11.1967 की प्रातः क्लास का तीसरा पेज। तो कोई सजा नहीं है पढ़ाई की। है, न है, ये पतित बने हो उसके लिए सजा है। तो तुम्हारा जोर बिल्कुल ज़ोर जो चलना होता है जो तुमको क्राउन वो ये तो मिलता रहता है। अभी भी मिलता रहता है ताज। और वो तो है ही पतित की निशानी। और वो नई दुनिया में जो निशानी है वो पावन की। वो कहां है यहां?

तो बाप समझाते हैं कि तुम बच्चों को तो याद में ही रहना है क्योंकि जानते हो पढ़ाई कोई इतनी बड़ी बात नहीं है बहुत। पढ़ाई तो देखो ये बच्चियां भी हैं। जो भी आकर पढ़ाते हैं क्योंकि याद की यात्रा जरूर चाहिए। तो यहां तुम आते ही हो इसलिए कि बाबा जो जाएंगे ना तो बाबा सन्मुख है ना। वो तो फिर भी ऊँचे बच्चे हैं, कुमारिया हैं, ब्रह्मा कुमारी हैं, कुमारी हैं। यहां तो खुद बैठे हैं ना मधुबन में बाप। बाप तो घड़ी-घड़ी खेंचेंगे ही कि बच्ची अपन को आत्मा समझो। घड़ी-घड़ी कहेंगे अपन को आत्मा समझो। देही अभिमानी बनो। तो तुम बाप को याद करो तो तुम्हारे पास लाइट का ताज आएगा ही। जितना-जितना याद करेंगे याद के कारण ही लाइट का ताज आएगा। क्योंकि देवता बनते हो ना। अगर, अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो फिर देवता कैसे बनेंगे? और नहीं तो फिर बाबा ने कहा है ना कि राजा, इस दुनिया के राजाएं तो पतित बनते हैं। तो सजा खाएंगे। पद भी तो भ्रष्ट ही रहेंगे। ऊँचा पद तो नहीं पाय सकेंगे। और तुम्हारी जो लाइट है ना पवित्रता कि वो कोई देखने में थोड़ेही आएगी। हँ? वहां भी कुछ ऐसे देखने में थोड़ेही आती है। ये लाइट तो समझने की बात है। समझ के समझ से जितना जो याद की यात्रा में मस्त रहेगा वो ही तो ताज पाएंगे। डबल सिरताज भी तो वो बनेंगे ना। उनके साथ तो वो है ही है क्योंकि ड्रामा के प्लैन अनुसार जब तुम सजा, जब तुम राजा बनते हो सतयुग में तो वहां पवित्रता तो है ही ना बच्चे। जरूर है ही है। तो कोशिश बाकी किसके लिए करें? पवित्र तो बनना ही है। सजा खाकरके भी पवित्र जरूर बनेंगे। वहां कोई भी अपवित्र रह नहीं सकते। अच्छा, तो अभी ताज कैसे प्राप्त हो? तो ताज भी तो पाना होते हैं ना पढ़ाई से। (क्रमशः)

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page on Friday was – Baba has explained that you go and give Baba’s message to the ablas (weaker sex), kubjas (hunch backed ladies), ganikas (prostitutes), etc. Tell them – Look, Baba says, come, children, you go and explain something to the ganikas, will you not? Poor ladies, the name ‘veshyalay’ (brothel) that has been coined has been coined only because of this, children; there are brothels in every lane. So, it is these people who are poor and they are weak as well. So, you go and keep on performing this task in an incognito form so that the human beings understand that these people are doing a lot of good work. These ladies render very good service. Baba has explained many times that which is the best service? That is it; it is these famous prostitutes only. Hm? So, while trying again and again; poor people do try, however they try very little. In which topic? Hm? These Ganikas, kubjas who are living in the brothels are very famous. You should keep on trying; those poor people try a little. Baba has told about exhibitions and other things, hasn’t He, so, they pay more attention to this. Arey, you should pay attention to that place also that such big centers should emerge. So, they should also feel attracted a little. They should understand that this museum that has been built, these people have come from there to explain.

So, incognito; you all children should be incognito. There is no time at all to cry and talk. Even now it is not the time at all. Remain peaceful. The Father has explained that you children have the power of remembrance. And knowledge is not called power. That is an education. This education is imparted not just in this entire India but in the entire world in the colleges. They keep on teaching. Daughter, education is not a big deal. No. The history and geography of the world. The Father alone explains that. It is because human beings have the history of 2500 years with proof. There is no history of the world before that. And the history that they have is a history of the world of sorrows. Nobody has the history of the world of happiness, the heaven that the Father had established and gone. So, the Father Himself explains the entire history, geography of 5000 years from the beginning to the end. And that is a task of one second.

You children know that these difficulties that you face, you understand that you have to remember Baba. You yourselves say that Baba we forget every moment. Look, you come here; why do you come? You will go in front of Baba; if Baba is face to face with you, then the intoxication will increase by meeting Him face to face. When you go in front of the Father, then you feel that if you go in front of the Father you will become crown prince. Well, the Father is not a crown prince, is He? No. There is no crown over Him, is it there? That to you have to obtain double crown prince. Now look, you know that when there are princes, then they are made to wear a crown. They spend lakhs, crores, multimillions. Do not think that they spend a small amount. No. When the Prince is crowned, when they organize the ceremony, they organize a lot of ceremony for this. The biggest festival is of this crown (coronation). Now you children also know that this crown that is worth a pie-paisa; it will be said that this is worth pie-paisa because there is no purity through which all the tasks of the world are accomplished. As such they crown him. You children know nicely that they are not pure. This is the symbol. And the Father is making you pure here because you know that we have to become double crowned. So, we have to become pure. Deities have the crown of purity, don’t they? A crown of light is shown all around the forehead. Now, even if you don’t get the crown, yet you all remain pure, don’t you?

This is your, this is Father’s inheritance of purity, isn’t it? So, you will definitely have to become pure. Even after suffering punishments you will definitely become pure in the end. Yes, some may become praja (subjects), you may become anything, you may become anything. There everyone has the crown of purity. You will definitely become pure, will you not? You have to suffer these punishments only for the sake of purity because if the sins remain then how will these sins be cut? It is a study. Yes. And there is no punishment for the studies. There is no punishment ever. So, it depends on the extent to which anyone studies. Third page of the morning class dated 17.11.1967. So, there is no punishment for studies. It is there, it isn’t there; you have become sinful; the punishment is for that. So, your dominance, your complete dominance which is to take place; you keep on getting this crown. You keep on getting the crown even now. And that is a symbol of sinfulness. And that symbol in the new world is of purity. Does it exist here?

So, the Father explains that you children have to remain in remembrance because you know that the studies are not a very big deal. Look as regards the studies, there are these daughters also. Whoever comes and teaches because the journey of remembrance is definitely required. So, here you come only because Baba who will go, that Baba is face to face with you, isn’t He? However they are higher children, virgins, Brahmakumaris, Kumaris. Here the Father Himself is sitting in Madhuban, isn’t He? The Father will definitely pull every moment that daughter consider yourself to be a soul. He will say every moment that consider yourself to be a soul. Become soul conscious. So, if you remember the Father, then you will definitely get the crown of light. The more you remember; you will get the crown of light because of remembrance only. It is because you become deities, don’t you? If, if you do not become pure, then how will you become deities? And otherwise, Baba has said that the king, the kings of this world become sinful. So, they will suffer punishments. Their posts will also be unrighteous only. They will not be able to achieve a higher post. And your light of purity will not be visible. Hm? Even there it is not visible like this. This light is a thing to be understood. The one who remains immersed in the journey of remembrance by understanding to whatever extent will alone get the crown. They will also become double crowned, will they not? That is with them because as per the drama plan when you become a king in the Golden Age, then children, there is purity there, isn’t it? It is definitely there. So, then for what should we make efforts? You have to definitely become pure. You will definitely become pure even by suffering punishments. Nobody can remain impure there. Achcha, so, how will the crown be received now? So, you have to obtain the crown also through studies, will you not? (Continued)

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VCD 2836, dated 31.03.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2836-Bilingual-Part-2

समय- 15.10-31.45
Time- 15.10-31.45


तो बाबा कहते हैं कि मीठे बच्चे पवित्र तो बनो क्योंकि पवित्र तो बनना ही है क्योंकि क्योंकि वो है पवित्र दुनिया। और वो है छी-छी दुनिया। तो पवित्रता तो तुम सबको छोटे हों, बड़े हों, अगर नहीं बनते हो तो जानते हो कि बरोबर हम अगर पवित्र ना बनेंगे तो भले पवित्रता का ताज फिर भी है तुम्हारे, तुम्हारे पास क्योंकि सजाएं खाकरके तो पवित्र बनना ही पड़ेगा। फिर वो ताज कहां से आएंगे रत्न जड़ित? वो तो फिर पढ़ाई से ही होगा। होगा ना बच्चे। तो पवित्रता, पवित्रता को तो तुम ऐसे ही सजा खाकरके भी पवित्र तो जरूर तुमको बनना ही है। समझा ना? हां, ये है जितनी सजाएं खाएंगे उतना पद भ्रष्ट हो जाएगा। तो वो जो खुशी, अंदरूनी खुशी तो नहीं हुई ना। अभी हम पवित्र न बने, सजाएं खा कर के पवित्र बने, तो वो तो कोई हमारा मान तो नहीं रहा ना। हँ? मोचरा खाके थोड़ा बहुत बाद में कुछ पद मिल जाएगा।

तो नहीं, मान है दोनों बातों में कि हम पढ़ें भी अच्छी तरह से और याद की यात्रा में भी रहें क्योंकि बाप तो पुरुषार्थ फुल कराएंगे ना। हलका तो पुरुषार्थ नहीं कराएंगे। या इतने में ही खुश हो जाएंगे? खुश हो जाएंगे तो कोई हर्जा नहीं है। अच्छा, तो फिर सजाएं खाएंगे। हां, ये तो जरूर है कृष्ण की पुरी में ही तो जाएंगे ना। कृष्ण की पुरी में जाएंगे। पर तुम चाहते तो हो ना कि हम कृष्ण जैसा बनें, नर से नारायण जैसा बनें। तो बनेंगे तो फिर याद चाहिए, बहुत अच्छी याद चाहिए। और याद भी चाहिए, पढ़ाई भी चाहिए। अगर पढ़ाई सिर्फ होगी, याद नहीं होगी तो फिर पवित्र तो नहीं बनेंगे। तो, तो क्या ताज भी तो नहीं मिलेगा ना बच्ची। वो पवित्र नहीं बनेंगे तो सजाएं खाएंगे। ताज कहां मिलेगा?

तो तुम बच्चों को तो रात दिन यही ओना चाहिए कि हम बाबा की याद में रहे। और ये चक्कर भी घूम आएं। और ये जो तुम्हारा चक्कर है ये भी तो बहुत सहज है। कोई मुश्किल बात थोड़े ही है। चक्कर तो जो अभी भी है बच्चियां, तो चक्कर की बात ये बच्चियां बहुत हैं जो कुछ समझाय नहीं सकती हैं। हां, आगे चलकर के समझाने लग पड़ेंगी। क्योंकि कुछ तो सीखती जाएंगी ना। बाबा रोज कहते हैं, जो कुछ नहीं बोलते हैं उनको बुलवाओ। उनको कुछ समझाओ। तो कोई ना कोई को कुछ बोलें। जैसे देखो ये ब्राह्मणियां भी साथ में तो रहती हैं ना। ले आती हैं। तो देखो, ब्राह्मणियों को तो रास्ते पर भी यही धंधा करना पड़ता होता है। कुछ ना कुछ समझाती हुई आवेंगी। जिनको साथ लाना है उनको समझाना पड़े। ऐसे नहीं कि सिर्फ ट्रेन में बैठ जाना है। नहीं। तुम ट्रेन में भी ये सबको कह सकते हो कि याद में रहो बाबा की। ये सब जो बैठे हो यहां ट्रेन में कोई धंधा-धोरी तो नहीं है। हँ? कोई पानी-वानी, खाना-वाना पकाने की बात तो नहीं है। कोई भी घर का काम तो नहीं है। तो जब भी ट्रेन में बैठो तो भी तो ताज के लिए पवित्रता के लिए कुछ ना कुछ पुरुषार्थ तो करना पड़े ना। तो याद में बैठो और बिठाओ।

17.11.1967 की प्रातः क्लास का चौथा पेज। तो बाप तो चाहते हैं, कहते हैं बहुत अच्छा पवित्र बनो। तो पवित्रता में बैठो क्योंकि जितने-जितने तुम पवित्र बनेंगे इतना बाबा कहते हैं ना कि तुम बच्चों को खुशी का पारा बहुत चढ़ता रहेगा। पवित्रता की पावर के आधार पर खुशी का पारा चढ़ेगा, चढ़ता रहेगा। बाबा ने समझाया है ना जब खुशी थी तब सतोप्रधान थे। अभी तमोप्रधान हैं तो इतनी खुशी नहीं है। अच्छा, फिर तुमको खुशी चाहिए? तो जितना ऊपर जाते रहेंगे, जितना ऊपर जाते रहेंगे इतना तुमको खुशी का पारा चढ़ता रहेगा। अभी क्यों नहीं चढ़ता है पूरा खुशी का पारा? क्यों घड़ी-घड़ी भी ये, ये तूफान आते हैं? हां, तूफान तो ज़रूर आएंगे माया के। वो तो छोड़ेंगे तो नहीं। फिर भी देखो हनुमान का मिसाल भी तो दिया हुआ है। इसके ऊपर तो बाप समझाते हैं। देखो, वो कितना अडोल था, कितना अचल था! ये रावण के ये पांच विकार कितना भी तूफान लाएं, अभी रावण तो हो ही नहीं सकते हैं ना बच्चे। ये तो समझ गए हो कि रावण कहाँ से आया वहाँ? तो ज़रूर ये ज्ञान की बातें इस समय की हैं। ये कोई त्रेता की बातें नहीं हैं। नहीं। ये इस समय की बातें हैं।

तो मीठे बच्चों, तुम बच्चों को इतना तो योगयुक्त रहना चाहिए जो कभी भी तूफान आवें ये पांच विकारों के इस समय में क्योंकि वो बातें सब भूल जाओ। जो आखानियां, कहानियां हैं रामायण की, वगैरा-वगैरा की, वो तो सभी भूल जाओ। बाप ने समझाया है कि बच्ची सतयुग, त्रेता में कभी भी ऐसे कोई उपद्रव हुए ही नहीं हैं जो शास्त्रों में लिख दिया है कि वहाँ रावण था, राक्षस था या हिरण्याकश्यप था, हिरण्याक्ष था। ना। कोई कृष्ण को ये सर्प ने डसा है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है बिल्कुल। वो तो है ही, हँ, पक्का स्वर्ग। सतयुग भी और त्रेता भी, दोनों। अच्छा, त्रेता में समझो दो कला कम हैं, बस। बाकि कोई दुख देने वाले राक्षस वहाँ थोड़ेही हैं। तो वो तो, वो तो एकदम ग्रहण लग जाता है ना बच्ची। हँ? त्रेता में तो दो कला कम। चंद्रमा को देखा है बाहर में? हँ? पर दो कला कम कितनी थोड़ी होती है। फिर भी तो देखो रोशनी कैसी अच्छी लगती है। जब चन्द्रमा दो कला कम होता है। और फिर जब-जब बाकि दो कलाएं रहती हैं चन्द्रमा में, सिर्फ दो कलाएं रहती हैं। तो ऐसे समझो तो खाली एक लीक जाकर रह गई। तो फिर कहेंगे अंधियारा हो जाता है। अभी तुम बच्चे जानते हो ये तो है रात-दिन का ये चंद्रमा का। परन्तु तुमको आधा कल्प। हँ? आधा कल्प सुख, आधा कल्प दुख। सुख है तो सुख ही सुख है। और आधा कल्प दुख है तो दुख ही बढ़ता जाता है। सुख तो कम होता जाता है। तो देखो वहाँ थोड़ी लीक जाकर बचती है। तो ये समझो कि बाकि थोड़ी लीक कमती होगी त्रेता में क्योंकि जनम बाइ जनम नीचे डाका तो उतरने होते हैं ना।

तो देखो, ये सीढ़ी कैसी अच्छी बनी हुई है फर्स्टक्लास समझाने के लिए कि भई 84 जनम सो सभी तो नहीं लेंगे ना। हँ? कोई सभी 84 जनम भोगेंगे क्या? हँ? जो इस दुनिया में जो आबादी है मनुष्यों की 700-750 करोड़ वो सब थोड़ेही स्वर्ग में जावेंगे? सिर्फ जो पहले आए हैं, हँ, वो ही शुरुआत में आएंगे। और ये तो जानते हो कि ज्ञान में पहले-पहले थोड़े आए थे या ढ़ेर के ढ़ेर आए थे? थोड़े आए। फिर धीरे-धीरे बढ़ते गए। वो ही शुरुआत में आएंगे और वो नीचे उतरेंगे। अच्छा।

इसी ज्ञान से तुम यहाँ-यहाँ आए हो समझ करके। कोई बाबा नहीं आकरके इन बच्चों को ज्ञान दिया है। नहीं, ये बच्चियों ने ही बैठकरके इनको समझाया है। कलप पहले मुआफिक समझाया है। और ये समझाते तो रहते ही हैं ना बच्चे। तो ये तुम जानते हो कि यहाँ ईश्वरीय मशीनरी है। वो भी दुनिया में सभी मशीनरी हैं। परन्तु ये मशीनरी बड़ी वंडरफुल है। वो भी कोई मशीनरी नहीं। उसको कहेंगे बच्चे क्योंकि वहाँ से तो जो आते जाते हैं ये भी मशीनरी अभी शुरू हुई है क्रिश्चियन्स की। हँ? क्योंकि क्रिश्चियनिटी को बढ़ाने के लिए ये मशीनरी शुरू हुई। जो ये पादरी और ये पादरणियां आई हैं, ये सभी माइयां आईं हैं, जो बैठकरकरके क्रिश्चियन बनाती हैं हिंदुओं को। ये तो अभी शुरू हुआ है। पहले थोड़ेही कोई ऐसा होते हैं। पहले तो तुम जानते हो बच्चे कि जिस-जिस धरम के जो-जो भी आत्माएं हैं वो अपने-अपने समय पर आती हैं आत्म लोक से। कोई भी किसको ऐसे नहीं कहते हैं वहाँ कि तुम क्रिश्चियन बनो। क्यों नहीं कहते? हँ? क्योंकि वहाँ तो जब आती हैं तो सतोप्रधान आत्माएं होती हैं ना। तो सतोप्रधान आत्माएं ये धंधा थोड़ेही करेंगी कि तुम दूसरों के धर्म को कन्वर्ट करो, हँ, और उनसे, उनको खींच-खींच के अपने धर्म में ले आओ? नहीं। कोई भी वो जानते थोड़ेही नहीं थे। ये जो अभी ग्लानि करते हैं सो भी सुन-सुन करके पीछे ग्लानि करते हैं। सो भी तब करते हैं जब ये मशीनरी बनी है क्रिश्चियन्स की क्योंकि जब बहुत लाखों करोड़ों की अंदाज़ में आए हैं ना आत्मलोक से उतरकरके, उसके बाद ये मशीनरी निकालने के लिए और वृद्धि करने के लिए, क्रिश्चियन बनाने के लिए ये निकले हुए हैं। ओमशान्ति। (समाप्त)

So, Baba says that sweet children, become pure because you have to definitely become pure because that [heaven] is a pure world. And that [hell] is a dirty world. So, as regards purity, you all, you may be young, you may be old, if you do not become [pure] then you know that rightly if we do not become pure then however you have the crown of purity because you will certainly have to become pure by suffering punishments. Then how will you get that gem-studded crown? That will be through studies only. It will happen, will it not children? So, as regards purity, purity, you will definitely have to become pure even by suffering punishments. Did you understand? Yes, it is sure that the more punishments you suffer, the lower your post will be. So, there will not be that joy, that inner joy; will it be there? Now if we do not become pure, if we become pure by suffering punishments, then we no longer command any respect, do we? Hm? After suffering punishments you will get some post later.

So, no, there is a respect in both the topics that we should also study well and we should also remain on the journey of remembrance because the Father will enable you to make full purusharth, will He not? He will not enable a lighter purusharth. Or will you feel happy in just this much? If you feel happy, then it doesn’t matter. Achcha, so then you will suffer punishments. Yes, it is sure that you will go to the abode of Krishna only, will you not? You will go to the abode of Krishna. But you want that we should become like Krishna, we should become Narayan from nar (man). So, if you become, then remembrance is required, very good remembrance is required. And remembrance is also required; study is also required. If there is just study, if there is no remembrance, then you will not become pure. Then, then you will not get the crown as well, will you daughter? If you do not become pure, you will suffer punishments. Will you get the crown?

So, the only worry (ona) that you children should have day and night is that we should remain in Baba’s remembrance. And we should also go around this cycle. And your cycle is also very easy. It is not a difficult thing. The cycle exists even now daughters; so, there are many daughters who are unable to explain anything about the topic of the cycle. Yes, in future they will start explaining. It is because they will go on learning something, will they not? Baba says everyday – Make those people to speak who don’t speak anything. Explain something to them so that they tell something to someone or the other. For example, look, these Brahmanis also live with you, don’t they? They bring [people]. So, look, the Brahmanis have to do this business even on the way. They will keep on explaining something or the other while coming. Those who have to be brought along have to be explained. It is not as if you have to just sit in the train. No. You can tell everyone in the train also that you remain in Baba’s remembrance. All of you who are sitting in the train, you don’t have any business here. Hm? There is no topic of water, food, cooking, etc. There is no household work. So, when you sit in the train, you have to make some or the other purusharth for the crown, for purity, will you not? So, sit in remembrance and make others sit.

Fourth page of the morning class dated 17.11.1967. So, the Father desires, says, become pure very nicely. So, sit in purity because the purer you become, Baba says, doesn’t He that the mercury of joy of you children will keep on rising a lot. The mercury of joy will rise; it will keep on rising on the basis of the power of purity. Baba has explained, hasn’t He that when there was joy, you were satopradhan (pure). Now you are tamopradhan (impure), so there is not much joy. Achcha, then do you want joy? So, the higher you move, the higher you go your mercury of joy will keep on rising. Why doesn’t the mercury of joy rise completely now? Why do these storms emerge every moment? Yes, Maya’s storms will definitely come. They will not leave you. However, look, the example of Hanuman has also been given. The Father explains on this. Look, he was so unshakeable, immovable. Howevermany storms these five vices of Ravan may cause to emerge; now Ravan cannot exist [there] at all, can he children? You have understood that how will Ravan emerge there? So, definitely these topics of knowledge are of this time. These are not the topics of the Silver Age. No. These are topics of this time.

So, sweet children, you children should remain very yogyukt (meditative) that whenever the storms of these five vices emerge in this time because you should forget all those topics. The stories of Ramayana, etc.; forget all of them. The Father has explained that daughter no such riots have happened in the Golden Age, Silver Age for which it has been written in the scriptures that there was Ravan there, there was a demon or there was Hiranyakashyap, there was Hiranyaksh. No. Krishna was bitten by this snake. No such thing has happened at all. That is a firm heaven. Golden Age as well as Silver Age, both. Achcha, there are two celestial degrees less in the Silver Age; that is it. There are no sorrow-causing demons there. So, daughter you get eclipsed suddenly, don’t you? Hm? There are two celestial degrees less in the Silver Age. Have you seen the Moon outside? Hm? But two celestial degrees less is very little. However, look, its light appears so nice when the Moon has two celestial degrees less. And then when just two celestial degrees remain in the Moon, only two celestial degrees remain. So, just think that one line remains. So, then it will be said that it becomes dark. Now you children know that this is day and night of the Moon. But for you it is half a Kalpa. Hm? Happiness for half a Kalpa and sorrows for half a Kalpa. When there is happiness, there is only happiness. And when there are sorrows for half a Kalpa, then the sorrows keep on increasing. The happiness goes on decreasing. So, look, a little line remains there. So, understand that a line decreases in the Silver Age because you have to come down step by step, birth by birth, will you not?

So, look, this ladder has been made such first class in order to explain that brother everyone will not get 84 births, will they? Hm? Will everyone get 84 births? Hm? The population of the human beings in this world consisting of 700-750 crores, will all of them go to heaven? Only those who have come first will come in the beginning. And you know that had very few entered the path of knowledge in the beginning or had numerous people entered? Then they started increasing gradually. They alone will come in the beginning and they will go down. Achcha.

You have come here, here only by understanding this knowledge. Baba did not come and give knowledge to these children. No, it is these daughters who sat and explained to them. They have explained like the Kalpa ago. And they keep on explaining, don’t they children? So, you know that here it is a Godly machinery. In that world also there are all machineries. But this machinery is very wonderful. That is also not machinery. That will be called children because whoever keeps on coming from there; this machinery (missionary) of the Christians has also started now. Hm? It is because this machinery has started for the growth of Christianity. These Fathers and Sisters who have come, all these ladies who have come who sit and convert Hindus to Christians. This has started now. Did any such thing used to happen in the past? Children, first you know that to whichever religion all the souls belong, they come at their time from the Soul World. Nobody tells anyone there that you become Christian. Why don’t they say? Hm? It is because when they come there, then they are satopradhan (pure) souls, aren’t they? So, will the satopradhan souls do this business that you convert from others’ religion and pull them into your religion? No. They did not know. This defamation that they do now, that too, they defame after listening. That too they do when this machinery of Christians has been formed because when they have come down from the Soul World in lakhs and crores, after that in order to cause this machinery to emerge and in order to grow in numberwise, these people have emerged to make others Christians. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2837, दिनांक 01.04.2019
VCD 2837, dated 01.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2837-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.14
Time- 00.01-19.14


आज का प्रातः क्लास है – 17.11.1967. शुक्रवार। ओमशान्ति। रूहानी बच्चों को रूहानी बाप बैठकरके समझाते हैं। पहले ही बता देते हैं। माना जिस्मानी बच्चों को या जिस्म की याद में रहने वाले बच्चों को नहीं समझाते। रूहानी बच्चों को समझाते हैं और समझाने वाला भी रूहानी बाप है। ऐसे नहीं कि जिस जिस्मानी बाप में प्रवेश करते हैं वो बैठकरके समझाते हैं। तो पक्का कर देना चाहिए ना दोनों बातें। क्या? कि समझाने वाला भी रूहानी बाप है और समझने वाले भी रूहानी बच्चे हैं। तो ये बात रोज़ क्यों बोलना होता है? हँ? क्योंकि बच्चे रोज़ भूल जाते हैं। रोज संशय आता है इन दोनों बातों पे, हँ, कि जो रूहों का बाप है वो जिस्मानी बाप में क्यों आते हैं? और जिस्मानी बाप को पक्का कैसे किया जाए कि ये ही जिस्मानी बाप है? भले बाबा समझाते हैं तो ये भी समझाते हैं कि जो जिस्मानी बाप है उसकी क्या-क्या पहचान है? मुरली में तो सब बताते हैं ना क्योंकि ये मुरली छपती है बच्चों के लिए। कौनसे बच्चों के लिए? वो ही रूहानी बच्चों के लिए। अब पढ़ेगा तो कोई भी। वो जिस्मानी भी पढ़ेगा। रूह की स्टेज में रहने वाला बच्चा होगा वो भी पढ़ेगा। कोई भी पढ़ेगा।

तो वो समझेंगे कि सभी आत्माओं का जो बाप है, सभी रूहों का बाप है, वो ही बैठकरके इनको पढ़ाते हैं। इनको माने किनको? हँ? रूहानी बच्चों को जो अपन को रूह समझते हैं। देह समझना; अभी बुद्धि में बैठ रहा है कि हम देह नहीं हैं। तो इन रूहों को पढ़ाते हैं। समझते हैं कि भृकुटि के बीच में हम ज्योति आत्मा रूह हैं। कहते हैं, हाँ, भृकुटि में बैठकरके इस शरीर को, इस शरीर की इन्द्रियों को चलाते हैं। तो वो रूह पढ़ते हैं। क्योंकि यूं तो है, गीता में भी है, भगवानुवाच है ना। भगवान ने बोला; क्या? बोला कि अणु से भी अणु रूप है। बाप है, वो अणु रूप है। अणु कितना छोटा होता है! उससे भी अणु रूप! अणोणीयांसम अनुस्मरेत यः। तो बाप जैसा होगा तो बच्चे भी वैसे ही अणु रूप होंगे। सांप का बच्चा सांप जैसा लंबा, हाथी का बच्चा हाथी जैसा मोटा-ताजा। चींटी का बच्चा चींटी जैसा। तो रूप तो बाप और बच्चे का एक ही जैसा होता है ना।

तो गीता में भगवानुवाच तो है। और जब भगवानुवाच है तो वो समझते हैं कि श्री कृष्ण भगवान है। कौन? दुनियावाले मनुष्य हैं वो समझते हैं श्री कृष्ण भगवान है। हँ? ये थोड़ेही समझते हैं कि भगवान कोई निराकार है। और वो निराकार कोई साकार में प्रवेश करके फिर बताते हैं, समझाते हैं, सुनाते हैं। वो श्री कृष्ण भगवान 16 कला संपूर्ण को समझ लेते हैं। जो शास्त्रों में बताया है कि नर अर्जुन को 16 कला संपूर्ण नारायण बनाया भगवान ने। तो नारायण तो बड़ा रूप होता है ना। श्री कृष्ण तो छोटा बच्चा मन्दिरों में दिखाया जाता है। तो उसे छोटे बच्चे को भगवान समझते हैं। तो ये बातें जो मुंझान पैदा करती हैं बच्चों को इसलिए ये घड़ी-घड़ी समझाते हैं बच्चों को; क्या? कोई पूछे – ये रोज़-रोज़ क्यों समझाते हैं रूहानी बाप रूहानी बैठ बच्चों को समझाते हैं? तो बताया इसीलिए घड़ी-घड़ी समझाते हैं बच्चों को कि हे रूहानी बच्चों, रूहानी बाप बैठकरके समझाते हैं। कोई श्री कृष्ण, कोई बच्चा नहीं समझाता है। बच्चा तो बच्चा बुद्धि। वो कैसे समझाएगा? हँ? बच्चे तो सुनते हैं। और जो सुनते हैं सो ही सुनाते हैं। छोटे बच्चे होते हैं ना स्कूल में। जो टीचर सुनाता है उसको सुनाय देते हैं। हाँ। रट लेते हैं। बाकि बात की गहराई को समझते नहीं हैं, न समझाते हैं।

तो बाप बैठके रूहानी बच्चों को समझाते हैं कि अभी कृष्ण तो ऐसा नहीं कहेंगे। क्या? कैसा नहीं कहेंगे? हँ? कि मैं रूहों का बाप हूँ क्योंकि उनको तो अपना शरीर है ना। और बच्चे के रूप में दिखाते हैं। मन्दिर में पूजा करते हैं तो बच्चे के रूप में पूजा करते हैं ना कि बड़े रूप में पूजा होती है? बच्चे के रूप में पूजा होती है। तो ज़रूर है कि बच्चा ज्यादा पवित्र होगा। बच्चे को वैसे भी महात्मा कहते हैं। बड़े होते हैं तो फिर, हां, तो फिर सुख भोगने की लालसा आती है। हँ? तो जो नारायण 16 कला संपूर्ण है देखो, चित्र में दिखाया ना। क्या? कि सतयुग में जो नारायण बनते हैं वो पहले तो श्री कृष्ण बच्चा है ना छोटा, नीचे खड़ा हुआ। हँ? और बड़े होते हैं तो फिर धीरे-धीरे किशोर अवस्था शुरू हुई तो वो एक-दूसरे को देखना शुरू कर देते हैं। हँ।

तो बताया कि कृष्ण ऐसे नहीं कह सकेंगे। क्या? रूहानी बच्चों। वो तो खुद ही बच्चा है। वो कैसे कहेगा? नहीं। क्योंकि वो रूहानी बाप तो कहते ही नहीं हैं। हँ? न कोई वो है रूहानी बाप। कृष्ण को कोई रूहानी बाप कहते हैं? नहीं। है भी नहीं। और न वो ही रूहानी बाप ज्ञान का सागर है। श्री कृष्ण जो है वो कोई ज्ञान का सागर है क्या? नहीं। इसलिए रोज़-रोज़ इसको कहना होता है। किसको? हँ? किसको कहना होता है? हाँ। इसको माना कि वो जो कृष्ण वाली आत्मा है ना जिसको साक्षात्कार हुए तो ये पक्का समझ के बैठा कि मैं सतयुग में कृष्ण बनूंगा। हँ? और सफेदपोश ब्रह्मा का साक्षात्कार हुआ तो उसको समझाया गया तो उसकी बुद्धि में पक्का बैठ गया कि इस जनम में मुझे ब्रह्मा सफेदपोश का पार्ट बजाना है। तो ये बच्चाबुद्धि है। यहाँ की यादगार है शास्त्रों में। क्या? बच्चे के रूप में कृष्ण की पूजा होती है।

तो रोज़-रोज़ इसको कहना होता है पहले। किसको कहता है पहले? कि तुम रूह हो; देहभान में घड़ी-घड़ी आना बंद कर दो। इसको कहना होता है क्योंकि कोई न मुरली किस जैसी; तो उसमें पहले ही पहले ये लिखा हुआ होगा; हँ? क्या लिखा हुआ होगा? कि रूहानी बाप रूहानी बच्चों को बैठ समझाते हैं। तो वो लोग ऐसे समझेंगे कि इनको बाप समझाते हैं। कौन लोग समझेंगे? कोई दुनियावाले होंगे नए-नए आने वाले तो वो समझेंगे कि इनको बाप समझाते हैं। रूहानी बाप समझाते हैं। क्योंकि एक दफा आगे भी ऐसे हुआ। क्या हुआ था? हुआ था ना बच्चे कि बाप ने कुछ चीन के बनिस्बत में कुछ लिखा था तो आकरके जांच किया था कि भई आप ये चीन के बारे में, क्या उनके साथ कुछ ताल्लुक है आपका? अभी बच्चे दुनिया में तो कोई भी नहीं जानते हैं कि इनको रूहानी बाप रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। दुनिया तो कोई भी नहीं जानती है सिवाय तुम्हारे। तुम्हारे में भी फिर नंबरवार हैं; क्या? कोई को ज्यादा याद रहता है कि हम रूहानी बच्चे हैं, ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं, भृकुटि के मध्य में बैठी है आत्मा और शरीर को, शरीर के द्वारा काम कराती है। तो सबको बुद्धि में थोड़ेही बैठा रहता है हर समय? तो सब नंबरवार हैं। और नंबरवार ये जानते हैं कि बरोबर हमको बाप पढ़ाते हैं। रूहानी बाप पढ़ाते हैं।

ये विचार करने का है कि देखो कौन पढ़ाते हैं? बाप पढ़ाते हैं। तो कोई जिस्मानी बाप थोड़ेही पढ़ाते हैं? ये तो जिस्मानी में रूहानी बाप पढ़ाते हैं। हँ? ये जो याद आती है तो डुकायरून हो जाते हैं। हँ? रोमांच खड़े हो जाते हैं। ये याद सिर्फ आने की है कि बाबा हमको पढ़ाते हैं। क्या याद आने की है? कि पढ़ाने वाला रूहों का बाप नहीं है। कि रूहों का बाप अकेला रूह बनके पढ़ाता है। नहीं। वो साकार तन में प्रवेश करते हैं तो बाबा कहा जाता है। क्यों? क्योंकि रूह भी है और साकार भी है। तो कोई भी संबंध बनते हैं। हाँ, बाबा का संबंध बहुत प्यारा है। क्योंकि बाबा से प्राप्ति ज्यादा होती है। क्यों? अरे, दुनिया में भी जितने संबंध हैं उन संबंधों में कोई कहेगा, एं, बाप से ज्यादा प्राप्ति होती है, वर्सा मिलता है। अरे, बाप नाराज़ हो जाए, वर्सा न दे, फारकती दे दे तो? तो देगा? नहीं देगा। लेकिन बाबा का वर्सा, बाबा का वर्सा तो जरूर मिलता है।

तो ये तुम्हारी बुद्धि में बैठता है कि बाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। क्या? ऐसे नहीं कहेंगे कि रूहों का बाप शिव ज्योतिबिन्दु पढ़ाते हैं। नहीं। वो शिव ज्योतिबिन्दु साकार तन में आकरके; कैसे तन में? कोई बच्चाबुद्धि में नहीं। बच्चे में नहीं, नौजवान में नहीं, बूढ़े तन में आकरके पढ़ाते हैं। वानप्रस्थ अवस्था में प्रवेश करते हैं। तो उसको बाबा ही कहेंगे ना। बाबा हमको पढ़ाते हैं। तो ये तो खुशी चढ़ जानी चाहिए। क्या? क्या खुशी चढ़ जानी चाहिए? कि हमको पढ़ाने वाला कोई हद का बाप नहीं है। हमको पढ़ाने वाला तो बेहद का बाबा है, रूहानी बाप है। भले रूहानी बाप है लेकिन रूह बने हुए थोड़े ही पढ़ाते हैं? वो रूह भी साकार मनुष्य तन में, वृद्ध तन में आकरके पढ़ाते हैं।

तो बाबा पढ़ाते हैं। और वो बेहद का बाबा हमको बेहद की वर्सा देते हैं। हद का वर्सा नहीं, हाँ, कि भई एक जनम का वर्सा देते हैं। नहीं। बेहद का वर्सा, जन्म-जन्मान्तर का वर्सा मिलता है। परन्तु वो खुशी तो स्थायी बच्चे जानते हैं। हँ? कौनसे बच्चे? जो स्थायी रूहानी स्टेज में रहते हैं, रूह की स्मृति में रहते हैं उनको ये खुशी स्थायी रहती है। तो वो सदाकाल तो कोई उनको नहीं रहती है। रहती है? नहीं। क्यों नहीं रहती है? हँ? क्योंकि कई जन्म से देह में जन्म लेते आए हैं; शरीर छोड़ते आए। बार-बार देह का जन्म लिया। बार-बार देह में अटैचमेन्ट होता है। हँ? और जब शरीर छोड़ते हैं तो बहुत तकलीफ, मरने का दुख अनुभव करते हैं। क्योंकि लगाव लग गया ना शरीर से। हाँ। तो कभी न कभी कोई मुझारे में रहते हैं। क्या? मुझान होती रहती है कि दुनियावी इन बातों में मुंझ पड़ते हैं। किन बातों में? हँ? जो दुनियावी लोगों का संग होता है ना तो उनका रंग लगता है और वो नहीं समझते हैं तो वो अपनी दलील बताते हैं। तो दुनियावी लोग मुंझ पड़ते हैं। वो इनको हिलाय देते हैं। अगर ये याद आते रहे हरदम; क्या? कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं, भृकुटि के मध्य में बैठी हुई जो इस शरीर रूपी यंत्र को चलाते हैं। क्योंकि जो है भी वास्तव में राइट बात। क्या? ये शरीर जो है वो तो एक यंत्र है। और यंत्र दुनिया में कोई हमेशा रहता है क्या? आज है; कल? कल सड़ जाएगा, खराब हो जाएगा, जंक लग जाएगी। हाँ। तो ये भी वास्तव में राइट बात है कि तुमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं और पढ़ने वाले भी तुम, हँ, रूहानी बच्चे हो। हाँ। बच्चे भी रूहानी बेहद के और बाप भी बेहद का रूहानी। और आकरके क्या पढ़ाते हैं? पढ़ाते भी हैं सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का बेहद का राज़ समझाते हैं।

Today’s morning class is dated 17.11.1967. Friday. Om Shanti. The Spiritual Father sits and explains to the spiritual children. He tells beforehand. It means that He does not explain to the physical children or the children who remain in the remembrance of the body. He explains to the spiritual children and the one who explains is also the spiritual Father. It is not as if the physical Father in whom He enters, that Father sits and explains. So, you should firm up both these topics, shouldn’t you? What? That the one who explains is also the Spiritual Father and those who understand are also spiritual children. So, why is this topic needed to be spoken every day? Hm? It is because children forget every day. They get doubt on both these topics that why does the Father of souls come in the physical Father? And how can we firmly decide about the physical Father that this alone is the physical Father? Although Baba explains, and He also explains as to what is the indication of the physical Father? He tells everything in the Murli because this Murli is printed for the children. For which children? For the same spiritual children. Well, anyone will study. That physical one will also study. If there is a child who remains in the stage of the soul will also study. Anyone will study.

So, they will understand that the Father of all the souls, the Father of all the souls Himself sits and teaches to these. ‘These’ refers to whom? Hm? The spiritual children who consider themselves to be souls. Considering oneself to be a body; now it is sitting in the intellect that we are not a body. So, He teaches these souls. You think that we are light-form souls in the middle of the bhrikuti (in the center of the forehead between the eyebrows). They say, yes, we sit in the bhrikuti and run this body, the organs of this body. So, those souls study. It is because it is written in the Gita also; there is ‘Bhagwaanuwaach’, isn’t it? God spoke; what? He said that He is minuter than an atom. The Father is in the form of an atom. An atom is so small. Smaller than that atomic form! Anoneeyaamsam anusmaret yah. So, as is the Father, so the children will also be in the form of an atom. A snake’s offspring will be long like a snake. An elephant’s offspring will be fat and sturdy like an elephant. An ant’s offspring will be like an ant. So, the form of the Father and the child is alike only, isn’t it?

So, there is ‘Bhagwaanuwaach’ (God’s word) in the Gita. And when God speaks then they think that Shri Krishna is God. Who? People of the world think that Shri Krishna is God. Hm? Do they think that God is incorporeal? And that incorporeal enters in a corporeal and then tells, explains, narrates. They consider the one who is perfect in 16 celestial degrees as God Shri Krishna. It has been mentioned in the scriptures that God transformed man Arjun into Narayan, perfect in 16 celestial degrees. So, Narayan has a grown-up form, doesn’t he? Shri Krishna is shown as a small child in the temples. So, they consider that small child as God. So, these topics create confusion among the children; this is why this is explained again and again to the children. What? Someone may ask – Why does He explain this every day that the Spiritual Father sits and explains to the children? So, it was told that He explains again and again to the children that O spiritual children, the Spiritual Father sits and explains. Shri Krishna a child doesn’t explain. Child has a child-like intellect. How will he explain? Hm? Children listen. And they narrate whatever they listen. There are small children in the school. They narrate whatever the teacher narrates. Yes. They learn by heart. But they neither understand nor explain the depth of the topic.

So, the Father sits and explains to the spiritual children that now Krishna will not say like this. What? What will he not say? Hm? That I am the Father of souls because he has a body of his own, doesn’t he? And he is shown in the form of a child. When they worship him in the temples, then do they worship him in the form of a child or in a grown-up form? He is worshipped in the form of a child. So, it is sure that a child will be purer. Even otherwise, a child is called a mahatma (saint). When they grow up, yes, then they get the desire to enjoy pleasures. Hm? So, look, the Narayan who is perfect in 16 celestial degrees; he has been shown in the picture, hasn’t he been? What? That the one who becomes Narayan in the Golden Age is initially a small child Shri Krishna, isn’t he? The one, who is standing below. Hm? And when he grows up, then gradually, when the adolescent stage begins, then they start looking at each other. Hm.

So, it was told that Krishna will not be able to say like this. What? Spiritual children. He himself is a child. How will he say? No. It is because they do not call him the spiritual Father at all. Hm? Neither is he a spiritual Father. Does anyone call Krishna a spiritual Father? No. He is not that as well. And neither is that spiritual Father an ocean of knowledge. Is Shri Krishna an ocean of knowledge? No. This is why this one has to say every day. Who? Hm? Who has to say? Yes. This one means the soul of Krishna who had visions sat with the firm belief that I will become Krishna in the Golden Age. Hm? And when he had the vision of the white-robed Brahma, then he was explained; then it sat firmly in his intellect that in this birth I have to play the part of white-robed Brahma. So, this one has a child-like intellect. There is a memorial of this place in the scriptures. What? Krishna is worshipped in the form of a child.

So, this one has to be told this first every day. Whom does He say first? That you are a soul; stop becoming body conscious every moment. This one has to be told because some Murli is of some type; So, it will be written in it in the very beginning itself; hm? What would be written? That the spiritual Father sits and explains to the spiritual children. So, those people will think that the Father explains to these people. Which people will think? If there are people of the world, the newcomers, then they will think that the Father explains to these people. The spiritual Father explains. It is because it happened like this once in the past as well. What happened? Child, it happened that the Father had written something in regard to China, so they came and inquired that brother, you are saying this regarding China; do you have any connection with them? Now children, nobody in the world knows that the Spiritual Father teaches these people, the spiritual children. Nobody except you in the world knows. Even among you there are numberwise; what? Some remember more that we are spiritual children, points of light souls, we souls are sitting in the middle of the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows) and we perform tasks through the body. So, does this sit in the intellect of everyone all the time? So, all are numberwise. And you know this numberwise that rightly the Father teaches us. The Spiritual Father teaches.

You should think that look, who teaches? The Father teaches. So, does any physical Father teach? The spiritual Father within the physical one teaches. Hm? When His thoughts come to the mind then you become dukaayroon. Hm? You horripilate. You should just remember that Baba teaches us. What should you remember? That the teacher is not the Father of souls. That the Father of souls alone teaches as a soul. No. He is called Baba when He enters in a corporeal body. Why? It is because there is a soul as well as a corporeal. Then, any relationship is formed. Yes, Baba’s relationship is very dear. It is because one gets more attainment from Baba. Why? Arey, among all the relationships that exist in the world, someone may say, one gets more attainment, inheritance from the Father. Arey, if the Father becomes angry, does not give you inheritance, if he gives faarkati (cessation of relation between Father and son)? Then, will he give? He will not give. But you definitely get the inheritance of Baba (grandfather).

So, it sits in your intellect that Baba teaches us. ShivBaba teaches us. What? It will not be said that the Father of souls, point of light Shiv teaches. No. That point of light Shiv enters in the corporeal body; in what kind of a body? Not in the one who has a child-like intellect. Not in a child, not in a youth; He comes in an old body and teaches. He enters in a vaanprasth (retired) stage. So, He will be called Baba only, will he not be? Baba teaches us. So, your joy should rise. What? What joy should rise? That our teacher is not a limited Father. Our teacher is unlimited Baba, spiritual Father. Although He is a spiritual Father, yet does He teach in a soul form? That soul also comes in a corporeal human body, in an old body and teaches.

So, Baba teaches. And that unlimited Baba gives us unlimited inheritance. Not a limited inheritance, yes, that brother He gives us the inheritance of one birth. No. You get unlimited inheritance, an inheritance of birth by birth. But children know about that permanent joy. Hm? Which children? Those who remain in the permanent spiritual stage, in the remembrance of the soul have this permanent joy. So, they do not have that forever. Do they? No. Why don’t they have it [permanently]? Hm? It is because since many births you have been getting birth as a body, you have been leaving bodies. You have taken physical birth again and again. You have attachment in the body again and again. Hm? And when you leave the body, then you have a lot of difficulty, you experience sorrow of death. It is because you developed attachment for the body, didn’t you? Yes. So, sometime or the other you remain in some confusion. What? You keep on getting confused that you get confused in these worldly topics. In which topics? Hm? They get coloured by the company of the worldly people and they do not understand; so, they give their arguments. So, the worldly people get confused. They shake them. If you keep on remembering always; what? That we are points of light souls sitting in the middle of the bhrikuti running this body like machine. It is because this actually a right topic. What? This body is a machine. And does a machine exist forever in the world? It exists today; tomorrow? Tomorrow it will rot, spoil, rust. Yes. So, this is also actually a right topic that the unlimited Father teaches you and you the spiritual children are students. Yes. Children are also spiritual, unlimited and the Father is also unlimited, spiritual. And what does He come and teach? What He teaches is also the unlimited secret of the beginning, middle and end of the world.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2838, दिनांक 02.04.2019
VCD 2838, dated 02.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2838-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.27
Time- 00.01-16.27


प्रातः क्लास चल रहा था – 17.11.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के अंत में बात चल रही थी नीचे से छठी लाइन कि जब क्रिश्चियन्स लाखों-करोड़ों की अंदाज़ में आ जाते हैं आत्मलोक से उतरके आत्माएं आती हैं उसके बाद ये मिशिनरी निकलने की वृद्धि करने के लिए, क्रिश्चियन्स बनाने के लिए ये निकले हुए हैं। पहले इतना एड्वर्टाइज़मेन्ट नहीं करते थे, इतना कन्वर्शन नहीं होता था। बाबा कहते हैं तुम बच्चों को तो अभी भविष्य के लिए मनुष्य को देवता बनाने का है नई दुनिया के लिए। तो मनुष्य तो फिर मन-बुद्धि का उपयोग करते हैं। हँ? वो तो राक्षस हैं। वो दुनिया का विनाश करने के लिए दुनिया का सामान तैयार करते हैं एटम बम्ब वगैरा। तो उससे तो अच्छे मनुष्य हुए ना जो मनन-चिंतन-मंथन करें कि क्या करने से सुख होता है, क्या करने से दुख होता है। दुख देने का धंधा करेंगे तो दुख मिलेगा। सुख देने का धंधा करेंगे तो सुख मिलेगा।

तो ये किसी को मालूम नहीं है कि तुम यहाँ पढ़ते हो। क्या पढ़ाई पढ़ते हो? ये शूद्रों को यहाँ ब्राह्मण बनाया जाता है। मनु की औलाद मनन-चिंतन-मंथन करने वाले ब्राह्मण। ज्ञान लेना और ज्ञान देना। ऐसे ब्राह्मण। तो बाप तुमको पढ़ाते हैं। क्या? हाँ, कौनसा बाप? एवर लास्टिंग बाप जिसके बाद और ऊँचा कोई बाप होता ही नहीं। वो बापों का बाप है। हँ? मनुष्य सृष्टि का बाप, हँ, और उसका भी बाप, वो सुप्रीम सोल, जिसका कोई और बाप नहीं। निराकार आत्माओं का बाप है। तो बाप तुमको पढ़ाते हैं। निराकार है तो कैसे पढ़ाते हैं? हाँ, मनुष्य सृष्टि की जो बीजरूप आत्मा है, आदम, एडम, अर्जुन कहते हैं, उसके शरीर रूपी रथ में बैठकरके पढ़ाते हैं। किसलिए पढ़ाते हैं? बिल्कुल ही नई दुनिया के लिए पढ़ाते हैं। इस पुरानी दुनिया को तो बताते हैं कि अब ये दुनिया भसम होने वाली है। ऐसा बारूद इकट्ठा किया हुआ है इन राक्षसों ने। तो खुद भी भस्म हो जाएंगे और दुनिया को भी भसम। इनके अंदर ऐसा गुस्सा भरा हुआ है। क्रोधी हैं अति के।

तो मैं तो आया हूँ फिर भी इस पुरानी दुनिया, दुखदायी दुनिया को बदल करके क्या बनाऊँगा? नई सुखदायी दुनिया बनाऊंगा। इसके लिए आया हूँ। मैं कोई पुरानी दुनिया बनाने के लिए थोड़ेही आया हूँ? हँ? पुरानी चीज़ तो दुखदायी होती है। नई चीज़ सात्विक होती है। दुनिया की हर चीज़ पहले सतोप्रधान, फिर रजोप्रधान, फिर बाद में तमोप्रधान बनती है दुखदायी। तो मैं भी जब आता हूँ इस पुरानी दुनिया में तो नई दुनिया बनाकर जाता हूँ। तो नई दुनिया भी तो देखो, देखते हो ना। बुद्धि की आँख से देखते हो। इन आँखों से थोड़ेही दिखाई पड़ेगी। जरूर इनको महल तो होंगे ना सोने के। हँ? कौनसे महल? पहले तो ये जड़ महल चाहिए नई दुनिया के लिए या संगठन रूपी महल चाहिए आत्माओं के संगठन? हाँ, श्रेष्ठ आत्माओं के संगठन रूपी महल चाहिए। और वो भी देह अभिमान की मिट्टी वालों के नहीं। जो सारी ईंटें जो हैं आत्मा रूपी वो मिट्टी की हों, नहीं; पत्थर की हों, नहीं। कैसी? सोने की। सोना माने? हाँ, वो जितना मोल्ड करना चाहो उतना मोल्ड हो जाए और फिर भी टूटे नहीं। तो उसको कहते हैं, हँ, सोने का संगठन, सोने जैसी आत्माओं का संगठन। सोने के महल। हाँ।

तो तुमने सुना है ना सोने की द्वारिका। हँ? जब वो क्या नाम ये कंसपुरी में थे, कहते हैं, शास्त्रों में कहते हैं ना कि कृष्ण भगवान जब कृष्णपुरी में थे, तो वो जरासिंधी आक्रमण के ऊपर आक्रमण, आक्रमण के ऊपर आक्रमण, लगातार आक्रमण करता रहता था। हँ? हाँ, तो उन्होंने सोचा, अरे, यहाँ रहेंगे, यहाँ राजधानी बनाएंगे, बनाए रखेंगे तो ये तो आक्रमण करते ही रहेंगे, और प्रजा को तकलीफ देता ही रहेगा। कौन? जरासिंधी। जरा माने? पुराने। और सिंधी माने? सिंधी। कहाँ के? पश्चिमी सभ्यता के, हँ, मांसखोर, अंडा, मांस, शराब खाते हैं कि नहीं? हाँ, खाते हैं। या पूर्वी सभ्यता के? नहीं। पश्चिमी सभ्यता के वो जो सिंधी लोग हैं ना, हाँ, तो वो सिंधियों को कहा जाता है जब बाप आते हैं, ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की दुनिया रचते हैं तो सिंधियों से शुरुआत होती है। सिंधी ब्राह्मणों के वो संगठन की शुरुआत करते हैं। तो फिर वो सिंधी ब्राह्मण तो रूप धारण करते हैं जरासिंधी का। और जो भी नए-नए बच्चे पैदा होते हैं उनको मारामार-मारामार, हँ, धरमगुरु बनके बैठते हैं। जैसे धरमगुरु होते हैं ना। खुद बढ़िया-बढ़िया माल खाएंगे और चेलों को बचा-बचाया झूठा माल दे देते हैं। कहेंगे, अरे, शिवोहम्। हम भगवान का रूप हैं। हमारा जूठा खाओगे तो तुम एकदम देवता बन जाओगे। संग का रंग तुमको लगेगा ना। ऐसी पट्टी पढ़ाते हैं।

तो सोने की द्वारिका। कहाँ? समंदर के पार। समंदर के पार चले गए तो वहाँ सोने की द्वारिका बनाई। तुमने सुना है ना कि सोने की द्वारिका बनाई। कि नहीं सुना है? सुना है। तो सोने की द्वारिका भी कहा जाता है। हँ? भई, सोने की लंका भी कहा जाता है। हँ? द्वारिका भी सोने की कहा जाता है। नाम है दो अरिका। दो अरिका माने? हां? अरिका माने लकड़ी। दो लकड़ियां। हँ? और दो लकड़ियों को घिसोगे-घिसोगे तो क्या पैदा होगा? आग पैदा हो जाती है। तो ये नाम रख दिया दो अरिका। लंका को भी कहते हैं सोने की लंका। तो पास्ट तो हो गई ना; द्वारिका भी पास्ट हो गई और वो सोने की लंका भी पास्ट हो गई। वहाँ देखने जाएंगे तो सोने का कोई महल मिलेगा? नहीं मिलेगा।

17.11.1967 की प्रातः क्लास का पांचवां पेज, शुक्रवार। तो जानते हो कि पास्ट में तो बरोबर वहाँ तो वो तुमने खेल भी देखा था। क्या? एक माया मछंदर का खेल, जो वो ध्यान में गया, ऊपर में देखा, वैकुण्ठ में गया; हँ? अब सूक्षम वतन में तो कोई ईंट नहीं मिलती है सोने की। हँ? नहीं। सूक्षम वतन तो है ही सिर्फ साक्षात्कार मिसल। हँ? जैसे सपना देखा, बस, आँख खुली, कुछ भी नहीं। तो ऐसे ही वो सूक्षम वतन की साक्षात्कार की बात जो देखने वाले हैं, भगत ही होंगे ना। हाँ। वो ध्यान में जाते हैं। तो सूक्षम वतन में तो उन्हें कुछ मिलता नहीं। तो फिर समझते हैं कि ये तो वैकुण्ठ ही होगा। हँ? तो ये जाते हैं ध्यान में वैकुण्ठ। हँ? तो देखो वहाँ ईंटें देखीं तो सोने की। ये झोली में डालकरके, हँ, और ध्यान से खोला और ढ़ेर सारी झोली में ईंटें भर ली। और नीचे आए तो झोली खाली। कोई सोने की ईंटें-वींटें नहीं रही। तो देखो ये सब क्या है? ये तो सब साक्षात्कार है। जैसे स्वप्न देखते हैं, हँ, वो स्वप्न तो बंद आँखों से देखते हैं। ये खुली आँखों से साक्षात्कार होते हैं सूक्षम वतन। तो ये भी है ना बच्चे।

तो ये तो समझते हो कि बरोबर सतयुग माना ही सोने का युग। क्या? कैसा युग? सोने का युग। वो सोने का नहीं जो आँख बंद करके सो जाते हो क्लास में भी। हँ? घर्राटा मारना शुरू कर देते। वो नहीं। वो सोने का युग जहाँ सब सच्ची आत्माओं का संगठन होता है। संगठन रूपी महल सच्चे-सच्चे होते हैं। हाँ। कहते भी हैं। उस भारत को क्या कहते हैं? कहते हैं सोने की चिड़िया भारत थी। हाँ। अभी तो फिर कहते हैं कि पत्थर की, भित्तर की, पत्थर की चिड़िया। तो बुद्धि तो कहती है ना। और तुम पुरुषार्थ भी तो कर रहे हो ना अभी। क्या? ऐसी सच्ची दुनिया में सतयुग में जाने के लिए। 16 कला संपूर्ण। ये अभी हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। नहीं तो पुरुषार्थ किसके लिए करते हो? हँ? इस देह के लिए करते हो, पुरानी देह के लिए? नहीं। आत्मा के लिए पुरुषार्थ करते हो। आत्मा सतयुग में जाकरके जन्म लेगी तो नया चोला मिलेगा। कैसा चोला? कंचन काया मिलेगी। कोई शरीर में बीमारी वगैरा नहीं होगी। हाँ। तो वहाँ के लिए पुरुषार्थ करते हो। पुरुषार्थ का मतलब ही है पुरुष माने आत्मा। शरीर रूपी पुरी में आनन्द से शयन करने वाली। हँ? आत्मा के लिए करते हो। कोई देह और देह की इंद्रियों की प्राप्ति के लिए थोड़ेही करते हो? कोई तो बात बुद्धि में होगी ना जो तुम पुरुषार्थ करते हो।

तो ये तो तुम कहते हो कि बाबा हम तो आपके पास आए हुए हैं वर्सा लेने के लिए फिर से। कौनसा वर्सा? इस दुख की दुनिया का वर्सा लेने आए हुए हैं? नहीं। हम तो आपसे वो सुख की दुनिया का वर्सा लेने के लिए आए हैं जहाँ सुख ही सुख होगा, दुख का नाम-निशान नहीं होगा। तो उसे कहते हैं ब्रह्मा का दिन। क्या? दिन में क्या होता है? दिन में तो रोशनी ही रोशनी होती है कि अंधेरा होता है? हँ? अच्छा, तुम कमरा बंद करके बैठ जाओ। खिड़कियां बंदकर दो, पर्दे डाल दो। तो उस कमरे में रोशनी होगी कि नहीं कुछ? अंधेरा हो जाएगा? हाँ, नहीं। रोशनी तो होती है ना। तो दिन में तो रोशनी ही रोशनी। और रात में? रात में अंधेरा ही अंधेरा। तो ये जो दुनिया है पांच हज़ार वर्ष की चार युगों की, चार सीन की, उसमें दो युग हैं ब्रह्मा का दिन जहाँ रोशनी ही रोशनी। आत्मा में रोशनी रहती है ना। अपने को आत्मा समझते हैं। देह थोड़ेही समझते हैं। तो वहाँ सुख ही सुख। क्या? ज्ञान की रोशनी का सार है ना आत्मा में। क्या सार है? मैं आत्मा ज्योतिबिन्दु। तो उस सार का कहें मक्खन कहें, मक्खन खाने से तो ताकत ही मिलती है। तो आत्मा को इतनी ताकत मिलती है कि सुख ही सुख भोगती है। और फिर आधी दुनिया है ब्रह्मा की रात। हाँ। उस रात में क्या होता है? अज्ञान का अंधेरा। हँ? आत्मा की याद ही नहीं रहती है। क्या अज्ञान? बस, देह हूँ। हँ? मैं राजा हूँ, मैं ये हूँ, मैं डॉक्टर हूँ, मैं मिनिस्टर हूँ। ये दुनिया भर का भान रहता है देह का। आत्मा किसी को याद ही नहीं। न दूसरों को देखेंगे आत्मा, न अपन को आत्मिक रूप में देखेंगे।

तो बच्चे कहते हैं बाबा अब हम तो आपके पास आए हुए हैं। आप तो ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं ना। तो हम आपके पास आए हैं। तो आपके संग के रंग में हम भी क्या बन जाएंगे? क्या बनेंगे? ज्योतिबिन्दु आत्मा बनेंगे। हाँ। आत्मा बनेंगे तो ऐसी प्रैक्टिस पक्की हो जाएगी कि फिर हम आत्मा ही बने रहेंगे, देह की स्मृति आएगी ही नहीं। तब हमारी संपूर्ण स्टेज बनेगी तो हम देवता कहे जाएंगे। देवताओं को तो आत्मा की याद रहती है। देह की याद थोड़ेही रहती है। तो देखो, फिर वो ही देवताओं का वर्सा मिल जाएगा।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed at the end of the fourth page in last but sixth line on Friday was that when the Christians come in lakhs and crores, when those souls descend from the Soul World, then these missionaries emerge for growth; these have emerged to make people Christians. Earlier they did not used to do much advertisement; there used not to be much conversion. Baba tells you children that you have to now become deities from human beings for future for the new world. So, then the human beings use their mind and intellect. Hm? They are demons. They prepare a lot of things like atom bombs, etc. for the destruction of the world. So, human beings are better than them who think and churn that what leads to happiness and what leads to sorrows. You will get sorrows if you give sorrows. If you do the business of giving happiness, then you will get happiness.

So, nobody knows that you study here. What is the knowledge that you study? Here the Shudras are transformed into Brahmins. The children of Manu, the Brahmins who think and churn. Giving knowledge and taking knowledge. Such Brahmins. So, the Father teaches you. What? Yes, which Father? The everlasting Father after whom there is no Father higher than Him at all. He is the Father of fathers. Hm? The Father of the human world, and even his Father, that Supreme Soul who does not have any Father. He is the Father of the incorporeal souls. So, the Father teaches you. If He is incorporeal, how does He teach? Yes, the seed-form soul of the human world, who is called Aadam, Adam, Arjun; He sits in his body like Chariot and teaches. Why does He teach? He teaches for the completely new world. He tells about this old world that now this world is going to perish. These demons have collected such explosives. So, they will be burnt themselves and they will burn the world as well. They are full of such anger. They are extremely wrathful.

So, I have come; I will transform this old world, the sorrow-causing world to what kind of a world? I will make it a new, joy-giving world. I have come for this. Have I come to make an old world? Hm? An old thing gives sorrows. A new thing is pure. Everything in the world is initially satopradhan, then rajopradhan; then later it becomes tamopradhan, giver of sorrows. So, even when I come in this old world, then I make it a new world and go. So, look, the new world also; you see, don’t you? You see through the eye of intellect. It will not be visible through these eyes. Definitely they will have palaces of gold. Hm? Which palaces? Are first these non-living palaces required for the new world or are the gathering-like palaces, the gatherings of souls required? Yes, the gathering-like palaces of righteous souls are required. And that too not of those with the soil of body consciousness. All the soul-like bricks should be of clay; no. they should be of stone; no. How should they be? Of gold. What is meant by gold? Yes, they should mould as much as you wish to mould and yet they shouldn’t break. So, that is called a gathering of gold, a gathering of gold-like souls. Palaces of gold. Yes.

So, you have heard about the golden Dwarika, haven’t you? Hm? When these people were in Kanspuri (abode of Kansa), people say, they say in the scriptures, don’t they that when God Krishna was in the abode of Krishna, then that Jarasindhi used to attack him again and again, again and again; he used to keep on attacking. Hm? Yes, so he thought, arey, if we live here, if we build our capital here, if we continue it here, then they will keep on attacking and this one will keep on troubling the subjects. Who? Jarasindhi. What is meant by ‘jaraa’? Old. And what is meant by Sindhi? Sindhi. Of which place? Do the non-vegetarians of the Western Civilization eat eggs, meat, wine or not? Yes, they eat. Or do those from the Eastern Civilization? No. Those Sindhi people of the Western Civilization, yes, those Sindhis are called; when the Father comes, when He creates the world of Brahmins through Brahma, then the beginning is made through the Sindhis. He starts the gathering of the Sindhi Brahmins. So, then those Sindhi Brahmins assume the form of Jaraasindhi. And they sit as the religious gurus of all the new children who are born by beating them. For example there are religious gurus, aren’t there? They themselves eat good food and they give the leftovers to the disciples. They will say, arey, Shivohum (I am Shiv). We are forms of God. If you eat our leftover then you will become deities. You will be coloured by the company, will you not? They teach such lessons.

So, golden Dwarika. Where? Across the ocean. When they went across the ocean, they built the golden Dwarika there. You have heard, haven’t you that the golden Dwarika was built. Or haven’t you heard? You have heard. So, it is called golden Dwarika as well. Hm? Brother, it is called golden Lanka as well. Hm? Dwarika is also said to be of gold. The name is ‘do arika’. What is meant by ‘do arika’? Yes? Arika means wood. Two pieces of wood. Hm? And if you rub two pieces of wood, then what will be produced? Fire is produced. So, this name has been coined as ‘do arika’. Lanka is also called golden Lanka. So, it has become a past, hasn’t it? Dwarika has also become past and that golden Lanka has also become past. If you go there to see, then will you find any golden palace? You will not find.

Fifth page of the morning class dated 17.11.1967, Friday. So, you know that in the past rightly you had seen a drama as well. What? A dramaof Maya-Machchandar; he went into trance, saw up, went to Vaikunth. Hm? Well, you don’t get any golden brick in the Subtle Region. Hm? No. The Subtle Region is only like a vision. Hm? For example, you saw the dream, that is it, you opened the eyes and there is nothing. So, similarly the topic of vision of the Subtle Region, those who see [that] will be devotees only, will they not be? Yes. They go into trance. So, they do not get anything in the Subtle Region. So, then they think that this must be Vaikunth only. Hm? So, these go to Vaikunth in trance. Hm? So, look, there he saw golden bricks. He put them in his jholi (part of upper dress) and opened it carefully and he filled his jholi with numerous bricks. And when he came down [from the trance], his jholi was empty. There were no bricks of gold. So, look, what are all these? All these are visions. For example, you see dreams; you see those dreams with closed eyes. So, these visions of the Subtle Region happen through open eyes. So, this is also there, isn’t it daughter?

So, you feel that rightly Golden Age (Satyug) means Age of gold. What? What kind of Age? Age of gold (sona). Not of that ‘sona’ (sleep) in which you sleep with closed eyes even in the class. Hm? They start snoring. Not that. That Age of gold where there is a gathering of all the true souls. There are true gathering like palaces. Yes. People even say. What do they call that India (Bhaarat)? People say that India was a golden sparrow. Yes. Now they say that it is a sparrow of stone, wall, stone. So, the intellect says, doesn’t it? And you are even making purusharth now, aren’t you? What? In order to go to such true world, the Golden Age. Perfect in 16 celestial degrees. Now we are making purusharth. Otherwise why do you make purusharth? Hm? Do you make for this body, the old body? No. You make purusharth for the soul. When the soul goes to the Golden Age and gets birth then it will get a new dress (body). What kind of a dress? You will get a golden body (kanchankaya). There will not be any disease etc. in the body. Yes. So, you make purusharth for that place. The meaning of purusharth itself is – Purush means soul. The one that rests blissfully in the body like abode. Hm? You make [purusharth] for the soul. Do you make for the body and the attainments of the organs of the body? There will be some topic in the intellect that you make purusharth, isn’t it?

So you say that Baba we have come to you to obtain the inheritance once again. Which inheritance? Have you come to obtain the inheritance of this world of sorrows? No. We have come to obtain the inheritance of that world of happiness where there will be just happiness and there will not be any trace of sorrows. So, that is called Brahma’s day. What? What happens during day time? Is there just light in the day time or is there darkness? Hm? Achcha, you sit within a closed room. Close the windows; pull down the curtains. So, will there be some light in that room or not? Will it become dark? Yes, no. There is some light, isn’t it? So, there is just light in the day time. And in the night? There is just darkness in the night. So, in this world of five thousand years consisting of four Ages, four scenes, two Ages are Brahma’s day where there is just light. There is light in the soul, isn’t it? You consider yourselves to be souls. You don’t consider yourselves to be a body. So, there is just happiness there. What? There is an essence of light of knowledge in the soul. What is the essence? I am a soul, a point of light. So, call it that essence as cream, you get strength by eating that cream. So, the soul gets such power that it experiences just happiness. And then half the world [cycle] is Brahma’s night. Yes. What happens in that night? There is darkness of ignorance. Hm? There is no remembrance of the soul. What ignorance? That is it; I am a body. Hm? I am a king, I am this, I am a doctor, I am a Minister. There is all this world of body consciousness. Nobody remembers the soul. Neither do they see others as a soul, nor do they see themselves in a soul form.

So, children say – Baba, now we have come to You. You are a point of light soul, aren’t You? So, we have come to You. So, what will we too become through the colour of Your company? What will we become? We will become point of light soul. Yes. When you become a soul, then such practice will become firm that then we will remain a soul only; we will not get the thoughts of the body at all. Then, when we achieve the complete stage, then we will be called deities. Deities remember the soul. They do not remember the body. So, look, then you will get the inheritance of the same deities.

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