Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2816, दिनांक 11.03.2019
VCD 2816, dated 11.03.2019
रात्रि क्लास 14.11.1967
Night Class dated 14.11.1967
VCD-2816-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.15
Time- 00.01-17.15


रात्रि क्लास चल रहा था 14.11.1967. बात चल रही थी कि दुनिया में कोई भी विद्वान, पंडित, आचार्य, धरमपिताएं वगैरह कोई भी सृष्टि के आदि, मध्य, अंत को नहीं बताते। सृष्टि के आदि मध्य अंत का ज्ञान तुम बच्चों को यहां मिलता है। तो ये बात समझाने का खिर चाहिए बच्चों में। अभी ये युक्तियां चाहिए ना किसको बताने की। सभी युक्तियां तो कोई बच्चों में हैं नहीं। ‘कोई में नहीं है’ माना ‘ए टू जेड’ कोई में भी नहीं है। लेकिन 67 की बात बताई। फिर कोई बच्चे कोई उलट सुलट, सुलट भी बोल देते हैं। नहीं तो ये जो बाप कहते हैं कि थोड़ा ही बोलो। बहुत बोलने से कुछ ना कुछ उलट-पुलट मुख से निकल जावेगा। तो जास्ती भी बोलने की कोई दरकार नहीं है। क्योंकि वो अगर कहें भी तो शास्त्रार्थ करो, तो उनको बोलो कि यहां तो शास्त्रों की कोई बात ही नहीं है क्योंकि शास्त्र तो सब मनुष्यों के लिखे हुए हैं। कोई भगवान ने तो लिखे नहीं ।

और यहां तो हम कहते हैं भगवान स्वयं साक्षात इस सृष्टि पर आया हुआ है तब जब इस सृष्टि को, पुरानी दुनिया को, दुखदाई दुनिया को नई दुनिया बनाना है। उसको कहा ही जाता है हैविनली गॉड फादर। हैविनली गॉड फादर आवेंगे तो हैविन रचने की युक्ति बतावेंगे ना। तो उसके लिए शास्त्रों की कोई बात नहीं है। और हां, यादगार बना हुआ है भगवत गीता, जिसमें लिखा है - श्रीमद भगवत गीता। भगवत माने भगवान की गाई हुई ज्ञान का गीत। तो गाया तो मुख से जाता है। कोई कागज पे लिखना जरूरी थोड़े ही है। धर्मपिताओं ने भी कागज पे थोड़े ही लिख कर के रख गए। ना कोई शास्त्र बनाया।

तो ये तो ज्ञान का सागर एक ही है। क्या? जिस ज्ञान के सागर में जो भी गर्मी आती है वो सूर्य से आती है। हँ? सागर तो अटैचमेंट वाला है। धरणी से अटैच में होकर रहता है। लेकिन उसमें जो गर्मी आती है जल में, उस गर्मी आने की वजह से संसार में बरसात होती है। तो वो बरसात का निमित्त तो सूर्य ही है। वो जड़ सूर्य है, जड़ सागर है। और ये तो ज्ञान सूर्य, चैतन्य सूर्य है। वो तो स्थूल है, देखने में आता है इन आंखों से। लेकिन ये तो सूक्ष्म है, अव्यक्त है। इन आंखों से व्यक्त नहीं है जो देखा जा सके। तो जैसे आत्मा अव्यक्त है, ऐसे आत्मा का बाप भी, सुप्रीम सोल भी अव्यक्त है। तो वो अव्यक्त बाप जिस में प्रवेश करते हैं वो भी आत्मा है, वो भी चैतन्य आत्मा है, लेकिन ज्ञान सागर कहा जाता है। हँ? सागर और सूर्य में क्या अंतर? बताया ना; क्या? उसमें अटैचमेंट सागर में होता है। और नदियों से भी अटैचमेंट होता है कि नहीं? हां, धरणी से भी अटैचमेंट होता है। तो जो सूर्य है उसमें अटैचमेंट नहीं होता है।

तो ये भी ज्ञान सूर्य है चैतन्य। हँ? इसमें कोई भी प्रकार की आसक्ति नहीं है किसी भी आत्मा के प्रति। भले वो सागर में प्रवेश करता है, हँ, लेकिन सागर में मुकर्रर रूप से आता है, फिर भी उसमें कोई भी सागर के प्रति अटैचमेंट? अटैचमेंट नहीं है। ना सागर के प्रति, मुकर्रर रथ के प्रति अटैचमेंट है और ना जो टेंपरेरी रथ हैं। ब्रह्मा के चार मुख चार दिशाओं में दिखाए जाते हैं। ना उनके प्रति कोई अटैचमेंट है? देखो, प्रूफ देख लो। वो दादा लेखराज ब्रह्मा है। ब्रह्मा है ना। ब्रह्मा के द्वारा ही निराकार बोलेगा ना, वेद वाणी सुनाएगा। वेद माने ज्ञान। ज्ञान का अकूट भंडार है। तो अकूट भंडार वेदों को कहा जाता है भक्ति मार्ग में। तो वो अकूट ज्ञान का जो भंडार है वो तो फिर ब्रह्मा के द्वारा ही सुनाएंगा ना। अब वेद कोई एक नहीं हैं। तो ब्रह्मा भी एक नहीं। वो चार ब्रह्मा हैं तो वेद भी कितने हैं? चार हैं। तो ऐसे नहीं कि उन ब्रह्मा नामधारियों में, हँ, जो टेंपरेरी रथ हैं उन में प्रवेश करता है तो उनमें अटैचमेंट हो जाता है। दुनिया में तो ये देखा जाता है कि परिवार में जो मां-बाप होते हैं उनको अटैचमेंट बड़े बच्चे में होता है या तो सबसे छोटे बच्चे में होता है। होता है ना। हां। तो ऐसी कोई बात नहीं है। उसका तो अटैचमेंट किसी में नहीं होता है।

वो तो आकर के सिर्फ ज्ञान सुनाते हैं। हँ? ज्ञान माने जानकारी देते हैं। इस सृष्टि के आदि, मध्य, अंत की जानकारी देते हैं, अपनी जानकारी देते हैं और मुकर्रर रथ की भी जानकारी देते हैं। पूरी जानकारी देते हैं। क्या? किसके द्वारा? हां, वो ही चार मुखो वाला जो ब्रह्मा है, उनमें से जो मुख्य मुख है, टेंपरेरी रथ है, उसके द्वारा सहज-सहज भाषा में, मीठी-मीठी भाषा में; जैसे भक्ति मार्ग में दिखाते हैं ना। कृष्ण ने; क्या? भगवान ने मुरलिया बजाई। तो मीठी होती कि कड़वी होती? मीठी होती। तो दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में आकर के बड़ी मीठी वाणी चलाई। तो वो आकर के उस मीठी वाणी गीता ज्ञान के द्वारा; ज्ञान ही तो सुनाते हैं ना। हँ? न कि कोई अंधश्रद्धा की, भक्ति की बात सुनाते हैं। भक्ति में तो भागना, भागना। एक इधर भागो, उधर भागो, तीर्थों पर भागो, मंदिर में, मस्जिद में, गिरजाघर में भागो। हँ? जन्म लेते-लेते पता नहीं कहां जन्म लेते हैं भारतवासी। कभी क्रिश्चियन्स में जन्म लेते हैं, कभी मुस्लिम में जन्म लेते हैं, कहीं बौद्धियों में जन्म लेते हैं। तो उनके-उनके मंदिरों में भागना भागते हैं ना। तो बताया ये भक्ति का भागना नहीं सिखाते हैं। ये तो सिखाते हैं कि मन बुद्धि को एकाग्र कैसे करना है और उस एक को पहचानना है जिसमें बुद्धि को एकाग्र करना है। उसके लिए पहले तो ये जरूरी है कि पहले अपनी आत्मा में एकाग्र हो जाओ। क्या? तुम देह नहीं हो। तुम क्या हो? तुम ज्योति बिंदु भृकुटी के मध्य में चमकता हुआ सितारा हो।

तो बताया कि ये ज्ञान, ये जानकारी बताते हैं कि हम अभी ये जानकारी लेकर के पूज्य देवता बन रहे हैं। क्या बन गए? पुजारी बने हुए थे ढाई हजार साल से। हँ? जब से सोमनाथ मंदिर बना तब से पूजा कर रहे थे ना। पहले सतोप्रधान पूजा करते थे, अव्यभिचारी पूजा। बाद में व्यभिचारी पूजा करने लगे। ढेर सारे देवी-देवताओं की पूजा, पेड़ पौधों की पूजा, सांप की पूजा, बंदर की पूजा। हँ? गणेश, वो हाथी की पूजा करने लग पड़े, जानवरों की पूजा करने लग पड़े। तो व्यभिचारी पुजारी हो गए। अभी बाप कहते हैं व्यभिचारी पुजारीपना तो मैं छुड़ाता ही हूं। और साथ-साथ; क्या? अनेकों की पूजा करना भी छुड़ाय देता हूं। और पूजा नाम मात्र भी छुड़ा देता हूं। क्या करना है? अपन को आत्मा समझना है। और आत्मा समझ करके मुझ सुप्रीम सोल बाप, आत्माओं के बाप को पहचानना है कि मैं किस मुकर्रर रथ में, हँ, हां, लगातार पार्ट बजाता हूं। उस एक को याद करना है। तो तुम पूज्य बन जावेंगे। कैसे पूज्य बन जावेंगे? जैसे देवताओं की पूजा होती है। हँ? मंदिरों में जाते हैं तो देवताओं की पूजा करते हैं ना। हां। तो ऐसे, वो तो जड़ चित्र हैं, जड़ मूर्तियां हैं, लेकिन तुम तो चैतन्य देवता बन जावेंगे। कैसे देवताएं? जिन देवताओं की बुद्धि की एकाग्रता अपनी भृकुटी के मध्य में स्टार देखने तक ही रहती है। क्या? उनका कॉन्सेंट्रेशन एकाग्र रहता है। और जन्म-जन्मांतर के लिए रहता है कि एक जन्म के लिए रहता है? जन्म-जन्मांतर। तो मैं आ करके तुमको नर से ऐसा नारायण जैसा देवता बनाता हूं। उन देवताओं में भी नंबरवार हैं। कोई 16 कला संपूर्ण और कोई फिर कला घटते-घटते-घटते 8 कला रह जाती है। ऐसे भी हो जाते हैं।

तो बताया अभी हम न पुजारी हैं; क्या? अब हम कोई की पूजा? पूजा नहीं करते हैं। हँ? पूजा तो करते ही नहीं हैं। हां। किसी की भी पूजा नहीं करते। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) करते हैं? अच्छा? किसी की पूजा नहीं करते? और जिस से लगाव लग जाता है तो उसकी पूजा करनी पड़ती है कि नहीं? हँ? नहीं? अरे, कबूतर का कबूतरी से लगाव लग जाता है, तो आसपास घूमता है कि नहीं? नाच नाचता है कि नहीं? डांस करता है ना? हां। तो बताया, बताया – बच्चे, इस बात को समझना है कि अपन को देखना है कि हम ब्राह्मण बने हैं, ब्रह्मा के बच्चे बने हैं? और कौन सी कुरी के ब्राह्मण बने हैं? नौ कुरियां होती हैं ब्राह्मणों की। हँ? एक से एक ऊंची, एक से एक नीची। तो ऊंची कुरी का ब्राह्मण बनना माना फिर किसी की पूजा? किसी की पूजा नहीं करनी। माना सुप्रीम सोल जिस मुकर्रर रथ में आता है मुकर्रर रूप से उसकी भी पूजा नहीं करनी? हां, उसकी भी पूजा नहीं करनी है। क्या करना है? याद करना है।

तो बताया – 14.11.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। क्यों नहीं पूजा करनी है? क्योंकि भक्ति मार्ग में, शास्त्रों में सब ये ही भक्ति मार्ग का सब लिखा हुआ है कर्मकांड। ये पूजा करो, ये स्वाहा-स्वाहा यज्ञ करो, ये उल्टे लटक जाओ, ये आसन लगाओ, ये नाक में सारी सांस भर लो, वो कुंभक, प्राणायाम चलाओ। ऐसे-ऐसे-ऐसे ये देह के कर्म सिखाते हैं, कर्मकांड सिखाते हैं। कर्म इंद्रियों के कर्म करना सिखाए। तो कर्मकांड तो हम करते ही नहीं हैं। क्या? और ये बात गीता में भी लिखी हुई है। संस्कृत वाली गीता, विद्वान, पंडित, आचार्यों ने जो लिखी है, उसमें भी लिखी है; क्या? अर्जुन को बताया है भगवान ने, कृष्ण भगवान समझ लो। उन्होंने भी बताया है त्रैगुण्या विषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। (गीता 2/45) हे अर्जुन! ये जो वेद हैं ये त्रैगुण्य, 3 गुणों से भरे-पूरे हैं। ये कर्मकांड की बातें सिखाते हैं। क्या? इस शब्द ब्रह्मातिवर्तते। (गीता 6/44) ये शब्द करने वाली दुनिया से पार जाना है। हँ?

हिंदू देखो तो कीर्तन-वीर्तन करते रहते हैं, प्रार्थनाएं करते रहते हैं। मुसलमानों को देखो तो वो चिल्लाते हैं, हँ, अजान मारते हैं। और क्रिश्चियंस को देखो तो वो भी गिरिजाघर में प्रार्थनाएं करते हैं। और फिर वो जो मध्य कलियुगांत में आते हैं, मध्यांत में। कौन? सिक्ख धर्म के। उनके गुरुद्वारे में तो 24 घंटे आवाज की आवाज़ चलती है। तो ये, ये क्या हैं? ये सब देह के धंधे हैं। आवाज मुख से निकलेगी। देह नहीं है? है ना। तो ये देह के धंधे मैं नहीं सिखाता हूं। ये सब कर्मकांड हैं। कर्म इंद्रियों के, चाहे ज्ञान इंद्रियों के और चाहे कर्मेंद्रियों के कर्मकांड हैं। जैसे ब्रह्माकुमार कुमारी हैं। कहेंगे तो ब्रह्माकुमार-कुमारी कि कर्मकांड सब छोड़ दिए। अरे छोड़ दिए तो ये क्लास में बैठ कर के एक-दूसरे को आंखें लड़ाते हैं, हँ, ये आंखों का कार्य नहीं करते? ये कर्मकांड हुआ कि नहीं हुआ? हँ? नहीं हुआ? हां। ये भी तो कर्मकांड हुआ। हां। तो ये कर्मकांड मैं नहीं सिखाता हूं। और मैं तो ब्रह्मा के मुख से जो बोली हुई गीता में, गीता का ज्ञान है, जो मुरली जिसे तुम बच्चे कहते हो उसमें ही बता दिया कि बाप तो बच्चों को बैठ करके सकाश देते हैं। कहते हैं बच्चे आंखें खोल के बैठो। आंखें बंद करके बैठेंगे तो बाप का सकाश कैसे मिलेगा? संग का रंग मिलेगा? नहीं मिलेगा। बाकी तुम बच्चों को ऐसे नहीं करना है। तुम बच्चे तो ऐसे नहीं करेंगे जैसे बाप करते हैं? हां, तो फिर बच्चों ने तो उस बात पर ध्यान ही नहीं दिया। तो बाप कहते हैं ये सब कर्मकांड कर्मेंद्रियों के मैं छुड़ाने के लिए आया हूं।

A night class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed was that no scholar, pundit, acharya, founder of religion, etc. in the world narrates the beginning, middle and end of the world. You children get the knowledge of the beginning, middle, and end of the world here. So, children should have the capacity to explain this topic. Now these tacts of telling someone are required. Any children do not know all the tacts. ‘Any do not know’ means that nobody from A to Z knows. But the topic of 67 was mentioned. Then some children speak inappropriately as well. Otherwise, the Father says that you should speak only a little. If you speak a lot then something inappropriate will emerge from the mouth. So, there is no need to speak more. It is because even if they ask you to argue on the basis of scriptures (shaastraarth), then tell them that there is no topic of scripture here because all the scriptures have been written by the human beings. They haven’t been written by God.

And here we say that God Himself has come to this world in practical when this world, the old world, the sorrow-causing world has to be made a new world. He Himself is called the Heavenly God Father. When the Heavenly God Father comes He will narrate the method of creating heaven, will He not? So, there is no topic of scriptures for that. And yes, the memorial, Bhagwat Gita has been prepared in which it has been written – Shrimad Bhagwat Gita. Bhagwat means the song (geet) of knowledge sung by God (Bhagwaan). So, one sings through the mouth. It is not necessary to write on the paper. Did the founders of religions also write on paper and go? Neither did they write any scripture.

So, this ocean of knowledge is only one. What? Whatever heat comes in the ocean of knowledge comes from the Sun. Hm? The ocean has attachment. It remains attached to the Earth. But the heat that comes in it, in the water, because of that heat rainfall takes place in the world. So, it is the Sun who is instrumental for that rainfall. That is a non-living Sun, non-living ocean. And this is the Sun of Knowledge, the living Sun. That [Sun] is physical; it is visible to these eyes. But this is subtle, unmanifest (Avyakt). He is not visible to these eyes so that he could be seen. So, just as the soul is Avyakt, the Father of the soul, the Supreme Soul is also Avyakt. So, the one in whom that Avyakt Father enters is also a soul, is also a living soul, but he is called the ocean of knowledge. Hm? What is the difference between the ocean and the Sun? It was told, wasn’t it? What? There is attachment in the ocean. And is there attachment with the rivers also or not? Yes, there is attachment with the Earth (land) also. So, there is no attachment in the Sun.

So, this is also the living Sun of Knowledge. Hm? There is no attachment in it for any soul in any manner. Although He enters in the ocean, hm, but He enters in the ocean in a permanent manner, yet is there any attachment towards the ocean? There is no attachment. Neither is there any attachment towards the ocean, towards the permanent Chariot nor towards the temporary chariots. Four heads of Brahma are shown in the four directions, aren’t they? Neither is there any attachment for them? Look, see the proof. There is that Dada Lekhraj Brahma. There is Brahma, isn’t he? It is through Brahma only that the incorporeal will speak, narrate the Vedvani. Ved means knowledge. He is an inexhaustible stock-house of knowledge. So, Vedas are called inexhaustible store-house on the path of Bhakti. So, that inexhaustible stock-house of knowledge will narrate through Brahma only, will he not? Well, the Vedas are not one. So, Brahmas are also not one. When those Brahmas are four, then how many kinds of Vedas are there? There are four. So, it is not as if among those Brahma titleholders, the temporary chariots, when He enters in them, then He develops attachment for them. It is observed in the world that the parents in the family have attachment either for the elder child or in the youngest child. They have, don’t they? Yes. So, it is not so. He does not have any attachment for anyone.

He comes and just narrates the knowledge. Hm? He gives knowledge, i.e. information. He gives the information of the beginning, middle and end of this world, He gives His own information and He gives the information of the permanent Chariot also. He gives complete information. What? Through whom? Yes, the same four headed Brahma, the main head among them, the temporary Chariot, through him, in an easy language, in a sweet language; just as it is shown on the path of Bhakti, isn’t it? Krishna; what? God played the flute. So, is it sweet or bitter? It is sweet. So, He came in the body of Dada Lekhraj Brahma and narrated very sweet Vani. So, He comes and through that sweet Vani, the knowledge of Gita; He narrates knowledge only, doesn’t He? Hm? He doesn’t narrate any topic of blind faith, Bhakti. There is just running and running in Bhakti. Run this side, run that side, run to the pilgrimage centers, run to the temple, to the mosques, to the Churches. Hm? While getting birth one doesn’t know where all the residents of India get birth. Sometimes they get birth among the Christians, sometimes they get birth among the Muslims, and somewhere they get birth among the Buddhists. So, they keep on running to their individual temples, don’t they? So, it was told that He does not teach this running (bhaagna) of Bhakti. He does teach how to concentrate the mind and intellect and one has to recognize that One in whom the soul is to be focussed. What? You are not a body. What are you? You are a point of light, a star shining in the midst of the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows).

So, it was told that He narrates this knowledge, this information that now we are becoming worshipworthy deities by obtaining this information. What did you become? You had become worshippers since 2500 years. Hm? Ever since the temple of Somnath was built, you had been worshipping, hadn’t you? Initially you were doing satopradhan worship, non-adulterous worship. Later on you started doing adulterous worship. You started worshipping numerous deities, worship of trees and plants, worship of snake, worship of monkey. Hm? You started worshipping Ganesh, that elephant. You started worshipping animals. So, you became adulterous worshhippers. Now the Father says I do liberate you from adulterous worship. And along with that; what? I liberate you from the worship of many as well. And I liberate you from worship even for name sake. What should you do? You should consider yourself to be a soul. And after considering yourself to be a soul you have to recognize Me, the Supreme Soul Father, the Father of souls that in which permanent Chariot, hm, yes, I play a part continuously. You have to remember that One. Then you will become worshipworthy. What kind of worshipworthy will you become? Just as deities are worshipped. Hm? When you go to the temples, then you worship the deities, don’t you? Yes. So, in this manner, those are non-living pictures, non-living idols, but you will become living deities. What kind of deities? Such deities whose intellect is focussed on seeing the star in the middle of their bhrikuti. What? Their concentration remains focussed. And does it remain focussed for many births or for one birth? Birth by birth. So, I come and make you a deity like Narayan from a man (nar). Those deities are also numberwise. Some are perfect in 16 celestial degrees and with the decrease in celestial degrees only 8 celestial degrees remain. It becomes like this also.

So, it was told that we are now worshippers (pujari). What? Do we worship anyone now? We don’t worship. Hm? We do not worship at all. Yes. We don’t worship anyone. Hm?
(Someone said something.) Do you [worship]? Achcha? Don’t you worship anyone? And do you have to worship the one with whom you develop attachment or not? Hm? No? Arey, if a he-pigeon develops attachment for a she-pigeon, then does he move around her or not? Does he dance or not? He dances, doesn’t he? Yes. So, it was told, it was told – Children, you have to understand the topic that you have to check yourself that have we become Brahmins, have we become Brahma’s children? And we have become Brahmins of which category? There are nine categories of Brahmins. Hm? One higher than the other, one lower than the other. So, to become a Brahmin of high category means should you worship anyone? You shouldn’t worship anyone. Does it mean that you shouldn’t even worship the permanent Chariot in which the Supreme Soul enters in a permanent manner? Yes, you shouldn’t worship him as well. What should you do? You have to remember.

So, it was told; Second page of the night class dated 14.11.1967. Why shouldn’t you worship? It is because on the path of Bhakti, in all the scriptures everything has been written about the rituals of the path of Bhakti. Do this worship, do this Yagya uttering ‘swaha-swaha’, hang upside down, do this asana, inhale completely through the nose, do that kumbhak, pranayam (breathing exercise). In such ways they teach the actions of the body, they teach rituals. They taught the actions of the organs of action. So, we do not perform any ritual at all. What? And this topic has been written in the Gita also. In the Sanskrit Gita that the scholars, pundits, acharyas (teachers) have written, it has been written even in that; what? God told Arjun; you may consider him to be God Krishna. He too said – Traigunya vishaya veda nistraigunyo bhavaarjun. (Gita 2/45) O Arjun! These Vedas are full of three attributes. They teach these topics of rituals. What? This – Shabd Brahmativartate. (Gita 6/44) You have to go beyond this world that creates sounds. Hm?

Look, the Hindus keep on singing prayers etc., keep on praying. Look at the Muslims; they shout, hm, sing ajaan. And look at the Christians; they too do prayers in the Church. And then those who come in the middle of the end of the Iron Age, in the end of the mid-period. Who? Those from Sikhism. In their Gurudwaras, sound keeps on emerging for 24 hours. So, what is this? All these are businesses of the body. Sound will emerge from the mouth. Is it not a body? It is, isn’t it? So, I do not teach these occupations of the body. All these are rituals. These are rituals of the organs of action, be it the sense organs or the organs of action. For example, there are Brahmakumar-kumaris. The Brahmakumar-kumaris do say that they have left all the rituals. And if they have left, then they exchange glances with each other sitting in the class; hm, don’t they perform the task of the eyes? Isn’t this a ritual or not? Hm? Is it not? Yes. This is also a ritual. Yes. So, I do not teach this ritual. And in the Gita, the knowledge of the Gita uttered through the mouth of Brahma, which you children call as Murli, it has been told in it that the Father sits and gives sakaash to the children. He says that children, sit with your eyes open. If you sit with your eyes closed then how will you get the Father’s sakaash? Will you get the colour of company? You will not. But you children shouldn’t do like this. Will you children do like the Father? Yes, then the children did not pay attention to that topic at all. So, the Father says that I have come to liberate you from all these rituals of the organs of action.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2817, दिनांक 12.03.2019
VCD 2817, dated 12.03.2019
रात्रि क्लास 14.11.1967
Night Class dated 14.11.1967
VCD-2817-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.32
Time: 00.01-18.32


रात्रि क्लास चल रहा था 14.11.1967. दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी - कोई कितना भी जिज्ञासु शास्त्रों की बात करे, तुम उन्हें पहले ही बता दो कि हम तो एक को याद करते हैं। जैसे गीता में लिखा है - मामेकम् याद करो। तो वो एक ही अलफ हमारी बुद्धि में रहता है। और हम अलफ ही जानते हैं। जिस अलफ से फिर हम बच्चों को नंबरवार बादशाही मिलती है। कौन से अलफ को जानते हैं? हँ? हां। अलफ माना खड़ा डंडा। जो आदि से अंत तक पुरुषार्थ में खड़ा रहता है, हिलता नहीं, पड़ नहीं जाता है कि भई गिर जाता हो। नहीं। उसको कहते हैं उर्दू में अलफ। और बे? बे माने पुरुषार्थ करते-करते आखरीन, हँ, क्या होता है? पहले ही पड़ा हुआ था और पूरा ही पड़ जाता है। और फिर बाप आकर उसको, हां, बे। बे कहा जाता है बादशाह। सतयुगी नई दुनिया का बादशाह बनाते हैं। बाकी तो हम कुछ ये पढ़ते ही नहीं हैं शास्त्र वगैरह अभी। हां, पढ़ते तो पहले बहुत थे। जन्म-जन्मांतर पढा। अभी सब छोड़ दिया है पढ़ना। क्योंकि जब ज्ञान का सागर मिल गया तो भक्ति को क्या करेंगे फिर? वो तो गीता में भी लिखा हुआ है ना, हँ, जब सागर मिल जाए तो गड्ढे-गढीचियों में, तालाबों में स्नान कौन करेगा? गंगासागर का स्नान तो प्रसिद्ध है ना। कहते हैं ना - और मेले, और स्नान बार-बार, गंगासागर एक बार। तो ये ज्ञान सागर की बात है।

ये समझाने की बड़ी युक्तियां रहती हैं। सो युक्तियां तो अभी तुम बच्चे सीख रहे हो। हां, ये हो सकता है कि तुम बहुत ही हार भी खाते हो कोई के आगे। हँ? नहीं समझाय सकते हो तो क्या कहेंगे? हार खाई। हां। तुम बहुत ही, एक नहीं हो हार खाने वाले, बहुत हो। हां, क्योंकि शास्त्रवादी तो अपनी ही ट्रां-4 करते ही रहते हैं। क्या? जो बरसात के मेंढक होते हैं ना वो कितनी ट्रां-2 करते हैं। तो वो भी जब ज्ञान बरसात का मौसम आता है, शिव बाप आते हैं, हँ, तो सृष्टि के अंत में ज्ञान की बरसात करते हैं। तो वो अपनी ही ट्रां-4 लगाय देते हैं। तो अभी वहां मेजारिटी और मैनार्टी, बिल्कुल ही मैनार्टी, थोड़ी। हँ? तुम्हारी अभी मैनार्टी है। और उनकी? उनकी, शास्त्रवादियों की मेजोरिटी है। तो तुम भी क्या करो? मेजोरिटी बनो। क्या? थोड़े नहीं। अच्छे से समझाने वाले युक्तिपूर्वक बनो।

अभी तो तुम शिकार करते हो। हँ? किसका शिकार करते हो? कौन ज्यादा निकलते हैं? अरे, जितने भी ज्ञान में आने वाले हैं उनमें ज्यादा संख्या किसकी होती है? कन्याओं की होती है, कुमारों की होती है कि अधरकुमारों की होती है कि अधरकुमारियों की होती है? किसकी ज्यादा संख्या होती है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) कन्याओं की संख्या ज्यादा होती है? अच्छा? जिन्होंने भट्ठी की है, जिनको तुम समझाते हो 7 दिन के कोर्स में, भट्ठी में उनमें कन्याओं की संख्या ज्यादा है? हँ? माताओं की संख्या। माताएं भी दो तरह की। हँ? एक तो होती हैं छोटी-छोटी माताएं, हँ, और दूसरे होती हैं, हां, बुजुर्ग माताएं। तो बताया तुम ज्यादा किसकी संख्या निकालते हो? माताओं की संख्या ज्यादा निकालते हो। जिनको दुनिया वाले क्या समझते हैं? हँ? कुछ भी नहीं समझते। उनको तुम निकालते हो। उनको समझाय लेते हो। हँ? दुनिया वाले कहते हैं अबलाएं। वो तो ठीक है। कलियुग में आके कन्याएं-माताएं क्या बन जाती हैं? अबला या सबला? बाप आकरके सबला बनाते हैं, शिव शक्तियां बनाते हैं। तो अबलाओं को, हँ, तुम कन्याओं को, अबलाओं को, फलाने को, टीरों को।

और पीछे तुमको है पिछाड़ी में आकर के ये सन्यासियों का सामना करना पड़ेगा। क्या? सन्यासियों का सामना भी पिछाड़ी में करना है ना बच्ची। तो इसलिए सन्यासियों से जास्ती वाद-विवाद में नहीं आना चाहिए क्योंकि उनके तो ढेर के ढेर फॉलोअर्स हैं। तो क्या करो? हँ? पहले क्या करो? उनके ढेर के ढेर फॉलोअर्स को पहले निकाल लो। जब उनके फॉलोअर्स टूटेंगे तो अपने आप नाक लटकाएंगे बाद में। नहीं? हां। एक-एक सन्यासी के लाखों फॉलोअर्स होते हैं। क्या? आसाराम बापू के कितने फालोअर्स होंगे? हँ? जब मजमा लगता है तो लाखों की तादाद में इकट्ठे हो जाते हैं। बताया लाख-लाख, दो-दो लाख, तीन-तीन लाख फॉलोअर हैं। किसके? सन्यासियों के। वो जब फॉलोअर के बीच में बैठ करके बोलते हैं ना, हां, तो दूसरी तरफ बोलने को वो ढक देते हैं। हँ? उनका अपना ही ट्रां-3 रहता है। अभी कहां ट्रां-4 शास्त्रों का। और कहाँ तुम्हारा सिर्फ एक अक्षर। क्या? क्या एक अक्षर? कि बाप कहते हैं मामेकम याद करो। मुझे याद करो। तुम मुझ एक को याद करेंगे तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाएगा। एक को याद करेंगे तो। अब कोई कहेगा - ये कहां लिखा हुआ है? तो तुम गीता का श्लोक बता दो। हँ? क्या लिखा हुआ है गीता में? मनमनाभव मध्याजी मामेवनमस्कुरू। हँ? मामेकम याद करो। और किसी को माथा मत टिकाओ। कोई के आगे माथा टिकाने की जरूरत नहीं है। हां। तो गीता में लिखा हुआ है ना। हां। मामेकम याद करो।

तो अभी तुमको कहना पड़ेगा कि ऐसे तो कहां भी और शास्त्रों में नहीं लिखा हुआ है। हां, शिव बाप ने आकर के समझाया है ओरली। हँ? जितने भी धर्मपिताए हैं ओरली ही तो समझाते हैं। न कि कोई बैठ कर के शास्त्र लिखते हैं। तो हमने वो ओरली मुख से सुना और ये ज्ञान फिर प्रायः लोप हो गया। क्या? हमारे सुनने के बाद फिर ये ज्ञान प्रायः लोप हो जाता है। तो बाप कह देते हैं ये ज्ञान प्रायः लोप हो जाता है। जबकि हम कहते हैं सतयुग के आदि में लक्ष्मी नारायण को भी ये ज्ञान नहीं रहा। क्या? 16 कला संपूर्ण जो कृष्ण होता है; सतयुग में तो 16 कला संपूर्ण होते हैं ना। सतयुग होता ही है 16 कला संपूर्ण; त्रेता 14 कला संपूर्ण। तो बताया सतयुग के आदि में ये जो लक्ष्मी-नारायण होते हैं पहली गद्दी पर बैठे हुए, इनको ही कुछ ज्ञान नहीं रहता है। बस। तो चत्थरे करके लगी। करने लग पड़े कि बस। हँ? बहुत चिल्लाते हैं। कहते हैं – बस, तुम ही को ज्ञान है। लक्ष्मी-नारायण को ज्ञान नहीं है। इन बड़े-बड़े देवताओं को ज्ञान नहीं है। तुमको ज्ञान पैदा हो गया। ऐसे चत्थरे लगाने पड़ेंगे, लगाने लग पड़ेंगे। कहेंगे – अरे, ये विश्व का मालिक। उनमें भी ज्ञान नहीं है? हँ? उनमें भी। माने किसकी तरफ इशारा किया? विश्वनाथ शंकर जिसे कहते हैं ना उसकी तरफ इशारा किया कि उसमें भी ज्ञान नहीं है? सिर्फ तुम्हारे ही पास ज्ञान है? पीछे ऐसा करके बहुत तुमको तंग करते हैं। भक्ति मार्ग में बहुत हम वो छी-छी, छी-छी हैं, सो भी सब पक्के हो गए। कि आधा कल्प भक्ति करते-3 एकदम भक्ति मार्ग में पक्के हो गए क्योंकि जो पूजा करते हैं ना वो तो फिर पूजा करने वाले तो पुजारी हुए ना। पूज्य तो कहला ही नहीं सकते। पूज्य काहे से बना जाता है? हँ? पूज्य तो ज्ञान से बना जाता है ना। हां।

14.11.67 की रात्रि क्लास का तीसरा पेज। अभी ज्ञान देने वाला तो तुमको गुप्त बाबा मिला है। क्या कहा? बाप मिला है गुप्त कि बाबा मिला है गुप्त? हँ? अरे आत्मा ही निराकर ज्योति बिंदु होती है तो निराकार होती है, गुप्त होती है। तो आत्मा का बाप प्रत्यक्ष हो जाएगा? वो तो सदा काल। क्या? गुम होके रहता है, अप्रत्यक्ष होके रहता है, पर्दे के पीछे रहता है कि सामने रंगमंच पर आता है? नहीं। तो कौन गुप्त है? हँ? किसको गुप्त बताया? बाबा। माना जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं वो तो गुप्त पार्टधारी है। ये दादा लेखराज ब्रह्मा भी प्रत्यक्ष है। लेकिन जो बाबा है ना शिवबाबा, जिसे हम कहते हैं कि सृष्टि रूपी रंगमंच पर शिवबाबा का सदाकाल पार्ट है वो शिवबाबा ज्ञान देने वाला अभी। अभी गुप्त है या प्रत्यक्ष है? अभी भी गुप्त है और; क्या? चतुर्युगी में भी गुप्त रहता है। अभी सिर्फ अभी संगमयुग में नंबरवार 500-700 करोड़ जानते जावेंगे; कि इकट्ठे जान लेंगे? हँ? धीरे-धीरे जानते जावेंगे।

अभी उनको क्या मालूम कि इस रथ में ये भाग्यशाली रथ है? किस रथ में? हँ? किस रथ में ये भाग्यशाली रथ है? ‘इस’ शब्द बोला, हां, तो रथ की बात बताई कि रथ तो हैं ब्रह्मा के। चार मुख दिखाए जाते हैं, पांच मुख दिखाए जाते हैं। तो जरूर मुख होंगे तो धड़ भी होंगे। क्या राहु होंगे? राहु को मुख दिखाते हैं। धड़ दिखाते हैं? नहीं दिखाते। तो बताया कि जो मुख हैं वो रथ ही हुए ना। परंतु वो सब मुख जो हैं अनेक, वो हैं टेंपरेरी और एक है? एक है मुकर्रर रथ। तो वो ये भाग्यशाली रथ है, भागीरथ है। हँ? इसमें परमपिता परमात्मा आते हैं। शास्त्रों में भी प्रसिद्ध है। क्या किया उन्होंने? कहते हैं भगीरथ ने क्या किया? गंगा लाई। अब वो तो गंगा समझ लेते हैं कन्या-माता कोई गंगा है। हँ? जिसको दिखाते हैं कन्या का रूप कि शंकर जी जटा में वो कन्या दिखाय देते हैं। अरे कन्या की बात थोड़े ही है। हँ? कन्याएं-माताएं जो भी ज्ञान सुनाएंगी वो ज्ञान पानी की गंगा होगा या वो ज्ञान गंगा होगा जो अकूट ज्ञान का सागर कहा जाता है? हँ? अरे, ज्ञान को ही गंगा कहा जाता है। वो गंगा के अनेक रूप हैं। क्या? गंगा के सहस्त्र नाम गिनाते हैं ना। सहस्त्र नाम गिनाते हैं, इसका मतलब हजार ब्रह्मा की भुजाएं हैं। हँ? और उन भुजाओं के द्वारा ज्ञान सुनाते हैं। तो मुख्य रथ तो ये है मुकर्रर रथ, भगीरथ। इसमें परमपिता परमात्मा आते हैं।

A night class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page was – A student may talk about the scriptures to whatever extent, you tell them beforehand that we remember One. For example it has been written in the Gita – Remember Me alone. So, only that one Alaf remains in our intellect. And we know only about Alaf. From that Alaf we children get numberwise emperorship. Which Alaf do you know? Hm? Yes. Alaf means a vertical line. The one who remains standing in purusharth from the beginning to the end; does not shake, does not fall that brother he falls. No. He is called Alaf in Urdu. And Be? Be means – what happens ultimately while making purusharth? Already he was lying down and he lies down even more. And then the Father comes and him, yes, Be. Be means baadshah (emperor). He makes us the emperor of the Golden Age new world. But we do not study these scriptures, etc. Yes, earlier we used to read a lot. We read birth by birth. Now we have left reading all that. It is because when we have found the ocean of knowledge, then what will we do to Bhakti? It has been written in the Gita also, hasn’t it been written that when you find the ocean who will bathe in the pits, lakes? The bath of Gangasagar is famous, isn’t it? People say, don’t they? Other fairs, other baths take place again and again; Gangasagar takes place once. So, this is about the ocean of knowledge.

These are a lot of tactics to explain. You children are now learning those tactics. Yes, it may be possible that you also suffer a lot of defeat in front of someone. Hm? If you are unable to explain, then what will be said? You suffered defeat. Yes. You are many; you are not just one person to suffer defeat; you are many. Yes, it is because the followers of scriptures (shaastravaadi) keep on uttering ‘tran, tran’ (speak their own topics). What? The frogs of the rainy season keep on shouting ‘tran, tran’ so much. So, they too, when the season of rain of knowledge arrives, when the Father Shiv comes, hm, then in the end of the world, He causes the rainfall of knowledge. So, they keep on uttering their own ‘tran, tran’. So, now there majority and minority, completely minority, a little. Hm? You are now in a minority. And they? They, the followers of the scriptures are in majority. So, what should you too do? Attain majority. What? Not a little. Tactfully become those who explain nicely.

Now you hunt. Hm? Whom do you hunt? Who emerge more? Arey, among all those who enter the path of knowledge, whose number is more? Is it of the virgins, is it of the Kumars (unmarried men) or is it of the Adhar Kumars (married men) or is it of the Adhar Kumaris (married women)? Whose number is more? Hm?
(Someone said something.) Is the number of virgins more? Achcha? Those who have undergone bhatti, those whom you explain in the 7 days course, during the bhatti, is the number of virgins more? Hm? The number of mothers. Mothers too are of two kinds. Hm? One is young mothers, and the other are, yes, elderly mothers. So, it was told that whom do you cause to emerge more in numbers? You cause the number of mothers to emerge in more numbers. What do the people of the world think about them? Hm? They do not give them any value. You make them to emerge. You explain to them. Hm? People of the world call them the weaker sex (ablaaen). That is correct. In the Iron Age, what do the virgins and mothers become? Weak (abla) or strong (sablaa)? The Father comes and makes them strong, Shiv Shaktis. So, the weaker ones, you virgins, the weaker ones, such and such ones.

And later in the end you will have to face these Sanyasis. What? Daughter, you also have to face the Sanyasis in the end, will you not? So, this is why you shouldn’t indulge in much debate with the Sanyasis because they have numerous followers. So, what should you do? Hm? What should you do first? Take out their numerous followers first. When their followers break away, then they will hang their noses automatically later on. Will they not? Yes. Each Sanyasi has lakhs of followers. What? How many followers will Asaram Bapu have? Hm? When a gathering takes place, then they gather in lakhs. It was told that there are one lakh, two lakhs, three lakhs followers. Whose? Of the Sanyasis. When they sit amidst their followers and speak, don’t they, yes, then they cover the other side. Hm? They keep on speaking their own ‘tran, tran’. Well, on the one side is the ‘tran, tran’ of the scriptures and on the other side is your just one word. What? Which one word? That the Father says – Remember Me alone. Remember Me. If you remember Me alone, then you will become satopradhan (pure) from tamopradhan (impure). If you remember one. Well, someone may say – Where is this written? Then you tell the Shlok of the Gita. Hm? What is written in the Gita? Manmanaabhav Madhyaaji Maamevanamaskuru. Hm? Remember Me alone. Do not bow your forehead before anyone else. There is no need to bow your forehead before anyone. Yes. So, it has been written in the Gita, hasn’t it been? Yes. Remember Me alone.

So, now you will have to tell that it has not been written anywhere in any other scripture. Yes, Father Shiv came and explained orally. Hm? All the founders of religions explain orally. Neither does anyone sit and write scriptures. So, we heard that orally and then this knowledge almost disappeared. What? After we have heard it, this knowledge almost disappears. So, the Father says that this knowledge almost disappears. While we say that in the beginning of the Golden Age, even Lakshmi-Narayan did not have this knowledge. What? Krishna who is perfect in 16 celestial degrees; they are perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age, aren’t they? The Golden Age is perfect in 16 celestial degrees; the Silver Age is perfect in 14 celestial degrees. So, it was told that in the beginning of the Golden Age, these Lakshmi-Narayan who sit on the first throne, they themselves do not have any knowledge. That is it. They started taunting. They started doing this; that is it. Hm? They shout a lot. They say – That is it; you alone have knowledge. Lakshmi & Narayan do not have knowledge. These big deities do not have knowledge. Knowledge has emerged in you. They will start taunting. They will say – Arey, this master of the world. Don’t they too have knowledge? Hm? They too. It means that towards whom did He make a gesture? The one who is called Vishwanath Shankar, a gesture was made towards them that doesn’t he too have knowledge? Do you alone have knowledge? Later they trouble you a lot like this. On the path of Bhakti, we are very dirty, very dirty; that too all have become firm. While doing Bhakti for half a Kalpa, you have become firm on the path of Bhakti because those who worship are worshippers, aren’t they? They cannot be called worshipworthy. How does one become worshipworthy? Hm? One becomes worshipworthy only through knowledge, doesn’t one? Yes.

Third page of the night class dated 14.11.67. Now you have found the incognito Baba who gives you the knowledge. What has been said? Did you get incognito Father or did you get incognito Baba? Hm? Arey, when the soul itself is incorporeal, point of light, then it is incorporeal, incognito. So, will the Father of the soul be revealed? He is forever; what? Does He remain invisible, unrevealed? Does He remain behind the curtains or does He come in the front on the stage? No. So, who is incognito? Hm? Who was mentioned to be incognito? Baba. It means that the permanent Chariot in which He enters is an incognito actor. This Dada Lekhraj Brahma is also revealed. But the Baba, the ShivBaba for whom we say that ShivBaba’s part is forever on the world stage, that ShivBaba gives knowledge now. Is He now incognito or revealed? He is still incognito and; what? He remains incognito in the four Ages also. Now just, now in the Confluence Age, numberwise 500-700 crores will continue to know; or will they know simultaneously? Hm? They will get to know gradually.

Do they now know that there is this fortunate Chariot in this Chariot? In which Chariot? Hm? In which Chariot is this fortunate Chariot? The word ‘this’ was uttered, yes, so, the topic of the Chariot was mentioned that the chariots are of Brahma. Four heads are depicted, five heads are depicted. So, definitely when there are heads, then there will be torsos also. Will they be Rahu (without torso)? Rahu is depicted with a head. Do they show the torso? They do not depict. So, it was told that these heads are chariots only, aren’t they? But all those numerous heads are temporary and one is? One is permanent Chariot. So, this is that fortunate Chariot, Bhaagirath. Hm? The Supreme Father Supreme Soul comes in this one. It is famous in the scriptures also. What did he do? It is said that what did Bhaagirath do? He brought the Ganges. Well, they think about Ganga that a virgin or mother is Ganga. Hm? She is shown in the form of a virgin that that virgin is shown in the hairlocks of Shankarji. Arey, it is not about a virgin. Hm? Whatever knowledge the virgins and mothers narrate, will that knowledge be Ganges of water or is it that Ganges of knowledge which is an ocean of inexhaustible knowledge? Hm? Arey, knowledge itself is called Ganga. That Ganga has many forms. What? A thousand names of Ganga are counted, aren’t they? Thousand names are counted; it means that there are thousand arms of Brahma. Hm? And He narrates knowledge through those arms. So, the main Chariot is this permanent Chariot, the fortunate Chariot. The Supreme Father Supreme Soul comes in this one.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2818, दिनांक 13.03.2019
VCD 2818, dated 13.03.2019
रात्रि क्लास 14.11.1967 और प्रातः क्लास 15.11.1967
Night class dated 14.11.1967 and Morning class dated 15.11.1967
VCD-2818-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-18.15
Time- 00.01-18.15


रात्रि क्लास चल रहा था 14.11.1967. तीसरे पेज के मध्यांत में, मध्यांत के बाद बात चल रही थी कि हमें तो ऊँच ते ऊँच बाप से एक ही ज्ञान मिला हुआ है। कहते हैं मामेकम याद करो। तो तुम्हारे ये जन्म-जन्मांतर के विकर्म हैं, पाप कर्म, वो सब विनाश हो जाएंगे। उसको ही याद करते हैं। बस। तुम्हारा ज्ञान है ही एक सेकंड का। गाया जाता है सेकंड में जीवनमुक्ति। हं? उनको फिर बात करने का ज्यादा टाइम नहीं देना चाहिए। बोलो ये शास्त्रों की तो ढेर की ढेर बातें ही नहीं करो। अब यहां आए हो तो हम जो कहते हैं सो सुनो। बस। तो वो दो अक्षर कह करके, चुप हो करके बैठ जाना चाहिए। कुछ भी, फिर कहें भी, चलो, बोलो, बाबा कहते हैं मामेकम याद करो। आप कितना भी बैठ कर के कुछ भी शास्त्र सुनाओ लेकिन हम शास्त्रों की बातों पर ध्यान देते नहीं हैं। अगर देते भी हैं तो हमें जो बाप सुनाते हैं उन बातों को टैली करने के लिए ध्यान देते हैं कि आप शास्त्रों को ही मानते हैं इसलिए। बाकी शास्त्रों में तो ढेर के ढेर गपोड़े हैं और ढेर शास्त्र हैं। तभी कुछ तुम लोग ठहर सकते हो। नहीं तो देखो, उनके पास बहुत शास्त्र हैं ढेर के ढेर। और वो शास्त्रों की अपन को बड़ी अथॉरिटी समझते हैं।

तो तुम्हारे में भी ऐसे-3 कोई ऐसी बात करें अगर टेउं-टिप्पण, छोटी-मोटी चीज़ बात कर दी तो फिर कुछ नीचे ऊपर हो जावेगा। और वो संस्कृत में तुम्हें बोलना भी नहीं आवेगा। तो फिर आबरू गुमाय देंगे। इसलिए कभी भी ऐसी जैसों से वो अपन को हल्का अगर समझें, तो बाबा ने यहां कह दिया ना, कोई भी सन्यासी हो, बोलो - आप हैं सन्यासी, ये हठयोगी और हम हैं राजयोगी। आप हठपूर्वक इंद्रियों को कंट्रोल करते हैं और घरबार छोड़ देते हैं। जो रचना रची है उसकी परवरिश न करके उसको छोड़ देते हैं। इसलिए हमारा आपसे बात करना फालतू है। खतम। खेल ही खलास कर दो। जो वो कुछ भी बोलें ना और अखबार-वखबार में भी किसी को डालना होगा, तो भी कहेंगे वो बोला, वो बोला। अब हमको तो बाप कहते हैं अलफ को याद करो तो तुम्हारा जन्म-जन्मांतर का पाप कट जाएगा। दूसरा तो कुछ वो डाल भी नहीं सकते हैं।

तो बोलने की इतनी होशियारी चाहिए क्योंकि तुम बच्चों को तो बोलना जास्ती है ही नहीं। अब ये बातें भी तुमको बाप क्यों समझाते हैं इतना? इसलिए समझाते हैं कि तुम परिपक्व बनो, परिपक्व बनाने के लिए। उन भक्तों से बात नहीं करते हैं। देखो, बाप कभी कोई भक्तों से बात करते हैं क्या? ना। और उसमें भी सन्यासी तो हैं ही नहीं तुम्हारे कुछ। तुम्हारे कुल के हैं क्या? देखो, वो झाड़ खड़ा है सृष्टि का। उसे देखो। कोई हैं? सन्यासियों को झाड़, झाड़ के सामने ले जाना चाहिए। अरे भई, देखो, ये सृष्टि रूपी वृक्ष देखो जिसका गीता में भी वर्णन है ऊर्ध्वमूलम अधः शाखा। (गीता 15/1) ऐसे है ना। उसमें देखो तुम हैं सभी विद्वान, पंडित, आचार्य, सन्यासी, आदि, हठयोगी। और हम हैं राजयोगी। तो ये हमारे से ये सब बातें क्या सुनेंगे? और सुनेंगे भी तो आप मानेंगे नहीं। तो भई एक बात हम बोल देते हैं कि बाप कहते हैं कि देह के सभी धर्म त्याग दो। हँ? जो इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट हैं ना इन्होंने देह के धर्म सिखाए हैं ना। कि आत्मा का ज्ञान दिया? आत्मा का ज्ञान तो नहीं दिया। हां, अब बाप कहते हैं अपन को आत्मा समझ मामेकम याद करो। क्या आत्मा समझ? कि मैं आत्मा अति सूक्ष्म ज्योति हूं, ज्योति बिंदु। और भृकुटी के मध्य में ये आत्मा रूपी राजा बैठा हुआ है सारी इंद्रियों के ऊपर।

तो उनको बताओ कि हम आत्मा हैं। आत्मा को कोई परमात्मा थोड़े ही समझो। न शिवोहम समझो। नहीं। हम आत्मा हैं शालिग्राम। और शिव परमपिता, सबका पिता, जिसका कोई पिता नहीं है। और उनके साथ परमपिता के साथ परमात्मा है क्योंकि जिस तन में प्रवेश करते हैं वो है परम पार्टधारी इस सृष्टि रूपी रंगमंच का। तो वो ही है परमात्मा। तो वो दोनों मिलकर के जिनको कहा जाता है पतित पावन। हँ? वो हीरो पार्टधारी है। इस अंतिम जन्म में आकरके इस सृष्टि का सुख भोगते-भोगते इंद्रियों से महापतित बन जाता है। तो वो पतित आत्मा। और शिव तो जन्म-मरण के चक्र में आता ही नहीं। वो सदा पावन है। तो वो पतित और पावन का कंबीनेशन है। बस। इतना बताओ। जास्ती नहीं। अच्छा। चलो बच्ची, म्यूजिक बजाओ। सीकीलधे बच्चों प्रति, रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार और गुड मॉर्निंग।

आज का प्रातः क्लास है 15.11.1967, बुधवार। रिकॉर्ड चला है - तकदीर जगा कर आई हूं। कहां से जगा कर आई हूं? हँ? कहां से जगा कर आई हूं? अरे? 63 जन्म जो लिए ना, द्वापर कलियुग में, भक्ति मार्ग में। तो जो भक्ति की है ढाई हजार साल उसमें ऐसे-ऐसे भक्तों ने अच्छे कर्म किए हैं तो उनकी तकदीर जग जाती है। तो मैं आत्मा भी तकदीर जगा कर आई हूं। हँ? और अपनी तकदीर में एक नई दुनिया बसा कर लाई हूं। ओम शांति। रूहानी बच्चों से बाप बैठ करके पूछते हैं। बाकी देह अभिमान में जो बैठे हुए हों उनसे तो कुछ पूछते ही नहीं। पूछते हैं कि बच्चों कौन सी तकदीर लाए हो बनाय करके? दिखलाओ बाबा को। हँ? ऐसा कोई बच्चा है दिखलाने वाला? तुम बताओ, तुम दिखलाएगी? कौनसी तकदीर बनाकर लाई हो? तुम बनाएगी? अच्छा बताएगी कौन सी तकदीर? किसी ने कहा - बाप से वर्सा मिलने की तकदीर। अरे, बाबा बोलते हैं तकदीर कहां है तुम्हारी? दिखलाओ। तो किसी ने कहा - हमारे पास ही है। अभी बनाय रहे हैं बाप द्वारा। अरे, पर है कहां तकदीर तुम्हारी? अरे, ये तकदीर सामने नहीं खड़ी है? तुम ऐसे नहीं कहते हो। कहते हो ना ये तकदीर बना कर आई। देखो तो घर में बैठी है चीज। और फिर बोलते हैं बाबा से - ये लाए। ये है, ये है। कितने-कितने हैं जो राज्य करते हो?

देखो, बाबा कितना सिंपल सवाल पूछते हैं कि तकदीर कौनसी बनाकरके लाए हो? बाबा ये तकदीर है। और सीधी-सीधी बात है एकदम। तो ऐसी सीधी बात का, सवाल का जवाब भी एकदम एक सेकंड में होना चाहिए ना। देखो, टीचर जब स्कूल में सवाल पूछते हैं फट से एकदम तुम खड़ा करके, खड़ा होकरके फट से बताय देते हैं। पूछते हैं भई पांच-पांच मिलाकर कितना हुआ? तो फट से तुम खड़े होके जवाब देंगे - दस। तो ये सवाल और ये जवाब। तो ये भी यही है ना। अभी कौन सी तकदीर बना कर लाई हो? और कौन सी तकदीर बनाने आई हो? बाबा ये है। बताओ कैसी सीधी बात। तभी तो बाबा कहते हैं कहां भी, जहां भी तुम ये चित्र वगैरह चित्रशाला बनाते हो, तो यहां है प्रिंसिपल। और ये बड़ा प्रिंसिपल। बड़ा ये तकदीर बना कर आए हैं। समझा ना? तो भारत की ये तकदीर बन रही है। इसलिए बाबा कहते हैं ना बच्ची - ये तकदीर बनती रहती है। उनको ढिंढोरा में ले आना चाहिए। और तो और, जो कोई इस, कोई मनुष्य इस बात को जाने क्योंकि कोई भी जानते तो कुछ भी नहीं हैं। (क्रमशः)

A night class dated 14.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion, after the end of the middle portion of the third page that we have received knowledge from only one highest on high Father. He says – Remember Me alone. Then all these sins, sinful actions of birth by birth will be destroyed. He alone is remembered. That is it. Your knowledge itself is of one second. It is sung – Jeevanmukti (liberation in life) in a second. Hm? They should not then be given more time to talk. Tell – Do not talk these numerous topics of scriptures. When you have come here, then listen to what we say. That is it. So, you should utter those two words and sit silently. If they say anything, tell them, Baba says – Remember Me alone. You may sit and narrate anything about the scriptures to whatever extent, but we do not pay attention to the topics of scriptures at all. Even if we pay, we pay attention in order to tally the topics that the Father narrates to us because you believe only in the scriptures. But there are numerous bluffs in the scriptures and there are numerous scriptures. Only then you people can stay a little. Otherwise, look, they have numerous scriptures. And they consider themselves to be an authority on scriptures.

So, even among you if someone speaks like this, if they make a comment, if they speak a small topic, then something will turn upside down. And you will not be able to speak in that Sanskrit. So, then you will lose your respect. This is why whenever you find yourselves to be lighter (weaker) than them, then Baba has said here, hasn’t He that be it any Sanyasi, tell him – You are Sanyasis (renunciates), you are hathyogis (obstinate yogis doing physical asanas) and we are rajyogis. You control your organs obstinately (forcibly) and leave your household. You do not sustain your creation and leave them. This is why our talking to you is a waste. End. End the game itself. Even if they speak anything and even if anyone has to publish anything in the newspapers, etc, they will say, you said like this, you said like this. Well, the Father tells us – Remember Alaf, and then your sins of many births will be cut. They cannot publish anything else.

So, you need such cleverness in speaking because you children don’t have to speak much at all. Well, why does the Father explain these topics to you so much? He explains so that you become mature, in order to make you mature. He doesn’t talk to those devotees. Look, does the Father ever talk to any devotees? No. And even among them, the Sanyasis do not have any connection with you at all. Do they belong to your clan? Look, that Tree of the world is standing. Look at it. Are there any of them? The Sanyasis should be taken in front of the Tree. Arey, brother, look, look at this world tree which has been described in the Gita also – Oordhwamoolam adhah shakha. (Gita 15/1) It is like this, isn’t it? Look in that you all scholars, pundits, acharyas, Sanyasis, etc. everyone is a hathyogi. And we are Rajyogis. So, will you listen to all these topics from us? And even if you listen you will not accept. So, brother, we say only one thing that the Father says that renounce all the religions of the body. Hm? Ibrahim, Buddha, Christ, have taught the religions of the body, haven’t they? Or did they give the knowledge of the soul? They did not give the knowledge of the soul. Yes, now the Father says – Consider yourself to be a soul and remember Me alone. What soul should you consider? That I, the soul am a very subtle light, point of light. And this soul is sitting as a king over all the organs in the middle of the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows).

So, tell them that we are souls. Do not consider the soul to be Supreme Soul. Neither should you consider yourself to be Shiv (Shivohum). No. We souls are Shaligrams. And Shiv is the Supreme Father, everyone’s Father, who does not have any Father. And along with Him, along with the Supreme Father is the Supreme Soul because the body in which He enters is the supreme actor of this world stage. So, he is the Supreme Soul. So, both of them are together called the purifiers of the sinful ones (patit-paavan). Hm? He is the hero actor. After reaching this last birth, while enjoying the pleasures of this world through the organs he becomes the most sinful one. So, he is the sinful soul. And Shiv doesn’t pass through the cycle of birth and death at all. He is ever pure. So, that is a combination of the sinful one and the pure one. That is it. Tell this much. Not more. Achcha. Okay daughter, play the music. Remembrance, love and good morning of spiritual Father (Baap) and Dada to the seekiladhey children, to the spiritual children.

Today’s morning class is dated 15.11.1967. Wednesday. The record played is – Takdeer jagaa kar aai hun (I have come with my fortune awakened). From where have I got it awakened? Hm? From where have I got it awakened? Arey? You have taken 63 births, haven’t you? In the Copper Age, in the Iron Age, on the path of Bhakti. So, the Bhakti that you have done for 2500 years, the devotees have performed such nice actions that their fortune gets awakened. So, I, the soul have also come with my fortune awakened. Hm? And I have come with a new world inhabited in my fortune. Om Shanti. The Father sits and asks the spiritual children. But He does not ask anything to those who are sitting in body consciousness. He asks – Children, which fortune have you brought? Show to Baba. Hm? Is there any child who could show? You tell, will you show [daughter]? Which fortune have you brought? Will you make? Achcha, will you tell which fortune? Someone said – The fortune of getting inheritance from the Father. Arey, Baba says – Where is your fortune (takdeer)? Show up. So, someone said – It is with us only. We are now building it through the Father. Arey, but where is your fortune? Arey, isn’t this fortune standing in front of you? You don’t speak like this. You say, don’t you that you brought this fortune. Look, the thing is sitting at home. And then you tell Baba – We brought this. This is it; this is it. How many of you rule?

Look, Baba asks such a simple question that which fortune have you built and brought? Baba this is the fortune. And it is a completely simple topic. So, even the reply to such direct topic, question should be completely in a second, shouldn’t it be? Look, when the teacher asks questions in the school, then you stand up immediately and tell immediately. He asks – Brother, what is five plus five? So, you will immediately stand up and tell – Ten. So, this is the question and this is the answer. So, this is also like this only, isn’t it? Now which fortune have you built and brought? And which fortune have you come to build? Baba this is it. Tell, it is such a simple topic. Only then does Baba say that anywhere, wherever you build this picture-hall with these pictures, so here it is principal. And this is a big principal. You have come with this big fortune built. Did you understand? So, this is India’s fortune being built. This is why Baba says, doesn’t He that daughter, this fortune keeps on being built. A trumpet should be blown about it. Moreover, whoever, whichever human being gets to know this topic because nobody knows anything. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2818, दिनांक 13.03.2019
VCD 2818, dated 13.03.2019
रात्रि क्लास 14.11.1967 और प्रातः क्लास 15.11.1967
Night class dated 14.11.1967 and Morning class dated 15.11.1967
VCD-2818-Bilingual-Part-2

समय- 18.16-33.21
Time- 18.16-33.21


तो ये तुम बैठ करके मनुष्यों से अभी ये जो देवताएं बन रहे हो, बल्कि तुम तो साफ कहते हो बच्चे कि हम तो नर से नारायण बन रहे हैं या नारी से लक्ष्मी बन रहे हैं। और तुम तो ये मानते ही नहीं हो। हँ? तुम तो साफ कहते हो कि हम नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनते हैं। राम-सीता थोड़े ही बनने के लिए आए हैं। फिर कोई राम-सीता बनने के लिए, सीता बने, राम बने। तो देखो, तुम तो एकदम पकड़ करके बैठ गए; क्या? अरे, राम तो फेल हो गया। तो हम राम थोड़े ही बनेंगे? तुम तो पकड़के बैठ गए। क्या? क्योंकि ये जानते हो ये सत्यनारायण की कथा है। ये कोई फेलियर की कथा नहीं है। ये बाप बैठ करके सच-सच और बात भी कितनी सहज सच समझाते हैं। सच-सच नर से नारायण बनाने के लिए बाबा रास्ता बताते हैं। क्या? और बहुत सहज रास्ता है। देखो, कितना सहज रास्ता है। हँ?

क्योंकि अभी तुम पतित बन गए हो। पुकारते हो। अपने को कहलाते हो कि हम पतित हैं। और फिर बुलाते। कितने जन्मों से बुलाते आए - हम पतितो को पावन बनाने वाले आओ। तो फिर बताओ कि हम कौन सा पावन बनावे? और पावन भी तो यही बनाएंगे ना। और तो कोई दुनिया में है नहीं जो पतितों को पावन बनावे। जो ऊँच ते ऊँच होगा वो ही तो पावन बनाएगा ना। हँ? उसको कहेंगे ही एवर प्योर, एवर पावन। हम यहां श्री सीता और राम के तो चित्र नहीं रखेंगे ना वास्तव में। वो तो समझाने के लिए कि इनके बाद फिर सीता-राम का राज्य होता है। गिरती कला का राज्य हुआ। 14 कला संपूर्ण। 16 कला थोड़े ही कहेंगे। 16 कला तो नारायण को ही कहेंगे। इसलिए उनको भी देरी से रखा गया त्रेता में। सतयुग में नहीं रखा गया। तो पहले पहले तो हैं ही ये ना। ये पहले वाले लक्ष्मी-नारायण।

तो बच्चों को तो झट रेस्पॉन्ड लिखना, जल्दी देना चाहिए। कहां भी हो। जब ये सुनते हो कुछ भी, तो कहां भी कोई भी प्रश्न पूछे, कोई ब्राह्मणी बैठकर के प्रश्न पूछे - तुम यहां क्या बनने आए हो? कौन सी तकदीर बनाने आए हो? क्योंकि गीत तो सभी सेंटर्स में बजाते हैं ना। तो तुम कौन सी तकदीर बनाकर आए हो? तो ये तो सबके, सबके पास यह चित्र रखे हुए हैं। कौन से? लक्ष्मी-नारायण के। हां। कि हम ये तकदीर बनाने आए हैं। भई कितनी ऊंची तकदीर! 16 कला संपूर्ण नारायण, सत्य नारायण, जिनकी कथा घर-घर में सुनाई जा रही है। तो ये इतना ऊंच किसके द्वारा बनाया? द्वारा बताओ। मीडिया कौन बना जिसके द्वारा बनाया? अरे, फिर बताना तो पड़ेगा ना किसके द्वारा? वो तो जरूर कहेंगे बेहद का बाप जो स्वर्ग की स्थापना करने वाला है। हँ? करने वाला है। करने वाला है कि कराने वाला है? उनके द्वारा। क्या कहेंगे उनको? करने वाला या कराने वाला? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) कराने वाला? कौन? पूछा - किसके द्वारा बनाय रहे हैं? अरे इसके द्वारा बनाय रहे हैं? वो जिसके द्वारा बनाय रहे हैं, वो करने वाला है या कराने वाला है? ये नहीं पूछ रहे हैं कि साकार है कि निराकार? द्वारा है तो साकार ही होगा। (किसी ने कुछ कहा।) हां। मुकर्रर रथधारी हुआ। तो करने वाला है कि कराने वाला है? क्या कहेंगे? हँ? करने वाला है। कराने वाला प्लस करने वाला। अरे? तो द्वारा इसमें कौन है? मीडिया कौन है? करने वाला मीडिया हुआ। हां। तो पूछते हैं कैसे कराय रहे हैं इसके द्वारा? अब ये जवाब दो। इनके द्वारा कराय रहे हैं, हँ, ये करनहार है। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) प्रवेश करके? प्रवेश करके वो तो कराय रहे हैं। कराने वाले की बात हुई। यहां करने वाले की बात है ना। तो वो करने वाले कैसे कर रहे हैं? जिनके द्वारा बताया कि बनाय रहे हैं। कैसे? कहेंगे हम ज्ञान ले रहे हैं। समझा ना? क्योंकि अभी भक्ति तो खतम।

तो अब हम उस तरफ में नहीं हैं भक्ति की तरफ। भक्ति तो रह गई उस तरफ। हँ? क्या होती है भक्ति में? हँ? सुन लिया और सुना लिया। सुनना और सुनाना ये होता है भक्ति। और यहां इस तरफ में क्या होता है? कुछ अंतर है? हँ? यहां सिर्फ सुनना-सुनाना नहीं है। हँ? क्या करना-कराना? हँ? हां, समझना और समझाना है। तो समझने-समझाने के लिए क्या करना पड़े? हँ? मनन-चिंतन-मंथन करना पड़े। तो वो भक्तिमार्ग में तो बस एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। उधर झोली भरी और उठ के खड़े हुए, पीठ की और बस झाड़ दी। कुछ नहीं बचा। यहां तो तुम जो सुनते हो वो मनन-चिंतन-मंथन करते हो ना। हां। तो ज्ञान, इस पुरुषोत्तम बनने के लिए संगमयुग में ये ज्ञान हमको मिल रहा है। क्या? बुद्धि में है कि जो भी पुरुष मात्र हैं, हँ, आत्मा रूपी जो पुरुष कहा जाता है, शरीर रूपी पुरी में आनंद से शयन करने वाली आत्मा, कभी भी दुख महसूस ना हो, ऐसा पुरुषोत्तम बनने के लिए संगमयुग में ज्ञान हमको मिल रहा है।

तो जब तलक ये ज्ञान सुनते रहते हो, तो बाबा तो कहते हैं ना, भले सभी जगह में जाओ। कहां भी दूसरे-दूसरे सत्संगों में भी जाओ जहां तुम बच्चों को ऐसी कोई एम-ऑब्जेक्ट मिले जो भगवान पढ़ाता हो, ये साबित होता हो। हँ? तो तुम्हें लगे कि भगवान पढ़ाता है तो वहां बैठ जाओ। बाबा तो मना नहीं करते हैं कि तुम कहां भी, यहां नहीं जाओ, वहां नहीं जाओ। बाबा मना करते हैं? ये तो देहधारी गुरु लोग हैं वो मना करते हैं, विष्णु पार्टी में नहीं जाओ, यहां नहीं जाओ, वहां नहीं जाओ। महाकाली पार्टी में न जाओ। कौन मना करते हैं? देहधारी गुरु लोग मना करते हैं कि बाबा मना करते हैं? अरे, बाबा तो कहते तुम कहीं भी जाओ, परखो। हां। जहां तुम बच्चों को ऐसी कोई एम-ऑब्जेक्ट मिले कि भगवान पढ़ाता हो, तो वहां प्यार से बैठ जाओ। बाबा तो नहीं मना करते कि जहां भी तुमको कोई और कुछ ही धक्का-वक्का भक्ति मार्ग का या चरणों में झुकना हो, हँ, तो, तो जाओ। क्योंकि अब जाते हैं उन सत्संगों में सन्यासियों के सामने तो झुकते तो सभी हैं। सन्यासी भी झुक रहे हैं। हँ? तो चरणों में तो सभी झुक रहे हैं। नहीं तो सन्यासी सभी शिव की पूजा करते नहीं हैं। परंतु नहीं, करते हैं जरूर, अच्छे-अच्छे जो सन्यासी हैं, उनमें बाप ने समझाया है कि सबसे बड़ा जो शंकराचार्य था, पहला-पहला शंकराचार्य, वो किसी के सामने माथा नहीं टिकाता। और अभी भी जो बड़ा शंकराचार्य होगा ना भारत में वो किसी के सामने माथा? माथा नहीं झुकाएगा। हां। तो इससे क्या साबित हुआ? कि शिव के मंदिर में जाकर माथा झुकाते हैं या नहीं झुकाते हैं? हां। वो शिव के मंदिर में जाके माथा झुकाते हैं। लेकिन वो तो कोई चैतन्य नहीं है। चैतन्य मूर्ति है? वो तो जड़ पत्थर, पत्थर की मूर्ति रखी है।

अभी शंकराचार्य तो देखो, वो कहते हैं जगतगुरु शंकराचार्य। हँ? सारे जगत के गुरु। तो जब सारे जगत के गुरु हैं तो किसके सामने माथा झुकाएंगे? झुकाएंगे? नहीं झुकाएंगे। वो कहते हैं हम जगतगुरु हैं। अभी उनको तो पहले भी समझाना चाहिए ना कि तुम जगतगुरु अपन को कहते हो, तो तुम जगतगुरु कैसे? हँ? जबकि तुम पूजा करते हो। चाहे मंदिरों में पूजा करते हो, चाहे अपने गुरु की पूजा करते हो। जगतगुरु, सारे जगत का गुरु होगा, तो वो कोई के पुजारी थोड़े ही होते हैं। जगतगुरु तो आते हैं लक्ष्य देने के लिए। जो सारे जगत का गुरु ऊंचे ते ऊंचे भगवंत है वो किसलिए आते हैं? आते हैं लक्ष्य देने के लिए कि तुमको नर से क्या बनना है? नारायण बनना है, नारी से लक्ष्मी बनना है। पुरुषोत्तम नारायण बनना है। तो गोया वो ही लक्ष्य देते हैं कि तुम भी, जो लक्ष्य देते हैं ऊँच ते ऊँच कि नर से नारायण बनो, वो शिव की ही पूजा करो। और कोई के सामने माथा नहीं झुकाओ। ओम शांति। (समाप्त)

So, you now sit and are becoming deities from human beings. Rather you say clearly children that we are becoming Narayan from nar (man) or we are becoming Lakshmi from naari (woman). And you do not accept this at all. Hm? You say clearly that we become Narayan from nar and Lakshmi from naari. We haven’t come to become Ram-Sita. Then some in order to become Ram-Sita; they may become Sita, they may become Ram. So, look, you have completely grasped and sat; what? Arey, Ram failed. So, will we become Ram? You have grasped and sat. What? It is because you know that this is the story of Satyanarayana. This is not a story of a failure. This Father sits and truly and the topic that He explains is also so easy and true. Baba shows the path to truly become Narayan from nar. What? And it is a very easy path. Look, it is such an easy path. Hm?

It is because now you have become sinful. You call [God]. You call yourselves that we are sinful. And then you call [God]. You have been calling since so many births – O purifier of us sinful ones come. So, then tell what kind of pure should we be made? And we will be made pure here itself, will we not be? There is nobody else in the world who could purify the sinful ones. Only the one who is highest on high will make others pure, will He not? Hm? He will be called ever pure, ever paavan. We will not keep the pictures of Shri Sita and Ram here in reality. That is for explanation that after them, there is a rule of Sita-Ram after them. It is a kingdom of decreasing celestial degrees. Perfect in 14 celestial degrees. They will not be called perfect in 16 celestial degrees. Narayan alone will be called 16 celestial degrees. This is why they were also kept later on in the Silver Age. They were not kept in the Golden Age. So, first of all it is these people only, aren’t they? These first Lakshmi and Narayan.

So, children should respond immediately, give an early reply. Wherever they may be. Whenever you listen to anything like this, then wherever anyone asks a question, a Brahmani should sit and ask a question – What have you come to become here? Which fortune have you come to build? It is because songs are played in all the centers, aren’t they? So, which fortune have you built and come? So, these pictures are available with everyone. Which ones? Of Lakshmi-Narayan. Yes. We have come to build this fortune. Brother, such high fortune! Narayan perfect in 16 celestial degrees, the true Narayan, whose story is being narrated in every home. So, through whom were these made so great? Tell about ‘through’. Who became the media through whom you were made? Arey, then you will have to tell as to through whom? That will definitely be said the unlimited Father who establishes heaven. Hm? Establishes. Does He establish or does He enable the establishment? Through them. What will he be called? Doer or enabler? Hm?
(Someone said something.) Enabler? It was asked – Through whom is He making? Arey, is He making through this one? The one through whom He is making, is he the doer or the enabler? It is not being asked as to whether he is corporeal or incorporeal. When he is ‘through’, then he will be corporeal only. (Someone said something.) Yes. He is the permanent Chariot-holder. So, is he doer or enabler? Who is the media? What would you say? Hm? He is the doer. He is enabler plus doer. Arey? So, who is ‘through’ in this? Who is the media? The doer is the media. Yes. So, He asks – How is He enabling through this one? Well, give this reply. He is enabling through this one, hm, this one is doer. Hm? (Someone said something.) By entering? He is enabling by entering. It is about the enabler. Here it is about the doer, isn’t it? So, how are the doers doing? The one through whom it was told that he is making. How? It will be said that we are obtaining knowledge. Did you understand? It is because now Bhakti has ended.

So, now we are not on that side, on the side of Bhakti. Bhakti remained on that side. Hm? What happens in Bhakti? Hm? You hear and narrate. Hearing and narrating is Bhakti. And what happens here on this side? Is there any difference? Hm? Here it is not just listening and narrating. Hm? What doing and enabling? Hm? Yes, you have to understand and explain. So, what do you have to do to understand and explain? Hm? You will have to think and churn. So, on the path of Bhakti you just listen through one ear and leave it through the other. You fill the jholi there and stand up, turn your back and then throw it. Nothing was saved. Here whatever you listen you think and churn, don’t you? Yes. So, the knowledge, we are getting this knowledge in the Confluence Age to become Purushottam (highest among souls). What? It is in the intellect that all the purush, the soul-like purush, the soul that rests blissfully in the body like abode, never experiences sorrows, we are getting knowledge in the Confluence Age to become Purushottam.

So, until you keep on listening to this knowledge, Baba says, doesn’t He that you may go to all the places. You may go anywhere to other satsangs (spiritual gatherings), wherever you children get such aim-object that God teaches and it is proved. Hm? So, if you feel that God is teaching, then sit there. Baba doesn’t stop you that you shouldn’t go anywhere, do not go here, do not go there. Does Baba stop you? It is these bodily gurus who stop; do not go to Vishnu party, do not go here, do not go there. Do not go to the Mahakali party. Who stops? Do bodily gurus stop or does Baba stop? Arey, Baba says – You may go anywhere; just judge. Yes. Wherever you children get such aim-object that God teaches, then sit there affectionately. Baba does not stop you that if you want to suffer the pushes of the path of Bhakti anywhere, if you want to bow at someone’s feet, then go. It is because when people go to those satsangs in front of the Sanyasis, then everyone does bow. The Sanyasis are also bowing. Hm? So, everyone is bowing at the feet. Otherwise all the Sanyasis do not worship Shiva. But no, they do worship; the nice Sanyasis; among them, the Father has explained that the biggest Shankaracharya, the first and foremost Shankaracharya, does not bow his head before anyone. And even now whoever is the biggest Shankaracharya of India, will he bow his forehead before anyone? He will not bow his forehead. Yes. So, what does it prove? That do they bow their forehead after going to the temple of Shiva or not? Yes. They bow their foreheads by going to the temple of Shiva. But that is not a living person. Is it a living idol? That is a non-living stone; a stone idol has been kept.

Now look at the Shankaracharya; they say – Jagatguru Shankaracharya. Hm? Guru of the entire world. So, when they are gurus of the entire world, then will they bow their forehead before anyone? Will they bow? They will not bow. They say – We are Jagatgurus. Well, they should be explained firstly that you call yourselves Jagatgurus; so, how are you Jagatgurus, hm, when you worship? You might be worshipping in the temples, you might be worshipping your gurus. If someone is a Jagatguru, if he is the Guru of the entire world, then will he be the worshipper of anyone? Jagatguru comes only to set a goal. Why does the Guru of the entire world, the highest on high God come? He comes to set a goal that what do you have to become from a man (nar)? You have to become Narayan, you have to become Lakshmi from naari (woman). You have to become Purushottam Narayan. So, it is as if He gives a target that you too, the highest on high target that He gives that you should become Narayan from nar, worship that Shiv alone. Do not bow your forehead before anyone. Om Shanti. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
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प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2819-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-22.05
Time- 00.01-22.05


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को दूसरे पेज की छठी लाइन में बात चल रही थी - जब सन्यासी आते हैं उनको बताना पड़े, समझाना चाहिए तुम तो पूजा करते हो। जगत का गुरु होगा वो कोई की पूजा थोड़े ही करेंगे? अरे, जगत का गुरु तो आते हैं लक्ष्य देने के लिए। जो भी मनुष्य मात्र हैं, जिन्हें नर कहा जाता है; नर को नारायण बनाने का लक्ष्य देते हैं ना। तो गोया वो ही लक्ष्य देते हैं। क्या लक्ष्य देते हैं? कि हम शिव की पूजा करते हैं तो तुम भी शिव की पूजा करो। फिर करके जो चीज दिखलाते हैं। देखो इतने सभी भगत हैं। और सभी भगत बैठकरके पूजा करते हैं कोई ना कोई की, देवता की या निराकार की। तो ये निराकार की करते हैं। कौन? सन्यासी। हँ? ऊंचे ते ऊंची भक्ति हुई। उसको कहा ही जाएगा ऊंचे ते ऊंची भक्ति। पर वो भक्ति ही करते हैं ना। तो ऊंचे ते ऊंची कोई एक ये भक्ति थोड़े ही करते हैं। उनके तो अपने-अपने अलग-अलग गुरु होते हैं। जो सन्यासियों के जो गुरु होते हैं उनकी भी भक्ति करते हैं ना। तो बड़े तुमान से करते हैं, मान-मर्तबा से।

दूसरा, मंदिर में जाकरके फिर लोटी चढ़ा करके आते हैं। वो अपने गुरु की पूजा करेंगे फिर जाकर के मंदिर में जड़ मूर्ति को लोटा चढ़ा कर आएंगे लिंग को। पूजा करेंगे। अब है तो चीज एक ही। कोई दूसरी चीज़ तो नहीं है। अब उसे चांदी की बनाओ, सोने की बनाओ, हीरे की है या कोई की भी है। स्वर्ण लिंग भी बनाते हैं ना। रजत लिंग माने चांदी का भी बनाते हैं। तांबे का भी लिंग बनाते हैं। लोहे का भी। चलो, वो किसका भी लिंग है, अभी वस्तु तो वो एक ही है ना जिसकी पूजा करते हैं। कहेंगे लिंग की पूजा करते हैं। अब पूजा करते हैं तो पुजारी हो गए ना। हँ? पूज्य तो नहीं हुए। पुजारी पूजा करते हैं। पूज्य देवताएं होते हैं। वो थोड़े ही किसी की पूजा करते हैं। अभी पुजारी ये जगत का गुरु फिर कैसे हो सकते हैं? खुद ही पूजा करते हैं। जगत में तो सारे मनुष्य मात्र आ जाते हैं। अब भई पूज्य हो, जगतगुरु तो भाई ठीक है।

अब ये तुम तो जानते हो कि तुमको कोई ये, ये नहीं बनाए रहे। क्या? तुमको कोई नर से नारायण नहीं बनाए रहे हैं। नहीं। तुमको तो जो वास्तव में कहते हैं वंदे, बंदे मातरम। या जिनको भी वंदना करते हैं, ये, ये जो कहते हैं ना। और अक्सर करके कहते हैं। हँ? क्या कहते हैं? कृष्णम वंदे जगतगुरु। परंतु कृष्ण बंदे तो नहीं है। हँ? बंदे तो भगवान के होते हैं। और बंदे भगवान की वंदना करते हैं। तो ये तो सिर्फ एक शिवबाबा को कहेंगे जो वास्तव में सारे जगत का गुरु। क्योंकि कृष्ण को अगर कहें कि सारे जगत का गुरु तो उनको तो गुरु था, सांदीपन गुरु, तो जगत का गुरु कैसे हुआ? तो कृष्ण, वो तो सहज है कहना। अभी शिव के लिए कैसे कहें? क्योंकि शिव का तो लिंग है हाथ, पांव, नाक, आंख, कान तो हैं नहीं। अरे भई, शिवबाबा ही तो सबका उद्धार आकर करने वाला है ना। उद्धार कैसे करेगा? उद्धार माना कि उत् हर। ऊपर बुद्धि को, मन को ले जाए। अगर मन-बुद्धि नीचे की दुनिया में ही आसक्त बनी रहे तो उद्धार थोड़े ही कहेंगे। क्योंकि पुकारते ही उनको हैं। उनके लिए नहीं कहा जाता है शिव बंदे।

वंदना तो तुमको करनी नहीं है। शिव को भी वंदना नहीं करनी है। कोई को भी नहीं करनी है। तो बाप को कोई घड़ी-घड़ी कहना पड़े, घड़ी-घड़ी वंदना ही थोड़े ही करते हैं? टीचर को कोई घड़ी-घड़ी थोड़े ही कहते हैं भई वंदना करो? वंदना थोड़े ही की जाती है? नहीं। वंदना तो ये भक्ति मार्ग की बात है। वो बाबा तो यहां वंदना भी नहीं करने देते। तो वंदना क्यों करते बैठकर के? जबकि तुमको हम नमस्ते कर रहे हैं। यहां तो बाबा आकर खुद ही बच्चों को नमस्ते कर रहे हैं। तो फिर वंदना कैसे करेंगे? और जो नमस्ते करते हैं वो फिर वंदना कैसे करेंगे? नमस्ते तो पूज्य को कहा जाता है। पूज्य को ही नमस्ते की जाती है। अब भक्ति मार्ग तो वो मार्ग ही है भक्ति का। वंदना तो भक्ति मार्ग का अक्षर है। ये बैठकर के कहते हैं कि हम, हमारे आगे तो किस को भी हाथ जोड़ने का नहीं है। सिर्फ यहां तो बैठकर के समझने की बात है। बुद्धि से समझने की बात है। हाथ जोड़ने की तो कोई बात ही नहीं। फिर कहने की भी वो ही एक बात है जो बाप समझाते हैं। बाबा ने समझाया था ना कोई चांस ही तुमको नहीं देते हैं जो किसको बैठकरके समझाओ, जो वो समझें।

तो तुम बच्चों को तो देखो यहां आए हैं। कल भी आए एक ऑफिसर लोग। तो देखो, सभी तो नहीं समझ सकेंगे ना। अच्छा, बहुत अच्छा समझते थे कि ये बहुत अच्छा है। हां, यही ठीक नॉलेज है। और गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल के समान रहना तो फिर यही है अच्छी। नॉलेज तो इसे ही कहेंगे अच्छा। अब हम तो ऑफिसर हैं। अब ऑफिसर हैं तो कोई मना तो नहीं है ऑफीसरों को। नहीं। क्योंकि ऑफीसर तो यहां बहुत ही आते हैं। और ऑफिसरों में नौकरी करने वाले वाले। जैसे कोई एरोप्लेन में हों, नौकरी करने वाले आते हैं। ऑफिसों में नौकरी करने वाले आते हैं ना। और बिजली कंपनी में भी तो वो ऑफिसर हैं ना असली। सब ऑफिसर। एक पुलिस का सुपरिंटेंडेंट, एक इंस्पेक्टर, एक सिपाही। वो भी कोई के ऊपर ऑफिसर है। अब ऑफिसर तो सभी हैं। ऑफिस में काम करते हैं तो क्या वो ऐसे थोड़े ही कहेंगे कि हम को फुर्सत नहीं हैं? और इसमें तो फुर्सत की बात ही नहीं है। इसमें तो मूल बात है कि अपन को बैठे-बैठे आत्मा समझो। इसमें कोई तकलीफ तो नहीं है ना। बाप कोई तकलीफ देता है क्या? अपन को आत्मा समझो और बाप को याद करो। तो तुम सतोप्रधान बन जाओगे। और कोई तो बात तो है नहीं बाप को याद करने के सिवाय। और बाप जास्ती तो बात करते ही नहीं हैं।

देखो गीता भी है। ये गीता भी देखो कितनी थोड़ी है। वो ग्रंथ, वेद, शास्त्र तो कितने बड़े-बड़े। बाबा तो आकर के सुनाते ही हैं गीता ज्ञान। हँ? कहते हैं गीता तो उनसे भी छोटी होनी चाहिए। 15.11.1967 के प्रातः क्लास का तीसरा पेज। तो गीता कोई इतनी बड़ी थोड़े ही होनी चाहिए। और भागवत भी तो, जब गीता इतनी बड़ी नहीं, तो भागवत फिर उनका बच्चा कैसे बड़ा होना चाहिए? नहीं। कुछ भी नहीं। अरे, कोई भी चीज बड़ी नहीं होनी चाहिए। शास्त्र भी बड़ा नहीं क्योंकि इनका अक्षर ही है मनमनाभव मध्याजी भव। यानी उसका अर्थ भी एकदम एक्यूरेट पूरा है मामेकम याद करो। तो बच्चे तुम्हारा जो पाप कर्म है वो भस्म हो जाएगा। तो तुम तो बुलाते रहते हो ना - हे पतित पावन आओ। तो सो ही आकरके कहता हूं कि तुम पतित से पावन बनेंगा मुझे याद करने से। क्या? और कोई को याद करने से पावन नहीं बनेगा क्योंकि और इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कोई आत्मा ऐसी नहीं है जो शरीर में रह करके ऐसा पार्ट बजाए कि कोई पाप न बने उस आत्मा का। कोई है? कोई नहीं है।

तो मुझे ही याद करने से पावन बनेंगे। जैसा संग करेंगे वैसा ही रंग लगेगा ना। हँ? परंतु मन-बुद्धि से याद करने की बात है। कोई इंद्रियों से थोड़े ही याद किया जाता है। इंद्रियों से तो पूजा करते हैं। क्या? क्या करते हैं? पूजा माने? अरे? नहलाते हैं, धुलाते हैं, भोजन खिलाते हैं, कपड़े पहनाते हैं, पूजा करते हैं ना। यहां तो बाप कहते हैं मुझे याद करने से सतोप्रधान बन जाएंगे। तो और सतोप्रधान विश्व का मालिक बन जाएंगे। और ये भी तो समझते हो कि जो आकर के पुरुषार्थ करते हैं वो ही कम जास्ती जाकरके वहां राजाई का वर्सा पाते हैं। अब जैसा पुरुषार्थ करेंगे। और तो कुछ है नहीं। क्योंकि पढ़ाई कोई वास्तव में जास्ती तो है ही नहीं। पढ़ाई अगर कोई होती भी है ना, देखो बच्ची, जब पढ़ते हैं तो पहली पौढी पढ़ेंगे, पहली दर्जा, दूसरी दर्जा। फिर पढ़ते-पढ़ते 10 पीढ़ी, 10 पौढ़ी। फिर फलाना पढ़ेंगे, टीरा पढ़ेंगे। पढ़ते-पढ़ते पिछाड़ी में जो आकर के पढ़ते हैं बड़े-बड़े इम्तेहान। तो बस वो ही तो पढ़ते हैं। वो ही उनको याद रहता है थोड़ा। भई हमने ये पढ़ा। हम बैरिस्टर बना, फलाना-फलाना सब्जेक्ट पढ़ा, ये पढ़ा।

तो तुम्हारे पास भी सब्जेक्ट तो बाबा समझाते हैं ना। ऐसे नहीं कि तुम्हारे पास कोई सब्जेक्ट नहीं है। क्योंकि दैवी गुण धारण करना है। देवता बनना है तो दैवी गुण धारण करना है। ये भी तो सब्जेक्ट है ना। और इसके लिए भी समझाना पड़ता है बच्चों को कि ये भई कि ये जो तुम्हारे अंदर आसुरी गुण हैं ये नहीं होना चाहिए। हँ? आसुरी स्वभाव होना ही नहीं चाहिए बच्चों में। जब तुम्हारा लक्ष्य है ही देवता बनने का क्योंकि असुर तो रावण था ना। रावण का तो मतलब ही होता है लोगों को रुलाने वाला। हँ? तो, तो देखो उसको तो फिर आसुरी संप्रदाय कहेंगे। दूसरों को रुला देते हैं। दुख दिया ना। तो बाप ने समझाया ना बच्ची - एक तरफ में हैं आसुरी संप्रदाय। उनको कहेंगे रावण की संप्रदाय। और जिसको जानते भी हैं बच्चे। देखो, किसको बताते हैं। कहते हैं ना देखो रावण को क्यों जलाते हैं? अरे, दुनिया में भी कोई किसी को बहुत दुख देते हैं, प्रजा के लोग बहुत दुखी होते हैं तो क्या करते हैं? हँ? उसका पुतला बनाके जलाते हैं ना? हां। (क्रमशः)

A morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the sixth line of the second page on Wednesday was – When the Sanyasis come, they will have to be told, they should be explained that you worship. Will the Guru of the world worship anyone? Arey, the Guru of the world comes to give a target. All the human beings, who are called ‘nar’, He gives ‘nar’ the target of making (becoming) Narayan, doesn’t He? So, it is as if He gives the target. What target do they give? That we worship Shiva; so, you too worship Shiva. Then they show a thing. Look, there are so many devotees. And all the devotees sit and worship one or the other deity or the incorporeal. So, they worship the incorporeal. Who? The Sanyasis. Hm? It is the Bhakti of the highest on high. That will be called highest on high Bhakti. But they do Bhakti only, don’t they? So, do they do one highest on high Bhakti? They have their individual separate gurus. They also worship the Gurus of the Sanyasis, don’t they? So, they do that with a lot of majesty, respect and position.

Secondly, they go to the temple and then pour a loti (tumbler full of water/milk) and come. They will worship their guru and then go and pour a loti over the non-living idol, the ling in the temple and come. They worship it. Well, it is the same thing only. It is not a different thing. Well, you may make it of silver, you may make it of gold; it may be of diamond or of anything. They make golden ling also, don’t they? They make rajat ling, i.e. of silver also. They also make ling of copper. Of iron also. Okay, it may be a ling of anything, well, it is the same thing, isn’t it, which they worship. They will say that they worship the ling. Well, when they worship, they are worshippers, aren’t they? Hm? They are not worshipworthy. Worshippers worship. Deities are worshippers. Do they worship anyone? Well, how can these worshippers then be Gurus of the world? They themselves worship. The entire mankind is included in the world. Well, brother, if you are worshipworthy, if you are Jagatguru (Guru of the world), then brother it is alright.

Now you know that you are not being made by this one, this one. What? You are not being made Narayan from nar [by this one]. No. You are actually told Vandey, Vandey Mataram. Or whomsoever you pray (vandana), you say this, don’t you? And you often say. Hm? What do you say? Krishnam vandey Jagatguru. But you are not people (bandey) of Krishna. Hm? People belong to God. And people pray to God. So, you will say only for one ShivBaba who is the Guru of the entire world in reality. It is because if you say for Krishna that he is the Guru of the entire world, then he had a Guru, Guru Sandipani, so how can he be the Guru of the world? So, it is easy to say for Krishna. Well, how can we say now for Shiv? It is because Shiv has a ling; He does not have hands, legs, nose, eyes, ears. Arey brother, ShivBaba is the one who comes and uplifts everyone, doesn’t He? How will He uplift (uddhaar)? Uddhaar means ut har. You should take the intellect, the mind up above. If the mind and intellect remains attached in the lower world itself, then will it be called upliftment (uddhaar)? It is because you call Him. It is not said for Him – Shiv Bandey.

You don’t have to pray. You don’t have to pray to Shiv as well. You don’t have to pray to anyone. So, does anyone say to his/her Father every moment, does one pray to him every moment? Does anyone tell the teacher every moment that brother, pray to him? Do you pray to him? No. Prayer (vandana) is a topic of the path of Bhakti. Baba does not allow you to pray here as well. So, why do you sit and pray? While we are saying Namaste to you here. Here Baba comes and is Himself telling Namaste to the children. So, then how will you pray to Him? And how will those who say Namaste pray? Namaste is said to someone who is worshipworthy. Namaste is said only to the worshipworthy. Well, the path of Bhakti is a path of Bhakti only. Vandana (prayer) is a word of the path of Bhakti. This one sits and says that there is no need for anyone to fold their hands in front of Me. Here it is only a topic of sitting and understanding. It is a topic to be understood through the intellect. There is no topic of folding your hands [in reverence] at all. Then there is only one topic to be uttered which the Father explains. Baba had explained, hadn’t He that they don’t give you any chance at all that you sit and explain to anyone and they understand.

So, look, you children have come here. Yesterday also an officer had come. So, look, all will not be able to understand, will they? He used to understand nicely, very nicely that this is very good. Yes, this alone is the correct knowledge. And leading a lotus flower like life while living in household is good. This knowledge alone will be called good. Well, we are officers. Well, if you are an officer, then the officers are not prohibited. No. It is because many officers come here. And those who work as officers. For example, people employed to work on an aeroplane come. Those working in offices come, don’t they? And even in the electricity company they are real officers. All are officers. One is a Police Superintendent, one is an Inspector, and one is a constable (sipaahi). They too are officers over someone. Well, everyone is an officer. If they are working in offices, will they say that they don’t have time? And there is no question of leisure in this at all. In this the main topic is to consider oneself a soul while sitting. There is no difficulty in this. Does the Father give you any trouble? Consider yourself to be a soul and remember the Father. Then you will become satopradhan. There is no topic other than remembering the Father. And the Father doesn’t talk much at all.

Look, there is the Gita as well. Look, this Gita is also so small. Those books, Vedas, scriptures are so big. Baba comes and narrates only the knowledge of Gita. Hm? He says that the Gita should be even smaller. Third page of the morning class dated 15.11.1967. So, the Gita shouldn’t be so big. And Bhaagwat as well; when the Gita is not so big, then how can her child, the Bhaagwat be so big? No. Nothing at all. Arey, nothing should be big. Even the scripture shouldn’t be big because its words itself are ‘Manmanaabhav Madhyaajibhav’. It means that its meaning is also very accurate – Remember Me alone. Then, children your sinful actions will be burnt. So, you keep on calling, don’t you? O purifier of the sinful ones, come. So, I come and tell that you will become pure from sinful by remembering Me. What? You will not become pure by remembering anyone else because there is no such soul on this world stage that could remain in the body and play such a part that that soul does not accrue any sin. Is there anyone? There is nobody.

So, you will become pure only be remembering Me. You will be coloured by the company that you keep, will you not? Hm? But it is about remembering through the mind and intellect. One doesn’t remember through the organs. One worships through the organs. What? What do you do? What is meant by worship? Arey? You bathe them, you wash them, you offer them food, you drape them with clothes, you worship, don’t you? Here the Father says that you will become satopradhan by remembering Me. Then you will become satopradhan, Master of the world. And you also understand that those who come and make purusharth, they alone get the inheritance of kingship more or less. Well, as if the purusharth one makes. And there is nothing else. It is because the study is not much. Even if there is a study, then look daughter, when you study, then you study in the first step, first class, second class. Then while studying you reach 10th generation, tenth step (class/grade). Then you study such and such thing. While studying ultimately you study for the big exams. So, that is it, you study for that only. They remember that alone a little. Brother, we studied this. I became a Barrister, I studied such and such subject; I studied this.

So, Baba also explains the subject to you, doesn’t He? It is not as if you don’t have a subject. It is because you have to inculcate divine virtues. If you want to become deities, then you have to inculcate divine virtues. This is also a subject, isn’t it? And for this also the children have to be explained that you shouldn’t have the demoniac qualities that you have in you. Hm? Children shouldn’t have demoniac nature at all. When your goal itself is to become deities because Ravan was a demon, wasn’t he? Ravan itself means the one who makes people cry. Hm? So, so, look, that will then be called a demoniac community. They make others cry. He gave sorrows, didn’t he? So, daughter, the Father explained, didn’t He? On the one side are the demoniac communities. They will be called Ravana’s community. And children know him. Look, who are told? People say, don’t they? Look, why is Ravana burnt? Arey, if anyone gives a lot of sorrows to anyone in the world, when the subjects become very sorrowful, then what do they do? Hm? They make his effigy and burn, don’t they? Yes. (Continued)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2819, दिनांक 14.03.2019
VCD 2819, dated 14.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2819-Bilingual-Part-2

समय- 22.06-45.51
Time- 22.06-45.51


अब ये तो किसी को मालूम थोड़े ही है कि रावण क्या है? कुछ भी नहीं मालूम है। उनको कितना भी समझाते हैं। ये है बहुत बड़ा पुराना दुश्मन भारत का है। हँ? पुराना दुश्मन है? कितना पुराना दुश्मन है? हँ? ढाई हजार साल का पुराना दुश्मन? और जलाते कब से आए? ये कुछ पता नहीं। हँ? अरे बताया ना, जब बहुत दुख देते हैं, सहन नहीं होता है, सहनशक्ति से परे हो जाता है तो जलाते हैं पुतला बनाके। तो ऐसे ही ऐसे नहीं कि ढाई हजार साल से रावण को जलाते आए हैं। नहीं। जब कलियुग शुरू होता है ना तो फिर बहुत दुख देते हैं। तो देखो, ये तो पता चला कि कब का पुराना दुश्मन है। ये द्वापरयुग जब से शुरू हुआ द्वैतवादी, 2-2 धर्म, 2-2 राज्य, 2-2 कुल, 2-2 भाषाएं, 2-2 मतें, तबसे ये पुराना दुश्मन, हां। तो अब तो वो बिचारा जभी समझे कि भई आधा कल्प का दुश्मन है, ढाई हजार वर्ष का। और ये आधा कल्प में कोई दुश्मन होता ही नहीं है ये। इसलिए, हँ, इसलिए कहते हैं कि भई सुख का राज्य भी होता है। और जहां सुख का राज्य होता है उसको सुखधाम कहा जाता है।

पीछे जब आसुरी राज्य शुरू होता है तो उसको दुखधाम। शुरू से लेकरके दुखधाम कहेंगे। कोई दुख तुम बच्चों को बाबा बोलते हैं कि मिलता नहीं है? अरे, दुखधाम में तो दुख ही मिलता है। परंतु मिलता है, धीरे-धीरे बढ़ता है दुख भी कि एकदम बढ़ जाता है? धीरे-धीरे बढ़ता है। आहिस्ते-आहिस्ते, धीरे-धीरे। फिर ये विकार में जाने से ये पहले से ही तो दुख हुआ ना। हँ? काहे में जाने से? विकार। कार माने कार्य। वि माने विपरीत कार्य। जो देवताएं कार्य करते थे, हँ, देवताएं तो काहे से कार्य करते थे? हँ? ज्ञान इंद्रियों से कार्य करते थे ना। स्नेह भी करते थे तो ज्ञान इंद्रियों से करते थे। मुख का प्यार था। ये नीची इंद्रियों का, भ्रष्ट इंद्रियों का प्यार थोड़े ही था? हँ?

तो बताया कि जब यह उल्टा मार्ग पकड़ा, हँ, दुखदाई इंद्रिय का, तो ये दुख शुरू हुए। कहेंगे उल्टा मार्ग पकड़ा माना वाम मार्ग पकड़ा, वाम मार्ग में गए। तो ये दुख ही हुआ ना। तो ये सारी बात वाम मार्ग के ऊपर है। क्या? इसलिए इस सृष्टि चक्र के जो चित्र है ना उसमें समझाते हैं ना कि सतयुग त्रेता है दाईं हाथ, दाईं ओर, और द्वापर कलयुग है बाएं हाथ की ओर। तो वाम मार्ग हुआ। उल्टे रास्ते में चल पड़े। तो ये वाम मार्ग, ये विकारी मार्ग कोई कम थोड़े ही है बच्ची। विपरीत कार्य के मार्ग पर तो चल पड़े ना। अरे, बात मत पूछो। ये तो अच्छे-अच्छे जो बैठकर के यहां समझते भी हैं, बहुत अच्छे-अच्छे आते हैं। समझते हैं ना अच्छी तरह से। ये बच्ची ऐसी क्रिमिनल आई जो घड़ी-घड़ी सावधानी ना मिले और चले जावें कहां बाहर में, ये तो थोड़े वक्त में उसको हाथ लगाओ, ये करो, वो करो। उनकी वो जो वृत्ति है ना अंदर संस्कार अपवित्रता के, वो सारी पवित्रता उनकी भंग हो जाती है। समझा ना? हां, यह ऐसी ही बात है बच्ची। ये आहिस्ते-आहिस्ते करके भले थोड़ा अच्छा हाथ लगाएंगे, थोड़ा ही लगाएंगे। नहीं करेंगे, ये करेंगे, हाथ लगाएंगे, ये करेंगे। हाँ, हाँ, करेंगे-करेंगे करके आखरीन में तो फंस ही पड़ते हैं। तो इसमें तो फंसने का बिल्कुल है ही नहीं। किसमें? किस में फंसने का नहीं है बिल्कुल? ये जो कर्म इंद्रियों की बात बताई ना। तो कर्मेंद्रियां चाहे हाथ हों, पांव हों या कोई भी इंद्रियां हों ऐसी कर्म करने वाली, उसमें तो शुरुआत ही नहीं करना है फंसने की।

वो अक्षर ही ऐसे हैं कि अगर ऐसे करेंगे तो फिर बाप कहते हैं सजा खाएंगे। तो क्योंकि काम कटारी एक दो के ऊपर चलाने से फिर सजा खाते हैं। क्या? तो इसलिए कहते रहते हैं खबरदार रहना। भले अंदर में कितना भी तूफान आए, कुछ भी आए, तो भी वो, वो खता नहीं करना एकदम। सन्यासियों ने भी कहा है कि भई ये सर्पिणी है। और अपने सर्प बनने से वह भाग जाती है। हँ? क्योंकि खुद सर्प ही तो है ना। तो घर छोड़ देते हैं। कि जहां हम जंगल में चले जावेंगे तो ना होगी वहां सर्पिणी और ना हम सर्प बनेंगे सर्पिणी में फंसेंगे। यानी सर्प तो जरूर कुछ हुए ना। ऐसे तो जरूर है ना। हां, पीछे अलग होकर के, जाकर के पवित्र बनते हैं। बस। तो उनको कहा जाएगा। क्या? पवित्र। पवित्र आत्मा कहते हैं। अब आत्मा पवित्र कहते हैं तो क्या मन-बुद्धि से पवित्र बनते हैं? मन-बुद्धि से याद नहीं करते सर्पिणी को? हँ? क्योंकि फिर भी तो पैदाइश कहां से हुई है? हँ? पैदाइश तो वो ही भ्रष्ट इंद्रियों से हुई ना। हँ? भ्रष्ट कर्म से ही पैदा हुए ना। शरीर तो विकार से ही पैदा होते हैं द्वापर युग से। बिगर विकार के तो शरीर मिल ही नहीं सकता ना। और आत्मा भी तो फिर जो पवित्र थी द्वापरयुग से पहले सतयुग त्रेता में वो अपवित्र हो जाती है ना जरूर क्योंकि जन्म बाई जन्म जो होते हैं अभी जन्म को कोई जानते नहीं हैं कि हमने कहां कैसे कितने जन्म लिए?

15.11.67 की प्रातः क्लास का चौथा पेज तीसरी लाइन। ये सन्यासी उदासी वगैरा-वगैरा ये, ये भी नहीं समझते हैं कि अरे भई सतयुग में तो सुख ही सुख होता है क्योंकि वहां तो हैं ही 16 कला संपूर्ण। सतयुग को कहा ही जाता है 16 कला संपूर्ण। अच्छा पीढ़ियां चलेंगी जन्म बाई जन्म वो थोड़े उतरेंगे धीरे-धीरे। तो सुख कम होता जावेगा ना। पीछे जो हम आते हैं पीछे तो जरूर पीछे आते हैं तो विकार से ही पैदा हुए द्वापरयुग से। और फिर तो ढेर के ढेर आते ही रहते हैं। कौन? वो ही आत्माएं आती रहती हैं जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कभी भी श्रेष्ठ इंद्रियों से पार्ट नहीं बजाती हैं सुख लेने का। बस। आते ही रहते हैं भ्रष्ट इंद्रियों का पार्ट बजाने वाले। भले हम कितना भी पढ़ते हैं, शास्त्र पढ़ते हैं, अच्छी-अच्छी बातें पढ़ते हैं। चलो हम विकार से घर छोड़ करके क्योंकि एक फैशन निकल गया कि एक ने घरबार छोड़ा तो उनको देख करके दूसरों ने भी छोड़ दिया। एक आद्य शंकराचार्य निकला और उसने ऐसी पट्टी पढ़ाई, पढ़ाना शुरू की तो दूसरों ने भी धड़ाधड़, बड़े-बड़े राजाओं ने भी हां छोड़ दिया राजपाट, रनिवास छोड़ दिया क्योंकि ये धर्म की तो स्थापना होनी है ना। सन्यास धर्म की भी तो स्थापना होनी है। तो उनकी भी संख्या बढ़ेगी ना। तो ये भी एक धर्म है। ये यहां सन्यासियों का सन्यास है। क्या? नाम रख दिया है - सं माना संपूर्ण। न्यास माने त्याग। तो समझते हैं हमने घरबार छोड़ दिया, पत्नी, बीबी, बाल-बच्चे छोड़ दिए तो हमने सब कुछ छोड़ दिया।

अरे, तो अभी सन्यास तो फिर भी तो दो प्रकार का हुआ ना। क्या? अभी बाबा ने समझाया ना एक हद का सन्यास और एक बेहद का सन्यास। तो वो तो देखो सन्यास करते आए। कौन सा? हद का सन्यास करते आए हैं ना। हद की चीजों को छोड़ दिया। कितने समय से वो सन्यास करते आए हैं। कहेंगे जब से वो आए हैं तब से सन्यास शुरू हुआ सन्यासियों का। कब से आए? वो आए आज से डेढ़ हजार साल पहले। उस समय कलियुग नहीं था। क्या? उस समय द्वापर का अंत था। तो कलियुग तो पहले सात्विक स्टेज में रहेगा ना। तो वो द्वापर के अंत में आते हैं अंतिम समय में और अपने धर्म की स्थापना करते हैं जोर-शोर से। ढेर के ढेर राजाएं और उनकी प्रजा उनको फॉलो करती है। तब से सन्यास करते ही चले आए।

तो तुम्हारा सन्यास है एक समय। क्या? एक समय माने? तुम चार युगों में से कोई युग में सन्यास नहीं करते हो। घरबार का, बीबी, बाल-बच्चों का सन्यास करते हो? नहीं करते हो। तुम्हारा सन्यास है एक समय। कौन सा एक समय? इस पुरुषोत्तम संगमयुग में जब बाप आते हैं तो बस इस 100 साल के संगमयुग में तुम्हारा सन्यास है बेहद का। एक ही समय और एक ही जन्म का तुम्हारा सन्यास है। इस समय में जो-जो, हँ, जो-जो संन्यास किया, बस, फिर चले गए अमरपुरी में क्योंकि फिर तो वो है ही नहीं वहां दूसरा। क्या? दूसरा वो संन्यास, वो कोई हद का सन्यास तो वहां है ही नहीं तुम्हारे लिए। कहां? न हद का, न बेहद का। कहां? अरे स्वर्ग में, सतयुग त्रेता में न हद का सन्यास, न बेहद का सन्यास।

तो उनका और तुम्हारा भी कितना रात दिन का फर्क है। उन सन्यासियों का सन्यास। और तुम्हारा, तुम्हारा सन्यास बहुत थोड़े समय का है। उनका तो अनेक जन्मों का सन्यास। क्या? हँ? और शूटिंग भी कहां होती है? रिहर्सल कहां होती है? कौन करता है?
(किसी ने कुछ कहा।) ऊपरवाला करता है? सब ऊपर वाले के लिए उंगली उठा देते। कौन करता है सन्यास? (किसी ने कुछ कहा।) शंकर जी करते हैं सन्यास? अच्छा? और ‘तुम्हारा’ किसके लिए कहा? हँ? ‘तुम्हारा सन्यास है एक समय का।‘ ये शंकर जी के लिए नहीं कहा? पहले तो शंकर जी के लिए लागू होगा। हँ? फिर उनके फॉलोअर के लिए लागू होगा। तो बताया कि जहां शूटिंग होती है, रिहर्सल होती है, उनमें सन्यास धर्म की शूटिंग कौन करते हैं? कौन है सन्यासी और उनमें अव्वल नंबर कौन? (किसी ने कुछ कहा।) बीके? बहुत से बीके हैं। उनमें अव्वल नंबर? हां, लक्ष्मी। क्या कहा? हँ? किसके फॉलोअर बनना? हँ? हां, पक्का कर लेना। स्वीकार है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) स्वीकार है? वाह वाह रे सन्यासी। संडासी जी महाराज। मन से क्या करेंगे? मन से वही संडास को याद करते रहेंगे। और तन से? दुनिया को दिखाएंगे दिखावा। क्या? देखो हमने सन्यास कर लिया। अब अंदर को तो कोई जानता ही नहीं क्या हो रहा है। हाँ।

तो तुम एक ही बार सन्यास करते हो। घड़ी-घड़ी हद का सन्यास करते हैं वो। और तुम तो एक ही बार बेहद का सन्यास करते हो। उस लिस्ट में तुम नहीं हो। जो एक ही बार करते हो एक ही जन्म में। अच्छा कोई-कोई दो जन्म भी लेते हैं संगमयुग में। हँ? लेते हैं ना। बेहद का सन्यास करते हो। तो ये बातें भूल तो नहीं जानी चाहिए ना। क्या? क्या बातें? लक्ष्मी को भी। कि लक्ष्मी नामधारी भी अनेक होंगी? हां।
(किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी एक ही होगी? अच्छा? और नारायण? नारायण भी सतयुग में एक ही होगा? पीढ़ी दर पीढ़ी और नारायण नहीं होंगे? होंगे ना। तो सन्यास किसका कहेंगे? और किसका कहेंगे सन्यास नहीं? ये तो जल्दी से स्वीकार कर लिया मैं तो सन्यासी नहीं बनूंगा। (किसी ने कुछ कहा।) हां। जो इस्लाम धर्म की आत्माएं हैं कन्वर्ट होने वाली जो पहला नारायण होगा ना उसका जो बच्चा बनेगा, बच्ची बनेगी और उनके जितने भी फॉलोअर्स होंगे वो हैं असली सन्यासी द्वापरयुग से। दूसरे धर्म में कन्वर्ट होंगे कि नहीं? हां। बाकी जो पहले जन्म की लक्ष्मी है, हँ, जो सतयुग में राधा और कृष्ण माना ब्रह्मा बाबा और ओम राधे। और उनको जन्म देने वाले मां-बाप। तो वो क्या सन्यासी बनते हैं? फिर तुमने कैसे स्वीकार कर लिया हम तो जन्म-जन्म बनेंगे? हँ? नहीं। वो तो हैं प्रवृत्ति मार्ग के सूर्यवंशी और चंद्रवंशी, हां, पक्के हैं अपने धर्म के। चंद्रवंशी भी हैं तो फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास? फर्स्ट क्लास चंद्रवंशी। हां।

तो ये तो अच्छी तरह से धारण करना चाहिए। क्या? कि जो अव्वल नंबर लक्ष्मी है या उसके बाद में भी दूसरी पीढ़ी में आने वाली लक्ष्मी है तो वो तो सन्यासी नहीं बनते। क्या? बनते हैं? नहीं बनते हैं। वो तो तुम बच्चे जो इस एक जन्म में ही आकर के क्या? हां, तुम तो तुम्हारा बेहद का सन्यास है, वो भी हद का नहीं। तो अच्छी तरह से ये बात धारण करनी चाहिए। और उसमें भी जो वो जो है ना क्या नाम अव्वल नंबर आदि लक्ष्मी वो मन से त्यागती है क्या? मन से त्याग देना माना बेहद का सन्यास। मन से भी याद ना करे तो क्या कहें? बेहद का सन्यास। और मन से याद करती रहे तो क्या कहेंगे? हद का सन्यास। तो फर्स्ट क्लास बेहद का सन्यास किसका हुआ? हँ? लक्ष्मी को भी क्या कहेंगे? मन से याद करना छोड़ती है? मन से याद करना नहीं छोड़ती। क्या? जगदंबा क्या करेगी? और जो भारत माता, लक्ष्मी है, वो क्या करेगी? क्या अंतर है दोनों में? जगदंबा तन को याद करेगी। और तन की याद करना भूलती ही नहीं। और जो भारत माता है, लक्ष्मी है, आदि लक्ष्मी, वो मन से याद करना छोड़ पाती है? मन से याद नहीं करना छोड़ पाती। तो बेहद का सन्यासी हुई ना। बाप तुमको क्या सिखाते हैं? क्या बनना है बच्ची? क्या लक्ष्य लिया है? हाँ। हमको मन से याद बुद्धि से याद करना है। किस को याद करना है? हमारा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। कि लक्ष्मी? हाँ। नहीं। कभी कहेगा, हां, पीछे-पीछे चलेगा, कभी कहेगा नहीं। हां। तो ये तो अच्छी तरह से धारण करनी चाहिए। ओमशांति। (समाप्त)

Well, nobody knows that what is Ravan? They know nothing. You may explain to them to any extent. This is a very big, old enemy of Bhaarat. Hm? Is he an old enemy? How old an enemy is he? Hm? 2500 years old enemy? And since when have you been burning? They know nothing. Hm? Arey, it was told, wasn’t it? When someone gives a lot of sorrows, when one is unable to tolerate, when it goes beyond our power of tolerance, then you burn him by making his effigy. So, similarly, it is not as if you have been burning Ravan since 2500 years. No. When the Iron Age starts, then he gives a lot of sorrows. So, look, you have come to know that how old an enemy he is. Ever since this dualist Copper Age started, when 2-2 religions, 2-2 kingdoms, 2-2 clans, 2-2 languages, 2-2 opinions started, he is an old enemy since then, yes. So, when that poor fellow understands that brother he is an enemy since half a Kalpa, since 2500 years. And for half a Kalpa this enemy doesn’t exist at all. This is why, hm, this is why it is said that brother there is a kingdom of joy also. And wherever there is a kingdom of happiness, it is called an abode of happiness (sukhdhaam).

Later, when the demoniac kingdom starts, then it is called an abode of sorrows. It will be called an abode of sorrows from the beginning. Baba says – Do you children get any sorrows or not? Arey, you get sorrows only in the abode of sorrows. But you get it, does sorrow also increase gradually or does it increase suddenly? It increases gradually. Gradually, slowly. Then by indulging in lust, you get sorrows from the beginning itself, don’t you? Hm? By indulging in what? Lust (vikaar). Kaar means task. Vi means opposite task. The tasks that the deities used to perform, hm, how did the deities used to work? Hm? They used to work through the sense organs, didn’t they? Even if they used to love, they used to do it through the sense organs. There was oral love. Was there the love of these low organs, unrighteous organs? Hm?

So, it was told that when you followed this opposite path of the organ causing sorrows, then these sorrows started. It will be said that you followed the opposite path, i.e. the leftist path; you went on the leftist path. So, this is sorrow only, isn’t it? So, all these topics are based on the leftist path. What? This is why it is explained on the picture of this world cycle that the Golden Age and Silver Age are on the right hand side, on the right side and the Copper Age and the Iron Age are on the left hand side. So, it is leftist path, isn’t it? You started following the opposite path. So, daughter, this leftist path, this vicious path is not any less. You started following the path of opposite task, didn’t you? Arey, just do not ask. Nice ones, who sit and understand here; many nice ones come. They understand nicely, don’t they? Daughter, if you are not cautioned about this criminal eye and if you go out anywhere, within a short time [you start thinking], touch that one, do this, do that. Their vibrations within, the sanskars of impurity, their entire purity gets violated. Did you understand? Yes, daughter this topic is like this. Gradually, they will touch a little; they will touch a little only. They will not do; they will do this; they will touch with their hands, they will do this. Yes, yes, they will do, they will do; ultimately they get entangled. So, you should not get entangled in this at all. In what? In what shouldn’t you get entangled at all? This topic of the organs of action which was mentioned, wasn’t it? So, the organs of action, be it the hands, be it the legs or be it any organs performing such actions, you shouldn’t even make a beginning of getting entangled at all.

Those words themselves are like this that if you do like this, then the Father says that you will suffer punishments. So, it is because you suffer punishments if you use the axe of lust against each other. What? So, this is why He keeps on telling – Be careful. You may face storms to whatever extent internally, whatever you may face, yet, do not commit that mistake at all. The Sanyasis have also said that brother, this is a she-snake (sarpini). And when you become a he-snake, she runs away. Hm? It is because you yourself are he-snakes, aren’t you? So, you renounce the home. If we go to the jungle, then neither will there be a she-snake there nor will I become a he-snake and get entangled in a she-snake. It means that you are definitely he-snake to some extent, aren’t you? It is definitely like this, isn’t it? Yes, later you separate and become pure. That is it. So, they will be called; what? Pure. They are called a pure soul. Well, if they are called pure, then do they remain pure through the mind and intellect? Don’t they remember the she-snake through the mind and intellect? Hm? It is because how were they born? Hm? Birth was through the unrighteous organs only, wasn’t it? Hm? They were born through the unrighteous acts only, weren’t they? The bodies are born through lust only from the Copper Age. You cannot get a body without lust, can you? And even the soul which was pure before the Copper Age in the Golden Age and Silver Age, then becomes impure, doesn’t it because birth by birth, now nobody knows about his/her births that where, how and how many births have we taken?

Fourth page of the morning class dated 15.11.67, third line. These Sanyasis, Udasis, etc, do not even understand that arey, brother, there is only happiness in the Golden Age because there you are perfect in 16 celestial degrees. The Golden Age itself is called perfect in 16 celestial degrees. Okay, the generations will continue birth by birth; they will decline gradually. Then the happiness will keep on decreasing, will it not? Later we come later, then definitely when we come later, then we were born only through lust from the Copper Age. And then numerous people keep on coming. Who? The same souls which never play the part of obtaining joy through righteous organs on this world stage keep on coming. That is it. Those who play the part of unrighteous organs keep on coming. Although we read so much, we read the scriptures, we read nice things. Okay, we leave the house because of lust because a fashion emerged that if one leaves his household then seeing him, others also leave. One Aadya Shankaracharya emerged and he taught such a lesson, he started such teachings that others also started leaving in flocks, yes, even big kings left their kingship, left their queen’s palaces because this religion is to be established, isn’t it? The Sanyas religion is also to be established. So, their numbers will also increase, will it not? So, this is also a religion. This is a renunciation (sanyas) of Sanyasis here. What? The name has been coined as – Sam means sampoorna (complete). Nyas means sacrifice (tyaag). So, they think that since we have renounced the household, since we have renounced the wife and children, so we left everything.

Arey, so, now sanyas is however of two types, isn’t it? What? Baba explained just now, didn’t He that one is a limited Sanyas and one is an unlimited Sanyas. So, look you have been doing that Sanyas. Which one? You have been practicing limited Sanyas, haven’t you? You renounced the limited things. You have been doing that Sanyas since such a long time! It will be said that ever since they have come, the Sanyas of the Sanyasis has started. Since when have they come? They came 1500 years from this day. At that time it was not Kaliyuga (Iron Age). What? At that time it was the end of the Copper Age. So, the Iron Age will initially be in a pure stage, will it not be? So, they come in the end of the Copper Age in the last time and establish their religion vigorously. Numerous kings and their subjects start following them. Since then they have been practicing Sanyas.

So, your Sanyas is one time. What? What is meant by ‘one time’? You do not practice Sanyas in any Age out of the four Ages. Do you renounce the household, wife and children? You don’t. Your Sanyas is one time. Which one time? When the Father comes in this Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age), then your unlimited Sanyas is only during this 100 years’ Confluence Age. Your Sanyas is only for one time and only for one birth. In this time, whatever Sanyas you practiced, that is it; then you go to the abode of eternity (amarpuri) because then there isn’t that other one. What? The other Sanyas; that limited Sanyas doesn’t exist there for you. Where? Neither limited nor unlimited. Where? Arey, in the heaven, in the Golden Age and the Silver Age, neither is there limited Sanyas nor is there unlimited Sanyas.

So, there is such a difference of day and night in theirs’ and yours’. The Sanyas of those Sanyasis. And your, your Sanyas is for a very less time. Their Sanyas is for many births. What? Hm? And where does the shooting also take place? Where does the rehearsal take place? Who does?
(Someone said something.) Does the above one (ooparvala) do? You all raise your finger for the above one. Who practices Sanyas? (Student said something.) Does Shankarji practice Sanyas? Achcha? And for whom was ‘yours’ said? Hm? Your Sanyas is for one time. Wasn’t this said for Shankarji? First it will be applicable to Shankarji. Hm? Then it will be applicable to his follower. So, it was told that the place where the shooting takes place, the rehearsal takes place, who performs the shooting of the Sanyas religion among them? Who are Sanyasis and who is number one among them? (Someone said something.) BKs? There are many BKs. Who is number one among them? Yes, Lakshmi. What did you say? Whose follower should you become? Hm? Yes, make it sure. Do you accept? Hm? (Someone said something.) Do you accept? Wow, wow, O Sanyasi. Sandasi ji Maharaj. What will you do through your mind? You will keep on remembering the same Sandaas (washroom) through your mind. And through the body? You will show-off before the world. What? Look, we have renounced. Well, nobody knows what is going on inside. Yes.

So, you practice Sanyas only once. They practice limited Sanyas every moment. And you practice unlimited Sanyas only once. You are not in that list. You practice only once in only one birth. Achcha, some get even two births in the Confluence Age. Hm? They get, don’t they? You practice unlimited Sanyas. So, you shouldn’t forget these topics, should you? What? Which topics? Even Lakshmi. Or will those with the name Lakshmi also be many? Yes.
(Someone said something.) Will Lakshmi be only one? Achcha? And Narayan? Will Narayan also be only one in the Golden Age? Will there not be other Narayans generation by generation? They will exist, will they not? So, whose Sanyas will it be called? And whose Sanyas will it not be called? You accepted quickly that I will not become Sanyasi. (Someone said something.) Yes. The souls of Islam religion who convert, the one who becomes the son, the daughter of the first Narayan and all their followers are the true Sanyasis from the Copper Age. Will they convert to other religion or not? Yes. As regards the Lakshmi of the first birth, Radha and Krishna in the Golden Age, i.e. Brahma Baba and Om Radhey. And the parents who give them birth. So, do they become Sanyasis? Then how did you accept that we will become birth by birth? Hm? No. Those Suryavanshis and Chandravanshis belong to the path of household, yes, they are steadfast in their religion. Even if you are Chandravanshis, are you first class or second class? First class Chandrvanshis. Yes.

So you should inculcate this nicely. What? That the number one Lakshmi or the Lakshmi who comes after that in the second generation, they do not become Sanyasis. What? Do they become? They do not become. You children, after coming to this birth; what? Yes, yours’ is unlimited Sanyas; that too, not limited. So, you should inculcate this topic nicely. And even in that what do you call her, the number one first Lakshmi, does she renounce through her mind? To renounce through the mind means unlimited Sanyas. If she doesn’t remember even through the mind then what will we say? Unlimited Sanyas. And if she continues to remember through the mind, then what will you say? Limited Sanyas. So, whose is the first class unlimited Sanyas? Hm? What will be said even about Lakshmi? Does she stop remembering through the mind? She doesn’t stop remembering through the mind. What? What will Jagdamba do? And what will Mother India, Lakshmi do? What is the difference between both of them? Jagdamba will remember the body. And she doesn’t forget remembering the body at all. And the Mother India, Lakshmi, the first Lakshmi, is she able to stop remembering through the mind? She is unable to stop remembering through the mind. So, she is unlimited Sanyasi, isn’t she? What does the Father teach you? What should you become daughter? What is the goal that you have set? Yes. We should remember through the mind, through the intellect. Whom should we remember? One ShivBaba and none else belong to us. Or Lakshmi? Yes. No. Sometimes he says yes, he will follow; sometimes he will say ‘no’. Yes. So, you should inculcate this nicely. Om Shanti. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2820, दिनांक 15.03.2019
VCD 2820, dated 15.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning Class dated 15.11.1967
VCD-2820-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-19.17
Time- 00.01-19.17


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी कि वो सन्यासी तो घड़ी-घड़ी हद का सन्यास करते हैं। और तुम तो एक ही बार इस पुरुषोत्तम संगमयुग में बेहद का सन्यास करते हो। तो ये बातें भूल नहीं जानी चाहिए। ये तो अच्छी तरह से धारण करनी चाहिए। बच्चे, बहुत सुनते-3 समझो। अभी तो यहां हैं। आते हैं। अच्छा, हम बाद में विलायत चले जाते हैं। तो भी वहां बैठकर के कौन देखते हैं, हँ, विलायत में? माया ऐसी प्रबल है बहुत ही प्रबल। बात मत पूछो एकदम। हां, वो चोटी से पकड़ करके गिराए देती है। तो ये माया जो बाप के अपोजिशन में बैठी है वो कोई कम थोड़े ही है। तो बाप समझाते रहते हैं बच्चे, इनमें तो पक्का बहुत होना चाहिए। क्योंकि पक्का सन्यासी बनना है। बेहद का सन्यासी। कच्चा सन्यासी नहीं बनना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में भी तो कच्चे सन्यासी होते हैं ना। हँ? नंबरवार तो होते ही हैं। थोड़े दिन सन्यास किया, देखा बहुत भटकना पड़ता है जंगलों में, डर लगता है शेर, चीता खा जाएगा, तो बस घर में आ जाते हैं। नहीं तो शहरों में घुस पड़ते हैं। वो कच्चे सन्यासी हुए ना। उनमें भी नंबरवार तो बताए।

अभी सन्यासी देखो कहां वो शंकराचार्य और कहां वो एक सन्यासी आएगा, लोन लिया था मुझे, हँ, ये आटा चक्की लिया और जाओ आश्रम। तो यहां बहुत ही ऐसे बैठे हुए हैं सन्यासी ढेर के ढेर। वहां काशी में जाओ तो ढेर सन्यासी बैठे हैं। हरिद्वार में जाओ। काशी में बहुत हैं क्योंकि काशी में तेज है ना। सन्यासियों में भी कुछ ना कुछ पवित्रता का तेज होता है ना। कभी काशी में जाकर के करवट खाएगा तभी उनका उद्धार होगा। या तो वहां गंगा में बैठकर के गंगा स्नान करेंगे। जैसे ये हद की बातें वैसे बेहद की बातें भी हैं। बेहद ब्राह्मणों की दुनिया में भी काशी नगरी है ना। गंगा नदी भी है। तो देखो, दो यानी एक बात में भी दोनों मत नहीं हैं। ऐसे कहते हैं कि हम काशी में जा करके वहां मरने से हमें मुक्ति को पाउं, मुक्ति को प्राप्ति होगी। एक कहते हैं नहीं, हम तो गंगा स्नान करेंगे गंगा के घाट पर। वो है ना गंगा का घाट। और तुलसी तो काली तुलसी और हरित तुलसी। काली तुलसी तो जंगल में फलती है। जंगल में फलीभूत होती है। और हरी तुलसी? घरों में, घर-गृहस्थ में।

अभी गंगा का घाट तो बनारस में भी है। और वो ही गंगा का घाट हरिद्वार में भी है। हँ? बनारस किसकी नगरी? बनारस कहते हैं, हां, काशी। काशी विश्वनाथ गंगे। हां, विश्वनाथ की, शंकर की नगरी बताते हैं। और हरिद्वार? हरी वो कृष्ण को कहते हैं। तो गंगा जब उतरती है ऊंची स्टेज से तो कहां उतरती है? हरिद्वार में उतरती है। तो हरिद्वार में भी गंगा है, बनारस में भी गंगा है। पर वहां तो शिव का मंदिर तो खास है एकदम। कहां? शिवकाशी में। हँ? वो एकदम खास मंदिर हरिद्वार में थोड़े ही है? नहीं। तो हरिद्वार से तो अच्छा उत्तम तो बनारस हुआ ना। क्या? क्यों? क्योंकि हरिद्वार में बना-बनाया रस सोमरस नहीं मिलता। और बनारस में? नाम ही है बनारस। बना-बनाया सोमरस मिलता है क्योंकि फिर भी तो वो शिव का वहां नाम है ना शिवकाशी। हँ? कहते हैं, जपते रहते हैं शिवकाशी-शिवकाशी। सारा दिन ऐसे ही करते हैं - शिव काशी विश्वनाथ गंगा, शिव काशी विश्वनाथ गंगा। सारा दिन वो सन्यासियों के मुख में ये ही आता है। अभी बताओ - कौन सी भला पतित पावनी है? काशी या गंगा? हँ? किसको कहेंगे पतित पावनी? क्या वो ये शिवकाशी? हँ? जो बनारस शहर दिखाया हुआ है ये तो शिव के ऊपर करवट खाते हैं कलवट। काशी करवट। हां। अभी ये मुक्ति को पाएंगे या वो गंगा में मरेंगे वो पाएंगे? कौन पाएंगे? अब देखो उनका कोई है एक ठिकाना? कोई भी किसका भी एक ठिकाना है? कभी कुछ, कभी कुछ।

तो अभी सुप्रीम सोल बेहद का बाप बैठकर के समझाते हैं बच्चों को। मीठे-मीठे बच्चों ये सभी हैं सब भक्ति मार्ग। है ना? क्योंकि वहां पूजा तो करते हैं ना। हँ? और पूजा जड़ मूर्ति की करते हैं या कोई चैतन्य देवताएं होते हैं वो? जो लिंग दिखाते हैं वो जड़ है या चैतन्य है? जड़ है। अभी देखो तुम तो कोई भी पूजा नहीं करते हो क्योंकि पूजा देह की होती है। देह की मूर्तियों की होती है। याद तो, याद तो बाप को किया जाता है कि बाप की पूजा करेंगे? हँ? बाप तो निराकार है। पूजा कैसे करेंगे? तो ऐसे नहीं कहेंगे कि तुम मूर्तियों की या देहधारियों की या गुरुओं की पूजा नहीं करते हो तो तुम नास्तिक हो। ऐसे नहीं है। तुम्हारी आस्था तो है ना। बल्कि तुम्हारी तो और ही सच्ची आस्था है क्योंकि तुम तो हो मन-बुद्धि रूपी आत्मा। तो तुम्हारी अंदरूनी आस्था है या बाहर दिखावे की आस्था है? अंदरूनी आस्था है। श्रद्धा है, विश्वास है, निश्चय है।

तो वो तुमको कहेंगे भक्तिमार्ग वाले क्योंकि तुम मूर्तियों की पूजा नहीं करते हो, हँ, मूर्ति रुप में जो देवताएं बनाए हुए हैं चित्रों में उनकी पूजा नहीं करते हो। तो कहते हैं ये तो देखो, हँ, पहले ये कितनी अच्छी भक्ति करते थे। हँ? बहुत अच्छी भक्ति करते थे देहधारियों की, देवताओं की मूर्तियों की। हां, भगवान का नाम भी नहीं लेते। क्या? क्यों? श्री कृष्ण भगवान का नाम नहीं लेते? हनुमान का, गणेश का, हँ, व्यास भगवान का, कितने भगवान के नाम लेते हैं! ऐसे क्यों कि भगवान का नाम नहीं? अरे वो कोई असली भगवान थोड़े ही? भगवान तो एक होता है या ढेर के ढेर होते हैं? हँ? तो देखो वो भगवान का नाम भी नहीं जानते तो लेंगे कैसे? हँ? श्री कृष्ण का नाम ही नहीं लेते हैं कभी। तुमको ऐसे कहेंगे कि ये तो श्री कृष्ण भगवान का नाम भी नहीं लेते। रामचंद्र का भी नाम नहीं लेते। किसका भी नहीं लेते। ये तो पूरे नास्तिक हैं। ऐसे तुमको कहेंगे। अरे, पर नहीं। नाम तो काम के आधार पर होता है ना।

इनको तो याद ही है ना। उनका काम भी याद है, उनका नाम भी याद है क्योंकि ये नाम ही लेते हैं ऊँचे ते ऊँच का जिससे ऊंचा कोई होता ही नहीं। कौन ऊंचे से ऊंचा? अगर निराकार आत्माओं में कहें तो आत्माओं में ऊंचे ते ऊंचा कौन? शिव ज्योति। सदा शिव ज्योति। उससे ऊंचा परमपिता तो कोई उसका बाप कोई होता ही नहीं। और फिर अगर साकार देहधारियों में, मनुष्यों में कहें तो मनुष्यों में कहेंगे मनुष्यों का जो बीज है जिसे वो कहते हैं, सब धर्म वाले मानते हैं। क्या? आदम, एडम, आदिदेव, आदिनाथ। मानते हैं ना। तो प्रजापिता, प्रजापति नाम देते हैं ना। तो ऊंचे ते ऊंचा हुआ ना इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। तो याद करते हैं। सो भी वो याद करने के लिए कोई नाम थोड़े ही लेने की दरकार है कि नाम रटते रहो। मां है, बाप है, अपने बच्चे को विलायत में बच्चा बैठा है, याद करते हैं, तो उसका नाम रटते हैं क्या? क्या याद आता है? उसका रूप, उसका रूप याद आता है। उसकी एक्टिविटी, उसकी बातचीत; बातचीत याद आती है।

हां, तो तुमको कोई नाम लेने की दरकार नहीं है। नहीं। ये याद करते हैं। क्या? किसको याद करते? उनके रूप को, उनकी एक्टिविटी को, उनकी बातों को याद करते हैं क्योंकि उनके ही तो बच्चे हैं ना। उनके? उसके कि उनके? हँ? हां, एक के नहीं। जैसे आत्मा अकेली कुछ नहीं कर सकती निराकार; दूसरा शरीर भी तो चाहिए ना। तो ऐसे ही सुप्रीम सोल बाप जो हैविन बनाने का रास्ता बताते हैं वो भी निराकारी स्थिति में कुछ भी कर नहीं सकते। वो जब तक मनुष्य सृष्टि के साकार बीज आदम में, एडम में, आदिदेव में, आदिनाथ में प्रवेश न करें तब तक कुछ भी अर्जुन के रथ में दिखाते हैं ना। हां। तो उनके ही हम बच्चे हैं ना। उसके नहीं। एक के नहीं कि एक मनुष्य सृष्टि के बीज बाप के बच्चे हैं। नहीं। उस बीज रूप बाप में भी वो निराकार सदा ज्योति शिव प्रवेश करता है तो दो हुए ना। एक आत्मा और एक? एक शरीर। तो उनके बच्चे हैं। तो वो बच्चे हैं तो याद करेगा। हँ? बच्चे हैं तो याद करेगा। और बच्चे ही नहीं होंगे तो कहां से याद करेगा? किसके बच्चे? निराकार और साकार दोनों के बच्चे तो याद करेगा या सिर्फ निराकार को मानता रहेगा तो याद करेगा? या सिर्फ साकार को मानेगा तो याद करेगा? नहीं। हां।

तो नाम हम क्यों लेवे? हमें नाम रटने की, जपने की कोई दरकार नहीं। नाम तो बहुत ही लेते हैं भक्ति मार्ग में। और हम भी जन्म-जन्मांतर नाम बहुत रटते आए। हां। किताबें बना दी। विष्णु सहस्त्रनाम। गंगा सहस्त्रनाम। गणेश सहस्त्रनाम। हनुमान सहस्त्रनाम। अरे क्या? ढेर सारे नाम ही नाम। ढेर सारे भगवान ही भगवान। बहुत हैं ऐसे। राम का नाम जपो। राम का नाम लिखो। हँ? अरे राम नाम लिखो। जितनी बार राम नाम लिखेंगे और लिख कर के आटे की गोलियां बनाकर के मछलियों को खिलाएंगे तो तुम्हारा बड़ा पुण्य होगा। कहते हैं राम नाम संग है वो। तो भक्ति मार्ग में नाम चलता है। और ज्ञान मार्ग में? तुम्हारी बुद्धि में नाम चलता है कि नाम किस आधार पर पड़ता है? अरे, दुनिया में भी जो बड़े-बड़े नेताएं हुए, बड़े-बड़े महापुरुष हुए उनका नाम किस आधार पर चलता है? उन्होंने कुछ काम करके अच्छा दिखाया ना। तो काम के आधार पर नाम चलता है। तो ऐसे ही भगवान ने आकर के इस सृष्टि पर कुछ काम किया होगा ना जो काम इस दुनिया में कोई भी विद्वान, पंडित, आचार्य, धर्म पिता, महान पुरुष, ऋषि-मुनि नहीं कर सका। तो वो, वो तो कहते हैं राम नाम संग है। समझे ना? ऐसे ही वो नाम उठाते रहते हैं। (क्रमशः)

A morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page on Wednesday was that those Sanyasis practice limited renunciation (sanyas) every moment. And you practice unlimited renunciation only once in this Purushottam Sangamyug. So, you should not forget these topics. You should inculcate this nicely. Children, go on understanding while listening. Now you are here. You come. Achcha, we later go abroad. Even then, while sitting there abroad who sees? Maya is so strong, very strong. Just do not ask at all. Yes, it catches you by your choti (hairlock at the back of the head) and makes you fall. So, this Maya which is sitting in opposition of the Father is no less. So, the Father keeps on explaining - Children, you should be very strong in these. It is because you have to become firm Sanyasis. Unlimited Sanyasis. You shouldn’t become weak Sanyasis because there are weak Sanyasis in this world also, aren’t they? Hm? They are indeed numberwise. They practice Sanyas for a few days; when they observe that they have to wander a lot in the jungles, when they fear that a lion or a Cheetah may eat them, then that is it; they come home. Otherwise, they intrude into the cities. They are weak Sanyasis, aren’t they? Even among them, they are said to be numberwise.

Now look, on the one side is that Sanyasi Shankaracharya and on the other side is that one Sanyasi who came and took a loan from me, he took this flour mill and go to the ashram. So, there are many such Sanyasis who are sitting here. If you go there to Kashi there are numerous Sanyasis sitting there. Go to Haridwar. There are many in Kashi because there is luster (tej) in Kashi, isn’t it? There is some or the other luster of purity in the Sanyasis, isn’t it? When he goes to Kashi and sacrifices himself, only then will he be uplifted. Or they will sit there near the Ganges and bathe in the Ganges. Just like these limited topics, there are unlimited topics as well. There is a Kashi nagari (city of Kashi) in the unlimited world of Brahmins as well, isn’t it? There is a river Ganga as well. So, look, there are not both opinions in two, i.e. one topic. People say that we will go to Kashi and if we die there we will achieve mukti (liberation). Some people say that no, we will go and bathe in the Ganges on the banks of the Ganges. There is a ghat (steps leading to a river) of Ganga, isn’t it? And as regards Tulsi, there is a black Tulsi and a green Tulsi (basil leaf). Black Tulsi grows in the jungles. It prospers in the jungles. And the green Tulsi? In homes, in households.

Well, there is Ganga’s ghat in Benares as well. And the same ghat of Ganga is in Haridwar as well. Hm? Whose city is Benares? Yes, Kashi is called Benares. Kashi Vishwanath Gangey. Yes, it is said to be the city of Vishwanath, Shankar. And Haridwar? They call Krishna as Hari. So, when Ganga descends from a high stage, then where does it descend? It descends in Haridwar. So, there is Ganga in Haridwar as well as Benares. But the temple of Shiva is special there. Where? In Shivakashi. Hm? Is that completely special temple in Haridwar? No. So, Benares is better, greater than Haridwar, isn’t it? What? Why? It is because you do not get readymade juice (ras), the Somras in Haridwar. And in Benares? The name itself is Benares. You get readymade Somras because however there is the name of Shiva there, Shivakashi, isn’t it? Hm? They say, keep on chanting Shivkashi-Shivkashi. They keep on doing like this throughout the day – Shiv Kashi vishwanath Ganga, Shiv Kashi Vishwanath Ganga. These words only keep on emerging through the mouth of those Sanyasis throughout the day. Now tell – Which one is purifier of the sinful ones (patit-paavani)? Is it Kashi or is it Ganga? Hm? Who will be called patit-paavani? Is it this Shivkashi? Hm? The city of Benares has been depicted; here people sacrifice themselves on Shiva. Kashi karvat. Yes. Well, will these achieve liberation (mukti) or will those who die in Ganga achieve? Who will achieve? Well, see, do they have any one destination? Does anyone have any one destination? Sometimes something, sometimes something.

So, now the Supreme Soul, the unlimited Father sits and explains to the children. Sweet, sweet children, all this is a path of Bhakti. Is it not? It is because people worship there, don’t they? Hm? And do they worship non-living idol or are they any living deities? Is the ling that is depicted non-living or living? It is non-living. Now look, you do not worship anything because it is the body which is worshipped. There are idols of bodies. Do you remember the Father or will you worship the Father? Hm? The Father is incorporeal. How will you worship? So, it will not be said that since you do not worship idols or do not worship bodily beings or gurus you are atheists. It is not so. You do have faith (aastha), don’t you? Rather your faith is even truer because you are mind and intellect-like soul. So, is your faith inner or is your faith external for showing-off? It is internal faith. There is devotion, confidence, faith.

So, they, those who follow the path of Bhakti will tell you because you do not worship idols, you don’t worship the deities who have been depicted in the form of idols and pictures. So, they say, look, earlier they used to do so nice Bhakti. Hm? They used to do very good Bhakti of bodily beings, of the idols of deities. Yes, they do not even utter the name of God. What? Why? Don’t you utter the name of God Shri Krishna? You utter the names of Hanuman, Ganesh, God Vyas; you utter the names of so many Gods. Why is it that we don’t utter God’s name? Arey, are they real Gods? Is God one or many? Hm? So, look, when they don’t even know the name of God, how will they utter the same? Hm? These never utter the name of Shri Krishna. They will tell for you that these people don’t even utter the name of God Shri Krishna. They don’t utter the name of Ramchandra as well. They don’t utter the name of anyone. These people are completely atheists. They will say so for you. Arey, but no. The names are on the basis of the tasks performed, aren’t they?

These people do remember, don’t they? They remember His task also, they remember His name also because they utter the name of the highest on high; there is nobody higher than Him. Who is the highest on high? Even if you speak of the incorporeal souls, then who is the highest on high among the souls? Shiv, the light. Shiv, the forever light. There is no Supreme Father higher than Him; He doesn’t have any Father at all. And then if you speak of corporeal bodily beings, human beings, then the seed of the human beings whom people of all the religions believe. What? Aadam, Adam, Aadi Dev, Aadinath. They believe, don’t they? So, they give him the name Prajapita, Prajapati, don’t they? So, he is highest on high on this world stage, isn’t he? So, they remember. That too, is there any need to utter His name, to chant His name to remember Him? There is a mother, there is a Father; their child is sitting abroad, when they remember him, do they chant his name? What comes to their mind? His form, his form comes to the mind. His activity, his conversations, his talks come to the mind.

Yes, so you need not utter any name. No. These remember. What? Whom do you remember? You remember their form, their activity, their words because you are their (unkay) children only, aren’t you? Theirs’? His (uskay) or theirs’ (unkay)? Hm? Yes, not of one. Just as the incorporeal soul cannot do anything alone; a body is also required, isn’t it? So, similarly the Supreme Soul Father who shows the path of creating heaven, He too cannot do anything in an incorporeal stage. Unless He enters in the corporeal seed of the human world, Aadam, Adam, Aadidev, Aadinath He cannot do anything; they show the Chariot of Arjun, don’t they? Yes. So, we are their children only, aren’t we? Not His. Not of one that we are the children of one seed Father of the human world. No. Even in that seed-form Father that incorporeal forever light Shiv enters; so, they happen to be two, aren’t they? One is the soul and the other? One is the body. So, we are their children. So, if they are children, they will remember. Hm? If they are children, they will remember. And if they are not children at all, then how will they remember? Whose children? Will he remember if they are the children of both incorporeal and corporeal or will he remember if he continues to believe only in the incorporeal? Or will he remember if he accepts only the corporeal? No. Yes.

So, why should we utter the name? We need not utter, chant the name. People chant the name a lot on the path of Bhakti. And we too have been chanting the name birth by birth. Yes. We wrote books. Vishnu Sahastranaam (thousand names of Vishnu). Ganga sahastranaam. Ganesh Sahastranaam. Hanuman Sahastranaam. Arey, what? Numerous names and just names. Numerous Gods and just Gods. There are many such people. Chant the name of Ram. Write the name of Ram. Hm? Arey, write the name of Ram. As many times as you write the name of Ram and after writing, if you prepare small balls of dough and feed the fishes, then you will get a lot of punya (fruits of noble actions). People say that the name of Ram is with us. So, the name is popular on the path of Bhakti. And on the path of knowledge? Do you chant the name in the intellect or on what basis is the name coined? Arey, even in the world on what basis is the name of the big leaders, the big personalities famous? They have performed some nice task and shown, didn’t they? So, the name continues on the basis of the task performed. So, similarly, God must have come and performed some task in this world which no scholar, pundit, teacher, founder of religion, great personality, sage or saint could perform. So, they say that the name of Ram is with us. Did you understand? They simply keep on uttering the name. (Continued)

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Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2820, दिनांक 15.03.2019
VCD 2820, dated 15.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning Class dated 15.11.1967
VCD-2820-Bilingual-Part-2

समय- 19.18-39.16
Time- 19.18-39.16


15.11.1967 की प्रातः क्लास का पांचवा पेज। तो वो जब आते हैं तभी भी ऐसे ही कहते हैं राम नाम हमारे संग है। कोई-कोई तो, तो बाबा कोई भी शहर में, गांव में जाएंगे तो बस चिल्लाते जाएंगे रामरामा-6 तो सब जान जाएंगे बड़ा भगत आ गया। अरे, जैसे नारद है ना। नारद को दिखाते हैं। क्या? क्या जपता रहता है? हँ? झांझ बजाता रहता है नारायण-3 बोलता रहता है। अरे, भला राम कौन सा नाम संग है? हँ? कौन से राम का नाम संग में है? राम का भी कोई नाम तो होना चाहिए ना पक्का काम के आधार पर। अभी राम किसको कहें? कहते हैं राम राज्य। तो राम राज्य अगर कहेंगे तो वो तो त्रेता में आ जाता है। राम का राज्य कब बताते हैं वो? त्रेता में बताते हैं ना। हां। चलो, वो कहते हैं वो ही राम वाली आत्मा द्वापर में कृष्ण के रूप में जन्म लेती है। अच्छा, तो वो द्वापर में नीचे आ जाता है। त्रेता ऊपर। उसके नीचे? द्वापर। उससे ऊपर भी तो सतयुग 16 कला संपूर्ण। तो उसको रामराज्य तो कहा ही नहीं जाता है। न दो आपर को, ना त्रेता को। हँ? वो राम का राज्य थोड़े ही है।

राम का राज्य तो अयोध्या में था ना। कहां? नाम ही क्या रखा? अ योध्या। अयोध्या माने? जहां युद्ध अ माने नहीं होता है। तो जहां युद्ध ही नहीं होता; और द्वापर में तो महाभारी महाभारत युद्ध दिखाय दिया। और त्रेता में भी राम रावण का युद्ध दिखाय दिया। और सतयुग में भी क्या कहते हैं? कहते हैं देवासुर संग्राम हुआ। अरे राम राज्य में, कितना अच्छा राम राज्य का वर्णन करते हैं शास्त्रों में कि वहां कोई भी दुखी नहीं था। कोई भी प्रकार की हिंसा नहीं होती थी। सब सुखी थे। अरे, तो ये सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग जहां हिंसा की हिंसा दिखाई है वहां रामराज्य हो सकता है? हिंसा में दुख होगा या सुख होगा? क्या होगा? दुख ही होगा ना।

तो अभी कौन से राम का नाम लेवें? कौन सा रामराज्य? हँ? रामराज्य तो तुमने अयोध्या में दिखाया। नाम रख दिया अयोध्या। जैसे आज की दुनिया में नाम रख देते हैं। नाम रख देते हैं क्या? हँ? नाम रख देते हैं वंशीधर। वंशी ना पुंगी नाम है वंशीधरा। वाह भई। हाँ? जल की न बूंदो नाम है गंगाधरा। ऐसे-ऐसे भक्ति मार्ग में नाम रख दिए। तो देखो सब मुंझे हुए हैं। एकदम मुंझे हुए हैं। सिर्फ राम कहने से ही मुंझे हुए हैं। राम कह दिया। अरे उसके अर्थ को भी तो समझो। अर्थ भी करते हैं संस्कृत में बताते हैं रम्यते योगिनो यस्मिन इति राम। योगी लोग जिसमें रमण करते हैं वो राम है। अरे? कौन से योगी लोग? कहां रमण करते हैं? रमण करते हैं माने प्रसन्न रहते हैं, खेल खेलते हैं, मस्ती मारते हैं। अगर उस राम को वो शिव कहते हैं या कहते रहें, जैसे कहते हैं शिव-3. शिव के मंदिर में जाते हैं। तो उस शिव के मंदिर में राम थोड़े ही कहना चाहिए? राम कहेंगे? हँ? शिवबाबा-2 ही कहेंगे ना। हां। तो फिर राम भगवान अलग हो गया। कृष्ण भगवान अलग हो गया। तो देखो उस शिव को भी राम। जैसे गांधीजी भी कहते थे रामराज्य लाएंगे। हँ?

तो फिर रामराज्य तो फिर सतयुग को कहेंगे ना बच्चे। कौन से सतयुग को? उतरती कला के सतयुग को नहीं। जहां पीढ़ी दर पीढ़ी देवताएं जन्म लेते हैं और आत्मा सुख भोगते-भोगते कमज़ोर होती जाती है। कलाएं कम होती जाती हैं। नहीं? कमती होती हैं तभी तो त्रेता में 14 कलाएं रह जाती हैं ना? हां, वो सतयुग नहीं। एकदम सतयुग के, हां, आदि काल। जैसे कहते हैं आदि सनातन। आदि भी है और आदि में भी पुराने ते पुराना। इतना पुराना जिसकी स्मृति आज किसी को भी बुद्धि में नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि वो सतयुग जो पहला युग है चतुर्युगी का, जिसे कहते हैं चार युगों का कल्प, उससे पहले तो इस दुनिया में बड़ा भारी विनाश हो गया था। हँ? हाँ। कल्पांत काल कहेंगे। तो उस महाविनाश में ऐसा एक्सीडेंट भारी होता है कि किसी को कुछ भी याद ही नहीं रहता। तो इसलिए सब मुंझे हुए हैं। किसी को कुछ याद नहीं है कि वास्तव में रामराज्य कहां से शुरू होता है। किसको रामराज्य कहें? तो जिसको जो मन में आया सो ही बोलते रहते हैं।

और हर एक का मन अलग-अलग प्रकार के संकल्प करता है कि कोई का मन दूसरे के मन से एक जैसे संकल्प मिला के करता है? नहीं। तुंडे-तुंडे मतिर्भिन्ना। तो अब जिसने जो पढ़ाया। हँ? जैसे वो पोपट होता है ना तोता। पिंजरे में बंद करते हैं उसको। परकटे, चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भीड। तो वो बार-बार रिपीट करता है परकटे चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड। ऐसे बोलता रहता है ना। हां। तो पढ़ाते हैं ना तोते को। पढ़ाने वाले पढ़ाते हैं। पुट पढ़ो। हँ। पुट पढ़ो, काज सरो। ऐसे कुछ पढ़ते हैं। बस। जिसको जिस गुरु ने जो कुछ भी पढ़ाया वो ही फिर कंठ कर लेते हैं। हां। अब वो चाहे कोई धर्म के हों। चाहे वो सनातन धर्म के अपन को कहते हों, हिंदू धर्म के कहते हों या इस्लाम धर्म के हों, बौद्धी धर्म, क्रिश्चियन धर्म के हों या उनके सहयोगी धर्मों के हों। उनके गुरु जो कुछ उनको पढ़ाते हैं बस वो ही बातें, वो ही रटते रहते हैं, कंठ करते हैं। इसलिए जैसे कि ये सभी पैरेट शो बन गए हैं। क्या? ये सभी धर्म के फॉलोअर्स क्या बन गए? पैरेट शो बन गए। माना तोतों का कोई शो किया जाए ना, कोई प्रदर्शनी लगाई जाए, तो ऐसे बन गए। जो किसको सिखलाते ही रहते हैं। जिसको सिखलाते हैं वैसे ही, हँ, रटते रहते हैं। जैसे मैना है और पैरेट है। उसका नाम मैना है। उसका नाम पैरेट। तो ये सभी क्या हैं कुछ? कोई मैना है, कोई पैरेट है। जो जिसने सिखलाया वो ही सीख लिया। समझ कुछ भी नहीं है बिल्कुल अपनी कि जो बातें जो कुछ भी आ करके बोलते हैं चाहे धर्मपिताएं आकरके बोलते हैं, उन बातों पर विचार तो करें। हँ? अपने अपना जो धर्म है उसके ऊपर टैली करके पता तो लगाएं कि क्या अच्छा है, क्या बुरा है। क्या करने से फायदा है, क्या करने से नुकसान है। कुछ भी नहीं, बिल्कुल नहीं।

तभी बाप कहते हैं जो बहुत बेसमझ देखना हो; देखो यह अक्षर कहते हैं ना समझदार, बेसमझ। तो जिद भी तब बेसमझ करते हैं। क्या? जो हठ है, जिद पकड़ लेते हैं ना। कौन करते हैं? वो बेसमझ हठ पकड़ लेते हैं कि हमने जो कुछ किया हमने ठीक किया। यानी एकदम पत्थरबुद्धि हो जाते हैं। किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते। यहां तक कि कोई-कोई तो कान में उंगली दे देते हैं। इबादत करेंगे तो चिल्लाएंगे कान में उंगली देके अल्लाह हो अकबर। हम किसी की बात नहीं सुनेंगे सिवाय अल्लाह अकबर को याद करने के। मुख भी ऊपर को कर देते हैं। देखेंगे भी नहीं किसी को इधर-उधर। एक को याद करो। अभी पत्थर बुद्धि तो जरूर कहना चाहिए ना। हँ? पारस बुद्धि और पत्थर बुद्धि। अंतर हुआ ना। पारस के लिए कहते हैं जिसको टच कर दो लोहे को तो वो सोना बन जाएगा। संग का रंग लग जाता है तो उसे कहते हैं पारस बुद्धि। जिसके संग का रंग दूसरों को लगे, दूसरों का संग खुद को न लगाए तो उसको कहते हैं पारस। बाकी ऐसा कोई पारस पत्थर नहीं होता है। ये तो हां उस परमपिता परमात्मा शिव हैविनली गॉडफादर पारस आत्मा की यादगार है जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकरके मनुष्य सृष्टि के बीज रूप बाप में प्रवेश करता है तो उसको भी आप समान पारस बनाए देता है। कैसा पारस? जो भी उसे याद करेगा, जो भी उसके कनेक्शन में आएगा तन से, मन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों की ताकत लगा के आएगा तो फिर वैसा ही संग के रंग से जरूर बन जाएगा। तो अभी तो वो भी तो समझ की बात है कलियुग में कि पत्थरबुद्धि होते हैं। कोई को भी पारसबुद्धि तो नहीं कह सकते हैं ना। कह सकते हैं? नहीं कह सकते। हां।

तो बताया सतयुग में पारस बुद्धि होते हैं। नाम ही है सत्य का युग। और ये कलह क्लेश का युग, झूठ युग, झूठ खंड। वो सचखंड सत बाप आकर के रास्ता बताते हैं और सत्य बाप से सत्य युग की स्थापना करते हैं। तो देखो पारसनाथ कितने बड़े-बड़े मंदिर बने हुए हैं। हँ? जैनियों में भी बने हुए हैं ना। तो देखो ये जरा सी बात भी मनुष्यों की बुद्धि में नहीं है कि ये पारस बुद्धि कब थे? ये पारस पत्थर की जो यादगार है वो कबकी है? ऐसा आज तो कोई भी पारस पत्थर नहीं मिलता जो लोहे से टच कर दो तो सोना बन जाए। शास्त्रों में लिखा हुआ है। अब वास्तव में तो भगवान बाप हैविनली गॉड फादर ऊंचे ते ऊंचा भगवंत जब आते हैं तो वो जिस मनुष्य मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं तो उसे पत्थरबुद्धि से क्या बनाते हैं? पारस बुद्धि बनाते हैं। तो उसका गायन अभी चल रहा है भक्ति मार्ग में। भक्ति मार्ग में जो भी ढाई हजार साल से गायन, पूजन, यादगार, त्यौहार चल रहे हैं वो सब कहां की यादगार? हां, वो सब उसी संगमयुग की यादगार हैं जिसे पुरुषोत्तम संगमयुग कहें, कलियुग का अंत और सतयुग के आदि वाला कल्प पूर्व का युग।

गोल्डन एज कब बनता है? हँ? जब सब पारस बुद्धि बन जाते हैं। तो अभी तो पत्थर बुद्धि हैं ना, आयरन एज में है। कब? जब सबकी आत्मा लोहे के मिसल काली बन गई है। हँ? लोहा ज्यादा कड़क होता है या सोना ज्यादा कड़क होता है? मुलायम कौन सा होता है? जल्दी मोल्ड कौन हो जाता है?हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) लोहा? (किसी ने कुछ कहा।) हां, सोना मोल्ड हो जाता है। सो भी तीव्र अग्नि में डालते हैं तो मोल्ड होता है। यह है योगाग्नि, ज्ञानाग्नि। तीव्र ज्ञानाग्नि जब सूर्य फेंकता है इस सृष्टि की आत्मा प्राणियों के ऊपर तो ज्ञान की तीव्र रोशनी से बुद्धि में बैठता है। क्या? कि किसके साथ योग लगाना है? और उस योगेश्वर को पहचानते हैं तो फिर, हाँ, मोल्ड होते हैं। क्या? क्या बन जाते हैं? लोहे से, हां, सोना बन जाते हैं। सोने जैसा मोल्ड होने वाले बन जाते हैं। लेकिन काहे से? योगाग्नि से। तीव्र योगाग्नि होगी निरंतर लगातार योगाग्नि प्रज्वलित होगी तो क्या होगा? सोना सच्चा बनेगा। उसमें से सारी खाद लोहे की पड़ी हो कलियुग में, द्वापर में तांबे की खाद पड़ी हो, त्रेता में चांदी जैसी आत्माएं ढेर की ढेर उतरती हों, उनकी पड़ी हो, हां, या सतयुग में कुछ कम कला वाली आत्माएं सोने जैसी उतरी हों, उनका संग का रंग लगा हो वो सारा संग का रंग तब उतरता है जब निरंतर तीव्र अग्नि में, योगाग्नि में पकते हैं। हां।

नहीं तो ऐसे नहीं कि जैसे कहते हैं सवेरे को मंदिर में गए, झांझ बजाया, मजीरा बजाया, कीर्तन किया, शाम को गए, कीर्तन किया, या जैसे मुसलमान लोग हैं, पांच बार नमाज पढ़ लेते हैं और समझ लेते हैं बस हो गया काम। ऐसे नहीं। लगातार निरंतर धुनी लगी रहे। जैसे वो कोई-कोई साधु होते हैं ना। हां। जंगल में रहते हैं एकांत में। और रात-दिन धूनी जमाए रहते हैं आग की। क्यों? हां, कोई जानवर आकर के आक्रमण ना कर दें। तो ये माया रावण रूपी जानवर है। ये घड़ी-घड़ी आक्रमण करता है। लगातार योगाग्नि में रहेंगे, ज्ञान अग्नि प्रज्वलित रहेगी तो कोई का आक्रमण? वो दूर से ही भाग जाएंगे। जंगल में जानवर जहां देखते हैं, आग जल रही है तो भागते हैं कि रुकते हैं? भागते हैं।

तो ये भी कोई को पता नहीं पड़ता है। क्या? ये तो रट करके किसको समझाना। क्या? कि भई गीता कंठ कर लो। या ये रामायण कंठ करो। रामायण की चौपाइयां कंठ करो। या ये श्लोक कंठ करो, वो श्लोक कंठ करो। गुरु ग्रंथ साहब कंठ करो। अरे नहीं, ये रटने की बात नहीं है। ये समझने की बात है। ये भी तो ठीक है। बच्चों ने ये समझा। क्या? जो ज्ञान बाप सुनाते हैं वो समझने की बात है। ये कोई रटने की बात नहीं है। परंतु फिर उनकी पिछाड़ी भी तो चाहिए ना। जो समझते हैं, कहां तक समझे हैं, कोई संशय तो नहीं आ रहा है। तो उन संशयों का निवारण भी तो करना चाहिए ना। तो पिछाड़ी, उनकी पिछाड़ी करनी चाहिए। हां। ओम शांति। (समाप्त)

Fifth page of the morning class dated 15.11.1967. So, when they come, at that time also they say that the name of Ram is with us. Some people, whenever Baba goes to any city, any village, they just keep on shouting Ramrama-6 so that everyone gets to know that a big devotee has come. Arey, just as there is Narad, isn’t he? Narad is depicted. What? What does he keep on chanting? Hm? He keeps on playing jhaanjh (a musical instrument) and keeps on uttering Narayan-3. Arey, the name of which Ram is with you? Hm? The name of which Ram is with you? Ram should also have a firm name on the basis of the task performed. Who should be called Ram now? They say the kingdom of Ram. So, if you say ‘kingdom of Ram’ then he comes in the Silver Age. When do they mention the kingdom of Ram to exist? They mention it to exist in the Silver Age, don’t they? Yes. Okay, they say that the same soul of Ram gets birth in the form of Krishna in the Copper Age. Achcha, he comes down to the Copper Age. The Silver Age is above. Below that? The Copper Age. Above even that is the Golden Age perfect in 16 celestial degrees. So, that is not called the kingdom of Ram at all. Neither ‘do aapar’ (the Copper Age), nor the Silver Age. Hm? That is not a kingdom of Ram.

Ram’s kingdom existed in Ayodhya, didn’t it? Where? What was the name coined? A yodhya. What is meant by Ayodhya? The place where there is no war (yuddh). So, the place where war doesn’t break out at all; And the fiercest Mahabharata war has been depicted in the Copper Age. And even in the Silver Age, the war of Ram and Ravan has been depicted. And what is said about the Golden Age as well? They say that the war between deities and demons took place. Arey, in the kingdom of Ram; they describe the kingdom of Ram so nicely in the scriptures that no person was sorrowful in it. There used not to be any kind of violence. Everyone was happy. Arey, so, this Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age, where just violence has been depicted, can there be a kingdom of Ram? Will there be sorrow or happiness in violence? What will be there? There will be only sorrows, isn’t it?

So, which Ram’s name should we utter? Which kingdom of Ram? Hm? You have depicted the kingdom of Ram in Ayodhya. The name has been coined as Ayodhya. For example, in today’s world people coin names. What is the name that they coin? Hm? They coin the name as Vanshidhar (the holder of flute). One doesn’t have any flute (vanshi), but the name is Vanshidhara. Wow brother! Yes? There is no drop of water, but the name is Gangadhara (the holder of river Ganges). Such names have been coined on the path of Bhakti. So, look, everyone is confused. They are completely confused. They are confused just by uttering Ram. They called him Ram. Arey, understand its meaning as well. They interpret its meaning also; they tell in Sanskrit – Ramyate yogino yasmin iti Ram. The one in whom the yogis enjoy is Ram. Arey? Which yogis? Where do they enjoy? They enjoy, i.e. remain happy, play, enjoy. If they call or if they keep on calling that Ram as Shiv, for example, they say Shiv-3. They go to the temple of Shiva. So, in that temple of Shiva should they utter Ram? Will they utter Ram? Hm? They will say ‘ShivBaba-2’ only, will they not? So, then God Ram is separate. God Krishna is separate. So, look, that Shiv is also called Ram. For example, Gandhiji also used to say that we will usher in the kingdom of Ram. Hm?

So, then the Golden Age will be called the kingdom of Ram, will it not be children? Which Golden Age? Not the Golden Age with decreasing celestial degrees where deities get birth generation by generation and the soul goes on becoming weak while experiencing pleasures. The celestial degrees keep on decreasing. No? They decrease; only then do 14 celestial degrees remain in the Silver Age, don’t they? Yes, not that Golden Age. In the very, yes, beginning of the Golden Age. For example you say ‘Aadi Sanatan’ (first ancient). It is the beginning as well and even in the beginning, it is the oldest one. It is so old that nobody’s intellect remembers it today. Why not? It is because that Golden Age which is the first Age of the Chaturyugi (cycle of four Ages), which is called the Kalpa of four Ages, before that a big destruction of this world had taken place. Hm? Yes. It will be called the period of the end of the Kalpa. So, such a big accident takes place in that mega-destruction that nobody remembers anything at all. So, this is why all are confused. Nobody remembers anything that actually where does the kingdom of Ram begin from? What should be called the kingdom of Ram? So, people keep on speaking whatever comes to their mind.

And does everyone’s mind create different kinds of thoughts or does any mind create same thoughts as the other one’s mind? No. Tundey-tundey matirbhinna (there are as many opinions as there are heads). So, well, whatever anyone taught. Hm? For example, there is that popat, the parrot, isn’t it? It is confined in a cage. [You tell him] Parkatey (a caged bird), Chitrakoot ke ghaat pe bhayi santan ki bheed (there was a rush of sages on the banks of Chitrakoot). So, it keeps on repeating again and again – Parkatey, Chitrakoot ke ghaat pe bhayi santan ki bheed. It keeps on uttering like this, doesn’t it? Yes. So, people teach the parrot, don’t they? Teachers teach. Put padho (O parrot, read). Hm. Put padho, kaaj saro (O Parrot, read and do the work). They read out something like this. That is it. Whatever any guru taught to anyone, they learn it by heart. Yes. Well, they may belong to any religion. They may call themselves followers of Sanatan Dharma, they may call themselves followers of the Hindu religion or of Islam religion, Buddhist religion, Christianity or of their helper religions. Whatever their gurus teach them, that is it; they keep on mugging up, learn by heart the same topics. This is why all these have become parrot shows. What? What have the followers of all the religions become? They became parrot shows. It means that if a show of parrots is organized, if an exhibition is organized, then they have become like this. They keep on teaching others. They keep on repeating whatever they are taught. For example, there is Maina and Parrot. Its name is Maina (a bird). Its name is Parrot. So, what are all these? Some are Mainas, some are Parrots. They learnt whatever anyone taught. They don’t have any wisdom of their own to think over whatever anyone comes and speaks, be it the founders of religions who come and speak. Hm? Let me tally with my religion and know what is good and what is bad. Doing what leads to benefit and doing what leads to harm? Nothing; nothing at all.

That is why the Father says – If you want to see a very unwise person; look, these words are uttered, aren’t they? Wise, unwise. So, it is the unwise who show obstinacy. What? The obstinate ones become recalcitrant, don’t they? Who becomes? Those unwise ones become obstinate that whatever we did was correct. It means that they develop a completely stone-like intellect. They are not ready to listen to anyone. Some go to the extent of putting a finger in their ear. When they pray, then they keep a finger on their ears and shout – Allaho Akbar. We will not listen to the topic of anyone except remembering Allah Akbar. They even turn their head upwards. They will not even see anyone here and there. Remember one. Well, they should definitely be called pattharbuddhi (stone-like intellect), shouldn’t they be? Hm? Paarasbuddhi and Pattharbuddhi. There is a difference, isn’t it? It is said for Paaras (elixir) that if you touch it to iron, then it will become gold. When the colour of company is applied, then it is called Paarasbuddhi. The one whose colour of company is applied to others, if he himself does not get coloured by anyone’s company, then such a person is called Paaras. As such there is no Paaras stone. Yes, this is the memorial of that Supreme Father Supreme Soul Heavenly God Father, the Paaras soul who comes to this world stage and enters in the seed form Father of the human world and makes him also a Paaras equal to Himself. What kind of a Paaras? Whoever remembers him, whoever comes in connection with him, through body, through mind, through wealth, through time, through contacts, through the power of relatives, then he will definitely become like that through the colour of company. So, now that is also a topic to be understood in the Iron Age that people have stone-like intellect. Nobody can be called Paarasbuddhi, can they be? Can they be called? They cannot be called. Yes.

So, it was told that you are Paarasbuddhi in the Golden Age (Satyug). The name itself is ‘Age of truth’ (satya ka yug) And this is an Age of disputes and despair, false Age, false land. The true Father comes and shows the path to the land of truth and the True Father establishes the true Age. So, look, such big temples of Paarasnath have been built. Hm? They are built among the Jains also, aren’t they? So, look, even this small topic is not there in the intellect of the human beings that when were they Paarasbuddhi? The memorial of the Paaras stone is of which time? You don’t get any such Paaras stone today which on being touched with iron converts it into gold. It has been written in the scriptures. Well, actually, when God, the Father, the Heavenly God Father, the highest on high God comes, then the permanent human Chariot in which He enters, what does He transform him from a stone-like intellect (paththarbuddhi)? He makes him Paarasbuddhi. So, his praise continues on the path of Bhakti now. Whatever songs, worships, memorials, festivals are being celebrated since 2500 years on the path of Bhakti, they are memorials of which place? Yes, all those are memorials of the Confluence Age which may be called Purushottam Sangamyug; the Age of the Kalpa ago at the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age.

When is the Golden Age established? Hm? It is when everyone becomes Paarasbuddhi. So, now you are Paarasbuddhi, aren’t you? You are in the Iron Age. When? When everyone’s soul has become black like iron. Hm? Is iron harder or gold harder? Which is soft? Which of these gets moulded easily? Hm?
(Someone said something.) Iron? (Someone said something.) Yes, the gold gets moulded. That too, when it is put in intense fire, then it gets moulded. This is the fire of Yoga, fire of knowledge. When the Sun throws intense fire of knowledge over the souls, the living beings of this world, then the intense light of knowledge sits in the intellect. What? That with whom should you have Yoga? And when you recognize that Yogeshwar, then, yes, they get moulded. What? What do you become? From iron, yes, you become gold. You become persons who get moulded like gold. But with what? Through the fire of Yoga. If the fire of Yoga is intense, if the fire of Yoga is continuous, constant, then what will happen? It will become true gold. The entire alloy of iron that has been added to it in the Iron Age, the alloy of copper that has been added in the Copper Age, the alloy of silver like numerous souls which descend in the Silver Age might have been added, yes, or if the colour of company of the gold like souls with fewer celestial degrees that might have been applied in the Golden Age, all that colour of company is removed only when you get baked in the continuous, intense fire, in the fire of Yoga. Yes.

Otherwise, it is not as if you say that you go to the temple in the morning, played jhaanjh, played majeera, sang prayers, you went in the evening, prayed or just as there are Muslims, they read the Namaz five times and think that that is it, our task is over. Not like this. The devotion should be continuous, constant. Just as there are some sages, aren’t they? Yes. They live in the jungles in solitude. And they burn the fire day and night. Why? Yes, no animal should come and attack. So, this is Maya like animal. It attacks again and again. If you remain in the fire of Yoga continuously, if the fire of knowledge keeps burning, then will anyone attack? They will run away from a distance. In the jungles, if the animals see fire, then do they run away or do they stop? They run away.

So, nobody gets to know this as well. What? To learn this by heart and to explain to someone. What? That brother learn Gita by heart. Or learn this Ramayana by heart. Learn the Chaupaais (stanzas) of Ramayana by heart. Or learn this shlok by heart, learn that shlok by heart. Learn the Guru Granth Sahib by heart. Arey, no, it is not about learning by heart. It is a topic to be understood. This is also correct. Children understood this. What? The knowledge that the Father narrates is a topic to be understood. It is not a topic to be learnt by heart. But then they are required to be backed-up, aren’t they? If anyone has understood, how far have they understood, are they getting any doubts? So, those doubts should also be cleared, shouldn’t they be? So, they should be backed-up, they should be supported. Yes. Om Shanti. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2821, दिनांक 16.03.2019
VCD 2821, dated 16.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2821-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-21.35
Time- 00.01-21.35


प्रातः क्लास चल रहा था 15 नवंबर 1967. बुधवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी पारसबुद्धि और पत्थरबुद्धि। तो ये भी किसी को मालूम नहीं है कि पारसबुद्धि कब बनते हैं और आयरन एज्ड पत्थरबुद्धि कब बनते हैं। सो बाप ही आकरके बताते हैं – बच्चे, ये दुनिया की हर चीज 4 अवस्थाओं से पसार होती है। सतोप्रधान, सतोसामान्य, रजो और तमो। बुद्धि भी जब तमो बनती है तो कहते हैं पत्थरबुद्धि, आयरन एज्ड। तो ये रट करके किसी को समझाना ये भी तो ठीक है क्योंकि बच्चों ने समझा परंतु फिर जिन्होंने समझा और समझाया उनकी फिर पिछाड़ी करनी चाहिए। जैसे कोई यहां प्रदर्शनी करते हैं, बहुत आते हैं। अच्छा, फिर जो आते हैं और चले जाते हैं उनकी पिछाड़ी भी तो करना चाहिए ना कि भई ऐसे भी तो कोई जगह होनी चाहिए जो वरी कोई आए समझने के लिए और उनको समझाया जाए। अगर प्रदर्शनी कर-करके और वो ये स्थान ही छोड़ दिया या मंडप छोड़ दिया तो मनुष्य फिर कहां जाएंगे समझने के लिए? इसलिए देखो, ये प्रदर्शनी, ये सेंटर-कम-म्यूजियम क्योंकि यहीं तो आवेंगे ना। कि यहीं 2, 4, 5 कोठी भी होनी चाहिए उसी शहर में। ये तो अभी तो दो-चार कोठियां ढूंढते हैं। पीछे तो ये लोग, इन लोगों को 50-50, 60-60, 70-70 कोठियां चाहिएगा क्योंकि हर गली में सेंटर चाहिए। जब आएंगे वहां समझने के लिए तो बाप कहते हैं ना कि दिन-प्रतिदिन इनकी वृद्धि कुछ न कुछ खुलती ही जाएगी जिनको-जिनको यहां आने का है।

तो आएंगे तो कितने आएंगे? फिर जितने आते हैं उनको समझाना भी तो पड़ता है ना। और समझाना भी कोई तुम्हारा इतना थोड़े ही जितना अभी समझाते हैं। कितना? तो देखो पीछे समझाना पड़ेगा क्योंकि पीछे तो समझानी दिन-प्रतिदिन कमती होती जावेगी। क्यों? क्योंकि जब प्रभाव निकलता जावेगा, पहचान होती जावेगी बाप की तो फिर डिटेल में बताने की कोई दरकार नहीं क्योंकि बहुत लोग फॉलो करेंगे। बस, फिर तो वो जैसे मिंटो मोटर कहा जाता है ना बच्चे। कारखानों में एक मोटर 1 मिनट में तैयार होती है। देखो, पहले तो शुरुआत में कितना टाइम लगता है, मोटर असेंबल करने में, तैयार करने में, पुर्जे-वुर्जे बनाने में। पीछे कितने बनेंगे। क्योंकि ये झाड़ ब्राह्मणों का बड़ा होता जावेगा। बड़ा होता जाएगा, होता जाएगा, बहुत बड़ा हो जाएगा। उन ब्राह्मणों का नहीं दुनिया वालों का। यहां का ही जो ब्रह्मा के बच्चे कहे जाते हैं। तो फिर देखो एक से, ये पत्तों से पत्ते निकलते ही रहते हैं ना। हँ? निकलेंगे तो शुरुआत कहां से होगी? एक पत्ते से दूसरा पत्ता निकलता है ना। पहले तो पहले एक ही पत्ता। पत्ता कि बीज?
(किसी ने कुछ कहा।) बीज? नहीं। पत्तों से पत्ते। बीज थोड़े ही दिखाई पड़ता है? बीज तो हां, कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है। वो तो खाक हो जाता है, राख हो जाता है। तो एक कौन? हां। एक पत्ता। माना कौन पत्ता? ब्रह्मा। हां। 16 कला संपूर्ण कृष्ण वाली आत्मा वो पहला पता है। तो फिर पत्ते से पत्ते निकलते जाते हैं।

तो पीछे तुमको बहुतों को समझाना होगा। तुमको कोई ये कोठियां थोड़े ही पूरी पड़ेंगी जो अभी हैं? ये तो तुम बनाते हो। हँ? 3, 4, 5 कमरा ले लेते हो फलाने, फलाने से। नहीं नहीं। तुमको तो बहुत बड़े-बड़े, बड़े-बड़े मकान चाहिएगा जहां बहुत आकरके और समझें और बस ये मंत्र लिया। समझा? कौन सा मंत्र? मनमनाभव। भव? हाँ, मेरे मन में भव। मेरे मन में समा जा। कोई पूछेगा क्या कि निराकर भगवान को मन होता है क्या? अरे उनको मन कहां होता है? वो तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं उसकी बात है। बहुत पावरफुल मन। तो उस मन में समा जा। क्या है मन में? हँ? उस मन में क्या है जो औरों में नहीं है? कोई खसूसियत तो होगी ना। क्या? यही कि जैसे धर्मपिताएं हैं, हँ, निराकार के पक्के होते हैं; इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, भगवान को किस रूप में मानते हैं? निराकार मानते हैं या साकार मानते हैं? निराकार मानते हैं। जैसे वो पक्के होते हैं वैसे ये भी तो धर्मपिता है ना अव्वल नंबर का। मुसलमान तो कहते भी हैं अल्लाह अव्वलदीन। अव्वल नंबर धर्म की स्थापना करते हैं। तो ये जो अव्वल नंबर धर्मपिता है वो तो निराकार का पक्का होगा या नहीं होगा? हँ? उसे निराकार भूलेगा? नहीं। निराकार और अपनी आत्मा भी निराकार। दोनों निराकार। और साकार शरीर? साकार शरीर खत्म हो जाएगा? नहीं। साकार शरीर भी निराकारी स्टेज पकड़ लेगा। हँ? हाँ, तब कहा जाता है परमब्रह्म, तुरीया ब्रह्म। और जो ब्रह्मा नामधारी हैं उनके मुकाबले तुरीया।

तो बताया – बताएंगे, मनमनाभव का मंत्र देंगे। बाप को याद करो और फिर तुम सतोप्रधान बन जाएंगे। कोई पूछेंगे भी नहीं क्या हम सब सतोप्रधान बन जाएंगे? नहीं। समझेंगे। अपने-अपने धर्म में, सब अपनी-अपनी स्टेज में आत्मा सात्विक स्टेज को धारण करेगी। जब भी आएंगे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने तो सत्वप्रधान पार्ट बजाएंगे, अरे, या नीचा पार्ट बजाएंगे? सत्वप्रधान पार्ट बजाएंगे। तो है तो ईजी समझाना। तुम, तुम खुद समझते हो। ज्ञान तो बड़ा सहज है। कोई बड़ी बात नहीं है। आत्मा जो बाप कहकरके कहते हैं ना कि अपन को आत्मा समझो, अभी निश्चय करो। अरे, पर ये तो बिल्कुल ही सहज है कि हम आत्मा तो हैं ही ना। शरीर तो नहीं हैं। हँ? हां, ये है कि आत्मा तो हैं लेकिन ये जो आत्मा है वो जन्म-जन्मांतर से देह के सुख भोगते-भोगते जो देह मिट्टी में मिल जाती है उस मिट्टी परस्त बनते हैं। मिट्टी में आत्मा की मन-बुद्धि की लागत लग गई। तो उल्टे हो गए। बाबा बोलते हैं ना उल्लू कैसे लटकता है? बाबा तो समझते हैं उल्लू। उल्लू की बात नहीं। चमगादड़ की बात है। चमगादड़ नीचे को मुंह और ऊपर को टांग। तो उल्टे बन गए। 15.11.67 के प्रातः क्लास का छठा पेज, बुधवार। तो बस अब जो उल्टे हो गए हैं, मन-बुद्धि उल्टी ओर जा रही है, मिट्टी की ओर जा रही, धरणी की ओर, तो अब सुल्टा होने का है। दूसरी तो कोई तकलीफ नहीं है।

उल्टे लटके हुए हो। सो बाबा आ करके तुमको सुल्टा बनाते हैं। बाबा आकरके उल्टा बनाते हैं? कि शिव बाप आकरके सुल्टा बनाते हैं? शिव बाप कहेंगे तो शिव बाप को तो पहचानेंगे ही नहीं कोई। आत्मा ही नहीं दिखाई पड़ती, आत्मा को ही नहीं पहचानते, तो बाप को कैसे पहचानेंगे? तो वो जिस मुकर्रर रथ में आते हैं तो वो हुआ बाबा। बापों का बाप। माना जो दुनिया में जन्म-जन्मांतर के लौकिक बाप हैं उनका भी बाप। और फिर जो अलग-अलग धर्मों के लौकिक बाप हैं उनके बाप स्पेशल। कौन? धर्मपिताएं। और धर्मपिताओं का भी कोई बाप है आदम। तो उस आदम, एडम के तन में आकरके सुल्टा तुमको बनाते हैं। इसलिए कहा बाबा आकरके तुमको सुल्टा बनाते हैं। ऐसे नहीं कि निराकार बाप आत्माओं का आकरके तुमको सुल्टा बनाते हैं।

और तो कोई तकलीफ नहीं है। बोलते हैं पहली बात अपन को आत्मा समझो। आत्मा समझो और किसको याद करो? परमपिता को याद करो ऐसे नहीं कहते। धर्मपिताओं की आत्माएं भी तो, उनके फॉलोअर्स भी तो निकलेंगे ना। तो उनको भी ऐसे नहीं कहते कि वो परमपिता जिसका कोई पिता नहीं है उस पिता को याद करो। नहीं। वो परमपिता जिस परमपार्टधारी हीरो में प्रवेश करता है, हँ, उस परमात्मा को याद करो। हँ? निराकार और साकार के मेल को याद करो। तब ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अभी देखो है कितना सहज। बिल्कुल ही तुम्हारे लिए तो बिल्कुल सहज है। क्यों? साकार में निराकार को याद करना सहज है या सिर्फ निराकार को याद करना सहज है? हां। परंतु बहुत बच्चे हैं, हँ, इतना कहने के बावजूद भी अपन को आत्मा समझने का पुरुषार्थ ही नहीं करते। है ना।

नहीं तो जो कोई भी हमारे पास हैं वो कोई भी हैं, बाप कहते हैं ना, कम कार डे दिल यार डे। हँ? काम करते रहो इंद्रियों से और दिल? हँ? दिल किस में? यार डे। कौन यार डे? बाप कहते हैं। कहने वाला तो बाप है सुप्रीम सोल। लेकिन ये नहीं कहते हैं कि दिल मेरे में लगा। हँ? दिल से दिल को राहत होगी या जिसको दिल ही नहीं है उसको राहत होगी? हँ? हाँ। तो मैं जिसमें प्रवेश करता हूं मुकर्रर रूप से, हां, उसके लिए बताया कि वो है तुम्हारा यार। हँ? यार दोस्त कहते हैं ना। हां। नाम ही देते हैं भक्ति मार्ग में शास्त्रकार लोग। क्या? विश्वामित्र। मित्र माने? दोस्त। तो सारे विश्व का दोस्त है, 500-700 करोड़ का दोस्त है या कोई का है कोई का नहीं है? सबका दोस्त है। तो उसको दिल देंगे तो क्या होगा? हँ? काम तो तुम्हारा हाथ करेगा ना? हँ? काम तुम्हारा हाथ करे लेकिन दिल? दिल उसके पास जाए। आत्मा तो कोई चीज नहीं करेगी ना। हँ? सिर्फ आत्मा करेगी क्या? आत्मा को भी दिल हुआ ना जब शरीर धारण करती है तब ही हुआ ना।

तो हाथों से काम करते रहो। और बुद्धि जो देखो कभी भी कोई कृष्ण का भगत होगा ना सच्चा, सच्चा भगत, तो काम भी करते रहेंगे, कोई भी किसम का काम करेंगे, कृष्ण को भी याद करते रहेंगे। अभी कृष्ण है बड़ा चित्र। और देखने में आते हैं इन आंखों से। हँ? उनका चित्र तो बड़ा बनाते हैं, हँ, और इन आंखों से देखने में आता है। अभी जिस बाबा को याद करना है वो इन आंखों से देखने में आता है? हँ? ये आंखें पहचानेंगी? ये आंखें नहीं पहचानती हैं। उसके लिए कौन सी आंख चाहिए? ज्ञान का तीसरा नेत्र चाहिए। अभी ये तो समझना है बहुत महीन बात क्योंकि महीन ही चाहिए ना। हँ? (क्रमशः)

A morning class dated 15th November, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Wednesday was about Paarasbuddhi (elixir-like intellect) and Pathharbuddhi (stone-like intellect). So, nobody knows as to when one becomes Paarasbuddhi and when one becomes Iron-Aged Pathharbuddhi. So, the Father Himself comes and tells – Children, everything in this world passes through four stages. Satopradhan, satosaamaanya, rajo and tamo. When the intellect also becomes tamo, then it is called stone-like intellect, Iron-Aged. So, it is correct to learn this by heart and explain to someone because children have understood but those who have understood and [those who have been] explained should then be backed-up. For example, some organize an exhibition here; many people come. Achcha, then those who come and go away, they should also be pursued that brother there should also be a place where anyone could come to understand and they could be explained. If you organize exhibitions and leave that place or leave the tent, then where will people go to understand? This is why, look, this exhibition, this center-cum-museum because they will come here only, will they not? 2, 4, 5 houses should also be there in the same city. These people now search for 2-4 houses. Later, these people, these people will require 50, 60, 70 houses because a center is required in each lane. When they come there to understand then the Father says, doesn’t He that day by day they will go on growing, their intellect will go on becoming broad, all those who have to come here.

So, if they come, how many will come? Then all those who come have to be explained as well, will they not be? And you will not explain as much as you explain now. How much? So look, later you will have to explain because later the explanation will go on decreasing day by day. Why? It is because when the influence spreads, when people start recognizing the Father, there will not be any need to tell in detail because many people will follow. That is it; then just as it is called Minto Motor, isn’t it children? In the factories, one motor is produced in one minute. Look, initially, in the beginning it takes so much time to assemble the motor, to make it, to make the parts. Later, so many will be prepared. It is because this tree of the Brahmins will go on growing. It will go on growing, go on growing and become very big. Not of those Brahmins of the world. Only of this place, those who are called Brahma’s children. So, then look, from one, these leaves keep on emerging from leaves. Hm? When they emerge, where will the beginning take place? Second leaf emerges from the first one, doesn’t it? Initially there is only one leaf. Leaf or seed?
(Someone said something.) Seed? No. Laves from leaves. Is the seed visible? As regards the seed, yes, the seed mixes with the soil to produces flowers. It becomes ash. So, who is one? Yes. One leaf. It refers to which leaf? Brahma. Yes. The soul of Krishna, perfect in 16 celestial degrees is the first leaf. So, then leaves emerge from the leaf.

So, in the end you will have to explain to many. The present houses that you have will not be sufficient. You build this. Hm? You obtain 3, 4, 5 rooms from such and such persons. No, no. You will need very big, very big houses where many will come and understand and just obtain this mantra. Did you understand? Which mantra? Manmanaabhav. Bhav? Yes, merge (bhav) into My mind. Merge into My mind. Someone will ask – Does the incorporeal God have a mind? Arey, does He have a mind? It is a topic of the permanent Chariot in which He enters. Very powerful mind. So, merge into that mind. What is in the mind? Hm? What is in that mind which is not in others? There must be some specialty, will it not be there? What? Just as there are founders of religions, hm, they are firm in their belief in the incorporeal; In which form do Ibrahim, Buddha, Christ believe God to be? Do they believe Him to be incorporeal or corporeal? They believe Him to be incorporeal. Just as they are strong [in their belief], similarly this one is also number one founder of religion, isn’t he? Muslims even say – Allah Avvaldeen. He establishes the number one religion. So, will this number one founder of religion be firm in his belief in the incorporeal or not? Hm? Will he forget the incorporeal? No. He is incorporeal and our soul is also incorporeal. Both are incorporeal. And the corporeal body? Will the corporeal body end? No. The corporeal body will also achieve incorporeal stage. Hm? Yes, then he is called Parambrahm, unique (turiya) Brahm. And unique in comparison to other holders of the title of Brahma.

So, it was told – You will tell, you will give the mantra of Manmanaabhav. Remember the Father and then you will become satopradhan. Nobody will ask – Will we all become satopradhan? No. They will understand. Their souls will inculcate pure stage in their individual religion, in their individual stages. Whenever they come to this world stage to play their parts will they play satwapradhan part, arey, or will they play a lowly part? They will play satwapradhan part. So, it is easy to explain. You, you understand yourself. Knowledge is very easy. It is not a big issue. The Father says, doesn’t He that consider yourself to be a soul, have this faith now. Arey, but it is completely easy that we are anyways souls. We are not bodies. Hm? Yes, we are indeed souls, but this soul, while enjoying the pleasures of the body birth by birth, the body that merges into the soil, you become followers of that soil. The soul, the mind and intellect became attached to the soil. So, you became opposite. Baba says, doesn’t He that how does the owl (ullu) hang? Baba thinks it is owl. It is not the topic of owl. It is the topic of bat (chamgaadad). The bat’s head is downwards and the legs are upwards. So, you became opposite. Sixth page of the morning class dated 15.11.67, Wednesday. So, that is it; well, those who have turned upside down (ultey), their mind and intellect is moving in the opposite direction, moving towards the soil, towards the Earth, then now it has to turn downside up (sulta). There is no other difficulty.

You are hanging upside down (ultaa). So, Baba comes and makes you downside up (sultaa). Does Baba make you ‘ultaa’? or does Father Shiv come and make you ‘sultaa’? If you speak of Father Shiv, then nobody will recognize Father Shiv at all. When the soul itself is not visible, when you don’t recognize the soul itself, then how will you recognize the Father? So, the permanent Chariot in which He comes, he is Baba. The Father of fathers. It means that the Father of even the worldly fathers of birth by birth. And then the special fathers of the worldly fathers of different religions. Who? The founders of religions. And there is a Father of those founders of religions as well, Aadam. So, He comes in the body of that Aadam, Adam and makes you ‘sultaa’. This is why it was said that Baba comes and makes you ‘sultaa’. It is not as if the incorporeal Father of souls comes and makes you ‘sultaa’.

There is no other difficulty. He says – the first topic is – consider yourself to be a soul. Consider yourself to be a soul and remember whom? He doesn’t say – Remember the Supreme Father. The souls of the founders of religions also, their followers will also emerge, will they not? So, they are also not told that remember that Supreme Father, who doesn’t have any Father. No. Remember that Supreme Soul, the supreme actor, the hero in which that Supreme Father enters. Hm? Remember the combination of the incorporeal and corporeal. Only then will your sins be destroyed. Now look, it is so easy. It is completely easy for you. Why? Is it easy to remember the incorporeal within the corporeal or is it easy to remember only the incorporeal? Yes. But there are many children, who do not make purusharth (efforts) to consider themselves to be souls despite being told so much. Is it not?

Otherwise, whoever is available with us, whoever they may be, the Father says, doesn’t He that ‘kam kaar de, dil yaar de’ (hands at work, heart with the friend). Hm? Keep on performing the task through the organs and the heart? Hm? In whom should the heart be? In the friend. The Father says. The speaker is the Father, the Supreme Soul. But He does not say – Put your heart in Me. Hm? Will the heart find solace in heart or will the one who doesn’t have a heart at all feel the solace? Hm? Yes. So, the one in whom I enter in a permanent manner, yes, it was said for him, that he is your friend (yaar). Hm? People say ‘yaar, dost’, don’t they? Yes. The writers of the scriptures coin a name in the scriptures. What? Vishwamitra. What is meant by mitra? Friend. So, is he the friend of the entire world, is he the friend of 500-700 crores or is he the friend of some and not the friend of some [others]? He is everyone’s friend. So, what will happen if you give him the heart? Hm? The task will be performed by your hands, will it not be? Hm? Your hand should perform the task, but the heart? The heart should go to him. The soul will not do any work, will it? Hm? Will the soul alone do? The soul too has a heart, doesn’t it? It is only when it assumes a body, isn’t it?

So, keep on doing the work with your hands. And the intellect, look, whenever there is a devotee of Krishna, a true devotee (Bhagat), then he will keep on doing the work also, he may do any kind of work, he will keep on remembering Krishna also. Now Krishna is a big picture. And he is visible to these eyes. Hm? His picture is made big, hm, and it is visible to these eyes. Well, is the Baba whom you have to remember visible to these eyes? Hm? Will these eyes recognize? These eyes don’t recognize. Which eye is required for that? The third eye of knowledge is required. Well, it is a very minute topic to understand this because it is required to be minute only, isn’t it? Hm? (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2821, दिनांक 16.03.2019
VCD 2821, dated 16.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2821-Bilingual-Part-2

समय- 21.36-38.35
Time- 21.36-38.35


ऊँच पद लेना है, जो इतना ऊँच पद है, ये बनने के लिए तो ये एम-ऑब्जेक्ट कितना सहज रख दिया है। एम-आब्जेक्ट सहज रख दिया है कि भई लक्ष्मी-नारायण बनना है या लक्ष्मी-नारायण जैसा बनना है। तभी तो बाप ने कहा ना ये जो तुम्हारी एम-ऑब्जेक्ट है ये तो हमारा उद्देश्य है पढ़ाई का। हँ? इस तरह का हमको देवता, देवी-देवता बनना है। कोई पूछते हैं ना। बहुत पूछते हैं आखरीन में तुम्हारा उद्देश्य क्या है? तुम भारत की क्या सेवा कर रहे हो? तो बस बता दो। ये ही सेवा कर रहे हैं ना। हँ? भारत को ये, ये राजधानी स्थापन कर रहे हैं। कौन सी? आज की प्रजातंत्र गवर्नमेंट की राजधानी नहीं जो प्रजा के द्वारा बनाई जाती है। नहीं। बाप तो राजयोग सिखा करके जन्म-जन्मांतर का राजा बनाने आए हैं। और खास करके स्वर्ग का राजा बनाने आए हैं। तो ये स्वर्ग की राजधानी हम स्थापन कर रहे हैं। ये दिल्ली क्या बनेगी? अभी है नरक की राजधानी। फिर क्या बनेगी? हाँ, स्वर्ग की राजधानी। और सो भी राजधानी स्थापन कैसे कर रहे हैं? जैसे 5000 वर्ष पहले की थी उसी मुआफिक कर रहे हैं। 5000 वर्ष पहले भी, हँ, इनका राज्य था। अभी इनका राज्य नहीं है।

और अभी कोई भी आदि सनातन देवी-देवता धर्म का राज्य। दुनिया में कहीं भी ऐसा कोई राज्य नहीं है क्योंकि उस राज्य में तो सुख ही सुख था या थोड़ा बहुत दुख भी था? नहीं था। अभी भले वो देवी देवता सनातन धर्म की आत्माएं, वो धर्म की आत्माएं सनातन धर्म की हैं लेकिन अपन को देवता तो नहीं कहती। कोई कहती हैं देवता? हँ? देवता कोई नहीं कह सकती। हां। क्योंकि लगातार कोई किसी को सुख देता रहे ऐसा तो दुनिया में कोई है ही नहीं। भले अपन को सनातन धर्म के कहते हैं परंतु दुख मन से, वचन से, कर्म से, दुख देने के आदी हो गए। तो वो राज्य जहां सुख ही सुख था, हँ, दुख का नाम-निशान नहीं था, वो राज्य अभी नहीं है। वो डीटी राजा है कहां? तो जब डीटी राज्य थी, वो थोड़ा ख्याल तो करो उस डीटी राज्य में और कोई धर्मों का, इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन्स आदि का या उनके सहयोगी धर्मों का राज्य था? कोई दूसरे धर्म वालों का राज्य था क्या? हँ? कोई भी राज्य नहीं था उस नई दुनिया में। इस भारत में कहो, बल्कि इस दुनिया में कहो। हां, ये कहेंगे छोटी दुनिया थी। हां। तो वहां सुख ही सुख था क्योंकि तुम उस दुनिया के मालिक बनते हो। हाँ। तुम बच्चे दुनिया के मालिक बनते हो। तुम बच्चे।

जिस तुम नई दुनिया के मालिक बनते हो जहां सुख ही सुख होता है, दुख का नाम-निशान नहीं, उस दुनिया में जाने के लिए कितनी मेहनत चाहिए। क्या? कितनी मेहनत माने? जैसे उस गीता में बताया ना सर्व धर्मान् परित्यज्य। कोई भी किसी भी धर्म का हो या कोई भी किसी भी धर्म में कन्वर्ट हो गया हो। क्या? देवी देवता सनातन धर्म के जो भारतवासी पहले थे वो दूसरे धर्मों में कन्वर्ट होते रहे ना। हिस्ट्री में देखा ना। हां। कन्वर्ट होते रहे। तो वो जो दूसरे-दूसरे धर्मों में भी चले गए हैं उनको मेहनत तो करनी पड़ेगी ना। कितनी मेहनत चाहिए। बच्चे, बहुत मेहनत चाहिए। जो बच्चे हैं ना, जो बाप जितना समझाते हैं, हँ, जितना समझाते हैं; थोड़ा समझाते हैं या बहुत विस्तार में समझाते हैं? जैसे झाड़ बहुत बड़ा विस्तार हो जाता है। और उसका बीज सार होता है। ऐसे ही वो बीज रूप बाप तुमको इतना विस्तार में समझाते हैं रुपए में से एक आना भी तुम मेहनत नहीं करते हो। बस, सत्यानाश मार दिया। जितना समझाते हैं उतना समझने के लिए और दूसरों को समझाने के लिए तुम कितना मेहनत नहीं करते? रुपए में एक आना, 16वां हिस्सा। अरे, एक आना तो छोड़ दो। दो पैसा भी, कई हैं, जो मेहनत नहीं करते। अरे जो भला दो पैसे से मेहनत करने से भी, तो भला जा कर के वहां स्वर्ग में तो जाएंगे ना। क्या कहा? हँ? जितना बाप विस्तार में समझाते हैं, हँ, उतना अगर उसमें से दो पैसा भी समझा तो क्या होगा? हां, दो पैसा भी समझेंगे तो स्वर्ग में आ जावेंगे। एक पैसा भी मेहनत करे तो भी स्वर्ग में चले जावेंगे। अरे?

ये ऐसा है इम्तेहान। क्या? कहां चले जावेंगे? स्वर्ग में तो चले जावेंगे लेकिन प्रजा वर्ग में जाएंगे या राजघराने में आवेंगे या राजा रानी बन जावेंगे? हां, पाई-पैसे का ज्ञान लेंगे तो फिर ऐसी ही प्रजा में चले जावेंगे। कैसी प्रजा? प्रजा भी कहते हैं, फर्स्ट क्लास प्रजा, सेकंड क्लास प्रजा, थर्ड क्लास प्रजा, फोर्थ क्लास प्रजा भी होती है। चांडाल-वांडाल को क्या कहेंगे? प्रजा। प्रजा है कि नहीं? हां। कोई होते हैं राजघराने के चांडाल, फिर कोई होते हैं प्रजा वर्ग के चांडाल। तो ये ऐसा है इम्तेहान। ये इम्तेहान बहुत बड़ा है। हँ? हां, भई बड़ी राजाई स्थापन हो रही है। तो कितना फखुर होना चाहिए तुम बच्चों को जब तुम्हारी एम आब्जेक्ट ही ये है। ये अभी स्टूडेंट भी हो। किस के? ईश्वर के स्टूडेंट हो ना। और जब ईश्वर पढ़ाते हैं। कौन? ईश माने शासनकर्ता। और वर माने श्रेष्ठ। दुनिया में जितने शासनकर्ता हैं, शासक हैं, उन शासनकर्ताओं के बीच में सबसे श्रेष्ठ शासनकर्ता। क्या? पुलिस भी नहीं, कोई मिलिट्री भी नहीं। ऐसा है? नहीं। कुछ भी नहीं। हँ? और कोई प्रकार का दबाव देते हैं? मनसा का, वाचा, कर्मणा का, कर्म इंद्रियों का दबाव देते हैं? कुछ भी नहीं। प्यार से पढ़ाते हैं। कहा ही जाता है प्यार का सागर। हँ? तो उनसे जास्ती प्यार का सागर तो कोई हो ही नहीं सकता। कोई शुरूड़ बच्चे होंगे तो कहेंगे सागर कैसे कहा? वो तो सूर्य है। हां, वो ज्ञान सूर्य है लेकिन ज्ञान सूर्य भी सागर में प्रवेश करते हैं ना। और सागर का भी पार्ट खुद बजाते हैं या सागर बजाता है पत्थर बुद्धि? हँ? हां, सागर का पार्ट भी पुरुषोत्तम संगमयुग में खुद बजाते हैं।

तो तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए कि हमको ऐसा ईश्वर पढ़ाते हैं। अरे, अपार खुशी होनी चाहिए, जिसका कोई पारावार नहीं। और ये बात कोई बाबा एक को थोड़े ही कहते हैं? हँ? सबको कहते हैं कि अभी हम सो बनते हैं। सो माने? हम सो बनते हैं। माने क्या बनते हैं? सब बच्चों को क्या कहते हैं? सो माने? जो देवी-देवताएं थे स्वर्ग में वही देवताएं हम अब बनते हैं। वो चाहे प्रजा वर्ग के हों, चाहे राजवर्ग के हों, चाहे राजघराने के हों। कोई भी हों हम सो बनते हैं।

तो बाबा कहते हैं अच्छा, आओ। हँ? नहीं तो भला यहाँ आकरके बैठ जाओ इनके सामने कि हम सो बनते हैं। किनके सामने बैठ जाओ? हँ? हां, लक्ष्मी-नारायण के सामने बैठ जाओ। जड़ चित्रों के सामने? हाँ। इनके सामने बैठ जाओ माने ब्रह्मा बाबा के सामने बैठ जाओ। इनमें कौन है? इनमें शिवबाबा है या नहीं? शिवबाबा। शिव बाप अकेला है कि बाबा है? शिव बाबा है। तो इनके सामने बैठ जाओ कि हम सो बनते हैं। क्या बनते हैं सो? जो ये लक्ष्मी-नारायण हैं, हँ, जिस राजधानी की ये हैं उसी राजधानी के हम बनते हैं। बाबा हमको ये बनाते हैं। हँ? तुम यहां आकरके बैठ जाओ। पर कोई बैठेगा थोड़े ही। हँ? नहीं। अरे, बैठने का भी वो खिर नहीं है यहां। कौन सा खिर? हँ? वो योग्यता नहीं है यहां बैठने की। क्यों भला? इनके आगे क्यों नहीं आकर बैठते हैं? अरे, टीचर के सामने स्टूडेंट बैठते हैं ना। नहीं बैठते? बैठते हैं। बैरिस्टर होगा तो टीचर के स्टूडेंट बैरिस्टर बनने वाले होंगे तो बैरिस्टर पढ़ाने वाला टीचर होगा तो उसके सामने बैठेंगे ना। हां। जो बैरिस्ट्री पास करने वाले होते हैं तो सामने बैठेंगे। तो इनके सामने भी। हँ? ये पास करते हैं ना बाबा तुमको। हँ? क्या? ये तो जानते हो कि बाबा हमको आप समान पवित्र आत्मा भी बनाते हैं। हँ? आप समान माने? जितना स्वयं आत्मा बनती है 16 कला संपूर्ण। हँ? सतयुग में 16 कला संपूर्ण बनेंगे ना। आप समान भी बनाते हैं। तो पहले ये बनते हैं; पीछे? पीछे हम भी बनते हैं, बनेंगे।

तो यहां आकरके बैठ जाओ। क्या? कहां आकरके बैठ जाओ? यहां। यहां माने बाप के बाबा के सामने आकर बैठ जाओ। और अच्छी तरह से बैठ जाओ। ऐसे नहीं अभी-अभी बैठे अभी-अभी उठ कर बाहर खड़े हो जाए। हां। क्यों खड़े हो गए कोई पूछे तो बताने में भी शर्म आएगी। अच्छा, पर एम ऑब्जेक्ट के सामने एकदम बैठ जाओ। तभी बाबा कहते हैं कि दिन में भी यहां रहते हो और घड़ी-घड़ी अगर भूल जाते हो तो, तो घड़ी-घड़ी आकरके यहां बैठ जाओ। मना करते हैं? कभी मना किया? हँ? नहीं मना तो नहीं करते। घड़ी-घड़ी आकरके बैठो। बाबा, ये बाबा हमको ये बना रहे हैं। क्या बना रहे हैं? ये बाबा हमको ये लक्ष्मी-नारायण जैसा देवता बनाय रहे हैं। बाबा हमको ये बनाय रहे हैं। ओमशान्ति। (समाप्त)

If you wish to achieve a high post, in order to achieve such a high post, this aim-object has been set so easy. An easy aim-object has been set that brother you have to either become Lakshmi-Narayan or like Lakshmi-Narayan. Only then did the Father say that your aim-object is the goal of our study. Hm? We have to become such deity. Some people ask, don’t they? Many ask – Ultimately what is your aim? What is the service that you are rendering to India? So, that is it; tell them. This is the service that we are rendering, aren’t we? Hm? We are establishing this capital of India. Which one? Not the capital of today’s democratic government which is established by the subjects (praja). No. The Father has come to teach rajyog and make you kings for many births. And He has come especially to make you the king of heaven. So, we are establishing this capital of heaven. What will this Delhi become? Now it is the capital of hell. Then what will it become? Yes, the capital of heaven. And that too how are we establishing the capital? We are establishing in the same manner as we had established 5000 years ago. There was a kingdom of these 5000 years ago as well. Now the kingdom of these doesn’t exist.

And now there is no kingdom of the Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma. There is no such kingdom anywhere in the world because was there only happiness in that kingdom or was there some sorrow also? It wasn’t there. Although now the souls of that ancient deity religion, the souls of that religion, the Sanatan Dharma do exist, but they don’t call themselves deities. Does anyone call himself a deity? Nobody can call himself/herself a deity. Yes. It is because there is no one in the world who keeps on giving happiness to someone continuously. Although people claim that they belong to the Sanatan Dharma, yet, they have become habituated to giving sorrows through the mind, words, actions. So, that kingdom where there was only happiness, there was no trace of sorrows, that kingdom doesn’t exist now. Where is that deity king? So, when there was deity kingdom, just think a little, in that deity kingdom was there the kingdom of any other religion, that of Islamic people, Buddhists, Christians, etc. or their helper religions? Was there a kingdom of the people of any other religion? Hm? There was no other kingdom in that new world. Call it in India, rather in this world. Yes, it will be said that the world was small. Yes. So, there was just happiness there because you become the masters of that world. Yes. You children become the masters of the world. You children.

The new world whose masters you become, where there is only happiness, there is no trace of sorrows; you need to work so hard to go to that world. What? What is meant by ‘so much hard work’? For example it was said in that Gita, wasn’t it? Sarva dharmaan parityajya (renounce all the religions). One may belong to any religion or may have converted to any religion; what? The residents of India who belonged to the ancient deity religion earlier continued to convert to other religions, didn’t they? You saw in the history, didn’t you? Yes. They continued to convert. So, those who have gone to other religions will have to work hard, will they not have to? So much hard work is required. Children, a lot of hard work is required. The children are there, aren’t they? Do they explain as much as the Father explains? Do they explain a little or do they explain in very detail? For example, the Tree expands a lot. And its seed is the essence. Similarly, that seed-form Father explains to you in such detail, you don’t work hard to the extent of one Anna in a Rupee (16 Annas). That is it; you have ruined. How hard do you not work to understand whatever is explained or to explain to others? One Anna in a Rupee, 16th part. Arey, leave aside one Anna. There are many who do not work hard even up to two paise. Arey, even if someone works hard to the extent of two paise, they will go to heaven there, will they not? What has been said? Hm? The extent to which the Father explains in detail, hm, if you understand even to the extent of two paise, then what will happen? Yes, even if you understand to the extent of two paise, you will come to heaven. Even if you work hard to the extent of one paisa, you will go to heaven. Arey?

This is such an examination. What? Where will you go? You will go to heaven, but will you come to the subjects category or will you come in a royal clan or will you become king and queen? Yes, if you obtain knowledge worth pie-paise, then you will be included in the category of such subjects (praja) only. What kind of praja? Even in case of praja, it is said first class praja, second class praja, third class praja; there is fourth class praja also. What will Chandaals, etc be called? Praja. Are they praja or not? Yes. Some are Chandaals of royal clans; then some are Chaandaals of praja category. So, this is such an examination. This examination is very big. Hm? Yes, brother, a big kingship is being established. So, you children should feel so proud when your aim-object itself is this. You are this student also now. Whose? You are students of God, aren’t you? And when God (Ishwar) teaches; who? Ish means governor. And var means righteous. The most righteous governor among all the governors, rulers in the world. What? Not even police, not any military as well. Is it so? No. Nothing. Hm? And does He exert any kind of pressure? Does He exert any pressure of mind, speech, actions, organs of action? Nothing. He teaches lovingly. He is called ocean of knowledge. Hm? So, there cannot be anyone greater ocean of love than Him. If there are any intelligent children, they will say – How did you call Him ocean? He is the Sun. Yes, He is the Sun of Knowledge, but the Sun of Knowledge also enters in the ocean, doesn’t He? And does He play the part of ocean also Himself or does the stone-like intellect play the part of ocean? Hm? Yes, He Himself plays the part of ocean in the Purushottam Sangamyug.

So, you children should feel very happy that we are being taught by such God. Arey, you should have immeasurable joy, which does not have any limit. And does Baba say this topic to any one person? Hm? He says to everyone that we now become that. What is meant by ‘that’? We become that. What do we become? What does He say to all the children? What is meant by ‘like that’? We now become the same deities who existed in heaven. They may belong to the praja category, they may belong to the royal category, they may belong to the royal clan. They may be anyone; we become like that.

So, Baba says – Achcha, come. Hm? Otherwise, you may come and sit here in front of these that we become like that. In front of whom should you sit? Hm? Yes, sit in front of Lakshmi-Narayan. In front of the non-living pictures? Yes. Sit in front of these means that sit in front of Brahma Baba. Who is present in him? Is ShivBaba present in him or not? ShivBaba. Is Father Shiv alone or is it Baba? He is ShivBaba. So, sit in front of these that we become like that. What do you become like that? We become members of the same capital (raajdhani) to which these Lakshmi-Narayan belong. Baba makes us this. Hm? You come and sit here. But will anyone sit? Hm? No. Arey, they do not have the quality to sit here. Which quality? Hm? They do not have that capability to sit here. Why so? Why don’t you come and sit in front of these? Arey, students sit in front of the teacher, don’t they? do not they sit? They sit. If someone is a Barrister, then if the students of the teacher are to become Barristers, then if the teacher is a Barrister, then they will sit in front of him, will they not? Yes. Those who have to pass Barristry will sit in the front. So, in front of these as well. Hm? This Baba enables you to pass, doesn’t He? Hm? What? You know that Baba makes us a pure soul equal to Himself. Hm? What is meant by equal to Himself? The extent to which the soul itself becomes perfect in 16 celestial degrees. Hm? You will become perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age, will you not? He makes you equal to Himself, too. So, first these become; later? Later we too become, we will become.

So, come and sit here. What? Where should you come and sit? Here. Here means come and sit in front of the Father, Baba. And sit nicely. It is not as if you sit just now and then just now you get up and stand outside. Yes. If anyone asks why you stood, then you will feel shy to tell. Achcha, but sit in front of the aim-object. Only then does Baba say that you live here in the day also and if you forget every moment, then come and sit here every moment. Does He stop you? Did He ever stop you? Hm? No, He doesn’t stop. Come and sit every moment. Baba, this Baba is making us this. What is He making? This Baba is making us deities like Lakshmi-Narayan. Baba is making us this. Om Shanti. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2822, दिनांक 17.03.2019
VCD 2822, dated 17.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2822-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.10
Time- 00.01-17.10


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को छठे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि दिन में यहां रहते भी; कहां? मधुबन में रहते भी हो, घड़ी-घड़ी अगर भूल जाते हो, तो क्या करो? घड़ी-घड़ी आकरके यहां बैठो। बैठ जाओ। अंदर में सोचो बाबा हमको ये बनाए रहे हैं। बाबा हमको ये बनाए रहे हैं। क्या बनाए रहे हैं? हँ? ये माना क्या बनाए रहे हैं? (किसी ने कुछ कहा।) देवता बनाए रहे हैं? देवता तो वहां स्वर्ग में सारे ही होंगे। कल बताया - भई पैसे का भी ज्ञान सुनेंगे ना तो भी फोर्थ क्लास प्रजा में तो आवेंगे ना। तो नहीं होंगे? देवता नहीं होंगे? हां। वो देवता नहीं जो कलियुग के अंत तक देवता धर्म की आत्माएं आती रहती हैं 33 करोड़, वो नहीं। उनमें भी, हां, जो 8-10 करोड़ वाले हैं उनकी बात बताई कि बाबा हमको ये बनाए रहे हैं। बाबा माना मनमनाभव। बाबा माने क्या? मेरे मन में समा जा। तो ये कौन कहता है मेरे मन में समा जा? हँ? (किसी ने कुछ कहा कहा।) हत् तेरा भला हो। कहता है - साकार कहता है मेरे मन में समा जाओ। अरे, साकार में जो प्रवेश है निराकार, वो कहता है कि मेरे मन में; जब प्रवेश कर गया तो उसका मन हुआ, उसका दिल हुआ या नहीं हुआ? हां।

तो कहता है मेरे दिल में मनमनाभव, मेरे मन में समा जा। और ये बनाय रहे हैं माना मध्याजीभव। क्या बनाय रहे हैं? हँ? क्या बनाय रहे हैं? ये। ये माने कौन हैं? ये। लक्ष्मी-नारायण की तरफ इशारा करके। ये कौन हैं? देवता। तो ये बनाय रहे हैं। तो कैसे बनते हैं ये? मध्याजीभव। मेरे लिए यजन करने वाला। यजन माने सेवा। स्वाहा-स्वाहा नहीं मुंह से बोलना। वो क्या करते हैं भक्तिमार्ग में? स्वाहा-स्वाहा। ढेरों गाय का बढ़िया-बढ़िया घी उंडेल देते हैं। गरीबों को बिचारों को खाने को नहीं मिलता। वो आग में जला देते हैं। हां। बाप कहते हैं वो स्वाहा-स्वाहा की सेवा नहीं। असली सेवा क्या है? स्व हा। स्व माने आत्मा। हा माने आत्मा का जो तन है, धन है, मन है, ये मन के संकल्प भी और तन की इंद्रियों का सुख भी और तन के जो संबंधी हैं उनकी ताकत भी सारी स्वाहा। तो ऐसे मध्याजी भव। पहले मनमनाभव। फिर? फिर जब मनमनाभव हो गए, मेरे को दिल ही दे दिया, आहा, जिसके ऊपर दिल आ जाता है तो फिर उसके लिए जानमारी करते हैं, अरे, तुम, तुम मेरे को जो अच्छा लगता है, सारा तू ले ले। हां, दिल आ गया ना। हां।

तो बताया तो देखो यहां भी नहीं आएंगे क्योंकि माया है ना। आने नहीं देती। यहां भी नहीं आएंगे; माया नहीं आने देती? क्यों? क्योंकि माया रूपिणी है, जो है ना, वो तो अनेक रूप धारण करती है। हां। स्त्री का रूप भी धारण करती है, पुरुष का रूप भी धारण करती है, कन्या का रूप भी धारण करती है। कुमारों का रूप भी धारण करती है। ये माया है ना। ये माया नाक से पकड़ करके यहां बैठने ही नहीं देगी। हँ? मुसीबत। क्या? ऐसे नाक पकड़ती है जैसे बहुत लंबी नाक हो गणेश जी की। आराम से पकड़ने में आ जाती हो दोनों हाथों से। हँ? नाक से पकड़ करके यहां बैठने नहीं देगी। यहां माने कहां? बाबा के पास बैठने ही नहीं देगी। या उठाए करके बाहर में ले जाएगी। क्या? कहां ले जाएगी? बाहर। बाहर में क्यों? हँ? जहां बार-बार दिल जा रही होगी ना वहां उठाके ले जाएगी। माया ऐसी प्रबल है। प्र माने प्रकष्ठ। बल माने बलवाली। ऐसी जबरदस्त बलवान है; कैसी जबरदस्त? ऐसी माना कैसी? हँ? अरे, कैसी? जो, हां, भगवान बाप से भी अलग कराए देती है। नहीं तो बिल्कुल सहज बात है ना बच्चे। यहां आकरके बैठ जाओ। हँ? नहीं तो? नहीं तो माना क्या? ये जो माया से प्रभावित मन के संकल्प नहीं होने चाहिए। अगर माया से प्रभावित हुए तो कोई ना कोई बात आ जावेगी। दूर ले जावेगी।

तो यहां आकर के बैठो। क्या? माया से अप्रभावित होकरके यहां आकरके बैठो। और इस सीढ़ी के ऊपर ही आकर के बैठो सामने। क्या? इस सीढ़ी के ऊपर आकरके बैठो सामने। क्या है सीढ़ी? हँ? अरे, सीढ़ी में क्या है? अरे, 84 जन्मों की 84 सीढ़ियां है। तो बुद्धि में आएगा हमने 84 जन्म लिया है। हँ? अभी हम फिर जाकरके वो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। हँ? वो माने कौन से? वो लक्ष्मी-नारायण। हँ? जब बाबा के पहले से पास ही रखे हुए हैं तो वो क्यों कह दिया? वो माने क्या? वो माने दूर या नजदीक? दूर। तो कम कलाओं वाले नारायण हैं ना। कितने? हां, कम, एक है आदि नारायण, सूर्यवंशी। और वो भी फर्स्ट क्लास। और बाकी जो आठ हैं वो तो उतरती कला वाले हैं ना। हां। तो बताया अभी हम फिर जाकरके वो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। वो बुद्धि में आएगा। क्यों? नीचा क्यों बुद्धि में आएगा? हँ? अरे, जैसा पुरुषार्थ किया होगा वैसा ही तो बुद्धि में आएगा ना। वो बनते हैं। हँ। कौन बनाते हैं? बनते तो हैं। चलो पहले नंबर के फर्स्टक्लास, दूसरे नंबर के सेकंड क्लास, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास, फिफ्थ क्लास। हँ? नारायण तो हैं ना सतयुग में। नौ नारायण हैं। नो नाथ द्वारे गाए हुए हैं। कहते हैं ना? हां।

तो बताया बनाते कौन हैं ये नंबर वार 1 से लेकर के 9? अब ये सोचना पड़ेगा। 15.11.1967 की प्रातः क्लास का सातवां पेज, बुधवार। कौन बनाते हैं? हँ? अरे, कोई जवाब आया कि नहीं आया? हँ? अरे, बाप बनाते हैं। कौन बनाते हैं? बाप। अरे कौन से? दुनिया में तो ढेर सारे बाप हो गए। लौकिक दुनिया में जन्म-जन्मांतर के बाप हो गए। फिर उनके जिस-जिस धर्म के जो बाप हैं उनके धर्मपिताएं बाप हो गए। उन धर्मपिताओं का भी बाप आदम, वो सब धर्मपिताओं का, सारी दुनिया का बाप हो गया मनुष्य मात्र का। हँ? तो कौन सा बाप बनाते हैं? अरे, इतनी देर लगाते। कौन सा बाप बनाते हैं? अरे, बाबा कहते हैं सो समझना भी बहुत बिल्कुल सहज है कि कौन सा बाप बनाते हैं? परंतु इतनी ताकत नहीं है, किसकी भी इतनी ताकत नहीं है जो वहां बैठ सके। कहां? वहां माने कहां? अरे, वहां माने कहां बैठ सके? अरे? अभी-अभी तो बताया, अभी-अभी भूल गए। हँ? बाबा के सामने की बात हो रही थी कि सीढ़ी की बात हो रही थी? हत तेरे की। और सीढ़ी में भी 84 जन्म। नीचे की सीढ़ी से लेकर के मध्यम सीढ़ियों से होते हुए ऊपर तक की सीढ़ी।

तो इतनी किसी की ताकत नहीं है जो वहां बैठ सके। माने? वहां क्यों कह दिया? दूर क्यों कर दिया? अरे ब्रह्मा बाबा कहां बैठे हैं सीढ़ी में? सीढ़ी में ब्रह्मा बाबा नीचे बैठे हैं या ऊपर बैठे हैं? हँ? ब्रह्मा बाबा तो नीचे बैठे हैं। तो वहां कहां के लिए बोला? हँ? ऊपर माने कहां? ऊपर माने? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, ऊपर माना कलातीत? हँ? कलातीत में नारायण होता है? अरे? वहां तो विष्णु होता है। नारायण कहां होता है? हँ? अरे, नारायण होगा तो उसकी नजर कहां जाएगी? हँ? नारायण होगा तो फिर नारायणी के ऊपर नजर जाएगी। हाँ। तो विष्णु की नजर कहीं जाती है क्या? देखो? हँ? संगमयुग में विष्णुलोक होता है या सतयुग में विष्णुलोक होता है? 16 कला संपूर्ण सतयुग में? नहीं।

तो बताया तो इतनी किसी की ताकत नहीं है जो वहां जा कर के बैठ सके। वहां माने कहां? हां जो सीढ़ी की, आखरी सीढ़ी है ना 84वें जन्म की, जहां, जहां माया बैठने नहीं देगी। वहां माया बैठने नहीं देगी? कहां नहीं बैठने देगी? हँ? अरे माया ने क्या ठान रखी है? अरे, माया भी तो नंबरवार माया रूप धारिणी है ना। कोई अव्वल नंबर, कोई सेकंड नंबर, कोई थर्ड नंबर, नंबर, ढेर सारे नंबर। माया की भुजाएं ढेर सारी हैं। तो बताया माया बैठने नहीं देगी। तो अव्वल नंबर की बात पकड़ लो। अव्वल नंबर माया जो है वो पहले अपना नंबर लेगी कि दूसरों का नंबर देगी? चाहे बीज रूप हो, चाहे आधार मूर्त हो। आधार मूर्त को तो समझ लिया ना। वो कहां बैठेगी? उसने क्या ठान लिया? कि ब्रह्मा बाबा की अगर गद्दी लूंगी तो मैं लूंगी। ब्रह्मा बाबा की पहले-पहले गद्दी मेरे अलावा और किसी को मैं लेने ही नहीं दूंगी। पक्की बात है? हां। ऐसे ही बीज रूप आत्मा। जो उस माया की बीज रुप है ना। रुद्राक्ष का मणका होगा। हाँ। उसके, उसने क्या ठान ली? कि अगर पहले-पहले मैं गले पडूंगी जाके लटकूंगी तो मैं लटकूंगी जाके। और भरी सभा में मैं किसी को पहले ब्रह्मा बाबा के गले में लटकने ही नहीं दूंगी। जाते ही जाते क्या करूंगी? पहले ब्रह्मा बाबा के गले में लटक जाऊंगी। अच्छा।

वो तो हो गई कहां की बात? हँ? वो तो हो गई ओम मंडली की बात। फिर मध्य में? मध्य में जब एडवांस पार्टी शुरू होती है बीज रूप आत्माओं की, रूद्र माला के मणकों की तो सबसे पहले नंबर कौन लेगी? हँ? हां, वो ही यमुना बेटी। कहते हैं सूर्य की बच्ची थी। क्या? सूर्य की बेटी, सूर्य की पुत्री यमुना। काली नदी थी ना। हां। काले कर्म करने वाली। तो ठीक है। वो बैठने ही नहीं देगी। किसी की हिम्मत नहीं, ताकत नहीं जो वहां किसी को बैठने दे। क्या? चाहे बीज रूप माता ने जिसको ठान लिया इसके पास नहीं बैठने दूंगी, पहले मैं बैठूंगी और चाहे आधार मूर्त माने जड़ों के रूप में हो वो ने भी ठान ली मैं जो मुख्य जड़ है ना दादा लेखराज ब्रह्मा उसकी गद्दी के ऊपर मैं बैठूंगी। उसके अलावा और किसी को बैठने नहीं दूंगी। कोई न कोई बात के ऊपर, कोई ने कुछ वो उठाकरके यहां से ले ही जाएगी। क्या? इतनी पावरफुल है। कौन? ज्यादा पावरफुल कौन सी? बीज रूप या आधारमूर्त जड़? बीज रूप। उसकी यादगार है कोई? हँ? यादगार नहीं मालूम? अरे? कितनी बार यादगार, मंदिर है ना उसका।
(किसी ने कुछ कहा।) हां। योग माया मंदिर। एडवांस पार्टी जब निकलती है तो सबसे पहले वो योग माया मंदिर वाली निकलती है। महारौला मचाय देती है। कहां? दिल्ली राजधानी में। तो बताया वो और किसी को नहीं बैठने देगी बाबा के पास। वो खुद बैठेगी।

A morning class dated 15.11.1967. The topic being discussed in the end of the middle portion of the sixth page was that during the daytime, while living here; where? Even while living in Madhuban, if you forget every moment, then what should you do? Come every moment and sit here. Sit. Think inside – Baba is making us this. Baba is making us this. What is He making? Hm? What is He making when He says ‘this’?
(Someone said something.) Is He making you deities? There in the heaven everyone will be a deity. It was told yesterday – Brother, even if you listen to knowledge worth a paisa you will be included in the fourth class praja, will you not be? So, will they not be? Will they not be deities? Yes. Not those deities who are the 33 crore souls of deity religion which keep on coming till the end of the Iron Age. Not that. Even among them, yes, those who are included among 8-10 crores, it was said about them that Baba is making us this. Baba means Manmanaabhav. What is meant by Baba? Merge into My mind. So, who says – Merge into My mind? Hm? (Someone said something.) Damn, God bless you. He says – The corporeal says – Merge into my mind. Arey, the incorporeal who has entered in the corporeal says – In My mind; when He entered then is it His mind, His heart or not? Yes.

So, He says – Manmanaabhav in My heart; merge into My mind. And He is making us this, i.e. Madhyaajibhav. What is He making us? Hm? What is He making us? This. ‘This’ refers to whom? This. He pointed towards Lakshmi-Narayan. Who are these? Deities. So, He is making us these. So, how do you become this? Madhyaajibhav. The one who makes efforts for Me. Yajan means service. You don’t have to utter swaha-swaha through the mouth. What do they do on the path of Bhakti? Swaha-swaha. They pour good quality ghee of numerous cows. Poor people don’t get to eat [ghee]. And they burn it in fire. Yes. The Father says – Not that service of ‘swaha-swaha’ (making offerings in the sacrificial fire). What is the true seva? Swa ha. Swa means the soul. Ha means the body, the wealth, the mind of the soul, even these thoughts of the mind and the pleasure of the organs of the body also and the entire power of the relatives of the body also should be sacrificed. So, Madhyaajibhav like this. First Manmanaabhav. Then? Then, when you became Manmanaabhav, when you gave the mind itself to Me, aaha, the one to whom you lose your heart, then you sacrifice your life for him/her, arey, you, you, whatever I like, you take that entirely. Yes, you lost your heart, didn’t you? Yes.

So, it was told – So, look, they will not come here as well; it is because there is Maya, isn’t she? She doesn’t allow you to come. They will not come here as well; Doesn’t Maya allow you to come? Why? It is because the embodiment of Maya assumes different forms, doesn’t she? Yes. She assumes the form of a woman also; she assumes the form of a man also; she assumes the form of a virgin also. She assumes the form of Kumars (unmarried men) also. This is Maya, isn’t she? This Maya will catch you by the nose and will not allow you to sit here at all. Hm? Difficulty. What? She catches by the nose in such a way as if it is a very long nose of Ganeshji. It can be caught easily with both hands. Hm? She catches you by the nose and will not allow you to sit here. ‘Here’ refers to which place? She will not allow you to sit near Baba. Or she will make you get up and go out. What? Where will she take? Outside. Why outside? Hm? She will make you get up and take you to the places where your heart is moving again and again. Maya is so strong (prabal). Pra means prakashth (special). Bal means ‘the one with power’. She is so powerful; how powerful? Such means how? Hm? Arey, how? It separates you from God, the Father also. Otherwise, it is a very easy topic, isn’t it children? Come and sit here. Hm? Otherwise? What is meant by otherwise? The thoughts of the mind should not be influenced by Maya. If you are influenced by Maya, then one or the other topic will intrude. It will take you far-away.

So, come and sit here. What? Come and sit here uninfluenced by Maya. And come and sit in front of this Ladder only. What? Come and sit in front of this Ladder. What is the Ladder? Hm? Arey, what is in the Ladder? Arey, there are 84 steps of the 84 births. So, it will come into the intellect that we have taken 84 births. Hm? Now we go and again become that Lakshmi-Narayan. Hm? ‘That’ means which ones? That Lakshmi-Narayan. Hm? When they are already placed near Baba, then why did He say ‘that’? What is meant by ‘that’? Does ‘that’ mean far or near? Far. So, there are Narayans with fewer celestial degrees, aren’t there? How many? Yes, fewer; one is Aadi Narayan, Suryavanshi. And that too first class. And the remaining eight are those with decreasing celestial degrees, aren’t they? Yes. So, it was told that now we go and become that Lakshmi-Narayan again. That will come to the intellect. Why? Why will the lower one come to the intellect? Hm? Arey, as is the purusharth, the similar one will come to the intellect, will it not? You become that. Hm. Who makes? They do become. Okay, first number is first class, second number is second class, third class, fourth class, fifth class. Hm? There are Narayans in the Golden Age, aren’t there? There are nine Narayans. Nine Nath Dwaras are famous. People say, don’t they? Yes.

So, it was told – Who makes you these numberwise from one to nine? Now you will have to think over this. Seventh page of the morning class dated 15.11.1967, Wednesday. Who makes? Hm? Arey, did you get any reply or not? Hm? Arey, the Father makes. Who makes? The Father. Arey, which one? There are numerous fathers in the world. In the lokik world, there have been fathers birth by birth. Then their fathers of whichever religion they belong, the founders of those religions are fathers. The Father of even those founders of religions is Aadam; He is the Father of all the founders of religions, of the entire world, of the mankind. Hm? So, which Father makes? Arey, you take such a long time. Which Father makes? Arey, Baba says, it is very easy to understand as to which Father makes? But you don’t have that power; nobody has the power to sit there. Where? ‘There’ refers to which place? Arey, ‘there’ means where could he sit? Arey? It was told just now, you forgot just now. Hm? Was the topic of Baba’s front being discussed or was the topic of the Ladder was being discussed? Damn it. And 84 births in the Ladder also. From the lower step to the middle steps to the top step.

So, nobody has the power to sit there. What does it mean? Why did He say ‘there’? Why did He make it distant? Arey, where is Brahma Baba sitting in the Ladder? Is Brahma Baba sitting below or above in the Ladder? Hm? Brahma Baba is sitting below. So, for which place was ‘there’ used? Hm? ‘Above’ refers to which place? What is meant by ‘above’? Hm? (Someone said something.) Yes, does ‘above’ mean ‘kalaateet’ (beyond celestial degrees)? Hm? Is Narayan in kalaateet [stage]? Arey? There is Vishnu there. Is it Narayan there? Hm? Arey, if it is Narayan, then where will his eyes see? Hm? If it is Narayan, he will look at Narayani. Yes. So, do Vishnu’s eyes move in any direction? Look? Hm? Is the abode of Vishnu in the Confluence Age or is the abode of Vishnu in the Golden Age? In the Golden Age perfect in 16 celestial degrees? No.

So, it was told – So, nobody has that much power to go and sit there. There refers to which place? Yes, in the Ladder, there’s the last step of the 84th birth, where, where Maya will not allow you to sit. Will Maya not allow you to sit there? Where will she not allow you to sit? Hm? Arey, what has Maya decided? Arey, Maya is also numberwise holder of the form of Maya, isn’t she? Someone is number one, someone is second number, someone is third number, number, numerous numbers. There are numerous arms of Maya. So, it was told that Maya will not allow to sit. So, grasp the topic of number one. Will the number one Maya achieve its number first or will she allow others to achieve the number? Be it the seed-form one or be it the aadharmoort (base-like) one. You have understood the aadhaarmoort, haven’t you? Where will she sit? What has she decided? That if anyone has to inherit the throne of Brahma Baba, then it is me. I will not allow anyone other than myself to inherit the first and foremost throne of Brahma Baba. Is it sure? Yes. Similar is the case with the seed-form soul. There is a seed-form of that Maya, isn’t it there? There is bead of Rudraksh. Yes. What did she decide? That if anyone has to embrace, I will go and embrace. And I will not allow anyone else to embrace Brahma Baba in a packed gathering. What will I do as soon as I go? First I will embrace Brahma Baba. Achcha.

That topic is about which place? Hm? That topic is about Om Mandali. Then in the middle? In the middle when the Advance Party of seed-form souls, of the beads of the Rudramala starts, then who will achieve the first number? Hm? Yes, the same daughter Yamuna. It is said that she was the daughter of the Sun. What? The daughter of Sun, the daughter of Surya, Yamuna. She was a dark river, wasn’t she? The one who used to perform dark actions. That is correct. She will not allow you to sit at all. Nobody can dare, show courage to allow anyone to sit there. What? If the seed-form mother decides that she will not allow anyone to sit near this one; first I will sit; and be it the aadhaarmoort (base-like soul), i.e. in the form of roots, if she also decides that I will sit on the throne of the main root, Dada Lekhraj Brahma; I will not anyone else to sit; She will make him/her get up from there on some or the other pretext and take them away. What? She is so powerful. Who? Who is more powerful? The seed-form or the base-form root? The seed-form. Is there any memorial of hers? Hm? Don’t you know the memorial? Arey? So many times; there is a memorial, temple of hers’, isn’t it?
(Someone said something.) Yes. Yogmaya temple. When the Advance Party emerges, then first of all that lady from the Yoga Maya temple emerges. She causes uproar (maharaula). Where? In the capital Delhi. So, it was told that she will not allow anyone else to sit near Baba. She herself will sit.
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arjun
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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2823, दिनांक 18.03.2019
VCD 2823, dated 18.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2823-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-24.05
Time- 00.01-24.05


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को सातवें पेज के मध्य में बात चल रही थी - 4:00 बजे उठो। हँ? अपनी कोठरी में क्यों बैठते हो? यहां आकर के बैठो। बस, यही ख्याल से कि मैं यहां आता हूं और अभी हम संगमयुग पर बैठे हैं। बाबा को याद कर रहे हैं। और याद करते-3 सतोप्रधान बन जाएंगे। तो हम बैठकरके याद करते हैं। फिर देखो। हँ? वो चित्र टिकता है या फिर माया क्या करती है? अपनी जांच तो करवाओ। तो बाबा राय देते हैं ना। तो उन एक भी राय को जांच कराओ। उठो, जाकरके स्नान करने में तो कोई देरी नहीं लगती है। चलो, एक घंटा, नहीं तो बाबा आकर के सिखलाय बच्चों को, बाबा सुबह को आते हैं। आयकर के इसके सामने बैठ जाएगा। तो जब देखेगा टाइम है तो फिर चला जाएगा। फिर देखें हम कितना आकर के बैठते हैं? कल गुरुवार है ना बच्चे। मैं गुरुवार को महूर्त करता हूं। सुबह को उठकर के वहां से और आकरके हम यहां बैठ जाऊंगा। है ना। बड़े मौज से बैठ करके देखूंगा कि बाबा हमको ये बनाते हैं। मैं आत्मा हूं। मुझ आत्मा को बाबा पढ़ाते हैं। हम फिर हम लिख देंगे वो चार्ट। कितना समय मेरा रहा इसमें? कितना हम रहेंगे? एग्ज़ांपल तो दिखाएंगे ना। अच्छा। पीछे तुम भी देखें हम कितना आकर के बैठते हैं। है ना।

और चित्र जाएगा तो हम दूसरे भी बहुत चित्र हैं। चित्र तो अभी बहुत ही छपाते हैं। ढेर के ढेर। फिर सबको चित्र दे देंगे। ये किसने बोला ढेर के ढेर चित्र छपाते हैं? हँ? ढेर के ढेर चित्र छपाते हैं - ये किसने बोला? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, ब्रह्मा बाबा ने बोला। शिवबाबा तो कहते हैं माया की मत पर ढेर के ढेर चित्र बनाए हैं। तो शिव बाबा कैसे कहेंगे? हँ? ब्रह्मा बाबा ने पास किए होंगे मुंबई वाले को। तुम छपाओ ढेर के ढेर चित्र। माया की नगरी है ना। तो माया ऐसी मत देती है। क्या? हँ? हाँ। तो फिर चित्र दे देंगे ढेर के ढेर चित्र। ये चित्र घर में रख करके और सब उनके सामने बैठ, बैठ जाओ। ढेर के ढेर चित्रों के सामने बैठेंगे तो बुद्धि भटकेगी या एक जगह एकाग्र होगी? नहीं। तो सोचो सामने बैठकर हम अभी ये बन रहे हैं। यह नहीं बन रहे हैं। ये बन रहे हैं। माने ढेर के ढेर चित्र हैं तो उन चित्रों में से नंबरवार होंगे ना। हां। तो बहुतों की बुद्धि में आएगा कि किसी को क्या पसंद, कोई को क्या पसंद। कोई को हनुमान पसंद, कोई को गणेश पसंद। तो ये बन रहे हो। तो खुशी का पारा भी चढ़ेगा। हँ? क्यों? खुशी का पारा उन ढ़ेर के ढेर चित्रों को देखकर क्यों चढ़ेगा? क्योंकि जन्म-जन्मांतर में कोई किसका इष्ट, कोई किसका इष्ट रहा। तो डबल सिरताज बन रहे हैं। अभी हम कंगाल से, कौडी भी हाथ में नहीं है अभी हमारे।

ये तो समझ सकते हैं कि दुनिया में तो सब भक्ति ही भक्ति है। जो भी हैं सब भक्ति करते हैं। उनको नशा बहुत है। है ना। वो तो तुमको पता नहीं क्या समझते हैं। कोई तो समझते हैं यह ब्रह्माकुमारियां तो शायद विनाश ही लावेंगी। ये सदा विनाश की बातें करती रहती हैं। ये उल्टा-उल्टा हमको बताती हैं सब विनाश हो जाएगा। और तुम उनको, तुम उनको उल्टा करते हो। करते हो ना? वो हैं जो उल्टे उनको तुम फिर सुल्टा बनाते हो। और वो समझते हैं कि ये हमको उल्टा बनाते हैं। 15.11.1967 का प्रातः क्लास, आठवां पेज। ये जरूर है ये दुनिया, ये भारत का आगे चलकरके तुम देखना कि बरोबर वो खुद कहेंगे ये ब्रह्माकुमारियां, ब्रह्माकुमारिया तो सारा दिन यही करती हैं। हँ? 8 बरस में विनाश हो जावेगा। सन् 67 चल रहा था ना। तो ये यही बोलती हैं कि 8 बरस में विनाश हो जावेगा। 9 बरस में विनाश हो जावेगा। ये विनाश-विनाश करती ही रहती हैं। तो ये मुट्ठी विनाश-विनाश कर-करके विनाश ही ले आएंगी। ऐसा कुछ देखने में आता है क्योंकि इनके मुख में विनाश के सिवाय कोई दूसरी बात ही नहीं आती है। एकदम कोई नहीं। बस विनाश।

और तुम लिखती भी हो इस विनाश के बाद स्थापना। हँ? बाद क्यों? अभी स्थापना हो रही है ब्रह्मा द्वारा या ब्रह्मा द्वारा विनाश हो रहा है कोई? फिर क्यों कहा? विनाश के बाद फिर स्थापना। ऐसे क्यों? हँ? क्योंकि जब तक बुराई का विनाश नहीं होगा, दुष्टों का दमन नहीं होगा। हँ? गीता में लिखा है ना - विनाशाय च दुष्कृताम्। किस लिए आता हूं? हां धर्म संस्थापनार्थाय। लेकिन धर्म की स्थापना प्रत्यक्ष कब होगी? जब इन दुष्टों का विनाश होगा क्योंकि इनकी तादाद बहुत है ढेर की ढेर। तो जो छोटे से संगठन की स्थापना होती है। देवताएं तो थोड़े होंगी देव आत्माएं। तो वो थोड़े से जो हैं इन ढेर के ढेर के बीच में छुप जाते हैं। बाकी स्थापना तो हो रही है। हां, ये जो स्थापना हो रही है अभी गुप्त है। फिर विनाश के बाद ये खड़ी हो जाएगी। क्या? विनाश के बाद क्यों खड़ी हो जाएगी? क्योंकि अपोजिशन करने वाला कोई रहेगा नहीं। तो तुम जानते हो क्योंकि अभी ये गुप्त स्थापना हो रही है। है ना बच्चे?

तो जो-जो अच्छे-अच्छे हैं, समझते हैं, देखो, वो निमंत्रण भी तो देते हैं ना बच्ची। तो जो निमंत्रण देते हैं वो अच्छे हैं, हँ, तुम्हारी नजर में अच्छे हैं या खराब हैं? अच्छे हैं तभी तो निमंत्रण देते हैं ना। हां। तो देखो कहां-कहां से निमंत्रण कि बाबा यहां आकरके सेंटर खोलो। तो, तो बहुतों का कल्याण हो जावेगा। परंतु ये सब करने में मेहनत तो है ना बच्ची। ये तो सिर्फ राम-राम, माला-वाला तो नहीं करने का है। हँ? या कृष्ण शरणम भव, कृष्ण शरणम मम्। ऐसे फलाना-फलाना, बताना। ये तो नहीं करना है। यहां तो ऐसा भक्ति मार्ग का कोई टंट-घंट नहीं करना एकदम। और यहां भी आकर चुप करके बैठ जाना है। हँ? कि कुछ बोलते करते रहना है? नहीं। बोलना कुछ थोड़े ही है बच्चे? नहीं। ये तो अंदर की बात कहता हूं। अंदर में। क्या? बाबा नहीं समझते हो? अंदर में समझने की बात है। साधारण देहधारी समझते हो कि बाबा समझते हो? बाबा इनको देखते होंगे। किनको? किनको देखते होंगे? ब्रह्मा बाबा को, दादा लेखराज को देखते होंगे। और इनको इनको? हां, जो मुकर्रर रथधारी आत्मा है उनको भी देखते होंगे। बाकी एक को देखने की बात नहीं बताई।

तो बाबा जब इनको देखते होंगे तो क्या तुम खुश नहीं होते हो कि बाबा हमको नहीं देखते, इनको ही देखते हैं? एक तुम क्यों नहीं खुश होते हो? हँ? ये किसके लिए बोला एक तुम? तुम भी तो उसी डिनायस्टी में जाते हो ना। तुमको भी तो खुशी होनी चाहिए। तुम जानते हो ना हम ये शरीर छोड़करके गोल्डन स्पून इन माउथ लूंगा। यूं भी अगर अभी भी शरीर छोड़ो कि तुम बहुत बड़े घर में जाकरके जन्म लेते हो। समझा ना। क्योंकि ब्राह्मण हो ना। फिर भी तो ऊँचे हुए ना ब्रह्मा की औलाद। तो तुम तो बहुत बड़े घर में जन्म लेंगे। हाँ, फिर भी तो तुमको गोल्डन स्पून इन माउथ देंगे ना। देखो वो बड़े आदमी होते हैं। तुम बच्चे जानते हो ना बाबा ने नहीं गोल्डन स्पून और सोने का स्पून या चमचा या पतीला बनाया था कोई के लिए। बनाया था क्या? नहीं। तो देखो, उनको सौगात भी भेजी गई। गोल्डन स्पून इन माउथ।

तो तुम बच्चे भी तो जानते हो कि तुम्हारा जो जैसे जैसा तुम्हारा पुरुषार्थ है ऐसे-ऐसे तुम्हारा जन्म मिलने का है। अच्छा-अच्छा पुरुषार्थ होगा तो जन्म भी अच्छा मिलेगा। तो भी गोल्डन स्पून इन माउथ तो जरूर मिलेगा। मिलेगा ना तुम बच्चों को? क्योंकि वहां तुम जाते हो। जाते ही हो नई दुनिया में। कोई पुरानी दुनिया में तो नहीं जाते हो। फिर भी अगर इस दुनिया में ही पहले जन्म लेते भी हो तो बहुत बड़े घर में जन्म लेंगे। हँ? बाबा ने किस हिसाब से बड़े घर में जन्म लेंगे ऐसे बोला? हँ? किस हिसाब से बोला? क्योंकि जन्म बाई जन्म तो नीचे उतरते जाती है आत्मा पार्ट बजाने के लिए कि ऊंची चढ़ती है? नीचे गिरती है। बाबा ने किस हिसाब से बोला बड़े घर में जन्म लेंगे? क्योंकि जिन आत्माओं के बीच में जन्म लेंगे वो तो ज़रूर ऊंच आत्मा ही होगी ना। हां। वहां तुम्हारे वैसे संस्कार? संस्कार पड़ेंगे फिर। वहां तुम जानते हो कि कुछ तो दुख खलास कर दिए होंगे योग में इस जन्म में। और बाकी जो कुछ रहा हुआ है क्योंकि गई हो कुछ ना कुछ बाकी रहा हुआ है तो भोगने के लिए रहा हुआ है भोगेंगे। वो थोड़ा दुख भी तो कर्मों के अनुसार भोगना ही पड़ेगा ना क्योंकि अभी कर्मातीत अवस्था तो कोई की नहीं हो सकती ना। नहीं। कर्मातीत अवस्था हो जाएगा, पीछे तो दुख की कोई बात ही नहीं होगी।

तो ये भी, ये भी शास्त्रों में ऐसे रख दिया है, लिख दिया है कि वो गर्भ में बैठा था, बाहर नहीं आता था। समझा ना? परंतु इससे थोड़े ही है कि यहां से जाकरके कोई गर्भ में बैठ जाना है या घर, घर में जगह नहीं है बैठने की जो आकरके गर्भ में ही बैठेगी। ऐसे तो फिर शांतिधाम में ही रहना होगा ना। पीछे आएगा। अपने समय पर गर्भ में आएगा। गर्भ में भी 6 महीना रहेगा। हँ? 6 महीने रहती है कहीं आत्मा गर्भ में? 6 महीने रहती है? आत्मा कहां 6 महीने रहती है? आत्मा तो जब निर्जीव गर्भपिंड जब चार-पांच महीने का हो जाता है तब आत्मा प्रवेश करती है। हां। तो किसने बोला ये? हां, ब्रह्मा बाबा ने बोला। गर्भ में भी 9 महीना रहेगा। कोई 12 महीना थोड़े ही रहेंगे? वो तो कायदा जैसा है सबका उस कायदे के अनुसार ही गर्भ में रहेगा। निकलेंगे तो बाहर ना। तो यह भी दंत कथाएं बना दी हैं कि बैठ गया था गर्भ में। बाहर नहीं आता था। अभी ये कोई लॉ थोड़े ही है।

तो बाप बैठकर के समझाते हैं। अगर अपनी उन्नति चाहो तीन रोज, चार रोज, पांच रोज, जो भी दिन आते हो तो चलो, ये आकरके सुबह को उठकरके स्नान पानी भी करके, अगर स्नान नहीं किया, किसको ये अभ्यास है कि पीछे स्नान करने का, तो भी तुम लोग कोई, कोई पलीत मूत-पलीती थोड़े ही होते हो। जो बाथ करके यहां स्नान करके ही आना है। आराम हो गया थोड़ा। हँ? हँ? बाबा ने छुट्टी दे दी? क्या? कि तुम स्नान करके न भी आते हो तो कोई बात नहीं। कोई तुम मूत पलीती थोड़े ही होते हो। पलीत तो होते हो जब पैखाने में जाते हो। तब ही पलीत होते हो। उसको कहा ही जाएगा मूत-पलीती थी। नहीं तो कोई पलीत तो नहीं होते हो तो। तो आकरके सुबह को यहां बैठ जाओ। हां भले बाद में पीछे स्नान करके आओ। पीछे स्नान करो। क्लास सुनकर के पीछे क्लास करो। कोई मना थोड़े ही है क्योंकि हां, पलीत तो नहीं हो ना। जब तक नहीं मूत-पलीती हो तब तक कुछ हर्जा नहीं है यहां बैठने में। (क्रमशः)

Morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the seventh page on Wednesday was – Wake up at 4 A.M. Hm? Why do you sit in your room? Come and sit here. That is it; with the thought that I come here and now we are sitting in the Confluence Age. We are remembering Baba. And while remembering we will become satopradhan. So, we sit and remember. Then see. Hm? Does that picture remain constant or what does Maya do? Get yourself checked. So, Baba gives advice, doesn’t He? So, get even one advice checked. Wake up; it does not take much time to go and bathe. Okay, one hour; otherwise Baba comes and teaches children; Baba comes in the morning. He will come and sit in front of this one. So, when He will see that there is still some time left, then He will go. Then we should check – To what extent do we come and sit? Child, tomorrow is Guruvaar (Thursday). I will start on Thursday. I get up from there in the morning and I will come and sit here. Is it not? I will see happily that Baba makes us this. I am a soul. Baba teaches me, the soul. We will then write that chart. How much time did I spend in this one? How long will I be [in this]? We will set an example, will we not? Achcha. Later you should also see how long I come and sit here. Is it not?

And if the picture is sent, then we have many other pictures. Now we are getting many pictures printed. Numerous. Then we will give pictures to everyone. Who said – We are getting many pictures printed? Hm? We are getting numerous pictures printed – Who said this? Hm?
(Someone said something.) Yes, Brahma Baba said. ShivBaba says that you have prepared numerous pictures on the opinion of Maya. So, how will ShivBaba say? Hm? Brahma Baba must have given pass (approval) to the person from Mumbai. You get numerous pictures printed. It is Maya’s city, isn’t it? So, Maya gives such opinion. What? Hm? Yes. So, then you will be given pictures, numerous pictures. Place these pictures at home and everyone should sit in front of them. If you sit in front of numerous pictures, then will the intellect wander or will it focus at one place? No. So, just think sitting in the front that now we are becoming these. We are not becoming this. We are becoming these. It means that when there are numerous pictures, then those pictures will be numberwise, will they not be? Yes. So, it will strike the intellect of many people that someone likes something, someone likes something else. Someone likes Hanuman, someone likes Ganesh. So, you are becoming these. So, the mercury of joy will also rise. Hm? Why? Why will the mercury of joy rise by seeing those numerous pictures? It is because birth by birth, someone was someone’s favorite deity (isht), someone else was the favorite deity of someone else. So, you are becoming double crowned. Now we are changing from beggars; now we don’t even have cowrie in our hands.

You can understand that there is Bhakti everywhere in the world. Everyone does Bhakti. They feel very intoxicated. Is it not? You don’t know what they think about yourself. Some think that these Brahmakumaris will perhaps bring destruction soon. They always keep talking about destruction. These ladies keep on telling us opposite things that everything will be destroyed. And you turn them opposite. You do, don’t you? They are opposite (ultey); you then make them straight (sulta). And they think that these people make us opposite (ulta). Morning class dated 15.11.1967, eighth page. It is definite, this world, this India, in future you will see that definitely they themselves will say that these Brahmakumaris keep on doing this throughout the day. Hm? Destruction will take place in 8 years. The year 67 was going on, wasn’t it? So, these ladies keep on telling that destruction will take place within 8 years. Destruction will take place in 9 years. These ladies keep on talking about destruction. So, these ladies will definitely bring destruction while talking about it. Something like this is seen because no topic other than destruction emerges from their mouths. None at all. Just destruction.

And you ladies even write – Establishment, after this destruction. Hm? Why later? Is establishment taking place now through Brahma or is any destruction taking place through Brahma? Then why was it said so? Establishment, after destruction. Why so? Hm? It is because unless the evil is destroyed, the wicked people will not be destroyed. Hm? It has been written in the Gita, isn’t it? Vinaashaay cha dushkrutaam (in order to destroy the evil). Why do I come? Yes, dharma sansthaapanaarthaayn (in order to establish dharma). But when the establishment of religion will be revealed? It is when these wicked people are destroyed because their number is very large. So, the small gathering that is established; deities, the deity souls will be very few. So, those few get hidden in the midst of these numerous people. But establishment is taking place. Yes, this establishment that is taking place now is incognito. Then this will stand up [get revealed] after destruction. What? Why will it stand up after destruction? It is because there will not be anyone to indulge in opposition. So, you know because now this incognito establishment is taking place. Is it not children?

So, those who are nice ones, understand; look, daughter, they even give invitation, don’t they? So, those who give invitation, are they nice, hm, are they nice in your eyes or are they bad? They are nice; only then do they give invitation, don’t they? Yes. So, look, invitations are received from different places that Baba come and open a center here. Then, then many will be benefited. But daughter, it involves hard work in doing all this. This is not just about saying ‘Ram, Ram’, feeling the rosary. Hm? Or about saying ‘Krishnam sharanam bhav, Krishnam sharanam mam’. Uttering, telling such things. You don’t have to do this. Here you don’t have to do any ritual of the path of Bhakti at all. And here too you have to come and sit silently. Hm? Or do you have to keep on speaking anything? No. Child, do you have to say anything? No. I speak about the inner thing. Inside. What? Don’t you understand Baba? It is about understanding inside. Do you consider Him to be an ordinary bodily being or do you consider Him to be Baba? Baba must be seeing this one. Whom? Whom must He be seeing? He must be seeing Brahma Baba, Dada Lekhraj. And this one, this one? Yes, He must also be seeing the soul of the permanent Chariot. It was not said about seeing one.

So, when Baba must be seeing these, then do you not feel happy that Baba doesn’t see us, He sees only these? Why don’t you one feel happy? Hm? For whom was it said ‘you one’? You also go to the same dynasty, don’t you? You too should feel happy. You know, don’t you that I will leave this body and take up a golden spoon in mouth. Even otherwise, even if you leave the body now, you go and get birth in a very big [prosperous] house. Did you understand? It is because you are Brahmins, aren’t you? However you, the children of Brahma are high, aren’t you? So, you will get birth in a very big house. Yes, however, you will be given a golden spoon in mouth, will you not be? Look, there are those big personalities. You children know that Baba had not made any golden spoon or a golden spoon or utensil for anyone. Had he made? No. So, look, a gift was also sent to them. Golden spoon in mouth.

So, you children also know that as is the purusharth you make you will get births accordingly. If your purusharth is good then the birth that you will get will also be good. However, you will definitely get golden spoon in mouth. You children will get, will you not? It is because you go there. You go only to the new world. You don’t go to the old world. However, even if you get first birth in this world, then you will get birth in a very big (prosperous) house. Hm? On what account did Baba say that you will get birth in a big house? Hm? On what account did He say? It is because does the soul keep on descending birth by birth or does it rise to play its part? It falls. On what account did Baba say that you will get birth in a big house? It is because the souls among whom you will get birth will definitely be high souls only. Yes. There you will get such sanskars. There you know that you might have burnt some sorrows through Yoga in this birth. And whatever remains because if any suffering remains to be experienced, then you will experience it. You will have to experience that little sorrow as per your actions because now nobody can achieve the karmaateet stage, can they? No. When the karmaateet stage is achieved, then later there will not be any topic of sorrow at all.

So, this has also been kept, written like this in the scriptures that he was sitting in the womb and was not coming out. Did you understand? But it is not as if you have to go from here and sit in the womb or that there is no place in the house that you will go and sit in the womb. In this way you will have to live in the abode of peace only, will you not? Later he will come. He will enter the womb when the time comes. Even in the womb he will remain for six months. Hm? Does the soul remain in the womb for six months? Does it remain for six months? Does the soul remain for six months? When the non-living foetus (garbhpind) grows four-five months old, then the soul enters. Yes. So, who said this? Yes, Brahma Baba said. It will remain in the womb for nine months. Will anyone remain for 12 months? As is the rule for everyone, he will remain in the womb as per that rule only. They will come out, will they not? So, this is also a mythological story that has been written that he sat in the womb. He was not coming out. Well, this is not a law.

So, the Father sits and explains. If you want your progress, you may come for three days, four days, five days, or whatever number of days, you come, wake up in the morning, after bathing, if you have not taken a bath, some people have the habit of bathing later on, even then you people don’t become dirty with urine (lust) that you have to take a bath and come here only after bathing. It has become a little easier. Hm? Hm? Did Baba give you permission? What? That it doesn’t matter even if you come without bathing. You don’t become dirty with urine (moot-paleeti). You become dirty when you go to the washroom (latrine). Only then do you become dirty. That will be called moot-paleeti. Otherwise, you don’t become dirty. So, come in the morning and sit here. Yes, later on you may come after bathing. Later take a bath. After listening to the class; later you may attend the class. You are not prohibited because yes, you are not dirty, are you? Unless you are dirty, there is no objection in sitting here. (Continued)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2823, दिनांक 18.03.2019
VCD 2823, dated 18.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2823-Bilingual-Part-2

समय- 24.06-37.32
Time- 24.06-37.32


15.11.1967 की प्रातः क्लास का नौवां पेज। जब तुम्हारा देखो खुशी का पारा चढ़ेगा और तुम्हारे, तुम्हारे मुखड़े में रौनक आ जाएगी क्योंकि खुशी में तो मनुष्य का चेहरा खिल जाता है ना। तो देखो इनका भी तो चेहरा खिला रहता है ना। किनका बताया? किनका? (किसी ने कुछ कहा।) ऊपर वाले का? हां? किनका चेहरा खिला रहता है? (किसी ने कुछ कहा।) हां, लक्ष्मी नारायण का। तो कोई नई बात तो नहीं है ना ये। अरे, लक्ष्मी-नारायण तो नई दुनिया की बात। अभी नई दुनिया थोड़े ही है। अभी तो पुरानी दुनिया माया का राज्य है। तो माया मुंह लटकाए देती है घड़ी-घड़ी। तो लक्ष्मी-नारायण की मिसाल देने की तो बात ही नहीं। तो किनका चेहरा खिला रहता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, संगमयुग में किन का? जितने संगमयुग में बैठे हैं ब्राह्मण सबका? इनका माने, अरे, जो रथ बताया ब्रह्मा बाबा का तो वो तो एक हो गया रथधारी। और उसमें वो एक होता है कि शिव बाप जब आते हैं तो दूसरे को भी लेकर आते हैं? हां। मुकर्रर रथधारी आत्मा भी तो आती है ना। तो बोला इनका।

इनका चेहरा तो खिला रहता है। क्यों? क्यों खिला रहता है? हँ? क्योंकि हां;
(किसी ने कुछ कहा।) अच्छा चलो ठीक है ब्रह्मा बाबा को तो खुशी है, पक्का निश्चय बैठा हुआ है साक्षात्कार की अंधश्रद्धा के आधार पर कि मैं कृष्ण बनूंगा। और जो दूसरी आत्मा है मुकर्रर रथवाली उनका? हां, उनका किसलिए? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, उनका इसलिए खिला रहता है कि वो तो समझते हैं कि और तो जो रथ हैं सो टेंपरेरी हैं, मैं तो हर जगह इनके, बाप के साथ ही रहता हूं। हां। तो अंतर हो गया ना। क्या? क्या अंतर हो गया? परमानेंट में और टेंपरेरी में अंतर नहीं होगा? खुशी में भी तो अंतर होगा ना। तो कोई नई बात तो नहीं है ना ये। अरे, ये तो कल बाबा कहते हैं कल तुमको राज्य देकर गया था। क्या? बाबा तो 100 साल के बाद 5000 साल के लिए आराम से सो जाते हैं। परमधाम में कोई याद रहता है? हँ? कुछ नहीं। वहां तो आत्मा जैसे सुषुप्ति में। तो बाबा को तो ऐसे लगता है जैसे कल आए थे, कल राजाई देकर चला गया और आज फिर आ गया। हां। तुमको, तुमने, हँ, कल राजाई देकर गया और तुमने, हँ, एक दिन में ही सारा पैसा गंवा दिया? हँ? जितना अकूट ज्ञान का भंडार देके गया था खुशी में लाने के लिए तो वो सारा तुमने गुमाय दिया भक्तिमार्ग में? हां, अब बाबा को याद आया हां, भक्तिमार्ग में। क्यों भक्ति मार्ग में तो ढाई हजार साल चलता है ना यहां। हां। भक्ति मार्ग में सारा गुमाय दिया। तो देखो सब गुमाए दिया।

ये मत समझो कि ये, ये अमेरिका में इतना पदम, हँ, करोड़ों, पर ये तो बाकी थोड़े रोज के लिए है ना बच्ची। ये तो अभी खत्म हो जाएंगे। अभी हुए कि हुए। जब बाबा आते हैं तब तो यही समझो कि बस दुनिया का खात्मा करने के लिए आए हुए हैं। कौन सी दुनिया का? दुखदाई दुनिया का खात्मा करने के लिए आए हैं। बुलाते ही हो। किसलिए? बाबा को बुलाते ही इसलिए हो बाबा आय करके इस दुखदाई दुनिया को खत्म करो क्योंकि इस अंतिम जन्म में तुमको, हां, और धर्म की आत्माओं के मुकाबले सबसे ज्यादा दुख तुमको मिलता है। क्योंकि आता ही हूं पतितों को पावन बनाने के लिए। तो पावन बनाएगा तो जरूर पतित दुनिया खलास होगी ना। कि पतित ही बने रहेगी? खलास होगी। पुरानी दुनिया खलास होगी। तब तो फिर नई दुनिया आवेगी ना। पुराना मकान भी बना रहे और फिर नया मकान भी बन जाए उसके ऊपर तो चलेगा? वो थोड़े ही चलेगा?

तो देखो, बाप को बुलाते ही हैं इसलिए। किसलिए? कोई समझ में किसके थोड़ेही आता है कि हम बाबा को बुलाते हैं। किसलिए बुलाते हैं? अरे, हम बुलाते ही हैं कि आकरके पतितों को पावन बनाओ, पतित दुनिया को पावन बनाओ। बस। यही बोलते आते हैं। हँ? यही तुम बोलते हैं, जन्म-जन्मांतर बोलते आए। और आते हैं। तुम बोलते हैं और हम आते हैं। अब जब यहां आते हैं तो समझ तो मिलती है ना बच्चों को कि तुम किसको बुलाते हो? तो वो तो महाकालों का काल, जिसको महाकाल कहा जाता है ना। महाकाल का भी मंदिर होता है। ऐसे नहीं समझो कि महाकाल का मंदिर नहीं होता है। हँ? अभी मंदिर खाली रख दिया है। बाकी अर्थ का किसी को भी पता नहीं है कि महाकाल का मंदिर नाम क्यों रखा है? खाली क्यों रख दिया है? हँ? महाकाल का मंदिर खाली क्यों रख दिया? क्योंकि
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? महाकाल विनाश करते हैं इसलिए उनके मंदिर में सब डरते हैं इसलिए खाली कर दिया। हां। अभी नहीं बना है? अरे उज्जैन में तो कितना बड़ा मंदिर अभी बना हुआ है महाकाल का मंदिर। हां। नाम भी रख दिया उत् जैन। कैसे? उत् माने ऊंचे। और जैन माने जिन्होंने इंद्रियों पर जीत पाई। किसने? इंद्रियों में मुख्य इंद्रिय काम इंद्रिय पर किसने जीत पाई? हां। कहते हैं शिवबाबा ने जीत पाई। तो उसके फॉलोअर हैं। जो ऊंचा जिनेंद्र है, हँ, इंद्रियों को जीतने वाला, उसको फॉलो करने वाले हैं। भले जीतते हैं या कम जीतते हैं या ज्यादा जीतते हैं। पुरुषार्थ तो करते हैं ना ऋषि-मुनि। हां।

तो बताया अभी खाली कर दिया है क्योंकि वो तो कालों का काल; काल कहते हैं ना। तो डर जाते हैं। भगवान ने काल को भेज दिया इनको ले जाने के लिए। तो दुखी होते हैं कि सुखी होते हैं? हां, दुखी होते हैं। अभी भगवान-वगवान तो कुछ भेजता नहीं है। हँ? कोई की मौत होती है मरने वाला होता है तो कोई भगवान भेजता है किसी को? हँ? कि इनको जाके उठा लो, पकड़ के ले आओ? ऐसे कुछ भी नहीं है। जो भगवान भेजता हूं कि ये किस को काल कहेंगे। नहीं। ये तो ड्रामा के प्लान अनुसार हर एक चीज आपे ही चलती रहती है। न कोई भेजता है और न कोई ऐसी बात है। कुछ भी ऐसी बात नहीं है। कोई ऐसी बात है कि कोई भेजता है? नहीं। ये तो बाप है। ये देखो ड्रामा अनुसार सब विनाश भी ड्रामा के प्लैन के अनुसार अर्थक्वेक वगैरह होगा। हँ? जैसा ड्रामा का प्लैन है वैसा ही होगा। कल्प-कल्प जैसा होता आया है वैसा ही होगा।

अभी शंकर कहां बैठा हुआ है? भले त्रिमूर्ति के चित्र में दिखाया है शंकर। परंतु अभी कहां बैठा हुआ है? कहीं है? हँ? दीवाल में बैठा हुआ है? हँ? कहां बैठा हुआ है? अभी शंकर थोड़े ही है? अभी ब्राह्मण है, ब्रह्मा का बच्चा है कि शंकर है? हां। हां? कहां बैठा हुआ है? बाबा को पता नहीं है। क्या? क्या पता नहीं है? कि शंकर कब कहा जाता है? शंकर तो कहा ही जाता है जब ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा उसमें प्रवेश करे अधूरा चंद्रमा। और शिव तो प्रवेश करता ही है मुकर्रर रूप से। और उसकी अपनी आत्मा भी है ही है। तो तीनों आत्माएं मिक्स होती हैं एक ही शरीर में तो शंकर कहा जाता है। तो, तो वो ये भले वे चित्र बनाय दिए हैं गले में सर्प डालकर के। ये तो, ये तो वंडर खाते हैं। हँ? बैल के ऊपर। भला बैल के ऊपर? बैल पर सवारी वरी शंकर की। अब वो कहते हैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। कोई पूछे कहां हैं तो कहते हैं सूक्ष्म वतन में हैं। अब वहां सूक्ष्म वतन में बैल कहां से आया? हँ? सूक्ष्म वतन में तो मनुष्यों के शरीर भी सूक्ष्म होते हैं या कोई जानवर होते हैं वहां? वो तो होते नहीं। तो देखो, बुद्धि कितनी चट्ट खाते में एकदम गई हुई है। और फिर उनको अहंकार फिर देखो कितना है पुजारियों को? ओमशांति। (समाप्त।)

Ninth page of the morning class dated 15.11.1967. Look, when your mercury of joy rises and when your face starts glowing because a person’s face glows in joy, doesn’t it? So, look, the face of these also remains glowing, doesn’t it? Whose [face] was mentioned? Whose?
(Someone said something.) Of the above one? Yes? Whose face remains glowing? (Someone said something.) Yes, of Lakshmi-Narayan. So, this is not a new topic, is it? Arey, Lakshmi-Narayan is a topic of the new world. It is not a new world now. Now it is the old world, kingdom of Maya. So, Maya makes your face droop every moment. So, there is no question of giving an example of Lakshmi-Narayan at all. So, whose face remains glowing? Hm? (Someone said something.) Yes, whose [face] in the Confluence Age? Is it of all the Brahmins who are sitting in the Confluence Age? ‘Of these’ (inka) means, arey, the Chariot of Brahma Baba that was mentioned, that is one Chariot-holder. And is he alone when Father Shiv comes in him or does He bring another one also? Yes. The soul of the permanent Chariot-holder also comes, doesn’t it? So, it was said ‘of these’.

The face of these remains glowing. Why? Why does it remain glowing? Hm? It is because yes;
(Someone said something.) Achcha, okay, Brahma Baba has the joy, he has developed firm faith on the basis of blind faith of visions that I will become Krishna. And what about the other soul of the permanent Chariot? Yes, why is his [face glowing]? (Someone said something.) Yes, his face remains glowing because he understands that the other chariots are temporary; I remain with the Father only everywhere. Yes. So, there is a difference, isn’t it? What? What is the difference? Will there be any difference between the permanent and temporary? There will be a difference in the joy also, will it not be there? So, it is not a new topic, is it? Arey, yesterday, Baba says – I had given you the kingdom yesterday and went. What? Baba sleeps comfortably for 5000 years after 100 years. Does anyone come to the mind in the Supreme Abode? Hm? Nothing. There the soul is in deep slumber (sushupti). So, Baba feels as if He had come yesterday, I had given the kingship yesterday and gone and today I have come again. Yes. You, you; hm, I had given the kingship yesterday and gone; and you lost the entire money in one day itself? Hm? Did you lose on the path of Bhakti the entire inexhaustible stock of knowledge that I had give to you to bring you in joy? Yes, now Baba recollected, yes, on the path of Bhakti. Why? The path of Bhakti continues for 2500 years here, doesn’t it? Yes. You lost everything on the path of Bhakti. So, look, you lost everything.

Do not think that this, this America has such multimillions, crores, but daughter this is for a few days, isn’t it? These will perish now. They are about to perish. When Baba comes, then just understand that He has come to end the world. Which world? He has come to end the sorrow-causing world. You call only for that. Why? You call only because; Baba, come and end this sorrow-causing world because in this last birth you, yes, when compared to souls of other religions you get the maximum sorrows. It is because I come only to purify the sinful ones. So, if He makes you pure, then the sinful world will definitely end, will it not? Or will you remain sinful only? It will perish. The old world will perish. Only then will the new world come, will it not? If the old house also remains intact and if the new house also gets built over it, then, will it work? It will not work.

So, look, the Father is called only for this. Why? Does anyone understand that we call Baba? Why do we call? Arey, we call only for the sake that you come and make the sinful ones pure, make the sinful world pure. That is it. We have been telling this only. Hm? You speak this only; you have been telling this birth by birth. And He comes. You say and I come. Well, when I come, then you children get the wisdom as to whom do you call? So, He is Kaal of Mahaakaals, the one who is called Mahaakaal, isn’t he? There is a temple of Mahaakaal as well. Do not think that there is no temple of Mahaakaal. Hm? Now the temple has been kept vacant. But nobody knows the meaning that why the temple of Mahaakaal is named so? Why has it been kept vacant? Hm? Why the temple of Mahaakaal was kept vacant? It is because
(Someone said something.) Hm? Mahaakaal causes destruction; this is why everyone fears in His temple; this is why it was vacated. Yes. Has it not been built now? Arey, such a big temple, the temple of Mahaakaal is still built in Ujjain. Yes. The name has also been coined as Ut jain. How? Ut means high. And Jain means those who have conquered the organs. Who? Who conquered the main organ among the organs, i.e. the organ of lust? Yes. It is said that ShivBaba conquered. So, we are His followers. We are those who follow the high Jinendra, the one who conquers the organs. Although they conquer or conquer to lesser extent or conquer to a greater extent. The sages and saints do make purusharth, don’t they? Yes.

So, it was told that now it has been vacated because He is the ‘Kaalon ka kaal’; People speak of ‘kaal’ (agent of death), don’t they? Then they feel afraid. God has sent ‘kaal’ to take this one away. So, do they feel sorrowful or do they feel happy? Yes, they feel sorrowful. Well, God doesn’t send anyone. Hm? If someone dies, if someone is about to die, then does God send anyone that go and pick-up this one, catch him and bring him? There is no such thing as God sends someone who is called ‘kaal’. No. As per the drama plan everything keeps on moving. Neither does anyone send nor is there any such topic. There is no such topic. Is there any such thing that anyone sends [anyone]? No. This is the Father. Look, as per this drama, even the destruction, earthquake, etc. will take place as per the drama plan. Hm? It will happen only as per the drama plan. It will happen only as has been happening every Kalpa.

Where is Shankar sitting now? Although Shankar has been depicted in the picture of Trimurti. But where is he sitting now? Is he anywhere? Hm? Is he sitting in the wall? Hm? Where is he sitting? Is Shankar present now? Is he a Brahmin, is he a child of Brahma or is he Shankar? Yes. Yes? Where is he sitting? Baba doesn’t know. What? What doesn’t he know? That when is he called Shankar? He is called Shankar only when the Moon of knowledge Brahma, the incomplete Moon enters in him. And Shiv does enter in a permanent manner. And his own soul is also anyways there. So, when all the three souls mix in the same body, then he is called Shankar. So, so, although these pictures have been formed showing snakes around the neck. They, they wonder. Hm? On a bull. On a bull? Shankar rides on the bull. Well, they say – Brahma, Vishnu, Shankar. If anyone asks, where he is, then they say – He is in the Subtle Region. Well, where did the bull emerge there in the Subtle Region? Hm? In the Subtle Region even the bodies of the human beings are subtle or are there any animals there? They do not exist there. So, look, the intellect has gone completely in the nil account. And then look they, the pujaris (priests) feel so egotistic! Om Shanti. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2824, दिनांक 19.03.2019
VCD-2824, dated 19.03.2019
प्रातः क्लास 15.11.1967
Morning class dated 15.11.1967
VCD-2824-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.35
Time- 00.01-19.35


प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को नौवें पेज के मध्य के बाद तीसरी, चौथी लाइन में बात चल रही थी - शंकर को दिखाते हैं बैल पर सवारी है। गले में सर्प पड़ा हुआ है। हँ? अब देखो वन्डर लगता है। बुद्धि कितनी चट्ट खाते में एकदम चली गई। और अहंकार फिर देखो कितना इनका है पुजारियों को। एकदम कितना अहंकार। अभी यहां कोई भी, कोई भी अवतार तो नहीं कोई कहते हैं। यहां कोई ब्रह्माकुमार-कुमारी अवतार कहते हैं कि भगवान का अवतार हुआ? नहीं। अवतार-ववतार की कोई बात नहीं है। कुछ भी नहीं है। अगर अवतार भी कोई कहलाते हैं अपन को अवतार, चलो भक्ति मार्ग में अवतार कहलाते हैं 10 अवतार, 22 अवतार, 24 अवतार। जैनी लोग भी मानते हैं। तो भी तो ये श्री श्री 108 जगतगुरु। अभी जगतगुरु तो पतित-पावन को कहेंगे ना। जो सारा जगत कलियुग के अंत में पतित बन जाता है उसको आकर के पावन बनावे। तो वो जगतगुरु असली पतित-पावन हुआ ना, एवर प्योर हुआ ना। अरे, अब ये जगतगुरु तो मूत से पैदा होते हैं। पैदाइश ही मूत की है, तो ये पतित-पावन कहां से हो गए? हँ? फिर सर्व का सद्गति दाता तो वो एक ही है। सारी दुनिया 500-700 करोड़ मनुष्य मात्र की सद्गति करता है। हँ?

अभी ये कोई आकरके, आकरके अपन को श्री श्री 108 जगतगुरु। कितना मम्मा ने भी चिट्ठी लिखवाई थी इन जगतगुरु महाराजों को। अभी भी होगा कोई। तो जब देखें कि ऐसे-ऐसे अपन को जगतगुरु कहलाते हैं तो फिर उन जगतगुरुओं को ये पत्र भेज दो कि तुम अपन को जगतगुरु कहलाते तो हो परंतु भारत में ही तुमको भारतवासी तुमको सब जगतगुरु मानते हैं? जगत में तो 500-700 करोड़ मनुष्य आत्माएं। यहां तो भारतवासी ही सब तुमको नहीं मानते हैं तो तुम जगतगुरु कहां से हो गए? हँ? तो ऐसे-ऐसे पत्र लिख करके भेज दियो। शायद अभी कुछ नरम हुए होंगे। समझा ना। अभी न नरम होंगे तो पीछे आगे चलके फिर भी इनको ये भेज देना। नहीं, ये भेज देगा। क्या कहा? अभी तुम बच्चे अगर नहीं भेज रहे हो और ये नर्म नहीं भी होते हैं, तो आगे चलकरके ये, कौन ये भेज देगा? ये भेज देगा। कौन भेज देगा? देगा माने एक या दो-चार? हां, किसके लिए बोला? हँ? ये भेज देगा माने कौन भेज देगा? हां,
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा भेज देगा? खत्म हो गया। उसने भेजा? नरम हुए? कि और ही गर्म हुए? हँ? अभी नरम हुए क्या? हँ? ब्रह्माकुमारियां अपनी स्टेज पर बुलाती हैं निमंत्रण देके तब आते हैं या अपनी स्टेज पर बुलाते हैं ब्रह्माकुमारियों को? तो नरम हुए? क्या कहें? नरम माने मुलायम हुए? सॉफ्ट हुए कुछ? बुद्धि उनकी कुछ ब्रह्माकुमार-कुमारियों के लिए सॉफ्ट हुई? हँ? कोई सॉफ्ट कॉर्नर उनके हृदय में है उनके लिए? नहीं है।

तो देखो, ये तो काम में आने वाली चीजें हैं पत्र, वगैरह। अभी तो ईमेल निकल पड़ा। है ना? हां। तो ये तुम जगतगुरु कैसे कहलाए सकते हो? ये चिट्ठी लिख करके भेजना। यानी ये सफेद झूठ है ना बच्ची। हँ? जो अपन को टाइटल लेकरके बैठे हैं श्री श्री 108 जगत गुरु जी महाराज। श्री श्री 1008 जगत गुरु जी महाराज। इस बात के ऊपर तो पहले एडल्ट्रेशन का केस चलाएं। वो ठगी का केस चलाना चाहिए। क्या? ये तो पब्लिक के साथ ठगी कर रहे हैं। जो अपन को जगत का गुरु कहलाते हैं। अरे, सारे जगत का गुरु तो जगत पिता ही होगा ना। हँ? एक तरफ गाते भी रहते हैं जगतं पितरं वंदे पार्वती परमेश्वरौ। हँ? जो हमारे जगत के पितर हैं, पिता हैं, हँ, सबसे पहले-पहले, वो हैं पार्वती परमेश्वर माने शिव-शंकर जिन्हें कहते हैं। है ना? और पार्वती। वो मात-पिता पितर हुए ना सबके, सारी दुनिया के।

तो तुम अपन को जगतगुरु कैसे कहलाते हो? पर केस किसके ऊपर करें? यहां तो चार-चार शंकराचार्य बैठे हुए हैं। हँ? देश के चारों कोनों में चार-चार बैठे हुए हैं। बाबा एक तो कहते हैं ना इनके ऊपर भी वास्तव में केस करना चाहिए। क्या? इनके ऊपर? माने इन सभी शंकराचार्यों के ऊपर कोर्ट में, सुप्रीम कोर्ट में केस, हां, जनहित याचिका डालनी चाहिए। ये तो सारी पब्लिक को बुद्धू बनाय रहे हैं, एडल्ट्रेशन कर रहे हैं। क्योंकि ये बात क्लियर है ना एकदम - जगतगुरु। अरे, जगत माना ही सारा जगत। सारा जगत माने? जो भी दुनिया में 500 करोड़ मनुष्य हैं, 700 करोड़ हों, वो सारे ही जगत कहेंगे। एकदम सारी सृष्टि के गुरु। तो सारी सृष्टि उनको गुरु मानती है? क्रिश्चियन मानते हैं? मुसलमान मानते हैं? इस्लामी मानते हैं? हँ? अरे बौद्धी लोग मानते हैं उनको अपना जगतगुरु? नहीं मानते हैं ना। वो अपने धर्मपिताओं को बड़ा मानते हैं या इनको मानते हैं? हँ? हां।

वो तो सभी पतित-पावन को क्यों बुलाते हो? जबकि यहां जगतगुरु यहां बैठे हुए हैं इतने ढेर के ढेर जगतगुरु बैठे हुए हैं तो फिर गांधीजी और गांधीजी के फॉलोअर्स को पतित पावन सीता राम रघुपति राघव राजा राम ये क्यों धूनी लगाते हैं तुम्हारे बापू जी महाराज? तो वो तो पतित-पावन को बुलाते हैं। परंतु अभी इतनी किसमें ताकत नहीं आई है। अभी। इतनी ताकत। कितनी ताकत? जो इन, हँ, इन धर्मगुरुओं से, जो भारत के धर्मगुरु हैं खास, विदेशों के तो छोड़ दो। उन्होंने तो व्यभिचार फैलाया। वो तो पवित्र हो ही नहीं सकते। लेकिन जो भारत के धर्मगुरु हैं सन्यासी, हां, वो तो पवित्र रहते हैं ना। तो कुछ तो पवित्रता की ताकत है ना गृहस्थियों के मुकाबले? हां, तो और तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियों में भी इतनी ताकत नहीं आई है इतनी पवित्रता की। कितनी? जितनी उन सन्यासियों में है। तो जो ताकत ही नहीं है क्योंकि दुनिया के सारे काम किस बात से सफल होते हैं? पवित्रता की पावर से दुनिया के सारे काम सफल होते हैं। तो इतनी पावर किसी में भी नहीं आई है। न दुनिया वाले कोई मनुष्यों में, विधर्मियों की तो, व्यभिचारियों की तो बात ही छोड़ दो। और न भारत के देवी देवता सनातन धर्म के फॉलोवर्स में। हँ? और न तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियों में। और ब्रह्माकुमार-कुमारियों के जो बीज हैं एडवांस पार्टी अपने को कहते हैं, न उनमें कोई ऐसी ताकत आई है पवित्रता की जो इन गुरुओं, सन्यासियों का मुकाबला करें और इस तरह के पत्र लिख करके भेजें। इतनी ताकत नहीं आई है।

अभी इस समय वो ताकत नहीं है। कौन सी ताकत? जो भविष्य में तुम बच्चों के अंदर वो पवित्रता की पावर आने वाली है कि इन सारी गवर्नमेंट, भारत की ही नहीं, विदेश की भी गवर्नमेंट। देखो बौद्धियों में भी जो सन्यासी होते हैं दलाई लामा, कितना विदेशी लोग भी मान सम्मान देते हैं। भारत में भी देते हैं। तो इन सन्यासियों को जो ताकत है पवित्रता की, हँ, वो ताकत अभी किसी में नहीं। वो आएगी तुम्हारे अंदर। हां, जब तुम्हारा योगबल बढ़ेगा तो योगबल से वो ताकत भी पवित्रता की तुम्हारी आत्मा पवित्र बनेगी तो ताकत आएगी। तो इनको जीत ही जाते हैं। हँ? जीता ही जाता है। पीछे यही कहेंगे। अभी नहीं कहेंगे। क्या? पीछे माने क्यों? अभी क्यों नहीं? क्योंकि अभी तुम बच्चों में वो ताकत एकाग्रता की मनबुद्धि की नहीं आई है। जो कल बताई ना एक घंटे बाबा के सामने तुम एकाग्र मन-बुद्धि रूपी आत्मा से बैठ ही नहीं सकेंगे। बताया ना कि नहीं? भूल गए? हां।

तो जब तुम्हारे पास ऐसी ताकत वाले बहुत हो जाएंगे; क्या? एकाग्रता की शक्ति वाले, हां, तुम्हारी बहुत महिमा हो जाती है। फिर बहुत आ जाते हैं तुम्हारे फॉलोअर्स। तभी उनके दिल धड़कने, छिड़कने, धड़कने लगते हैं। क्या? अरे, ये तो हमारे सारे अच्छे-अच्छे चेला-चपाटे शिष्य ये ब्रह्माकुमार-कुमारी बनने लगे, प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी बनने लगे। तो उनके दिल धड़कने लगते हैं। पीछे फिर वो समझते हैं, हां, कि भई अभी तक तो ये निमंत्रण दे करके बुलाते रहे। अभी ब्रह्माकुमारियां तो निमंत्रण देती हैं लेकिन ये जो प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी अपन को कहते हैं ये तो निमंत्रण देके कभी हमको बुलाते भी नहीं। और बुलाएंगे भी कैसे? हमने तो स्टेज में जा करके इनकी अच्छी तरह से बुराई भी सुन ली। हमने कुछ नहीं बोला। है ना? हां, वीडियो में और अखबारों में प्रूफ हैं ना। हां। तो एक टुंटा-घुंटा सन्यासी जैसा निकला। कौन था वो? हँ? अरे? अरे, वो था ना। हां। क्या नाम था? सब भूल गए क्या? ओहो। अब वो उसने थोड़ा आवाज उठाई। अरे भाई, जब तक गवर्नमेंट का जो कोर्ट है वो केस को साबित न कर दे तब तक उस व्यक्ति के ऊपर तुम उंगली कैसे उठा सकते हो? तो किसी ने नहीं सुना। नज़रअंदाज कर दिया उसकी बातों को। हँ?

तो देखो, जब तुम्हारे पास बहुत उनके चेले-चपाटे आने लगेंगे तो फिर वो समझेंगे कि कुछ भला यहां जा करके देखें, कुछ समझें, क्या है जो इतना जिज्ञासु टूट-टूट करके हमारे उनके पास जाय रहे हैं। वो भी आएंगे। वो बाद में आएंगे कि पहले तुम्हारी ब्रह्माकुमार-कुमारियों की दुनिया में, ब्राह्मणों की दुनिया में शूटिंग करने वाले सन्यासी हैं वो पहले आएंगे? कौन आएंगे तुम्हारे पास? बताओ। हँ? हां। पहले तो तुम ब्राह्मणों की दुनिया में जो सन्यासी हैं बड़े-बड़े माने जाते हैं। क्या? कैसे? कैसे-कैसे? जैसे शास्त्रों में लिखा हुआ है। क्या? वरहूं शंभू न तो रहूं कुंवारी। अरे, शंभू को, एक को वरण करोगी तो क्या भ्रष्ट इंद्रियों से वरण करने की बात है या श्रेष्ठ इंद्रियों से भी वरण करने की बात? हँ? श्रेष्ठ इंद्रियों से भी, जो आंखें हैं ना, वो भी आंखें एक के अलावा और किसी दूसरे से आंख न लड़ाएं। तब कहेंगे। क्या? क्या कहेंगे? हँ? हां, पवित्र इंद्रियों वाली आत्मा। तो पहले तो कहां से निकलें? हँ? ब्रह्माकुमार-कुमारियां, जो कहते हो ना कि चारों युगों की शूटिंग यहां हो रही है हम ब्राह्मणों की दुनिया में। ब्रह्मा, चतुर्भुजी ब्रह्मा की रहभरी में। हो रही है कि नहीं? हां। तो पहले तो तुम्हारे अंदर से जो बड़े-बड़े सन्यासी हैं वो निकलें जो बड़ा अपन को पवित्र मानते हैं। हँ? बड़ा दबदबा है उनका।

15.11.1967 की प्रातः क्लास का दसवां पेज। तो अभी तो देखो उन हद के सन्यासियों का और बेहद के तुम ब्राह्मणों के सन्यासियों का मान बिल्कुल ऊंचा है। है या नहीं? प्रधानमंत्री भी जाकर उनकी स्टेज में कोर्स करके चला आता है, महिमा करके चला आता है। क्या? अरे भई, दुनिया में एक यही ब्रह्माकुमारी संस्था है जिसमें कहीं भी दो फांटे नहीं कभी पड़े, 80 साल हो गए। देखो, कितनी प्रधानमंत्री ने महिमा कर दी! तो ऊंचा मान हुआ कि नीच मान हुआ? ऊँच मान हुआ। अच्छा, और तुम हो कितने? पांच पांडव। उंगलियों से गिन लो इतने हैं। उंगलियों से गिने जा सकते हैं कि नहीं? नहीं? गिने जा सकते हैं। तो तुम तो मुट्ठी भर को एकदम। जैसे वो सुदामा की मुट्ठी विख्यात है ना। दो मुट्ठी चावल दिए। चावल क्यों दिए? धान क्यों नहीं दे दिए? अरे देह अभिमान वाले धान थोड़े ही देंगे, देह अभिमान का छिलका चढ़ा हुआ हो? चावल माने आत्मा जिसके देह भान का छिलका उतर गया हो। दो मुट्ठी। एक दाएं? एक दाएं ओर की मुट्ठी, एक बाईं और की मुट्ठी। दाएं ओर की मुट्ठी माने विजय माला की आत्माएं। एक मुट्ठी भर। एक मुट्ठी में 108 दाने तो आ जाएंगे ना चावल के? हां। और दूसरी मुट्ठी बाएं हाथ की लेफ़्टिस्ट। क्या? थोड़ा उतनी पवित्र नहीं होंगी। लेकिन फिर भी योगबल वाले तो होंगे ना। हां। सच्चे भगवान बाप से योग लगाते होंगे या समझ के योग लगाते होंगे, पहचान के योग लगाते होंगे कि बिना पहचान के योग लगाते होंगे? पहचान के लोग लगाते हैं। तो सच्चे योगी हुए ना। हां। तो देखो तुम तो मुट्ठ भर हो। (19.35)

A morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third, fourth line after the middle portion of the ninth page on Wednesday was – Shankar is shown to be riding a bull. A snake is hanging around his neck. Hm? Well, look, it appears to be a wonder. The intellect has gone into a nil account completely. And then look, these pujaaris (Hindu priests) have such ego. Such complete ego. Now here nobody speaks of any incarnation (avatar). Do any Brahmakumar-kumaris speak of avatar that God has incarnated? No. There is no topic of incarnation, etc. There is no such thing. Even if anyone calls himself an incarnation; okay, on the path of Bhakti they speak of 10 avatars, 22 avatars, 24 avatars. Jains also believe. Still this Shri Shri 108 Jagatguru. Well, Jagatguru will be called purifier of the sinful ones, will he not be? So, He should come and purify the entire world which becomes sinful in the end of the Iron Age. So, that Jagatguru is the true Patit-Paavan, ever pure, isn’t He? Arey, well, these Jagatgurus [of the world] are born through urine [lust]. When the birth itself is through urine, then how can they be Patit-Paavan? Hm? Then the bestower of true salvation upon everyone is only one. He causes the true salvation of the entire world, 500-700 crore human beings. Hm?

Well, some come and call themselves Shri Shri 108 Jagatguru. Mama had also dictated letters to these Jagatguru Maharajs. A sample must be available even now. So, when you see that people call themselves Jagatguru (Guru of the world), then send this letter to those Jagatgurus that you call yourself Jagatgurus, but in India itself do all the residents of India accept you as Jagatguru? Jagat (world) includes 500-700 crore human souls. Here, all the Indians themselves do not believe in you, then how can you be Jagatgurus? Hm? So, write such letters and send it to them. Perhaps they must have softened a little now. Did you understand? If they do not soften now, then later send them this thing in future. Otherwise, this one will send. What has been said? If you children are not sending now and if these people do not soften, then in future this one, who ‘this one’ will send? This one will send. Who will send? ‘Will send’ (dega) refers to one or two-four? Yes, for whom was it said? Hm? ‘This one will send’ means who will send? Yes
(Someone said something.) Will Brahma send? He perished. Did he send? Did they soften? Or did they became even hotter (angry)? Hm? Have they softened now? Hm? Do they come when Brahmakumaris call them to their stage by inviting them or do they call the Brahmakumaris on their stage? So, did they soften? What should we say? Did they become ‘naram’, i.e. soft? Did they become a little soft? Did their intellect become a little soft for the Brahmakumar-kumaris? Hm? Is there any soft corner in their heart for them? There isn’t.

So, look, these letters, etc. are things that prove useful. Now email has emerged. Is it not? Yes. So, how can you call yourself Jagatguru? Write this letter and send. It means that this is a plain lie, isn’t it daughter? Hm? They have assumed the title Shri Shri 108 Jagatguruji Maharaj. Shri Shri 1008 Jagatguruji Maharaj. First a case of adulteration should be initiated on this topic. That case of deceit should be initiated. What? They are deceiving the public. They call themselves the Gurus of the world. Arey, only the Father of the world will be the Guru of the entire world, will he not be? Hm? On the one side they also keep on singing – Jagatam pitaram vandey Paarvati Parmeshwarau. Hm? The first and foremost ancestors (pitar), Father of our world are Paarvati and Parmeshwar, i.e. the ones who are called Shiv-Shankar. Is it not? And Parvati. Those Mother and Father are the ancestors of everyone, of the entire world, aren’t they?

So, how do you call yourself Jagatgurus? But against whom should a case be filed? Here four Shankaracharyas are sitting. Hm? Four of them are sitting in the four corners of the country. Baba says that actually a case should be filed against these also. What? Against these? It means that a case, yes, a public interest litigation should be filed against all these Shankaracharyas in the top court, in the Supreme Court. They are fooling the entire public, they are indulging in adulteration. It is because it is very clear – Jagatguru. Arey, jagat itself means the entire world. What is meant by the entire world? All the 500 crore human beings in the world, they may be 700 crores, all of them will be said to constitute the world. Guru of the entire world. So, does the entire world accept them as a guru? Do the Christians accept? Do the Muslims accept? Do the Islamic people accept? Hm? Arey, do the Buddhists accept them as their Jagatguru? They do not accept, do they? Do they believe their founders of religions to be greater or do they believe these [Jagatgurus] to be greater? Hm? Yes.

Why do you all call the Purifier of the sinful ones (Patit-Paavan)? When Jagatgurus are sitting here, when numerous Jagatgurus are sitting, then why do Gandhiji, your Bapuji Maharaj and Gandhiji’s followers sing the song ‘Patit-paavan Sita Ram, Raghupati Raghav Raja Ram’? So, they call the Patit-Paavan. But till now nobody has acquired that power. Now. That much power. How much power? To the extent that these religious gurus, especially the religious gurus of India; leave alone those from abroad. They have spread adultery. They cannot be pure at all. But the religious gurus, the sanyasis of India, yes, they lead a pure life, don’t they? So, they have some power of purity when compared to the householders, don’t they? Yes, so; and you Brahmakumar-kumaris too haven’t imbibed that power of purity. How much? To the extent the Sanyasis have. So, when you don’t have the power at all, because how do all the tasks of the world succeed? All the tasks of the world succeed through the power of purity. So, nobody has inculcated that much power. Neither the worldly human beings; leave alone the topic of the vidharmis (heretics) and the adulterous persons. And neither do the followers of the ancient deity religion of India have. Hm? Nor you Brahmakumar-kumaris. And the seeds of the Brahmakumar-kumaris, who call themselves the Advance Party, neither have they inculcated such power of purity that they could confront these Gurus, the Sanyasis and write such letters and send it to them. They haven’t inculcated such power.

Now you don’t have that power. Which power? The power of purity that you children are going to inculcate in future that all these governments, not just of India, even the governments of foreign countries. Look, even among the Buddhists, the Sanyasis, the Dalai Lamas, the foreigners also give them so much respect and honour. They accord in India as well. So, now nobody has that power of purity which these Sanyasis have. You will inculcate that. Yes, when your power of Yoga increases then through that power of Yoga, you will get that power of purity as well when your soul becomes pure. Then you definitely conquer it. Hm? You definitely conquer it. Later it will be said like this only. It will not be said now. What? Why later? Why not now? It is because you children haven’t developed that power of concentration of the mind and intellect. It was mentioned yesterday, wasn’t it that you will not be able to sit with focused mind and intellect like soul in front of Baba even for an hour. Was it told or not? Have you forgotten? Yes.

So, when you have many persons with such powers; what? Those with the power of concentration, yes, you will garner a lot of praise. Then you will have many followers. Only then do their hearts start beating. What? Arey, all our nice disciples have started becoming Brahmakumar-kumaris, Prajapita Brahmakumar-Kumaris. Then their hearts start beating. Later they think, yes, that brother till now these people had been calling us by giving us invitations. Now these Brahmakumaris invite us, but these people who call themselves Prajapita Brahmakumar-kumaris, do not even call us by giving us invitations. And how will they invite us? We have gone to the stage and even listened to their defamation nicely. We did not say anything. Is it not? Yes, there are proofs in the videos as well as in the newspapers, aren’t there? Yes. So, one small Sanyasi emerged. Who was he? Hm? Arey? Arey, he was there, wasn’t he? Yes. What was his name? Did you forget everything? Oho. Well, he raised his voice a little. Arey brother, unless government’s court proves the case, how can you raise a finger towards that person? So, nobody listened. They brushed aside his words. Hm?

So, look, when many of their disciples start coming to you, then they will understand that let us go and see there a little, let us understand something, what is it that so many disciples are breaking away from us and are going towards them. They too will come. Will they come later on or will the sanyasis who perform the shooting in your world of Brahmakumar-kumaris, in the world of Brahmins come first? Who will come to you? Speak up. Hm? Yes. First the Sanyasis who are considered to be big ones in the world of you Brahmins; what? How? Of what kind? For example, it has been written in the scriptures. What? Varahu Shambhu na toh rahoon kunwaari (either I will marry Shambhu or I will remain unmarried). Arey, if you marry Shambhu, if you marry one, then is it a topic of marrying through unrighteous organs or is it about marrying through the righteous organs? Hm? Even through the righteous organs; there are eyes, aren’t there? Even those eyes should not exchange glances with anyone except one. Only then will it be said; what? What will you say? Hm? Yes, a soul with pure organs. So, from where should they emerge first? Hm? Brahmakumar-kumaris, who say that the shooting of all the four Ages is going on in the world of us Brahmins. In the company of Brahma, the four-armed Brahma; is it taking place or not? Yes. So, first the big Sanyasis among you should emerge who consider themselves to be very pure. Hm? They have a lot of domination.

Tenth page of the morning class dated 15.11.1967. So, now look, those limited sanyasis and the unlimited sanyasis among you Brahmins command such high respect! Do they or don’t they? Even the Prime Minister goes to their stage and undergoes a course, praises them. What? Arey, brother, this Brahmakumaris institution is the only one in the world which has never seen division; it has been 80 years. Look, the Prime Minister praised them so much! So, do they command a high respect or low respect? They command high respect. Achcha, and what is your number? Five Pandavas. You can be counted on fingers. Can you be counted on fingers or not? No? You can be counted. So, you are just handful. Just as that fistful of Sudama is famous, isn’t it? He gave two fists full of rice. Why did he give rice? Why did he not give rice covered with husk (dhaan)? Arey, will he give body conscious rice covered with the peel of body consciousness? Rice means the souls whose peel of body consciousness has been removed. Two fists full. One right side? One fist of the right side and one fist of the left side. Right side fist means the souls of Vijaymala. One fist full. 108 grains of rice can be held in one fist, can’t they be? Yes. And the second fist of the left hand, leftist. What? It will not be as much pure. But however they will have the power of Yoga, will they not? Yes. Must they be having Yoga with the true God Father or must they be having Yoga with understanding, must they be having Yoga after recognizing or must they be having Yoga without recognizing? They have Yoga after recognizing. So, they are true yogis, aren’t they? Yes. So, look you are just fist full. (19.35)

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प्रातः क्लास चल रहा था 15.11.1967. बुधवार को 10वें पेज की अंतिम दो लाइनों में बात चल रही थी कि ओम मंडली में सब ध्यान में चले जाते थे। वो मेहतरानी भी ध्यान में चली जाती थी। तो ये बच्चे इतने छोटे-छोटे स्कूल में आओ तो भी ध्यान, कोई रड़ते हैं, कोई ध्यान करते हैं, कोई कृष्ण से रूसते हैं। हँ? अरे, सब कृष्ण से ही रुसते थे। तो, कितनी तो थी। समझा ना। अच्छा और पीछे तो भट्टी बनी। अब जो भट्टी बनी तो हाय-दोष मच गया। 15.11.1967 की प्रातः क्लास का 11वां पेज। चारों ओर सिंध, हैदराबाद में आवाज फैल गई कोई राक्षस आ गया। जो आदि में हुआ सो अंत में भी होता है। एडवांस पार्टी में भी ऐसे ही होता है अंत में। कहने लगे; और वो उस एरिया का बड़ा नेता भी कहने लगा कोई नर राक्षस आ गया। क्या? ऐसे सिंध में भी कहते थे। और बोलते थे कितनी गइयां खा गया। एकदम खा गया। हँ? इतना भयंकर कि सारी खा गया। अरे, कोई को समझ नहीं थी, बुद्धि नहीं, भई ये कैसे? एक मनुष्य इतना कैसे कार्य कर सकता है? गवर्नमेंट है। कोई ऐसे तो नहीं है कि गवर्नमेंट भी नहीं है। और पहले तो कौनसी गवर्नमेंट थी? हँ? ज्यादा स्ट्रिक्ट गवर्नमेंट थी या अब की तरह थी ढुल्लुम-ढुल्लुम? नहीं। क्रिश्चियन गवर्नमेंट थी ना। हां। देखो, कुछ भी बुद्धि में नहीं बैठता। समझे कि जैसे जादू है। वो सबके ऊपर जादू। और जादू कर दिया तो कुछ कर ही नहीं सके एकदम।

तो देखो, अब तुम बच्चे तो समझते हो नंबरवार कि ताकत तो है ना बाप की जो भट्टी भी लगाई है। फिर भट्टी में भी देखो कितनी टें खिजर निकली। माने खंजर हो गई काली। तमोप्रधान हो गई। कितनी खत्म हो गई। कितनी कच्ची निकली, कितनी पक्की हो गई। ऐसे-ऐसे हो गया ना। आदि में भी हुआ तो फिर? कब? जब एडवांस ज्ञान निकलता है तो अंत में भी ऐसे होता है। बच्चे, अभी तो देखो ठीक से पढ़ाई पढ़ रहे हो, बिल्कुल अच्छी तरह से। और कितनी पढ़ाई पढ़ते हो! विस्तार में पढ़ते हो या अभी सार में ही पढ़ते हो? हां। छोटे-छोटे बच्चे होते हैं तो सार में उन्हें पढ़ाया जाता है। एबीसीडी। अभी तुमको पता है कितना बहुत ज्ञान है।

और कितने आएंगे यहां। हँ? दिन-प्रतिदिन मकान सौ गुना होते जाते हैं। और ये मकानों में रहते हैं कि कहां मकान बनावें, क्या करें? हां, देखेंगे जरूर क्योंकि बहुत बच्चे आ रहे हैं तो मकान तो बनाना ही पड़ेगा ना। हँ? एक तरफ मकान बनाने के लिए मना करते हैं। क्यों मिट्टी में पैसा बहाना है? हँ? विनाश सामने खड़ा है। और फिर दूसरी ओर कहते - मकान तो बनाना ही पड़े ना। अरे? बताया कि बाबा जहां है वहां तो मकान बनाना पड़ेगा ना। ढेर बच्चे आते हैं। तो उनके लिए प्रबंध नहीं करना है? हां। तो कहां न कहां से बनाना जरूर पड़ेगा। कहां न कहां से? माना वो ज्ञान में अच्छी तरह चलते हों, न भी चलते हो तो भी बाबा को तीन पैर पांडवों को पृथ्वी चाहिए ना। तो जो देवे क्योंकि बहुत बच्चे वृद्धि को पाना है फिर। फिर माने कब? हां, अंत में। क्यों? क्योंकि ये राजधानी स्थापन हो रही है। हो रही है ना। राजधानी में तो सब तरह के चाहिए। ऊँच ते ऊँच राजा-रानी भी चाहिए। फिर? उनका राज परिवार भी चाहिए। प्रजा भी चाहिए। और प्रजा को संभालने वाले अधिकारी भी? अधिकारी भी चाहिए।

तो एक-एक के साथ कितनी मेहनत करते हैं। नहीं-नहीं, पीछे तो मिंटो मोटर तैयार होगी। मिनट का मतलब थोड़ा समझेंगे और स्वर्ग के मालिक बनते जाएंगे। कैसे? जो देखे, जो सुने, हां, बुद्धि में फट से बैठ जावे। हां, ये है कि कोई सब राजा-रानी नहीं बनेंगे। बाद में जो ढेर के ढेर निकलेंगे राजा-रानी बनेंगे सब क्या? नहीं। महाराजा-महारानी नहीं बन सकते। हां, प्रजा बनती जाएगी। अरे, ढेर की ढेर प्रजा बनेगी। और सूर्यवंशी, चंद्रवंशी सब बनने का है। हँ? सब माने? सबमें तो फिर इस्लामवंशी, बौद्धीवंशी क्रिश्चियनवंशी और उनके फॉलोवर्स या उनके सहयोगी वंशी, उनके भी फॉलोअर्स वो सब आ गए ना? हां। तो वो जो बिचारे अभी शूद्र बन गए हैं ना शूद्रवंशी, तो जरूर आ कर के फिर ब्रह्मावंशी बनेंगे। क्या? माना? सारी दुनिया ब्रह्मावंशी ब्राह्मण बनेगी या नहीं बनेगी? हँ? सारी दुनिया ब्राह्मणवंशी ब्राह्मण बनेगी। ब्रह्मावंशी। हां, नंबरवार तो होंगे। इसलिए शास्त्रों में नौ कुरी के ब्राह्मण गाए हुए हैं। कितने? हँ? हां, 9 मुख्य धर्म है ना दुनिया में। कौन-कौन से? गिनाओ जल्दी-जल्दी। सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, इस्लामवंशी, बौद्धीवंशी, क्रिश्चियनवंशी, सन्यासवंशी, हँ, मुस्लिमवंशी, सिक्खवंशी और लास्ट में? आर्यसमाजी। वो भी तो भगवान को मानते हैं ना। भले साकार को नहीं मानते। निराकार को तो मानते ही हैं ना। हां। तो सब आकरके ब्रह्मा वंशी बनेंगे। हां।

प्रजापिता ब्रह्मा। अब प्रजापिता ब्रह्मा देखो तो। उनका शास्त्रों में भी कितना नाम है। क्या नाम दिया है? प्रजापिता नाम दिया है, प्रजापति नाम दिया है? वो तो उन्होंने तो प्रजापति नाम दे दिया। लेकिन पहले पिता बनता है कि पहले पति बन जाता है? पहले तो पिता चाहिए ना। तो गाते भी कितना हैं। तो फिर प्रजापिता कौन है वो तो बिचारे कोई भी नहीं जानते। क्या? बिचारे। बिचारे माना? नहीं जानते हैं तो बिचारे। कोई नहीं जानते। माना? कोई भी धर्म वाले प्रजापिता को नहीं जानते? जानते हैं कि नहीं जानते? (किसी ने कुछ कहा।) जानते हैं? अच्छा? वो प्रजापिता वो जो प्रजामाता होती है उसके मुकाबले बहुत सॉफ्ट होता है कि पिता बड़ा कठोर होता है भयंकर भी होता है? वो भयंकर को जानते हैं? हँ? जानते हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) आदिदेव है? अच्छा? देव पहले बन जाता है? प्रजापिता बाद में बनता है। देव माने सुख देवा या दुख देवा? तो कौन सा देव बन जाता है? क्या लिखा तुमने? (किसी ने कुछ कहा।) प्रजापिता? वो देव? अरे, देव तो उनको कहा जाता है जो सुख ही सुख देते हैं। क्या? इंद्रियों से सुख का लेन-देन करते हैं। प्रजापिता सदा सुख का ही लेन-देन करेगा क्या? और प्रजा कोई एक धर्म की प्रजा है? दुनिया में सभी धर्मों की प्रजा हैं ना। उन सारी मनुष्य सृष्टि का बाप तो बीज रूप एक ही बाप है ना प्रजापिता।

तो वो तो समझते हैं कि प्रजापिता तो ज़रूर ही पतित होगा। जब बाप आकरके उनमें प्रवेश करते हैं, हँ, प्रवेश करके पीछे ज्ञान देते हैं। उनमें क्यों कहा? प्रजापिता क्या बहुत होते हैं क्या? फिर उनमें क्यों कहा?
(किसी ने कुछ कहा।) टाइटल मिलता है? किसको? दादा लेखराज ब्रह्मा को प्रजापिता का टाइटल मिल जाता है। और फिर दूसरी बात कि कोई संगमयुग में एक जन्म तो होता नहीं। हँ? कोई-कोई आत्माओं के दो-तीन जन्म भी होते हैं। तो ओम मंडली में भी प्रजापिता एक तन हुआ और फिर दूसरा जन्म हुआ कि नहीं? दूसरा जन्म हुआ तो भी प्रजापिता। तो उनमें कहेंगे कि एक में ही कहेंगे? हँ? एक में कहेंगे? उनमें नहीं कहेंगे? उनमें क्यों कह दिया? झूठा बोल दिया? उनमें माने शरीर तो अलग-अलग हो गए ना। हां। प्रवेश करके पीछे ज्ञान देते हैं। क्या? ऐसे नहीं कि ओम मंडली में पहले ही पहले ज्ञान दे देते हैं। क्यों? पहले ही। अरे देना है तो पहले ही दे दो ना। पीछे क्यों? क्यों? पता है? नहीं पता? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) समय के अनुसार? अरे, क्या समय के अनुसार?

इसलिए बताया कि बाप तो निराकार है ना। हँ? और अभोक्ता है, अकर्ता है, अजन्मा है, हँ, और इतना सूक्ष्म है कि चिंतन करना भी मुश्किल है एक्यूरेट रूप में। अति सूक्ष्म है ना। हां। तो अति हल्का होगा, फुल्का होगा कि भारी होगा? हां, अति सूक्ष्म। जैसे और आत्माएं होती है ना, भूत-प्रेत बनती हैं तो खुद भी भारीपन अनुभव करती हैं और जिनमें प्रवेश करती हैं उनको भी भारीपन अनुभव होता है। लेकिन शिव बाप में तो कोई पापों का बोझा थोड़े ही है। है क्या किसी जन्म का? नहीं। तो वो तो हल्का-फुल्का है। जब प्रवेश करता है तो पता भी? पता भी नहीं लगता कब आया, कब चला गया। तो फिर ज्ञान मिलेगा? हँ? उस समय ज्ञान मिलेगा? ओम मंडली में जब प्रवेश किया, आया, गया और फिर कोई को पता ही नहीं चला, कब आता है, कब चला जाता है। हँ? तो ज्ञान मिलेगा? ज्ञान किसको मिलना है? ज्ञान देह को मिलना है या आत्मा को मिलना है? अरे बेसिक ज्ञान ही सही। मिलना किसको है? देह को या आत्मा को? हां, तो आत्मा का ज्ञान हुआ? उस समय तो आत्मा का भी ज्ञान नहीं। वो ही पुराना ज्ञान। क्या? आत्मा सो परमात्मा शिवोहम् ब्रह्मा अस्मि। यही शास्त्रों का ज्ञान।

तो बताया कि यज्ञ के आदि में, हँ, शुरुआत में नहीं कहेंगे ज्ञान देते हैं। पीछे जब दूसरा जन्म लेते हैं तो, जो आत्मा निमित्त बनती है दूसरी। कौन? वो तो शरीर छोड़ गया। वो तो बच्चा रहेगा ना, बच्चा बुद्धि रहेगा ना कुछ समय। तो उसमें प्रवेश करेंगे क्या? नहीं। तो जो सालिम बुद्धि, बुजुर्ग होता है दादा लेखराज ब्रह्मा सन 47 में उनमें प्रवेश किया। हँ? तो उनमें प्रवेश करके फिर ज्ञान देते हैं। क्या ज्ञान देते हैं? अरे वो ही गीता में लिखा है ना, शास्त्रों में भी लिखा है - अहम बीज प्रदःपिता। मैं बीज डालने वाला पिता हूं। क्या बीज डालने वाला? आम का बीज डालने वाला कि अक का बीज डालने वाला? क्या बीज डाला? अरे, ज्ञान का बीज डालने वाला। क्या ज्ञान का बीज? कि तुम ज्योति बिंदु आत्मा हो। ये बीज हुआ ना। हां। तो आकर के पीछे ज्ञान देते हैं। तो वो भी ज्ञान लेते जाएंगे। 'भी' क्यों लगा दिया? माना जो आदि वाले बच्चे थे वो भी ज्ञान लेते जाएंगे और तुम बच्चे भी, हां, लेते जाएंगे।

A morning class dated 15.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last two lines of the tenth page on Wednesday was that everyone used to go into trance (dhyaan) in Om Mandali. That Mehtaraani (a lady belonging to a lower caste among Hindus considered untouchables at that time) also used to go into trance. So, these small, small children, even when they used to come to the school they used to go into trance; some cry, some go into trance, some get angry with Krishna. Hm? Arey, everyone used to get angry with Krishna only. So, there were so many [girls]. Did you understand? Achcha, and later bhatti was organized. Well, when the bhatti was organized, then uproar took place. Eleventh page of the morning class dated 15.11.1967. A word spread all over in Sindh, Hyderabad that a demon has arrived. Whatever happened in the beginning happens in the end also. It happens like this in the Advance Party also in the end. They used to say; And the big leader of that area also started telling that a human demon has arrived. What? They used to say like this even in Sindh. And they used to say that he has eaten many cows. He ate them completely. Hm? He is so dangerous that he ate all of them. Arey, nobody had the wisdom, the intellect that brother how can this be possible? How can one human being perform such tasks? There is a government. It is not as if the government doesn’t exist. And which government existed in the past? Hm? Was it a stricter government or was it weak like the present times? No. It was a Christian government, wasn’t it? Yes. Look, nothing sits in the intellect. They thought that it is like a magic. Magic on everyone. And when a magic was done, then they couldn’t do anything at all.

So, look, now you children understand numberwise that there is the power of the Father that the bhatti has also been organized. Then even in the bhatti look, many weak ones emerged. It means that the axe (khanjar) became black. It became degraded (tamopradhan). Many perished. Many emerged unbaked (weak), many became strong. It happened like this, didn’t it? It happened in the beginning also; so, then? When? When the advance knowledge emerges then it happens like this in the end also. Children, look, now you are studying well, very well. And you study so much! Do you study in detail or do you study now only in essence? Yes. When the children are small (young), then they are taught in essence. ABCD. Now you know that the knowledge is in detail.

And so many will come here. Hm? Day by day the house grows hundred fold. And these live in houses that where should we build houses, what should we do? Yes, it will definitely be observed because many children are coming; so, houses will have to be built, will they not be? Hm? On the one side He prohibits you from building houses. Why should you make your money flow in soil? Hm? Destruction is staring at you. And then on the other hand He says – You will definitely have to build houses, will you not? Arey? It was told that the place where Baba lives, houses will definitely have to be built, will they not be? Numerous children come. So, will you not make arrangements for them? Yes. So, you will definitely have to build from somewhere or the other. From somewhere or the other? It means that they may be following the knowledge nicely or they may not be following nicely; however, Baba, the Pandavas require three feet of land, don’t they? So, whoever gives because then the number of children is going to increase. ‘Then’ refers to which time? Yes, in the end. Why? It is because this kingdom is being established. It is being established, isn’t it? All kinds of people are required in a kingdom. Highest on high king and queen are also required. Then? Their royal family is also required. Subjects are also required. And the officers to take care of the subjects? The officers are also required.

So, He works hard with each one so much! No, no, in the end, minto motor will get ready. Minute means that they will understand a little and go on becoming the masters of heaven. How? Whoever sees, whoever listens, yes, it should sit immediately in the intellect. Yes, it is true that everyone will not become a king and queen. The numerous people who will emerge later on, will all of them become kings and queens? No. They cannot become Maharaja-Maharani. Yes, subjects (praja) will go on forming. Arey, numerous praja will get ready. And everyone including Suryavanshis, Chandravanshis are to get ready. Hm? What is meant by everyone? In ‘everyone’, then Islamvanshis, Bauddhivanshis, Christianvanshis and their followers or their helper dynasties, all their followers are included, aren’t they? Yes. So, those poor people who have now become Shudras, those from the Shudra dynasty, haven’t they? So, they will definitely come and become Brahmavanshi. What? What does it mean? Will the entire world become Brahmavanshi Brahmin or not? Hm? The entire world will become Brahminvanshi Brahmin. Brahmavanshi. Yes, they will indeed be numberwise. This is why nine categories of Brahmins are praised in the scriptures. How many? Hm? Yes, there are nine main religions in the world, aren’t there? Which ones? Count them quickly. Suryavanshis, Chandravanshis, Islamvanshis, Bauddhivanshis, Christianvanshis, Sanyasvanshis, hm, Muslimvanshis, Sikhvanshis; and in the last? Arya Samajis. They too believe in God, don’t they? Although they do not believe in the corporeal. They do believe in the incorporeal, don’t they? Yes. So, all will come and become Brahmavanshi. Yes.

Prajapita Brahma. Now look at Prajapita Brahma. He is so famous in the scriptures. What is the name assigned? Has he been assigned the name Prajapita or has he been assigned the name Prajapati? They have assigned the name Prajapati. But does he first become a Father (pita) or does he become a husband (pati) first? First the Father is required, isn’t he? So, he is praised so much. So, then none of those poor fellows know who is Prajapita? What? Poor fellows (bichaarey). What is meant by ‘bichaarey’? When they don’t know, they are ‘bichaarey’. None of them knows. What does it mean? Don’t people belonging to any religion know? Do they know or not?
(Someone said something.) Do they know? Achcha? Is that Prajapita (Father of subjects) very soft when compared to the Prajamata (mother of subjects) or is the Father very strict and dangerous also? Do they know the dangerous one? Hm? Do they know? (Someone said something.) Is he Aadi Dev (the first deity)? Achcha? Does he become a deity (dev) first? He becomes Prajapita later. Does ‘Dev’ means ‘Sukhdeva’ (giver of happiness) or ‘Dukhdeva’ (giver of sorrows)? So, which deity does he become? What did you write? (Someone said something.) Prajapita? Is he a deity? Arey, those who give only happiness are called deities. What? They exchange joy through organs. Wiil Prajapita exchange only joy? And is there praja of only one religion? There is a praja of all the religions, isn’t it? The Father of that entire human world, the seed-form Father is only one Prajapita, isn’t he?

So, they think that Prajapita will definitely be sinful. When the Father comes and enters in them, hm, He enters and then later gives knowledge. Why did He say ‘in them’ (unmein)? Are there many Prajapitas? Then why did He say ‘in them’?
(Someone said something.) Does he get the title? Who? Dada Lekhraj Brahma gets the title of Prajapita. And then another aspect is that there is not just one birth in the Confluence Age. Hm? Some souls get even two-three births. So, even in Om Mandali Prajapita is one body and then is there another birth or not? Even in the second birth he is Prajapita. So, will we say ‘in them’ or will you say ‘only in one’? Hm? Will you say ‘in one’? Will you not say ‘in them’? Why did He say ‘in them’? Did He speak lies? ‘In them’ means the bodies are different, aren’t they? Yes. He enters and later gives knowledge. What? It is not as if He gives knowledge in the very beginning in the Om Mandali. Why? In the beginning. Arey, if you have to give, give it in the beginning itself, will you not? Why later? Why? Do you know? Don’t you know? Hm? (Someone said something.) As per time? Arey, what as per time?

This is why it was told that the Father is incorporeal, isn’t He? Hm? And He is abhokta (non-pleasure seeker), akarta (non-doer), ajanma (one who doesn’t get physical birth), hm, and He is so subtle that it is difficult to even think [about Him] in accurate form. He is very subtle, isn’t He? Yes. So, will He be very light or will He be heavy? Yes, very subtle. For example, there are other souls; when they become ghosts and devils, they experience heaviness themselves and those in whom they enter also experience heaviness. But there is no burden of sins on the Father Shiv. Does He have [burden] from any birth? No. So, He is light. When He enters do you know? You don’t even know when He came and when He departed. So, then will you get knowledge? Hm? Will you get knowledge at that time? When He entered in the Om Mandali, He came, He went and then nobody got to know when He comes and when He goes. Hm? So, will you get knowledge? Who is to get knowledge? Is the body supposed to get knowledge or is the soul supposed to get knowledge? Arey, be it the basic knowledge itself. Who is to get? Is it the body or the soul? Yes, so did you get the knowledge of the soul? At that time there wasn’t even knowledge of the soul. It was the same old knowledge. What? The soul is the Supreme Soul. Shivohum (I am Shiva). Brahma asmi (I am Brahma). The same knowledge of the scriptures.

So, it was told that in the beginning of the Yagya, hm, it will not be said that He gives knowledge in the beginning. Later, when he gets the second birth, then the other soul which becomes instrumental; who? He left his body. He will be a child, will he not be? He will have a child-like intellect for some time, will he not? So, will He enter in him? No. So, the one who has a matured intellect, the one who is elderly, Dada Lekhraj Brahma, He entered in him in 47. Hm? So, He enters in them and then gives knowledge. What knowledge does He give? Arey, the same thing which has been written in the Gita; it has been written in the scriptures also – Aham beej pradah pita. I am the Father who sows the seed. Which seed does He sow? Does He sow the seed of mango or the seed of Ak? Which seed did He sow? Arey, the one who sows the seed of knowledge. Seed of what knowledge? That you are a point of light soul. This is the seed, isn’t it? Yes. So, He comes and later gives knowledge. So, they will also go on obtaining knowledge. Why did He add ‘also’? It means that the children of the very beginning period will also go on obtaining knowledge and you children will also, yes, go on obtaining knowledge.

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