Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2940, दिनांक 13.07.2019
VCD 2940, dated 13.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning class dated 30.11.1967
VCD-2940-Bilingual-Part-2

समय- 20.51-33.54
Time- 20.51-33.54


तो देखो जहां भी जगह खाली है कोई भी आवे। जाओ। जहां चाहिए वहां जाकरके रहो। इतने मकान बने पड़े हैं। बाबा ने बच्चों के लिए बनाए हैं। इनको दिखाओ तुम्हें कहां अच्छा लगता है? वहां ऊपर अटाले में रखा। एक तो हवाई महल भी बनाया। ऊपर पहाड़ी पर। तो वहां भी जाते थे बच्चे कि कोई को वहां अच्छा लगता था तो वहां बैठते थे। तो जहां अच्छा लगे वहां जाके रहो। फिर कभी देखते हैं कि नहीं कि भई जिन्होंने बहुत-बहुत दिया है; भई, उनको भी तो सुख देना है ना? क्यों? उनको जास्ती सुख क्यों देना है? उनको सुख देते हैं तो बोलते हैं वाह, परमात्मा के पास भी हम खातिरी? अरे, कहां पास खातरी? वो तो ज़रूर जो पास में आते हैं खातरी तो ज़रूर करेगा ना? ऐसे थोड़ेही है कि कोई-कोई साहूकार आवे और उनको मैं छोटी सी कोठरी या वो क्या, क्या झोंपड़ी-2 ले दूं। वो महलों में रहने वाला, महलों का आदी और उसे क्या दे दूं? झोंपड़ी दे दूं। हाँ, छोटी कोठरी दे दूं। तो कहां या ऐसे-ऐसे तो उनकी बेचारी की वो ही हो जाएगा। क्या? हालत खराब हो जाएगी कि अच्छी हो जाएगी? हँ? हाँ, उनकी तो आदत पड़ी हुई है। ऐसा-ऐसा खाना चाहिए, ऐसा-ऐसा रहना चाहिए, ऐसे-ऐसे कपड़े चाहिए। तो फिर कोई कैसा, कोई कैसा, कोई कैसा। कोई कह भी देगा - अच्छा, चलो इनके पास जगह नहीं होगी तो हम बैठ जाते हैं जहां बैठाएंगे।

तो देखो बाप को तो सब संभाल करनी पड़ती है बच्चों की। कोई बच्चे तो बहुत नाज़ुक होते हैं। क्या? नाज़ुक माने? हाँ, थोड़ी गर्मी पड़ी और उन्हें पंखा न मिला तो बस छटपटाएंगे। रात में नींद भी? नींद भी नहीं आएगी। बड़े नाज़ुक। देखो, तुम समझो। तो वो क्या हिरे हुए हैं? हँ? जो विलायत से आते हैं, हँ, बड़ा, बड़े-बड़े वहां तो महल-माड़ियां, अटारियां और बड़े साधन, सुख-साधन, संपत्ति के होते हैं। तो उनके आदी बने पड़े हैं ना? हाँ। तो जो ऐसे आते हैं उनके पास बिल्कुल सफाई रहती है। हँ? बड़े-बड़े बंगले। बड़े-बड़े शाही बंगले। बड़े-बड़े लाख-लाख, दो-दो लाख की मोटरें। हँ? और बहुत बच्चे। उस समय तो दो लाख की मोटर आज की कितने लाख की हो गई? हँ? करोड़ की भी हो जाएगी कि नहीं? हँ? हां। हां, जी। तो बाबा, बाबा सिंधियों की, सिंधी तो क्या गुजराती भी तो हैं ना? हँ? सिंधी बड़े धनाढ़्य होते थे ना? और गुजराती भी। हाँ। तो किसम-किसम के भी हैं। और ये जो काले हैं सीदी लोग। हँ? वो जो, सीदी किन्हें कहते हैं? वो होते हैं क्या नाम, गंटे-गंटे, छोटे कद के अफ्रीका से आने वाले। हँ? अफ्रीका तो बहुत धनाढ़्य देश तो नहीं है। उसको तो कंट्रोल किया हुआ था। हँ? दास बनाया हुआ था। दास-दासियों को जैसे रखते हैं अंग्रेज लोग वैसे रखा हुआ। तो ये काले सीदी आते हैं। इतने इनका अफ्रीका के। अरे, बात मत पूछो। ये भी अभी तो बहुत साहूकार हो गए। पहले तो अंग्रेजों के राज्य में थे। अभी तो स्वतंत्र हो गए ना? हाँ। बहुत साहूकार होते हैं। कोई कम नहीं होते हैं। सब-सब, हर-हर नेशन में बड़े-बड़े साहूकार भी हैं। और फिर बड़े-बड़े गरीब भी हैं। हँ?

अरे, इंडिया से बहुत जाते हैं ना विलायत में। किसलिए जाते हैं? देखते वहां बहुत पैसा है। जैसे यहां मुम्बई में जाते हैं बिहार वाले। तो वहां कोई उनको बड़ा आफिसराना मिल जाता है क्या? नहीं। झाड़ू-वाडू लगाने का काम मिल जाता है तो फिर उन्हें पैसा तो मिलता है ना ज्यादा? हाँ। तो बड़े-बड़े वहां गरीब भी हैं विलायत में। तो यहां गरीब यहां तो हैं ही बहुत। कहां? भारत में तो बहुत करके गरीबों की संख्या ज्यादा है कि साहूकारों की संख्या? साहूकार तो उंगलियों पे गिने-चुने, हां, थोड़े हैं। अरे, यहां तो कोटन में कोऊ-कोऊ साहूकार हैं। हँ? करोड़ों की, जो प्रजातंत्र शासन है ना? तो उसमें करोड़ लोग हों, हँ, और वो वोट देते हैं सब। तो उसमें साहूकार कितने होंगे? हँ? करोड़ों में कोई एक, दो साहूकार। नहीं तो वास्तव में तो हैं ही गरीब ना? गरीब ही गरीब अक्सर करके यहां भारत में। तो उनको क्या कहेंगे? हँ? उनको साधारण लोग कहेंगे या असाधारण कहेंगे? साधारण।

तो ये तो बच्चे समझते हैं, हँ, कि कोई हमको यहां महल नहीं बनाने के हैं। फिर भी ऐसे ही बनेंगे। जैसे बच्चे आकरके रह सकें। ऐसे नहीं कि बाबा एकदम ताजमहल जैसा पूरा संगमर्मर का उनके लिए बनाय देंगे। नहीं। है ना? बाबा को तो प्लेन रहता है ना बच्ची? बाबा ने पहाड़ी पर वहीं मधुबन में बाजू में एक पहाड़ी थी ऊँची, उसपे मकान बनाय दिये। हाँ। कमरे बनाय दिये। और उनका नाम रख दिया एरोप्लेन। तो जो आते थे तो उनको वो भी दिखाते थे। कहां रहोगे? यहां एरोप्लेन में रहोगे? यहां रहोगे वहां। अब आज के बड़े-बड़े आदमी तो एरोप्लेन में घूमते ही रहते हैं ना? घरों में कम बैठेंगे और बस घूमना-फिरना दुनिया में। उनके पास पैसे तो बहुत हैं। वो एरोप्लेन के आदी हैं। तो एरोप्लेन रहता है ना बच्ची? अब कितना बनाना पड़ेगा? कितने बच्चे होंगे? इतना-इतना कोई दूसरा बाप होगा, हँ, जिनको इन एरोप्लेन में चलने वालों का भी ख्याल रहता होगा, हँ, कि ये भी यहां आकरके कहीं छटपटाने लगे, हां, कि हमारे पास इतने बच्चे होंगे। इतने मकान होंगे। किसी को बुद्धि में आएगा? अरे? दुनिया में किसी को बुद्धि में नहीं आएगा कि हमारे इतने बच्चे होंगे लाखों की तादाद में। बच्चे, बच्चे किसके पास होंगे? अगर होंगे भी तो 10, 12, 15, 20. अच्छा, कोई को पोते-पड़पोते, तरपोते। तुमने अखबार में पढ़ा होगा। अच्छा भई, इनको 150 बच्चे हैं। अच्छा भई 200 हैं। इनको पोते, पड़पोते, तरपोते, फलाने, टीरे। अच्छा? चलो 200 हैं, 300 हैं, 400, 500 हैं। चलो। अरे भई, इतनी ही तो लिमिट हुई ना? जो बाबा के पास होंगे वो तो कोई के पास इतनी फैमिली होगी भी नहीं। हाँ। इस बाबा की फैमिली देखो कितनी बड़ी फैमिली है! तुम जानते हो कि और भी फैमिली वृद्धि को पानी है। है ना? इतने हैं। परन्तु नहीं। ये फैमिली तो कितनी-कितनी वृद्धि को पानी है!

अरे, ये तो बादशाही स्थापन हो रही है। कौनसी? छोटी-मोटी? नहीं। विश्व की बादशाही स्थापन हो रही है। तो विश्व में तो बहुत प्रजा। प्रजा की संख्या तो बहुत ज्यादा होती है ना? और उसमें भी फर्स्टक्लास प्रजा, सेकण्ड क्लास प्रजा, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास प्रजा भी होती है। तो बाबा तो कौनसे बच्चों को पढ़ाते हैं? हँ? और क्या पढ़ाते हैं? राजयोग पढ़ाते हैं ना? राजयोग से राजाई की इच्छा रखने वाले बच्चे यहां पढ़ने आते हैं ना? क्या? ये पढ़ाई और तो कोई दुनिया में पढ़ाता ही नहीं। तो जो बाप के राजा बच्चे हैं राजा बेटा वो यहां आते हैं। तो उनकी संख्या थोड़ी होती है या ज्यादा होती है? हँ? ज्यादा होती है? अरे, 500-700 करोड़ प्रजा को कंट्रोल करने वाले वो भी तो फिर लाखों की तादाद में होंगे कि नहीं दुनिया में? नहीं होंगे? होंगे। हाँ। तो देखो बादशाही स्थापन हो रही है। तो उस बादशाही में तो जो विश्व की बादशाही है उसमें तो बहुत ही कितनी गिनती करें, कितनी करते-करते? ये तो बुद्धि में बच्चों के है ना कि बाबा, हं, बापदादा की फैमिली कितनी बनेगी? ओमशान्ति। (समाप्त)

So, look, wherever there is vacant place anyone may come. Go. You can go and stay wherever you want. So many houses have been built. Baba has built for the children. Show them which place do you like? There it was placed above in Atala. One Hawai Mahal (an airy house built at a height atop a hillock) was also built. On the mountain top. So, children used to go there also as some used to like that place; so, they used to sit there. So, you can go and stay wherever you like. Then sometimes it is observed that no, brother, those who have given [donated] a lot, brother, they should also be provided comfort, shouldn’t they be? Why? Why should they be given more comfort? If they are given comfort, then people say, wow, there is special treatment at the place of the Supreme Soul also? Arey, special treatment at which place? Those who come near, He will definitely give special treatment, will He not? It is not as if a prosperous person comes and I provide him a small room or what is that called a hut? He lives in palaces, he is habituated to living in palaces and what do I give him? I give him a hut. Yes, I give him a small room. So, somewhere or in this manner that will happen to that poor fellow. What? Will his condition deteriorate or will it become better? Hm? Yes, he is habituated. He wants such and such food, such and such accommodation, such and such clothes. So, then someone is of some type, someone else is of some other type, someone else is of some other type. Someone may even say – Achcha, okay, these people might not have accommodation; so, I will sit wherever I am made to sit.

So, look, the Father has to take care of the children in all ways. Some children are very delicate. What? What is meant by delicate? Yes, if the temperature increases a little and if they don’t get a fan, then that is it; they will feel agonized. Will they get sleep in the night also? They will not get sleep as well. Very delicate. Look, you understand. So, how are they habituated? Hm? Those who come from abroad, hm, big, there are big, big palaces and big amenities of pleasure and properties. So, they have become habituated to them, haven’t they? Yes. So, such ones who come, they remain very clean. Hm? Big, big bunglows. Big, big, royal bunglows. Big, big motors worth one lakh, two lakhs. Hm? And many children. A motor (vehicle) worth two lakhs at that time is worth how many lakhs today? Hm? Will it be worth even a crore or not? Hm? Yes. Yes, So, Baba, Baba talks of Sindhis; not just Sindhi, there are Gujaratis also, aren’t they there? Hm? Sindhis used to be very prosperous, weren’t they? And the Gujaratis too. Yes. So, there are people of different kinds as well. And these dark ones, the Sidis (Siddis). Hm? Those, who are called Siddis? They are, what you call, short ones, coming from Africa. Hm? Africa is not a very prosperous country. It was controlled. Hm? It had been made a slave. Just as the Britishers keep the maids and servants, they were kept like that. So, these black Siddis come. So many from Africa. Arey, just do not ask. They have also now become prosperous. Earlier they were in the kingdom of Britishers. Now they have become independent, haven’t they? Yes. They are very prosperous. They are no less. All, all, there are big prosperous ones also in every nation. And then there are very poor ones also. Hm?

Arey, many go from India abroad, don’t they? Why do they go? They see that there is a lot of money there. Just as people from Bihar go to Mumbai here. So, do they get any officer’s post there? No. They get the work of sweeping; so, then they get more money, don’t they? Yes. So, there are very poor ones also abroad. So, here there are many poor ones. Where? In India is the number of poor persons more or is the number of prosperous ones more? The prosperous ones can be counted on the fingers, yes, they are a few. Arey, here, a few among crores are rich. Hm? Crores; there is democratic government, isn’t it? So, there could be crores of people in it, hm, and all of them cast their votes. So, how many would be rich among them? Hm? One or two rich ones among crores. Otherwise, actually there are poor ones only, aren’t they there? There are just poor ones here in India. So, what will they be called? Hm? Will they be called ordinary people or extraordinary? Ordinary.

So, children understand that we don’t have to build palaces here. However, they will be built like this only so that children can come and stay. It is not as if Baba will build something like Taj Mahal completely with marble. No. Is it not? Baba has a plane, doesn’t He daughter? Baba had built a house on a mountain, there in Madhuban itself on a high mountain beside. Yes. He built rooms. And He named them Aeroplane. So, whoever used to come, He also used to show them those [rooms] also. Where will you stay? Will you stay here in the aeroplane? Will you stay here or there? Well, today’s big personalities keep on travelling in aeroplanes, don’t they? They will sit less in homes and just keep on moving around the world. They have a lot of money. They are habituated to aeroplanes. So, they have aeroplanes, don’t they daughter? Well, to what extent will we build? How many children will be there? This much, this much, will there be any other Father who thinks of these people who travel in aeroplanes also that they will also come and wriggle here, yes, that I will have so many children. There will be so many houses. Will it come to anyone’s intellect? Arey? It will not occur in anyone’s intellect that I will have so many children in lakhs. Children, who will have [these many] children? Even if they have it could be 10, 12, 15, 20, achcha, some may have grandchildren, great grand children, great-great grandchildren. You must have read in the newspaper. Achcha brother, this one has 150 children. Achcha brother, he has 200. This one has grandchildren, great grand children, great-great grandchildren, etc. etc. Achcha? Okay, he has 200, 300, 400, 500. Okay. Arey brother, this is the limit, isn’t it? Whatever Baba will have, nobody will have such a big family. Yes. Look, the family of this Baba is such a big family! You know that the family is to grow further. Is it not? There are so many. But no. This family is to grow so much!

Arey, this is an emperorship that is being established. Which one? Small one? No. The emperorship of the world is being established. So, there are a lot of subjects (praja) in the world. The number of subjects is very big, isn’t it? And even in it first class praja, second class praja, third class, fourth class praja also. So, which children does Baba teach? Hm? And what does He teach? He teaches rajyog, doesn’t He? Children who desire to obtain kingship through rajyog come here to study, don’t they? What? Nobody else teaches this knowledge in the world at all. So, the kingly children of the Father, Kingly sons (Raja beta) come here. So, is their number less or more? Hm? Is it more? Arey, those who control 500-700 crore praja, will they also be in lakhs or not in the world? Will they not be? They will be. So, look, emperorship is being established. So, in that emperorship, the world’s emperorship, to what extent will you count? Children have it in their intellect as to how big Baba’s, BapDada’s family will grow. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2941, दिनांक 14.07.2019
VCD 2941, dated 14.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning class dated 30.11.1967
VCD-2941-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.25
Time- 00.01-20.25


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.11.1967. गुरुवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी – ये तो बादशाही स्थापन हो रही है। कौनसी बादशाही? छोटी-मोटी बादशाही नहीं। विश्व की बादशाही स्थापन हो रही है। उसमें तो बहुत ही, हँ, विश्व की बादशाही में कितनी जनसंख्या होगी? हँ? 500-700 करोड़ जनसंख्या होगी सारे विश्व की। तो कितनी गिनती करके कितनी करें? ये तो बुद्धि में है ना बच्चों के कि शिवबाबा, हँ, इस बादशाही में बापदादा की फैमिली कितनी बनेगी? हँ? कौन बापदादा की फैमिली? हँ? अरे? कौनसे बापदादा की फैमिली बनेगी? कितनी बनेगी? पूछा है तो बताना चाहिए ना? हँ? बापदादा की फैमिली कितनी बनेगी? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नौ लाख बनेगी? बापदादा की फैमिली नौ लाख बनेगी? बाप और दादा में कौन-कौनसी आत्माएं हुईं? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा, शिव की भी फैमिली बनती है? यहां तो बापदादा की बात हो रही है। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? राम दादा? फैमिली एक से बन जाती है, एक आत्मा से? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, प्रजापिता ब्रह्मा बाप और ब्रह्मा चौमुखी। हँ? ये हुए साकार में बापदादा। बाकि शिव की कोई फैमिली होती है क्या इस दुनिया में? नहीं।

बताया बापदादा की ये फैमिली कितनी बनेगी? अभी बताया ना कितनी बनेगी? अरे? जीरो? हँ? 9 लाख बनेगी। तो ये कौनसे बापदादा होंगे? राम-कृष्ण की आत्माओं को ही कहेंगे ना बापदादा? मनुष्य सृष्टि का बाप और उसका बड़ा बच्चा। 16 कला संपूर्ण कृष्ण बच्चा। तो दादा हुआ ना सारी सृष्टि का। और बाकि जो साढ़े चार लाख हैं, हँ, उनको दादा कहेंगे या चाचा, ताऊ कहेंगे? क्या कहेंगे? हँ? वो कौनसी कैटागरी में होंगे? कौनसा संबंध होगा? साढ़े चार लाख का। उसमें भी आधे-आधे कर दो। आधे पुरुष, आधी स्त्रीयां। हँ? तो कितनी फैमिली बनेगी? दोनों की बनेगी। कहेंगे नौ लाख। हँ? अगर अलग-अलग करें आधा-आधा करें तो? बाबा की कितनी, बाप की कितनी और दादा की कितनी? कहेंगे बाप की साढ़े चार लाख बीज रूप आत्माएं क्योंकि बाप तो बीज है ना? और दादा को बीज थोड़ेही कहेंगे? हँ? बीज है? नहीं। वो तो मनुष्य सृष्टि की बड़े ते बड़ी जड़ है। आज की दुनिया में यादगार क्या है? हँ? अरे, विदेशी लोग तो बहुत ही डरते हैं। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) बड़मूला ट्रायंगल। हाँ। कौनसी आत्मा हुई? बड़ा मूला? मूल माने जड़। हँ? हाँ, विदेशी किसको मानते हैं सबसे जास्ती इस दुनिया में? हँ? भगवान को तो कह देते हैं निराकार है। वो तो जैसे कुछ है ही नहीं। हँ? किसको मानते हैं? जबरैल। हाँ। जबरदस्त आइल है इस दुनिया की। जबरदस्त ऊर्जा है कहें। हाँ। तो उस दादा की दादागिरी को मानेंगे या नहीं मानेंगे? हाँ।

तो वो दोनों की मिलाकरके नौ लाख फैमिली कहें। अच्छा, उससे ऊपर कोई फैमिली? नौ लाख से ऊपर? अरे? नौ लाख से ऊपर साढ़े चार लाख की फैमिली कहेंगे ना प्रजापिता ब्रह्मा की। हँ? जब प्रजापिता के बच्चे हैं ब्रह्मा के, प्रजापिता ब्रह्मा के, तो भाई-बहन हो सकते हैं कि नहीं? भाई-बहन हो सकते हैं। हाँ। प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे, भाई-बहन भी हो सकते हैं और फिर बीजरूप आत्माओं की दृष्टि से, आत्मिक स्थिति में टिक जाएं तो आत्मा-आत्मा भाई-भाई भी। परन्तु स्त्री चोले हैं तो भाई-बहन। तो चलो ये फैमिली देखो कितनी बड़ी हो गई। हँ? हाँ, कहां देखो? हँ? साढ़े चार लाख। ये तो यहीं देखनी पड़ेगी ना? नौ लाख की कहां देखेंगे? नौ लाख की फैमिली यहां देखेंगे या सतयुग में देखेंगे? इतनी देर! एक अक्षर लिखने में इतनी देर।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सतयुग में देखेंगे। तो देखो कितनी बड़ी फैमिली ढ़ेर की ढ़ेर। इतनी बड़ी दुनिया में, हँ, हाँ, आज की जो दुनिया है इस दुनिया में इतनी बड़ी फैमिली किसी की होगी?

तो ये है प्रजापिता ब्रह्मा की फैमिली। ये बात बुद्धि में बैठती है ना बच्ची, हँ, कि सारी प्रजा का पिता है। ऐसे नहीं कि सिर्फ भारतवासियों का पिता है। नहीं। इस विश्व में जितने भी देश हैं, उनमें जो भी प्रजा है सबका पिता है ना? प्रजापिता कहो, आदम कहो, एडम कहो, है तो वो एक ही है ना मनुष्य सृष्टि का बीज। बीज माने बाप। तो ये कल्प-कल्प जब बाप आते हैं; ये बाप; कौनसे बाप? हँ? तभी ये वंडरफुल बातें हमारे कान पर पड़ती हैं। कौनसे बाप आते हैं? अरे? तैयार नहीं रहते एक अक्षर लिखने के लिए। कौनसे बाप आते हैं तो वंडरफुल बातें हमारे कान पर पड़ती हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिव बाप आते हैं। क्या? आत्माओं का बाप आते हैं तब ये वंडरफुल बातें कान में पड़ती हैं। कि ये कहें कि मनुष्य सृष्टि का बाप आता है तो कान में पड़ती हैं? अरे, वो तो पत्थरबुद्धि हो जाता है कलियुग के अंत में। हो जाता है ना? हाँ। तो देखो, कान पर तुम्हारे ये वंडरफुल बात पड़ती है ना सभी? जिन बातों को सुनाने के लिए बाप, हँ, बाप के लिए कहलाते हैं ना – हे प्रभु, तुम्हारी गत और मत न्यारी, सबसे न्यारी। कौनसी आत्मा के लिए कहते हैं हे प्रभू, तुम्हारी गत और मत। तुम्हारी माने किसकी मत और गत? तुम जो गति करते हो संसार की, सारी दुनिया की उससे गति तो न्यारी और कोई कर ही नहीं सकता। और मत भी तुम देते हो। न्यारी मत देते हो। दुनिया में ऐसी कोई ऋषि-मुनि, सन्यासी, विद्वान, पंडित, आचार्य ऐसी मत दे ही नहीं सकता। सबसे न्यारी। अरे, भई क्यों नहीं न्यारी होगी? अरे, बापों का बाप। क्या? जो धरमपिताएं हैं उनका भी बाप। आदम, प्रजापिता। और उसका भी पिता? शिव। हँ? जो सदा निराकार है। और उसका तो कोई बाप है ही नहीं। तो तुरीया है ना? उसके समान कोई और हो सकता है? नहीं हो सकता। तो सबसे न्यारी मत है ना? तो है ना बरोबर न्यारी मत। न्यारी गत।

कैसे भक्तिमार्ग में और ज्ञानमार्ग में फर्क देखो, हँ, मालूम पड़ता है? हँ। भक्ति में बहुत मुश्किल कोई-कोई; हँ? हाँ, कोई-कोई को बहुत मुश्किल। क्या होता है? उसका साक्षात्कार होता है बहुत मुश्किल। देखो मीरा का कितना है? तो बाप ने समझाया ना बच्ची? एक होती है भक्तिमाल। क्या? भक्तों की माला। हँ? और एक होती है रुद्र माला। होती है ना? तो भक्तिमाला में जेन्ट्स ही होते हैं या फीमेल भी होते हैं? हँ? दोनों होते हैं। आधी फीमेल की। माना? जिनमें ज्यादा देहभान रहता है। और आधी मेल की। तो उनका यादगार क्या है? उस भक्तिमार्ग में कोई यादगार है मेल-फीमेल का? भूल गए। अरे? मेल का भी यादगार बताया बाबा ने। फीमेल का भी यादगार बताया। मेल का यादगार है नारद। हँ? फर्स्टक्लास भक्त। क्या करता है? झांझ-मजीरे बजाता रहता है। हँ? और? और तीनों लोकों में डोलता रहता है। हँ? क्या? सबको क्या करता है? अरे, काम के आधार पर नाम होते हैं ना? तो शास्त्रों में ये नारद नाम है ना? नार माने ज्ञान जल। द माने देने वाला। क्या करता है? अरे, जहां-जहां जाता है, स्वर्ग में जाता है, तो ज्ञान देता है। नरक में जाता है तो ज्ञान देता है। तो वो भ्रमण करता रहता है। हँ? विश्व भ्रमण है। तो वो प्रसिद्ध है। अरे, दुनिया में कौन भ्रमण करता है? पुरुष ज्यादा भ्रमण करते हैं कि स्त्रीयां ज्यादा भ्रमण करती हैं? अरे, स्त्रीयां तो जास्तीतर अपना घर संभालती हैं ना? हाँ। घर-परिवार संभालती हैं, बच्चों को संभालती हैं।

तो बताया – भक्तिमाल में पुरुष रूप में नारद और स्त्री रूप में? मीरा। हाँ। और ये हो गई भक्तिमाल। और इसके मुकाबले दूसरी होती है रुद्र माल। होती है ना? तो रुद्र माल और ये भक्तिमाल का विचार करो। हँ? क्या विचार करो? भक्तिमार्ग तब शुरू होता है जब रावण राज्य होता है। हँ? हाँ। रुलाने वालों का राज्य होता है। कैसे रुलाते हैं? क्या करते हैं जो रोने लगते हैं, रोने की शुरुआत होती है इस दुनिया में? हँ? कौन रोता है पहले? अरे, रुलाने वाला भी कोई होगा ना? रोता भी कोई होगा पहले? हँ? इस नरक की दुनिया में, इस रावण राज्य में; रावण नाम ही पड़ता है - रावयते लोकान। जो लोगों को रुलाता है। हँ? तो लोग, लोगों में कोई पहला नंबर होगा? कौन? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) दादा लेखराज रुलाता है? अच्छा? अच्छा? उस आत्मा की यादगार क्या है? हँ? कुछ यादगार है? हाँ, उनकी यादगार है। ब्रह्मा की यादगार है; क्या? पुष्कर? क्या? पुश कर। पुश माने? धक्का मारा तो चल पड़ा। हाँ। तो धक्के की गाड़ी कितने दिन चलती है? कितने दिन चलेगी? हाँ, वो तो बार-बार उसके पुर्जे खराब होते रहेंगे। तो ज्यादा दिन नहीं चलती ना? हाँ। कि पूरा संगमयुग चलती है, पुरुषोत्तम संगमयुग? नहीं। बीच में ही शरीर छूट जाता है। अच्छा; तो उससे जो पैदा होते हैं ब्राह्मण वो फिर कहे जाते हैं पुष्करणी ब्राह्मण। क्या? विद्या की देवी के बच्चे नहीं। सारस्वत ब्राह्मण नहीं। सरस्वती पुत्र। हँ? पुष्करणी ब्राह्मण। उनको धक्का दे-देके चलाया जाता है तो चलते हैं।

तो बताओ कौन धक्का देता है? हँ? अरे, पुष्कर में जो ब्रह्मा का गायन है, मन्दिर है, उस ब्रह्मा को, चार मुखों वाले ब्रह्मा को कौन धक्का देता है? हँ? उन चार मुखों में कोई धक्का देने वाला भी होगा ना? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) परमब्रह्म वहां पैदा हो गया? हँ? परमब्रह्म जो है वो तो सबसे ऊँची स्टेज है। क्योंकि बाप आते ही हैं माताओं के लिए। (किसी ने कुछ कहा।) आदि लक्ष्मी? अच्छा? उसने धक्का दिया? हँ? धक्का दिया? धक्का मिलता है ना तो ताकत मिलती है गाड़ी को आगे बढ़ने की। हाँ। तो किसने फोर्स दिया ऐसा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) जगदम्बा ने धक्का दिया। हाँ। जगदम्बा को तो वो आत्मा पसन्द है ना? अरे, जगत की अंबा है तो उसका बच्चा कोई होगा कि नहीं होगा? हाँ। जगत की अंबा है तो उसका बच्चा भी होगा। बच्चा होगा कि पोता होगा? हँ? क्या होगा? (किसी ने कुछ कहा।) बच्चा होगा? अच्छा? भारत माता का बच्चा नहीं होगा वो? हं? अरे, भारत माता छोटी सी, नन्ही सी, बच्ची सी, कोई कहेगा नहीं ये माता है। वो तो सदा कन्या ही है कि नहीं? एक नारी सदा ब्रह्मचारी। तो एक पति सदा ब्रह्माचारी नहीं हुई? हाँ। हँ।

तो बताया कि जो भक्तिमाल है उस भक्तिमाल में तो नारद कौन हुआ? हँ? कौन हुआ अव्वल नंबर नारद? नार माने ज्ञान जल, द माने देता रहा। हँ? देता रहा, देता रहा। खुद नारायण नहीं बना उसी जन्म में। बना? कौन हुआ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, वो ही चार मुखों वाला ब्रह्मा। अव्वल नंबर नारद हो गया। हो गया कि नहीं? कि उसी जनम में वो नारद नर से नारायण बन गया? नहीं। हाँ, झांझ-मजीरा बजाया और जो संगी-साथी थे उन्होंने भी खूब झांझ-मजीरा बजाया। गीत गाओ। तो देखो भक्तिमार्ग में तो ये सब होता है ना? तो मनुष्य ये करते-करते भक्ति में नीचे गिरते जाते हैं। हँ? रावण राज्य होता है, भक्ति करते जाते हैं, करते जाते हैं और सीढ़ी नीचे उतरते जाते हैं तीव्र गति से।

A morning class dated 30.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Thursday was – This is an emperorship being established. Which emperorship? Not a small emperorship. The emperorship of the world is being established. In that a lot of, hm, what would be the population in the emperorship of the world? Hm? The population of the entire world would be 500-700 crores. So, what should be the calculation? It is in the intellect of the children that ShivBaba, hm, what would be the strength of BapDada’s family in this emperorship? Hm? Family of which BapDada? Hm? Arey? Family of which BapDada would be established? How big would it be? When it has been asked you should tell, will you not? Hm? How big would be BapDada’s family? Hm?
(Someone said something.) Will it be nine lakhs? Will the family of BapDada be nine-lakh strong? Which souls are included in Baap and Dada? (Someone said something.) Achcha, is family of Shiv also established? Here the topic of BapDada is being discussed. Hm? (Someone said something.) Hm? Ram Dada? Is a family formed with one, with one soul? (Someone said something.) Yes, Prajapita Brahma is the Father and the four-headed Brahma. Hm? These are BapDada in corporeal form. But does Shiv have any family in this world? No.

It was told – How big will this family of BapDada grow? It was told just now, wasn’t it as to how big it will grow? Arey? Zero? Hm? It will grow to 9 lakhs. So, which BapDada will they be? The souls of Ram and Krishna will only be called BapDada, will they not be? The Father of the human world and his eldest son. Child Krishna perfect in 16 celestial degrees. So, he is the Dada (elder brother) of the entire world, isn’t he? And the remaining four and a half lakhs, hm, will they be called Dada or Chacha (younger brother of Father), Tau (elder brother of Father)? What will they be called? Hm? In which category will they be? What would be their relationship? Of the four and a half lakhs. Even in that divide them into two halves. Half men, half women. Hm? So, how big would be the family? It will be of both. It will be said to be nine lakhs. Hm? If you separate them into two halves? How many of Baba, how many of the Father and how many of Dada? It will be said – four and a half lakh seed form souls of the Father because the Father is the seed, isn’t he? And will Dada be called the seed? Hm? Is he the seed? No. He is the biggest root of the human world. What is the memorial in today’s world? Hm? Arey, foreigners fear a lot. Hm?
(Someone said something.) Bermuda Triangle. Yes. Which soul is it? Badaa moola? Mool means root. Hm? Yes, whom do foreigners believe the most in this world? Hm? They say for God that He is incorporeal. It is as if He is nothing at all. Hm? Whom do they believe? Jabrail (Gabriel). Yes. It is the powerful (jabardast) oil of this world. It can be said that it is the powerful energy. Yes. So, will they believe in the Dadagiri (dominance) of that Dada or not? Yes.

So, we can say that the collective family of both of them is nine lakhs. Achcha, is there any family above that? Above nine lakhs? Arey? Above nine lakhs is the family of Prajapita Brahma of four and a half lakhs, isn’t it? Hm? When you are children of Prajapita, of Brahma, of Prajapita Brahma, then can you be brother and sisters or not? You can be brothers and sisters. Yes. You can be children of Prajapita Brahma, brothers and sisters and then from the point of view of seed-form souls, if you become constant in soul conscious stage, then you are brothers in the form of souls. But when there are female bodies then you are brothers and sisters. So, okay, look, this family is so big! Hm? Yes, where should you see? Hm? Four and a half lakhs. This will have to be seen here itself, will it not be? Where will you see the one of nine lakhs? Will you see the family of nine lakhs here or in the Golden Age? Such delay! You take so much time to write one alphabet.
(Someone said something.) Yes, you will see in the Golden Age. So, look, it is such a big family, numerous. In such a big world, hm, yes, in today’s world, in this world will anyone have such a big family?

So, this is Prajapita Brahma’s family. This topic sits in the intellect, doesn’t it daughter that he is the Father of the entire praja (subjects). It is not as if he is the Father of just the residents of India. No. He is the Father of all the subjects in all the countries in this world, isn’t he? Call him Prajapita, call him Aadam, call him Adam, he is the only one, the seed of the human world, isn’t he? Seed means Father. So, when this Father comes every Kalpa; this Father; which Father? Hm? It is from that time that these wonderful topics fall on our ears. Which Father comes? Arey? You don’t remain ready to write one alphabet. On the arrival of which Father do wonderful topics fall on our ears?
(Someone said something.) Yes, Father Shiv comes. What? When the Father of souls comes, then these wonderful topics fall on our ears. Or can we say that when the Father of the human world comes then they fall on our ears? Arey, he develops stone-like intellect in the end of the Iron Age. He develops, doesn’t he? Yes. So, look, all these wonderful topics fall on your ears, don’t they? In order to narrate those topics, people say for the Father – O God! Your dynamics and your directions are unique, very unique. For which soul do they say – O God, your dynamics and your directions? ‘Your’ refers to whose directions and dynamics? The dynamics of the world, the entire world that You change, nobody else can change the dynamics in a more unique way than that at all. And it is You who give the directions as well. You give a unique direction. No sage or saint, sanyasi, scholar, pundit, acharya (teacher) can give such directions in the world at all. Unique. Arey brother, why will it not be unique? Arey, Father of fathers. What? Father of even the founders of religions. Aadam, Prajapita. And even his Father? Shiv. Hm? The one who is forever incorporeal. And He doesn’t have any Father at all. So, He is unique, isn’t He? Can there be anyone equal to Him? There cannot be. So, it is a unique direction, isn’t it? So, it is rightly a unique direction, isn’t it? Unique dynamics.

Look, do you know the difference between the path of Bhakti and the path of knowledge? Hm. In Bhakti hardly anyone; hm? Yes, hardly anyone. What happens? They hardly have His vision. Look, what about Meera? So, the Father has explained, hasn’t He daughter? One is the rosary of Bhakti. What? The rosary of devotees (bhakt). Hm? And one is the Rudramala (rosary of Rudra). It exists, doesn’t it? So, are there just gents in the rosary of Bhakti or are there females as well? Hm? There are both. Half of it is of females. What does it mean? Those who have more body consciousness. And half of it is of males. So, what is their memorial? Is there any memorial of males and females on that path of Bhakti? You forgot. Arey? Baba told the memorial of male also. He mentioned the memorial of female as well. The memorial of male is Narad. Hm? First class bhakt. What does he do? He keeps on playing jhaanjh-majeera (musical instruments). Hm? And? And he keeps on roaming in the Three Worlds. Hm? What? What does he do to everyone? Arey, the names are based on the tasks performed, aren’t they? So, this name Narad is there in the scriptures, isn’t it? Naar means the water of knowledge. Da means giver. What does he do? Arey, wherever he goes, he goes to heaven, he gives knowledge. When he goes to hell, he gives knowledge. So, he keeps on travelling. Hm? It is a world tour. So, he is famous. Arey, who travels in the world? Do men travel more or do women travel more? Arey, the women mostly take care of their homes, don’t they? Yes. They take care of the home and family, take care of the children.


So, it was told – There is Narad in the male form in the rosary of Bhakti and in the female form? Meera. Yes. And this is the rosary of Bhakti. And when compared to it, the other one is the Rudramaal (rosary of Rudra). It exists, doesn’t it? So, think about this Rudramaal and this Bhaktimaal. Hm? What should you think? The path of Bhakti starts when there is the kingdom of Ravan. Hm? Yes. There is a kingdom of those who make you cry. How do they make you cry? What do they do that you start crying or crying begins in this world? Hm? Who cries first? Arey, there must be someone who makes you cry, will he not be there? There must be someone who cries first? Hm? In this world of hell, in this kingdom of Ravan, the name Ravan itself is coined – Ravayate lokaan. The one who makes people cry. Hm? So, people, there must be a first number among people? Who? Hm? (Someone said something.) Does Dada Lekhraj make you cry? Achcha? Achcha? What is the memorial of that soul? Hm? Is there any memorial? Yes, there is his memorial. Brahma’s memorial is there; What? Pushkar? What? Push kar (push). What is meant by push? It started moving when it was pushed. Yes. So, for how many days does a vehicle that works on being pushed, work? How many days will it work? Yes, its parts will keep on becoming non-functional again and again. So, it does not work for more days; does it? Yes. Or does it work for the entire Confluence Age, the Purushottam Sangamyug? No. He loses his body in between only. Achcha, so, the Brahmins who are born from him are called Pushkarni Brahmins. What? Not the children of the Devi of knowledge (Vidya Devi). They are not Saaraswat Brahmins. Sons of Saraswati. Hm? Pushkarni Brahmins. They walk when they are made to walk by being pushed.

So, tell, who pushes? Hm? Arey, the Brahma who is praised and has a temple in Pushkar, who pushes that Brahma, the four-headed Brahma? Hm? There must be a head among those four heads which pushes, will it not be there? Hm?
(Someone said something.) Was Parambrahm born there? Hm? Parambrahm is the highest stage. It is because the Father comes only for the mothers. (Someone said something.) First Lakshmi? Achcha? Did she push? Hm? Did she push? When a vehicle is pushed, it gets the power to move ahead. Yes. So, who gave such force? Hm? (Someone said something.) Jagdamba pushed. Yes. Jagdamba likes that soul, doesn’t she? Arey, when she is the Mother of the World, then will she have a son or not? Yes. When she is the Mother of the World, then she will have a child as well. Will she have a son or a grandson? Hm? What will she have? (Someone said something.) Will she have a son? Achcha? Will he not be the son of Mother India? Hm? Arey, Mother India is a small, tiny, daughter-like; nobody will say that she is a mother. Is she always a virgin or not? Ek naari sadaa brahmachaari (the one who remains faithful to one woman, i.e. wife is as good as a celibate.) So, is she not forever celibate if she remains faithful to one husband? Yes. Hm.

So, it was told that in the rosary of Bhakti, who is Narad in that rosary of Bhakti? Hm? Who is number one Narad? Naar means the water of knowledge, da means he went on giving. Hm? He went on giving, went on giving. He himself did not become Narayan in the same birth. Did he become? Who is it?
(Someone said something.) Yes, the same four-headed Brahma. He is the number one Narad. Is he or not? Or did that Narad become Narayan from nar (man) in the same birth? No. Yes, he played jhaanjh-majeera (musical instruments) and his companions also played jhaanjh-majeera a lot. Sing songs. So, look, all this happens on the path of Bhakti, doesn’t it? So, human beings keep on falling in Bhakti while doing this. Hm? There is kingdom of Ravan; they keep on doing Bhakti, keep on doing Bhakti and keep on coming downstairs quickly.
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2942, दिनांक 15.07.2019
VCD 2942, dated 15.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning Class dated 30.11.1967
VCD-2942-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.18
Time- 00.01-20.18


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.11.1967. गुरुवार को सातवें पेज के चौथी लाइन में बात चल रही थी कि बाप तो समझते हैं कि अभी पुरुषोत्तम संगमयुग में मेरे से ये दो अक्षर सीख लो। बाबा शब्द को अक्षर कह देते हैं। हँ? कौन-कौन? अलफ और बे। हाँ। अब ये और तो कुछ नहीं कहते हैं। ये तो तुम जानते हो जबकि हमको स्वर्ग में जाना है तो दैवी गुण तो जरूर धारण करना है। ये तो आटोमेटिकली तुम्हारी बुद्धि में आना चाहिए कि हम जब देवता बनते हैं तो देवताओं के गुण भी तो चाहिए ना? अभी? अभी तो कोई गुण नहीं हैं बच्चों में। हँ? गुण नहीं है? कौनसे बच्चों में? हँ? विजयमाला के बच्चों में कहें या रुद्रमाला के बच्चों में कहें? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) दोनों में? दोनों में कोई गुण नहीं? अच्छा? इसने तो कंटा की काट दिया। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, 1967 में ज्ञान नहीं है तो गुण कहां से आएंगे? ज्ञान तो मूल चीज़ है ना? अज्ञान होता है तो अवगुण। ज्ञान से आते हैं गुण। ज्ञान से होती है मुक्ति-जीवनमुक्ति। ज्ञान से होता है सुख। अज्ञान से होता है दुख।

तो अभी बच्चों में कोई गुण नहीं है। गाते रहते हैं मुझ निर्गुणहारे में कोई गुण नाहि। देखो, कोई गुण नाहि। अच्छा? तो बाकि है क्या? हँ? कोई गुण नहीं तो कोई कुछ है क्या? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) अवगुण हैं? और कुछ नहीं है? बाबा को तो दिखाई पड़ता है कि कुछ है। हँ? ये तो पांच विकार अवगुण हैं। वो तो सारी दुनिया रावण संप्रदाय है। हँ? पांच विकारों का बाप सबमें देहभान है। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, बाबा को गुण दिखाई पड़ता है। क्या गुण दिखाई पड़ा? हाँ, बूढ़ी माता ने बताय दिया। क्या बताय दिया? बताय दिया बाप की पहचान तुम बच्चों में ही है नंबरवार। हाँ, कोई पहले पहचानेगा, कोई? कोई बाद में पहचानेगा। बाकि पहचानते तो जरूर हैं। तो नहीं पहचानते हैं तो तब तक अवगुण तो जरूर होंगे। फिर 5000 वर्ष के बाद ये अवगुण आहिस्ते-आहिस्ते प्रवेश करते हैं। फिर ऐसे ही आएंगे 5000 वर्ष के बाद जैसे अभी आए हैं। हँ? अभी मैं आया हुआ हूँ क्या देने के लिए? गुण देने के लिए आया हुआ हूँ? हँ? क्या देने के लिए आया हुआ हूँ? अरे, गुण तो देवताओं में होते हैं। मैं तो निराकार। न मेरे में गुण न मेरे में अवगुण। मेरे में तो सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान है। अखूट ज्ञान का भंडार है। हाँ। और ज्ञान ही सबसे जास्ती पवित्र चीज़ है। हँ? हाँ, ज्ञान से ही तो रास्ता मिलता है। ज्ञान की रोशनी नहीं होगी तो रास्ता कहां से दिखाई पड़ेगा? हाँ, नहीं दिखाई पड़ेगा। तो कौनसा रास्ता? मुक्ति और जीवनमुक्ति में जाने का रास्ता। तो वो तो तभी जा सकेंगे जब पवित्र बनेंगे। क्या?

तो बाप सब कुछ समझाय देते हैं बच्चे। शुरू से लेकर अंत तक सब समझाय देते हैं। क्या? अपवित्र के संग में आए तो अपवित्र बन गए। हँ? और पवित्र के संग में आएंगे तो पवित्र बन जाएंगे। तो एवर प्योर कौन? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) शिव? उसके संग में कैसे आएंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिव तो आत्माओं का बाप है ना? तो वो आत्माओं का बाप; आत्मा निराकार, तो आत्मा का बाप भी निराकार। संग तो, हं, कैसे होता है? संग का रंग कैसे लगता है? देह के द्वारा लगता है ना? देह की इन्द्रियों के द्वारा संग का रंग लगता है। हँ? या तो याद से लगता है। और याद भी किसको करेंगे? आँखों से देखा होगा, कानों से सुना होगा। हँ? रसगुल्ला जीभ से खाया होगा, चाखा होगा तो याद आएगा ना? याद आएगा। तो इन सब बातों के लिए तो वो निराकार काम आएगा? हँ? निराकार को याद कर सकेंगे? नहीं याद कर सकेंगे।

तो उसके लिए बताया कि निराकार सूक्षम, सूक्षम रूप को नहीं याद कर सकते हो तो मैं बड़े रूप में भी प्रवेश करता हूँ। उसको नाम दिया है शिवलिंग। क्या नाम है? बड़े रूप का? लिंग। लिंग तो मन्दिरों में बड़ा बनाते हैं या बिन्दी बनाते हैं? बड़ा ही तो बनाते हैं ना? तो बड़ा जो है वो किसकी यादगार है? हाँ, वो बड़ा उसी की यादगार है जो बहुत बड़ा काम करके दिखाता है। हाँ, वो ही साकार। इन्द्रियां तो साकार ही होती हैं ना? हाँ, उन इन्द्रियों में भी और जो देवताओं की तो सारी इन्द्रियां पूजी जाती हैं। लेकिन मेरी? मेरी तो सारी इन्द्रियां नहीं पूजी जाती। मेरा तो लिंग ही पूजा जाता है। तो लिंग मेरे को कहां से आए? मैं तो निराकार ज्योतिबिन्दु। न मेरे को कान, न आँख, न हाथ-पांव, कुछ भी नहीं। तो लिंग कहां से आएगा? तो जिसमें मैं प्रवेश करता हूँ ना उसमें?
(किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? उसी को लिंग है? और कोई मनुष्य हैं ही नहीं, पुरुष ही नहीं हैं दुनिया में? हैं तो लेकिन उसका जो है बड़ा काम है। छोटा काम है कि बड़ा काम है? हाँ, उसका बड़ा काम है। क्या बड़ा काम है? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) सारी दुनिया? सारी दुनिया को पावन बनाता है? कैसे पावन बनाता है? अरे, सारी दुनिया दृष्टि से पावन नहीं बन सकती? हँ? बन सकती? कभी हां, कभी ना। दृष्टि का संग हो तो पावन नहीं बनेगी? और ज्ञान कानों से सुना जाता है तो कानों से सुनकरके पावन नहीं बनेंगी? हँ? हाँ, ये तो ज्ञान इन्द्रियां हैं ना? ये जो ज्ञान इन्द्रियां हैं वो तो जो ज्ञान धारण करेंगे, हँ, उन्हीं की ज्ञान इन्द्रियां पावरफुल बनेंगी। और ज्ञान ही धारण नहीं करेंगे, हँ, ज्ञान में ही कमी रह जाएगी, जो ज्ञान है वो ही नहीं लेंगे ज्ञान सागर से, या ज्ञान सूर्य का जो ज्ञान ज्ञान सागर में आता है, प्रकाश आता है ना सबसे जास्ती सागर में, तो नहीं लेंगे तो कहां से आएगा?

तो बताया इस संसार में तो कर्मेन्द्रियों को प्रधानता देने वाले वो राक्षस संप्रदाय भी हैं। ऊँची इन्द्रियां कौनसी? ज्ञान इन्द्रियां ऊँची। और कर्मेन्द्रियां? कर्मेन्द्रियां नीची। तो नीची से नीचा काम करेंगे कि ऊँचा काम करेंगे? नीची से नीचा काम। और ऊँच इन्द्रियों से ऊँचा काम। तो देव आत्माएं जो होती हैं वो स्वर्ग में ज्ञानेन्द्रियों से ऊँच काम करती हैं, ऊँच वातावरण बनाती हैं। और? और क्या? दुनिया ऐसी बनती है जिसमें हिंसा की कोई बात है ही नहीं। नीच तो उसे ही कहा जाता है जो दूसरों को दुख दे, हिंसा करे। तो वो राक्षस कहे जाते हैं। वो ज्ञान नहीं लेते तो क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों को उनको महत्व ही नहीं है। उनको समझाया जाए कि देवताएं जो हैं वो ज्ञानेन्द्रियों से संतान पैदा करते थे, ज्ञानेन्द्रियों के योग से। हँ? उन ज्ञानेन्द्रियों में वो ज्ञान का सार भरा रहता था। क्या ज्ञान का सार? मैं आत्मा ज्योतिबिन्दु। तो उस सार से, हँ, सार से वो वायब्रेशन बनता था। और सृष्टि चलती थी। तो ये बात वो मानने वाले नहीं। मानेंगे राक्षस संप्रदाय? इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट और उनके फालोअर्स, हँ, इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन्स और उनके सहयोगी धरमपिताएं और उनके फालोअर्स ये बात मानेंगे कि कोई ऐसी भी दुनिया हो सकती है जहां ज्ञानेन्द्रियों से सृष्टि चलती रहे, बाल-बच्चे पैदा होते रहें? मानेंगे? बिल्कुल नहीं मानेंगे।

तो वो तो हैं ही नीच आत्माएं। हँ? नीची इन्द्रियों से कर्म करने के उनके स्वभाव-संस्कार जन्म-जन्मान्तर के भरे हुए हैं। हाँ, अब उनको पवित्र कैसे बनाएंगे? हँ? पवित्र बनना है कि नहीं बनना है? अरे, उनकी भी ज्ञानेन्द्रियों को पवित्र बनाना है या नहीं बनाना है? बनाना तो है। तो वो बनाने के लिए जो देव आत्माएं हैं ना, जो देव आत्माएं स्वर्ग में आती हैं, स्वर्ग के सुख भोगती हैं और जन्म-जन्मान्तर कई जन्मों तक सुख भोगती हैं। तो वो ही आत्माएं सुख भोगते-भोगते जब द्वैतवादी द्वापरयुग में जहां दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो कुल, दो-दो भाषाएं शुरू हो जाती हैं तो वो आत्माओं को संग का रंग उनको लेना पड़ता है। किनको? उन धरमपिताओं से को जो परमधाम से पवित्र आत्माएं बनकरके; पवित्र आत्माएं तो परमधाम में नहीं बनतीं; बनती तो सब कलियुग के अंत में संगमयुग में ही हैं। हँ? और बाप ही आकरके बनाते हैं। लेकिन किनके संग के रंग से वो पवित्र बनती हैं? बाप के डायरेक्ट सन्मुख आती हैं? वो आती ही नहीं।

तो बाप जिन देव आत्माओं को मनुष्य से देवता बनाते हैं; देवता दो तरह के होते हैं। एक तो डायरेक्ट मनुष्य से देवता उसी जनम में। और दूसरे? उसी जन्म में नहीं। अगले जनम में जन्म लेकरके बच्चा बनके प्रिंस बनकरके फिर जन्म लेते हैं। है ना? तो वो दोनों प्रकार की देवात्माएं जो हैं उनका हिसाब है। क्या? वो एक हैं बीज रूप आत्माएं और दूसरी हैं आधारमूर्त आत्माएं सृष्टि रूपी वृक्ष की। बीज उनको कहा जाता है जो बहुत सूक्ष्म ज्ञान सुनते हैं। सूक्ष्मता से, गहराई से ईश्वर के ज्ञान का खूब मनन-चिंतन-मंथन करते हैं तो उन्हें क्या कहा जाता है? बीज। हाँ। तो बीज में ज्यादा ताकत होती है कम होती है? बीज में ज्यादा ताकत। तो जो ज्यादा ताकत वाले बीज हैं वो उन देवताओं को जो इस जनम में तो देवता नहीं बनते अपने शरीर से, नर से नारायण डायरेक्ट नहीं बनते, अगले जनम में 16 कला संपूर्ण देवता या उससे कम कला के देवता बन जाते हैं। तो उन देवताओं को फिर कहेंगे, अरे, उन देवताओं को कहेंगे जड़। जड़ माने आधार। क्या कहेंगे? हाँ, सारे सृष्टि रूपी वृक्ष के आधार हैं, जड़ हैं।

वो जड़ें जो हैं, भल जड़ रूप आत्माएं आधारमूर्त आत्माएं जन्म लेते-लेते जब द्वापरयुग में पहुंचती हैं तो फिर वो धरमपिताएं जो उन आधारमूर्त देवताओं से ज्ञान लेकरके निराकारी स्टेज को जिन्होंने धारण किया था और वो भी निराकार बने थे। पहले बने थे कि बाद में बने थे? हँ? बाद में बने थे। तो वो फिर उनमें ही प्रवेश करते हैं। समझ में आया कि नहीं? किनमें? आधारमूर्त में, जड़ रूप प्रवेश करते हैं। तो उनका संग का रंग लगेगा कि नहीं? हँ? उनकी जो मेंटलिटी हैं जन्म-जन्मान्तर की वो मेंटलिटी कि भई ज्ञानेन्द्रियों से कोई संतान पैदा नहीं हो सकती है। क्या मेंटलिटी है उनकी? वो जो कर्मेन्द्रियां हैं ना उनमें जो सबसे पावरफुल कर्मेन्द्रिय है उसी से संतान की उत्पत्ति हो सकती है। तो बस ये देवात्माएं जो हैं, इनकी आदत क्या है? ये सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास कर लेती हैं। जो कुछ भी सुनाएगा, सत्य वचन महाराज। हाँ। तो बस उनके प्रभाव में आ जाते हैं।

क्यों प्रभाव में आ जाते हैं? क्योंकि ये मातृ देश की आत्माएं हैं। देवात्माएं कहां की हैं? मातृ देश की। मातृ देश एक भारत ही है। क्या? जितने भी परिवार में बच्चा होते हैं वसुधैव कुटुम्बकम कहा जाए कि सारी वसुधा एक कुटुम्ब, परिवार है तो उसमें परिवार में बच्चे कहां से पैदा होते हैं? मां से पैदा होते हैं। तो ये जो जितनी भी आधारमूर्त हैं या बीजरूप आत्माएं हैं वो सब माता के गुण वाली। कहेंगे बीज क्यों? बीज तो बाप होता है बीज डालने वाला। होता है लेकिन माता के संसर्ग-संपर्क में उसे आना पड़े या नहीं आना पड़े? हँ? और आएगा तो अपना सारे बीज की ताकत किसको दे देगा? हँ? किसको देगा? माता को देगा ना? तो ये माताएं हैं। अब उन माताओं में परमब्रह्म हो, अव्वल नंबर की हो, दोयम नंबर की हो, तीसरे नंबर की माता हो, चौथे नंबर; पांच-पांच शादियां भी कर लेते हैं ना? हाँ, चार-चार, पांच-पांच शादियां करते हैं भारत में। कहते हैं एक जूती गई, भारत में कहते हैं कि एक जूती गई, दूसरी लेते हैं, तीसरी लेते हैं। और ऐसे चार-पांच शादियां भी करते हैं। तो उसी बात को फिर ये इस्लामियों ने भी फालो किया है। क्या? वो भी तो उन्हीं त्रेतायुगी क्षत्रीयों के बच्चे हैं ना? तो वो उन बातों को फालो करेंगे कि नहीं? तो ये बात उन्होंने फालो की कि भई कितनी शादियां करनी चाहिए कम से कम? हाँ, पूर्ति करना, आपूर्ति होती है तो फिर चार-पांच भी शादियां कर लेते हैं।

तो देखो, तुमको पता चला गया। क्या? कि वो जो आत्माएं राक्षसी आत्माएं हैं, कर्मेन्द्रियों से बड़ा महत्व देने वाली हैं, ऐसी आत्माएं पवित्र कैसे बनती हैं? हँ? वो आत्माएं भी एक जन्म के लिए पवित्र इन्द्रियों से ही आचरण करती हैं। पहला जन्म जो है द्वापरयुग से लेकरके कलियुग के अंत तक जितने भी हैं आत्माएं आत्मलोक से आनेवाली राक्षसी आत्माएं वो सब की सब पहले जनम में एक जनम में सुख भोगती हैं। कौनसा सुख? कौनसी इन्द्रियों का? ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगती हैं। उनमें वो कर्मेन्द्रियों के विकार की चेष्टा नहीं होती। अभी तुम जब यहां बैठे रहते हो तो देखो तुमको कितनी अच्छी नॉलेज मिलती है। क्या? कि पूरा पवित्र कैसे बना जाता है और अधूरा पवित्र कैसे बना जाता है।

A morning class dated 30.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fourth line of the seventh page on Thursday was that the Father explains that now in the Purushottam Sangamyug learn these two alphabets from Me. Baba uses the word ‘akshar’ (alphabet) instead of word. Hm? Which ones? Alaf and Be. Yes. Now this one does not say anything else. You know that when we have to go to heaven, then we have to definitely inculcate divine virtues. This should automatically come to your intellect that when we become deities, then we also require the virtues of deities, don’t we? Now? Now children don’t have any virtue. Hm? Is there no virtue? In which children? Hm? Should we say ‘in the children of vijaymala (rosary of victory)’ or ‘in the children of Rudramala (rosary of Rudra)’? Hm?
(Someone said something.) In both? Is there no virtue in both? Achcha? This person cut all possibilities. (Someone said something.) Yes, how will virtues emerge when there is no knowledge in 1967? Knowledge is the main thing, isn’t it? There are vices when there is ignorance. Virtues come from knowledge. Knowledge leads to mukti-jeevanmukti. Knowledge leads to happiness. Ignorance leads to sorrows.

So, now there are no virtues in the children. They keep on singing ‘there is no virtue in me, the one without virtues’. Look, there is no virtue. Achcha? So, what is there? Hm? If there is no virtue, then is there anything? Hm?
(Someone said something.) Are there vices? Isn’t there anything else? Baba observes that there is something. Hm? These five vices are bad qualities. The entire world belongs to the Ravana community. Hm? There is the Father of five vices, i.e. body consciousness is present in everyone. Hm? (Someone said something.) Yes, Baba observes a virtue. What is the virtue that He saw? Yse, the old mother told. What did she tell? She told that the recognition of the Father is only in you children numberwise. Yes, someone will recognize first and someone? Someone will recognize later. But they definitely recognize. So, until they recognize they will definitely have vices. Then after 5000 years, these vices enter gradually. They will enter again after 5000 years just as they have entered now. Hm? Now I have come to give what? Have I come to give virtues? Hm? What have I come to give? Arey, there are virtues in the deities. I am incorporeal. There are neither virtues nor vices in Me. There is the knowledge of the beginning, middle and end of the world. He is the inexhaustible stock-house of knowledge. Yes. And the knowledge itself is the purest thing. Hm? Yes, one finds the path only through knowledge. If there is no light of knowledge, then how will you see the path? Yes, you will not be able to see. So, which path? The path to mukti (liberation) and jeevanmukti (liberation in life). So, you will be able to go there only when you become pure. What?

So, children, the Father explains everything. He explains everything from the beginning to the end. What? When you came in the company of impure ones, you became impure. Hm? And if you come in the company of the pure one, you will become pure. So, who is the ever pure one? Hm?
(Someone said something.) Shiv? How will you come in His company? (Someone said something.) Yes, Shiv is the Father of the souls, isn’t He? So, that Father of souls; when the soul is incorporeal, the Father of the souls is also incorporeal. How does one keep company? How does one get coloured by company? It is through the body, isn’t it? The colour of company is applied through the organs of the body. Hm? Either it is applied through remembrance. And whom will you remember as well? If you have seen through the eyes, if you have heard through the ears; hm? If you have eaten, tasted rasgulla (a sweet dish) through the tongue, it will come to your mind, will it not? It will come to the mind. So, will that incorporeal prove useful for all these topics? Hm? Will you be able to remember the incorporeal? You will not be able to remember.

So, it was said for Him that if you cannot remember the incorporeal, subtle, subtle form, then I enter in a big form also. It has been named Shivling. What is the name? of the big form? Ling. Is the ling made big in the temples or is it made as a point? They make it big only, don’t they? So, whose memorial is the big one? Yes, that big form is the memorial of the same person who performs a big task and shows. Yes, the same corporeal. The organs are corporeal only, aren’t they? Yes, in those organs also and all the organs of the deities are worshipped. But Mine? All My organs are not worshipped. My ling (phallus) alone is worshipped. So, how do I get a phallus? I am an incorporeal point of light. Neither do I have ears, nor do I have eyes, hands, legs, nothing. So, how will I get a phallus? So, what about the one in whom I enter?
(Someone said something.) Achcha? Does he alone have a phallus? Is there no other human being, no other man at all in the world? There indeed are, but His task is big. Is it a small task or a big task? Yes, His task is big. What is the big task? Arey? (Someone said something.) The entire world? Does He make the entire world pure? How does He make it pure? Arey, can’t the entire world become pure through the vision? Hm? Can it become? Sometimes you say yes, sometimes no. Will it not become pure if there is company of the eyes? And the knowledge is heard through the ears; will they not become pure by listening through the ears? Hm? Yes, these are sense organs, aren’t they? These sense organs, only those will inculcate knowledge, hm, only their sense organs will become powerful. And if they do not inculcate knowledge at all, hm, if there is shortage in the knowledge itself, if they do not obtain knowledge from the ocean of knowledge, or if they do not obtain the knowledge of the Sun of Knowledge which comes into the ocean of knowledge, maximum light is absorbed by the ocean, isn’t it? So, if they do not obtain it, then where else will they obtain it from?

So, it was told that there are also those demoniac communities who give importance to the organs of action in this world. Which are the higher organs? The sense organs are higher. And the organs of action? The organs of action are lower. So, will they perform lowest tasks or high task? They will perform lowest task. And higher tasks are performed through high organs. So, the deity souls perform high task through sense organs in the heaven, create a high atmosphere. And? And what? The world becomes such that there is no question of violence in it at all. Only the one who gives sorrows to others, indulges in violence is called lowly. So, they are called demons. They do not obtain knowledge because they do not have importance for the sense organs at all. If they are explained that the deities used to procreate through sense organs, through the Yoga of the sense organs; hm? Those sense organs used to be filled with the essence of knowledge. What essence of knowledge? I am a point of light soul. So, through that essence, hm, through that essence that vibration used to be formed. And the world used to function. So, they do not believe in this topic. Will the demoniac community accept? Will Ibrahim, Buddha, Christ and their followers, the Islamic people, Buddhists, the Christians and their helper founders of religions and their followers believe in the topic that there can also be one such world where the world functions through the sense organs and children are born through them? Will they believe? They will not at all believe.

So, they are lowly souls only. Hm? They are filled with the nature and sanskars of acting through the lowly organs since many births. Yes, well, how will they be made pure? Hm? Do they have to become pure or not? Arey, will their sense organs also have to be made pure or not? They are to be made. So, in order to make that, the deity souls, the deity souls which come to heaven, experience the joy of heaven and experience joy birth by birth for many births; so, the same souls, while experiencing joy, when the dualist Copper Age starts, where two religions, two kingdoms, two clans, two languages start, then those souls have to get coloured by their company. Who? From those founders of religions, which descend as pure souls from the Supreme Abode; souls do not become pure in the Supreme Abode; everyone becomes only in the end of the Iron Age in the Confluence Age only; hm? And the Father Himself comes and makes them. But in whose colour of company do they become pure? Do they come direct face to face with the Father? They do not come at all.

So, the deity souls whom the Father transforms from human beings to deities; deities are of two kinds. One is those who become deities from human beings direct in the same birth. And the other? Not in the same birth. They get birth in the next birth, become a child, get birth as a prince. Is it not? So, there is an account of both kinds of deity souls; what? One is seed form souls and the other is base-like souls of the world tree. Those who listen to very subtle knowledge are called seeds. When they think and churn the knowledge of God with subtlety, in depth, then what are they called? Seeds. Yes. So, is there more power in the seeds or is there less power? There is more power in the seeds. So, the seeds with more power, those deities, who do not become deities in this birth through their own body, those who do not become direct Narayan from nar (man), become deities perfect in 16 celestial degrees in the next birth or become deities with lesser celestial degrees. So, then those deities will then be called, those deities will be called roots. Roots means base. What will they be called? Yes, they are the base, roots of the entire world tree.

Those roots, although the root-like souls, the base-like souls, while getting rebirths, when they reach the Copper Age, then the founders of religions, who obtain knowledge from those base-like deities and had attained the incorporeal stage and they too had become incorporeal. Did they become first or did they become later on? Hm? They had become later on. So, they then enter in them only. Did you understand or not? In whom? They enter in the base-like, root-like [souls]. So, will they get coloured by their company or not? Hm? Their mentality, their mentality of many births that brother, children cannot be born through sense organs; what is their mentality? Among the organs of action, the children can be born through the most powerful organ of action. So, that is it; what is the habit of these deity souls? They believe in hearsay. Whatever anyone narrates, satya vachan maharaj (it is true). Yes. So, that is it, they come under their influence.

Why do they come under their influence? It is because they are souls of the mother country. To which place do the deity souls belong? To the mother country. India alone is a mother country. What? All the children in a family; if you say ‘vasudhaiv kutumbakam’ that the entire Earth is a family (kutumb, parivaar), then where from are the children born in that family? They are born from the mother. So, all these base-like souls or the seed-form souls, they all have mother’s qualities. You will say – Why the seeds? Seed is the Father who sows the seed. He is indeed, but will he have to come in contact with the mother or not? Hm? And if he comes, then to whom will he give the power of the entire seed? Hm? To whom will he give? He will give to the mother, will he not? So, these are mothers. Well, among those mothers, be it Parambrahm, be it the number one [mother], be it the number two, be it the number three mother, fourth number; people marry even five times, don’t they? Yes, they perform four, five marriages in India. They say – One shoe is gone. They say in India that one shoe is gone; I take up the second one, third one. And in this manner they get married four-five times. So, these Islamic people also followed the same topics. What? They too are the children of the same Silver Age Kshatriyas, aren’t they? So, will they follow those topics or not? So, they followed this topic that brother, how many marriages should we perform at the least? Yes, to compensate, when they feel the loss, then they marry even four-five times.

So, look, you have come to know. What? That the souls which are demoniac souls, those that give more importance to the organs of action, how do such souls become pure? Hm? Those souls also act through the pure organs only for one birth. In the first birth from the Copper Age to the end of the Iron Age, all the souls coming from the Soul World, the demoniac souls, all of them experience happiness in the first birth, one birth. Which happiness? Of which organs? They experience happiness of the sense organs. Among them there is no desire for lust in those organs of action. Now the place where you sit, look, you get such good knowledge. What? That how does one become completely pure and how does one become incompletely pure.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2943, दिनांक 16.07.2019
VCD 2943, dated 16.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning class dated 30.11.1967
VCD-2943-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-17.12
Time- 00.01-17.12


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.11.1967. गुरुवार को सातवें पेज के मध्य में बात चल रही थी सूक्षम वतन की। बताया कि बच्चियां साक्षात्कार में जाती थी। वो तो सूक्षम वतन की बात है। साक्षात्कार भी दो तरह का है। एक भक्तिमार्ग का और एक ज्ञानमार्ग का। भक्तिमार्ग के साक्षात्कार में बंद आँखों से, जैसे स्वप्न देखते। आँख खुली तो कुछ भी नहीं। ये ज्ञानमार्ग का साक्षात्कार है सूक्ष्म वतन का। इसमें जो व्यक्त हैं सो फिर अव्यक्त हो जाते हैं। हमें जो इन आँखों से देखने में आते हैं वो फिर क्या हो जाता है? हँ? देखने में आते हैं सबको? हँ? सबको देखने में आते हैं? अच्छा? सबको देखने में नहीं आते हैं। हाँ। जो ज्ञानी होते हैं वो फिर मनन-चिंतन-मंथन में एक्सपर्ट होकरके वो देखते हैं तीसरे नेत्र से। तो अव्यक्त होने की बात है। ये जो पतित हैं सो फरिश्ता जाकरके बनते हैं। इस दुनिया में पतित। ज्ञान मिलता है, मनन-चिंतन-मंथन करते हैं तो फिर सूक्ष्म मन-बुद्धि की ऐसी स्टेज बनती है कि बाहर की दुनिया वालों से मन-बुद्धि का संपर्क क्या होता है? टूट जाता है। और जब इसमें एक्सपर्ट हो जाते हैं, तो फिर बाद में पावन देवता बनेंगे।

तो ये फरिश्तेपन की निशानी हुई। क्या? हँ? जब तक फरिश्ता नहीं बने हैं तब तक इन आँखों से सबको देखने में आ सकते हैं। जो पुरुषार्थ करें, जो प्रयास करें। और फरिश्ता बन गए तो क्या होगा? जो ज्ञानी होंगे, मनन-चिंतन-मंथन करने में समान होंगे या समान बनने वाले होंगे तो नंबरवार। तो उनको वो देखने में आवेंगे। बाकि बंद आँखों के साक्षात्कार में खुली आँखों का जो ज्ञान का साक्षात्कार है, वो है तो कुछ भी नहीं।

और ये तो समझ गए ब्रह्मा, विष्णु और शंकर कौन हैं? शंकर तो और बाबा ने समझाया। ऐसा कोई शंकर होता है जो बैल पर सवारी करे? हँ? सूक्षम वतन में वहां बैल, वगैरा जानवर कहां से आएंगे? सूक्षम वतन में वरी ये कहां से आएंगे? जो सूक्षम वतन में कहते हैं शंकर पार्वती के पिछाड़ी फिदा हुआ। अरे, फिर जो वो वीर्य धरती पर पड़ा वो उससे फिर बिच्छू-टिंडन पैदा हुए। अरे, ये तो शास्त्रों में पढ़ा है, शास्त्रों में लिखा हुआ है जो बाबा बताते हैं। ये तो आखानियां बनाई हुई हैं। अभी, अभी कहां पार्वती और कहां शंकर सूक्षम वतन में! और कहां वो विकार की बात! और देखो क्या-क्या बैठकरके बनाया है! देखो भक्तिमार्ग में कितनी-कितनी चरियाई की है! सारी चरियाई की बातें। तो बाप कहते हैं ना बरोबर तुम भक्ति करते-करते क्या बन गए! बाप पूछते हैं। अभी तुम बरोबर फर्क देखते हो कि कैसे नॉनसेन्स बन गए जो कोई कुछ कहे हां, सत्य है, ये बात भी सत्य है। अरे, भक्तिमार्ग में तो सदा ही सत्य-4 करते ही रहे।

तो अभी बच्चे समझते जाते हैं और धारण करते जाते हैं। और फिर खुशी में भी रहते हैं। तो ये कोई नई बात थोड़ेही है। अरे, हम तो अनगिनत बार देवताएं बने हैं। इनन्यूमरेबल टाइम्स। यानि डीटी राज्य के भांती बने हैं। अच्छा, डीटी राज्य तो था ना? और अभी तो ये जरूर सतयुग में ही होता है। झूठ युग में तो नहीं होगा ना? झूठ भी होता है तो नंबरवार और सत्य भी होते हैं तो भी नंबरवार। और दोनों होते हैं तो झगड़ा होगा कि नहीं? हँ? तो ये तो कलह-कलेश का युग है। लड़ाई-झगड़े का, मारामारी का। देखो क्या हालत हो जाती है! तो बीच का तो बाप ने बताय दिया। तो ये चक्कर फिरता रहता है। क्या? सतयुग से त्रेता, त्रेता से द्वापर और फिर कलियुग। तो ये बेहद का ड्रामा का ज्ञान मिला ना? वो ड्रामा होता है हद का। तो उसका भी रिहर्सल का टाइम तो होता है ना? और वो ब्रॉड ड्रामा खेलते हैं तो वो अलग होता है। जब रिहर्सल कम्प्लीट हो जाती है तो फिर खेलते हैं ब्रॉड ड्रामा।

तो ये बेहद का ड्रामा है। इसमें ये चार युगों का चक्कर फिरने के बाद फिर रिहर्सल कराते हैं। कौन कराते हैं? अरे, रिहर्सल कराने वाला डायरेक्टर ही होगा ना पर्दे के पीछे रहने वाला? तो तुम बच्चों को बुद्धि में बैठा है। ये ड्रामा फिरता रहता है। वो छोटा ड्रामा भी फिरता है। हँ? बार-बार फिरता रहता है ना? बार-बार दिखाते हैं। तो दो घंटा। और ये तो देखो बेहद का ड्रामा। कितना बरस? और वो तो विनाशी। हँ? और ये तो अविनाशी ड्रामा। ये तो बार-बार हूबहू चक्कर काटता है। इसका तो विनाश होता ही नहीं। ये कोई पूछे कि भई ये बेहद का ड्रामा कब बनाया? तो इनके लिए तो बताय देंगे कि ये ड्रामा अभी बनाय, हँ, अभी बनाया पुरुषोत्तम संगमयुग में। वो तो हद की बात हो गई हद के ड्रामा की। हँ? तो उनका भी टाइम होता है ना? और इस बेहद के ड्रामा का भी टाइम है। वो अपना टाइम बतावेंगे फलाना-फलाना और उनके उस ड्रामाबाजी की एड्वर्टाइज़मेन्ट भी होती है। भई देखो, ये नया खेल आया है देखने के लिए। आकरके देखो। तो हाँ, दिखलाते हैं ना? वो गायन वायन दिखला करके। अच्छा? ये वरी बेहद का ड्रामा देखो कैसा है? मजे का है ना? बच्ची बेहद का ड्रामा है। और अभी तुम्हारी ये बेहद की बुद्धि में ये बेहद का ड्रामा बैठा है। तुम्हारे सिवाय सारी दुनिया में कोई भी ये बेहद के ड्रामा को नहीं जानते। तुम्हारे में भी फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार ऐसे बच्चे बहुत हैं जिनको इस ड्रामा की डीटेल कुछ भी पता नहीं होती। क्या? उनको कहो ये ड्रामा बेहद का है, इसका चक्कर बताओ क्या है? तो क्या बताएंगे? सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, संगमयुग। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, संगमयुग। वो ही रटते रहेंगे। कुछ और बताएंगे? कुछ डीटेल बताएंगे? डीटेल कुछ नहीं बताएंगे। तो तुम्हारे में भी नंबरवार बच्चे हैं। ऐसे भी हैं जिनको कुछ नहीं आता है। समझा?

तो देखो ये ड्रामा कितना बड़ा है! और इसको समझना भी कितना सहज है! और फिर देखो कितना समझाया जाता है! हँ? तो इसमें धारणा हुई ना? धारणा ऐसी होती है कि इनको बहुत धारण कर-करके देखो, विचार तो करो। कोई धारणा बन करके विजयमाला में पिरोए जाएंगे। हँ? और फिर उनसे कम चले-चले जाओ तो फिर वो जाकरके चांडाल भी बनेंगे। एकदम चांडालों के भी चांडाल, प्रजा के चांडाल। तो देखो फर्क हो जाता है ना? कितना फर्क है! 30.11.1967 के प्रातः क्लास का आठवां पेज। यहां का प्रेसिडेंट देखो। आगे तो महाराजा लोग थे। अभी प्रेसिडेंट, प्राइम मिनिस्टर देखो। और कहां वो एक ऐसा भी होता है, हँ, प्रजातंत्र सरकार में ही होता है। कैसा? वो गटर साफ करने वाला। सरकार का बंदा है कि नहीं? हाँ। तो फर्क हो गया ना? हाँ, ये ज़रूर है कि वहां स्वर्ग में दुख नहीं है। और यहाँ? यहां दुख ही दुख है। बाकि स्वर्ग में प्रजा भी तो ऐसी होगी ना? कैसी? जिसको दुख बिल्कुल कुछ भी? कुछ भी नहीं होगा। सुख ही सुख। बाकि पोजिशन तो सबका होगा ज़रूर। ऐसे नहीं कि सब कोई महाराजा की पोजिशन में माने जाएंगे। होगा? नहीं। पोजिशन तो सब पाते हैं। अरे, पोजिशन के बिगर कोई दुनिया थोड़ेही चल सकती है? नहीं। सबका नाम अलग। ओहदा अलग। आक्यूपेशन अलग। सबको अपना-अपना अलग-अलग मिलता है।

अभी तुम बच्चों को तो चान्स है कि तुम बहुत ऊँचे ते ऊँचा आक्यूपेशन ले सकते हो। तो उसमें फिर तुम्हारी एम-आब्जेक्ट है। तुमने अपना क्या लक्ष्य रखा है क्या बनने का? अब कोई 10-20 आक्यूपेशन थोड़ेही रखेंगे। हाँ, रख सकते हैं, पर क्या उससे कोई कहेगा तुमको कि हम राजा रामराज्य में जाएंगे? देखो, देखो, तुम सब कहते हो हम तो आए ही हैं यहां सत्य नारायण की सच्ची कथा सुनने के लिए। हँ? वहां भक्तिमार्ग में तो झूठी कथा सुनाते हैं। सत्य नारायण का तो कुछ बताते ही नहीं कथा में। तो तुम सत्य नारायण की कथा सुनने के लिए आए हो। यहां राम के राज्य में राज्य करने के लिए तो नहीं आए हो। या समझेंगे कि हम यहां चन्द्रवंशी बनेंगे। ये ऐसे ख्याल से तो नहीं आए हो? (क्रमशः)

A morning class dated 30.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the seventh page on Thursday was about the Subtle Region. It was told that daughters have visions. That is a topic of the Subtle Region. Vision is also of two kinds. One is of the path of Bhakti and one is of the path of knowledge. In the visions of the path of Bhakti they see through closed eyes, just as we see dreams. When the eyes open, then there is no such thing. This vision of the path of knowledge is of the Subtle Region. In this those who are manifest (vyakt) become unmanifest (Avyakt). What happens to whatever is visible to us through these eyes? Hm? Is it visible to everyone? Hm? Is it visible to everyone? Achcha? They are not visible to everyone. Yes. Those who are knowledgeable, they see through the third eye by becoming experts in thinking and churning. So, it is a topic of becoming Avyakt. These who are sinful go and become angels. Sinful in this world. When they get knowledge, when they think and churn, then they develop such subtle stage of mind and intellect that what happens to the contact of mind and intellect with the people of the outside world? It breaks. And when they become experts in this, then later they will become pure deities.

So, this is the indication of angelic stage. What? Hm? Until you become angels you can be visible to everyone through these eyes. Those who make purusharth, those who make efforts. And what happens once you become angels? Those who are knowledgeable, those who are equals in thinking and churning or those who are to become equal will indeed be numberwise. So, they will be visible to them. But there is no such thing as the vision of knowledge of the open eyes in the visions of the closed eyes.

And you have understood as to who are Brahma, Vishnu and Shankar? As regards Shankar; and Baba has explained. Is there any such Shankar who rides on a bull? Hm? Where will animals like bull, etc. come from in the Subtle Region? From where will these come in the Subtle Region? It is said that Shankar lost his heart to Parvati in the Subtle Region. Arey, then the semen that fell on the Earth, scorpions and locusts were born from it. Arey, it has been read from the scriptures, it has been written in the scriptures that Baba tells. These are stories that have been made. Well, well, on the one hand is Parvati and on the other hand is Shankar in the Subtle Region! And that topic of lust! And look, what all have they sat and made! Look, so much madness has been done on the path of Bhakti. All the topics of madness. So, the Father says, doesn’t He that rightly what you become while doing Bhakti! The Father asks. Now you rightly see the difference that how nonsense you have become that whatever anyone says, yes, it is true, this topic is also true. Arey, you have been saying true-4 always on the path of Bhakti.

Now children go on understanding and go on inculcating. And then they also remain in happiness. So, this is not a new thing. Arey, we have become deities innumerable times. Innumerable times. It means that we have become members of the deity kingdom. Achcha, there was a deity kingdom, wasn’t it? And now this definitely exists in the Golden Age only. It will not exist in the false Age, will it? Even if falsehood exists, it is numberwise and even if truth exists, it is numberwise. And if both exist, will there be a dispute or not? Hm? So, this is an Age of disputes and despair. Of fights, quarrels and killings. Look, how the situation is! So, the Father has described about the middle. So, this cycle keeps on rotating. What? From the Golden Age to the Silver Age, from the Silver Age to the Copper Age and then the Iron Age. So, you got the knowledge of this unlimited drama, didn’t you? That drama is limited. So, there is a time of its rehearsal also, isn’t it? And when that broad drama is enacted, then that is different. When the rehearsal completes, then the broad drama is enacted.

So, this is an unlimited drama. In this, after the rotation of the four Ages’ cycle, rehearsal is enabled. Who enables? Arey, the one who enables rehearsal will be the director only who remains behind the curtains, will he not be? So, it has sat in the intellect of you children. This drama keeps on rotating. That small drama also rotates. Hm? It rotates again and again, doesn’t it? It is shown again and again. So, two hours. And look this is unlimited drama. How many years? And that is perishable. Hm? And this is imperishable drama. This rotates as it is again and again. It is never destroyed at all. If anyone asks that brother, when was this unlimited drama formed? So, for this, it will be told that this drama was made now, hm, it was made now in the Purushottam Sangamyug. That is a limited topic of the limited drama. Hm? So, they too have a [fixed] time, don’t they? And there is a time of this unlimited drama as well. They will tell their time to be such and such [time] and advertisement is done for their dramas as well. Brother, look, this new drama has arrived for us to see. Come and see. So, yes, they show, don’t they? By showing songs, etc. Achcha? Then look how this unlimited drama is! It is enjoyable, isn’t it? Daughter, it is an unlimited drama. And now in your unlimited intellect this unlimited drama is sitting. Nobody in the world except you knows about this unlimited drama. Even among you then number-wise, as per your purusharth, there are many such children who do not know about any detail of this drama. What? If you tell them that this drama is unlimited; tell, what is its cycle? So, what will they tell? Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age, Confluence Age. Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age, Confluence Age. They will keep on repeating. Will they tell anything else? Will they narrate any detail? They will not narrate any detail. So, even among you, children are numberwise. There are some such persons also who do not know anything. Did you understand?

So, look, this drama is so big! And it is so easy to understand it as well! And then look you are explained so much! Hm? So, inculcation is involved in it, isn’t it? The inculcation is such that inculcate it a lot and look, just think. Some will inculcate and then get threaded into the rosary of victory. Hm? And then if you go lower than them, then they will go and become Chaandaal (those who assist in preparing the funeral pyre and cremation). Completely Chaandaals of Chaandaals, Chaandaals of the subjects. So, look, a difference arises, doesn’t it? There is such a difference! Eighth page of the morning class dated 30.11.1967. Look at the President of this place. Earlier there were Maharajas (kings). Now look at the President, Prime Minister. And there is one such person also somewhere, hm, he exists in the democratic government only. How? The one who cleans the gutter. Is he a government official or not? Yes. So, there is a difference, isn’t it? Yes, it is certain that there is no sorrow there in heaven. And here? Here there are just sorrows. But in the heaven, the subjects will also be like this, will they not be? How? That they will not experience any? Any sorrows. Happiness and just happiness. But everyone will definitely have a position. It is not as if everyone will be considered to be in the position of a Maharaja. Will they be? No. Everyone gets a position. Arey, can the world continue without positions? No. Everyone’s name is different. Post is different. Occupation is different. Each one gets his/her own, different one.

Now you children have a chance that you can obtain a very highest of all occupations. So, in that then you have an aim-object. What is the target that you have set for yourself to become? Well, will anyone have 10-20 occupations? Yes, they can have, but will anyone tell on the basis of that that I will go to the kingdom of King Ram? Look, look, you all say that we have come here only to listen to the true story of the true Narayan. Hm? There, they narrate the false story on the path of Bhakti. They do not narrate anything about the true Narayan in the story at all. So, you have come to listen to the story of the true Narayan. You have not come here to rule here in the kingdom of Ram. Or you may think that we will become Chandravanshis here. Have you come with any such thoughts? (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2943, दिनांक 16.07.2019
VCD 2943, date 16.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning Class dated 30.11.1967
VCD-2943-Bilingual-Part-2

समय- 17.13-31.01
Time- 17.13-31.01


नाम ही है इनका सत्य नारायण की कथा। किनका? इनका माने किनका? हँ? इनका। इनका माने कोई एक नहीं है। इसका नहीं बोला। इनका। कौन-कौन? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) राम और कृष्ण की कथा है? अच्छा? सत्य नारायण की कथा सुनाते हैं तो राम कृष्ण की कथा सुनाते हैं उसमें? (किसी ने कुछ कहा।) हां, लक्ष्मी-नारायण की कथा। माने दो हैं। लक्ष्मी भी है और नारायण भी है। उसको कहते हैं सत्य नारायण की कथा। ये नहीं कहते सत्य नारायणी की कथा। लक्ष्मी की कथा कहते हैं? नहीं। अभी कथा वो, वो भी सुनी। हँ? भक्तिमार्ग वाली जन्म-जन्मान्तर देखो सुनी। और आधा कल्प तो वो सुनी ही। और ये बाप बैठकरके सच-सच तुमको नर से नारायण बनाते हैं। और तुम ये बात जानकरके यहां आते हो। क्या? कि हम सत्य बाप से, क्या, सत्य युग के नारायण जैसे बनेंगे। तो वो छोटी कथाएं होती हैं। हाँ, तो फिर उसको क्या कहेंगे? वो झूठी कथाएं। छोटी-छोटी कथाएं। और ये तो बेहद की कथा है। हँ? इस कथा को सुनते-सुनते तुम्हें कितना टाइम होता आया? कितना टाइम होता गया? हँ? वो कथाएं तो आधा घंटा, एक घंटा, पंडितजी आके सुना-सुनु के और खीर-पूड़ी खाके भाग जाते हैं। हँ? ये कथा तुम कितने समय से सुनते आए हो? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। अस्सी साल हो गए।

तो सत्य नारायण जब होता है ना? कब होता है? हँ? सत्य नारायण होता है कब? जब पूर्णिमा होती है। क्या? पूर्ण मां। माना मां भी पूर्ण होती है। हँ? और सिर्फ मां पूर्ण होती है? मां पूर्ण होती है तब ही तुम सत्य नारायण की कथा सुनते हो। हँ? बस। फिर सत्य नारायण कथा। अब कितनी कथाएं तुमने सुनीं होंगी! और वो कथाएं तो सुनी होंगी ना? हँ? तो 500 बरस में कितनी दफा, 5000, ढ़ाई हज़ार वर्ष में कितनी कथाएं सुनी होंगी। बड़ी आयु होगी। तो हर पूर्णमासी यानि हर महीने कथा सुनते आए हो। फिर जन्म-जन्मान्तर सुनते आए हो। और वो झूठी कथाएं सुनते-सुनते देखो तुम्हारा क्या हाल हो गया? सुनते-सुनते ये बन गए हो। क्या बन गए हो? हँ? ये क्या? हँ? अरे, तुम हीरे समान जन्म लिया था, हीरा बने थे और अब ये झूठी कथाएं सुनते-सुनते कौड़ी मिसल बन गए हो। कौड़ी मिसल बन गए हो? हँ? कैसे कहें कौड़ी मिसल? हँ? वो तो वो एक बैल वाला होता है। वो झूल डाल देता है बैल के ऊपर और उसमें कौड़ियां ही कौड़ियां लगी होती हैं। उसके मुख में भी कौड़ियां, उसके पेट में भी कौड़ियां। टांगों में भी कौड़ियां, पूंछ में भी कौड़ियां लगा देते हैं। हँ? तुमको कैसे कहें कि कौड़ी बन गए? हँ? कैसे कहेंगे? झूठा बोल दिया?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सच्चा कैसे बोल दिया? हँ? क्या? कैसे सच्चा बोल दिया? अरे, तुम आत्मा हो ना? तुम्हारी मन-बुद्धि रूपी आत्मा में वो कौड़ी ही ज्यादा याद आती रहती है। हँ? कि जो हीरे समान है हीरो पार्टधारी वो हर समय याद आता है? हँ? वो तो नहीं याद आता।

ये बाबा बैठकरके सब बच्चों को समझाते हैं, तुम क्या-क्या करते आए हो। क्योंकि वो सब बातें समझाएंगे ना? अरे, ऐसे नहीं कि प्रेजंट में तुम्हारी क्या हालत है वो ही बताएंगे। पास्ट, प्रेजेन्ट, फ्यूचर, सब समझाएंगे। समझाएंगे ना? आदि, मध्य और अंत- ये तो समझाया ना? जो भी सन्यासी हैं, अभी किसी से भी जाकरके पूछो विद्वान, पंडित, आचार्य से क्योंकि अगर परंपरा से ये ज्ञान चलता आता होता तो बहुत तुमको समझाते ना? सृष्टि के आदि, मध्य, अंत की कहानी बताते ना? जाओ। कोई राजा के पास देखो। कोई सन्यासी के पास देखो। हँ? कोई शास्त्रकार के पास उसके शास्त्रों में देखो। नहीं, बाबा कहते हैं बच्चों ये तो हम तुमको ज्ञान सुनायकरके ज्ञान प्रायःलोप जो हो जाता है, विनाश हो जाता है; प्रायः माना पूरा लोप नहीं होता। कुछ न कुछ शास्त्रों में आटे में नमक मिसल रहता है। तो विनाश तो हुआ ना? हाँ। तो वो शास्त्रों में से सार-सार की बातें बाप निकालकरके तुमको समझाते हैं। हँ? फिर तो ये ज्ञान ही लोप हो जाता है। विनाश हो जाता है। और तुम जाकरके राजाई पद प्राप्त करते हो। फिर ज्ञान सुनने की क्या दरकार? पढ़ाई कब तक के लिए होती है? अरे, पढ़ाई तब तक के लिए होती है जब तक पद, मर्तबा नहीं मिला। मर्तबा मिल गया फिर उस मर्तबे के लिए पढ़ाई पढ़ेंगे क्या? अगर पढ़ेंगे भी तो उससे भी जो ऊँचा मर्तबा होगा उसके लिए पढ़ाई, पढ़ाई पढ़ेंगे।

और तुमको तो देखो एम-आब्जेक्ट ही दे दिया। क्या? ऊँच ते ऊँच एम-आब्जेक्ट दे दिया। क्या एम-आब्जेक्ट? विश्व का बादशाह बनते हो। उससे ऊँच तो मर्तबा कोई दुनिया में और होता ही नहीं। पीछे ये जो भी तुमको सुनाते हैं; ये जो नॉलेज तुमको सुनाते, हँ, वो फिर मर्तबा प्राप्त करते हो तो ये सब नॉलेज धीरे-धीरे भूल जाते हो। सतयुग में ये नॉलेज वहां होती नहीं है। इस तरह से ये जो नॉलेज तुम यहां पढ़ते हो, आने वाले जिज्ञासुओं को बोलो। तुम बैरिस्टर, वकील, फलाना-ढिकाना बनने के लिए पढ़ते हो ना? बोलो। अरे, ये तो सभी खत्म हो जाती है। ड्रामा में कोई वो ही थोड़ेही बातें फिर, हँ, फिर-फिर कोई इस समय रिपीट होंगी? हाँ, रिपीट करेंगे, जब पूरा टाइम होगा तब करेंगे। देखो, कोई बैरिस्ट्री पढ़ेगा। कोई डॉक्टरी पढ़ेगा। कोई अस्पताल होगी। हँ? तो वहां कोई सजा खाएंगे? वहां तो ऐसे-ऐसे नहीं होता। होता है? हँ? नहीं। और जेल होंगे वहां? न वहां की जो नई दुनिया में न जेल होगी, न सज़ाएं खाएंगे, न हॉस्पीटल होंगे। कुछ भी नहीं होंगे। तब ही तो कहा जाता है कि ये तुम-तुम अभी तुम गर्भ महल में जाएंगे। हाँ। फाउण्डेशन ही तुम्हारा कहां होगा? गर्भ महल का या गर्भजेल का? और इस दुनिया में क्या होता है? गर्भजेल होती है ना? हाँ। त्राहि-त्राहि करते हैं। हमको निकालो बाहर। हाँ। पैदा होते हैं तो भी रोते-रोते या जैसे स्वर्ग में बच्चे पैदा होते हैं ऐसे पैदा होते? नहीं, रोते-रोते पैदा होते हैं।

तो अभी तुम तो तैयारी कर रहे हो गर्भ महल में जाने के लिए। वहां कोई सजा-वजा थोड़ेही रहती है? हँ? वो सजा-वजा, हिसाब-किताब तो यहां ही आराम से तुम्हारा चुक्तु हो जाता है। परन्तु टाइम से तो आना ही पड़ता है ना बच्चे। तो बाप कहते हैं कभी भी तुम गर्भ जेल में भी सजा नहीं खाएंगे। हँ? ये जो गोर्मेन्ट की जेल है ना, उनमें भी सजा नहीं और फिर जो शरीर छोड़ेंगे फिर भी सजा नहीं। अरे, सजाएं तो एकदम बंद। क्योंकि सजाओं से तुम लिबरेट हो जाते हो। सजा मुक्त। अर्थात् उन जेल की यातनाओं से लिब्रेशन। ओमशान्ति। (31.01) (समाप्त)

The name of these (inka) itself is the story of Satya (true) Narayan. Whose? ‘These’ (inka) refers to whom? Hm? These. These means it is not one. It was not said ‘this’. These. Who all? Hm?
(Someone said something.) Is it a story of Ram and Krishna? Achcha? When people narrate the story of Satya Narayan, do they narrate the story of Ram and Krishna in it? (Someone said something.) Yes, the story of Lakshmi-Narayan. It means there are two. There is Lakshmi as well as Narayan. It is called the story of true Narayan. It is not called the story of true Narayani. Is it called the story of Lakshmi? No. Now you have heard that, that story as well. Hm? Look, you have seen, heard the story of the path of Bhakti birth by birth. And you have indeed heard that one for half a Kalpa. And this Father sits and truly makes you Narayan from nar (man). And you come here by knowing this topic. What? That we will become like the Narayan of the Satya Yug (Age of truth) from, what, the true Father. Those stories are small ones. Yes, so, then what will that be called? Those false stories. Small stories. And this is an unlimited story. Hm? How much time has passed for you while listening to this story? How much time has passed? Hm? The Punditji (Hindu priests) comes and narrates those stories for half an hour, one hour and eat Kheer-Poori (Indian delicacies) and run away. Hm? Since how long have you been listening to this story? (Someone said something.) Yes. It has been 80 years.

So, when the true Narayan exists, doesn’t he? When does he exist? Hm? When does the true Narayan exist? It is when the full Moon (Poornima) arrives. What? Poorn ma. It means that the mother (ma) also becomes complete (poorn). Hm? And does the mother alone become complete? You listen to the story of Satyanarayan only when the mother becomes complete. Hm? That is it. Then the story of the true Narayan. Well, you must have heard so many stories! And you must have heard those stories, didn’t you? Hm? So, you must have heard so many times in 500 years, you must have heard so many stories in 5000, 2500 years! You will be long-lived. So, every full-Moon day, i.e. every month you have been listening to the story. Then you have been listening birth by birth. And while listening to those false stories, look, what condition you have reached? You have become this while listening. What did you become? Hm? What this? Hm? Arey, you had got a diamond-like birth, you had become a diamond and now while listening to these false stories you have become like cowries (shells). Have you become like cowries? Hm? How can we say like cowries? Hm? There is one person with a bull. He hangs a cloth across the bull [on his back] and there are just cowries (shells) attached to it. There are cowries on his head also, there are cowries on his stomach also. They hang cowries on its legs also; they hang cowries on its tail also. Hm? Hm? How can we say that you have become like cowries? Hm? How will you say? Did He speak lies?
(Someone said something.) Yes, how did He speak the truth? Hm? What? How did He speak the truth? Arey, you are souls, aren’t you? That cowrie alone keeps on coming to your mind and intellect-like soul. Hm? Or does the diamond-like hero actor come to the mind always? Hm? He doesn’t come to the mind.

This Baba sits and explains everything to the children as to what all you have been doing. It is because He will explain all those topics, will He not? Arey, it is not as if He will narrate only about your present condition. He will explain everything including the past, present and future. He will explain, will He not? Beginning, middle and the end – This was explained, wasn’t it? All the sanyasis, well, if you go and ask any scholar, pundit, teacher (acharya) because if this knowledge had been continuing as a tradition, then many people would have explained to you, wouldn’t they have? They would have narrated the story of the beginning, middle and end of the world, wouldn’t they? Go. Look with any king. Look with any sanyasi. Hm? Look at any writer of the scriptures in his scriptures. No, Baba says, children, after I narrate this knowledge to you, this knowledge almost disappears (praayahlop), gets destroyed; ‘Praayah’ means that it does not disappear completely. It remains to some extent or the other in the scriptures just like a pinch of salt in wheat flour. So, it was destroyed, wasn’t it? Yes. So, the Father extracts those topics of essence from the scriptures and explains to you. Hm? Then this knowledge disappears. It is destroyed. And you go and achieve the post of kingship. Then where is the need to listen to the knowledge? For how long do the studies continue? Arey, the studies are for such a period until you achieve the post. Once you got the post, will you study for that post? Even if you study, then you will study for a post higher than that.

And look, you have been given an aim-object. What? Highest of all aim-object has been given. What aim-object? You become the emperor of the world. There is no other post higher than that in the world at all. Later whatever is narrated to you, this knowledge that is narrated to you, hm, then when you achieve that position, then you gradually forget all this knowledge. This knowledge doesn’t exist in the Golden Age. This knowledge that you study here, tell the students who come here – You study to become Barristers, Advocates, etc., don’t you? Tell. Arey, all these perish. Will those topics repeat at this time in the drama again and again? Yes, you will repeat, you will repeat when the time is completed. Look, someone will study Barristers’ course. Someone will study doctors’ course. There will be a hospital. Hm? So, will anyone suffer punishment there? Such things don’t happen there. Does it happen? Hm? No. And will there be jails there? Neither will there be jails in the new world nor will anyone suffer punishments, nor will there be hospitals. Nothing will exist. Only then is it said that you, you will now go to the womb-like palace. Yes. Where will be your foundation itself? Womb-like palace or womb-like jail? And what happens in this world? There is womb-like jail, isn’t it? Yes. They cry in despair. Take us out from here. Yes. Even when they are born, are they born while crying or do they get birth in the way children are born in heaven? No, they are born crying.

So, now you are making preparations to go to the womb-like palace. Is there any punishment, etc. there? Hm? That punishment, karmic account of yours gets cleared comfortably here. But children, you have to come as per your time, will you not? So, the Father says that you will never suffer punishments even in the womb-like jail. Hm? This jail of the government is there, isn’t it? You will not get punishment in that also and then you will not suffer punishment even when you leave the body. Arey, the punishments will end completely. It is because you get liberated from punishments. Free from punishments. It means liberation from the tortures of that jail. Om Shanti. (31.01) (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2944, दिनांक 17.07.2019
VCD 2944, dated 17.07.2019
प्रातः क्लास 30.11.1967
Morning Class dated 30.11.1967
VCD-2944-Bilingual

समय- 00.01-24.30
Time- 00.01-24.30


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.11.1967. गुरुवार को आठवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी गर्भ जेल की। इस पुरानी दुनिया में तो गर्भ में भी जेल भोगते हैं। और बाप तो कहते हैं कि तुम नई दुनिया में गरभ में भी कोई सजा नहीं खाएंगे। ये जो गोर्मेन्ट की जेल हैं उनमें भी सजा नहीं है। हँ? कौनसी गोर्मेन्ट के? रूहानी गोर्मेन्ट के जेल हैं ना? हँ? कौनसे जेल? हँ? अरे, सरेन्डर हैंड्स कहां पड़े हुए हैं? हँ? जेल में हैं कि नहीं हैं? जेल में हैं। लेकिन सजा तो नहीं भोग रहे हैं? और फिर जो शरीर छोड़ेंगे; ये पुराना शरीर है ना? छोड़ेंगे। तमोप्रधान शरीर छोड़ेंगे। फिर भी सजा नहीं। तो देखो सजा एकदम बंद। तो सजामुक्त। हँ? सजाओं से लिबरेट हो जाते हो। अर्थात् दुख से मुक्त हो जाते हो। तो गायन आते हैं ना भक्तिमार्ग में यादगार।

देखो, यहां से तुमको बहुत तारें भी बतावेंगे कि पोप आया था। उनको भी तार दिया था ना? कि ये आकरके सुनो। वो जो लिब्रेटर है ना सुप्रीम सोल, हैविनली गॉड फादर, गाइड है, और वो आए हैं। तुम भी आकरके ये सभी सीखो। भारत का प्राचीन राजयोग है ना? तो तारों में इतनी लंबी-लंबी तारें देते रहते हैं। और यहां तो अपना फर्ज है ना? तो आखरीन में जब समय आएगा विनाश का तो फिर उनको ये याद आएगा ना? क्या याद आएगा? हँ? अरे? अभी-अभी सुनते जाते, भूलते जाते। क्या याद आएगा? हँ? हत् तेरा भला हो। हाँ, एक अक्षर लिखो भाई। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) जेल याद आएगी? (बाबा हंसे।) अरे, ये तारें याद आएंगी उनको कि हमको किसी ने तार दिये थे। हाँ।

जैसे बाबा कहते हैं कोई भी पाप मनुष्य करते हैं तो वो पाप उनको कोई भूलते थोड़ेही हैं। नहीं। भले बच्चे बाबा के पास दे आते हैं, दे जाते हैं। ये बाबा ये ले लियो। हम हल्का हो जाएंगे। हँ? अपने पाप पोतामेल में बाबा को दे देते हैं ना? हाँ। पर हल्का कहने मात्र होता है। बाकि वो, वो सजाओं से हल्का हो जाते हैं। आधा माफ हो जाता है। बाकि ऐसे तो नहीं है कि कोई भूल जाते हैं। नहीं। कोई को तीन-तीन बरस से, कोई चार बरस से लेकरके पिछाड़ी तक का, जो भी कुछ कर्म करते हैं वो सब उनको याद रहता है। और वो अच्छे करम हों या बुरे करम हों। 30.11.1967 की प्रातः क्लास का नौवां पेज। दूसरी लाइन। तो देखो, ऐसा कोई भी नहीं होगा। मेरे ध्यान में भी कोई नहीं होगा। कोई होगा शायद जो उनको 5-6 बरस के बाद मालूम पड़ता होगा। ये बाबा को तो मालूम है कि शायद अढाई, तीन बरस से लेकरके बाबा को मालूम है सब। समझा ना? क्योंकि गांवड़ों में भटकता था ना बच्ची? हँ? और छोटेपन में तो मां तो मर गई। हाँ। समझा ना? बाकि बाप सो बच्चे पकड़करके, लेकरके सो भी कोई है ना अभी। अपना जनम भी ये, ये जाना और बाबा ने सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, उसका भी समाचार सुनाया। उन युगों में इतने-इतने जनम पास किये। बाकि हां, इस जनम की प्रैक्टिकल में एक्यूरेट याद रहती है। और जन्मों को याद थोड़ेही रहती है। उसी तरह याद रहती है क्या जैसे इस जनम में याद रहती 3-4 साल की? इतना समझ गए कि बरोबर ऐसे-ऐसे जन्म लेते आए हैं। और इसको तो पूरा मालूम है। किसको? हँ? ब्रह्मा बाबा को, हँ, कि मैं तो पूरा एक्यूरेट 84 जन्म लिया है एकदम पूरा। तत् त्वम्। क्योंकि तुम भी मेरे साथ पढ़ते हो ना?

तो कितना मजे की पढ़ाई है ये। अच्छी पढ़ाई है। और कैसे अच्छी तरह से पढ़ना भी चाहिए। दैवी गुण भी धारण करना चाहिए। और फिर खाली भी हो जाना चाहिए। देखो, ये खाली है ना? बाबा को क्या पड़ेगा? हँ? अरे, बुद्धि में कुछ याद रहता है? पैसा याद पड़ेगा? नहीं। पैसा अब कहां याद पड़ेगा? है कुछ? अरे, कुछ भी नहीं है। जो भी रहा बचा था, वो इन बच्चियों के हवाले कर दिया। तो ये तो शिवबाबा को देते हैं। अरे, कोई हमको थोड़ेही देते हैं? अब शिवबाबा को देते हैं तो शिवबाबा कोई भूखा है, हँ, तुम्हारे पैसों का? बिल्कुल नहीं। कोई भी कहते हैं ना मैं शिवबाबा को देता हूँ। तो वो-3 बाबा को कंगाल समझते हैं। ऐसे बोलते हैं तभी तो। शिवबाबा को कंगाल समझते हैं क्या? अरे? जो विश्व का मालिक बनाते हैं। हँ? तो कई-कई होते हैं ना ऐसे? वो समझते हैं कि हमने शिवबाबा को दे दिया। और तुम्हारा सौदा तो शिवबाबा के साथ है ना? इनका सौदा थोड़ेही है? किनका? इनका माने किनका सौदा नहीं है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा का? कुछ नहीं लिखा? ब्रह्मा बाबा बताया? ब्रह्मा बाबा के लिए इनका कहा जाएगा? ओहो? ड्रामा सुनते-सुनते कितना टाइम हो गया। इनका, इसका, ये क्या अंतर होता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा का और प्रजापिता ब्रह्मा का। हँ? इनके साथ तुम्हारा सौदा नहीं है ना? क्या? ब्रह्मा के साथ और प्रजापिता ब्रह्मा के साथ तुम्हारा लेन-देन का सौदा है? कि शिवबाबा के साथ है? अरे? हाँ, शिवबाबा के साथ है।

और इन्होंने भी तो शिव को सारा दे दिया ना? क्या? एक ने दे दिया कि दोनों ने दे दिया? हँ? ब्रह्मा ने भी तो प्रजापिता ब्रह्मा ने भी दे दिया ना? तो हमको वर्सा तो अब शिव से लेना है ना? हँ? इन्होंने भी दे दिया। तुम बच्चों ने भी शिवबाबा को देते हैं। तो जिसको देते हैं उससे ही लेना है। हाँ। तो जिससे वर्सा लेना है उनके लिए कहना कि हमने दिया। भई पांच सौ दिया, हज़ार दिया, दस हज़ार, बीस हज़ार दिया। अरे, उनको दिया या तुमने लिया? हँ? देखो, ये बड़ा हिसाब है। हम अभी आते हैं शिवबाबा के पास। आते हैं ना यहां? शिवबाबा को हम जाकरके और पांच रुपया देते हैं। हम इनसे पांच करोड़ रुपया ले लेंगे। तो ये बात तुम बच्चों को दिल में अंदर आना चाहिए। क्या? कि बाप जितना रिटर्न देते हैं उतना रिटर्न और कोई दे नहीं सकता। बाप या शिवबाबा? कौन रिटर्न देते हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिवबाबा जितना रिटर्न; बाप कहां रिटर्न, न लेता है। वो तो बिन्दी बाप। वो लेता है? किसके थ्रू लेता है? हाँ, शिवबाबा माने साकार में प्रवेश करने की बात। तो ये दिल में अन्दर में आना चाहिए कि हम तो, हँ, किसलिए देते हैं? हँ? कई गुना लेने के लिए। अरे, तुम बैंक में इस दुनिया में जमा करते हो तो कितना देते हैं? अभी तो ब्याज भी कम करते जाते हैं। हँ? कुछ भी नहीं जैसे। जितना ब्जाज कम करते जाते उससे ज्यादा महंगाई बढाते जाते हैं। तो तुमको तो फायदा हो रहा है उस दुनिया में देने से या नुकसान हो रहा है? नुकसान ही नुकसान। और ये तो पांच रुपया तुम देते हो और बदले में पांच करोड़।

तो ये बात दिल में रहनी चाहिए। और फिर जो जिनकी बुद्धि में ज्ञान पूरा नहीं है वो समझते हैं कि हम शिवबाबा को जाकरके पचास रुपया देते हैं। 500, 1000, सौ रुपया देते हैं। हँ? और जो हम देते हैं फिर बाप वो हमको नहीं देंगे। नहीं। हम तो कभी भी ऐसा नहीं करेंगे। तो तुम बच्चों को दिल में अंदर ये नहीं आना चाहिए। अरे, भूले चूके भी ऐसी बात नहीं आनी चाहिए कि तुम कोई देते हैं बाबा को। अरे, पांच देते हैं, दस देते हैं कि पचास देते हैं। हँ? ये तो हरेक जैसे होते हैं नहीं, हँ, हम तो बाबा से, बाबा से लेने के लिए देते हैं। सब दे देऊँ। फिर तो बस फिर सारी बादशाही हमारी हो जावेगी। तो नशा आना चाहिए ना? हँ? किस बात का? कि जो दिया है वो हम बाबा से कई गुना जितना, जितना रिटर्न कोई दे ही नहीं सकता। तन दिया, धन दिया, हँ, और दुनियादारी के मन के संकल्प दिये; तो जो कुछ दिया है तुमने टटपुंजिया, हँ, वो ये बुद्धि में रहेगा कि हम लेने के लिए देते हैं। तो उसका नशा रहेगा। नशा है ना? हँ? नशे वाला है तो सही ना?

ये सामने जिनमें प्रवेश किया है; हँ? जिनमें। जिनमें या जिसमें? जिनमें प्रवेश किया है। किनमें प्रवेश किया है? वो तथाकथित ब्रह्माकुमार-कुमारी क्या समझेंगे? हँ? वो समझेंगे कि सिर्फ ब्रह्मा बाबा में प्रवेश किया। अरे, नहीं। मैं तो बोलता हूँ ना? मुकर्रर रथ भी लेता हूँ। और फिर टेम्परेरी रथ भी लेता हूँ। ये ब्रह्मा बाबा क्या हुआ? टेम्परेरी रथ हुआ ना? हाँ। तो ये ब्रह्मा बाबा टेम्परेरी रथ। और एक मुकर्रर रथ भी है जिसमें प्रवेश किया है। तो जिनमें प्रवेश किया है वो उनको नशा तो है ना? नहीं है? हाँ, वो नशा वाला तो है ना? क्या ये, ये क्या है? ये 5 लाख रुपया, 10 लाख, 15 लाख, ये सब क्या है? अरे, ये तो कुछ भी नहीं है। ये तो ठीकरी है ठीकरी। अरे, हम तो क्या बनते हैं? हम तो विश्व के बादशाह बनते हैं। हां। हम तो बनते हैं, ये किसकी तरफ से बोला? हँ? शिवबाप ने अपने लिये बोला? हँ? किसके लिए बोला? वो ही ब्रह्मा के लिए और प्रजापिता ब्रह्मा। तो विश्व की बादशाही प्रजापिता ब्रह्मा को मिलेगी या शरीर छोड़ने वाले दादा लेखराज ब्रह्मा को मिलेगी? फिर हमने क्यों कह दिया? हँ? बताओ। जिनमें प्रवेश किया है दोनों को विश्व की बादशाही मिलेगी? मिलेगी नहीं, लेकिन ब्रह्मा बाबा ऐसे समझते हैं कि नई दुनिया होगी वो भी विश्व होगी। ये तो नहीं समझते कि वो कोई वहां कोई विश्व धरम होंगे क्या? वहां तो विश्व धरम नहीं होंगे। हाँ, विश्व धर्मों की आधारमूर्त और बीजरूप आत्माएं होंगी। उनकी संख्या तो बहुत थोड़ी होगी। हाँ।

तो बाबा को समझ में नहीं आया। विश्व का मालिक बनते हैं। रिकार्ड चलाय दिया। आजा आजा प्रेम दुलारे आना ही होगा। तो ऐसे नहीं है कि एकदम ऐसे ही नहीं कि एकदम गिराय देना। क्योंकि आपस में भी कभी ऐसे हो जाते हैं ना? तो फिर पढ़ाई छोड़ देते हैं। हँ? आपस में जो पढ़ने वाले बच्चे हैं ना या पढ़ाने वाले साथ में जो सहयोगी टीचर्स हैं ना बाबा के वो क्या करते हैं? धक्का मार देते हैं। तो बाहर चले जाते हैं। छोड़ देते हैं पढ़ाई। तो ऐसे नहीं कि आपस की लड़ाई में तुम पढ़ाई छोड़ दो। हँ? पढ़ाई और याद, ये दो बातें तो बिल्कुल नहीं छोड़नी है। हँ? पढ़ाई भी पढ़ते रहना और? और? और बाबा को याद भी करते रहना। हाँ, बस इन्हीं बातों से तुमको सब कुछ मिलता है। जितनी पढ़ाई पढ़ेंगे उतना गहराई से बापदादा को, शिवबाबा को पहचानेंगे। और जितना-जितना पहचानते जावेंगे उतना याद भी आवेगी। क्या? कम पहचान होगी तो याद भी कम होगी। तो जितना पढ़ाई पढ़ेंगे ये ईश्वरीय ज्ञान की उतना फायदा ही फायदा है। जिस बाबा से तुमको मिलता है ना सब कुछ।

हैलो, मधुबन से बापदादा मीठे-मीठे सभी सेन्टर्स के ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुलभूषण, चक्रधारी, स्वदर्शन चक्रधारी, सर्विसेबुल, रूहानी बच्चों के प्रति रूहानी बाप व दादा का आज गुरुवार के दिन सिक व प्रेम से, जान से याद प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बच्चों के प्रति रूहानी बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से यादप्यार। रूहानी बच्चों के प्रति कहते हैं। रूहानी बाप। दादा से पहले रूहानी नहीं लगाते। क्यों नहीं लगाते? हँ? क्योंकि इनको तो जब तक संपूर्ण स्टेज नहीं बनती, पुरुषार्थी हैं तो देहभान आता रहता है कि नहीं? हाँ। तो रूहानी तो नहीं कहेंगे। तो दादा का भी दिल व जान, सिक व प्रेम से याद प्यार। ओमशान्ति। (24.30) (समाप्त)

A morning class dated 30.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the eighth page on Thursday was of the jail-like womb. In this old world people suffer like a jail in the womb also. And the Father says that you will not suffer any punishment in the womb in the new world. There are no punishments even in the government’s jail. Hm? Of which government? There are jails of the spiritual government, aren’t they there? Hm? Which jails? Hm? Arey, where are surrender hands living? Hm? Are they living in a jail or not? They are in a jail. But are they suffering punishments? And then those who will leave the bodies; this is an old body, isn’t it? They will leave it. They will leave the tamopradhan (degraded) body. However, there is no punishment. So, look, the punishment will stop completely. So, free from punishments. Hm? You are liberated from punishments. It means that you become free from sorrows. So, there are praises, memorials on the path of Bhakti, aren’t they there?

Look, here you will find many telegrams informing you about the visits of the Pope. You had sent telegrams to him also, didn’t you? That come and listen to this. The one who is the liberator, isn’t He, the Supreme Soul, the Heavenly God Father, the Guide, and He has come. You also come and learn all this. This is India’s ancient Rajyog, isn’t it? So, in the telegrams, you keep on giving you keep on sending such long telegrams. And here it is our duty, isn’t it? So, ultimately, when the time of destruction comes, then they will remember this, will they not? What will they remember? Hm? Arey? Just now you go on listening and go on forgetting. What will they remember? Hm? Damn, God bless you. Yes, write one alphabet brother. Hm?
(Someone said something.) Will they remember the jail? (Baba laughed.) Arey, they will remember these telegrams that someone had sent us telegrams. Yes.

For example, Baba says – If human beings commit any sin, then they don’t forget those sins. No. Although children come and give to Baba. Baba, take this. I will become light. Hm? You give your sins in the potamail (life history) to Baba, don’t you? Yes. But it becomes light for name sake. But they, they become light from punishments. Half of it is pardoned. But it is not as if someone forgets. No. Some people remember all the actions that they have performed from the age of three years, four years till the end. And be it good actions or bad actions. Ninth page of the morning class dated 30.11.1967. Second line. So, look, there will not be any such person. There will not be anyone in my knowledge also. There must be someone who perhaps knows about the happenings from the age of 5-6 years. This Baba knows that perhaps from the age of two and a half years, three years Baba knows everything. You have understood, haven’t you? It is because I used to wander in the villages, didn’t I daughter? Hm? And the mother died when I was young. Yes. You have understood, haven’t you? The Father caught hold of the children; some exist even now, don’t they? You came to know about your birth also and Baba narrated the news of the Golden Age, the Silver Age, the Copper Age, the Iron Age also. You have passed through these many births in those Ages. But yes, you have accurate remembrance of this birth in practical. You don’t have memory of the other births. Do you remember in the same way as you remember in this birth from the age of 3-4 years? You have understood to the extent that rightly you have been getting births like this. And this one knows completely. Who? Hm? Brahma Baba, hm, that I have got complete accurate 84 births. Tat twam (so have you). It is because you study with me, don’t you?

Arey, this is such an enjoyable study. It is a good study. And you should also study it very nicely. You should also inculcate divine virtues. And then you should become empty also. Look, this one is empty, isn’t he? What will Baba need? Hm? Arey, does he remember anything in his intellect? Will he remember money? No. How will money come to the mind now? Is there anything? Arey, nothing is there. Whatever was remaining, he entrusted to these daughters. So, this one gives to ShivBaba. Arey, does anyone give to me? Well, if they give to ShivBaba, is ShivBaba hungry for your money? Not at all. Some say, don’t they that I give to ShivBaba? So, they, they, they consider Baba to be pauper (kangaal). Only then do they say so. Do you consider ShivBaba to be pauper? Arey? The one who makes you master of the world. Hm? So, there are many such ones, aren’t they there? They think that we gave to ShivBaba. And your deal is with ShivBaba isn’t it? Is it a deal of these (inka)? Whose? ‘Inka’ (these) means with whom do you not have a deal? Hm? (Someone said something.) Of Brahma Baba? Did you not write anything? Did you mention Brahma Baba? Will ‘inka’ (these) be said for Brahma Baba? Oho! It has been such a long time listening to drama! What is the difference between inka (these), iska (this one)? Hm? (Someone said something.) Of Brahma and Prajapita. Hm? Don’t you have a deal with these? What? Is your deal of give and take with Brahma and with Prajapita? Or is it with ShivBaba? Arey? Yes, it is with ShivBaba.

And these also gave entirely to Shiv, didn’t they? What? Did one give or did both of them give? Hm? Brahma as well as Prajapita gave, didn’t they? So, now we have to obtain inheritance from Shiv, will we not? Hm? These also gave. You children also give to ShivBaba. So, you have to obtain from the one whom you give. Yes. So, the one from whom you have to obtain inheritance, tell for them that we gave. Brother, you gave five hundred, thousand, ten thousand, twenty thousand. Arey, did you give to them or did you obtain? Hm? Look, this is a big calculation. Now we come to ShivBaba. We come here, don’t we? We go and give five rupees to ShivBaba. We will get five crores from them. So, this topic should remain in the hearts of you children. What? That nobody can give as much returns as the Father gives. Father or ShivBaba? Who gives returns?
(Someone said something.) Yes, the extent to which ShivBaba gives returns; does the Father give returns? Neither does He take. He is a point-like Father. Does He take? Through whom does He take? Yes, ShivBaba means the topic of entry in a corporeal. So, it should strike your heart that why do we give? Hm? To obtain multifold. Arey, even when you deposit in the banks in this world, how much do they give? Now they keep on reducing the interest also. Hm? It is as if nothing. The more they reduce the interest, they keep on increasing inflation much more than that. So, are you getting benefit by giving in that world or are you suffering loss? There is just loss. And you give these five rupees and get five crores in return.

So, this topic should be in your heart. And then those whose intellects do not have complete knowledge think that we go and give fifty rupees to ShivBaba. We give 500, 1000 rupees. Hm? And whatever we give, then the Father will not give to us. No. I will never do such thing. So, you children should not get such a thought in your heart. Arey, such topic should not come to your mind even by mistake that you give to Baba. Arey, you give five, you give ten or fifty. Hm? It is as if everyone is not alike, hm, we give to Baba to obtain from Him. I should give everything. Then, that is it, the entire emperorship will be ours. So, you should feel intoxicated, shouldn’t you? Hm? In which topic? That whatever we have given, we will get many folds from Baba; nobody can give as much returns as Him at all. You gave body, you gave wealth, hm, and you gave worldly thoughts of the mind, so, whatever worthless you gave, hm, it will be in your intellect that we give in order to take. So, you will feel its intoxication. You have the intoxication, don’t you? Hm? You are rightly the intoxicated ones, aren’t you?

The ones in front in whom I have entered; hm? In ones in whom (jinme). The ones in whom (jinme) or the one in whom (jisme)? The ones in whom I have entered. In whom have I entered? What will those so-called Brahmakumar-kumaris think? Hm? They will think that He entered in just Brahma Baba. Arey, no. I speak, don’t I? I take the permanent Chariot as well. And then I take the temporary Chariot as well. What is this Brahma Baba? He is a temporary Chariot (mukarrar rath), isn’t He? Yes. So, this Brahma Baba is a temporary Chariot. And there is one permanent Chariot as well in whom I have entered. So, the ones in whom I have entered, they have the intoxication, don’t they? Don’t they have? Yes, he has that intoxication, doesn’t he? What this, what is this? What is all this, five lakh rupees, ten lakhs, fifteen lakhs? Arey, this is nothing. This is just a stone, a stone. Arey, what do we become? We become emperors of the world. Yes. We become; on behalf of whom did He say? Hm? Did Father Shiv say for Himself? Hm? For whom did He say? For the same Brahma and Prajapita Brahma. So, will Prajapita Brahma get the emperorship of the world or will Dada Lekhraj Brahma who left the body get it? Then why did He say ‘we’ (hamne)? Hm? Speak up. Will both of them in whom He has entered get the emperorship of the world? Both will not get, but Brahma Baba thinks that the new world will also be a world. He doesn’t understand that will the world religions exist there? World religions will not exist there. Yes, the base-like souls and the seed-form souls of the world religions will be there. Their number will be very less. Yes.

So, Baba did not understand. We become masters of the world. The record (song) was played. Aaja aaja prem dulare, aana hi hoga (come, come O beloved! You will have to come). So, it is not as if immediately, it is not as if you have to make them fall immediately. It is because it happens between people like this, doesn’t it? So, then they leave the studies. Hm? The children who study with each other, aren’t they there or the helper teachers of Baba who teach, don’t they, what do they do? They push. So, they go out. They leave the studies. So, it is not as if you leave the studies due to mutual fights. Hm? Studies and remembrance, these two topics should never be left. Hm? You should also keep on studying and? And? And you should continue to remember Baba. Yes, that is it; you get everything through these topics only. The more you study, the more deeply you will recognize BapDada, ShivBaba. And the more you go on recognizing, the more you will be able to remember. What? If the recognition is less, then the remembrance will also be less. So, the more Godly knowledge you study, the more benefit you reap. You get everything from that Baba, don’t you?

Hello, BapDada from Madhuban, to Brahma’s sweet, sweet mouth born progeny, gems of the Brahmin clan, chakradharis, swadarshan chakradharis, serviceable, spiritual children of all the centers, remembrance, love and good morning from spiritual Father and Dada on this day of Thursday with love and affection, from the heart. Remembrance and love from the heart and life, love and affection from spiritual BapDada to the spiritual children. He says to the spiritual children. Spiritual Father. Spiritual is not prefixed to Dada. Why isn’t it prefixed? Hm? It is because until he reaches the perfect stage, until he is purusharthi (effort maker), does he keep on becoming body conscious or not? Yes. So, he will not be called spiritual. So, remembrance and love from heart and life, love and affection of Dada also. Om Shanti. (24.30) (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2945, दिनांक 18.07.2019
VCD 2945, dated 18.07.2019
रात्रि क्लास 30.11.1967
Night Class dated 30.11.1967
VCD-2945-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-19.20
Time- 00.01-19.20


आज का रात्रि क्लास है – 30 नवम्बर, 1967. वाणी का कुछ हिस्सा कटा हुआ है। बोला कि भविष्य 21 जन्म के लिए और ये पक्का निश्चय भी है बच्चों को, परन्तु माया भी कुछ कच्ची नहीं है। बच्चों को तो निश्चय है कि 21 जन्म के लिए हम अब नई दुनिया में रहेंगे। परन्तु माया क्या करती है? निश्चय को उखाड़ती है। तो माया भी ठोंक-ठोंक करके देखती है। ठोंकती है कि ये लायक है राजगद्दी पर बैठने के लिए या ऊँच पद पाने के लिए लायक है? तो ठोंक-पीट करना छोड़ती नहीं है। समाचार सुना? किसी ने कहा – जयपुर का। ये जो समाचार आते हैं सर्विस के, फिर किसके पास जाते हैं? सर्विस के समाचार किसके पास जाते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) दादा लेखराज के पास जाते हैं? किसके पास जाते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) ओहो! शिवबाबा तो वो जानता ही है सब कुछ। वो तो है ही त्रिकालदर्शी। उसके पास जाने से भी और न जाने से भी क्या अंतर है? जो सर्विस के समाचार आते हैं वो किसके पास जाते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, उसके पास जाते हैं; जो सेवाधारी जो भी बच्चे हैं, उन सेवाधारी नंबरवार बच्चों का सेवा का पोतामेल किसके पास पहुंचना चाहिए? विश्वपिता के पास पहुंचना चाहिए ना? तो बताया – जगदीश के पास सर्विस समाचार जाते हैं। कौनसे जगदीश की बात की? हद के जगदीश की बात की? या बेहद का जगत का ईश माने ईश्वर, कंट्रोलर, शासक? (किसी ने कुछ कहा।) हां, बेहद के जगदीश के पास जाते हैं। वो कुछ-कुछ फिर अखबारों में डालते हैं।

पुराने झाड़ देखने में आएंगे कांटों के। तुम बच्चों को क्या देखने में आवेंगे? हँ? अरे, पुराने झाड़ में भी तुम बच्चों को फूल देखने में आएंगे। और जो आहिस्ते-आहिस्ते हैं ना? हँ? जिनका पुरुषार्थ धीमा चल रहा है, तो सर्विस भी कैसी करेंगे? धीमी सर्विस करेंगे। उनको कांटे देखने में आएंगे। क्योंकि कांटें याद पड़ते रहेंगे। और फिर कांटें याद आएंगे तो फिर कांटों में फल बनेंगे? कांटों में तो फल नहीं बनेंगे। फिर काटें बनने की बातें करेंगे आपस में। नहीं बनेंगे तो क्या करेंगे? खुद भी कांटा बनेंगे और कांटों की ही आपस में बातें करेंगे। कि अच्छी बातें करेंगे? हँ? श्रेष्ठ संकल्पों में रमण करेंगे या निगेटिव संकल्पों में रमण करेंगे? निगेटिव में। तो आपस में कांटों की ही बात करते रहेंगे। तो कुछ जरूर है जो इतना अच्छा फूल नहीं बन सकते हैं। क्योंकि बाबा के पास अच्छे-अच्छे फूलों की क्वालिटी भी तो आती है ना? बाबा ने सुबह को बताया; किसको? इनको। हँ? कि देखो हमारे पास, हँ, हमारे पास कौनसा झाड़ खड़ा है? हँ? अरे, बाबा अपने पास कौनसे, कौनसे झाड़ को रखते हैं? हँ? बढ़िया एकदम फर्स्टक्लास फूलों वाले झाड़ को रखते हैं या कांटों के झाड़ को रखते हैं? हँ? अरे, झाड़ में, झाड़ में देख लो ना? कल्प वृक्ष का चित्र है ना? झाड़ है ना? उसमें देखो। बाबा के पास कौन बैठा हुआ है? हँ? कौन बेठा है?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो दुनिया का सबसे बड़ा दुखदायी। क्या दुख देता है? हाँ, दुनिया के लिए अति दुख का सामान तैयार करता है। मन में भी बड़ी तलखन पैदा हो जाती है हर आत्मा को। क्या करें? कैसे करें? कहां जाएं?

तो समझा हमारे पास कौनसा झाड़ खड़ा है? अक का झाड़ खड़ा हुआ है। वो अक का झाड़ बड़ा होता जाता है, लंबा होता जाता है। फूल दिया ही नहीं है। तो फिर उनके बच्चा पैदा हुआ है। क्या? झाड़ तो बहुत बड़ा है। और बच्चा छोटा है कि बड़ा है? झाड़ में से जो बच्चा निकला वो छोटा है कि बड़ा है? क्या छोटा बच्चा? अक का फूल कितना बड़ा होता है? छोटा सा होता है। मैं तो समझता हूँ तो बच्चा ही फूल दिखलाएंगे भी। क्योंकि बगीचे में अक का फूल जरूर चाहिए। हँ? क्यों? क्योंकि वो शास्त्रकार दिखलाते हैं ना? क्या दिखलाते हैं? कि वो जो जगतपिता है ना, सारे जगत का बीज। पिता को क्या कहा जाता है? बीज। सारे जगत का पिता, जगतपिता शंकर क्या खाता है? हँ? अरे? और देवताएं नहीं खाते हैं वो चीज़। उनको नहीं चढ़ाया जाता है। वो क्या खाता है? हँ? अरे, वो खाता है आक, धतूरे। हँ? धतूरा खाता है, आकरा खाता है। हँ? धतूरा क्या होता है? हँ? अरे, नाम ही है - धत् उरा। उरा माने? उरा माने दिल। है ना? हाँ। कैसा दिल है? अरे? धत् बोला तो पसन्द है कि नहीं पसन्द है?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, पसन्द नहीं है। तो भी अपने पास रखते हैं। धत् उरा। हाँ, गाते हैं ना, गाते हैं। शंकर आक, धतूरा खाता है। और तुम बच्चे जानते हो कि ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को तो सूक्षम वतन में दिखाते हैं। वहां तो कोई आक, धतूरे होते नहीं हैं। होते हैं? कहाँ होते हैं? इस दुनिया में होते हैं अक जैसे फूल। हँ? नाम क्या दे देते हैं उनको? अ माने नहीं। क, हँ, अ, क। क माने? कर्म न करो। तो हुआ अक। अच्छा? और फिर उसके पीछे लगा हुआ है वर। वर माने? श्रेष्ठ। तो दोनों को मिलाया तो क्या हुआ? अक बर। हँ? कैसा कर्म न करो? जैसा अकबर ने किया वैसे खराब कर्म न करो। हाँ।

तो इस दुनिया की बात है। फिर भी क्या कहें अभी? अरे, बनते-3 ट्रांसफर होकरके असुर बन जाते हैं। कहां से कहां ट्रांसफर होते हैं? देवता बनते-बनते, देवी-देवता बनते-बनते ट्रांसफर होकरके क्या बन जाते हैं? असुर बन जाते हैं। कहां से ट्रांसफर होते हैं? अरे, देवता से आसुरी दुनिया में, नरक की दुनिया में ट्रांसफर होते हैं ना? तो क्या बन जाते हैं? वहां तो देवता थे। जरूर देवतापने की भी शूटिंग की होगी; रिहर्सल की होगी। फिर बनते-बनते क्या बन गए? असुर बन गए। क्योंकि बाप को याद करने बिगर जो और कुछ भी देह अभिमान में आकरके याद करते हैं अरे, तो कुछ न कुछ खता हो ही जाती है। खता माने? भूल, गल्ती हो जाती है। इतने खता न हों तो क्या कहें? क्या करना चाहिए? ज्यादा भूल न हो, ज्यादा खता न हो, तो करना क्या चाहिए? अरे, इसलिए जितना हो सके उतना याद में रहना चाहिए। याद में रहें। क्योंकि बाबा ने आखानी सुनाई थी ना? कौनसी आखानी? ये ही शास्त्रों की आखानी। शास्त्रों की कथा-कहानियां। भई, सुख देखेंगे या दुख देखेंगे? तो क्या बोलेगा फट से बोलने वाला? क्या बोलेगा? अरे, सुख देखेंगे। दुख क्यों देखेंगे? तो जाकरके सुखधाम में बैठ गया। क्योंकि जानते हैं कि जब तक सुखधाम आधा कल्प पूरा नहीं होगा ढ़ाई हज़ार वर्ष तब तक कोई भी जमघटा नहीं आ सकेगा। जमघटा कौन? यमराज के दूत होते हैं ना? हाँ। तो ये सुख की मिसाल दिये हुए हैं कि देखो कितना सुख है सुखधाम में! क्योंकि सुख और दुख कंट्रास्ट है ना? रात और दिन। तो बराबर-2 होंगे ना? हाफ एंड हाफ होंगे ना? तो पहले क्या? पहले सुख या दुख?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, पहले सुख। जो भी आत्माएं आती हैं ना आत्मलोक से, तो पहले क्या देखती हैं? क्या अनुभव करती हैं? सुख अनुभव करती हैं।

तो ये क्वेश्चन, ये क्वेश्चन नहीं उठ सकता है कि वो सुख की दुनिया में कोई जमघटा आकरके बांधके ले जाएगा। ये जरूर है कि जब सृष्टि रची जाती है पुरुषोत्तम संगमयुग में नई सृष्टि रची जाती है। संगम है ना? पुराने से नई दुनिया बनाई जाती है तो पहले सुख देखने में आता है।

ये तो बच्चे अभी अच्छी तरह से बुद्धि में याद करते हैं कि जब तुम सुख में थे या सुख में हो तो और सभी शांतिधाम में रहते हैं। क्यों? क्यों? तुम सुख में हो तो और सभी शांतिधाम में रहते हैं। क्यों? क्यों? तुम सुख में हो तो सभी शांतिधाम में क्यों रहते हैं? क्योंकि तुम बाप भगवान ऊँच ते ऊँच के कौनसे बच्चे हो? सुखदाता बाप के कौनसे बच्चे हो? हाँ, सुखदेवा बच्चे हो ना? तो देवताएं तो सुख देते हैं ना? कि दुख देते हैं? हाँ, तो वो थोड़े होंगे या ज्यादा होंगे? थोड़े से होते हैं। और दुखदाता? दुखदायी दुनिया में प्राणी ज्यादा हैं या कम हैं? हँ? कीड़े-मकोड़े, पतंगे, मक्खी-मच्छर इनकी संख्या थोड़ी होती है? नहीं। ज्यादा होती है। हँ। तो जब तुम सुख में रहते हो, नई दुनिया में रहते हो तो बाकि सब कहां रहते हैं ढ़ेर के ढ़ेर? शांतिधाम में रहते हैं। (क्रमशः)

Today’s night class is dated 30th November, 1967. Some portion of the Vani has been cut. It was said that for future 21 births and children also have this firm faith, but Maya is not weaker. Children have the faith that now we will live in the new world for 21 births. But what does Maya do? She makes them lose faith. So, Maya also observes by hitting again and again. She hits to see if this one is worthy of sitting on the royal throne or worthy of achieving a high post? So, she does not leave hitting or beating. Did you hear the news? Someone said – From Jaipur. These news items of service then go to whom? To whom does the service news go?
(Someone said something.) Do they go to Dada Lekhraj? To whom do they go? (Someone said something.) Oho! ShivBaba does know everything. He is anyways Trikaaldarshi (knower of past, present and future). What is the difference between [the news] going to Him or not going to Him? To whom do the news items of service go? (Someone said something.) Yes, they go to the one; all the children who are sevadharis, to whom should the potamail of service of those numberwise serviceable children go? It should reach the Father of the world, shouldn’t it? So, it was told – The news items of service go to Jagdish. The topic of which Jagdish was mentioned? Was the topic of the limited Jagdish mentioned? Or the unlimited Eesh of Jagat, i.e. Ishwar, Controller, ruler? (Someone said something.) Yes, they go to the unlimited Jagdish. He then publishes some of them in the newspapers.

The old trees with thorns will be visible. What will be visible to you children? Hm? Arey, even in the old tree you children will see flowers. And those who are slowly, slowly, aren’t they? Hm? Those whose purusharth is going on slowly, then even the service that they do will be of what kind? They will do slow service. They will see thorns. It is because they will keep on remembering thorns. And then if they remember the thorns, then will fruits develop in the thorns? Fruits will not develop in thorns. Then they will talk to each other about becoming thorns. If they don’t become then what will they do? They will become thorns themselves and they will talk about thorns only with each other. Or will they talk about nice topics? Hm? Will they create righteous thoughts or will they create negative thoughts? Negative. So, they will keep on talking to each other about thorns only. So, there are some who cannot become such nice flowers. It is because good quality flowers also come to Baba, don’t they? Baba had said in the morning; Whom? These. Hm? That look, which tree is standing near us, with us? Hm? Arey, which tree does Baba keep with Himself? Hm? Does He keep trees with completely first class flowers with Him or does He keep trees with thorns? Hm? Arey, in the tree, look in the tree, will you not? There is a picture of the Kalpa tree, isn’t it? There is a tree, isn’t it? Look in it. Who is sitting near Baba? Hm? Who is sitting?
(Someone said something.) Yes, the biggest giver of sorrows of the world. What sorrows does he give? Yes, he prepares the material of extreme sorrows for the world. Every soul’s mind becomes disturbed. What should we do? How should we do? Where should we go?

So, did you understand which tree is standing with us? The tree of Ak is standing. That tree of Ak keeps on growing big, growing tall. It hasn’t given flowers at all. So, then a child has been born from it. What? The tree is very big. And is the child small or big? The child that emerged from the tree, is it small or big? What small child? How big is the flower of Ak? It is small. I feel it will show a child-like flower only. It is because the flower of Ak is definitely required in the garden. Why? It is because those writers of the scriptures show, don’t they? What do they show? That there is the Father of the world (Jagatpita), the seed of the entire world, isn’t he there? What is the Father called? Seed. What does the Father of the world, Jagatpita Shankar eat? Hm? Arey? Other deities do not eat that thing. They are not offered that. What does he eat? Hm? Arey, he eats Aak, Dhatura. Hm? He eats Dhatura, Aakra. Hm? What is Dhatura? Hm? Arey, the name itself is Dhat ura. What is meant by ura? Ura means heart. Isn’t it? Yes. What kind of a heart is it? Arey? When He said ‘dhat’ (damn), does He like it or not?
(Someone said something.) Yes, He doesn’t like it. Still, He keeps them with Him. Dhat ura. Yes, people sing, don’t they? They sing. Shankar eats Aak, Dhatura. And you children know that Brahma, Vishnu, Shankar are shown in the Subtle Region. There are no Aak, Dhatura there. Do they exist? Where do they exist? They, the Ak like flowers exist in this world. Hm? What is the name that they are given? ‘A’ (अ) means ‘no’. ‘Ka’ (क), hm, ‘A’, ‘ka’. What is meant by ‘ka’? Do not perform actions (karma). So, it becomes Ak. Achcha? And then ‘var’ is suffixed to it. What is meant by ‘var’? Righteous. So, if you merge both of them, then what happens? Ak bar. Hm? What kind of actions should you not perform? Do not perform the bad actions that Akbar performed. Yes.

So, it is about this world. However, what should we say now? Arey, while becoming [a deity], you get transferred and become demons. From which place to which place do you get transferred? While becoming deities, while becoming deities, you get transferred and what do you become? You become demons. From where do you get transferred? Arey, you get transferred from deities to the demoniac world, to the world of hell, don’t you? So, what do you become? You were deities there. Definitely you must have performed the shooting of being a deity; you must have performed the rehearsal. Then while becoming [a deity] what did you become? You became a demon. It is because except for remembering the Father, whatever else you remember under the influence of body consciousness, arey, then you commit some or the other mistake (khataa). What is meant by khataa? You commit a mistake, error. If you don’t commit so many errors, then what should we say? What should we do? What should we do to avoid committing more mistakes, more errors? Arey, this is why you should remain in remembrance as much as possible. You should remain in remembrance. It is because Baba had narrated a story, hadn’t He? Which story? The same story of the scriptures. The stories of the scriptures. Brother, will you see happiness or will you see sorrows? So, what will the speaker say immediately? What would he say? Arey, I will see happiness. Why will I see sorrows? So, he went and sat in the abode of happiness. It is because they know that until the abode of happiness, half a Kalpa is not completed for 2500 years, no agent of death (jamghata) can come. Who is Jamghata? There are messengers of Yamraj (the deity of death), aren’t they there? Yes. So, this example of happiness has been given that how much happiness there is in the abode of happiness! It is because there is a contrast between happiness and sorrows, isn’t it? Night and day. So, they will be equal, will they not be? They will be half and half, will they not be? So, what first? First happiness or first sorrows?
(Someone said something.) Yes, first happiness. Whatever souls come from the Soul World, what do they see first? What do they experience? They experience happiness.

So, this question, this question cannot arise as to any Jamghata (messenger of death) will come and tie you up and take you from the world of happiness. It is certain that when the world is created; new world is created in the Purushottam Sangamyug. It is a confluence, isn’t it? When the new world is created from an old one, then initially happiness is visible.

Children now remember nicely in the intellect that when you were in happiness or when you are in happiness, then everyone else lives in the abode of peace. Why? Why? When you are in happiness then all others live in the abode of peace. Why? Why? When you are in happiness, then why does everyone live in the abode of peace? It is because which children of the highest on high God Father are you? Which children of the Father, the giver of happiness are you? Yes, you are children of the giver of happiness, aren’t you? So, deities give happiness, don’t they? Or do they give sorrows? Yes, so, will they be a few or more? They are a few. And givers of sorrows? Are the living beings that give sorrows more in the world or less? Hm? Is the number of worms, insects, fire-flies, fleas, mosquitoes less? No. It is more. So, when you live in happiness, when you live in the new world then where do all others numerous [souls] live? They live in the abode of peace. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2945, दिनांक 18.07.2019
VCD 2945, dated 18.07.2019
रात्रि क्लास 30.11.1967
Night Class dated 30.11.1967
VCD-2945-Bilingual-Part-2

समय- 19.21-37.37
Time- 19.21-37.37


तो देखो इस दुनिया में भी जिसे देखो शांति के लिए कितनी भक्ति का मत्था मारते हैं। क्योंकि सुख का कोई भी, किसी के पास रास्ता ही, किसी के पास रास्ता है बताने के लिए? हाँ, बताय ही नहीं सकते। तो सुख का रास्ता बताय नहीं सकते और दुख में, अशांति में तो पड़े ही हुए हैं दुख की दुनिया में, तो क्या चाहिए फिर? तो हमें न सुख चाहिए न दुख चाहिए, हमें शांत छोड़ दो शांत दुनिया में। तो देखो यहां जो रहते हैं इस दुनिया में, हँ, जो भी ऋषि-मुनि-सन्यासी, पंडित, विद्वान, आचार्य, जो भी हैं वो सिर्फ शांति का ही रास्ता बताते हैं। हँ? क्या कहते हैं? मुक्ति का रास्ता बताते हैं। और कहते भी हैं कि कहां गया? मुक्तिधाम में गया। हँ? वो मुक्ति क्या समझते हैं? मुक्तिधाम में गया तो बस हमेशा के लिए मुक्त हो गया। फिर जैसे इस दुनिया में आएगा ही नहीं। हाँ। वो तो ठीक है। मुक्त हो जाएगा तो इस दुखधाम में थोड़ेही आएगा। लेकिन बिल्कुल आएगा ही नहीं ये हो सकता है? ये तो नहीं हो सकता।

तो देखो, भले वो ऋषि, मुनि, सन्यासी शांति का रास्ता बताते हैं पर मिलती कोई थोड़ेही है किसी को। और बच्चे जानते हैं कि हमारा जो बेहद का बाप है आत्माओं का वो क्या देते हैं? अरे? क्या देते हैं? सुख भी देते हैं और शांति भी देते हैं। हाँ। पहले क्या देते हैं? पहले तुम्हारी जो मांग है, हँ, इस दुनिया में जब तुम बहुत दुखी होते हो, हँ, एटम बम चारों ओर फटने लगते हैं, दुनिया सबको समझ में आ जाएगी अब खतम होने वाली है, अब हमारा भी खेल, हाँ, खलासा होने वाला है। तो फिर सब क्या चाहते हैं? सुख चाहते हैं? नहीं। क्या चाहते? शांति चाहते। तो बाप भी आकरके पहले क्या देते हैं सबको? शांति देते हैं। फिर? हँ? शांति जिनको देते हैं उनको सुख नहीं देते? शांति भी देते हैं और सुख भी देते हैं। ये जरूर है कि जो मैं आता हूँ ना तो मैं तो बताता हूँ। क्या बताता हूँ? न दुख दो, न दुख लो। सुख दो और सुख लो। यही तो बताता हूँ। कि उल्टा बताता हूँ? हाँ।

तो देखो सुख भी देते हैं और शांति भी देते हैं जो तुम बच्चे प्राप्त कर रहे हो। क्या? सुख-शांति तुम बच्चे दोनों ज्यादा प्राप्त कर रहे हो? तुम बच्चे सुख-शांति ज्यादा प्राप्त कर रहे हो कि दूसरे आत्माएं ज्यादा? हँ? तुम बच्चे शांति ज्यादा प्राप्त नहीं कर रहे हो? शांतिधाम में ज्यादा पड़े रहोगे?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, फिर? अरे? बाप तो आकरके सुख और शांति दोनों देते हैं जो तुम बच्चे प्राप्त कर रहे हो। (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा, सुख ज्यादा लेते हो? और शांति कम लेते हो? (किसी ने कुछ कहा।) दोनों लेते हो? सदाकाल के लिए? कि और जो ढ़ेर की ढ़ेर आत्माएं हैं वो ज्यादा लेती हैं सुख शांति सदाकाल के लिए इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर? कभी हां, कभी ना। हम ज्यादा सुख-शांति लेते हैं? और वो दूसरे धर्म की जो आत्माएं हैं ढ़ेर की ढ़ेर वो शांति कम लेती हैं? अरे? अरे, परमधाम में वो ज्यादा टिकेंगी शांतिधाम में या थोड़ा टिकेंगी? वो तो ज्यादा टिकेंगी। तो वो शांति ज्यादा नहीं लेती? अरे? अरे, शांतिधाम में भले शांति मिलती है लेकिन कुछ याद रहता है कि हमको शांति मिली? नहीं। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ये तुम बच्चों की बात है। कौनसे बच्चों की? तुम सूर्यवंशी असल जो सूर्यवंशी बच्चे हैं उनकी बात है जो राजयोग से राजाई पद पाते हैं और, और तुम्हारा जो भी जमात है देवी-देवता सनातन धर्म की फर्स्टक्लास, वो दूसरे धरम में कन्वर्ट जो नहीं होते हैं, वो इस दुनिया में, सुख की दुनिया में भी सुख-शांति ज्यादा भोगते हैं और दुख की दुनिया में भी, नरक में भी सुख और शांति ज्यादा भोगते हैं या नहीं भोगते हैं? हाँ, बोला कि तुम बच्चों को तीन हिस्सा सुख मिलता है। और धरमवालों को, हँ, आधा सुख, आधा दुख मिलता है। तो सुख के साथ शांति भी होती है कि नहीं? सुख मिले और अशांति ढ़ेर सारी हो तो फायदा है? नहीं।

तो सुख के साथ तुम शांति भी इस दुनिया में जास्ती भोगते हो। कैसे भोगते हो? अरे, पुरुषार्थ करके भोगते हो। क्या पुरुषार्थ करते हो? सुख देंगे, सुख लेंगे। हँ? शांत रहेंगे और शांत करेंगे। ऐसा कुछ नहीं करेंगे ऐसा कुछ नहीं बोलेंगे जो कोई भी हमसे अशांत हो जाए। जैसे गीता में लिखा है ना? क्या लिखा है? गीता में भी उन्होंने लिखा तो है – यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च। (गीता 12/15) क्या? जो लोगों से परेशान नहीं होता, हँ, और जो लोगों को परेशान करता भी नहीं है। तो वो श्रेष्ठ आत्माएं हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच की। उनको कहेंगे देवात्माएं। अरे? हाँ, तो वो क्या पुरुषार्थ करती हैं? यहां शूटिंग पीरियड में, रिहर्सल पीरियड में भी यही पुरुषार्थ करती हैं। क्या? दूसरों को सुख-शांति देना है और सुख-शांति ही लेना है। न दुख और अशांति किसी को देना है और न लेना है। न कर्मेन्द्रियों से, न ज्ञानेन्द्रियों से लाल-पीली आँखें करके, हँ, या कोई गंदी बात सुनाकरके; सुनाना-करना, देखना-करना ये कौनसी इन्द्रियों का काम है? अरे, ज्ञानेन्द्रियों का काम है ना? तो न ज्ञानेन्द्रियों से, न कर्मेन्द्रियों से, तुम कोई ऐसा काम नहीं करते हो, ये पुरुषार्थ करते हो। कैसा काम? कि किसी दूसरे को अशांति और दुख पैदा हो जाए, परेशानी पैदा हो जाए।

तो खुद भी पुरुषार्थ ऐसा करते हो। औरों को ऐसा रास्ता बताने के लिए कितनी मेहनत करते हो। मेहनत कौन करेगा? जो खुद करेगा वो दूसरों को भी वो ही रास्ता बताएगा। हाँ, अरे, भाई। अपना खर्चा भी करते हो। हाँ। ‘अपना खर्चा भी’ क्यों लगाय दिया? औरों को भी ऐसा रास्ता बताकरके उनको उकसाते हो कि तुम भी ऐसा ही करो। हँ? ऐसा करेंगे, दूसरे भी ऐसा ही करेंगे तो अपना तन, मन, धन इस मेहनत में लगाएंगे या नहीं लगाएंगे? लगाएंगे। तो तुम अपना भी खर्चा करते हो और औरों से भी कराते हो। अपना खर्चा क्यों करते हो? कि हम जैसे कर्म करेंगे तो हमे देख दूसरे भी करेंगे। और हम नहीं करेंगे, हम ऐसे कर्म नहीं करेंगे तो हमको देखकरके दूसरे भी नहीं करेंगे। क्योंकि अपने लिए तुम राज्य लेते हो। तो क्या करेंगे? अरे, अपना लगाएंगे या दूसरों का लगाएंगे? हाँ, अपना लगाएंगे। तो अपने लिए राज्य जिसको लेना होगा, हँ, तो अपना ही पैसा खर्च करेंगे। हँ? और दूसरों का छीन झपट करके ले लिया, मांग के ले लिया, तो उससे तुम्हारा अपना बनेगा? हँ? नहीं बनेगा। हाँ। तो जिसको अपना राज्य नहीं चाहिए तो वो फिर पैसा क्यों खर्च करेंगे? करेंगे? हँ? अपना तन, मन, धन लगाएंगे? हाँ, नहीं लगाएंगे। तो इसलिए जिसको राज्य चाहिए, हँ, जिनको राज्य चाहिए वो ही तुम्हारे मददगार बनेंगे। राज्य किनको चाहिए? किनको मिलेगा? जो राजयोग सीखेंगे, राजयोग की पढ़ाई पढ़ेंगे, जो पढ़ाई इस दुनिया में कोई नहीं पढ़ाय सकता सिवाय एक बाप के, सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर के और ये राजयोग की पढ़ाई कोई पढ़ाय ही नहीं सकता। हाँ।

तो बैठे हो। एक, दो, तीन दफा आकरके यहां शांति में बैठते हो। और पुरुषार्थ करते हो। क्या करते हो? देहार्थ या पुरुषार्थ? पुरुष माने आत्मा। देह के लिए नहीं करते हो। किसके लिए करते हो? हँ? आत्मा की उन्नति के लिए करते हो क्योंकि देह की उन्नति के लिए करेंगे तो देह तो यहीं क्या होगा? खतम। और आत्मा के लिए करेंगे तो आत्मा खतम हो जाएगी यहां? नहीं। आत्मा तो जन्म-जन्मान्तर चलेगी ना? हाँ। तो ये जो तुम पुरुषार्थ करते हो तो ये तो सबसे अच्छा पुरुषार्थ करते हैं। कौन? ये। ये। थोड़े कि बहुत? हँ? ये माने कौन? सबसे अच्छा पुरुषार्थ करते हैं। कौन करते हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा? अच्छा? किसी ने कहा – बाबा, रोज क्लास में जाता है सवेरे।

इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, यही बाप का परिचय देना है। तो बुद्धि भी ऐसे ही कहती है कि बाप का परिचय मिलने से, हँ, क्या होगा? कौनसे बाप का परिचय मिलने से? लौकिक बाप जो जन्म-जन्मान्तर हुए, वो नहीं। और जो धरमपिताएं हुए बड़े-बड़े, महान-महान, ग्रेट फादर्स, वो भी नहीं। कौन? जो फादर्स का भी फादर कहा जाता है। हाँ। सुप्रीम सोल। हँ? तो वो सुप्रीम सोल बाप आकरके स्वर्ग स्थापन करने का, सुख की दुनिया, शांति की दुनिया स्थापन करने का रास्ता बताते हैं। कि सुख-शांति की दुनिया स्थापन करते हैं? हँ? करता है कि सिर्फ रास्ता बताता है? रास्ता बताता है। फिर करता कौन है? अरे?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, इस मनुष्य सृष्टि का जो जगतपिता है वो करता है, जो हीरो पार्टधारी कहा जाता है।

तो उसका परिचय मिलने से बाप स्वर्ग की स्थापना करते हैं। गोया स्वर्ग का परिचय मिल जाएगा कि हम बाबा से स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। किससे ले रहे हैं? हँ? किससे ले रहे हैं? बाबा किसे कहा जाता है? हँ? बाबा ऊपरवाले को कहा जाता है? हँ? बाबा कहा जाता है; फादर के फादर को बाबा कहा जाता है। ग्रांडफादर कहा जाता है तो भी बाबा कहा जाता है। हँ? और बाबा का भी बाबा, परदादा, परबाबा, उसको भी बाबा। और तरदादा, उसको भी? उसको भी बाबा। तो ये तरदादा, परबाबा, ये बाबा के ऊपर बाबा, बाबा के ऊपर बाबा, ये तो इस दुनिया की बात है जन्म-जन्मान्तर की। हँ? तो वो देहधारियों की बात है कि आत्माओं की बात है? हँ? देहधारियों की बात है। आत्माओं का तो जो बाबा है वो एक ही बार बाबा बनता है। क्या? तुम सब बच्चे आत्मा, हँ, और तुम बच्चों के लिए जो नई दुनिया बनाने वाला बाप है वो मनुष्य सृष्टि का बाप, आदम कहो, हँ, आदि देव कहो, जगन्नाथ कहो, विश्व पिता कहो, वो और उसका भी बाप, हँ, उसका भी बाप वो हुआ बाबा। कैसे? बापों का बाप हुआ ना? धरमपिताएं बाप और उनका भी बाप प्रजापिता कहो, आदम कहो, और उसका बाप; हँ? कौन? शिवबाबा। उससे ऊँचा तो कोई बाबा होता है? वो कोई नहीं होता। तो तुम्हारी बुद्धि में आ जाएगा परिचय मिल जाएगा कि हम बाबा से स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। ओमशान्ति। (समाप्त)

So, look, even in this world, whomsoever you see, they scramble so much for peace, for Bhakti. It is because does anybody have any path to happiness, does anyone have the path to show? Yes, they cannot tell at all. So, they cannot show the path to happiness and they are indeed lying in sorrows, peacelessness in the world of sorrows. So, what do they require then? So, we neither require happiness nor sorrows; leave us in peace in the world of peace. So, look, those who live here in this world, hm, all the sages, saints, sanyasis, pundits, scholars, teachers show just the path to peace. Hm? What do they say? They show the path to liberation (mukti). And they even say that where did he go? He went to the abode of liberation (muktidhaam). Hm? What do they mean by mukti? If someone went to the abode of liberation, then that’s it, he became liberated forever. Then it is as if he will not come to this world at all. Yes. That is correct. If he becomes liberated, then will he come to this abode of sorrows? But can it be possible that he will not come at all? This cannot be possible.

So, look, although those sages, saints, sanyasis show the path to peace, but does anyone get it? And children know as to what our unlimited Father of souls gives? Arey? What does He give? He gives happiness as well as peace. Yes. What does He give first? First your demand, hm, when you become very sorrowful in this world, hm, when atom bombs start exploding everywhere, when everyone understands that the world is going to end; now our drama is also going to, yes, end, then what does everyone want? Do they want happiness? No. What do they want? They want peace. So, the Father also comes and what does He give to everyone? He gives peace. Then? Hm? Does He not give happiness to those whom He gives peace? He gives peace as well as happiness. It is certain that when I come, don’t I, then I tell. What do I tell? Neither give sorrows nor take sorrows. Give happiness and take happiness. This is what I tell. Or do I tell anything opposite? Yes.

So, look, He gives happiness as well as peace which you children are obtaining. What? Are you children obtaining both happiness and peace more? Are you children obtaining more happiness and peace or are other souls obtaining more? Are you children not obtaining more peace? Hm? Will you remain more in the abode of peace?
(Someone said something.) Yes, then? Arey? The Father comes and gives both happiness and peace which you children are obtaining. (Someone said something.) Achcha, do you obtain more happiness? And do you obtain lesser peace? (Someone said something.) Do you obtain both? Forever? Or do numerous souls obtain more happiness and peace forever on this world stage? Sometimes you say ‘yes’, sometimes you say ‘no’. Do we obtain more happiness and peace? Do the numerous souls of other religions obtain less peace? Arey? Arey, will they stay more in the Supreme Abode, in the abode of peace or will they stay less? They will stay more. So, do they not obtain more peace? Arey? Arey, although you get peace in the abode of peace, but do you remember anything if you got peace? No. (Someone said something.) Yes, it is about you children. Of which children? It is about you Suryavanshis, the true Suryavanshi children, who obtain the post of kingship through rajyog and, and your first class group of ancient deity religion, those who do not convert to other religions, they experience more happiness and peace in this world, in the world of happiness also and do they experience more happiness and peace in the world of sorrows, in hell also or not? Yes, it has been said that you children get three-fourth part happiness. The people of other religions get half happiness and half sorrows. So, is there peace also along with happiness or not? If you get happiness and if there is a lot of peacelessness, then is there any benefit? No.

So, along with happiness you also enjoy more peace in this world. How do you enjoy? Arey, you enjoy by making purusharth. What purusharth do you make? You will give happiness, take happiness. Hm? You will remain peaceful and make others peaceful. You will not do any such thing, you will not speak any such thing that someone becomes disturbed due to us. For example, it has been written in the Gita, hasn’t it been? What has been written? They have written in the Gita also – Yasmaat na udvijate lokah lokaat na udvijate ch. (Gita 12/15) What? The one who does not get disturbed by people, hm, and the one who does not disturb people as well. So, those are the righteous souls of this world stage. They will be called deity souls. Arey? Yes, so what purusharth do they make? They make the same purusharth here in the shooting period, rehearsal period. What? You have to give happiness and peace to others and you have to obtain happiness and peace only. Neither should you give sorrows and disturbance to anyone nor should you take. Neither through the organs of action, neither through sense organs by making your eyes red and yellow [in anger], hm, or by narrating any dirty topic; narrating, seeing are tasks of which organs? Arey, they are the tasks of the sense organs, aren’t they? So, neither through the sense organs nor through the organs of action you perform any such task; this is the purusharth you make. What kind of task? That it creates disturbance and sorrows, creates trouble for others.

So, you yourself also make such purusharth. You work so hard in order to show such a path. Who will work hard? The one who works hard himself will also show the same path to others. Yes, arey, brother. You spend your money also. Yes. Why did He say ‘spend your money also’? You show such path to others also and instigate (inspire) them that you should also do like this only. Hm? If you do like this, if others also do like this, then will they invest their body, mind and wealth in this hard work or not? They will. So, you spend your money also and enable others also to do so. Why do you spend your money? It is because as is the action we perform, then others will also do so by observing us. And if we do not perform, if we do not perform such actions, then by observing us, others will also not do. It is because you obtain kingship for yourself. So, what will you do? Arey, will you invest your own [money] or will you invest others’ [money]? Yes, you will invest your own [money]. So, those who have to obtain kingship for themselves, then they will spend their own money. Hm? And if they take others’ [money] by snatching, by seeking, then will it become yours? Hm? It will not become. Yes. So, those who do not want their own kingdom, then why will they spend money? Will they? Hm? Will they invest their body, mind and wealth? Yes, they will not. So, this is why the one who wants kingship, hm, those who want kingship will only become your helpers. Who wants kingship? Who will get it? Those who learn rajyog, those who study the knowledge of rajyog, the knowledge that nobody except one Father, the Supreme Soul, Heavenly God Father can teach in this world and nobody can teach this knowledge of rajyog at all. Yes.

So, you are sitting. You come once, twice, thrice here and sit in peace. And you make purusharth. What do you do? Do you do for the sake of the body (deh) or for the sake of the soul (purush)? Purush means soul. You don’t do for the body. For whom do you do? Hm? You do for the progress of the soul because if you do for the progress of the body then what will happen to the body here itself? It will perish. And if you do for the sake of the soul, then will the soul perish here? No. The soul will continue birth by birth, will it not? Yes. So, this purusharth that you make, you make the best purusharth. Who? This one. This one. A few or many? Hm? What is meant by ‘this one’ (ye)? He makes the best purusharth. Who makes?
(Someone said something.) Brahma Baba? Achcha? Someone said – Baba, he goes to the class every day.

You will not have to work so hard; you have to give this introduction of the Father only. So, the intellect also says that by getting the introduction of the Father, hm, what will happen? By getting the introduction of which Father? Not the worldly Father, who have existed birth by birth. And not even those big, great founders of religions, the great fathers. Who? The one who is called the Father of fathers. Yes. The Supreme Soul. Hm? So, that Supreme Soul Father comes and shows the path of establishing heaven, the world of happiness, the world of peace. Or does He establish the world of happiness and peace? Hm? Does He establish or does He just show the path? He shows the path. Then who establishes? Arey?
(Someone said something.) Yes, the Father of the world of this human world who is called the hero actor establishes.

So, by getting His introduction, the Father establishes heaven. You will get the introduction to heaven that we are obtaining inheritance of heaven from Baba. From whom are we obtaining? Hm? From whom are we obtaining? Who is called Baba? Hm? Is the above one called Baba? Hm? Baba is said to be; Father’s Father is called Baba. When one says grandfather, at that time also he is called Baba. Hm? And Baba’s Baba, Pardada, Parbaba (great grandfather), even his Baba. And Tardada (great great grandfather), he too? He too is called Baba. So, this Tarbaba,Parbaba, this Baba over Baba, Baba over Baba, this is a topic of this world birth by birth. Hm? So, is that a topic of the bodily beings or is it a topic of the souls? Hm? It is a topic of the bodily beings. The Baba of souls becomes Baba only once. What? You all children are souls, hm, and the Father who makes the new world for you children, that Father of the human world, call him Aadam, hm, call him Aadi Dev, call him Jagannath, call him Father of the world, he and even his Father, hm, even his Father is Baba. How? He is Father of fathers, isn’t He? The founders of religions are fathers and even their Father, you may call him Prajapita, you may call him Aadam, and his Father; hm? Who? ShivBaba. Is there any Baba higher than Him? There is none. So, it will come to your intellect, you will get the introduction that we are obtaining the inheritance of heaven from Baba. Om Shanti. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2946, दिनांक 19.07.2019
VCD 2946, dated 19.07.2019
रात्रि क्लास 30.11.1967
Night Class dated 30.11.1967
VCD-2946-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.45
Time- 00.01-22.45


रात्रि क्लास चल रहा था – 30.11.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि बाप से, बाप का परिचय मिलने से जो बाप स्वरग की स्थापना करते हैं गोया स्वरग का परिचय मिल जाएगा कि हम बाबा से स्वरग का वर्सा ले रहे हैं। तो देखो, ये जीवनमुक्ति है ना? इसलिए गाया जाता है कि सेकण्ड में जीवनमुक्त। वो तो तभी होती है जब पहचान लेते हैं। किसको पहचान लेते हैं? जिसको पहचान लेते हैं; (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, बाप को तो पहचान लेते हैं। बाप तो बताय दिया, हँ, कि दो हैं। एक, बेहद के बाप दो; मनुष्य सृष्टि का बाप और आत्माओं का बाप। तो यहां कौनसे बाप की बात हो रही है? जो बताया स्वर्ग स्थापन करते हैं। करते हैं माना कर्ता है ना? कि अकर्ता है? अगर कहें कर्ता है तो साबित होता है कि कर्ता है तो भोक्ता भी है। जो कर्ता नहीं है वो भोक्ता भी नहीं है। बताया कि ये कर्ता और भोक्ता ये हिसाब है। तो किसको पहचानने की बात है? कौनसे बाप को? क्योंकि बाप भी तो दुनिया में, हां, जन्म-जन्मान्तर अनेक हो गए; धरमपिताएं भी ग्रेट फादर्स हैं; और वो धरमपिताएं भी अपने बाप, मनुष्य सृष्टि के बाप, आदम, एडम को मानते हैं। और वो आदम अपना बाप कोई मनुष्य को नहीं मानता। कब? जब अपनी आत्मा की पहचान मिल जाती है तो मनुष्य सृष्टि का बाप आदम, एडम कोई मनुष्य को अपना बाप मानेगा? नहीं मानेगा ना? हाँ। लेकिन यहां जो बात हो रही है वो स्वर्ग की स्थापना करने वाले बाप की बात हो रही है। हाँ।

तो उसको पहचान लेते हैं तो पीछे वो चाहे नारायण बने, हँ, या जन्म-जन्मान्तर में कोई भी बने। पर जीवनमुक्त तो बनते हैं ना बच्ची? यथा राजा रानी तथा प्रजा। अब जब स्वर्ग का स्थापन करने वाला बाप जीवनमुक्त बनते हैं तो यथा राजा तथा प्रजा बच्चे भी, हँ, बच्चे भी कैसे होंगे? जीवन में रहते-रहते मुक्त होंगे या अगले जनम में मुक्त होंगे? तो सभी बच्चे जीवनमुक्त बनते हैं। और जीवनबंध तो मुर्दाबाद हो जाते हैं। जीवनमुक्त जिंदाबाद हो जाते हैं।

अभी ये बहुत सहज बात है समझने की कि आधा कल्प है सुख और आधा कल्प है दुख। ज्ञान और भक्ति। ज्ञान से होता है सुख। अज्ञान माना भक्ति से होता है दुख। वो तो हिस्ट्री में हजारों साल से देखते आए ना? हँ? ये जो बहुत गाते हैं कि ज्ञान, भक्ति और वैराग। हँ? तो इस क्रम से क्यों गाते हैं? पहले ज्ञान, फिर भक्ति, फिर वैराग। हँ? काहे से वैराग? अपनी आत्मा का ज्ञान मिले, आत्मा के बाप का ज्ञान मिले, तो फिर पक्का बुद्धि में बैठता है कि एक ही सत है और एक से, सत से ही सत्य बात मिलती है। और जिससे सत्य मिलता है तो जो सत्य को धारण करे सो सतयुग की स्थापना करे। फिर नंबरवार भी हैं। तो रिजल्ट क्या हुआ? कि ज्ञान एक से मिलता है। अब वो एक निराकार हो या साकार हो या निराकार साकार का मेल क्योंकि जब तक मेल नहीं होगा निराकार आत्मा का साकार शरीर के द्वारा तो ज्ञान कैसे मिलेगा? तो ये तो बुद्धि में बैठा कि एक से ज्ञान मिलता है माने एक से ही सुख मिलता है। और अनेकों के पीछे बुद्धि भागने से दुख मिलता है।

तो भक्ति के पीछे आता है द्वैतवादी द्वापरयुग और फिर कलियुग। कलियुग के पीछे आता है सतयुग। तो जब सतयुग में जाना है तो अज्ञान और अज्ञान की दुनिया से, इस अज्ञान से ये दुख की दुनिया बनी, उससे वैराग जरूर आएगा ना? तो वैराग जरूर कलियुग में है। और प्यार सतयुग में है। वि माने विपरीत। राग माने प्यार। कहते हैं ना राग-द्वैष, रात-दिन, सुख-दुख। तो विराग माना वैराग। किससे वैराग? सत्य से वैराग? न सत्य से वैराग, न सतयुग से वैराग। तो वो जो प्यार है तुम बच्चों का; सत्य से प्यार है ना? और सच्चाई से प्यार तो सारी दुनिया को होता ही है। पहचानें तब। तो तुम बच्चों का प्यार है क्योंकि ये बच्चे जानते हैं कि सतयुग की बादशाही शिवबाबा से ही मिलती है। इसलिए जिससे प्राप्ति होती है उसकी आटोमेटिकली याद आती है। जिससे दुख मिलता है वो कोई याद थोड़ेही किया जाता है? रावण से दुख मिलता है तो कोई रावण को याद करता है क्या? स्वर्ग याद आता है। प्राप्ति का युग है। अप्राप्ति तो कुछ भी नहीं। तो दाता शिवबाबा याद आता है ना? तो ये याद तभी आती है जबकि बैठते हैं कुछ न कुछ। हँ? बाप की याद आती है और वो याद है देखो कितना सहज। हँ? सहज है? तो 24 घंटे याद आती होगी? हँ? सहज नहीं है? बाबा कहते कितना सहज है! ये क्या बात हुई? हँ? बाबा कहते वो सहज है या बच्चे कहते हैं इतना तो सहज नहीं है जो 24 घंटे याद आए, आते रहे, सहज-सहज याद आती रहे। तो फिर सहज होगा तो बाप याद आएंगे। और कठिन होगा तो नहीं याद आएंगे।

देखो, सहज कब होता है? हँ? सहज होता है
(किसी ने कुछ कहा।) आत्मिक स्थिति से? तो आत्मिक स्थिति 24 घंटे आती है ना? अरे? न आत्मा याद आती, न आत्मा का बाप याद आता। तो सहज कहां हुआ? (किसी ने कुछ कहा।) साकार सहज हुआ? तो साकार को याद करेंगे तो प्राप्ति हो जाएगी? हँ? तो भी प्राप्ति नहीं होगी। तो फिर? हँ? दुख होगा। मिसाल दिया जगदम्बा का। हँ? किसको याद करती है? हँ? याद करे या न करे वो याद आएगी जरूर। क्यों याद आती है उसे? और बच्चों को नहीं याद आती। और उसके लिए बताय दिया, समझाय भी दिया। क्यों लगातार याद आती है? हँ? क्या बात है? अरे, कान खुजलाने से थोड़ेही बात बनेगी? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, प्रैक्टिकल जीवन में जो सुख लिया है वो याद आएगा ना? हँ? और वो सुख भी तामसी स्टेज का नहीं। क्या? व्यभिचारी स्थिति का नहीं। कैसा सुख? हँ? एक से या अनेकों से? एक से सुख। तो प्रैक्टिकल में लिया। प्रैक्टिकल माने सहज-सहज शरीर के द्वारा, इन्द्रियों के द्वारा।

तो देखो ये सहज कैसे होगा? हं? अरे, जगदम्बा के लिए सहज कैसे हुआ? हँ? तीन मूर्तियों को तो पहचान लिया ना? नहीं पहचाना? हाँ। और उनका कनेक्शन अलग-अलग प्रकार का है तीनों का कि एक ही तरह का है? हँ? कैसे-कैसे अलग-अलग प्रकार का है? हँ? तीनों की याद सहज है क्या? तीनों की याद सहज है? नहीं है। क्यों? तीनों की तो सहज नहीं कर सकते। क्यों नहीं है? हँ? अरे? पहचान की बात हो रही थी ना? पहचाना है, सत्य बाप को पहचाना है सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्माओं के बीच में, हँ, चाहे आलराउंड पार्ट बजाने वाली हों, चाहे थोड़ा बहुत पार्ट बजाने वाली हों, उनमें सत्य पार्ट किसका है? अगर पहचान लिया तो सतयुग में जरूर जाएंगे। हँ? और पहचानना तो सारी दुनिया को है ना? तो सब सतयुग में चले जाएंगे क्या? हँ? सब नहीं जाएंगे। नहीं जाएंगे? अच्छा, एक जनम के लिए जाएंगे कि नहीं? हँ? अरे, जाएगी हर आत्मा एक जनम के लिए तो जीवनमुक्ति मिलेगी या नहीं मिलेगी? जीवन में रहते हुए दुख-दर्दों से मुक्त स्टेज अनुभव करेंगे या नहीं करेंगे? करेंगे। तो कहां एक दिन या एक जन्म और कहां जन्म-जन्मान्तर, अनेक जन्म। फर्क तो हो जाता है ना?

तो देखो कितना सहज याद आएंगे ये बात अनुभव करनी चाहिए कि कैसे सहज याद आएगी। आएंगे। माने अभी वर्तमान में उतना सहज याद आते हैं? नहीं याद आते हैं। आएंगे। अभी याद कभी आना चाहिए जो फिर स्वर्ग की बादशाही मिले। हँ? तो जरूर संगमयुग होगा। क्या? संगमयुग होगा? संगम माने? मेल होगा। अच्छा? मेल माने कितना मेल? जैसे सतयुग में कहते हैं, स्वर्ग में कहते हैं 21 जन्म का मेल हो जाता है। हँ? हो जाता है कि नहीं? हँ? 21 जन्म के लिए बाप आते हैं तो 21 जन्म की सगाई कराते हैं। अब कोई जितना पुरुषार्थ करे। बाकि ऐसे तो नहीं है कि स्वर्ग में रहेंगे और अनेक जन्म स्वर्ग भोगेंगे और अनेकों के साथ कनेक्शन हो जाएगा। होगा? नहीं। तो अभी पुरुषोत्तम तो बनेंगे ना? कब बनेंगे? संगम में बनेंगे ना? तो संगम कितना लंबा? 100 साल के संगम में? हँ? अरे, होगा संगम? अच्छा? 21 जन्म वाले के साथ सौ साल तक संगम होता रहेगा? हो जाएगा? हुआ? अनुभव किया? अरे? नहीं अनुभव किया। क्यों अनुभव नहीं किया? हँ?

अरे, क्योंकि जो संगम कराने के निमित्त बनता है; परंपरा क्या है? भारत में क्या परंपरा है? हँ? जीवन भर जीवन संगिनी या जीवन संगी-साथी का मेल कराने के लिए निमित्त कौन बनते हैं? अरे, एक अक्षर लिखो जल्दी से।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, मां-बाप। तो ये परंपरा पड़ी ना? कहां से? हाँ, इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर शिव बाप आते हैं, संगम का भी परिचय देते हैं और बच्चों का जो आत्मा रूप समझते हैं तो आत्मा का वो 84 जन्मों में कौनसी आत्मा विशेष होगी जिसके साथ नंबरवार एक जैसा तो नहीं, लेकिन कोई न कोई आत्मा ऐसी 84 जन्मों में होगी ना जिसके साथ संगम ज्यादा स्थायी रहेगा। नहीं होगी? हां, होगी। तो ये सिट्टाजोरी कराने के लिए बेहद की ब्राह्मणों की दुनिया में भी मां-बाप निमित्त बनते हैं ना? हँ? हाँ, मां-बाप निमित्त बनते हैं। तो मां-बाप को पहचानेंगे तब ही होगा या पहले से ही हो जाएगा? हँ? पहचानेंगे। पहचानेंगे तो याद सहज होगी या कठिन होगी? हँ? सहज याद होगी। लेकिन कठिन याद है इसका मतलब पहचाना है या नहीं पहचाना है? हँ? बीच-बीच में माया वायलोरा डालती है और संशय आता रहता है या नहीं आता है? हँ? संशय आता है। और संशयबुद्धि? हँ? 84 जन्मों का जो संगम है वो विनश्यंति। कि काबिज बना रहेगा? नहीं। तो बताया संगमयुग होगा तो पुरुषोत्तम बनेंगे।

A night class dated 30.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was that by getting the introduction of the Father from the Father, who establishes heaven, you will get the introduction of heaven that we are obtaining the inheritance of heaven from Baba. So, look, this is jeevanmukti (liberation in life), isn’t it? This is why it is sung that jeevanmukti in a second. That happens only when you recognize. Whom do you recognize? The one whom you recognize;
(Someone said something.) Yes, you do recognize the Father. It has been told that the fathers are two. One is, the unlimited fathers are two; the Father of the human world and the Father of souls. So, the topic of which Father is being discussed here? It was told that He establishes heaven. ‘He establishes’ means that He is a doer (kartaa), isn’t He? Or is He a non-doer (akarta)? If we say that He is a doer, then it is proved that if He is a doer, then He is a pleasure-seeker (bhokta) as well. The one who is not a doer is not a bhokta as well. It was told that this is a calculation of kartaa and bhokta. So, it is about recognizing whom? Which Father? It is because in the world the fathers are also many, yes, birth by birth; the founders of religions are also great fathers; and those founders of religions also believe in their Father, the Father of the human world, Aadam, Adam. And that Aadam does not accept any human being as his Father. When? When he gets the realization of his soul then will the Father of the human world, Aadam, Adam accept any human being as his Father? He will not accept, will he? Yes. But the topic being discussed here is of the Father who establishes heaven. Yes.

So, when you recognize him, then later whether he becomes Narayan, hm, or becomes anything birth by birth. But they do become jeevanmukt (liberated in life), don’t they daughter? As is the king and queen, so are the subjects. Well, when the Father who establishes heaven, becomes jeevanmukt, then just like the king, how will the subjects, the children also be? Will they be liberated while living in the life or will they be liberated in the next birth? So, all the children become liberated in life. And bondage in life (jeevanbandh) becomes murdaabaad (down with/death to). Liberated in life (jeevanmukt) become jindaabaad (victory to).

Now this is a very easy topic to understand that for half a Kalpa there is happiness and for half a Kalpa there is sorrow. Knowledge and Bhakti. Knowledge leads to happiness. Ignorance, i.e. Bhakti leads to sorrows. That you have been observing since thousands of years in the history, haven’t you been? Hm? Many people sing – Knowledge, Bhakti and detachment (vairaag). Hm? So, why do they sing in this sequence? First knowledge, then Bhakti, then detachment. Hm? Detachment from what? If you get knowledge of the soul, if you get the knowledge of the Father of the soul, then it sits firmly in the intellect that only one is truth and the topic of truth is received only from one, the Truth. An the one from whom you get the truth, so, the one who inculcates truth will establish the Golden Age Then there are numberwise also. So, what is the result? That knowledge is received from one. Well, whether that one is incorporeal or corporeal or the combination of incorporeal and corporeal because unless the incorporeal soul combines through the corporeal body, how will you receive knowledge? So, this topic sat in the intellect that knowledge is received from one, i.e. happiness is received only from one. And when the intellect runs after many, you get sorrows.

So, after Bhakti comes the dualist Copper Age and then the Iron Age. After the Iron Age comes the Golden Age. So, when you have to go to the Golden Age, then through ignorance and the world of ignorance, through this ignorance, this world of sorrows was established; you will definitely get detachment from that, will you not? So, detachment (vairaag) is definitely in the Iron Age. And there is love in the Golden Age. Vi means vipreet (opposite). Raag means love. People say, don’t they? Raag-dvesh, night-day, happiness-sorrows. So, viraag means vairaag (detachment). Detachment from whom? Detachment from truth? Neither detachment from truth (Satya), nor detachment from the Golden Age (Satyug). So, that love of you children; you have love for truth, don’t you? And the entire world has love for truth. Only when they recognize. So, you children have love because these children know that the emperorship of the Golden Age is received only from ShivBaba. This is why the one from whom you get attainments, you automatically remember him. Do you remember the one from whom you get sorrows? You get sorrows from Ravan; so does anyone remember Ravan? You remember heaven. It is an Age of attainments. There is nothing unattainable. So, the giver ShivBaba comes to the mind, doesn’t He? So, this remembrance comes only when you sit to some extent or the other. Hm? The Father comes to the mind and look that remembrance is so easy. Hm? Is it easy? So, you must be remembering 24 hours? Hm? Is it not easy? Baba says – It is so easy! What is this? Hm? Is that which Baba says easy or the children say that it is not so easy that we remember for 24 hours, we remember easily. So, then the Father will come to the mind when it is easy. And He will not come to the mind if it is difficult.

Look, when is it easy? Hm? It is easy
(Someone said something.) through soul conscious stage? So, the soul conscious stage comes 24 hours, doesn’t it? Arey? Neither the soul comes to the mind, nor the soul’s Father comes to the mind. So, is it easy? (Someone said something.) Is corporeal easy? So, will you achieve attainments if you remember the corporeal? Hm? Even then you will not achieve attainments. So, then? Hm? You will feel sorrowful. The example of Jagadamba was given. Hm? Whom does she remember? Hm? Whether she remembers or not the thoughts will definitely come to her mind. Why does she remember? Other children do not remember. And for her it has been told, it has also been explained. Why does she remember continuously? Hm? What is the topic? Arey, will you solve the topic if you prick your ears? Hm? (Someone said something.) Yes, the happiness that she has obtained in the practical life will come to her mind, will it not? Hm? And that happiness is also not of the degraded (taamsi) stage. What? Not of the adulterous stage. What kind of happiness? Hm? From one or from many? Happiness from one. So, she obtained in practical. Practical means easily through the body, through the organs.

So, look, how will this be easy? Hm? Arey, how is it easy for Jagdamba? Hm? You have recognized the three personalities, haven’t you? Haven’t you recognized? Yes. And is the connection of all those three of different kinds or is it of one kind only? Hm? How is it of different kinds? Hm? Is the remembrance of all the three easy? Is the remembrance of all the three easy? It isn’t. Why? It cannot be said to be easy in case of all the three. Why isn’t it? Hm? Arey? The topic of recognition was being discussed, wasn’t it? You have recognized, you have recognized the true Father amongst the souls playing the part on the world stage, be it those who play all-round part, be it those who play a little part, whose part is true among them? If they have recognized then they will definitely come in the Golden Age. Hm? And the entire world has to recognize, will it not? So, will everyone go to the Golden Age? Hm? Everyone will not go. Will they not go? Achcha, will they go for one birth or not? Hm? Arey, if every soul goes for one birth, then will it get jeevanmukti (liberation in life) or not? Will they experience a stage of being free from sorrows and pains while being alive or not? They will. So, on the one hand is one day or one birth and on the other hand is birth by birth, many births. There happens to be a difference, isn’t it?

So, look, it will come to the mind so easily! You should experience this topic as to how easily the thoughts will come to the mind. They will come. It means that now, at present, do they come to the mind that easily? They do not come to the mind. They will come. Now you should remember so that you get the emperorship of heaven. Hm? So, definitely the Confluence Age (Sangamyug) will exist. What? Will the Confluence Age exist? What is meant by sangam? Meeting will take place. Achcha? Meeting means meeting to what extent? For example, you say that in the Golden Age, you say that in heaven you meet for 21 births. Hm? Does it happen or not? Hm? For 21 births, when the Father comes, He causes engagement for 21 births. Well, to whatever extent someone makes purusharth. But it is not as if you will live in heaven and you will enjoy heaven for many births and you will have connection with many. Will you have? No. So, now you will become Purushottam, will you not? When will you become? You will become in the Confluence [Age], will you not? So, how long is the Confluence [Age]? Is it in the 100 years’ confluence? Hm? Arey, will the confluence take place? Achcha? Will the confluence keep on taking place for hundred years with the [companion] soul of 21 births? Will it happen? Did it happen? Did you experience? Arey? You did not experience. Why didn’t you experience? Hm?

Arey, it is because the one who becomes instrumental in enabling the confluence (meeting); what is the tradition? What is the tradition in India? Hm? Who become instrumental in enabling the meeting with the life-long life partner or life-long companion? Arey, write one alphabet quickly.
(Someone said something.) Yes, the parents. So, this tradition was laid, wasn’t it? From where? Yes, Father Shiv comes on this world stage; He also gives the introduction of the confluence (sangam) and of the children, who consider themselves to be soul-form, then which is that specific soul in 84 births with whom you will have confluence numberwise, not alike, but there will be some or the other such soul in 84 births, with whom your confluence will be more permanently. Will it not be? Yes, it will be. So, in order to enable this match (sittajori) the parents become instrumental in the unlimited world of Brahmins also, don’t they? Hm? Yes, the parents become instrumental. So, will it happen only when you recognize the parents or will it happen beforehand? Hm? You will recognize. If you recognize then will the remembrance be easy or difficult? Hm? The remembrance will be easy. But if the remembrance is difficult, then does it mean that you have recognized or not? Hm? Maya creates obstacles in between and does doubt keep on emerging or not? Hm? Doubt emerges. And doubtful intellect? Hm? The confluence of 84 births causes destruction. Or will it remain occupied? No. So, it was told that when there is Confluence Age, you will become Purushottam (highest among all the souls).
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2947, दिनांक 20.07.2019
VCD 2947, dated 20.07.2019
रात्रि क्लास 30.11.1967
Night class dated 30.11.1967
VCD-2947-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.45
Time- 00.01-18.45


रात्रि क्लास चल रहा था – 30.11.1967. और दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – जब शमशान में जाते हैं तो पहले तो माथा शहर की ओर। शमशान में पहुंचे तो माथा घुमाय देते हैं। कहां की यादगार? हँ? जरूर कहेंगे पुरुषोत्तम संगमयुग में शूटिंग पीरियड की यादगार है जब बेहद का ड्रामा शूट हुआ था। क्या हुआ था उस समय? हँ? बुद्धि रुपी मत्था जब तक इस दुनिया में रहता है, हँ, तो कहेंगे शमशानघाटवासी हुआ? नहीं हुआ। तो शमशान घाट में पहुंचते हैं तो मत्था घूम जाता है। वो मन-बुद्धि रूपी मत्था किधर काम करता है? हँ? पुराने जन्म की बात याद आती है या शमशानघाटवासी के देश में पहुंच गए? कौन है शमशानघाटवासी? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, वो ही जो मुर्दों की भभूत लगाता है। भभूत जानते हैं? हाँ, भभूत माने जो मरते हैं ना, तन से, मन से, धन से, समय, संपर्क, संबंधियों से मर जाते हैं वो दुनियादारी को भूल जाते हैं, खतम कर देते हैं, तो जैसे मर गए, योगाग्नि में जल गए। जल गए ना? हाँ, तो क्या बचा? जल गए तो कुछ बचा कि नहीं बचा? राख बची। हाँ।

तो वो राख यादगार है। कौन? इस दुनिया में पहले-पहले कौन राख बना? जो बाबा ने बोला भी है - अब देखेंगे कोटों में से एक, लाखों में से एक कौन निकलते हैं? हँ? किस बात में निकलते हैं? राख बनने में। हँ? देह भान को राख बना देना। तो कौन हुआ शमशानघाट वासी जो पहले-पहले अपने देहभान को स्वाहा करता है? कोई है? हाँ, एक अक्षर लिखो। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शंकर। तो उसको तो जगतपिता कहा जाता है। जगतम पितरम वंदे पार्वती परमेश्वरौ। हाँ।

तो बताया कि शमशान घाट में जब पहुंचते हैं, शमशानघाट वासी के देश में, तो फिर वो ही याद आएगा ना? हँ? कौन है? वहां क्या पड़े हुए हैं? सब मुर्दे पड़े हुए हैं। हँ? क्या दिखाई देंगे? मुर्दे दिखाई देंगे ना? तो इस दुनिया में भी पहले से क्या दिखाई पड़ना चाहिए? सब? सब मुर्दे बने पड़े हैं। अच्छा? चलो, बाहर की दुनिया में कि अंदर ब्राह्मणों की ब्राह्मणों की दुनिया में भी?
(किसी ने कुछ कहा।) कहां? यहां भी? अच्छा? यहां भी दो दुनिया है। एक बेसिक ब्राह्मणों की दुनिया। हँ? वो नीचे कैटागरी के जो ब्राह्मण बनते हैं। नौ कुरी के ब्राह्मण होते हैं ना? तो बाद वाली कुरियों के भी होते हैं और फर्स्टक्लास एकदम अव्वल नंबर कुरी का होता है। तो उनको नाम अलग-अलग दिये गए हैं - चन्द्रवंशी, इस्लामवंशी, बौद्धीवंशी, क्रिश्चियनवंशी, क्रिश्चियनवंशी; नाम दिए गए हैं ना? हाँ, उन धर्मों में कन्वर्ट होने वाले या उन धर्मों के ओरिजनल।

तो वो याद आएंगे कि वो सब मुर्दे बने पड़े हैं? क्या कहेंगे? हँ? वो नहीं याद आएंगे। चलो, वो नहीं याद आएंगे। मुर्दे बने पड़े हैं। अच्छा, उन्हें छोड़ दो। एडवांस वाले? हँ? एडवांस वाले मुर्दे बने पड़े हैं कि अभी जिंदा हैं? हं? थोड़ा दिल लगाना चाहिए? हँ? अरे, दिल लगाना चाहिए कि नहीं थोड़ा-थोड़ा? थोड़ा टाइम नहीं देना चाहिए? बिल्कुल नहीं टाइम देंगे? हँ? थोड़ा-थोड़ा देते रहें। हँ? चलेगा? हँ? अरे, माताजी तो हंस रही है। हँ? आँख का आँसू पोंछ रहे हैं क्या? हँ? याद आ रहे? नहीं, नहीं। कोई भी याद न आए। हँ? हाँ, सब मरे पड़े हैं। आज नहीं तो कल क्या होने वाले हैं? हँ? हाँ, तो यहां ब्राह्मणों की दुनिया में मरा हुआ किसको कहा जाता है? हँ? मरा हुआ उसको कहा जाता है जो बाप को छोड़ दे। बाप के प्रति अनिश्चयबुद्धि हो जाए। तो क्या सारे ही अनिश्चयबुद्धि हो जाएंगे क्या? माया किसी को नहीं छोड़ेगी? हाँ, छोड़ेगी तो किसी को नहीं। हाँ, कोई को पहले हप कर जाएगी, खा जाएगी और कोई को? कोई को बाद में खाएगी। ज्यादा पावरफुल होगा तो बचा रहेगा ना? हाँ, मुकाबला करेगा। तो बताया कि समझना यही है कि चाहे हद की दुनिया हो, चाहे बेहद की ब्राह्मणों की दुनिया हो, ये सब मरे पड़े हैं, सब मुर्दा हैं। इसलिए, मुसलमान लोग आज भी कहते हैं। क्या? मरना माने कब्रदाखिल होना। कहां हो गए? हाँ, शमशानघाटवासी। कब्र में दाखिल हो गए। मिट्टी में मिल गए। मिट्टी में मिल गए माने? राख बन गए। हाँ। राख माने मिट्टी।

तो शमशानघाट में जाते हैं तो माथा घूम जाता है। माथा माने? मन-बुद्धि रूपी माथा घूम जाता है। आगे माथा इस तरफ में था, शहर की तरफ। हँ? अभी हमारा माथा सदैव शमशान घाट की तरफ होना चाहिए। क्योंकि बाबा ने बताय दिया ना कि तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। क्योंकि वानप्रस्थी हो जाते हैं ना वो घरों में ही घुसे रहते हैं क्या? हँ? हाँ, अलग अपनी कुटिया बनाते हैं। जिसको जरूरत हो, वो आकरके कोई बात पूछनी हो, कुछ मुंझ रहे हों, तो आके पूछो। तो उनके सामने वाणी चलाएंगे। नहीं तो नहीं चलाएंगे? हाँ, चलाएंगे। उनको रास्ता दिखाएंगे। वानप्रस्थी कोई सन्यासी थोड़ेही हो गए? क्या हो गए? बाबा सन्यासी की बात करते हैं क्या? नहीं, वानप्रस्थी की बात करते हैं। तो वानप्रस्थ अवस्था है ना? सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। छोटे हों, चाहे बुड्ढे हों, चाहे नौजवान हों, सबकी क्या अवस्था है अभी? हाँ, तुम बच्चों की वानप्रस्थ अवस्था। इसलिए कोशिश करते रहो। फिर भी देखो क्या ऐसी कोई चीज़ है जो माथा फिराय देती है? हँ? उस चीज़ को पकड़ो। क्या? उस चीज़ को पकड़ लिया; कोई चीज़ है पकड़ में आने वाली या हवा है? अरे, भूत-प्रेत है या कुछ है? अरे, कोई चीज़ आँखों से देखने योग्य, हाथों से छूने योग्य, पकड़ने योग्य कुछ है या नहीं है? है तो सही। तो बताया वो चीज़ कोई ऐसी है जरूर जो माथा मन-बुद्धि को फिराय देती है। क्या फिराय देती है? हँ? बुद्धि में ये बात बैठने नहीं देती है कि सब मरे पड़े हैं। हँ? बुद्धि में बात बैठती है फिर? हाँ, नहीं। अरे, मरे कहां पड़े हैं ये? ये थोड़े और जिंदा रह जाएं। तो थोड़ी हमारी इच्छा पूर्ति हो जाए। अरे, बाप कहते हैं ये कोई मशीन-वशीन भी नहीं है। हँ? कोई चीज़ नहीं है। आटोमेटिकली बुद्धि का योग तुम्हारा पुरानी दुनिया की तरफ चला जाता है। हँ? स्थायी बुद्धि जो है शमशानघाट की तरफ ठहरती नहीं है। ठहरती है? नहीं ठहरती।

तो ये बच्चे जब विचार सागर मंथन करते हैं; हँ? क्या विचार सागर मंथन? हँ? शमशानघाटवासी दुनिया का विचार सागर मंथन करते हैं तो वो करते-करते, समझते, पुरुषार्थ करते, यात्रा में रहते, फिर क्या होगा? आखरीन पार चले जावेंगे। पार पहुंच जाते हैं। तो ये भारत का जो ये बेड़ा है ना? हँ? क्या? बेड़ा माने जानते? हँ? बेड़ा माने? अरे? एक अक्षर तो लिखो तो पता चले। बेड़ा माने क्या?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, बेड़ा माने शरीर। हाँ, ये शरीर रूपी नवैया है ना? ये देह जो है ना, ये देह आत्मा की नवैया है। इस शरीर रूपी नवैया पे बैठकरके हम पार जाएंगे। कि इसको छोड़ दें ब्रह्मा बाबा की तरह, हँ, तो पार लग जाएंगे? फिर नहीं जल्दी पार लगेंगे। फिर तो भूत-प्रेतों की दुनिया में रहेंगे। हँ? और भूत-प्रेत हमको पार लगने देंगे? नहीं। हाँ, फिर तो उनको तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार की जुंबिश में बांध के रखेंगे।

तो वो इस समय इस याद की यात्रा से बेड़ा पार हो जाता है। किस याद की यात्रा से? इस माने कौनसी याद की यात्रा की तरफ इशारा किया? दुनिया में तो बहुत तरह याद करते हैं। कोई अपने बच्चे को याद करते हैं, कोई पति को याद करते हैं, कोई किसी को, संबंधी को याद करते हैं, कोई पदार्थों को याद करते हैं। लड्डू पेड़ा, जलेबी याद आता रहता है। हँ? बुड्ढ़े-2 हो जाएंगे। उनकी और इन्द्रियां तो काम नहीं करती। जीभ तो अब हाय-हाय। उसमें तो लगा रहेगी। चट्टो है गई जीभ, जलेबी ले आ, ले आ। हाँ।

तो बताया कौनसी याद? अरे याद?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, एक की नहीं याद कि एक शिव की याद। वो तो बिन्दी है। क्या? उस एक की याद, बिन्दी की याद से काम नहीं चलने वाला। क्यों? क्योंकि बिन्दी तो हमारी आत्मा भी है। है ना? हाँ, बिन्दी को चाहे जितना छोटा बना दो। बहुत छोटा बना लो। बनाते चले जाओ, बनाते चले जाओ छोटा। हाँ। कहते हैं कि कोई ऐसा एक्सपर्ट चित्रकार निकला जिसने चावल के दाने के ऊपर पूरी गीता लिख दी। तो अक्षर कितने छोटे बनाए होंगे? बहुत छोटे-छोटे। और आज के वैज्ञानिक हैं ना, वो अणु को तोड़ देते हैं। हँ? मिट्टी के कण हैं ना? हाँ, तोड़ते चले जाते हैं, तोड़ते चले जाते हैं। तो कितना सूक्षम हो जाता है? वो कण आँखों से दिखाई पड़ते? नहीं दिखाई पड़ते हैं। वो तो यंत्र से देखे जाते हैं। लेकिन ये आत्मा जो है वो तो इतनी सूक्षम है कि इन आँखों से भी नहीं देखी जा सकती तो यंत्रों से भी नहीं देखी जा सकती। तो बिन्दु रूप तो कहेंगे ना? हाँ। छोटा बिन्दु है छोटे। अणोणीयांसम अनुस्मरेत यः। (गीता 8/9) ऐसे गीता में बोला है ना? हाँ।

तो इस याद की यात्रा से; अणु की याद की यात्रा से? नहीं। अणु तो हमारी आत्मा भी है। अणु हमारी आत्मा का बाप भी है। सिर्फ उसकी यात्रा से हम पार नहीं जाएंगे। कहां पार जाना है? हँ? न आत्माओं की दुनिया में जाएंगे, न स्वर्ग लोक में जाएंगे। न मुक्तिधाम में जाएंगे, हँ, न जीवनमुक्तिधाम में जाएंगे। तो कौनसी याद करें? हँ? अरे, प्रैक्टिकल किसे कहेंगे? आत्मा ज्योतिबिन्दु फुदक-फुदक के सारा काम करेगी प्रैक्टिकल में? नहीं करेगी ना? तो
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, फिर शिवबाबा। बाबा? बाबा तो तब कहा जाएगा क्योंकि वो तो बाप है आत्माओं का, ज्योतिबिन्दु शिव। उसका नाम भी शिव है बिन्दी का। वो नाम बदलता नहीं है। बदलता तब है जब कोई शरीर में प्रवेश करते हैं तो कहा जाता है शिवबाबा। तो कौनसे शरीर की बात है? हँ? जिन शरीरों में प्रवेश करते हैं उनमें प्रसिद्ध शरीर तो वो चार मुंह वाला ब्रह्मा है। चार मुंह हैं तो चार शरीर भी होंगे। देहधारी होंगे कि नहीं? हाँ। भले वो अपने आपस में मिलके सट्टाजोरी कर ली। मिलके एक हो गए। जो तू बोलेगा सो मैं बोलूंगा। मैं बोलूंगा सो तू बोले। दोनों एक-दूसरे को सपोर्ट करते हैं। दोनों या तीनों या चारो;. (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। वो जो पांचवां मुख है ना परमब्रह्म, हँ, पांचवां ब्रह्मा का मुख वो ऊर्ध्वमुखी दिखाते हैं। तो वो है मुकर्रर रथधारी का। वो मुकर्रर रथधारी में उस शिव ज्योतिबिन्दु को याद करेंगे तो कहा जाएगा शिव प्लस बाबा।

A night class dated 30.11.1967 was being narrated. And the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was – When you go to the cremation grounds, then initially the forehead [of the corpse] is towards the city. When you reach the cremation grounds, then they turn the forehead. It is a memorial of which place? Hm? It will definitely be said that it is a memorial of the shooting period in the Purushottam Sangamyug when the shooting of the unlimited drama took place. What had happened at that time? Hm? As long as the intellect like forehead remains in this world, hm, then will it be said that he became a resident of the cremation grounds? He didn’t. So, when you reach the cremation grounds then the forehead is turned. Where does that mind and intellect like forehead work? Hm? Does the topic of the old birth come to the mind or did you reach the country of the one who resides in the cremation grounds? Who is the resident of the cremation grounds?
(Someone said something.) Yes, the same person who applies the ash (bhabhoot) of the corpses. Do you know bhabhoot? Yes, bhabhoot means those who die, don’t they? Those who die through the body, through the mind, through the wealth, time, contacts, relatives, they forget the worldly affairs, end it, so, it is as if they died, burned in the fire of Yoga. They were burnt, weren’t they? Yes, so, what was left? When you were burnt, then was anything left or not? Ash was left. Yes.

So, that ash is a memorial. Who? Who became ash first of all in this world? Baba has also said – Now it will be seen as to who emerges as one among crores, one among lakhs? Hm? In which topic do they emerge? In becoming ash. Hm? Make the body consciousness as ash. So, who is the resident of the cremation grounds who first of all burns his body consciousness? Is there anyone? Yes, write one alphabet.
(Someone said something.) Yes, Shankar. So, he is called the Father of the world. Jagatam pitaram vande Paarvati Parmeshwarau. Yes.

So, it was told that when you reach the cremation grounds, in the country of the resident of the cremation grounds, then he alone will come to the mind, will he not? Hm? Who is it? What are lying there? Everyone has become a corpse. Hm? What will they appear to be? They will appear as corpses, will they not? So, what should be visible beforehand in this world also? Everyone? Everyone has become a corpse. Achcha? Okay, in the outside world or in the inner world of Brahmins also?
(Someone said something.) Where? Even here? Achcha? Even here there are two worlds. One is the world of basic Brahmins. Hm? Those who become Brahmins of the lower category. There are nine categories of Brahmins, aren’t they there? So, there are those of the latter categories also and there is one of the first class, completely number one category. So, they have been given different names – Chandravanshi, Islamvanshi, Bauddhivanshi, Christianvanshi, Christianvanshi; names have been assigned, haven’t they been? Yes, those who convert to those religions or those who belong to that religions in original form.

So, will they come to the mind that they all have become corpses? What would you say? Hm? They will not come to the mind. Okay, they will not come to the mind. They have become corpses. Achcha, leave them. Those following the advance [knowledge]? Hm? Have those who are following advance [knowledge] become corpses or are they still alive? Hm? Should you connect your heart with them a little? Hm? Arey, should you connect your heart a little or not? Should you not give them a little time? Will you not give them any time at all? Hm? You may keep on giving a little. Hm? Will it be okay? Hm? Arey, mataji is laughing. Hm? Are you wiping the tears of your eyes? Hm? Are they coming to your mind? No, no. None should come to the mind. Hm? Yes, everyone is dead. If not today, what is going to happen tomorrow? Hm? Yes, so, who is called dead here in the world of Brahmins? Hm? The one who leaves the Father is called a dead one. He should lose faith on the Father. So, will everyone lose faith? Will Maya not leave anyone? Yes, she will not leave anyone. Yes, she will gobble up, eat some persons first and some persons? Some persons she will eat later on. If someone is more powerful he will survive, will he not? Yes, he will confront. So, it was told that you should understand that be it the limited world, be it the unlimited world of Brahmins, all these are dead ones, all are corpses. This is why the Muslims say even to this day. What? To die means to enter into the grave. To which place did you go? Yes, residents of the cremation grounds. You entered into the grave. You mixed into the soil. What is meant by ‘mixing into the soil’? You became ash. Yes. Ash means soil.

So, when you go to the cremation grounds, the forehead [of the corpse] turns. What is meant by forehead? The mind and intellect-like forehead turns. Earlier the forehead was at this side, towards the city. Hm? Now our forehead should forever be towards the cremation grounds. It is because Baba has told, hasn’t He that you all are in the vaanprasth (retired) stage. It is because do those who become vaanprasthi remain inside the homes? Hm? Yes, they build their separate hut. Those who have any requirement, if they want to come and ask anything, if they are confused, then they can come and ask. So, they will speak in front of them. Otherwise, will they not speak? Yes, they will. They will show them the path. Are vaanprasthis sanyasis (renunciates)? What are they? Does Baba speak of the Sanyasis? No, He speaks of the vaanprasthis. So, you are in a vaanprasth stage, aren’t you? Everyone is in a vaanprasth stage. This is why keep trying. However look, is there anything that turns your forehead? Hm? Catch that thing. What? If you catch that thing; is there anything that you can catch or is it wind? Arey, is it a ghost or devil or anything? Arey, is there anything capable of being seen by the eyes, capable of being touched, held by the hands or not? It is indeed. So, it was told that there is definitely something that turns your forehead, mind and intellect. What does it turn? Hm? It does not make the topic sit in your intellect that everyone is dead. Hm? Does the topic sit in the intellect then? Yes, no. Arey, are they dead? Let them live for some more time. Then our desire will be fulfilled a little. Arey, the Father says that this is not a machine. Hm? It is not a thing. Automatically the connection of your intellect goes towards the old world. Hm? The intellect does not constantly remain towards the cremation grounds. Does it remain? It does not remain.

So, when these children churn the ocean of thoughts; hm? What churning of the ocean of thoughts? Hm? When they churn the ocean of thoughts of the world that is a resident of the cremation grounds, then while doing that, while understanding, while making purusharth, while being on journey, what will happen? Ultimately they will go across. They reach across. So, this ship (beda) of Bhaarat is there, isn’t it? Hm? What? Do you know what is meant by beda? Hm? What is meant by beda? Arey? I can know if you write one alphabet. What is meant by beda?
(Someone said something.) Yes, beda means body. Yes, this is a body-like boat, isn’t it? This body is there, isn’t it? This body is a boat of the soul. We will sail across by sitting on this boat-like body. Or will we sail across if we leave it like Brahma Baba? Then we will not sail across soon. Then we will live in the world of ghosts and devils. Hm? And will the ghosts and devils allow us to sail across? No. Yes, then they will tie them in the chains of lust, anger, greed, attachment, ego.

So, this body like boat is there, isn’t it? Yes, which boat? Hm? Which boat? Arey, it was not mentioned to be every Brahmin’s boat. The one that will be called true, hm, true boat. Which boat? Aadam, Shankar. They say on the path of Bhakti, don’t they? Shankar chaap jahaaj jehi chadhi utrain paar nar. Aur boodhi sakal sansaar. What? Body-like dress or body-like boat or body-like ship of Shankar is the true ship. What? It has been named as Chandrakant, Vedant ship in the scriptures. Yes. So, it will sail across. The one that enables you to sail across is the true boat. Hm? True boat, true ship. And if it makes you drown midway, then is it true or false? It is false. So, the boat that is said to be truly drowned; hm? Is this boat now drowned or has it sailed across? What would you say? ‘Paa’ or ‘doo’ [alphabets in Hindi]? Write one quickly. Arey, the time of tests is going on. You don’t write quickly. Then you will fail. Hm?
(Someone said something.) Yes, it is drowned. (Someone said something.) Did it sail across? Achcha? Wow brother! The boat on which mataji is sitting has sailed across. It has sailed across means has it come to our, our house? Is it so? Hm? Did it sail across for this reason? No. Did it sail across even if ghosts and devils enter into the home? Hm? There are ghosts of Kumbhakarna, aren’t they there? So, if they enter, then did he sail across? No. Where did he sail across? He is drowned.

So, he sails across at this time through this journey of remembrance. Through which journey of remembrance? ‘This’ refers to a gesture towards which journey of remembrance? People remember in many ways in the world. Someone remembers his child, someone remembers her husband, someone remembers someone, some relative, someone remembers things. Laddu, peda, jalebi (Indian sweets) keep on coming to their mind. Hm? They will grow old. Their other organs do not work. The tongue now keeps on crying. It will be busy in that. Tongue has become a licker; bring, bring jalebi. Yes.

So, which remembrance was mentioned? Arey, remembrance?
(Someone said something.) Yes, not the remembrance of one that you remember one Shiv. He is a point. What? Your work is not going to be completed by the remembrance of that one, through the remembrance of the point. Why? It is because our soul is also a point. It is, isn’t it? Yes, make the point as much small as possible. Make it very small. Go on making, go on making it smaller. Yes. It is said that one such expert painter emerged who wrote the entire Gita on a grain of rice. So, how small must he have made the alphabets? Very small, small. And there are today’s scientists, aren’t they there? They break the atom. Hm? There are particles of soil, aren’t they there? Yes, they go on breaking it, go on breaking it. So, how minute does it become? Do those particles remain visible to the eyes? They aren’t visible. They are seen through the instruments. But this soul is so subtle that it cannot be seen either through these eyes or through the instruments. So, it will be called point-form, will it not be? Yes. It is a small point. Anoneeyamsam anusmaret yah. (Gita 8/9) It has been said so in the Gita, hasn’t it been? Yes.

So, through this journey of remembrance; Through the journey of remembrance of atom? No. Our soul is also an atom. Our soul’s Father is also an atom. We will not sail across just by His journey [of remembrance]. Where do we have to sail across? Hm? Neither will we go to the world of souls, nor will we go to the world of heaven. Neither will we go to the abode of liberation (muktidhaam), hm, nor will we go to the abode of liberation in life (jeevanmuktidhaam). So, which remembrance should we do? Hm? Arey, what will be called practical? Will the soul, the point of light jump around and perform the entire task in practical? It will not perform, will it? So,
(Someone said something.) Yes, again ShivBaba. Baba? Baba will be said to be when because He, the point of light Shiv is the Father of souls. His name of the point is also Shiv. That name doesn’t change. It changes when He enters in a body, then He is called ShivBaba. So, it is about which body? Hm? The bodies in which He enters, among them the famous body is that four-headed Brahma. When there are four heads, then there will be four bodies also. Will there be bodily beings also or not? Yes. Although they connived together; they came together and became one. I will speak whatever you speak. You should speak whatever I speak. Both support each other. Both or all the three or all the four; (Someone said something.) Yes. That fifth head Parambrahm, hm, the head of the fifth Brahma is depicted to be upward-facing. So, that is of the permanent Chariot-holder. If you remember that point of light Shiv in that permanent Chariot holder, then it will be called Shiv plus Baba.
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