Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2854, दिनांक 18.04.2019
VCD 2854, dated 18.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2854-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.02
Time- 00.01-17.02


प्रातः क्लास चल रहा था 20.11.1967. सोमवार का छठे पेज की पहली लाइन की बात क्लीयर हो रही थी दो दिन से; क्या? कि राधा और कृष्ण, इनमें क्या ख़ास फर्क बताया? हं? कृष्ण को कहते हैं श्यामसुंदर। परन्तु राधा को श्यामसुंदरी नहीं कहते हैं। तो फर्क हुआ ना। हं? कृष्ण को झुलाते हैं झूले में, राधा को तो नहीं झुलाते। तो देखो, उनको नहीं कहेंगे श्यामसुंदरी। और कह भी नहीं सकेंगे। क्योंकि श्यामसुंदर कहना तो एक के ऊपर ही शोभता है। तो ये सभी बातें बैठकरके बच्चों को समझाते रहते हैं कि बच्चों ये सभी अच्छी तरह से समझ जाएँ और किसको भी समझाने में समर्थ हो जाएँ। तो जो समझते हैं, लिखते हैं, नोट करते हैं, समझाते हैं। ऐसे प्रैक्टिस करते रहते हैं। तो इसमें समझाने की भी प्रैक्टिस चाहिए ना। तो जिसकी जास्ती प्रैक्टिस होती है समझने की, समझाने की और वो इंग्लिश में भी समझाते हैं, हिंदी में भी समझाते हैं, और जो-जो कोई जो-जो भाषा जानते हैं अच्छी तरह से उस भाषा में समझाते हैं। अभी इंग्लिश में भी समझाते हैं। हँ? ऐसे क्यों कहा कि ‘अभी’? पहले क्यों नहीं? हँ? पहले की जो पुरानी-पुरानी दीदी-दादियां हैं, वो इतनी पढ़ी-लिखी नहीं होती थी और बाद में अभी, हाँ, पढ़ी-लिखी कन्याएं आने लगी, तो वो अंग्रेजी भी जानती हैं। तो वो इंग्लिश में समझाते हैं।

अभी देखो वहाँ जाओ। कहाँ? कनाडा में। तो कनेडी में भी समझाते हैं। अभी जिस-जिस गांव में जाओ, लैंग्वेज तो अलग-अलग है ना। गुजराती में भी तो समझाना पड़ता है। उर्दू में इतना नहीं मुंझते। क्यों? क्योंकि उर्दू वाले हिंदी समझ जाते हैं। यहाँ मुसलमानों का राज्य सैंकड़ों साल चला ना भारत में। तो उनकी भाषा भी आ गई। यथा राजा तथा प्रजा। वैसी भाषा भी चलती है। तो जो उर्दू वाले हैं वो हिंदी समझ जाते हैं। इंग्लिश भी समझ जाते हैं। हँ? बाकि जो ये मद्रासी होवें, क्योंकि वो वहाँ माइयां-वाइयां नहीं जानती हैं बिल्कुल ही। आजकल तो अभी तो कितने साल हो गए? हँ? 50-60 हो गए, 70 साल हो गए। अभी तो वहाँ अंग्रेजी खूब चल रही है। पहले की बात बताई 67 की। तो वहाँ मद्रासी लोग में माइयां नहीं जानती हैं बिल्कुल। उनको फिर ट्रांसलेटर चाहिए। तो जो ट्रांसलेट करते हैं उनका पता है कितना मान होता है! हँ? जो 8-10 लैंग्वेज जानते हैं, अरे, उनकी तो बहुत कीमत होती है। फर्स्टक्लास लैंग्वेज टीचर हो गए ना। देखो, वो यहाँ भी होते हैं दिल्ली में। ये काउंसिलों में आकरके बैठते हैं। तो जब काउंसिलर्स के भाषण होते हैं तो सभी भाषाओं में वो समझाते रहते हैं। उनका ट्रांसलेट करते रहते हैं ना। तो वो भी प्रबंध तो रखा है ना बच्ची। अब उसका पगार भी कितना होगा ट्रांसलेटर का? क्योंकि ऐसे ट्रांसलेटर बहुत भाषाएं जानने वाले बहुत तो मिलेंगे नहीं। अरे, बहुत अच्छा पघार उनको मिलता होगा।

ऐसे तो पघार एक-दो से जास्ती होती ही है। क्योंकि इन सबसे जास्ती पघार तो इन साइंस घमंडियों को मिलता है। क्या? बहुत पघार मिलता है। क्योंकि खर्चा उनको मिलता है। और जो ये बॉम्ब बनाते हैं। समझा ना? क्या? यहाँ फिर शूटिंग होती है ब्राह्मणों की दुनिया में। बॉम्ब्स बनाने वालों की शूटिंग होती है ना। हँ? जैसे उन बॉम्ब्स में ऐसा भरते हैं जब वो फूटते हैं तो उनकी बदबू सूंघने मात्र से तुरंत खलास हो जाते हैं। ऐसे ये बड़े-बड़े बॉम्ब्स बनाते हैं। क्या? और उन बॉम्ब्स में ऐसी ग्लानि भरते हैं कि सूंघा और ये खेल खलास। चाहे कितना भी ज्ञान सुनाओ। हँ? ज्ञान की खुशबू होती है ना। वो सब बेकार। ग्लानि का बाम्ब फटता है। पता है बडे ते बड़ा बॉम्ब कौनसा है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, परमात्म प्रत्यक्षता बॉम्ब। परमपिता प्रत्यक्षता बॉम्ब नहीं।

पहले तो मुकर्रर रथ जिसे गीता में बताया – परमात्मा इति उदाहृतः। उसे परमात्मा कहा जाता है क्योंकि परमपिता तो एक ही आत्मा है जो अक्षर है और सदा अक्षर है। कभी क्षरित होता ही नहीं, और क्षीण होता ही नहीं। तो वो, वो तो एक ही है। लेकिन वो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है उसको भी आप समान तो बनाता है ना। तो वो जो कहा जाता है परमात्मा माने जो भोगी आत्माएं हैं उनके बीच में परम पार्टधारी। हँ? क्या? भोग भोगने में भी परम पार्टधारी। कैसा-कैसा भोग? एक तो होता है श्रेष्ठ इन्द्रियों का भोग। और उससे भी ऊँचा? इंद्रियातीत भोग। कौनसा? हँ? इन्द्रियों से परे का भोग होता है ना।
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं? क्या? हँ? अरे, सूर्य कलातीत है ना। तो कलातीत सुख देगा ना। चन्द्रमा तो 16 कलाओं में बंधा हुआ होता है। तो जो ज्ञान चन्द्र का पार्ट है, कृष्ण चन्द्र कहते हैं तो वो तो लिमिटेड सुख देगा ना, 16 कला में बंधा हुआ सुख देगा। और सूर्य तो? सूर्य तो अखूट ज्ञान की रोशनी का भण्डार है। तो अखूट सुख देगा ना।

तो वो जड़ सूर्य की बात नहीं है। ये चैतन्य ज्ञान सूर्य परमपिता हैविनली गॉड फादर शिव की बात है जो सदा शिव है। तो वो इस सृष्टि पर आते हैं तो वो परमात्मा के रूप में जो पार्ट बजाने वाली आत्मा हीरो पार्टधारी है; किस बात में पहले हीरो बनाता है? ऊँच ते ऊँच सुख भोगने में। कौनसा ऊँच ते ऊँच सुख? एक होता है भ्रष्ट इन्द्रियों का सुख। कर्मेन्द्रियां कहते हैं। हँ? ऊँचा होता है ज्ञानेन्द्रियों का सुख। उसमें भी तो नंबरवार हैं ना। हँ? ज्ञानेन्द्रियों में भी सबसे ऊंचा आँखों का, दृष्टि का सुख। और उससे भी ऊँचा इंद्रियातीत। ज्ञानेन्द्रियों से भी ऊँचा है, हाँ, जिसे कहें; क्या कहें? हँ? अतीन्द्रिय सुख। इन्द्रियों से अतिरेक में जाने वाला। जैसे इन्द्रियों का सुख भूल जाता है। वो अतीन्द्रिय सुख जिनको मिलता है, तो इन्द्रियों का सुख भूल (जाता है)। इतनी ऊँची कोटि का सुख है। तो वो जो हीरो पार्टधारी होगा वो तो फिर ऊँचे ते ऊँचा सुख भोगेगा ना। हँ? हाँ। तो उसकी तो फिर बहुत महिमा होगी संसार में।

फिर ये कोई नहीं जानता कि जो ऊँच ते ऊँच बनता है वो फिर चार अवस्थाओं से पसार होने के बाद इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर क्योंकि सारी सृष्टि का बीज है ना, बाप है, तो ऊँच ते ऊँच कर्म में भी बाप है, ऊँच ते ऊँच सुख भोगने में भी बाप है, शांति भोगने में भी बाप है और नीच ते नीच दुख और अशांति भोगने वालों का भी बाप है या नहीं है? हँ? है। तो जब नीच ते नीच सुख भोगता है भ्रष्ट इन्द्रियों का और सबसे जास्ती सुख भोगता है। दुनिया में क्रिश्चियन्स वगैरा होंगे यादव, उनमें तो फ्री है, हँ, उनके सरकार से कानून बना हुआ है तुम कितनी भी शादियां करो, कितने भी डायवोर्स दो। कितनों के साथ भी इन्द्रियों का सुख भोगो। छूट है कि नहीं? हाँ, छूट है। और सरकारी तौर पर नियम के मुआफिक शादी करो तो करो, नहीं करो तो गुप्त रूप में चाहे जितने के साथ सुख भोगो। तो व्यभिचारी हुआ सुख या अव्यभिचारी हुआ? व्यभिचारी सुख हुआ। तो ये भारत में तो इसे बहुत बुरा मानते हैं। क्यों? क्योंकि भारतवासी जो आत्माएं, मनुष्यात्माएं, उनमें जास्ती संख्या तो देवात्माओं की है ना। तो देवात्माओं ने तो ऊँच ते ऊँच सुख भोगा है। हँ? ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगा, 16 कला संपूर्ण सुख भोगा, इन्द्रियातीत सुख भोगा। तो उनको ये बात बहुत खराब लगती है कि अच्छी लगती है? हँ? बहुत ग्लानि की बात आती है। और वो ग्लानि है वो सुनकरके एकदम फां हो जाते हैं। कौन? भारतवासी या विदेशी? भारतवासी फां हो जाते हैं। तो ये जो बॉम्ब्स बनाते हैं ग्लानि के, हँ, व्यभिचार की ग्लानि सबसे बड़ी ग्लानि हुई ना भारतीयों के हिसाब से। समझा ना?

तो ये बॉम्ब्स हैं। बेहद के ब्राह्मणों की दुनिया में ग्लानि के बॉम्ब्स। किसकी ग्लानि? ऊँच ते ऊँच पार्टधारी, जो विश्वपिता है, सारी दुनिया का जो बीज है, बाप है, उसकी भी ग्लानि। तो, तो जो उनकी भावना बैठी हुई है, हँ, भगवान के ऊपर वो भावना टूट जाएगी या रह जाएगी? भावना टूटती है। और धड़ाधड़ टूटती है। ग्लानि सूंघी और बस अनिश्चयबुद्धि बने। तो अभी बॉम्ब्स जिसको नाम कहते हैं बॉम्ब, हँ, वो तो किस बात के लिए है? हँ? वो हद के बॉम्ब हद की मौत करते हैं। और ये बेहद का बॉम्ब? बेहद की मौत करता है। बेहद की मौत क्या होती है? हँ? बेहद की मौत होती है अनिश्चयबुद्धि विनश्यते।

The morning class dated 20.11.1967 was being narrated. On Monday, the topic on the first line of the sixth page was being cleared for two days; what? What special difference was mentioned between Radha and Krishna? Krishna is called Shyam-Sundar but Radha isn’t called Shyam-Sundari. So, there is a difference, isn’t there? They swing Krishna in a cradle. They certainly don’t swing Radha. So look, she won’t be called Shyam-Sundari. They won’t be able to call her [that] either. It is because calling someone Shyam-Sundar only befits only one. So, He sits and explains all these topics to the children, so that the children understand them all properly and become capable to explain to anyone. Those who understand, they write, note down [and] explain. They keep practicing like this. So, you need the practice to explain for this, don’t you? Those who have a lot of practice to understand and to explain; and they explain in English as well as in Hindi. And whoever knows whichever language well, they explain in that language. Now, they explain in English as well. Why was it said ‘now’? Why not earlier? Earlier, the old Didis, Dadis weren’t much educated and later on [i.e.] now, educated maidens started coming and they know English too. So, they explain in English.

Now look, go there. Where? To Kanada (Karnataka). So, they explain in Kanedi as well. Well, go to any village, the language is different, isn’t it? They have to explain in Gujarati too. They don’t get so confused in Urdu. Why? It is because those who speak Urdu understand Hindi. The Muslims ruled here, in India for hundreds of years, didn’t they? So, they learnt their language as well. As is the king, so are the subjects. The language in use is also accordingly [as that of the king]. So, those who speak Urdu understand Hindi. They understand English as well. As for the rest, there are these Madrasis. It is because the mothers there don’t know [Hindi] at all. Arey, nowadays, how many years have passed? 50-60 years have passed. 70 years have passed. Now English is very much in practice there. The time of the past, of 67 was mentioned. So there, the mothers among the Madrasis don’t know [Hindi] at all. Then, they need a translator. Do you know how much respect a person who translates commands? Those who know eight–ten languages, arey, they are valued a lot. They are first class language teachers, aren’t they? Look, they are also present here, in Delhi. They come and sit in councils. So, when councillors give speech, they (the translators) keep explaining in all the languages. They keep translating [their speeches], don’t they? This has also been arranged, hasn’t it daughter? Now, what must be the salary of a translator? It is because you won’t find many translators who know many languages. Arey, they might be very well-paid.

As far as the salary is concerned, one receives more than the other. It is because these egotistic scientists earn the most. What? They get a high salary. It is because they get money. And those who make these bombs; You did understand, didn’t you? What? The shooting happens here, in the world of Brahmins. The shooting of those who make bombs happens, doesn’t it? Hm? Just like they fill such [things] in those bombs that when they explode, [people] die immediately just by smelling their odour. Similarly, they make very big bombs like them. What? And they fill such defamation in those bombs that as soon as you smell them, the game is over. No matter how much knowledge you narrate. Hm? There is the fragrance of knowledge, isn’t there? All that goes in vain. The bomb of defamation explodes. Do you know what the biggest bomb is? Hm?
(Someone said something.) Yes, the bombof the revelation of the Supreme Soul. It isn’t the bomb of the revelation of the Supreme Father.

First of all, the permanent Chariot, who has been mentioned in the Gita: Parmaatamaa itii udaahrirah [meaning] he is called the Supreme Soul. It is because only One Soul is the Supreme Father, who is Akshar (one who doesn’t get discharged) and always Akshar. He never loses vigour at all. And He doesn’t become weak at all. That is just the One. But the permanent Chariot in which He enters, He makes him equal to Himself, doesn’t He? So, the one who is called the Supreme Soul, it means, the supreme actor among all the pleasure-seeking (bhogi) souls. Hm? What? He is the supreme actor in seeking pleasures too. What kinds of pleasure? One is the pleasure of the elevated indriyaan (organs). And even higher than that? It is the pleasure beyond the indriyaan. Which one? Hm? There is pleasure beyond the indriyaan, isn’t it there?
(Someone said something.) No? What? Hm? Arey, the Sun is beyond celestial degrees, isn’t He? So, He will give joy that is beyond celestial degrees, won’t He? The Moon is indeed bound in 16 celestial degrees. So, the part of the Moon of Knowledge who is called Krishnachandra will certainly give limited happiness, won’t he? He will give happiness that is bound in 16 celestial degrees. And [what about] the Sun? The Sun is in fact the store house of inexhaustible light of knowledge, so He will give inexhaustible happiness, won’t He?

So, it isn’t about that inert Sun. It is about the living Sun of Knowledge, the Supreme Father, the Heavenly God Father, Shiva who is Sada Shiva (forever beneficial). So, when He comes in this world, the soul that plays the part in the form of the Supreme Soul, who is the hero actor… In which aspect does He make him the hero first? In experiencing the highest of the high happiness. Which highest of the high happiness? One is the pleasure of corrupt indriyaan (organs), they are called karmendriyaan (organs of action). Hm? The happiness of the gyaanendriyaan is higher [than that]. Even among them (the gyanendriyaan), they are numberwise, aren’t they? The happiness of the eyes, of the vision is the highest among the gyaanendriyaan as well. And higher than that is [the happiness] beyond the indriyaan. [The happiness] higher than even the gyaanendriyaan is, yes, which should be called… What should it be called? Hm? The super sensuous joy, the happiness that takes you beyond the indriyaan. It is as if you forget the pleasures of the indriyaan. Those who experience the super sensuous joy, they forget the pleasures of the indriyaan. It is the happiness of such high category. So, the one who is the hero actor will experience the highest of the high joy, won’t he? Hm? Yes. So he will be glorified a lot in the world.

Then, no one knows that the one who becomes the highest of the high, after passing through the four stages on this stage like world… It is because he is the seed of the whole world, isn’t he? He is the Father. So, he is the Father in [performing] the highest of the high actions also and in experiencing the highest of the high joy as well as peace. And is he the Father of those who experience the lowliest sorrow and restlessness or not? Hm? He is. So, when he experiences the lowliest pleasure of the corrupt indriyaan (organs) and he experiences it the most. The Christians, etc the Yadavas in the world are free. Their government has made a law: you may marry and divorce as many times as you want. Experience the pleasure of the indriyaan with as many [people] as you wish. Do they have [this] freedom or not? Yes, they have. And marry according to the government, legally if you want to, otherwise you may experience pleasure with as many as you wish secretly. So, is it pleasure adulterous or non-adulterous? It is adulterous pleasure. This is considered [to be] very bad in India. Why? It is because there is a majority of the deity souls among the Bharatvaasi souls, the human souls, isn’t it? So, the deity souls have experienced the highest of the high happiness. Hm? They experienced the happiness of the gyaanendriyaan, they experienced the happiness complete with 16 celestial degrees [and] the happiness beyond the indriyaan. So, do they dislike this concept [of adultery] a lot or do they like it? Hm? It is a matter of great defamation for them. And they become very upset listening to that defamation. Who? The Bharatvaasis or the foreigners? The Bharatvaasis become upset. So, the bombs of defamation that are made… The defamation of adultery is the biggest defamation according to the Indians, isn’t it? You did understand, didn’t you?

So, these are the bombs, the bombs of defamation in the unlimited Brahmin world. Whose defamation? It is the defamation of even the highest of the high actor who is Vishvapita (World Father), who is the seed, the Father of the whole world. So, so, the ones who have feelings for God, will they lose that feeling or will it be intact? They lose that feeling. And they lose it rapidly. They smell the defamation and they immediately become the ones with a doubting intellect. So now, the things that are called bombs, bomb... For what purpose are they [made]? Those limited [physical] bombs cause limited [physical] death. And this unlimited bomb? It causes unlimited death. What is the unlimited death? Hm? The unlimited death means to have a doubting intellect and to be destroyed (anishchaybuddhi vinashyate).

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2855, दिनांक 19.04.2019
VCD 2855, dated 19.04.2019
प्रातः क्लास 20.11.1967
Morning class dated 20.11.1967
VCD-2855-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.43
Time- 00.01-18.43


प्रातः क्लास चल रहा था- 20.11.1967 सोमवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी, हां, ये जो अलग-अलग भाषाओं के ट्रांसलेटर्स होते हैं ना उनको बहुत पगार मिलता है। लेकिन इन सबसे ज्यादा पघार तो साइंस घमंडियों को मिलता है जो बाम्ब्स बनाते हैं। वो हैं हद के बॉम्ब्स और ये हैं बेहद के बाम्ब्स। नाम है ना। ये मौत के लिए हैं ना। एरोप्लेन की तो बात ही छोड़ दियो। वो तो वरी घूमने के लिए हैं। पर ये जो बाम्ब्स सब कहते हैं वो तो तभी तो समझेंगे ना। ये बाम्ब्स की तो ये ही है मिसाइल जो शास्त्रों में लिखा है कि वो जो वृष्णवंशी यादव थे उनके पेट से, बुद्धि रूपी पेट से मिसाइल निकले, मूसल निकले, मूसल। मिसाइल्स को मूसल लिख दिया है। उनका आकार मूसलों जैसा होता है ना। तो एक-दो को लड़ाते हैं, टकराते हैं। तो मनुष्य तो समझते हैं ना कि विनाश तो होने का ही है। और बाम्ब्स विनाश, भई अच्छा एरोप्लेन, चलो भाई ये स्वर्ग की निशानी है। अभी ये बाम्ब्स तो स्वर्ग की निशानी नहीं है ना। ये बाम्ब्स नहीं स्वर्ग में होते हैं। वो तो संगम युग में ही होते हैं। चाहे हद के चाहे बेहद के।

तो ये तो जरूर समझना चाहिए ना बच्चे कि भई वहां स्वर्ग में एरोप्लेन तो होते हैं सुख देने के लिए। हँ? परंतु ये बाम्ब्स तो नहीं होते हैं पूरी दुनिया का विनाश करने के लिए। ये तो दुखदाई है ना। अभी बनाए हैं तो भी देखो कितना भय फैला हुआ है। संसार में भय फैला हुआ है ना। किसके लिए? कि बाम्ब्स बन चुके हैं। दुनिया का विनाश का बारूद तैयार हो गया है। अब क्या होगा? तो अब तुम बच्चों को मालूम पड़ गया कि सतयुग में विनाश तो नहीं होगा बाम्ब्स से। बाम्ब्स वहां गिरेंगे नहीं मौत के लिए। ये तो विनाश की निशानी है। अच्छा, तो ये भी तो समझ जाना चाहिए ना कि अभी इनसे विनाश जरूर होना है। माना ये कोई दुनिया की सजावट के लिए नहीं बनाए गए हैं। हँ? जैसे घर में खिलौने बनाते हैं सजावट के लिए। नहीं। तो विनाश तो होता ही है इनसे। ये पक्का है बनाए गए हैं। इसलिए तो बनाए गए हैं। तो मनुष्य को समझना चाहिए ना कि भई अब दुनिया का विनाश तो सामने खड़ा है क्योंकि ये कोई 1, 2, 4 तो नहीं हैं। या 1, 2 देशों ने तो नहीं बनाके रखे हैं। ढेर के ढेर देश हैं। और गुप्त रूप से भी बनाते रहते हैं।

एक तो ये निशानी है विनाश की। और दूसरे तुम स्थापना के लिए ज्ञान सीख रहे हो। किससे? हँ? ज्ञान तो एक बाप से आता है। तो बाप यहां आया हुआ है ना। फिर जब ज्ञान पूरा होगा, स्थापना होगी तो विनाश तो जरूर होगा। हँ? पहले क्या होगा? पहले विनाश होगा कि स्थापना होगी? पहले स्थापना फिर विनाश। हाँ। देखो, ये भी तो बुद्धि का काम है ना समझने का। परंतु अभी देखो इतना बैठ करके लोगों को समझाते हैं तो कुछ ना कुछ तो बुद्धि में बैठता है क्योंकि जब सुनते हैं तो उस समय बुद्धि में बैठता है। फिर बाहर जाते हैं तो दुनिया की चकाचौंध में सब भूल जाते हैं। यहां आते हैं तो उस समय सुनते हैं, समझते हैं। फिर जो गाया जाता है वहां की वहां रही। तो बस फिर वहाँ, बस यहां से उठे, बाहर निकले और ये जो अभी ताजी समझ होती है ना वो पावती बन जाती है। हँ? जो यहां से समझ मिलती है वह गुम हो जाती है एकदम। अगर गुम ना हो जाए, और धारणा हो जाए, तो पीछे वो तो सर्विस करते रहेंगे। परंतु वो फिर सर्विस कर नहीं सकते। हँ? तो कितना इनका हिस्सा, हं, नई दुनिया में सुख भोगने का हिस्सा चट्ट हो जाता है, खत्म हो जाता है। नहीं तो कितना पूरा बाबा समझाते हैं अच्छी तरह से।

ये जो समझानी बाबा देते हैं बैठकरके, कोई भाषण भी करो कहां तो भी तुम्हारा हियर-हियर होवे। ये तो बिल्कुल क्लियर बात बताते हैं। समझा ना? और है तो ये गीत का अर्थ। अर्थ तो निकला है ना। तो देखो, परंतु देखो गीत का अर्थ कितना सारा रचता, रचना के आदि, मध्य, अंत समझाय दिया है। बच्चों को सारा राज़ समझाया है। परंतु होता क्या है कि ये तो जरूर है, जैसे टीचर हैं, पढ़ाते हैं, पीछे सुनते तो सभी स्टूडेंट्स हैं, पर कोई के अंदर में धारणा होती है, कोई के अंदर में नहीं होती है। तो कोई पास हो जाते हैं, तो कोई फेल हो जाते हैं। हां, बिल्कुल फेल हो जाते हैं एकदम। समझा ना? क्योंकि ये तो बड़ी नॉलेज है ना एकदम। इसमें तो भला बहुत करोड़ों को नॉलेज मिलने की होती है। 20.11.67 की प्रातः क्लास का सातवां पेज, दूसरी लाइन। तो इसमें तो फिर प्रजा में तो आ जाते हैं ना। कौन? जो थोड़ा भी सुनते हैं वो प्रजा में तो आ जाते हैं। हँ? बाकी पुरुषार्थ तो नहीं करते हैं। जो सुनते हैं उसका मनन-चिंतन-मंथन करें और बाप को याद करें, राजयोग से राजाई लें। तो राजाई तो नहीं पाते हैं। प्रजा वर्ग में तो आ ही जावेंगे क्योंकि अभी सुना है तो कभी तो ये कहेंगे ना कि इसने नॉलेज तो लिया है जरूर। कुछ ना कुछ सुना है तो तभी तो प्रजा में आते हैं ना।

बाकी जो समझते हैं कि हम कोई ये लक्ष्मी-नारायण बनें, अरे, उनके तो नैन-चैन, बातचीत करना, ये तो बिल्कुल ही न्यारा होता है। और वो कोई छुपे थोड़े ही रहते हैं। ना बच्ची। वो तो अपना शो करते ही हैं। हँ? और शो करते हुए भी आया कि माया के तूफान तो क्या करेंगे? किसकी बात हो रही है? अरे? लक्ष्मी-नारायण की बात हो रही है ना। तो उनके सामने तूफान आएगा तो क्या करेंगे? हटाय दिया एकदम पूरा। क्योंकि इसमें तो बहुत तूफान में गिरते हैं एकदम। ये जो काम का शत्रु है ना तो उसमें तो एकदम लिटाय देते हैं। वो बड़ा तीखा दुश्मन है। जैसे दो पहलवान लड़ते हैं ना। तो जो तीखा होगा क्या करेगा? धक से, हां, जमीन पर लिटाय देगा। हां। तो अरे उस दुश्मन के कारण कौन हैं काम महाशत्रु के? किसे कहेंगे? कहेंगे ये आंखें।

ये सभी जो बाप बैठकरके समझाते हैं ये समझानी इसको तो ज्ञान कहा जाएगा ना बच्चे। तभी तो ये गीत है ना - हे भगवान। तो बस हम तो भगवान के लिए ही कहते हैं कि आओ और आकरके हम घोर अंधेरे में पड़े हैं, आकरके हमारे ज्ञान का दीपक जगाओ। तो किसको कहते हैं, हँ, ज्ञान का दीपक, हँ, जगाओ? भगवान को कहते हैं। और भगवान कब आएंगे वो तो बिचारे घोर अंधेरे में पड़े हुए हैं। किसने डाला? हँ? इन शास्त्रकारों ने, विद्वान, पंडित, आचार्यों ने जो शास्त्रों में लिख दिया ना ये सृष्टि लाखों वर्ष की है। और अभी तो कलियुग के हजारों वर्ष पड़े हुए हैं। अभी तो बच्चा है, कलयुग रेगड़ी पहन रहा है। तो समझते हैं विनाश तो बहुत लंबे समय के बाद होगा। हँ? तो वो तो अभी बोलता है 40000 वर्ष के बाद भगवान आवेंगे। हँ? तो भई वो सब तो घोर अंधियारे में हैं। वो शास्त्र बनाने वाले विद्वान, पंडित, आचार्य और जो उनकी बातों पे विश्वास करने वाले हैं, वो दुनिया वाले भी घोर अंधियारे में हैं। हँ?

और इस बात की भी ब्राह्मणों की दुनिया में शूटिंग होती है कि नहीं? हँ? हां, यहां भी रिहर्सल होती है। घोर अंधियारे में पड़े हैं। यहां कौन सी रिहर्सल होती है? यहाँ कौनसे वेद, शास्त्र हैं? यहां जो, प्रैक्टिकल में जो कहते हैं, विनाश सामने खड़ा है, वो बड़े-बड़े अंडरग्राउंड महल-माडियां, अटारियां बनाते रहते हैं। तो लोगों की बुद्धि में बैठेगा कि विनाश होने वाला है? हँ? क्या समझेंगे? ये हमको पैसा कमाने के लिए बेवकूफ बना रहे हैं और खुद तो कंक्रीट के मजबूत-मजबूत मकान बनाते चले जाते हैं। तो देखो घोर अंधियारे की शूटिंग हो रही है कि नहीं हो रही है? नहीं? हो रही है। इसलिए जो कुछ भी कलप पहले हुआ है ये सभी कौरव विनाश काले विपरीत बुद्धि। हँ? क्यों कौरव नाम दिया? कहते हैं कुरु की संतान थे। किसकी संतान? हँ? कुरु की संतान। कुरु माने करो। क्या करो? अरे, कर्मेंद्रियों से कर्म करो। तो कर्मेंद्रियों से कर्म करेंगे, हँ, तो ये नहीं समझते हैं कि कर्मेंद्रियों में मुख्य कर्मेंद्रिय कौन सी है जो पहले कर्म करने के लिए आगे आ जाएगी? हँ? जो बाप कहते हैं, बताते हैं, ये महाशत्रु है। कौन सी कर्मेंद्रिय? हँ? सब कहेंगे कि कामेन्द्रिय। तो कर्म करो। उनका ये करम है सबसे बड़ा। मन-बुद्धि में घूमता ही रहता है। तो वो जो कुरु है, कहते हैं करो-करो। कुरु की संतान हुए कौरव। उनके लिए फिर शास्त्रों में लिखा है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। जब विनाश का काल आता है तो बुद्धि विपरीत हो जाती है। कहते भी हैं जाए विधाता दारुण दुख देई ताकी मति बुद्धि पहले हरि लेई। तो हैं फिर विपरीत बुद्धि। तो ये ही ख्याल से हैं, घोर अंधियारे में हैं।

A morning class dated 20.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Monday was, yes, these Translators of different languages get a lot of salary. But the egotistic scientists, who produce bombs, get more salary than all these people. Those are limited bombs and these are unlimited bombs. They are famous, aren’t they? They are for the purpose of death, aren’t they? Leave alone the topic of aeroplanes. They are for travelling. But these bombs, which everyone speaks about, they will understand only at that time, will they not? These bombs are the same missiles which have been mentioned in the scriptures that missiles, moosal emerged from the abdomen, intellect-like abdomen of the Vrishnavanshi Yadavas. Missiles have been mentioned as moosal. Their shape is like the moosals, isn’t it? So, they make each other fight, they clash. So, human beings understand that destruction is bound to happen. And as regards destruction through bombs, brother, okay aeroplane, okay brother, this is an indication of heaven. Now these bombs are not the indicators of heaven, are they? These bombs don’t exist in the heaven. They exist only in the Confluence Age. Be it the limited ones or the unlimited ones.

So, children, you should definitely understand that brother, the aeroplanes exist there in heaven to give happiness. Hm? But these bombs do not exist [there] to cause the destruction of the entire world. These are givers of sorrow, aren’t they? Now they have been produced, yet, look, there is so much fear everywhere. There is fear all over the world, isn’t it? Why? The bombs have been produced. The explosives for the destruction of the world are ready. What will happen now? So, now you children have come to know that destruction will not take place in the Golden Age through bombs. The bombs will not fall there for destruction. This is a symbol of destruction. Achcha, so, you should also understand that now destruction is definitely going to take place through these [bombs]. It means that these [bombs] haven’t been produced for the decoration of the world. Hm? For example, toys are produced at home for decoration. No. So, destruction takes place only through these [bombs]. It is sure that they have been produced. This is why they have been produced. So, human being should understand that brother, now the destruction of the world is staring at you because these are not just one, two, four [in numbers]. Or one or two countries haven’t produced. There are numerous countries. And they keep on producing stealthily as well.

Firstly, this is an indication of destruction. And secondly, you are learning knowledge for establishment. From whom? Hm? Knowledge comes from one Father. So, the Father has come here, hasn’t He? Then, when the knowledge is completed, when the establishment takes place, then destruction will definitely take place. Hm? What will happen first? Will destruction take place first or will establishment take place? First establishment, then destruction. Yes. Look, this is also a task of the intellect to understand. But now look, you sit and explain so much to the people, then it sits in the intellect to some extent or the other because when they listen then it sits in their intellect at that time. Then, when they go out, then they forget everything in the glitz of the world. When they come here, then they listen at that time and understand. Then it is sung that the topics of that place remained there only. So, that is it; then there, that is it, they get up from here, go out and whatever they have understood freshly, haven’t they, that is lost. Hm? Whatever wisdom they get from here vanishes completely. If it doesn’t vanish and if it is inculcated, then later they will keep on doing service. But then they cannot do service. Hm? So, their large share, hm, the share of experiencing happiness in the new world becomes nil, ends. Otherwise, Baba explains so much completely and nicely.

This explanation that Baba sits and gives, wherever you deliver any lecture, people should say ‘hear, hear’ for you. He narrates a completely clear topic. You understood, didn’t you? And this is the meaning of the song. The meaning has been derived, hasn’t it been? So, look, but look, the meaning of the song, the entire knowledge of the Creator and the beginning, middle and end of the creation has been explained so much. The entire secret has been explained to the children. But what happens is that it is sure that for example, the teacher teaches; later all the students listen, but some inculcate and some don’t. So, some pass and some fail. Yes, they fail completely. You understood, didn’t you? It is because this is a completely big knowledge, isn’t it? Many crores have to get this knowledge. Seventh page of the morning class dated 20.11.67, second line. So, they are then included among the subjects in this, aren’t they? Who? Those who listen even a little are included in the subjects (praja). Hm? But they do not make purusharth. They should think and churn whatever they listen and should remember the Father, obtain kingship through rajyog. So, they do not obtain kingship. They will indeed come in the subjects category because now they have heard; so, at some point of time it will be said that this one has definitely obtained knowledge. He has heard to some extent or the other; only then is he included among the subjects, isn’t he?

But as regards those who think that we should become this Lakshmi-Narayan, arey, their eyes, their expressions, their conversation is completely unique. And they do not remain hidden. No daughter. They show themselves. Hm? And even while showing [themselves], if the storms of Maya emerge, then what will they do? Whose topic is being mentioned? Arey? The topic of Lakshmi-Narayan is being discussed, isn’t it? So, what will they do when they face storms? They remove it completely. It is because many fall completely in the storms. This enemy of lust causes them to lie down completely. That is a very strong enemy. For example, two wrestlers fight, don’t they? So, what will the one who is stronger do? He will suddenly, yes, make him lie on the floor. Yes. So, arey, what is the reason for that enemy, the biggest enemy lust? Whom would you say? We would say – These eyes.

All this that the Father sits and explains, this explanation will be called knowledge, will it not children? Only then is there this song – O God! So, that is it; we say only for God that come; and after coming; we are lying in complete darkness; come and light our lamp of knowledge. So, whom do they say – Light the lamp of knowledge? They say to God. And those poor people are lying in complete darkness as to when God will come. Who put them [in darkness]? Hm? These writers of the scriptures, the scholars, pundits, teachers who wrote in the scriptures that this world’s duration is lakhs of years. And still there are thousands of years for the Iron Age to be over. It is still a child; the Iron Age is crawling. So, they think that destruction will take place after a long time. Hm? So, he now says that God will come after 40000 years. Hm? So, brother all of them are in complete darkness. Those scholars, pundits, teachers who write the scriptures and those who believe in their words, those people of the world are also in complete darkness. Hm?

And does the shooting for this topic also take place in the world of Brahmins or not? Hm? Yes, the rehearsal takes place here as well. People are in complete darkness. Which rehearsal takes place here? Which Vedas and scriptures exist here? Here, those who say in practical that destruction is staring at you, keep on building big underground palaces and buildings. So, will it sit in the intellect of the people that destruction is going to take place? Hm? What will they think? These people are making us fools to earn money and they themselves are going on building strong buildings of concrete. So, look, is the shooting of complete darkness taking place or not? No? It is taking place. This is why whatever has happened Kalpa ago all these Kauravas have an opposite intellect at the time of destruction. Hm? Why was the name Kaurava given? It is said that they were the children of Kuru. Whose children? Hm? Children of Kuru. Kuru means ‘karo’ (do). What should you do? Arey, perform actions through the organs of action. So, they will perform actions through the organs of action; so, they do not understand that which is the main organ of action among the organs of action which will come ahead of everyone in acting? Hm? The Father says, tells, this is the biggest enemy. Which organ of action? Hm? Everyone will say – The organ of lust. So, perform actions. This is their biggest action. It keeps on revolving in their mind and intellect. So, those Kurus say – Karo, karo (do, do). Children of Kuru are Kauravas. Then it has been written for them in the scriptures that they have an opposite intellect at the time of destruction. When the time of destruction comes then the intellect turns opposite. It is also said – Jaye vidhaataa daarun dukh dei taaki mati buddhi pehley hari leyi (the one whom God gives extreme sorrows, He first takes away their wisdom, intellect). So, then they have an opposite intellect. So, they have this thought only; they are in complete darkness.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2856, दिनांक 20.04.2019
VCD 2856, dated 20.04.2019
रात्रि क्लास 20.11.1967
Night class dated 20.11.1967
VCD-2856-extracts-Bilingual

समय- 00.01-26.17
Time- 00.01-26.17


आज का रात्रि क्लास है - 20.11.1967. त्रिमूर्ति है और उसके नीचे भी जो लिखा हुआ है और जो फिर बाबा समझाते रहते हैं। पहले क्या? पहले त्रिमूर्ति साक्षात्कार से तैयार हुई। फिर लिखत बाद में लिखी गई या साथ ही? हँ? लिखत तो बाद में लिखी गई क्योंकि लिखा हुआ है वो उसको बाबा समझाते हैं कि गीता का भगवान वो नहीं है। वो नहीं है, वो है। उसका भी तो वो ये जैसे बनकरके आते हैं ना। जैसे ये रखा है सामने त्रिमूर्ति का चित्र। हँ? तो बात हुई गीता के भगवान की। त्रिमूर्ति में कौन हुआ गीता का भगवान? वो नहीं है। वो नहीं है, वो है। हँ? और वो जो है उसका भी तो वो। हँ? तो ये चित्र जैसे बनकरके आते हैं ना। तो ये तुम्हारे सामने रखा है। और दूसरी वाणी में क्या बोला? हँ? ये त्रिमूर्ति का चित्र एक्यूरेट है? हां। एक्यूरेट नहीं है। तुम बच्चों को यथार्थ चित्र निकालना चाहिए। हं? तो त्रिमूर्ति में जो बोला इशारा करके गीता का भगवान वो नहीं है, तो कौन नहीं है? हँ? त्रिमूर्ति में ध्यान से देखो। देखा कभी? हँ? कि वो नहीं है। कौन नहीं है? कौन? लिखो, एक अक्षर लिखो। वो नहीं है, वो है। (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा, ब्रह्मा नहीं है। वो है। कौन है वो? हं? (किसी ने कुछ कहा।) शंकर है? अरे, उसका भी तो वो। हँ? ये जैसे बनकरके आते हैं ना चित्र साक्षात्कार से, हं, जैसे ये सामने रखा है त्रिमूर्ति का चित्र।

अभी अखबार में तो इतने नहीं पड़ते हैं, हं, जितने आगे चलकरके पडेंगे। तो जो आगे चलके पडेंगे, अखबारों में पडेंगे चारों ओर, सारी दुनिया में, तो वो यथार्थ चित्र पडेगा या जो अभी त्रिमूर्ति में चित्र डाले गए हैं वो पडेंगे? हं? जो यथार्थ हैं सो डाले जाएंगे। अभी इतने क्यों नहीं पड़ते हैं? क्योंकि ये अयथार्थ हैं, तो न समझाने वाले समझते हैं और न समझने वाले समझेंगे। तो अखबार में इतने नहीं पड़ते हैं बड़े-बड़े। और अक्षर भी पतले ही होते हैं अखबार में। हँ? तो अभी माने 1967 में इन बच्चों को काम देते हैं। ये जो श्यामकिशोरी है ना। किसकी किशोरी? श्याम की किशोरी। कौन श्याम? अरे, श्याम माने पतित। काला माने पतित। तो कौन पतित? हँ? कौन पतित? अरे, पतित से पतित कामी कांटे में आते हैं ना। मुकर्रर रथ। तो उसकी किशोरी। कौन हुई किशोरी? हँ? जो किशोरी है जो अंग्रेजी भी जानती है या हिंदी भी जानती है कि बाबा को एक कॉलम बना कर दियो। क्योंकि अखबार का कॉलम है 2 इंच का। कॉलम होता है ना अखबार का। वो 2 इंच का होता है। हँ? क्यों? 2 इंच का क्यों होता है? 1-1 कॉलम 2-2 इंच का होता है। क्यों? क्योंकि अखबार तो लंबा-चौड़ा होता है 10, 12 15 पेज का होता है, 16-16 पेज का भी आ जाता है। तो अगर ऐसे पढ़ेंगे, दूसरे को सुनाएंगे बैठके, तो सुबह से शाम अखबार पढ़ने में ही हो जाएगी। तो कालम छोटा इसलिए बनाया जाता है कि वो दो इंच का कालम एक लाइन फटाक से एक ही नज़र में समझ में आ जाए। कोई पढने की दरकार है ही नहीं। हाँ। तो पीछे चाहिए तो डेढ़ इंच भी ले सकते हैं। इंच भी ले सकते हैं। अरे, चार भी ले सकते हैं। मैं तो समझता हूँ अखबार का कितने भी चाहे तो ले सकते हैं। हाँ।

और ब्लाक बनाना पडेगा। त्रिमूर्ति का तो ब्लॉक अपना अच्छा है। जो अच्छा किलियर है क्योंकि कम लिखत है। और उसके नीचे वो भी लिखना है जरूर। वो भी लिखना है। क्या लिखना है वो नहीं बताया। ऊपर भी वो-4 कर दिया। हाँ, लिखना जरूर है वो। और ये जो कृष्ण का है वो जो लिखा हुआ है लिखत क्योंकि अखबार में पढ़ेंगे तो अखबार तो अक्सर करके बहुत पढते भी हैं ना। बाबा का तो विचार है कि अखबार का जांच करके ये ऐसे कांट्रैक्ट किया जाता है कि भइ हजार इंच हम लेंगे। हँ? तो जब चाहिएगा तब डालेगा। जितना चाहिएगा उतना डालेगा। उनका जो रेट होवे अगर उनको अच्छी तरह से एडिटर को समझाएंगे; हँ? सुनाने की बात नहीं है। क्या? सुनाया तो ब्रह्मा के द्वारा, ब्रह्माकुमार-कुमारियों के द्वारा। लेकिन तुम बच्चों को क्या करना है? समझाना है गहराई से।

तो जो नामीग्रामी अखबार हैं ही वास्तव में; कौनसा नामीग्रामी अखबार? हँ? उस समय भी नामीग्रामी था सन् 67 में; अभी भी नामीग्रामी है। हँ? अरे, 50 साल पहले भी नामीग्रामी था, अभी भी नामीग्रामी। कौनसा अखबार? हिन्दी का, अंग्रेजी का। अरे? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, हिन्दुस्तान टाइम्स, हाँ। है। और फिर दूसरा? टाइम्स आफ इंडिया है। हाँ। कोई एक दूसरी अखबार है। तो किसी ने कहा - स्टेट्समैन। हाँ, स्टेट्समैन शायद बंगाल में अच्छी चलती है। तो किसी ने कहा – हाँ। तो थोड़ा-थोड़ा एक बरस के लिए 2-3 हजार रुपये का ले लेवें। जो कभी-कभी ये सब डालते रहें अखबार में अच्छी जगह। तो ये जो बिगर देखे चिल्लाय पड़ते हैं ना लोग, ये निंदा करते हैं, ये फलाना करते हैं। अब अपनी निंदा-विंदा तो कोई होती नहीं है। हँ? और राय करके फिर वो बाबा समझाते रहते हैं कि ये भी डालो। ये भी डालो वा तो अखबार अपनी निकालनी ही चाहिए। हँ? हिसाब करके निकालनी चाहिए। क्या होगा? अरे, 10, 20, 50 हज़ार खर्चा होगा। उस समय की बात। और क्या होगा? वो जो अपन को चाहे सो हम लिखते रहें। अपनी अखबार होगी तो हम जो चाहेंगे सो, सो लिखेंगे। और हम तो लिखते हैं सब राइट। क्योंकि बाप बच्चों को सब राइट सिखलाते हैं। राइटियस बाप तो क्या सिखलाएगा? राइटियस ही सिखलाएगा ना।

जैसे वो भक्तिमार्ग में नाभि कमल से वो नेहरू को निकाला। किसकी नाभि कमल से? हँ? नाभि कमल से वो नेहरू को निकाला। वो गांधी से वो निकाला। हँ? गांधी से नेहरू को निकाला। तो तैसे तुम भी लिख सकते हो कि ये है विष्णु। हँ? और ओम मंडली में, यज्ञ के आदि में ये विष्णु की नाभि कमल से निकला। कौन? कौन निकला? हाँ, लिखो।
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा निकला। हाँ। तो तुम लिख सकते हो। जैसे वो कुछ भी लिख देते हैं, तो तुम भी लिख सकते हो। अपना अखबार कुछ भी लिखो। तो ये तो है ही है। फिर ब्रह्मा की नाभी कमल से। तो ये लिखत तो बहुत है ना बच्ची। अखबार के लेख निकल पड़ेंगे। हँ?

तो अगर अखबार भी निकालें और 2-3 बड़े सेंटर्स भी खुल जाएं तो फिर कोई ऐसे नहीं समझेंगे कि ये कोई छोटी है कोई संस्था। क्या? समझेंगे। कबकी बात बताई? भविष्य की कि 67 की? हाँ, भविष्य की बात बताई कि ऐसे नहीं समझेंगे कि ये कोई छोटी संस्था है। नहीं तो क्या समझें? समझेंगे ये छोटी संस्था है। भविष्य की बात बताई। हाँ। छोटी संस्था है तो इनको कोई उड़ाय सकेंगे। कोई माने? बड़ी संस्था वाले। हँ? जैसे आज, आज क्या है? हँ? आज तो 50 साल के बाद आध्यात्मिक विद्यालय छोटी संस्था है या बड़ी संस्था है ब्रह्मा कुमारी विद्यालय के मुकाबले? छोटी संस्था है। तो बाबा ने तो पहले से ही इशारा दे दिया। हाँ। वो समझेंगे कि कोई छोटी संस्था है तो इनको तो कोई भी यूं, यूं चुटकी में उड़ाय देंगे। ब्रह्माकुमारियां इनको उड़ाय देंगी। या उनके ऊपर कोई जोर रखा ही सकेंगे। हँ? कोई जोर-जबरदस्ती रखेंगे, भई, तुम अपने विद्यालय के नाम में से यूनिवर्सिटी हटा दो। जबरदस्ती हटाएंगे हाइकोर्ट से बुलवा के। हटाओ। तो कोई जोर रखाय सकेंगे। अब हाइ कोर्ट का तो जोर होता है ना। हाँ, अरे, ऐसे नहीं होगा। क्या? कैसे? कि तुमको हाइ कोर्ट बोल दे और तुम हटाय दो, विश्वविद्यालय या यूनिवर्सिटी। ऐसे नहीं होगा। हँ? हाँ, थोड़ा हो-हल्ला न मचाएं तो विश्व के ऊपर त्रिमूर्ति का चित्र लटका दो, गोले का चित्र लटका दो। दिखाई नहीं पड़ेगा। तो समझेंगे हाँ, इन्होंने मिटाय दिया।

तो ये ही ख्यालात कर-करके क्योंकि बाहर में नाम तो, प्रभाव तो निकालना होता है ना। तो बाबा तो कहते हैं अखबार से भी प्रभाव निकालेंगे। क्या? अब ये तो ठीक है। बच्चे रोज़ प्वाइंट्स सुनते रहते हैं। सो बच्चे जानें और बाप जाने। फिर बच्चों के अलावा और बाप के अलावा और दुनिया में कोई जानें नहीं। और कोई जानेगा? नहीं। और न जाने कोय। हँ? भक्तिमार्ग में कहते थे ना – तुम्ही तुम्हरी गति-मति तुम ही जानो। और न जाने कोय। अभी और कैसे जानें? और कैसे जानें? तो उसकी युक्ति रचनी चाहिए।

तो अभी बाबा तो देते हैं ऐस्से (essay), निबंध कि ये करना चाहिए। फिर बच्चों को या प्रदर्शनी कमेटी को; हँ? उस समय कौनसी प्रदर्शनी कमेटी? ज़ड़ चित्रों की। हँ? और इस समय? इस तरफ, इस समय अब 50 साल के बाद भी जो जड़ चित्रों की कमेटी? नहीं। हाँ। अब तो चैतन्य चित्र तैयार होने चाहिए ना। हाँ। तो प्रदर्शनी कमेटी को, जो आजकल के समय में देखा जाता है कि कोई सोई पड़ी है कमेटी। क्योंकि सुनते तो रहेंगे ना। बाबा कहते हैं, बाबा कहते हैं तब प्रदर्शनी कमेटी या म्यूजियम कमेटी सोई पड़ी है। हँ? तब। तब। अब की बात, अब की अभी छोड़ो। तबकी बात बताई। ए। हाँ। प्रदर्शनी कमेटी सोई पड़ी है। क्या? नींद बहुत आती है। तो सोएगी ना। हाँ। सोई पड़ी है। कोई इतना ध्यान नहीं देती है। इतना माने? जितना देना चाहिए उतना ध्यान नहीं देती है कि बाबा का क्या विचार है? और जब बाबा कुछ कहते हैं तो जरूर बाबा लिखा-पढ़ी से बाबा, वो लिखा-पढी बाबा से करेंगे कि बाबा ये, ये हम इनको दृष्टि दिया है। इनको अच्छी तरह से समझाया है। और इनसे किफायत से मिल सकते हैं। तो कुछ अखबार में भी लिखे होवें, लिखोवें। और कुछ अपनी कोशिश को, कोशिश करें अखबार बनाने की।

लिखा है जयपुर वालों ने। हँ? भले बाबा मुरली में चलाया है। परन्तु जयपुर वाले कुछ लिखा है कि फलाने-फलाने अखबार वाले जो छपते हैं वो बोलते हैं। खाली खर्चा जास्ती नहीं होगा। इस थोड़े खर्चे में ही छपाय सकते हो। एक अखबार जहाँ छपती है वहां दूसरी भी छप सकती है। तीसरी भी छप सकती है। तो ऐसे सोए पड़े नहीं रहना चाहिए। कुछ न कुछ ठक-ठक करनी चाहिए। या कोई ऐसी बात होवे तो उनको क्योंकि तुम्हारे पास तो सभी सत्य ही सत्य है। और वहाँ तो उस दुनिया में फिर सभी असत्य है। हँ? बताया ना झूठ ही झूठ, सच की रत्ती भी नहीं। जैसे तुलसीदास ने क्या लिख दिया? झूठै लेना, झूठै देना, झूठै भोजन, झूठ चबैना। कलियुग की बात लिखी। तो वो सत्य की भी तो एडवर्टाइज़मेन्ट चाहिए। तो कुछ तो चाहिए ना कुछ न कुछ। क्योंकि इतने बच्चे हैं। अभी बाबा कहते हैं ना बच्चों ने अभी इतने जोर नहीं भरे क्योंकि हिसाब किया जाए तो क्योंकि संपूर्ण तो कोई, हँ, सम्पूर्ण तो कोई, कोई तो बनता है ना। हाँ। तो अभी कितने बरस हो गए। तो आहिस्ते-3 हल चलता ड्रामा के अनुसार। तो देखने में आते हैं कि अभी कुछ थोड़ी तीखी ये पुरुषार्थ चलना चाहिए। धीमे पुरुषार्थ से नहीं चलेगा।

Today’s night class is dated 20.11.1967. There is Trimurti and below it whatever is written and then Baba keeps on explaining on it. What first? First Trimurti was prepared through visions. Then was the write-up written later on or simultaneously? Hm? The write-up was written later on because Baba explains about the write-up that ‘that one’ is not the God of Gita. It is not that one, it is that one. Even that of that one also comes prepared like this, doesn’t it? For example, this picture of Trimurti is placed in the front. Hm? So, the topic is about the God of Gita. Who is the God of Gita in Trimurti? It is not that one. It is not that one, it is that one. Hm? And that one; that one of that one also. Hm? So, these pictures get ready and come, don’t they? So, this is placed in front of you. And what was said in another Vani? Hm? Is this picture of Trimurti accurate? Yes. It is not accurate. You children should bring out the accurate picture. Hm? So, in Trimurti, He said by making a gesture that ‘that one’ is not the God of Gita; so, who is not? Hm? Look at the Trimurti carefully. Have you ever seen? Hm? That it is not that one. Who isn’t? Who? Write; write one alphabet. It is not that one; it is that one.
(Someone said something.) Achcha, Brahma is not. It is that one. Who is that one? Hm? (Someone said something.) Is it Shankar? Arey, that of that one also. Hm? For example, these pictures get prepared through visions and come, hm, for example, this picture of Trimurti is placed in the front.

Now it is not published that much in the newspapers as much as it will be published in future. So, whatever will be published in future, it will be published everywhere, in the entire world in the newspapers, so, will that accurate picture be published or will the pictures that have been inserted in Trimurti now be published? Hm? The accurate ones will be published. Why aren’t they published that much now? It is because these are inaccurate; so, neither those who explain understand, nor will those who have to understand will understand. So, such big ones are not published that much in the newspapers. And the letters are also very thin in the newspapers. Hm? So, now, i.e. in 1967 these children are given a task. There is this Shyamkishori, isn’t she? Whose Kishori (young lady)? Shyam’s kishori. Who Shyam? Arey, Shyam means sinful. Black means sinful. So, who is sinful? Hm? Who is sinful? Arey, He comes in the most sinful, lustful thorn, doesn’t He? The permanent Chariot. So, his kishori. Who is kishori? Hm? Kishori knows English also or knows Hindi also. Prepare a column for Baba. It is because the newspaper column is 2 inches wide. There is a column in the newspaper, isn’t it? That is 2 inches wide. Hm? Why? Why is it 2 inches wide? Each column is 2 inches wide. Why? It is because the newspaper is long and wide; it consists of 10, 12, 15 pages; there are 16 pages as well. So, if you read like this; if you sit and narrate to others, then you will be occupied in reading the newspaper from morning to evening. So, the column is made small because that 2 inches column, a line of it can be understood immediately at one glance. There is no need to read it at all. Yes. So, later if we want we can take one and a half inches also. We can take one inch also. Arey, we can take four also. I think we can take as many as we wish in the newspaper. Yes.

And block will have to be made. Our block of Trimurti is good. It is nice and clear because the write-up is less. And below that you should also write that without fail. You should write that also. What is to be written was not told. Above also He said ‘that-4’. Yes, you should definitely write that. And this one of Krishna, the write-up that has been written because when people read in the newspaper, then many people often read newspapers, don’t they? Baba thinks that we should check the newspaper and a contract is signed like this that brother, we will take a thousand inches. Hm? Then they will publish whenever you wish. They will publish whatever volume that you wish. Whatever is its rate, if you explain to the Editor nicely; hm? It is not about narrating. What? It was narrated through Brahma, through the Brahmakumar-kumaris. But what should you children do? You have to explain deeply.

So, the newspapers which are actually well-known; which well-known newspaper? Hm? It was well-known at that time also in 67; It is well-known even now. Hm? Arey, it was famous 50 years ago as well; it is famous even now. Which newspaper? In Hindi, in English. Arey?
(Someone said something.) Yes, Hindustan Times, yes. It is. And then the other? There is Times of India. There is another newspaper. So, someone said – Statesman. Yes, perhaps Statesman is more popular in Bengal. So, someone said – Yes. So, we may take little portions for 2-3 thousand rupees for a year. We should keep on publishing all this nicely in the newspaper sometimes. So, these people who shout without seeing, they defame, they do such and such things. Well, we cannot be defamed. Hm? And by seeking advice Baba keeps on explaining that publish this as well. Publish this also or we should publish our own newspaper. Hm? You should publish after making calculations. What will happen? Arey, it may involve an expenditure of 10, 20, 50 thousands. It is about that time. What else will happen? We can keep on writing whatever we wish. If we have our own newspaper, then we will write whatever we wish. And we write everything right. It is because the Father teaches the children everything right. What will the righteous Father teach? He will teach righteous only, will He not?

For example, on that path of Bhakti they made Nehru to emerge from the lotus-like navel. From whose lotus-like navel? Hm? They made Nehru to emerge from the lotus-like navel. Hm? They made [Nehru] to emerge from Gandhi. So, similarly, you can also write that this is Vishnu. Hm? And in the Om Mandali, in the beginning of the Yagya this one emerged from the lotus-like navel of Vishnu. Who? Who emerged? Yes, write.
(Someone said something.) Brahma emerged. Yes. So you can write. Just as they write anything, so, you can also write. It is our newspaper, you may write anything. So, this is definitely there. Then, from the lotus-like navel of Brahma. So, daughter there is a lot of write-up, isn’t it? Newspaper articles will emerge. Hm?

So, even if you publish a newspaper and even if 2-3 centers open, then nobody will think that this is a small organization. What? They will think. It is about which time? Is it about the future or about 67? Yes, a topic of future was mentioned that they will not think that this is a small organization. Otherwise what would they think? They will think that this is a small organization. A topic of future was mentioned. Yes. If it is a small organization, then someone will be able to make it to vanish. What is meant by someone? Those from the bigger organization. Hm? For example, today; what is it today? Hm? Today, after 50 years, is Adhyatmik Vidyalay a small organization or a big organization when compared to the Brahmakumari Vidyalaya? It is a small organization. So, Baba has already given a hint. Yes. They will think that this is a small organization; so, anyone will make it to vanish like this, like this in a wink. Brahmakumaris will make these vanish. Or they may pressurize these. Hm? They may pressurize, brother, you remove university from the name of your school (vidyalaya). They will make you remove forcibly by making the High Court to pronounce [an order]. Remove. So, they may pressurize. Well, there is a pressure of the High Court, isn’t it? Yes, arey, it will not happen like this. What? How? That the High Court tells you and you remove Vishwavidyalay or University. It will not happen like this. Hm? Yes, if you don’t create a little noise, then hang the picture of Trimurti, hang the picture of the Wheel on [the word] ‘Vishwa’. It will not be visible. So, they will think that yes, they have removed it.

So, by thinking like this, because the name, the effect has to be spread outside, isn’t it? So, Baba says – The effect will spread through newspapers also. What? Now this is correct. Children keep on listening to the points every day. So, children know and the Father knows. Then except the children and except the Father nobody else in the world knows. Will anyone else know? No. Nobody else knows. Hm? On the path of Bhakti also people used to say – You alone know Your ways (tumhi tumhri gati-mati tum hi jaano). Nobody else knows (aur na jaaney koy). Well, how can others know? And how can they know? So, tactics should be created for it.

So, now Baba gives you an essay, a nibandh (Hindi word for essay) that you should do like this. Then children or the exhibition committee; hm? At that time which exhibition committee existed? That of non-living pictures. Hm? And at this time? On this side, at this time, now even after 50 years, is it the committee of non-living pictures? No. Yes. Now the living pictures should get ready, shouldn’t they? Yes. So, the exhibition committee, which, now-a-days it is observed that the committee is sleeping. It is because they keep on listening, don’t they? Baba says, Baba says at that time the exhibition committee or the museum committee is asleep. Hm? At that time. At that time. The topic of now; leave the topic of present now. A topic of that time was mentioned. A. Yes. The exhibition committee is sleeping. What? It feels very sleepy. So, it will sleep, will it not? Yes. It is asleep. It does not pay that much attention. What is meant by ‘that much’? It doesn’t pay as much attention as it should that what is Baba’s thought? And when Baba says something, then definitely you will correspond with Baba that Baba this, this, I have given drishti to this one. I have explained nicely to this one. And we can get at cheap rates from this one. So, we can write something in the newspaper also. And we can try to bring out our newspaper.

Those from Jaipur have written. Hm? Although Baba has mentioned in the Murli, yet those from Jaipur have written something that such and such newspaper persons who publish, speak. The expenditure will not be much. You can publish with a little expenditure only. The amount with which we publish one newspaper we can publish a second one also. A third one also can be published. So, you should not remain asleep like this. You should keep on doing something or the other. Or if any such thing happens then they; because you now have only the truth. And there everything is false in that world. Hm? It was told, wasn’t it that there is just falsehood; there is not even an ounce of truth. For example, what did Tulsidas write? Jhoothai lena, jhoothai dena, jhoothai bhojan, jhooth chabaina (Taking lies, giving lies, eating lies, chewing lies). He wrote a topic of the Iron Age. So, that truth also requires advertisement. So, something or the other is required. It is because there are so many children. Now Baba says, doesn’t He that children have not shown so much force so far because if you make calculations, then because someone becomes complete, someone does become perfect, doesn’t he? Yes. So, so many years have passed now. So, gradually, the plough moves as per drama. So, it is observed that this purusharth should move a little fast. It will not do if the purusharth is slow.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2857, दिनांक 21.04.2019
VCD 2857, dated 21.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2857-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-26.00
Time- 00.01-26.00


आज का प्रातः क्लास है 21.11.1967 मंगलवार। रूहानी बच्चों प्रति। उनको कहा ही जाता है ज्ञान गुलाब, रूहे गुलाब। गुल तो बहुत हैं। बच्चों को समझाते हैं। दुनिया तो नहीं जानती है बच्चे कि कब रूहानी बाप आकरके रूहानी बच्चों को समझाते हैं। हँ? कब समझाते हैं और कब सुनाते हैं? क्या कहेंगे? हँ? कहेंगे 76 के बाद समझाते हैं। क्योंकि बाप प्रत्यक्ष हो तो बाप समझाए टीचर बनकर। मां तो लोरी सुनाती है। तो बताया ये बात दुनिया के मनुष्य नहीं जानते हैं कि बाप ब्रह्मा के तन में सुनाते हैं माता के रूप में। और राम बाप जिसे कहा जाता है, कृष्ण तो बच्चे को कहा जाता है ना। कृष्ण की पूजा मंदिर में बच्चे के रूप में होती है। तो बाप समझाते हैं तुम कलयुगी दुनिया के नहीं हो। कहां के हो? पुरुषोत्तम संगमयुगी दुनिया के हो। ये बात भूलना नहीं चाहिए, लेकिन भूल जाते हो। बहुत भूल जाते हो। बुद्धि दुनिया में चली जाती है। तो कलियुगी दुनिया याद आ जाती है।

तुम तो संगमयुगी, सो भी पुरुषोत्तम बनने वाले हो। संगम में भी जो भी आत्माएं हैं पुरुषार्थ करने वाली उनमें उत्तम पुरुष बनने वाले। तो पुरुषोत्तम ऐसे फूल। लक्ष्मी नारायण की तरफ इशारा किया। ऐसे फूल। ये तो अक्षर सुनते तो हो। अनेक बार सुनते हो बाप द्वारा कि हमको फूल बनाने का है अर्थात हम अभी क्या हैं? कांटे हैं क्योंकि वो फूलों का बगीचा है, हँ, इन पुरुषोत्तम का। तो फूल तो सुखदाई होते हैं ना। खुशबू वाले होते हैं। दुर्गुणों की बदबू तो नहीं आती है। और हल्के-फुल्के भी होते हैं क्योंकि देहभान होता है तो भारी हो जाते हैं। आत्मा समझते हैं तो आत्मा तो हल्की है ना। अति सूक्ष्म है। देह भारी होती है। तो देहभानी से फिर हल्के-फुल्के फूल बनते जरूर हैं। परंतु कोई तो सजाएं खाकरके, ये सभी करके बनते हैं। तो फिर उनको? उनको फूल नहीं कहा जाता है। नहीं कहेंगे। अच्छा? ये तो जानते हो कि सजाएं खाते हैं तो पद कम हो जाता है।

जानते हो कि बुद्धि में समझते हो और कहते भी हो मुख से और तुम यहाँ सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनने के लिए बैठे हो। तो सुनाते कौन हैं? जरूर सत्य बाप ही सुनाते हैं। कहा जाता है सत चित आनंद। सत्य बाप आकरके सतयुग की रचना करते हैं। तो यहां क्या बनने आते हो? कथा मात्र सुनने के लिए आते हो? अरे, ये है नर से नारायण बनने की कथा। तो यहां तो आते ही हो नर से नारायण बनने की सच्ची कथा सुनने के लिए आते हो। क्योंकि उस दुनिया में खास भारत में घर-घर में नारायण, सत्यनारायण की कथा सुनते हैं। वो तो झूठी कथा है। नाम लिख दिया है चौपड़ी के ऊपर सत्यनारायण की कथा। और पंडित जी से कोई पूछता भी नहीं नाम लिख दिया है सत्यनारायण की कथा और सुनाते हो लीलावती, कलावती, लकड़हारा, लकड़बग्घा की कथा। और यहां तुम कौनसी कथा सुनते हो? भई ये वो ही गीता की कथा है।

अच्छा, तो ये गीता की कथा आगे कब सुनी है? वो पंडित जी तो बोलेंगे कि इन सत्यनारायण को लाखों वर्ष हुए। ये गीता सुनाई। कहते हैं द्वापर के अंत में सुनाई 5000 वर्ष में। और अभी 5000 वर्ष के बदली में ये जो भी पत्थरबुद्धि मनुष्य हैं अभी उसको पत्थरबुद्धि तो कहना पड़े ना क्योंकि गीता का एपिसोड या गीता का भगवान राजयोग सिखाने कब आए? हँ? जरूर नर को नारायण बनाया था। तो नारायण का राज्य तो सतयुग में होता है ना। तो द्वापर में कैसे कथा सुनाई? जरूर सतयुग के आदि में कथा सुनाई होगी। अभी देखो आए हैं तो कितने बरस के बाद? 5000 वर्ष हुआ। किसको? हँ? कथा सुनाने वाला बाप है। उसको 5000 वर्ष हुआ। पहले भी आया था। अभी फिर आया है। अगर कोई मनुष्य कह दें कि उनको लाखों वर्ष हुए तो अब भला उनको क्या कहा जाए? क्योंकि अपना धर्मशास्त्र भारत का है। ये तो विदेशी आए हैं ढाई हजार वर्ष के अंदर। तो ये इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन आदि आए तो उन्होंने अपना-अपना धर्म की धारणा शुरू कर दी देहभान की बातें। और अपना तो है ही गीता शास्त्र। श्रीमद भगवत गीता। भगवान की सुनाई हुई गीता।

तो ये है ड्रामा के अनुसार। परंतु जो भी भूल है वो समझाई तो जाएगी ना। तो ये समझाया जाता है कि ड्रामा के प्लैन अनुसार भारतवासी खास और जनरल ये सारी दुनिया। भारत है पर्टिकुलर। तो भारतवासी खास गीता का एपिसोड यानी गीता का एपिसोड कहा ही जाता है पुरुषोत्तम संगम युग। बाकी ऐसे थोड़े ही है कि द्वापर के अंत में गीता का एपिसोड। उस समय तो सब धर्म थोड़े ही होते हैं। अरे, गीता में भी लिखा हुआ है सर्व धर्मान् परित्यज्य। सब धर्मों को छोड़कर मामेकम शरणम् व्रज। तो सब धर्म तो कलयुग के अंत में होते हैं ना क्योंकि ये तो समझते हो ना कि गीता के एपिसोड अभी गीता सुनाई जाती है। तो ये युग गीता का है। तो गीता के युग को ही पुरुषोत्तम संगमयुग कहा जाता है। संगम तब कहेंगे पुरुषोत्तम जब कनिष्ठ मनुष्य से पुरुषों में उत्तम बनें। उत्तम तो होते हैं नई दुनिया में। पुरानी दुनिया में तो नीच मनुष्य होते हैं ना, कनिष्ठ मनुष्य होते हैं। तो ज़रूर पुरानी दुनिया और नई दुनिया। पुरानी दुनिया है कलियुग, पाप का युग, पापी युग। और नई दुनिया है पुण्य आत्माओं का युग। तो बरोबर ये नई और पुरानी दोनों दुनिया का संगम है। अभी पुरानी दुनिया नई दुनिया लाखों वरष तो नहीं हो सकती है। क्यों? क्योंकि ये जो विधर्मी आए हैं ना विदेशी, ये तो ढाई हजार वर्ष के अंदर आए ना। उससे पहले तो भारत में एक ही धर्म, एक ही राज्य, एक ही भाषा होती थी। एक ही कुल होता था, एक ही मत होती थी। ये दूसरे धर्म वाले आए तो उन्होंने द्वैतवाद फैलाय दिया। तो शास्त्रों में भी तो लिखा है द्वैतवाद से दैत्यों की दुनिया। कहा जाता है दिति की औलाद। दिति माने खंडित माता।

तो ये तुम बच्चों को समझाया जाता है। और बाप ने समझाय दिया है तो ये जो बिल्कुल सहज ते सहज। इसको कहते हैं बहुत सहज से सहज बातें। नाम ही है सहज राजयोग, सहज ज्ञान। अगर पुरानी और नई दुनिया का भी हिसाब करें तो भी सतयुग, फिर त्रेता, फिर द्वापर, फिर कलयुग। तो ये इतने तो ये 4 युग पसार हो गए ना। और नई दुनिया को इतना समय से इतना समय हो गया। नई दुनिया कितना लंबे समय से खलास हो गई। कहेंगे जब एक धर्म होता है तो नई दुनिया। एक राजा होता है तो नई दुनिया। तो वो तो ढाई हजार वर्ष से खलास हो गई ना। एक और अनेक। तो अभी मनुष्य तो समझते हैं कि लाखों वर्ष हो गए। तुम्हारे बुद्धि में बाप ने आकर के डाला है कि नहीं बच्चे, गीता के युग को लाखों वर्ष नहीं हुए। जबकि भगवान ने आकरके गीता सुनाई थी, राजयोग सिखलाया था। क्योंकि गीता में है ही राजयोग। राजाई प्राप्त कराने का योग है। अभी तो इस दुनिया में क्या है? ये कोई राजाई है? आज राजाई करने बैठे और कल उतार दिया। अरे, अब ये नर से नारायण बनना ये तो देखो इनकी राजाई कितना लंबा समय चली। हँ? कहेंगे कि इन आदि नारायण का राज्य कितने साल चलता है? ढाई हजार साल चलता है।

तो देखो कितनी बिल्कुल सहज बात है। ये गीता ही सत्यनारायण की कथा है। नर से नारायण बनने की कथा है। नर अर्जुन को ये कथा सुनाकर नारायण बनाया। अच्छा, अगर कहें कि राजयोग सिखाय राजाओं का राजा बनाया तो ये है तो जरूर क्योंकि राजाओं का राजा बनने का अभी, अभी ये बनना तो है ना। नारायण तो राजाओं का भी राजा है। बरोबर है। तो राजाओं का राजा बनने की कथा 5000 वर्ष बाद सुनाते हैं, हर 5000 वर्ष बाद। अच्छा वो तो हर 5000 वर्ष के बाद हो जाती है नई दुनिया। तो अभी फिर नई दुनिया हो जाएगी। हो जाएगी ना। ऑटोमेटिकली। नर, सत्यनारायण की, नर से सत्यनारायण बनने की कथा। तो सत्यनारायण के लिए सतयुग भी चाहिए। हँ? झूठ युग थोड़े ही चाहिए? ये कलियुग को कहेंगे झूठ युग।

तो पीछे ये समझ कर के भी तो नई दुनिया और पुरानी दुनिया में भी भेंट तो पड़ जाती है ना। गीता का एपिसोड को इतना दूर फेंकने से देखो सब बिल्कुल ही साफ हो गया। बिल्कुल बेहद सफेद झूठ हो गया। घोर अंधियारे में आ गए। तो जब झूठ के लिए कोई को बैठकरके समझाया जाता है तो देखो वो कितना गुरूर-गुरुर करते हैं। हँ? हाँ, मनुष्य गुर्र-गुर्र न करें; समझा ना? क्योंकि बंदर ही गुर्र-गुर्र करते हैं। तो इसलिए मनुष्य में जो ये पांच विकार होने के कारण ये फिर गाया जाता है ये बंदर से भी बदतर हो गए। हँ? रामायण में बंदर गाए गए हैं ना। मनुष्य इन बातों को नहीं समझते हैं कि ये बंदर क्यों गाए जाते हैं? जरूर गाए जाते हैं। ये भी गाया जाता है कि मनुष्य की सूरत मनुष्य की और सीरत माना चलन बंदर की। कब? सतयुग में थोड़े ही कहेंगे? जरूर कहेंगे कलियुग में। हां, तो ये महिमा जो सत्यनारायण की है वो सतयुग की महिमा है। हाँ। ये बंदरों की महिमा तो नहीं सतयुग की कहेंगे। क्योंकि लक्ष्मी और नारायण का राज्य ये तो सतयुग में था। नाम ही है सत्यनारायण। तो जरूर इस समय के मनुष्य को कहेंगे झूठ। झूठ खंड के हैं।

जरूर मनुष्य एक दो की जो तुम हैं जिनको दृष्टि मिली है ज्ञान की, तीसरे नेत्र की दृष्टि मिली है ना। तो तुम जान सकते हो ना अच्छी तरह से। भले ब्राह्मण की सूरत अभी बदल गई है। तो भी देखते हो कि बरोबर ब्राह्मण की सूरत, मनुष्य की भी तो ब्राह्मण की ही होती है ना। मनुष्य ही ब्राह्मण बनते हैं। और वो ही सीरत। फिर कहां से आ गए? जैसे बंदर की। फिर भी तो सीरत बंदर की देखने में आती है ना। क्योंकि पत्थर बुद्धि हैं। पत्थर बुद्धि हैं यानी कितना भी सुनाओ, कितना भी समझाओ सुधरते नहीं है बिल्कुल। 21.11. 1967 के प्रातः क्लास का दूसरा पेज। कितना भी वो जो गाया जाता है ना कि इसकी, इसकी बुद्धि ऐसी है कि जो भगवान भी आए तो भी इसकी बुद्धि कोई सुधार नहीं सकते, समझाए भी नहीं सके। अभी तो भगवान आया है ना। तो भी देखो नहीं सुधरती है ना। तो देखो इनका है ना बरोबर कि ये कहते आए हैं कि भगवान भी आ जाए तो भी ये बंदर से चेंज होकरके मंदिर लायक बन न सकें। भगवान, भगवान और बराबर ऐसे होता है कि बरोबर नहीं बनते हैं। मंदिर लायक बनते ही नहीं। क्यों? क्योंकि भगवान से प्रीति लगती ही नहीं जैसे भगवान चाहते हैं। क्या चाहते हैं? मामेकम याद करो। मेरे से प्रीति लगाओ। अब तो प्रीति क्यों नहीं लगती है? क्योंकि जन्म-जन्मांतर से व्यभिचारी बने पड़े हैं। देखो, लिखा हुआ है बिल्कुल किलियर। (क्रमशः)

Today’s morning class is dated 21.11.1967, Tuesday. To the spiritual children. They are called rose of knowledge, spiritual rose. There are many flowers. Children are explained. The world doesn’t know children as to when the spiritual Father comes and explains to the spiritual children. Hm? When does He explain and when does He narrate? What would you say? Hm? It would be said that He explains after 76. It is because when the Father is revealed then the Father will explain in the form of a teacher. The mother narrates lullaby (lori). So, it was told that the people of the world don’t know that the Father narrates in the body of Brahma in the form of a mother. And Ram who is called the Father; a child is called Krishna, isn’t he? Krishna is worshipped in the temple in the form of a child. So, the Father explains that you do not belong to the Iron Age world. To which place do you belong? You belong to the Purushottam Sangamyugi (elevated Confluence Age) world. You shouldn’t forget this topic, but you forget. You forget often. The intellect goes into the world. So, the Iron Age world comes to your mind.

You are Sangamyugi (Confluence-Aged), that too you are going to become Purushottam (highest among the souls). Even in the Confluence Age, you are the ones who become the best (uttam) among the souls which make purusharth. So, such Purushottam flowers. A gesture was made towards Lakshmi-Narayan. Such flowers. You do hear these words. You hear many times from the Father that we have to become flowers, i.e. what are we now? We are thorns because that is a garden of flowers of these Purushottams. So, flowers give joy, don’t they? They are fragrant. They do not emanate bad odour of vices. And they are also very light because if you have body consciousness you become heavy. If you consider yourself to be souls, then the soul is light, isn’t it? It is very subtle. Body is heavy. So, you definitely become light flowers from body conscious ones. But some become after suffering punishments and doing all this. So, then they? They are not called flowers. They will not be called. Achcha? You know that when you suffer punishments, then the post is reduced.

You know that you understand in the intellect and you even say through the mouth and you are sitting here to listen to the story of true Satyanarayana. So, who narrates? Definitely the true Father Himself narrates. It is said – Sat Chit Anand. The true Father comes and creates the Golden Age. So, you come here to become what? Do you come just to listen to the story? Arey, this is the story of becoming Narayan from nar (man). So, you come only to listen to the true story of becoming Narayan from nar. It is because in that world people listen to the story of Narayana, Satyanarayana in every home especially in India. That is a false story. The name written on the book is ‘Satyanarayan’s story’. And nobody asks the Punditji that you have written the name ‘Satyanarayan’s story’ and you are narrating the story of Leelawati, Kalawati, Lakadhara, Lakadbaggha. And which story do you listen here? Brother, this is the same story of the Gita.

Achcha, so, have you heard this story of the Gita earlier? That Punditji will tell that it has been lakhs of years since this Satyanayana [existed]. This Gita was narrated. They say that it was narrated in the end of the Copper Age (Dwapar) in 5000 years. And now, instead of 5000 years, these human beings with stone-like intellect; well, they will have to be called stone-like intellect because when was the episode of Gita enacted or when did the God of Gita come to teach RajYoga? Hm? Definitely He had transformed nar (man) to Narayan. So, the rule of Narayan exists in the Golden Age, doesn’t it? So, how was the story narrated in the Copper Age? Definitely the story must have been narrated in the beginning of the Golden Age. Now look He has come after how many years? It has been 5000 years. Who? Hm? The narrator of the story is the Father. It has been 5000 years since He came. He had come earlier also. He has now come again. If any human being says that it has been lakhs of years since He came, then well, what should he be called? It is because our religious scripture is of India. It is these foreigners who have come within 2500 years. So, when these Islamic people, Buddhists, Christians, etc. came, they started the inculcations of their individual religion, the topics of body consciousness. And ours is the Gita scripture. Shrimad Bhagwat Gita. Gita narrated by God.

So, this is as per the drama. But the mistake will be explained, will it not be? So, it is explained that as per the drama plan the residents of India in particular and this entire world in general; India in particular; so, the residents of India in particular; the episode of Gita, i.e. the Purushottam Sangamyug is called the episode of Gita. But it is not as if the episode of Gita was in the end of the Copper Age. At that time all the religions do not exist. Arey, it has been written in the Gita also – Sarva dharmaan parityajya. Leave all the religions and Maamekam sharanam vraj (be seated in My asylum alone). So, all the religions exist only in the end of the Iron Age because you understand that the episode of Gita, the Gita is narrated now. So, this is the Age of Gita. So, the Age of Gita itself is called Purushottam Sangamyug. It will be called Purushottam sangam (confluence) when you become highest among the souls from lowly human beings. The highest ones exist in the new world. There are lowly human beings in the old world, aren’t there? There are lowly human beings. So, definitely there is an old world and a new world. Old world is the Iron Age, an Age of sins, a sinful Age. And the new world is an Age of noble souls. So, rightly this is a confluence of both new and old world. Well, the old world and the new world cannot be lakhs of years old. Why? It is because these vidharmis (heretics), the videshis (foreigners) who have come, haven’t they? They have come within 2500 years, haven’t they? Before that there was only one religion, only one kingdom, only one language in India. There used to be only one clan, only one opinion. When the people of these other religions came, then they spread dualism. So, it has been written in the scriptures also that a world of demons (daitya) was created through dualism. They are called children of Diti. Diti means impaired mother.

So, this is explained to you children. And the Father has explained that this is very easiest of all. These are called very easiest of all topics. The name itself is easy RajYoga and easy knowledge. Even if you make calculations of the old and the new world, then there is the Golden Age, then the Silver Age, then the Copper Age and then the Iron Age. So, these many four Ages have passed, haven’t they? And it has been so much time since the new world existed. The new world has ended such a long time ago. It will be said that when there is one religion there is new world. When there is one king, then there is new world. So, that has ended 2500 years ago, hasn’t it? One and many. So, now people think that it has been lakhs of years. The Father has come and put in your intellect that no children, it has not been lakhs of years since the Age of Gita when God had come and narrated the Gita, taught the RajYoga. It is because there is a mention of RajYoga in the Gita. It is a Yoga which causes the attainment of kingship. What is there in this world now? Is this any kingship? Today you sit to rule and tomorrow you are made to come down. Arey, well, becoming Narayan from nar (man), look their rule lasted so long. Hm? It will be said that how many years does the rule of this first Narayan last? It continues for 2500 years.

So, look, it is such an easy topic. This Gita itself is the story of Satyanarayana. It is the story of becoming Narayan from nar (man). Man Arjun was narrated this story and made Narayan. Achcha, if we say that he was taught rajyog and made the king of kings, then this is definitely true because now, now he is to become the king of kings, isn’t he? Narayan is the king of kings as well. He rightly is. So, the story of becoming king of kings is being narrated after 5000 years, after every 5000 years. Achcha, that new world comes after every 5000 years. So now the world will become new again. It will become, will it not? Automatically. The story of man, of Satyanarayana, [the story of] becoming Satyanarayan from nar (man). So, the Golden Age (Satyug) is also required for Satyanarayana. Hm? Is a false Age required? This Iron Age will be called a false Age.

So, later, even after understanding this, a comparison is made between the new world and the old world, isn’t it? By throwing the Gita episode so far away look, everything has become completely clear. It has become completely white lie. People have entered into complete darkness. So, when you sit and explain to someone about lies, then look, they become so angry. Hm? Yes, people shouldn’t growl; You have understood, haven’t you? It is because it is the monkeys who growl. So, this is why because of the existence of five vices in the human beings it is sung that they have become worse than the monkeys. Hm? Monkeys are famous in the Ramayana, aren’t they? Human beings don’t understand these topics that why these monkeys are praised? They are definitely praised. It is also praised that human beings have the face (soorat) of a human being but they have a character (seerat) of a monkey. When? Will it be said to be in the Golden Age? It will definitely be said to be in the Iron Age. Yes, so this praise which is of the true Narayana is a praise of the Golden Age. Yes. This praise of the monkeys will not be said to be of the Golden Age. It is because the rule of Lakshmi and Narayan was in the Golden Age. The name itself is Satyanarayan (true Narayan). So, definitely the human beings of the present time will be called false. They belong to the false land.

Definitely the human beings, each other; you have received the vision (drishti) of knowledge, you have received the vision of the third eye, haven’t you? So, you can know very well. Although the face of the Brahmin has now changed. Yet, you see that rightly it is the face of a Brahmin; that of the human beings is also that of the Brahmins only. Human beings only become Brahmins. And the same character. Then where did they come from? It is like that of monkeys. However, the character of monkeys is visible, isn’t it? It is because they have a stone-like intellect. They have stone-like intellect means that howevermuch you narrate, howevermuch you explain, they do not reform at all. Second page of the morning class dated 21.11.1967. Howevermuch it is sung that the intellect of this person is such that even if God comes, nobody cannot reform the intellect of this person; He cannot even explain. Now God has come, hasn’t He? However, look, it doesn’t reform, does it? So, look, they are right that they have been telling that even if God comes, they cannot change from monkeys to worthy of being worshipped in the temples. God, God and rightly it happens that they rightly do not become. They do not become worthy of temples at all. Why? It is because they do not develop love for God at all, just as God wants. What does He want? Remember Me alone. Love Me. Well, why doesn’t the love emerge? It is because you have become adulterous since many births. Look, it has been written in a very clear manner. (Continued)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2857, दिनांक 21.04.2019
VCD 2857, dated 21.04.2019
प्रातः क्लास 21.11.1967
Morning class dated 21.11.1967
VCD-2857-Bilingual-Part-2

समय- 26.01-47.34
Time- 26.01-47.34


तुम बच्चे समझते हो अच्छी तरह से कि इतने ढेर के ढेर हैं जिनकी विनाश काले विपरीत बुद्धि हुई पड़ी है। विपरीत बुद्धि हैं तो कोई भी बाप को नहीं जानते हैं। तो रिजल्ट क्या होता है? हँ? विपरीत बुद्धि विनश्यते। विनश्यते? माना? क्या मर जाते हैं? देह से मर जाते हैं? हँ? नहीं। क्या? हाँ, बाप मिला और विपरीत बुद्धि बने तो पद क्या बनेगा? पद खलास हो जाता है। विनाश हो जाता है। तो देखो फिर रिजल्ट क्या होगा? हँ? फिर अभी उसको कयामत का समय भी कहा जाता है। हँ? कयामत नाम क्यों दिया? हँ? एक तो होती है मनुष्य की मत। एक होती है भगवान की मत। और एक फिर होती है कयामत। हँ? लोग कयामत में वायरे हो जाएंगे। हँ? क्योंकि जब भगवान आते हैं तो ढेर के ढेर भगवान निकल पड़ते हैं। तो मुगालते में पड़ जाते हैं। अरे क्या मत है? हँ? श्रेष्ठ मत क्या है? तो कयामत-कयामत करते-करते खलास हो जाते हैं। अब हिसाब-किताब भी तो उनका खलास करना है ना। हँ? हिसाब-किताब कैसे खलास करेंगे? जन्म-जन्मांतर के हिसाब-किताब हैं पापों के। तो रिजल्ट क्या होता है? सजाएं भी तो काटनी है। और जितनी-जितनी जो सजाएं काटेंगे, क्या होगा उसका रिजल्ट? उतना-उतना उनका पद भ्रष्ट होता जाएगा। होना जरूर है। क्योंकि ये तो बादशाही स्थापन होती है। हँ? ऊँच ते ऊँच पद। बाप कहते हैं मैं तुम्हें विश्व की बादशाही देने आया हूं।

तो अब है तो सब पुरुषार्थ अनुसार, पढ़ाई के अनुसार। तो उन स्टूडेंट्स में वैरायटी पद हैं। जैसी-जैसी पढ़ाई जैसा-जैसा पुरुषार्थ वैसा-वैसा पद। जैसे अज्ञान काल में वैरायटी है ना। इस दुनिया में वैरायटी पद है ना। ऐसे ज्ञान काल में भी वैरायटी हैं। तो ये तो समझते हो ना कि बादशाही एक जैसी नहीं बन सकती। बादशाह भी एक जैसे बनेंगे क्या? नहीं। महाराजा, कोई राजा, कोई छोटे, कोई बड़े। कोई की थोड़े समय की रजाई। कोई की लंबे समय की रजाई।

तो बाप बैठकर के समझाते हैं। हर एक बात समझाते हैं। बच्चे, पुरुषार्थ करके, हँ, अब तुम कितना भी पुरुषार्थ करो लेकिन पुरुषार्थ करके सभी को तुम फूल नहीं बनाए सकते हो वास्तव में। नहीं। क्योंकि जो बनते हैं सो ही यहां आते हैं सतयुग में। जो नहीं बनते या जो, जो फिर यहां आते ही नहीं हैं या आकरके चले जाते हैं, सुनते ही कुछ नहीं है। बुद्धि में जैसे कुछ बैठता ही नहीं। तो वह तो फिर आएंगे भी नहीं। अब तुम्हारे पास सब तो नहीं आएंगे। ना। हँ? क्योंकि इस दुनिया में और सब धर्म वाले देवता तो नहीं है ना सभी। वो तो अपने-अपने धर्म के हैं। देवता धर्म के तो हैं नहीं। क्योंकि बच्चों को समझाया गया है कि बहुत हैं जो ज्ञान मार्ग में ठहरते ही नहीं। वहां भक्ति मार्ग में भी तो आते हैं ना ढाई हजार साल भक्ति मार्ग, ढाई हजार साल ज्ञान मार्ग। ज्ञान मार्ग की प्रारब्ध ढाई हजार साल सतयुग, त्रेता। और भगत हैं, बुद्धि इधर भागती है, उधर भागती है, यहां टिकती, वहां टिकती। परमानेंट कहीं टिकते ही नहीं। तो भक्ति माना भागना-करना। वो भक्ति फिर ढाई हजार साल चलती है।

तो जो भक्ति मार्ग में क्योंकि शुरू भक्ति मार्ग होती है तो ज्ञान मार्ग के जो भी जिज्ञासु जो आकरके ज्ञान लेते हैं, थोड़ा भी लेते हैं, बड़ा भी लेते हैं। जैसे पढ़ाई होती है। कुछ भी नहीं पढते हैं कोई। समझा ना? और कोई तो बिल्कुल थोड़ा पढ़ते हैं। तो वहां कोई को कह दियो अलफ कहो, बे कहो या आओ, हम तुम्हें बताएं कहो। तो लोग यहां पढेंगे। और कोई देखो तो आईसीएस भी पढ़ते हैं। हँ? ऊंची-ऊंची पढ़ाई पढ़ते हैं तो ऊंचा-ऊंचा पद पाते हैं। अब यहां भी देख लियो। बाबा ने समझाया था ना, जब गए थे यहां वो जहां पांच पति करती हैं। हँ? कहां? हँ? देहरादून की तरफ कोई गांव है चकराता। तो सभी ने कहा - हां चकराता। चकराता? ये नाम क्यों रखा गांव का? बुद्धि चकराती है तो एक छोड़ दूसरा, दूसरा छोड़ तीसरा, चौथा, पांचवा। तो वहां तो वो मास्टरनी टीचर पढ़ करके फिर पढ़ाते थे तो बोलते थे बात मत पूछो बच्चों को बिठाया जाता है स्कूल में। तो वो फिर बैठते ही नहीं है। उनको वहां बैठने में सुख ही नहीं आता है। फिर उनसे पूछा तो बोला, अरे, हम तो घास काटने वाले हैं। हमको तो घास काटना पसंद आता है। हम ये तुम्हारी गिटपिट-गिटपिट, ए-बी-सी-ड, अलफ और बे, हमको ये अच्छी नहीं लगती है। हम अपना पेट का प्रबंध पहले करें ना। तो वो तो पढ़ते ही नहीं हैं। हँ?

तो विचार करो कि वो तो नहीं पढते हैं। फिर अगर पढ़ेंगे तो क्या पढ़ेंगे? ये भी समझ की बात हुई ना। क्या पढ़ते हैं और क्या फिर मनुष्य कितना बड़ा इम्तेहान जाकरके पढ़ते हैं। फर्क तो है ना। फर्क रहेगा पढ़ाई का। तो ये तो है ऐसा है बरोबर कि धंधे-धोरी में मनुष्यों को लाखों-करोड़ों रुपए आ जाते हैं। पढ़ाई वाले को इतना नहीं आ सकता है। व्यापार में और नौकरी में फर्क तो होता है ना। कोई-कोई तो नौकरी में भी बहुत बड़े बन जाते हैं। है ना? बाबा ने नहीं समझाया था? वो ही डॉक्टर कोई लाख रुपया महीने में कमाए लेंगे। कोई एक केस का भी लाखों कमाए लेते हैं। देखो, अब कोई साहूकार होते हैं, बहुत साहूकार। क्योंकि अभी तो पिछाड़ी आ गई है। परंतु ये ख्याल करो जब जिसने ये बनाया होगा सोमनाथ का मंदिर और वो होगा। वो तो भक्ति मार्ग में आ गए ना, तब बनाया जब वाम मार्ग में आ गए। तो उनमें धनवान भी तो बहुत होगा ना जिसने सोमनाथ मंदिर बनाया होगा। तो धनवान जब भी होते हैं, वाम मार्ग में आते हैं, तब ही आते हैं जब विकार में जाते हैं। और विकार में जाते हैं तो बीमारियां भी आ जाती हैं। हँ? कुछ ना कुछ बीमारियां जरूर आ जाती हैं।

तो वो बड़े-बड़े साहूकार होंगे। तो वो क्या देते हैं? हँ? बहुत देते होंगे ना बच्ची। उस समय में पैसे तो बहुत थे। जब वाम मार्ग में गए ना शुरू में उस समय में भी सोने के सिक्के चलते थे। तो धनवान थे ना। अरे, अभी तो ये देखो ठिक्कर-भित्तर सिक्के बनते रहते हैं। कागज के बनते रहते हैं। ये तो अभी हो सकते हैं। हां। चमड़े के भी पैसे बन जावें। कोई नियम तो नहीं है ना। जब ये टीन का बना है, एलुमिनियम का या फलाने का बना है। देखो, ये एलुमिनियम के भी सिक्के बने। तो ये वजन के भी हल्के होते हैं। तो इनसे भी कोई और नीचे चले जाएंगे। हँ? लोहे का भी नहीं। हँ? मिट्टी मिला हुआ लोहे का बनाएंगे। तो फर्क बाबा समझाते हैं कि तुम जो पढ़ते हो, हँ, तो कितना तुमको नशा चढ़ना चाहिए।

21.11.1967 के प्रातः क्लास का तीसरा पेज। अगर अपने उसमें दुकान घर में भी तो ऐसे फूल का गुलदस्ता नहीं रखते हैं ना। तो बड़े आदमी होते हैं तो बहुत अच्छे-अच्छे फूलों के गुलदस्ते रखते हैं। कोई तो उसमें सब मिक्सचर करके रखते जाते हैं। पत्ते भी, धूरछाई सब। तो वो भी तो एक नमूना होता है ना। तो कोई तो ये धूलछाई बनाएंगे ना। उसमें टालियां-वालियां, कचड़ा-वचड़ा सब कुछ डाल देंगे। कोई आएगा तो नहीं। अब लीली तो लीली ही होंगे। ये होगा तो यही होंगे। एकदम ऐसे ही। और लिली का फूल देखा है? सिर्फ फूल ही फूल। तो अभी ज्ञान तो उनमें है नहीं कोई में भी। इसमें कोई में ज्ञान हो फिर तो ये गुलदस्ता कभी भी तुम लोगों का वो जो गुलदस्ता बनाओ तो ये तुम टांगर और ये, ये रतनज्योति, अक के फूल तुम डालेंगे? बिल्कुल नहीं डालेंगे। तुम डालेंगे ही नहीं। अगर ज्ञान होगा तो नहीं डालेंगे। तो ऐसे हैं तुम्हारे में जिनमें ज्ञान ही नहीं है। वो क्या करेंगे? वो तो फिर कुछ भी डाल सकते हैं। बाकी जिनमें ज्ञान होगा वो क्या करेगा? लिली का फूल ले आएंगे। भल रखा रहे। 15-20 रोज रखा रहे। खुशबुएं उनकी चलती रहेंगी क्योंकि मुखड़ियां होती हैं ना। वो मुखड़ियां फिर पीछे-पीछे खुलती जाती हैं और खुशबू फैलती जाती है। खुलती जाती हैं खुशबू निकलती जाती है। तो जो फूल होंगे ना तुम्हारे में भी उनको फूलों का शौक होगा। खुद ही फूल नहीं होंगे, कांटे होंगे, तो क्या करेंगे? क्योंकि देखने के लिए कि हम, हम फूल बनेंगे। एक तो वहां देखेंगे। दूसरा फूलों को देखेंगे। बाबा नहीं कहते हैं। मैं कभी-कभी यहां देख करके फिर जाता हूं बगीचे में देखने के लिए कि देखो हमारे पास भी ऐसे हैं। देखो, ये टीचर है, ये रतनज्योत है। और ये तो कांटे वाला है। जरा भी फूल की खुशबू नहीं है। हँ? खुशबू नहीं है पर बांस है। तो बांस भी आती होगी। बदबू आती होगी ना। अभी बांस कोई तो नहीं है। परंतु ये तो अज्ञान की बदबू है।

तो वो तो तुम समझते हो ना बच्चे कि बरोबर यहां फूलों का बगीचा तो बन ही जाता है। इसमें तो कोई शक नहीं है। पर तुम जानते हो सतयुग में सब ऐसे फूल होते हैं क्या? वो जो गाया जाता है ना कि जो यहां से फारकती दे देते हैं तो वो चांडाल का जन्म लेते हैं। छोड़ करके चले जाते हैं। क्यों चांडाल का जन्म लेते? हँ? कि पहले बने, पहले दिया तन-मन-धन। फिर वापस लेके चले गए। तो ये है जो देकरके फिर वापस लेते हैं तो चांडाल का जन्म मिलता है। तो फिर वो क्या होंगे? हँ? कहां देखो वो बड़े-बड़े आदमी और कहां वो शमशान में चांडाल। समझा ना? इसलिए तुमने देखा होगा कि बड़े आदमियों का शाही शमशान अलग ही बनाते हैं। जैसे यहां है ऐसे फर्क तो वहां भी होगा ना। ऐसे तो नहीं है फिर सभी कोई ऐसे फूल बन जाएंगे। नहीं। फर्क तो जरूर रहता है। ओम शांति। (समाप्त)

You children understand nicely that there are numerous people whose intellect has turned opposite at the time of destruction. When they have an opposite intellect, none of them know the Father. So, what is the result? Hm? Vipreetbuddhi vinashyate (people with intellect opposite to God get destroyed). Get destroyed? What does it mean? Do they die? Do they die physically? Hm? No. What? Yes, if you found the Father and if your intellect turns opposite to Him, then what post will you achieve? The post is finished. It is destroyed. So, look, then what will be the result? Hm? Then now it is called the time of destruction (kayaamat) also. Hm? Why was the name kayaamat given? Hm? One is the opinion (mat) of the human beings. One is the opinion of God. And one then is Kayaamat. Hm? People will become mad in kayaamat. Hm? It is because when God comes, then numerous Gods emerge. So, they get confused. Arey, what (kya) is the opinion (mat)? Hm? What is the righteous opinion? So, they get finished while doing kayamat, kayamat. Well, their karmic account also has to be finished, isn’t it? Hm? How will the karmic account be finished? There are karmic accounts of sins of many births. So, what is the result? Their post will continue to be destroyed to the same extent. It is definitely going to happen. It is because this is an emperorship that is going to be established. Hm? The highest on high post. The Father says that I have come to give you the emperorship of the world.

So, well, everything is as per the purusharth, as per the studies. So, there are variety posts among those students. As is the level of studies, as is the level of purusharth, so is the post. For example, there is variety in the period of ignorance (in the outside world), isn’t it? There are variety posts in this world, aren’t there? Similarly there is variety in the period of knowledge also. So, you understand that the emperorship cannot be achieved equally. Will you become equal emperors? No. Some become Maharaja, some become Raja, some small ones, some big ones. Some rule for a short period. Some rule for a long period.

So, the Father sits and explains. He explains each and every topic. Children, by making purusharth, hm, well, howevermuch purusharth you make, but by making purusharth, you cannot make everyone a flower in reality. No. It is because only those who become [flowers] come here in the Golden Age. Those who do not become or those, those who don’t come here at all or come and go, do not listen anything. It is as if nothing sits in their intellect at all. So, they will not even come. Well, all will not come to you. No. Hm? It is because in this world the people belonging to other religions are not deities; are they? They belong to their individual religions. They do not belong to the deity religion. It is because children have been explained that there are many who do not stay on the path of knowledge at all. They also come there on the path of Bhakti also, don’t they? The path of Bhakti for 2500 years; the path of knowledge for 2500 years. The fruits of the path of knowledge for 2500 years in the Golden Age and the Silver Age. And there are devotees (Bhagat) whose intellect runs here, runs there; it becomes stable here, it becomes stable there. They do not become stable permanently anywhere at all. So, Bhakti means running around. That Bhakti then continues for 2500 years.

So, those on the path of Bhakti because when the path of Bhakti begins, then all the students of the path of knowledge who come and obtain knowledge, they may obtain a little, they may obtain more as well. For example, there is education. Some don’t study anything. You understood, didn’t you? And some study very little. So, if you tell anyone there that say Alaf, say Be or come, we will tell you. So, people will study here. And look, some study even ICS. Hm? When they study higher education, then they achieve high posts. Well, look here as well. Baba had explained, hadn’t He? When we had gone here, to the place where women have five husbands. Hm? Where? Hm? There is a village called Chakrata near Dehradun. So, everyone said – Yes, Chakrata. Chakrata? Why was the village given this name? When the intellect wonders (chakrati), then it leaves one to have the second, leaves second for the third, fourth, fifth. So, there the Masterni, the Teacher used to read out and then teach; so, they used to say, just do not ask; children are made to sit in the school. So, they do not sit at all. They do not feel happy sitting there at all. Then, when they were asked, they said, arey, we are grass-cutters. We like cutting grass. We do not like your gitpit-gitpit, ABCD, Alaf and Be. We will make arrangements to fill our stomach first, will we not? So, they do not study at all. Hm?

So, just think that they do not study. Then, if they study, what will they study? This is also a topic to be understood, isn’t it? What do they study and then what do human beings go and study for such a big examination. There is a difference, isn’t it? There will be a difference of education. So, it is right that people earn lakhs and crores of rupees in business. Those who study cannot earn that much. There is a difference in business and job, isn’t it? Some grow very big in job as well. Is it not? Hadn’t Baba explained? The same doctor earns lakh rupees in a month. Some earn lakhs in one case itself. Look, well, some are rich, very rich. It is because now it is the end. But just think that when someone had built this temple of Somnath and it must be there. They entered the path of Bhakti, didn’t they? Then they built that when they entered the leftist path. So, the one who built the temple of Somnath must have been very prosperous as well. So, when someone is prosperous and when they enter the leftist path, they enter it only when they indulge in lust. And when they indulge in lust, then the diseases also emerge. Hm? Some or the other diseases definitely emerge.

So, they must be big prosperous persons. So, what do they give? Hm? They must be giving a lot, don’t they daughter? At that time there was a lot of wealth. When they entered the leftist path in the beginning, at that time, gold coins were in vogue. So, they were prosperous, weren’t they? Arey, now look, these coins of clay and stone are produced. Those of paper are produced. This can be possible now. Yes. It may be possible that they produce coins of leather also. There is no rule, isn’t it? When this has been made of tin, of aluminium or of such and such thing. Look, these coins of aluminium were also produced. So, they are light weight as well. So, they may go to a lower level. Hm? Not even of iron. Hm? They may produce with iron mixed with clay. So, Baba explains the difference that whatever you study, you should feel so intoxicated.

Third page of the morning class dated 21.11.1967. We don’t keep such bouquet of flowers at shop, home also, do we? So, big people keep bouquets of very nice flowers. Some keep a mixture in it. They add leaves, etc. everything. So, that is also a sample, isn’t it? So, some make it a dhoolchaai, don’t they? They put everything like branches, wastage, etc. Nobody will come. Well, if it’s Lily, there will be lilies only. If there is this thing, then there will be these things only. Completely like this only. And have you seen the Lily flower? Only flowers. So, well, there is no knowledge in any of them. If in this one, if there is knowledge in someone, then this bouquet of you people, if you prepare a bouquet, then will you put Taangar, and this, this flower of Ratanjyoti, Ak? You will not put at all. You will not at all put. If you have knowledge you will not put. So, there are such ones among you who don’t have knowledge at all. What will they do? They can then add anything. But what will the one who has knowledge do? He will bring Lily flower. It can be kept. It can be kept for 15-20 days. It will continue to emanate fragrance because they are buds, aren’t they? Those buds keep on opening later on and the fragrance keeps on spreading. It goes on opening and the fragrance keeps on emerging. So, those who are flowers among you also will have a liking for flowers. If they themselves are not flowers, if they are thorns, then what will they do? It is because in order to see that we, we will become flowers. On the one hand we will see there. And on the other hand we will see the flowers. Baba doesn’t say. I sometimes see here and then go to the garden to see that look, we too have such ones. Look, this teacher is a Ratanjyot. And this one has thorns. There is no fragrance of flower at all. Hm? There isn’t fragrance, but there is bad odour. So, you must be getting bad odour also. You must be getting bad odour, don’t you? Now there is no bad odour. But it is the bad odour of ignorance.

So, you understand children, don’t you that rightly here the garden of flowers is definitely formed. There is no doubt in it. But you know that is everyone such flower in the Golden Age? It is praised that those who give faarkati (cutting of relationship with Father) here get the birth of Chaandaal (those who help in the cremation of dead bodies). They leave and go. Why do they get the birth of Chaandaal? Hm? First they became, first they gave body, mind and wealth. Then they took it back and went away. So, those who give and take it back get the birth of a Chaandaal. So, then what will they be? Hm? On the one hand look, those big personalities and on the other hand the Chandaals in the cremation grounds. You understood, didn’t you? This is why you must have seen that the royal cremation ground of big personalities is built separately. Just as it exists here, there will be a difference there as well, will it not be there? It is not as if everyone will become such flowers. No. The difference definitely exists. Om Shanti. (End)

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