Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2839, दिनांक 03.04.2019
VCD 2839, dated 03.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning Class dated 17.11.1967
VCD-2839-extracts-Bilingual

समय- 00.01-21.53
Time- 00.01-21.53


आज का प्रातः क्लास है – 17.11.1967. शुक्रवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि जितना-जितना तुम याद की यात्रा में रहेंगे तो तुमको इतनी-इतनी बाप की कशिश होगी। जैसे चकमक लोहे को खींचती है ना। पीछे तुम वहाँ रह नहीं सकेंगे। घड़ी-घड़ी बाबा पूछेंगे। क्यों घड़ी-घड़ी पूछेंगे? बाबा हम रह नहीं सकते हैं। हम चकमक बिगर कैसे रह सकेंगे? हँ? ऐसे अंदर-अंदर आतरवेला हो जावेगी। हमारी तो ये है ही कट निकल गई तो कशिश ही यहाँ होती है ना। कट निकली तो कशिश जरूर होगी। कट होती है तो चकमक इतना खींच नहीं सकती। बीच में कट आ जाती है। तो आगे चलकरके तुमको इतनी कशिश होगी। ये भी तो समझ की बात है ना। क्योंकि जितना तुम आत्मा शुद्ध होते जाएंगे, हँ, कट निकलती जाएगी। और इतना साफ होते जाएंगे। ये तो यहाँ बैठे होंगे तो कशिश तो करेंगे ना जरूर। कहाँ बैठे होंगे? हँ? भृकुटि के मध्य में बैठे होंगे तब तो कशिश करेंगे ही करेंगे। और अगर मधुबन में बैठे हैं जहाँ मुरलिया बाजे, तो वहाँ भी तो कशिश जरूर करेंगे ना। क्योंकि है बरोबर बाप समझाते हैं कि बच्चे बिन्दी होकरके रहो। बाप भी बिन्दी है। तुम भी बिन्दी हो।

तो ये समझने की बातें हैं। तो भी भले सुई भी समझो बाप कहकरके समझाते हैं। पर समझते तो हो कि जितना-जितना प्योर हमारी ये बिन्दी होगी इतना बहुत कशिश होगी। और कशिश होगी। घड़ी-घड़ी बाप की याद आएगी। तो हम ठहर नहीं सकेंगे। तुम लोग रह नहीं सकेंगे। तो ये तो जैसे गले में फांसी पड़ जाएगी। घड़ी-घड़ी फांसी। परन्तु किसको पड़ जाएगी? जो अच्छी तरह से याद करेंगे। याद से ये कट उतरती रहेगी। आत्मा में अनेक जन्मों की कट है ना विकारों की। तो ये कट बाप के संग के रंग से, बाप की याद करेंगे ना मन से, बुद्धि से। तो संग का रंग लगेगा, कट उतरेगी। देखो, ये कट कितनी देरी से उतरती है। टाइम तो लगता है ना। कितनी तुम लोग रिपोर्ट करते हो कि बाबा ये तो मंजिल है। इस मंजिल में तूफान बहुत आते हैं। ज्ञान में कोई तूफान आने की बात नहीं है। ये याद में ही तूफान बहुत लगते हैं। बाबा, अरे, हम गिर जाते हैं कितने तो। कट तो क्या इतनी कट लगती है जो थोड़ी साफ होकरके फिर इतनी कट लग जाती है। फिर सारी कट ज्यों की त्यों, जैसी थी वैसी हो जाती है।

तो जो तमोप्रधान थे सो पूरे फिर तमोप्रधान बन जाते हैं। और बाप ने तो बताय दिया। क्या? कि ये काम महाशत्रु है। हँ? क्योंकि कामना मात्र मन के अंदर आई और ये महाशत्रु चिपट गया। वाचा में आई, दृष्टि में आई तो और गया। और फिर कर्मणा में गिर गए कर्म इन्द्रियों से फिर तो इससे बड़ा शत्रु कोई है ही नहीं। तो वो है बड़ी ते बड़ी कट लगाने वाला एकदम। कौन? ये काम विकार। हँ? एकदम चट्ट खाते में चले जाते हैं। तभी तो पुकारते रहते हो ना – हे पतित-पावन। अब कोई भक्तिमार्ग में पुकारने की बात थोड़ेही है। वहाँ किसको पुकारेंगे? जानते ही नहीं। पहचानते हैं क्या? यहाँ तो नंबरवार पहचानते हैं तो, तो फिर पुकारते हैं – हे पतित-पावन। हँ? बस, सारी रड़ियां तुम्हारी पतित-पावन के ऊपर पड़ती हैं। हँ? पहले किसके ऊपर? हँ? पहले पतित के ऊपर कि पहले पावन के ऊपर? किसके ऊपर रड़ियां डालते हो? हे पतित-पावन! हँ? पहले कौन बुद्धि में?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, पतित पहले बुद्धि में आ जाता है।

तो बताया – पतित के ऊपर ये सारी तुम्हारी रड़ियां पड़ती हैं ना। चिल्लाते हो पतित के ऊपर। कोई-कोई क्रोध वगैरा की तो बात ही नहीं होती है। सिर्फ पतित को आकरके पावन बनाओ। तो मूल बात है पतित। और बाप भी कहते हैं। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘भी’ क्यों लगाया? अरे, बाप तो एवर प्योर है ना। तो ‘भी’, अपने लिए ‘भी’ लगाया। किसके मुकाबले? पतित के मुकाबले अपने प्रति ‘भी’ लगाय दिया। बाप भी कहते हैं बच्चे ये काम महाशत्रु है। बच्चे इन पर जीत पहनने से तुम जगतजीत बन जावेंगे। हँ? है ना। सारे जगत को जीत लेंगे। हँ? सिर्फ एक की बात करते हैं ना।

अच्छा, कुछ शास्त्रों में लिखा है कि द्रौपदी ने भी पुकारा ना। तुम बच्चे में तो बहुत हैं ना द्रौपदियां। हँ? दुःशासन-दुर्योधन पीछे पड़ते हैं तो पुकारती हो। तो ऐसी द्रौपदियां कोई थोड़ी थोड़ेही हैं। थोड़ी-थोड़ी हैं क्या? ढ़ेर हैं बिचारी बांधेली जो पुकारती हैं। बाबा, हमको ये नंगन करते हैं। ऐसे-ऐसे करते हैं कि दूसरों के समाने ही नंगन कर देते हैं। छेड़ते रहते हैं। तो वो द्रौपदियां नहीं ठहरी ना। ठहरी या नहीं ठहरी? द्रौपदियां तो ठहरी ना। ठहरी। तो बिचारी रड़ी मारती हैं। मार खाती हैं, चिल्लाती हैं। तो बाबा कहते हैं ये तो कलप पहले भी तुमने खाया है ना। ऐसे तो नहीं है कि कलप पहले कोई एक द्रौपदी थी। हँ? और कोई कृष्ण भगवान ने बैठकरके ऐसे-ऐसे उनको साड़ियां दी। एक के पीछे एक साड़ियां देते रहे। जैसे वो नाटक में दिखाते हैं। नहीं। ये तो सारी गुप्त बात यहाँ होती है। और ये सहन करनी पड़ती है। अरे, वो तो नाटक बनाय दिया, द्रौपदी, दुःशासन-दुर्योधन।

17.11.1967 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। तो ये नाटक हुआ। समझा ना। और वो ही इस समय का तुम्हारा नाटक। तो देखो तो इस समय का नाटक तुम्हारा। द्रौपदी के चीर हरण करने का नाटक। नंगन करने का नाटक। सारी सभा में नंगन करने का नाटक। कोई एक भी देखेगा तो दूसरों को बताएगा। तो सारी सभा में नंगन हुआ ना। देखो, अभी-अभी तुमको दिखलाते हैं। ये इस संगमयुग की बात है। सतयुग, त्रेता की तो कोई बात ही नहीं है। बाकि शुरू हुई है, तो जब पिछाड़ी हुई है तो जभी अबलाओं के ऊपर अत्याचार हुए हैं। तब देखो, अभी दिखलाते हैं कि भई ये, ये नाटक-वाटक अभी-अभी शुरु हुआ है। कोई आगे थोड़ेही ऐसे नाटक होते थे। तुम बच्चियां जानती हो कि बरोबर ये बच्चियां बहुत ढ़ेर की ढ़ेर हैं। और ढ़ेर की ढ़ेर होने वाली हैं द्रौपदियां। और आगे चलकरके और ही पुकारेंगी। अभी भी पुकारती तो हैं ना। मार खाती हैं, पुकारती हैं बहुत ही। तो तुम बच्चों को तो पूरा मालूम नहीं है ना। सारे समाचार तो बाबा के पास आते हैं। हँ? तो बाबा को तो सारा समाचार मालूम पड़ता है। कैसे ये विकार में जाते हैं। कैसे बिचारी नंगन होती हैं। तो कोई द्रौपदी के मुआफिक अबलाओं के माफिक थोड़ेही। नहीं।

ऐसी और भी बहुत होती हैं जो खुशी-खुशी बहुत नंगन हो पड़ती हैं। क्योंकि काम तो महाशत्रु है ना। बस, थोड़ी भी क्रिमिनल आई आपस में जुड़ी और किसको देखा, हँ, या कोई खूबसूरत अकेला देखा, उसकी कोठी-वोठी देखी और देखा कि अच्छा खासा है, ये गंद खाने में फिर देरी नहीं करते हैं। देखो, इस दुनिया में कितना गंद लगा पड़ा है। अरे, तुम देखते हो। देखते भी हो और सुनते भी हो। रस्ते चलते, चलते-चलते, मोटर से उतरते-उतरते ये गंद कर दिया। और मोटर में चढ़े और भाग गए। अब ये बातें तो तुम अखबार में भी सुनते रहते हो। पर भारत में तो इतनी ढ़ेर की ढ़ेर अखबारें। और कोई सभी अखबारें। सभी अखबारें, कोई एक ही अखबार में थोड़ेही पड़ता है। नहीं-नहीं। जो-जो अखबारें जहाँ-जहाँ जिस स्टेट में हैं; भारत बहुत बड़ा है ना एकदम। समझते हो बच्चे कि बरोबर तमोप्रधान बने पड़े हैं। ये काम शत्रु है।

ये पांच विकार इस समय में बहुत फुल फोर्स में हैं। किस समय में? हँ? जब बाप आते हैं तो ये और ही फोर्स में होते जाते हैं। ये लॉ मुजीब ड्रामा के प्लैन अनुसार है जरूर इनको; इन पर इस जबकि फोर्स में है ना। इस समय में बाप आते हैं। और आकरके बोलते हैं कि अभी देखो तुम पावन बनो। तुम्हारी मर्जी के ऊपर सारी बात है। अभी पूरे पतित बन जाते हो जब तभी तो बाप आते हैं ना। हँ? तो अभी और पतित बनते रहना है क्या? तो देखो कितनी आफत में आना पड़ता है बाप को। और कितना युक्ति से काम करना पड़ता है। और है सब गुप्त एकदम। तुम्हारा नाम ही है इन्काग्निटो, गुप्त। किसको भी मालूम नहीं पड़ सकता कि ये कोई ब्रह्मचारी है या फलाना है या टीरा है या क्या है।

ये भी जो बैज अभी तुमको लगवाया है ना। अभी-अभी लगवाया है। कबकी बात हुई? पहले प्लास्टिक के बैज बनवाए थे। हँ? गोल-गोल बिल्ले जैसे। हाँ। दोनों तरफ से लेमिनेशन और बीच में चित्र डाल दिया। एक तरफ लक्ष्मी-नारायण, दूसरी तरफ त्रिमूर्ति। या एक तरफ श्री कृष्ण का चित्र। तो ये अभी तुमको लगवाया। माने कभी? हँ? कब लगवाए ये बैज? सन् 66-67 में लगवाए। हाँ। समझाने के लिए लगवाए हैं। हँ? कि भई हार्टफेल नहीं हो। मुए छुए नहीं बनो। हँ। घड़ी-घड़ी बैज को देखते रहेंगे तो याद आवेगा। नहीं तो मुए-छुए फट से एकदम बन जाते हैं। हाँ। बहुत ही बच्चे लिख देते हैं बाबा, अरे बाबा क्या करें? ये तो बड़ी आफत है। बहुत बड़ी बीमारी है, फलानी है। अरे, बीमारी तुम्हारी है। अरे, करमभोग तुम्हारा है जन्म-जन्मान्तर का। मैंने कोई ये करम भोग भोगा है क्या? मैंने माने किसने? हाँ, शिव सुप्रीम सोल ने ये कोई करम भोग भोगा है? तुम्हारी बीमारी है। और वो भी जन्म-जन्मान्तर की सिर पर बहुत बोझ पड़ा हुआ है। तो तुमको मालूम थोड़ेही है। मालूम ही नहीं पड़ता है।

अभी ही देखो कितनी क्रिमिनल आई चलती रहती है। हँ? अभी माने सन् 66-67 में। और आगे चलकरके तो और बढ़ेगी या घटेगी? हँ? और जास्ती ये तो, हाँ, जब तक पूरा रावण खलास नहीं हो जाएगा, रावण का राज्य जब तक पूरा नहीं खतम होगा तब तक ये तो रावण, रावण के सहयोगी मेघनाद, कुंभकरण ये बढ़ते ही जाएंगे; बड़े-बड़े चित्र बनाते क्यों हैं? हर साल बड़े-बड़े चित्र बनाते रहते हैं। कारण क्या? कहाँ की यादगार? अरे, यहाँ संगमयुग की यादगार है कि संगमयुग में जब बाप आते हैं तो ये विकार जो हैं ना ये बढ़ते ही जाते हैं, बढ़ते ही जाते हैं।

Today’s morning class is dated 17.11.1967. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Friday was that the more you remain on the journey of remembrance you will be pulled by the Father to the same extent. For example magnet pulls the iron, doesn’t it? Later you will not be able to live there. You will ask Baba again and again. Why will you ask again and again? Baba we cannot live [there]. How can we live without the magnet? Hm? You will feel desperate like this inside. Our cut (rust) has been removed; so, we get attracted towards this place only, don’t we? When the rust has been removed then the attraction will definitely be there. If there is rust, then the magnet cannot pull so much. The rust comes in between. So, in future you will have such attraction (kashish). This is also a topic to be understood, isn’t it? It is because the more you souls become pure, the rust will continue to be removed. And you will become clean to that extent. If this one is sitting here, then He will definitely attract. If He is sitting at which place? Hm? If He is sitting in the middle of the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows) then He will definitely pull. And if He is sitting in Madhuban where the flute is played, then He will attract there as well, will He not? It is because the Father rightly explains that children, remain as a point (bindi). The Father is also a point. You are also a point.

So, these are topics to be understood. However, the Father explains about the needle. But you understand that the purer this point will be the more it will attract. And there will be attraction. You will get the thoughts of the Father again and again. So, we will not be able to stay [there]. You people will not be able to stay. So, it is as if the noose will hang around your neck. Noose every moment. But who will get? Those who remember nicely. This cut (rust) will continue to be removed through remembrance. There is a rust of vices in the soul since many births, isn’t it? So, this rust, through the colour of company of the Father, when you remember the Father through mind and intellect, then the colour of company will be applied, the rust will be removed. Look, this rust is removed so late. It takes time, doesn’t it? You people report so much that Baba this is a target. You face a lot of storms in this target. There is no topic of facing storms in knowledge. A lot of storms emerge only in this remembrance. Baba, arey, we fall so much. As regards the rust, we get covered by so much rust that despite becoming clean we get covered by so much rust again. Then the entire rust becomes as it was earlier.

So, those who were satopradhan become completely tamopradhan. And the Father has told. What? That this lust is the biggest enemy. Hm? It is because even if just a desire emerges in the mind this biggest enemy hugs you. If it comes in words, comes in vision, then one falls down further. And then if you fall in actions through the organs of action then there is no enemy bigger than this one at all. So, that is the one who applies the biggest rust. Who? This vice of lust. Hm? Your account becomes completely nil. Only then do you keep on calling – O purifier of the sinful ones! Well, there is no question of calling on the path of Bhakti. Whom will you call there? You don’t know at all. Do you recognize? Here you recognize numberwise, so, so then you call – O purifier of the sinful ones (patit-paavan). Hm? That is it; all your cries are directed towards the purifier of the sinful ones. Hm? First towards whom? Hm? First towards the sinful one (patit) or the pure one (paavan)? For whom do you cry? O purifier of the sinful ones! Hm? Who comes to your intellect first?
(Someone said something.) Yes, the sinful one comes to the intellect first.

So, it was told – All your cries are addressed to the sinful one, aren’t they? You shout upon the sinful one. There is no topic of anger at all. Just come and make the sinful one pure. So, the main topic is sinful. And the Father also says. Why was ‘also’ added? Hm? Why was ‘also’ added? Arey, the Father is ever pure, isn’t He? So, ‘also’, He added ‘also’ for Himself. When compared to whom? He added ‘also’ for Himself when compared to the sinful one. The Father also says – Children, this lust is the biggest enemy. Children, you will become conqueror of the world by conquering this [lust]. Hm? Is it not? You will conquer the entire world. Hm? He speaks only of one, doesn’t He?

Achcha, it has been written in some scriptures that Draupadi also called [God], didn’t she? There are many Draupadis among you children, aren’t there? Hm? When the Dushasans and Duryodhans chase you, then you call. So, such Draupadis are not a few. Are they very few? There are numerous bandhelis (women in bondage) who call. Baba, this one disrobes me. He does like this that he disrobes me in front of others. He keeps on molesting me. So, they are not Draupadis, are they? Are they or aren’t they? They are Draupadis, aren’t they? They are. So, poor women cry. They suffer beatings, they cry aloud. So, Baba says that you have suffered Kalpa ago as well, haven’t you? It is not as if there was one Draupadi Kalpa ago. Hm? And God Krishna sat and gave her sarees like this. He continued to give one saree after the other. For example, they show in the drama. No. All these incognito topics happen here. And you have to tolerate this. Arey, they have made a drama of Draupadi, Dushasan, Duryodhan.

Seventh page of the morning class dated 17.11.1967. So, this is a drama. Did you understand? And that is your drama of this time. So, look, this is your drama of the present time. The drama of disrobing Draupadi. The drama of disrobing. The drama of disrobing in front of a packed court. Even if one sees, he will tell others. So, she was disrobed in front of the entire court, wasn’t it? Look, it is shown to you just now. This is a topic of this Confluence Age. It is not a topic of the Golden Age, Silver Age at all. But it has started; so, when the end has come, then tortures have taken place against the weaker sex. Then look, now they show that brother, this, this drama has started just now. Were there such dramas earlier? You daughters know that rightly these daughters are in large numbers. And there are going to be numerous Draupadis. And in future many more will call. Even now they call, don’t they? They suffer beatings; they call a lot. So, you children do not know completely, do you? Baba gets all the news. Hm? So, Baba gets to know all the news. How they indulge in lust. How poor ladies get disrobed. So, it is not like Draupadi, like the weaker sex. No.

There are many such ladies who get disrobed very happily. It is because lust is the biggest enemy, isn’t it? That is it; even if the criminal eye gets connected with each other a little and if she sees anyone, hm, or if she sees a handsome man alone, if she sees his bunglow and if she finds that he is a good one, then they do not hesitate to eat this dirt [of lust]. Look, there is so much dirt in this world. Arey, you see. You even see and you also listen. While walking on a road, while walking, while getting down from the motor (vehicle), they perform this dirt. And they get into the motor and run away. Well, you keep on listening (reading) to such topics in the newspapers also. But there are numerous newspapers in India. And all the newspapers. All the newspapers; It is not published in just one newspaper. No, no. All the newspapers which exist in whichever state; India is very big, isn’t it? You understand children that rightly you have become tamopradhan. This lust is an enemy.

At this time these five vices are in very full force. In which time? Hm? When the Father comes then they go on getting in more force. As per law, as per the drama plan, it is certain; they are in force, aren’t they? The Father comes at this time. And He comes and says that now look, you become pure. The entire topic depends on your willingness. Now, when you become completely sinful, only then does the Father come, doesn’t He? Hm? So, now do you have to become further sinful? So, look, the Father has to come in such difficulties. And He has to work so tactfully. And everything is completely incognito. Your name itself is incognito, gupt. Nobody can know that this one is celibate (brahmachaari) or something else.

These badges also which you have been made to wear now, haven’t you? You have been made to wear just now. It is about which time? Earlier they were ordered to be made with plastic. Hm? Like round coins. Yes. Lamination on both sides and the picture was inserted in between. Lakshmi-Narayan on one side and Trimurti on the other side. Or the picture of Shri Krishna on one side. So, now you have been made to wear this. It means which time? Hm? When were you made to wear these badges? You were made to wear in 66-67. Yes. You were made to wear for explaining. Hm? That brother you should not suffer heart fail. Do not become those who die just by touching. Hm. If you keep on seeing the badge every moment, then it will come to the mind. Otherwise, you immediately become those who die on touching. Yes. Many children write, Baba, arey, Baba what should we do? This is a big difficulty. I am suffering from a very big disease, etc. Arey, the disease is yours. Arey, it is your karmic suffering of many births. Have I suffered the punishments for actions (karam Bhog)? ‘I’ refers to whom? Yes, has the Supreme Soul Shiv suffered karam Bhog? It is your disease. And that too you carry a lot of burden of many births on your head. So, you do not know. You do not know at all.

Look, even now people keep on indulging in criminal eye. Hm? ‘Now’ means in 66-67. And in future will it increase further or will it decrease? Hm? It will increase further, yes, until Ravan perishes completely, until the kingdom of Ravan perishes completely this Ravan and Ravan’s helpers Meghnad, Kumbhakaran will keep on increasing; why are big pictures prepared? They keep on making bigger pictures every year. What is the reason? It is a memorial of which place? Arey, it is a memorial of the Confluence Age here that when the Father comes in the Confluence Age then these vices keep on increasing, keep on increasing, don’t they?

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2840, दिनांक 04.04.2019
VCD 2840, dated 04.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2840-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.58
Time- 00.01-20.58


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967. शुक्रवार को नौवें पेज पर तीसरी, चौथी लाइन में बात चल रही थी बाबा ने पूछा - क्या तुम बच्चों को याद रहता है कि हम पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मण हैं? हम कोई कलियुगी थोड़े ही हैं। अगर ये भी बैठ करके याद करें तो भी खुशी का पारा बहुत चढ़े। परंतु नहीं ये भूल जाते हैं बिल्कुल क्योंकि बुद्धि बाहर की दुनिया में चली जाती है, कलयुगी दुनिया में चली जाती है। जो कलियुग में रहे पड़े हैं उनके संगदोष में चली जाती है। तो संग दोष तो होता है ना बच्चे। एक होता है ज्ञानेंद्रियों का संग दोष। और एक होता है स्थूल कर्मेंद्रियों का संग दोष। और एक होता है मन-बुद्धि का संगदोष। तो ज्यादा पावरफुल कौन सा है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, जो ज्यादा असर डालता है वो है मन-बुद्धि का संगदोष। तो संग तो है ही, हँ, ब्राह्मणों का भी या तो कलियुगी दुनिया वालों के साथ। या तो, हां, पुरुषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मणों की दुनिया वालों के साथ। और जो संग बताया वो नंबरवार सभी का संग है। कैसा संग? मन-बुद्धि का तो रहता ही है। लेकिन हां, ज्ञानेंद्रियों का भी संग प्रैक्टिकल में रहता है। और कोई-कोई का तो फिर कर्म इंद्रियों का भी प्रैक्टिकल में संग रह जाता है।

तो बताया पाप कर्म ज्यादा कब चढ़ता है? हँ? कौन से संग?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, कर्मेंद्रियों का संग कर लिया तो पाप बहुत चढ़ जाता है। जैसे कि 5 मार से नीचे गिरते हैं। तो संगदोष तो है ही ना यहां ब्राह्मणों की दुनिया में भी। तो देखो उसी का उसी समय में वहीं संग तारे और वहीं संग बोरे। क्या? क्या बताया? उसी समय में। हां, समय वो ही है ब्राह्मणों में। संगदोष का टाइम है। एक सेकंड में बुद्धि कहां से कहां भाग जाती है? उसी समय में ये शूटिंग होती जाती है। संग तारे; हां, पुरुषोत्तम संगम युगी ब्राह्मणों की दुनिया में और जो श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुरुषार्थी हैं नंबरवार तो है ना। तो उनके संग में आते हैं मन-बुद्धि से, ज्ञानेंद्रियों से, कर्म इंद्रियों से, तो वो एक ही समय में क्या कहेंगे? संग तारे या बोरे? संग तारे। और उसी एक सेकंड में बुद्धि भाग जाती है। मन भाग जाता है। हँ? और ज्ञान इंद्रियों को भी कभी-कभी भगाए ले जाता है। कर्मेंद्रियों में भी संगदोष हो जाता है। तो वहीं संग तारे और वहीं संग बोरे, उसी समय में, एक ही टाइम में। देखो, वो ही संग लग जाएगा। क्या? हां, झट वो संग में चला जाएगा। वहीं संग लगेगा, हँ, वहीं, स्थान भी एक ही, स्थान भी, समय भी एक ही। और वहां भी संग लगेगा और इस तरफ में भी चलेगा। इस तरफ माने किस तरफ? ब्राह्मणों की पुरुषोत्तम संगमयुगी दुनिया में। और एक ही सेकंड में आएगा और एक ही सेकंड में चला जाएगा। आएगा, फिर चला जाएगा। फिर आएगा, फिर चला जाएगा।

तभी तो बाबा कहते हैं ना देखो, कितने होते हैं ब्राह्मण जो हमको फारकती दे देते हैं। क्या? ऐसे आना-जाना बार-बार करते रहते हैं तो अंजाम क्या होता है? फिर फारकती दे देते हैं। छोड़ के चले जाते हैं। भाग जाते हैं। कितनी माताएं होती हैं। कितनों ने डाइवोर्स दिया होगा। पहले तो मन-बुद्धि में ये पक्का करके आते हैं, निश्चय पत्र लिख कर के देते हैं कि तुम्हीं हो माता, तुम्हीं हो, तुम्हीं हो बंधु च सखा तुम्हीं हो। जैसे भक्ति मार्ग में बोलते हैं हे प्रभु, जब आप आवेंगे तो हम आपके ही बनके रहेंगे। और कोई संबंध से कोई के नहीं बनके रहेंगे। तो देखो अभी यहां ब्राह्मणों की दुनिया में हिस्ट्री देखो कितनों ने डाइवोर्स दिया होगा। तुमको हम लिस्ट बतावें ना। हम सबके फोटो लेते जा रहे हैं, लेते जावेंगे। और यहां पर एक चित्रशाला बना के रख देंगे डेट वाइज। हां, उनके स्थान वाइज। कहां-कहां के हैं। इतना-इतना चित्र हैं। देखो। किनके? जिन्होंने ये निश्चय किया। क्या? कि तुम्हीं हमारे सब कुछ हो। हँ? सब कुछ हो माने? तुम्हीं मेरे पिता हो, तुम्हीं मेरे बंधु हो, तुम्हीं मेरे पति हो, सब संबंध तुम्हारे से हैं।

फिर देखो इनके चित्र लटके हुए हैं। ढेर के ढेर चित्र हैं जो डायवोर्स दे कर के; क्या? चले गए। समझा ना? सो भी इतने चित्र हो जावेंगे कि ये दीवालें भी छिप जावेगी। क्या? इतने फोटो इन दीवालों में लग जावेंगे कि दीवालें भी नहीं दिखाई पड़ेगी। चित्र ही चित्र डाइवोर्स देने वालों के दिखाई पड़ेंगे। या तो फारकती देने वालों के दिखाई पड़ेंगे। मर जावें। तो हम तुमको दिखलावें कि तुम आधा भी नहीं देखेंगे। क्या? वो सारे चित्र। (बाबा हंसे।) आधे में ही तुम्हारा पेट भर जाएगा। (बाबा हंसे।) हां, चौथा भी नहीं देख सकेंगे। जितने चित्र टांगेंगे भागने वालों के, डाइवोर्स देने वालों के, हँ, और फारकती देने वालों के, तो तुम आधे भी नहीं देखेंगे, चौथे भी नहीं देखेंगे। हँ? ये, ये इतने भागंती हो गए। पता नहीं कहां के थे और कहां चले गए। अब उनके एड्रेस ढूंढो तो पता नहीं कहां के कहां चले गए होंगे। है ना। कितना फोटो हम लेकरके कितना लेंगे। और कितने दीवालों पर चिपकाएंगे? हमको तो रोज बैठकर के चित्र देखना। अरे ये, ये इतना आता था। कैसी-कैसी बातें बनाता था। बहुत प्यार दिखाता था। आज है ही नहीं। अरे फिर चला गया। समाचार आया। अरे, वो तो जाके शादी कर लिया। हां। या बिना शादी के ही गटर में गिर गया। समाचार आया। चलो निकालो उसका चित्र, फोटो निकालो। फेंको, यहां बाहर फेंको। अंदर नहीं लगाएंगे। बाहर लगाओ बाहर। हां, बाहर में फेंको बाहर में। हां।

तो भी देखो कितनी मेहनत करनी पड़े, हँ, उन चित्रों को बाहर फेंकने के लिए। हां। हां, ढेर के ढेर हैं। तो कहते हैं ये सब फालतू हो गए। फालतू हो गए या काम के हुए? हँ? फालतू हो गए। इतना चित्र निकालें, हँ, इतने फोटो उतारें, हँ, और ये करें और ये ढेर सारी पंचायत। ज्ञानामृत पत्रिका में कितने फोटो निकाले होंगे। निकाले ना। और बड़े-बड़े प्रोग्राम किए। अखबार वालों ने कितने डाले होंगे। बड़ी पंचायत। ये भी इनकी यादगारी कौन रखेगा? इतनी ढेर सारी। इतने चित्र निकालें और उतारें। और ये करें। ये पंचायत। हँ? हम अपने बाप को याद करें या इन डायवोर्स देने वालों को, फारकती देने वालों को याद करें? इनके फोटो देखेंगे तो ये याद आएंगे कि नहीं? हँ? हाँ। इन चित्रों को बैठकरके नीचे रखो। क्या? हाँ। और ऊपर फेंकें। नहीं, नहीं। नहीं तो तुमको दिखलावें कि ये देखो वंडरफुल बात है।

बहुत आते हैं और बहुत फारकती दे देते हैं। हँ? कोई फारकती भी देते, कोई डाइवोर्स भी देते। फारकती कौन देते हैं? डाइवोर्स वो देते हैं जिन्होंने ये पक्का निश्चय कर लिया कि हम तो एक शिव बाबा के साथ पति-पत्नी का संबंध बुद्धि में धारण करेंगे और कोई के साथ न इंद्रियों से, न ज्ञानेंद्रियों से, न कर्मेंद्रियों से संबंध जोड़ेंगे। तो वे डायवोर्स देके चले जाते। और जो बच्चे बनते हैं; बच्चे भी तो होते हैं ना। बच्चियां होती हैं ना। तो वो फिर ऐसी भी हैं जो पति का संबंध तो नहीं जोड़ा, मनसा में भी नहीं, कर्मेंद्रियों से भी प्रैक्टिकल नहीं, ज्ञानेंद्रियों से भी नहीं। हां, क्योंकि जो ज्ञानेंद्रियां हैं उनका लगाव कहीं और लगा रहता है। कर्मेंद्रियों का लगाव भी कहीं ना कहीं और लगा रहता है तो वो डाइवोर्स देके चले जाते हैं, वो फारकती देके चले जाते हैं। भई, ये माइयां भी डायवोर्स दे देती हैं। हां। और ये ढेर बच्चे हैं जो फारकती दे देते हैं। क्या फारकती दे देते हैं? कि हम तुम्हारे बच्चे नहीं और तुम हमारे बाप नहीं। फारकती माना? किस को फारकती दी जाती है? बाप को फारकती दी जाती है, मां-बाप को। तो बच्चे जो हैं हमेशा फारकती देते हैं। हँ? और वो कन्याएं-माताएं जिन्होंने अपने अंदर पक्का धारण कर लिया कि अब तो हम इस जीवन में और किसी का वरण नहीं करेंगी तो वो डाइवोर्स देती हैं। तो देखो ये ऐसे-ऐसे अक्षर होते हैं ना। डाइवोर्स या फारकती।

तो यहां तो बहुत ही हैं। ढेर के ढेर। समझा ना? यहां आयकरके, हँ, मिल करके, कोई बाप के रूप में कोई गोद में बैठते हैं पति के रूप में मिलते हैं बच्चे के रूप में मिलते हैं। मिलकर के, यहां गोद में बैठ करके, अच्छी तरह से समझ करके प्रैक्टिकल में और मनसा से भी फिर फारकती, फिर डाइवोर्स दे देते हैं। बहुत बच्ची। अरे, बात मत पूछो। अरे, वो बात तो शुरु से लेकरके चलती चली आई है। कब से? शुरू से माने कबसे? अरे, कुछ याद है? कब शुरु? अरे? वो ही भूल गए।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, ओम मंडली से, सन 36-37 से, जबसे ये ईश्वरीय सत्संग शुरू हुआ, प्रैक्टिकल में ईश्वरीय संबंध, ईश्वरीय सत्संग। वो तो दुनिया में कहते हैं हम सत्संग में जाते हैं। वहां कोई प्रैक्टिकल में ईश्वर थोड़े ही बैठा है। यहां तो ईश्वर बाप खुद कहते हैं कि मैं मुकर्रर रथ में आकरके शुरू से लेकरके अब तक पार्ट बजाय रहा हूं। शुरू में जो आए वो भाग गए। ओम मंडली वाले सारे भाग गए कि नहीं? कि कोई बचे? सारे भाग गए। एकदम भट्टी में पड़े। अरे, उनमें से भी कितनों ने डाइवोर्स दे दिया देखो। जो आए थे ओम मंडली में शुरू से लेकर डायवोर्स और, और ये, ये क्या फारकती चली आ रही है। और चली ही आती है अंत तक भी। हँ? और चली आती रहेगी। क्या? कि बंद हो जाएगी? हँ? चली आती है और चली आती रहेगी।

नहीं तो बाप। कौन सा बाप? हँ? कौनसा बाप? अरे, हद का बाप; 84 जन्मों में हद के बाप हुए ना। नहीं? हाँ। और जो धर्मपिताएं हैं वो भी हद के कहेंगे कि बेहद के? 500-700 करोड़ के कहेंगे? कहेंगे? नहीं। वो भी तो हद के हुए ना। तो बेहद का बाप; कौन? कौन बेहद का बाप? हां, दो बेहद के बाप हैं। एक साकार मनुष्य सृष्टि का बेहद का बाप, साकार मनुष्यों का बाप, सारी 500-700 करोड़ प्रजा का पिता। पिता तो बाप ही हुआ ना। और जिसे मुसलमान कहते हैं आदम, अंग्रेज लोग कहते हैं एडम, हँ, हिंदू लोग कहते हैं; क्या? जगत पिता। जगतम पितरम वंदे पार्वती परमेश्वरौ। और जैनी लोग कहते हैं आदिनाथ, आदि पिता, ऋषभदेव। तो देखो वो दो हुए। आत्मिक रूप में देखेंगे कि दो। और देह के रूप में देखेंगे तो एक। दैहिक। माना जो निराकार बाप है निराकार आत्माओं का वो मुकर्रर रूप से किसी देह में प्रवेश करते हैं। तो वो भी बेहद का बाप ही हुआ ना। साकार हुआ या निराकार? कहेंगे साकार ही है। तो बेहद का बाप उनसे हम वर्सा लेते हैं।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third, fourth lineon the ninth page on Friday was – Baba asked – Do you children remember that we are Purushottam Sangamyugi Brahmins? We are not Kaliyugi (Iron-Aged). Even if we sit and remember this, then the mercury of joy will rise a lot. But no, you forget this because the intellect goes completely into the outside world, into the Iron-Age world. It goes under the ‘bad influence of the company’ (sangdosh) of those living in the Iron Age. So, there is definitely bad effect of company, isn’t it children? One is the bad effect of company of the sense organs. And one is the bad effect of company of the physical organs. And one is the bad effect of company of the mind and intellect. So, which is more powerful? Hm?
(Someone said something.) Yes, that which affects more is the bad effect of the company of the mind and intellect. So, the company is definitely there. Either with the Brahmins or with the people of the Iron Age world. Or, yes, with those from the world of Purushottam Sangamyugi Brahmins. And the company that was described is numberwise everyone’s company. What kind of company? That of mind and intellect definitely remains. But yes, there is the company of the sense organs also in practical. And in case of some there is company of the organs of action in practical.

So, it was told that when do sinful actions increase? Hm? Through which company?
(Someone said something.) Yes, if you keep the company of the organs of action, then you accumulate more sins. It is as if you fall from the fifth storey. So, there is indeed the bad effect of company here in the world of Brahmins also, isn’t it? So, look, in the same time the same company takes you across and the same company causes your downfall. What? What has been told? In the same time. Yes, it is the same time among the Brahmins. It is the time of bad effect of company. The intellect runs from one place to another place in a second. This shooting keeps on taking place in the same time. The good company takes you across; Yes, in the world of Purushottam Sangamyugi Brahmins and the righteous purusharthis are numberwise, aren’t they? So, when you come in their company through mind and intellect, through the sense organs, through the organs of action, then what will it be said in that same time? Does company take you across or does it cause downfall? Company takes you across. And in the same one second the intellect runs away. The mind runs away. Hm? And sometimes it takes in its stride the sense organs also. There is bad effect of company among the organs of action also. So, the same company takes you across and the same company causes downfall, in the same place, in the same time. Look, the same company will have effect. What? Yes, he will go into the company immediately. The company will take place there itself; the place is also the same; the place and the time is also the same. And you will have company there as well as on this side. On this side refers to which side? In the Purushottam Sangamyugi world of Brahmins. And in the same second it will come and in the same second it will go. It will come and then go. It will come again and go again.

That is why Baba says, doesn’t He that look, there are so many Brahmins who give Me faarkati (divorce between Father and son). What? If they keep on coming and going like this again and again, then what is the result? Then they give faarkati. They leave and go. They run away. There are so many mothers. Many must have given divorce. First they come with a firm mind and intellect, they give letter of faith that you alone are my mother, you alone are, you alone are my relative and you alone are my friend. For example, people say on the path of Bhakti – O God, when you come, I will remain only Yours. I will not remain with anyone else in any other relationship. So, look, now here in the world of Brahmins look at the history that how many must have given divorce. Let me give you the list, should I? We continue to click everyone’s photos, we will go on clicking. And here we will build a picture-house (chitrashala) date-wise. Yes, their place-wise. To which all places they belong. There are so many pictures. Look. Whose? Those who developed this faith. What? That you alone are my everything. Hm? What is meant by being everything? You alone are my Father, you alone are my relative, you alone are my husband; I have all the relationships with You.

Then look, their pictures are hanging. There are numerous pictures of those who gave divorce and; what? They went away. Did you understand? That too there will be so many pictures that these walls will be hidden (covered). What? So many photos will be affixed on these walls that the walls too will not be visible. Only the pictures of those who give divorce will be visible. Either the pictures of those who give faarkati will be visible. They may die. So, let Me show you; you will not be able to see even half of them. What? All those pictures. (Baba laughed.) Your stomach will be full just with half. (Baba laughed.) Yes, you will not be able to see even one-fourth. The number of pictures of those who run away, those who give divorce and faarkati that will be hung, you will not be able to see even half, you will not be able to see even one fourth. Hm? These, these many ran away. Who knows to which places they belonged and to which places they went. Now if you search their address then who knows where they must have gone. Is it not? How many photos should we click? And how far will we stick on the walls? We have to sit and see every day. Arey, this one used to come so many times. He used to speak in such and such ways. He used to show so much love. He is not present today. Arey, he went away. His news was received. Arey, he went and got married. Yes. Or he fell into the gutter even without getting married. His news was received. Come on; bring out his picture, his photo. Throw it; throw it out here. It will not be affixed inside. Paste it outside, outside. Yes, throw it outside, outside. Yes.

However, look, you have to work so hard to throw those pictures out. Yes. Yes, there are numerous. So, it is said that all these have become a waste. Are they wasteful or useful? Hm? They have become wasteful. You click so many pictures, you print so many photos and you do this and these numerous Panchayats (public debates). So many photos must have been published in the Gyanamrit magazine. They were published, weren’t they? And big programmeswere organized. The newspaper persons must have published so many. It is a big Panchayat (public debate). Who will keep their records? So many of them. We have to click so many pictures and print. And do this. This Panchayat. Hm? Should we remember our Father or should we remember those who give divorce, give faarkati? If you see their photos, will they come to your mind or not? Hm? Yes. Sit and keep these pictures down. What? Yes. And throw them up. No, no. Otherwise, we can show you that this is a wonderful topic.

Many come and many give faarkati. Hm? Some give faarkati also, some give divorce also. Who gives faarkati? Those people who have developed firm faith that we will inculcate the relationship of husband and wife with one ShivBaba and will not establish relationship with anyone else through organs, either sense organs or the organs of action, give divorce. So, they give divorce and go away. And those who become children; There are children as well, aren’t there? There are daughters, aren’t there? So, they too are such that they may not have established the relationship of a husband; not even in the mind, not even in practical through the organs of action, not even through the sense organs. Yes, because the attachment of the sense organs is somewhere else. The attachment of the organs of action is also somewhere else; so they give divorce and go; and they give faarkati and go. Brother, these ladies also give divorce. Yes. And these numerous children give faarkati. What faarkati do they give? That we are not your children and you are not our Father. What is meant by faarkati? Who is given faarkati? Faarkati is given to the Father, to the parents. So, children always give faarkati. Hm? And those virgins and mothers who have inculcated firmly in their mind that now we will not marry anyone else in this life, give divorce. So, look, there are such words, aren’t there? Divorce or faarkati.

So, there are many here. Numerous. Did you understand? After coming here, hm, after meeting, some sit in the lap in the form of a Father, some meet in the form of a husband, some meet in the form of child. After meeting, after sitting here in the lap, after understanding nicely in practical and then they give faarkati, divorce through the mind as well. Many, daughter. Arey, just don’t ask. Arey, that topic has been continuing from the beginning itself. Since when? ‘From the beginning’ means from which time? Arey, do you remember anything? When did it start? Arey? You forgot that itself.
(Someone said something.) Yes, from Om Mandali, from 36-37, ever since this Godly Satsang (spiritual gathering) started; Godly relationship, Godly satsang in practical. They say in the world that we go to satsangs. Is God sitting there in practical? Here God, the Father Himself says that I come in a permanent Chariot and am playing a part from the beginning till now. Those who came in the beginning ran away. Did all those who belonged to the Om Mandali run away or not? Or were anyone left? All ran away. They joined the bhatti suddenly. Arey, even among them, look, so many gave divorce. Those who had come in the Om Mandali started giving divorce from the beginning and, and this, this faarkati has been going on. And it continues even till the end. Hm? And it will continue. What? Or will it stop? Hm? It continues and it will continue.

Otherwise, Father. Which Father? Hm? Which Father? Arey, the limited Father; there have been fathers in 84 births, haven’t they been? No? Yes. And the founders of religions, will they also be called limited or unlimited? Will they be said to be of 500-700 crores? Will they be called? No. They too are limited, aren’t they? So, the unlimited Father; who? Who is the unlimited Father? Yes, there are two unlimited Fathers. One is the corporeal unlimited Father of the human world, the Father of the corporeal human beings, the Father of all the 500-700 crore subjects. The Father is a Father, isn’t he? And the one whom the Muslims call Aadam, Englishmen call Adam, Hindus call; what? Jagat Pita (Father of the world). Jagatam pitaram vandey paarvati parmeshawarau (I bow to Parvati and Parmeshwar, the ancestors of the world). And Jains call Aadinath, Aadi Pitaa (first Father), Rishabhdev. So, look, they are two. If you view in soul form they are two. And if you view in physical form they are one. Physical. It means the incorporeal Father of the incorporeal souls enters in a body in a permanent form. So, He too is an unlimited Father, isn’t He? Is He corporeal or incorporeal? It will be said that He is corporeal only. So, we obtain inheritance from the unlimited Father.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2841, दिनांक 05.04.2019
VCD 2841, dated 05.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2841-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.20
Time- 00.01-13.20


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967 शुक्रवार को 10वें पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - भक्ति मार्ग का एक भी चित्र करेक्ट नहीं है। और बाबा जो चित्र बनवाते हैं वो सारे ही करेक्ट, जो भी साक्षात्कार से तैयार कराए। देखो, ये लक्ष्मी-नारायण हैं। किसको भी पता नहीं है कि लक्ष्मी-नारायण कौन हैं? हँ? किसको पता है? हँ? ये आदि लक्ष्मी-नारायण हैं नर से डायरेक्ट बनने वाले नारायण हैं। नारी से डायरेक्ट लक्ष्मी बनने वाली लक्ष्मी है। बस, वो तो समझ लेते हैं लक्ष्मी-नारायण। 16 कला संपूर्ण। अरे? अच्छा, तो उनको ये भी पता नहीं है कि राधे कृष्ण कौन हैं? मंदिरों में पूजा करेंगे राधे-कृष्ण की। लेकिन जानते नहीं हैं कि ये राधे-कृष्ण कौन हैं? हँ? हां। किसको भी पता नहीं है कि राधे-कृष्ण कोई वो ही हैं। वो ही। जो लक्ष्मी नारायण हैं, हँ, आदि लक्ष्मी-नारायण।

आदि लक्ष्मी और आदि नारायण, ये नाम कहां होते हैं? नार्थ इंडिया में होते हैं? साउथ इंडिया में होते हैं? हां, साउथ इंडिया में होते हैं। तो वो बाप आता ही है जो साउथ इंडिया है ना वो भारत का विदेश है। तो बाप तो आते ही हैं विदेशी बनकर। क्या? जिस रथ में भी आते हैं परमानेंटली तो, हां, क्या पार्ट बजाते हैं? स्वदेशियों का कि विदेशियों का? विदेशी क्या करते हैं? विदेशी संसार का, जब से आते हैं, तब से विनाश करते हैं, गड्ढे में ले जाते हैं सारी दुनिया को तेजी से। हँ? और आखिर में क्या करते हैं? एटम बंब बनाकर खेल खलास कर देते हैं। और फिर टाइटल किसको मिलता है? हर-हर बम-बम। उनको मिलता है विदेशियों को? नहीं। टाइटल फिर भी बाप कहते हैं मैं जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता हूं उसको ही टाइटल मिलता है। क्या? हर-हर बम-बम क्योंकि वो जो बम बनाते हैं ना, बनाते-2 बनाय तो लेते हैं। और बहुत बनाय लेते हैं। लेकिन इतनी हिम्मत नहीं है, हवा निकल जाती है, अरे छोड़ें कि नहीं छोड़े? और शुरुआत में तो 20-20 मेगावाट की बम्बियां बनाईं सो छोड़ दीं हिम्मत करके। क्या पता बाप ने ही, बाप ने ही हिम्मत कराई होगी? हां। तो वो हिम्मत नहीं है जो इतना बड़ी जो एनर्जी तैयार की है दुनिया के विनाश के लिए कि कई दुनिया ऐसी खलास हो जाएं। हां, समझते हैं ना वो ग्रह-उपग्रह जो हैं ना, हां, उनमें भी दुनिया है, ऐसे समझते हैं। हाँ। तो वो वास्तव में जब वो एटम बंब इतने पावरफुल फटते हैं धड़ाधड़-3 तो ये ग्रह-उपग्रह सारे ही आपस में टूट-फूट के खलास हो जाते हैं। सिर्फ एक ही बचता है। कौन सा? कौन सा? बृहस्तपति। जो पतियों का पति कहा जाता है। बापों का बाप और पतियों का? पतियों का पति।

तो बताया ये राधे- कृष्ण वो ही हैं। कौन से? वो ही माने? कोई भी? जो आदि लक्ष्मी और आदि नारायण गाए जाते हैं। दक्षिण भारत में ज्यादा नाम है ना। खास करके आंध्रा प्रदेश में। क्यों? आंध्रा प्रदेश जो सागर के किनारे-किनारे है ना, हां, लंबा-लंबा फैला हुआ है, दक्षिण से लेकर के और पूरब तक, फैला हुआ है ना? हां। तो बताया कि वो तो भक्ति मार्ग की बातें हैं। स्थूल रूप में आंध्रा की बात हुई। कोई अंधरे हैं थोड़े ही। आंखें तो हैं ना। हां। बाकी बेहद की बात है। क्या? कि जो राधे है ना वो अंधे की औलाद अंधी है कि सोझरे की औलाद सोझरी है? क्या कहेंगे? औलाद किसकी है? अंधे की औलाद अंधे। अंधे माने? अज्ञान के? अज्ञान के अंधे। अज्ञान के अंधे? ज्ञान नहीं है? ज्ञान है कि नहीं है मैं आत्मा हूं? है? अच्छा? मैं आत्मा बिंदी हूं बस इतना ही। ये भी कहेंगे आत्मा क्या है? आत्मा एक रिकॉर्ड है, बैटरी है। ये जानते हैं। फिर ये नहीं बताएंगे ये किस कैटागरी की बैटरी है। कितनी पावर वाली बैटरी है। रिकॉर्ड है तो इसमें कितना पार्ट कैसा-कैसा पार्ट भरा हुआ है? हँ? कितने जन्मों का पार्ट भरा हुआ है और ऊंच ते ऊंच पार्ट है या नीचा पार्ट है, अव्वल नंबर है, दोयम नंबर, ये पता है? अंधे की औलाद अंधे। उन्हें कहां पता? हां।

तो दुनिया वालों को भी पता नहीं और जो दुनिया वालों की शूटिंग करने वाले हैं ब्राह्मणों की दुनिया में उनको? उनको पता है? उनको भी पता नहीं। हां, तो हैं वो ही। कौन? वो ही लक्ष्मी-नारायण जो नर से डायरेक्ट नारायण बनते हैं। बच्चा नहीं बनते। नारायण बाप। हां। और नारी से लक्ष्मी बनते हैं। लक्ष्मी बड़ी होती है कि छोटी? लक्ष्मी तो बड़ी होती है। और राधा-कृष्ण? राधा-कृष्ण की तो मंदिरों में यादगार है छोटा सा चित्र दिखाते हैं बच्चा, बचपने का। हां, तो फिर कैसा कहेंगे? हँ? ये भक्ति मार्ग के जो चित्र हैं वो करेक्ट हैं? कहेंगे करेक्ट? नहीं। और ये जो चित्र बनवाया साक्षात्कार से इसको करेक्ट कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) करेक्ट है? अच्छा? करेक्ट है? ओरिजिनल है? ओरिजिनल नहीं है तो फिर करेक्ट काहे का? ओरिजिनल हो तो करेक्ट। और नकली बनाके रख दिया कागज का, जैसे वो दुनिया में लक्ष्मी-नारायण के मंदिर बनाते हैं टाटा, वो क्या नाम, बिरला, बिरला। हां, तो वो काहे के बनाते हैं? पत्थर के बनाते हैं ना। भले संगमर्मर के पत्थर के बनाते हैं।

तो बताया कि दोनों वो लक्ष्मी-नारायण है ना वो सब के संग में रह-रहकर करके, मर-मरके जीते हैं। क्या? नारायण वाली आत्मा के लिए बाबा ने बताया ना। क्या? वो एक ही आत्मा दुनिया में ऐसी है जो सबके साथ निभाय लेती है। क्या? कोई ऐसी है जिसके साथ निभाती नहीं है? हां, सबके साथ निभाती है। तो कैसे निभाती है? संग में रह-रह करके, मर-मर के निभाती है या एकदम राजा बनकरके निभाती है?
(किसी ने कुछ कहा।) हां? राजा बनके निभाती है? लड्डू। अच्छा? राजा बनेगी तो सबको दंड देना शुरू कर देगी। दंड देती है? अरे किसी को दंड, तुम को दंड दिया? नहीं। हां, तो बताया कि ये करेक्ट नहीं है। चाहे शूटिंग वाले और चाहे बाहर की दुनिया के जो हैं वो। करेक्ट चित्र नहीं है। अच्छा, कोई बताए ये कब आए? हँ? तो वो भक्ति मार्ग वाले तो कहेंगे चाहे शूटिंग वाले भक्ति मार्ग वाले हों, चाहे बाहर की दुनिया वाले, वो क्या कहेंगे? जब बाबा ने साक्षात्कार कराया, तब ये चित्र आए। क्या कहेंगे? हँ? लेकिन ये तो नकली हैं। असली कब आए? पता है किसी को? किसी को मालूम नहीं है कब आए। वो भक्ति मार्ग वाले समझते हैं कि सतयुग के आदि में आए। लक्ष्मी-नारायण कब आए? हां, सतयुग आदि हुआ तो लक्ष्मी नारायण आए 16 कला संपूर्ण।

किसी को मालूम नहीं है कि ये कब राज्य करके गए हैं। हँ? ये। कौन से ये? हां, जो बताया आदि लक्ष्मी-नारायण जिन्होंने नई दुनिया की आदि, शुरुआत की। कब राज्य करके गए किसी को पता है? नहीं पता है। अब तुम बच्चों को तो नंबरवार तो पता है। क्या? कब राज्य करके गए? अरे, जब दुनिया का विनाश सामने खड़ा होता है तो ये सारी दुनिया के विश्व के मालिक बन करके गए। हँ? हां। बाद में फिर सतयुग शुरू होता है। ऐसे तो ये कहेंगे सत युग, सच्चा युग। तो संगम युग को भी सच्चा युग कहेंगे कि झूठा कहेंगे? हँ? सच्चे में सच्चा तो वो ही युग।

तो ये अभी तुमको मालूम पड़ा है। अरे ये तो 5000 वर्ष पहले की बात है। हँ? हाँ। क्या? ये जो आदि लक्ष्मी-नारायण हैं इनकी बात कब की है? 5000 वर्ष पहले की बात है। ये क्राइस्ट से 3000 साल पहले। माने क्राइस्ट को 2000 साल होने जा रहे हैं। हँ? और उससे भी 3000 साल पहले। 3000 साल के अंदर नहीं। 3000 साल पहले। तो टोटल कितने हुए? 5000 साल पहले। हां। अभी तो तुम बच्चों को बिल्कुल बुद्धि में बैठ जाना चाहिए। जैसे यहां बैठे हो ना। बस, यहां चुप करके बैठो। क्या? हँ? चुप करके क्यों बैठें? अरे, कुछ प्रश्न-व्रश्न पूछना हो तो ना पूछें? अरे, बाबा ने तो बताय दिया ना कि मैं सब कुछ बिना पूछे ही बताता हूं। हँ? कि तुम मांग करते हो तब बताता, देता हूं क्या? मैं तो ज्ञान रतन तुम्हें बिना पूछे ही जैसी तुम्हारी स्टेज बनती जाती है आत्मा की, मन-बुद्धि की, ऐसे-ऐसे टाइम पर तुम्हारी मन-बुद्धि की स्टेज के अनुसार मैं खुद सारा ज्ञान देता रहता हूं।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the 10th page on Friday was – Not even a single picture of the path of Bhakti is correct. And the pictures that Baba gets prepared are all correct which were prepared through visions. Look, these are Lakshmi and Narayan. Nobody knows as to who are Lakshmi and Narayan? Hm? Who knows? Hm? These are Aadi Lakshmi-Narayan, the Narayan who becomes Narayan direct from nar (man). Lakshmi is the one who becomes direct Lakshmi from naari (woman). That is it; they think it is Lakshmi-Narayan. Perfect in 16 celestial degrees. Arey? Achcha, so, they do not even know that who are Radhey and Krishna? They worship Radhey and Krishna in the temples. But they do not know that who are these Radhey and Krishna? Hm? Yes. Nobody knows that it is the same Radhey Krishna. The same. The ones who are Lakshmi-Narayan, hm, Aadi Lakshmi-Narayan.

Aadi Lakshmi and Aadi Narayan; where do these names exist? Do they exist in north India? Do they exist in south India? Yes, they exist in south India. So, that Father comes; the south India is India’s abroad. So, the Father comes as a foreigner (videshi). What? In whichever Chariot He comes permanently, yes, so, what part does He play? One of the swadeshis or videshis? What do the videshis do? Ever since the foreigners come, they cause the destruction of the world, they take the entire world into a pit at a fast pace. Hm? And what do they do in the end? They build atom bombs and destroy it. And then who gets the title? Har-har bam-bam. Do those foreigners get? No. However the Father says that the title is received only by the permanent Chariot in which I enter. What? Har-har, bam-bam because the bomb that they prepare, they do prepare it. And they prepare it in large quantities. But they do not have the courage, they lose the air (gas), arey, should we explode them or not? And in the beginning they prepared bombs of 20 megawatts each and they showed the courage of exploding them. Who knows the Father, the Father Himself must have given them the courage? Yes. So, they do not have the courage that such a big energy that they have prepared for the destruction of the world that many such worlds can perish. Yes, they think that there is a world even in those planets and satellites. Yes. So, actually, when those powerful atom bombs explode one after the other then all these planets and satellites perish by clashing with each other. Only one is saved. Which one? Which one? Saturn (Brihaspati). The one who is called highest among all the husbands (patiyon ka pati). Father of fathers and husband of? Highest among all the husbands.

So, it was told – These Radhey and Krishna are the same. Which ones? What is meant by ‘the same’? Is it anyone? The ones who are praised as Aadi (first) Lakshmi and Aadi Narayan. They are more famous in south India, aren’t they? Especially in Andhra Pradesh. Why? Andhra Pradesh which is spread along the ocean, isn’t it? Yes, it is spread in length from south to east; it is spread, isn’t it? Yes. So, it was told that those are the topics of the path of Bhakti. It is a topic of Andhra in a physical form. They are not andhrey (blind). They do have eyes, don’t they? Yes. But it is an unlimited topic. What? That is Radhey the blind child of the blind one or is she an eyed child of the eyed one? What would you say? Whose child is she? Blind children of the blind one. What is meant by blind? In ignorance? Blind by ignorance. Blind by ignorance? Don’t they have knowledge? Do they have the knowledge or not that I am a soul? Do they have? Achcha? I am a soul, a point; Just this much? It will also be said – What is a soul? The soul is a record, a battery. They know this. But they will not tell as to which category of battery is it? It is a battery with how much power? When it is a record, then how much part and what kind of a part is recorded in it? Hm? A part of how many births is recorded in it and is it a highest on high part or a low part, number one, number two? Do they know? They are blind children of the blind one. Do they know? Yes.

So, the people of the world also do not know and what about those who perform the shooting of the people of the world in the world of Brahmins? Do they know? They too do not know. Yes, they are the same ones. Who? The same Lakshmi-Narayan who become direct Narayan from nar (man). They do not become a child. Father Narayan. Yes. And they become Lakshmi from naari (woman). Is Lakshmi old or young? Lakshmi is old. And Radha & Krishna? There is a memorial of Radha and Krishna in the temples; small picture of the children, of their childhood is shown. Yes, so then what kind will it be called? Hm? Are these pictures of the path of Bhakti correct? Will they be called correct? No. And will this picture prepared through visions be called correct?
(Someone said something.) Is it correct? Achcha? Is it correct? Is it original? If it is not original, then how can it be correct? If it is original it will be correct. And if a duplicate one has been prepared on paper, just as they, the Tatas, or what do they call them, the Birlas build the temples of Lakshmi-Narayan in the world. Yes, so what do they build it with? They build it with stone, don’t they? Although they make it with marble.

So, it was told that both of those Lakshmi and Narayan live while dying while living in the company of everyone. What? Baba has told for the soul of Narayan, hasn’t He? What? His is the only soul in the world which maintains relationship with everyone. What? Is there anyone with whom it does not maintain relationship? Yes, it maintains with everyone. So, how does it maintain? Does it maintain while living, while dying in company or does it maintain completely as a king?
(Someone said something.) Yes? Does it maintain as a king? Laddu. Achcha? When it becomes a king it will start punishing everyone. Does it give punishment? Arey, did it punish anyone? Did it punish you? No. Yes, so it was told that this is not correct. Be it those who perform shooting and be it those who belong to the outside world. The pictures are not correct. Achcha, will anyone tell as to when did they arrive? Hm? So, those who belong to the path of Bhakti will tell, be it those who perform the shooting of the path of Bhakti or be it those who belong to the outside world, what would they say? These pictures arrived when Baba caused visions. What would they say? Hm? But these are duplicate. When did the original ones come? Does anyone know? Nobody knows as to when they came. Those who belong to the path of Bhakti think that they came in the beginning of the Golden Age. When did Lakshmi-Narayan come? Yes, when the Golden Age began, then Lakshmi-Narayan perfect in 16 celestial degrees came.

Nobody knows as to when these had ruled. Hm? These. Who these? Yes, it was told that Aadi Lakshmi-Narayan, who started the new world. Does anyone know as to when they ruled? They don’t know. Now you children know numberwise. What? When did they rule? Arey, when the destruction of the world is in front of you then these became the master of the entire world. Hm? Yes. Later the Golden Age begins. It will be said Sat yug, true Age. So, will the Confluence Age also be called a true Age or a false one? Hm? That Age itself is the truest of all.

So, now you have come to know of this. Arey, this is a topic of 5000 years ago. Hm? Yes. What? To which time does the topic of these Aadi Lakshmi-Narayan pertain? It is a topic of 5000 years ago. 3000 years before Christ. It means that it is going to be 2000 years since Christ. Hm? And 3000 years even before that. Not within 3000 years. 3000 years ago. So, how many years is it in total? 5000 years ago. Yes. Now it should sit completely in the intellect of you children. For example you are sitting here, aren’t you? That is it; sit quietly here. What? Hm? Why should we sit silently? Arey, shouldn’t we ask if we want to ask some questions? Arey, Baba has told that I reveal everything even if anyone doesn’t ask. Hm? Or do I reveal, give when you demand? I give you the gems of knowledge without your seeking them; as per the stage of the soul, of the mind and intellect that you go on developing, at such time I Myself keep on giving the entire knowledge as per the stage of your mind and intellect.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2842, दिनांक 06.04.2019
VCD 2842, dated 06.04.2019
प्रातः क्लास 17.11.1967
Morning class dated 17.11.1967
VCD-2842-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.21
Time- 00.01-15.21


प्रातः क्लास चल रहा था 17.11.1967. शुक्रवार को 11वें पेज की आदि में बात चल रही थी ये लक्ष्मी-नारायण का चित्र ले आओ। हँ? इसको देखो हम क्या बनने वाले हैं। बाबा हमको क्या बनाते हैं? बाबा बनाते हैं या हम खुद अपने पुरुषार्थ से बनते हैं? बनते तो अपने पुरुषार्थ से हैं। जैसा एम-आब्जेक्ट तो ये है ना मूल बात कि एम ऑब्जैक्ट क्या रखा है? लक्ष्य क्या है? क्योंकि जैसा लक्ष्य होता है वैसे ही लक्षण आते हैं ना। नहीं तो क्या एम-ऑब्जेक्ट रखावें? हँ? बाप तो चाहते हैं हर बच्चा ऊंच ते ऊंच पद पावे। तो ऊंचे ते ऊंची एम ऑब्जेक्ट रखी हुई है। लक्ष्मी-नारायण बनना है। कौन सा लक्ष्मी-नारायण? जो नाम ही है नारायण। होंगे तो नंबरवार ही। नार माने ज्ञान जल। अयन माने घर। जो ज्ञान जल के घर में रहते हों। माना मनन-चिंतन-मंथन में रहते हों।

तो अब एम-ऑब्जेक्ट देखना है कि हम कितना मनन-चिंतन-मंथन में रहें। मनन-चिंतन-मंथन भी काहे का? हँ? शास्त्रों की बातों का? नहीं। मनुष्यों की बातों का जो मनुष्य सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करते हैं उनका? नहीं। अरे, बाबा आकरके ब्रह्मा के तन में जो सुनाते हैं, समझाते हैं, उन बातों का मनन-चिंतन-मंथन करना। तो जरूर नर से नारायण की ये एम-ऑब्जेक्ट बुद्धि में आवेगी। क्या बनना है? नर से डायरेक्ट नारायण बनना है। ऐसे नहीं कि प्रिंस बनना है। हँ? क्या बनना है? प्रिंस बनना है या नारायण बनना है? हँ? नर से डायरेक्ट नारायण बनना है। और कोई एक ही बनेगा क्या नर से डायरेक्ट नारायण? और उसके फॉलो करने वाले नहीं होंगे? होंगे या नहीं होंगे? तो जो फॉलो करेंगे तो वो भी नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनेंगे इसी जन्म में या नहीं बनेंगे? भले नंबरवार बनेंगे। बनेंगे तो जरूर।

और फिर ये सत्यनारायण की कथा भी तुम सुनते रहते हो। हँ? बाबा सच्ची-सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनाते हैं। वो भक्तिमार्ग में तो झूठी कथाएं सुनाते रहते हैं। हँ? लीलावती, कलावती, लकड़हारा, लकड़बग्घा जाने क्या-क्या सुनाते रहते हैं। हँ? वो असली कथा थोड़े ही सुनाते हैं। नाम रख दिया है सत्यनारायण। अरे, काम के आधार पर नाम होता है ना। तो बाबा आकर के सच्ची-सच्ची सत्यनारायण की कथा सुनाते हैं। हां, कथा कब बनाई जाती है? कथा माने कहानी। क्यों कहानी बनाई गई? जरूर उन्होंने झूठ खंड के बीच में रहते हुए, झूठ आत्माओं के बीच में रहते हुए, हां, सच्चाई से आचरण किया, बात किया, तो सच्ची भाषण करके लोगों को मिर्च लगती है ना। हां, तो झगड़ा होता है। युद्ध होता है। वाचा का भी युद्ध होता है। मनसा का भी युद्ध होता है।

तो ये सत्यनारायण की कथा तुम सुनते रहते हो। कोई प्रजा की कथा थोड़े ही सुनते हो? हँ? प्रजा क्या, प्रजा जो है वो कोई राजयोग सीखती है क्या? नहीं। तुम बच्चे तो राजयोग सीखते हो राजा बनने के लिए। तो राजाओं को तो प्रजावर्ग में तो सब तरह की आत्माएं होती हैं। फोर्थ क्लास प्रजा भी होती है। थर्ड क्लास प्रजा की होती है। और वो तो बड़े दुष्ट होते हैं कोई-कोई चोर-चकार। उनको कंट्रोल करना पड़ता है ना। हां। और ऐसे तो थोड़े ही कि सतयुग त्रेता में ही राजा बनेंगे। द्वापर कलियुग में भी तो राजा बनेंगे ना। तो वहां चोरी-चकार नहीं होंगे? लुच्चे-लफंगे होंगे नहीं? गुंडे नहीं होंगे? उनसे टक्कर नहीं लेनी पड़ेगी? हां। तो शूटिंग कहां होती है? शूटिंग, रिहर्सल यहां होती है। तो बताया तो प्रजा की कथा तुम नहीं सुनते। तुम सुनते हो, हां, सत्यनारायण की कथा।

सीता राम की कथा भी सुनी है तुमने। हाँ। तो जानते हो कि जो अव्वल नंबर सीता, अव्वल नंबर राम, वो ही तो अव्वल नंबर सत्यनारायण बनते हैं। सत्य नारायण होगा तो सत्य नारायणी भी होगी। हँ? तो तुम लोगों ने सीता राम की कथा सुनी है ना। हां। कहते हैं नहीं। बस, हम तो सत्यनारायण की कथा ही सुनेंगे। अरे? क्यों भाई? सत्यनारायण की कथा सुनाइए। हँ? राम-सीता की कथा क्यों मना करते हो? कहते हैं राम-सीता तो फेल हो गए थे। अरे, सिर्फ राम-सीता ही फेल हुए? माया सिर्फ राम-सीता को ही फेल करती है? और कोई को फेल नहीं करती? माया किसी को छोड़ती है? हां। किसी को नहीं छोड़ती। हां, ये है किसी को पहले फेल कर देगी, तो किसी को बाद में पड़ीलेगी अच्छी तरह से। तो बताया जो पहले फेल हो जाएगा वो ज्यादा अनुभवी हुआ या जो बाद में फेल होगा वो ज्यादा अनुभवी हुआ? अनुभवी कौन हुआ? पहले फेल होने वाला ज्यादा अनुभवी हुआ ना।

तो बच्चे समझते नहीं हैं कि यज्ञ के आदि में जिनके लिए बताया कि वो राम-सीता वाली आत्माएं फेल हो गईं, तो फेल हो गई तो बाप ने क्या किया? भई तुम फेल हो गए तो तुम जाओ। ये लो धनुष और ये लो बाण। क्या? तुम हमारे पास जो भी वर्सा है ज्ञान बाणों का और जो भी तुमको सिखाते हैं, हँ, ये शरीर रूपी धनुष से कैसे-कैसे पुरुषार्थ करना है, इस शरीर रूपी धनुष को इतना लचीला बनाना है कि अच्छी तरह से बाण उसमें खिंचे और पूरे छोर मिल जाएं। हँ? तो तीखा बाण जाएगा ना। हां। तो बस उनको बाण दे देते हैं। और ऐसा धनुष देते हैं शरीर रूपी धनुष, जिस शरीर रूपी धनुष से वो अच्छी तरह से अगले जन्म में पुरुषार्थ करेंगे कि नहीं? करेंगे। और फिर तरकश भी दे देते हैं। तरकश क्या होता है? हँ? तरकश जो है वह पीठ में लटकाया जाता है माना बुद्धि। देखने में आती है क्या? देखने में तो नहीं। बुद्धि में वो ज्ञान बाण भरे रहते हैं। हां।

तो ये सत्यनारायण की कथा कोई ऐसे नहीं कहेंगे कि वह राम-सीता वाली आत्माएं नहीं थी। अरे, वो ही तो राम-सीता वाली आत्माएं फर्स्ट क्लास पार्ट बजाने वाली यज्ञ के आदि वाली थी। हां, जिनको ब्रह्माकुमार-कुमारी आज भी समझते हैं कोई पीयू था, हँ, पीयू की वाणी चलती थी। और वो मम्मा-बाबा को भी डायरेक्शन देते थे, ड्रिल कराते थे, योग कराते थे। तो आदि में ऊंचा पार्ट था ना। आदि में ऊंच थे, तो आदि में ऊंच, तो अंत में भी ऊंच ही पार्ट बजाएंगे ना। हां। तो ऐसे थोड़े ही समझना चाहिए कि घृणा कर दी की भई हम राम-सीता की कथा नहीं सुनेंगे। वो तो फेल हो गए। हम तो सत्यनारायण की कथा। अरे, वो फेल हो गए तो क्या ब्रह्माकुमारियों से पूछो, कुमारों से कि तुम्हारा ब्रह्मा बाबा क्या फेल नहीं हुआ? पास हो गया? हँ?

वो शरीर रूपी धनुष जो है वह पार गया विषय वैतरणी नदी के? अरे, धनुष कहो, चाप कहो, जहाज कहो, उसके लिए तो शास्त्रों में भी गायन है। कहते हैं शंकर चाप जहाज। जेहि चढ़ी उतरें पार नर। डूबी सकल संसार। तो वो शंकर वाली आत्मा कौन सी आत्मा है? कृष्ण की आत्मा तो ब्रह्मा का पार्ट बजाती है जो सतयुग में 16 कला संपूर्ण कृष्ण है। बजाती है ना। तो बताओ शंकर का पार्ट कौन सी आत्मा बजाती होगी? हँ? कहेंगे ना कि वो राम की आत्मा शंकर का पार्ट बजाती है। एक राइटियस और एक लेफ्ट में बैठा है। त्रिमूर्ति में चित्र देखा ना। एक है लूज। हँ? सब बातें मान लेता है। हाँ, बच्चे पूछते हैं बाबा घर में बहुत परेशानी है। दादी अम्मा और हमारी अम्मा और हमारे बप्पा बीमार पड़े रहते हैं, बुड्ढे हो गए हैं। और खाना-वाना बनाने में हमें भी तकलीफ होती है। शादी कर लें? हां, हां, बच्चे, बाबा तो कहते हैं कोई बच्चा ऐसा निकले जो पवित्र रहके दिखावे, शादी करके दिखावे और पवित्र रहे। तो बाबा परमिशन देते हैं। हां, करो, कर लो शादी। अरे, बाबा ने मुरली में क्या बोला और तुमने क्या डायरेक्शन दे दिया? क्या मुरली में बोला? शादी बर्बादी। पहले ही दिन ढेर हो पड़ेंगे। तो देखो ऐसे-ऐसे डायरेक्शन देते रहे।

तो बताया कि यज्ञ के आदि में जो आत्मा थी, हँ, राम सीता वाली आत्माएं वो ही पीयू वाली आत्मा। और बाबा भी कहते हैं राम बाप को कहा जाता है। अरे, बाप ही तो बीज होता है। बीज कहां से आता है? अम्मा के अंदर बीज होता है क्या? हँ? वो तो है ही नाम ब्रह्मा। ब्रह्मा माने बड़ी अम्मा। तो अब वो बड़ी अम्मा चाहे चार मुंह वाली हो और चाहे पांचवां मुंह वाली ब्रह्मा हो, पंचमुखी ब्रह्मा, ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा ब्रह्मा। लेकिन ऊर्ध्वमुखी ब्रह्मा भी होगा तो उसके अंदर बीज होता है क्या? कि बाप ही बीज होता है? बीज तो बाप में होता है। तो बताया कि ये जो ब्रह्मा है और जो सरस्वती है वो तो बाद में पार्ट बजाया ना। पहले पार्ट बजाया कंट्रोल करने का यज्ञ में या बाद में पार्ट बजाया, पश्चात में पार्ट बजाया ना। तो वो तो पश्चात्य सभ्यता की स्थापना करने वाले हो गए, जिन्होंने पहले बजाया पूरब में। पूरब माने पहले। सूरज कहां निकलता है? पूरब में निकलता है। तो जिन्होंने पूरब में पहले पार्ट बजाया वो श्रेष्ठ हो गए। वैसे भी देखो वो स्थूल सूरज है। सवेरे को निकलता है। तो ज्यादा फायदेमंद सवेरे का होता है कि दोपहर का होता है कि शाम का होता है सूरज की रोशनी लेना? सवेरे की रोशनी ज्यादा पावरफुल होती है ना। हां।

तो बस ऐसे नहीं समझना चाहिए कि हम सत्यनारायण की कथा सुनेंगे हम राम सीता की कथा नहीं सुनेंगे। हां, ये है कि राम-सीता वाली आत्माएं कलियुग के अंत में जाकरके तमोप्रधान बनती हैं तो उस समय बाबा ने बताया कि अपनी-अपनी कथा कहानी अपने-अपने शास्त्रों में लिख देते है। तो राम वाली आत्मा ने कलियुग में जाकरके तमोप्रधान युग में जो कथा लिखी है वो तो एक जैसे उपन्यास हो गया। क्या? असली बात उसमें से नहीं रहती है। तो बाकी ऐसे है कि नर से नारायण बनने की कथा और राम-सीता की कथा कोई अलग-अलग नहीं है। हां, ये है कि वो अव्वल नंबर नारायण है और कोई बाद वाले नारायण हैं। ये भी तो बताया है, मुरली में तो बाबा ने सब कुछ बताय दिया है, ये भी बताय दिया जो नारायण बनते हैं वो ही त्रेता में जाके क्या बनते हैं? राम सीता बनते हैं। जिस नंबर के नारायण बनेंगे उसी नंबर के राम-सीता बनेंग। तो जो अव्वल नंबर के राम-सीता हैं वो ही अव्वल नंबर के नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने वाले हैं। तो गलतफहमी जिन ब्रह्माकुमार-कुमारियों को हो जाती है तो वो अव्वल नंबर के चित्र ही बनाना बंद कर देते हैं। उन चित्रों को ही गुम कर देते, छुपाए देते, फाड़-फूड़ के फेंक देते, हँ, जलाए देते।। तो देखो गलतफहमी से कितना गड़बड़ हो जाता है।

A morning class dated 17.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the eleventh page on Friday was – Bring this picture of Lakshmi-Narayan. Hm? Look at this, what are we going to become. What does Baba make us? Does Baba make or do we become with our own purusharth? We do become with our own purusharth. This is the aim-object, isn’t it? The main topic is that what is the aim-object? What is the aim? It is because as is the aim, so are the characteristics that we develop, don’t we? Otherwise, what is the aim-object that we should set? Hm? The Father wants that every child should achieve the highest on high post. So, the highest on high aim-object has been set. We have to become Lakshmi-Narayan. Which Lakshmi-Narayan? The name itself is Narayan. They will be numberwise only. Naar means the water of knowledge. Ayan means home. Those who live in the house of water of knowledge. It means those who live in [the stage of] thinking and churning.

So, now the aim-object should be seen that how long we remain in thinking and churning. Thinking and churning also of what? Hm? Of the topics of scriptures? No. Of the topics of human beings, such human beings who believe in hearsay? No. Arey, you should think and churn about the topics that Baba comes and narrates, explains in the body of Brahma. Then this aim-object of becoming Narayan from nar (man) will come to the intellect. What do you have to become? You have to become direct Narayan from nar (man). It is not as if you have to become a prince. Hm? What do you have to become? Do you have to become a prince or Narayan? Hm? You have to become direct Narayan from nar (man). And will only one become direct Narayan from nar? Will there not be others who follow him? Will there be or will there not be? So, those who follow, then will they also become Narayan from nar and Lakshmi from naari (woman) in this birth itself or not? Although they will become numberwise. They will definitely become.

And then you also keep on listening to this story of Satyanarayana. Hm? Baba narrates the truest story of Satyanarayana. They keep on narrating false stories on the path of Bhakti. Hm? Leelavati, Kalavati, Lakadhara, Lakadbaggha; they keep on narrating so many things. Hm? They do not narrate the true story. They have named him Satyanarayan. Arey, the name is based on the task performed, isn’t it? So, Baba comes and narrates the truest story of Satyanarayana. Yes, when is the story (katha) formed? Katha means story. Why was the story formed? Definitely, yes, they acted, talked truthfully while living in the midst of false land, amidst false souls; so, when someone talks truthfully, people feel the pinch of chili powder, don’t they? Yes, so, a fight erupts. A war takes place. There is war of words as well. There is war of thoughts as well.

So, you keep on listening to this story of Satyanarayana. Do you listen to the story of subjects? Hm? Do the subjects (praja) learn rajyog? No. You children learn rajyog to become kings (raja). So, there are all kinds of souls among the subjects of kings. There is fourth class praja as well. There is third class praja as well. And some of the thieves are very wicked. They have to be brought under control, will they not have to be? Yes. And it is not as if you will become kings only in the Golden Age and Silver Age. You will become kings in the Copper Age and the Iron Age also, will you not? So, will there not be thieves there? Will there not be scoundrels and bums there? Will there not be goons? Will you not have to clash with them? Yes. So, where is the shooting performed? The shooting, the rehearsal takes place here. So, it was told that you don’t listen to the story of subjects. You listen to, yes, the story of Satyanarayana.

You have also heard the story of Sita-Ram. Yes. So, you know that the number one Sita, the number one Ram themselves become number one Satyanarayana. If there is Satyanarayana, then there will be Satyanarayani also. Hm? So, you people have heard the story of Sita-Ram as well, haven’t you? Yes. They say – No. That is it; we will listen to only the story of Satyanarayana. Arey? Why brother? Narrate the story of Satyanarayana. Hm? Why do you turn down the story of Ram-Sita? They say – Ram-Sita had failed. Arey, did just Ram and Sita fail? Does Maya make just Ram and Sita to fail? Does she not make anyone else fail? Does Maya leave anyone? Yes. She doesn’t leave anyone. Yes, it is true that she will make someone fail first and she will nicely trouble some people later on. So, it was told that is the one who failed initially more experienced or is the one who fails later more experienced? Who is experienced? The one who fails initially is more experienced, isn’t he?

So, children do not understand that the ones for whom in the beginning of the Yagyait was told that the souls of Ram and Sita failed; so, when they failed what did the Father do? Brother, you failed; so, you go. Take this bow and take this arrow. What? Whatever inheritance of the arrows of knowledge that I have and whatever I teach you, hm, how you should make purusharth through this body-like bow; you have to make this body-like bow so flexible that arrow can be fitted nicely and both the ends should meet. Hm? Then the arrow will be shot sharply, will it not be? Yes. So, that is it; He gives him the arrows. And He gives such a bow, the body-like bow, through that body-like bow will he make nice purusharth in the next birth or not? He will. And then He also gives the quiver (tarkash). What is a tarkash? Hm? Tarkash is hung on the back, i.e. intellect. Is it visible? It is not visible. Those arrows of knowledge are contained in the intellect. Yes.

So, as regards this story of Satyanarayana, it will not be said that those souls of Ram and Sita didn’t exist. Arey, it is the same souls of Ram and Sita who play first class part and who existed in the beginning of the Yagya. Yes, the Brahmakumar-kumaris think about them even today that there was a Piu, hm, Piu’s Vani used to be narrated. And they used to give directions even to Mama & Baba, they used to make them do drill, they used to make them do Yoga. So, they had a high part in the beginning, didn’t they? They were high in the beginning; so, when they were high in the beginning, then they will play a high part only in the end also, will they not? Yes. So, you shouldn’t think with hatred that brother, we will not listen to the story of Ram and Sita. They failed. We will listen to the story of Satyanarayana. Arey, they failed; so, you ask the Brahmakumaris, the Kumars that didn’t your Brahma Baba fail? Did he pass? Hm?

Did his body-like bow sail across the river of vices (Vishay-vaitarni nadi)? Arey, call it a bow, call it a boat, call it a ship, there are praises for him in the scriptures as well. It is said – Shankar-chaap jahaaj (Shankar-like ship). Jehi chadhi utraen paar nar (By boarding it men sail across). Doobi sakal sansaar (the entire world sinks). So, which soul is that soul of Shankar? The soul of Krishna plays the part of Brahma who is the Krishna perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age. It plays [the part], doesn’t it? So, tell, which soul plays the part of Shankar? Hm? It will be said that the soul of Ram plays the part of Shankar. One is righteous and one is sitting on the left [side]. You have seen the picture in Trimurti, haven’t you? One is loose. Hm? He accepts all the topics. Yes, children ask – Baba, there is a lot of trouble at home. My grandmother and my mother and my Father remain ill; they have grown old. And I too face difficulties in cooking. Should I get married? Yes, yes, child, Baba says that one such child should emerge who sets the example of leading a pure life; he should get married and lead a pure life. So, Baba gives permission. Yes, get married, get married. Arey, what did Baba say in the Murli and what is the direction that you gave? What has been said in the Murli? Marriage means ruination. You will fall on the first day itself. So, look, he (Brahma Baba) used to give such directions.

So, it was told that the soul in the beginning of the Yagya, hm, the souls of Ram & Sita, the same soul of Piu. And Baba also says that the Father is called Ram. Arey, the Father Himself is the seed. From where does the seed come? Does the seed exist within the mother? Hm? The name itself is Brahma. Brahma means the senior mother (bari amma). So, well, be it the four-headed senior mother or be it Brahma with the fifth head, the five-headed Brahma, the Brahma with his head facing upwards (oordhwamukhi). But even if it is the Oordhwamukhi Brahma, is the seed contained within him? Or is the Father himself the seed? The seed exists in the Father. So, it was told that this Brahma and Saraswati played their parts later on, didn’t they? Did they play the part of controlling in the beginning of the Yagya or did they play the part later on? They played the part later on, didn’t they? So, they are the ones who establish the Western Civilization, who played their parts initially in the East. East means before. Where does the Sun emerge? It emerges in the East. So, those who played their part first in the East are righteous. Even otherwise that is a physical Sun. It emerges in the morning. So, is it more beneficial to get sunlight in the morning or in the afternoon or in the evening? The morning light is more powerful, isn’t it? Yes.

So, that is it. You should not think that we will listen to the story of Satyanarayana; we will not listen to the story of Ram-Sita. Yes, it is true that the souls of Ram and Sita become tamopradhan in the end of the Iron Age; so, at that that time Baba has said that they write their own stories in their own scriptures. So, the story that the soul of Ram wrote in the Iron Age, in the tamopradhan Age, is like a novel. What? The true topic doesn’t exist in that. As such it is true that the story of becoming Narayan from nar (man) and the story of Ram-Sita are not different. Yes, it is true that he is the number one Narayan and some are latter Narayans. It has also been told [in the Murli]; Baba has narrated everything; He has also told that what do those who become Narayans become in the Silver Age? They become Ram-Sita. The serial number at which they become Narayan, they will become Ram-Sita of the same number. So, the number one Ram-Sita become the number one Narayan from nar (man) and Lakshmi from naari (woman). So, those Brahmakumar-kumaris who misunderstand stop making the pictures of the number one [Lakshmi-Narayan]. They make those pictures to vanish, they hide them, tear and throw them, burn them. So, look misunderstanding causes such confusion

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2843, दिनांक 07.04.2019
VCD 2843, dated 07.04.2019
रात्रि क्लास 19.11.1967
Night class dated 19.11.1967
VCD-2843-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.50
Time- 00.01-18.50


आज का रात्रि क्लास है 19.11.1967. भक्तिमार्ग में तो जिसको चाहिए जो किताब चाहिए, पुस्तक चाहिए वेद चाहिए, तो वो उठाए सकते हैं और पढ़ सकते हैं। मार्केट में से उठाएं, चाहे लाइब्रेरी में से उठाएं और सभी भाषाओं में हैं, पढ़ सकते हैं। और गीता भी सभी भाषाओं में है। और सारे ही ग्रंथ सभी भाषाओं में हैं। सिर्फ उसमें नहीं है। सिंधी में भी हैं। और शायद उर्दू में भी होगा। तो वह तो जिसको चाहिए तो उठा करके पढ़ लेवें। तो भक्ति मार्ग के वेद, ग्रंथ, शास्त्र पढ़े। वो सब भाषाओं में हैं। हँ? सिर्फ किसमें नहीं है? बोला ना सिर्फ उसमें नहीं है। नहीं। किसमें? हँ? संस्कृत भाषा में भी तो है ना। तो वो संस्कृत भाषा बनाई है। कहीं दुनिया में कहीं बोली जाती है? कहीं नहीं बोली जाती। समझते हैं कि बहुत ऊंची भाषा है। वो तो क्या कहेंगे? ज्ञान मार्ग की भाषा है या भक्ति मार्ग की भाषा है? क्या कहेंगे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, कहेंगे भक्ति मार्ग की भाषा है। जब कोई बोलता ही नहीं तो क्या कहेंगे? मरी हुई भाषा है या जिंदा है दुनिया में? मरी हुई है। तो जैसे वो भक्ति मार्ग में मरी हुई भाषा है वैसे ही ये तुम ब्राह्मणों की जो भाषा है ना वो किसी को समझ में नहीं आती दुनिया में। मरी हुई भाषा है। इस दुनिया में किसी को समझ में नहीं आती जब तक आकरके 7 दिन का कोर्स ना लें, 7 दिन की भट्टी में न बैठे। हां। तो देखा, बताया, सिर्फ उसमें नहीं है। उसमें माने? जो ब्राह्मणों की भाषा है उसमें नहीं है। बाकी सब भाषाओं में भक्ति मार्ग के ग्रंथ, शास्त्र तो मिलेंगे। तो लोग उठाएं और पढ़ें।

यहां तो बाप बैठकर के पढ़ाते हैं। कैसा बाप? दुनिया में तो जितने बाप हुए हैं उनके मुकाबले कोई वंडरफुल बाप है या तुरिया बाप कहें? तुरिया बाप है। तुरिया माने उस जैसा और कोई बाप हो ही नहीं सकता। तो यहां तो वो तुरिया बाप बैठकर के पढ़ाते हैं। कौन? आत्माओं का बाप। उनकी आत्मा की भाषा है। हँ? आत्मा की भाषा जो आत्मा समझेंगे पहले कम से कम सुन करके समझ तो ले कि हां हम आत्मा हैं। भले प्रेक्टिस नहीं है सदा काल की आत्मिक स्थिति में टिकने की तो भी मानें तो, जान तो लें। हाँ। तो वो आत्मिक भाषा बाप बैठ पढ़ाते हैं। और वो है चलती आती है। कौन सी भाषा?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, दुनिया में जो भी भाषाएं हैं और संस्कृत में जैसे गीता है वो भी चलती आ रही है। ये जन्म-जन्मांतर के ही पुस्तकें चली आती हैं। हर जन्म में तुम देखते हो चाहे उर्दू में हों, अरबी में हों, फारसी में हों, अंग्रेजी में हों, जर्मन में हों, वो पुस्तकें चली आ रही हैं। परंतु ये जो बाप बैठकरके समझाते हैं वो भाषा जन्म-जन्मांतर नहीं चलती है। कहां? इस एक ही जन्म में संगमयुग में चलती है। वो है ही इस एक जन्म के लिए। कौन सी भाषा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हां, रूहानी भाषा। रूहानी भाषा, रूह की रूह से रिहान, रूह रिहान करो। क्या? उसमें देह की जरूरत ही नहीं। क्यों? क्योंकि रूह तो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है ना। देह तो दिखाई पड़ेगी। देह के मुख में से आवाज निकलेगी। मुख को शंख कहते हैं ना। हाँ, तो गीता में लिखा है जब महाभारत युद्ध हुआ तो सबने अपने-अपने शंख बजाए। वो समझते हैं कि वो शंख बजाया, स्थूल शंख वो जो सागर में एक कीड़ा होता है ना उसका मुख होता है बड़ा बुलंद तो उसको, उसकी हड्डी निकाल लेते हैं। तो वो शंख। अरे उस शंख की बात थोड़े ही है। ये तो प्रैक्टिकल में मुख रूपी शंख है जिस शंख को बाप आ करके, हँ, अपना मीडिया बनाते हैं। हाँ।

तो ये बाप बैठ करके समझाते हैं। वो तो है ही इस एक जन्म के लिए। क्या? क्या समझाते हैं? जो भी रूहानी भाषा समझाते हैं, सुनाते हैं, वो इस एक जन्म के लिए जन्म-जन्मांतर वो भाषा चलती नहीं है। इस जन्म में जितना उठाया; किस जन्म में? कहेंगे संगम। अरे वो संगम नहीं सतयुग त्रेता का, त्रेता द्वापर का, द्वापर कलियुग का। नहीं। ये जो पुरुषोत्तम संगमयुग है। कौनसा? हँ? कलियुग और सतयुग के बीच का संगम। तो इस जन्म में जो 100 साल का संगम है ना। और भी धर्मपिताएं जो आए, विधर्मी धर्मपिताएं आए ना। चाहे चंद्रवंशी हों, चाहे इस्लामी हों, चाहे बौद्धी हों, क्रिश्चियन हों, कोई भी हों, उनके सहयोगी धर्मपिताएं हों। तो वो धर्मपिताएं आकरके अलग-अलग जन्मों में अपनी-अपनी भाषाएं उनकी चली हैं तो उनमें सुनाते रहे हैं उनके ग्रंथ सुनाए जाते रहे। और ये जो रूहानी भाषा बाबा बोलते हैं शिव बाबा ये तो इस एक ही जन्म में जितना उठाया; कौन सा? पुरुषोत्तम संगमयुग में। पुरुषों में; पुरुष माने आत्मा बताया ना। तो पुरुषों में आत्माओं में उत्तम से उत्तम पार्ट बजाने वाली कौन-कौनसी आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो जब जानकारी होती है तो उस संगम को कहते हैं पुरुषोत्तम संगम युग।

तो इस जन्म में जो जिसने जितना उठाया, जितना धारण किया और दूसरों को कराया इतनी ही उनकी जन्म-जन्मांतर की मिल्कियत बन जाती है, प्रॉपर्टी बन जाती है। कैसे? ये भाषा वहां चलेगी दूसरे जन्मों में? 84 के चक्कर में चलेगी? नहीं चलेगी। भले नहीं चलेगी लेकिन बाप कहते हैं ये जो रतन, तुमको ज्ञान रतन मिलते हैं रूहानी भाषा के ये ज्ञान रतन जो हैं तुम्हारे स्थूल रतन बन जाएंगे। क्या? ये तो मानसी सृष्टि चल रही है ना। ये मानसी सृष्टि में मनसा के द्वारा जो शूटिंग हो रही है वो कोई स्थूल चीज थोड़े ही है। मन-बुद्धि स्थूल है? नहीं। मन-बुद्धि भी स्थूल नहीं है और ये मन-बुद्धि के द्वारा जो सृष्टि रची जा रही है वो भी कोई, हां, स्थूल चीज थोड़े ही है। तो तुम्हारा जो ज्ञान है वो गुप्त ज्ञान है रूहानी ज्ञान। रूह ही समझती है। और सुनाने-समझाने वाला भी रूह है। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तो इस दुनिया में तो सिर्फ ये 100 साल की बात है। जितना जिसने उठाया उतना उठा लेते। उसके बाद तो कभी, हां, फिर ये होगा? ये जो रूहानी रतन है मनसा; मनसा और बुद्धि के द्वारा जो मानसी सृष्टि बन रही है वो फिर स्थूल सृष्टि बन जावेगी। सतयुग में स्थूल शरीर की सृष्टि होगी या सिर्फ मनसा की सृष्टि होगी? (किसी ने कुछ कहा।) हां, स्थूल शरीर। भले सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियों से पैदाइश होगी; स्थूल इंद्रियों से द्वापरयुग से पैदाइश होगी। लेकिन होगी तो स्थूल शरीर के द्वारा ना। हां।

तो ये जो तुम्हारी मिल्कियत है रूहानी ज्ञान रत्नों की वो स्थूल ज्ञान रतन बन जावेगी। स्थूल शरीर के लिए स्थूल ही तो चाहिए ना। हां। क्योंकि ये मिल्कियत है। और वो जो दुनिया में मिल्कियत है सोना, चांदी, हँ, वो जो जितने भी मेटल हैं ना, पहले तो वो ही चलता था। अभी तो कागज के नोट निकल पड़े। वह भी तो मिल्कियत ही हो गई ना। हां। तो ये जो मिल्कियत है ना, हाँ, बड़े-बड़े महल-माडियां, अटारियां, कारखाने, कल-कारखाने, वो भी मिल्कियत हुई ना। हां। खेती-बाड़ी, दुकानदारी, ये सब मिल्कियत है उस दुनिया की स्थूल मिल्कियत। और वो कोई मिल्कियत थोड़े ही है बच्ची। यहां संगम युग में वो मिल्कियत है क्या? वो नहीं। कौन सी मिल्कियत? हां, ये तो रूहानी ज्ञान की रूहानी मिल्कियत है। तो वो नहीं है। वो तो ऐसे पढ़ना है, हाँ, वो भी जैसे और पढ़ाई पढ़ी जाती है। हँ? ये रूहानी पढ़ाई भी ऐसे ही पढ़ी जाती है। उस पढ़ाई में भी पैसा कमाया जाता है, मिल्कियत कमाई जाती है ना, जायदाद कमाते हैं। और इसमें भी? इसमें भी वो ज्ञान रतन जो तुम्हारे हैं वो तुम्हारा पैसा है वो कमाया जाता है।

वो स्थूल रतन और ये सूक्ष्म ज्ञान रतन। क्या? ज्ञान रतन को सूक्ष्म कहेंगे या स्थूल कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) हां, स्थूल ज्ञान धन-संपत्ति जो है वो गुरुओं के द्वारा सिखाई जाती है कि तुम ये धंधा करो, धोरी करो, ये ब्राह्मण बनो, ये बड़े-बड़े यज्ञ रचो, तुम्हें बहुत पैसा मिलेगा ये है और वो है। ये धंधा ब्राह्मणों का है, ये धंधा क्षत्रियों का है, राजा बनो, पूरी राज्य की प्रजा की पूरी मिल्कियत तुम्हारी है। और वो वैश्यों की खेती करो, जानवर पालो और ये सब तुम जो कुछ है सो अपने कब्जे में करो सारी खेती-बाड़ी जमीन। हाँ। और शूद्रों की? अरे तुम सब की सेवा करो। सेवा से तुमको ढेर सारी मिल्कियत मिल जाएगी। तो वो तो स्थूल मिल्कियत हो गई। और ये? ये कौनसी मिल्कियत? ये तो रूहानी ज्ञान की मिल्कियत है। तो जैसे वो मिल्कियत स्थूल कमाई जाती है वैसे ही ये ज्ञान रत्नों की इसकी भी पढ़ाई है। वो पढ़ाई जैसे पढ़ी जाती है ये भी पढ़ाई पढ़ी जाती है। और उनको जो स्थूल पैसे मिलते हैं यहां भी तुमको सूक्ष्म ज्ञान रतन मिलते हैं कि नहीं? हां, मिलते हैं।

तो सो हर एक जन्म में पैसा मिलते हैं। हँ? और जो उस दुनिया में वो स्थूल पैसा मिलता है सोना-चांदी मिलता है। और यहां? यहां तो ज्ञान रत्नों का धंधा है। तो समझो इस समय में कोई साधु, संत, महात्मा है और वो साधु, संत, महात्मा का कोई बड़ा मठ-मंडलेश्वर बने पड़े हैं तो वो कोई बहुत धन छोड़ करके जाते हैं अपने मठ पंथ में। छोड़के जाते हैं ना। हाँ। अभी देखो दक्षिण भारत में एक मंदिर में कितना धन मिला। छोड़ के गए ना। हाँ। लेकिन वो छोड़ कर गए किसी के काम आया? किसी के काम नहीं आया। हां। और वो अभी भी दबा पड़ा है। कुछ सरकार ने निकाला। हां, भ्रष्टाचारी सरकार ने निकाला तो भ्रष्टाचारी तो क्या करेंगे? विदेशों में भेज देंगे। स्विस बैंक में डाल देंगे। भारत वासियों को तो कोई फायदा नहीं। तो वो जो साधु, संत, महात्माएं जो धन छोड़ करके जाते हैं, ऐसे नहीं है कि फिर जाकरके उसी स्थान में जन्म लेंगे। लेंगे? हँ? उसी मंदिर में, उसी मठ-पंथ में जाके जन्म लेंगे? नहीं लेते हैं। ऐसे तो नहीं है ना।

ये जो तुम्हारी नॉलेज है ये तो तुम जहां जाकरके जन्म लेंगे। हँ? चाहे सतयुग में, चाहे त्रेता में, स्वर्ग में और चाहे नरक की दुनिया में, द्वैतवादियों दैत्यों की दुनिया में, राक्षसी दुनिया में जो दुखदाई राक्षस हैं। इस्लामी आते हैं ना ढाई हजार साल से, हां, तो उन्होंने हिंसा की या नहीं की? हां, हिंसा की। तो राक्षस हुए ना ना। हां। मुसलमान आए उनके फॉलोअर्स। तो उन्होंने हिंसा की। तो जो हिंसा करते हैं वो हिंसा करने वाले दैत्य कहे जाते हैं। क्या? हां। दैत्य क्यों कहे जाते हैं? दिति माने चीरना-फाड़ना। अरे जो हिंसा करेंगे वो क्या करेंगे? शेर क्या करता है? चीता क्या करता है? चीर-फाड़ कर देता है ना। हां, तो ये हिंसक जो हैं ये तो फिर जहां उन्होंने अपनी धन-संपत्ति इकट्ठी की थी मठ-पंथ, संप्रदाय में वो तो वहां जन्म नहीं लेते। और तुम? तुम तो कोई भी जन्म में जाकर के जन्म लेंगे कोई भी युग में तो ये जो तुम्हारी नॉलेज है ना रूहानी नॉलेज ये तो तुम्हारे, हां, तुम्हारे साथ रहेगी। और उसके साथ होने के कारण तुम्हारे अंदर जो इसका जो मूल तंत है आत्मिक स्टेज, वो कुछ ना कुछ कलियुग के अंत तक चलती रहेगी। और जितनी-जितनी आत्मिक स्टेज धारण करेंगे योग बल से, हँ, तो बाप से योग लगाएंगे ना तो बाप तो सदा काल की आत्मा है। कि कभी देह बनता है? देह तो नहीं बनता।

तो तुम्हारी जो आत्मिक स्थिति है वो नंबरवार बनती है। काहे से? इस नॉलेज से। तो ये तुम्हारी नॉलेज तो ये तो जहां जाकरके जन्म लेंगे फिर वहां जाकर के वो साथ ही जाएगी इसकी प्रारब्ध। और वहां तो धन ही धन होगा तुम्हारे पास। बताया ना ये जो स्थूल ये जो तुम्हें सूक्ष्म ज्ञान धन ज्ञान रतन मिलते हैं ना ये वहां जाकरके उतना स्थूल धन का भंडार बन जावेंगे। तो दूसरी तो कोई बात नहीं है ना यहां।

Today’s night class is dated 19.11.1967. On the path of Bhakti, whoever wants whichever book, whether they want a textbook or the Veda, they can pick it and read it. They may get it from the market or pick it from a library and they can read it in all the languages. And the Gita is also available in all the languages. And all the scriptures are available in all the languages. They aren’t available only in that [language]. They are also available in Sindhi and perhaps they will be available in Urdu too. So, whoever wants those [books], he can pick them and read them. You read the Vedas, books, scriptures of the path of Bhakti. They are available in all languages. It isn’t available in just which language? It was said: It isn’t available only in that [language], wasn’t it? No. In which [language]? It is available in Sanskrit too, isn’t it? So, they have made the Sanskrit language. Is it spoken anywhere in the world? It isn’t spoken anywhere. They consider it to be a very high language. For that… what will be said? Is it the language of the path of knowledge or the path of Bhakti? What will be said?
(Someone said something.) Yes, it will be said that it is the language of the path of Bhakti. When no one speaks it at all, what will be said? Is it a dead language or a language that is alive in the world? It is dead. So, just like it is a dead language on the path of Bhakti, similarly, no one in the world understands the language of you Brahmins. It is a dead language. No one in the world understands it until they come and do the seven days course and undergo the seven days bhatti. Yes. So look, it was said: It isn’t available only in that [language]. What does ‘that’ mean? It isn’t available in the language of the Brahmins. The books and scriptures of the path of Bhakti will be available in all other languages, so, people may pick them and read them.

Here, the Father sits and teaches [us]. What kind of a Father? Is He a wonderful Father compared to all the fathers of the world or will He be called a unique (turiya) Father? He is a unique Father. Unique means there can be no other Father like Him at all. So, here that unique Father sits and teaches [us]. Who? The Father of the souls. His [language] is the language of the souls. Hm? Those who consider themselves as a soul [will understand] the language of the souls. First, at least they should listen to it and understand: ‘yes, we are a soul’. Although they don’t have the practice to remain in the soul conscious stage forever, at least they should accept it, know it. Yes. So, the Father sits and teaches that spiritual language. And that [language] continues. Which language?
(Someone said something.) Yes, all the languages in the world… For example, there is the Gita in Sanskrit; that has also continued. Those very books continue birth after births. You see, those books, whether they are in Urdu, Arabic, Persian, English [or] German, they have continued in every birth. But this language that the Father sits and explains [to us] doesn’t continued birth after birth. Where? It continues only in this one birth, in the Confluence Age. It is only for this one birth. Which language? (Someone said something.) Yes, the spiritual language. The spiritual language… have a spiritual chit chat. What? There isn’t the need of the body in it at all. Why? It is because the soul is certainly the mind and the intellect like soul, isn’t it? The body will be visible. The voice comes out of the mouth in the body. The mouth is called conch, isn’t it? Yes. So, it is written in the Gita: When the Mahabharata war was waged, everyone blew their conch. They think that they blew that conch, the physical conch. There is a creature in the ocean; its voice is very loud. So, they take out the bone. So, that conch. Arey, it isn’t about that conch. It is the conch like mouth in practical that the Father makes as His media after coming. Yes.

So, this Father sits and explains: It is in fact for this one birth. What? What does He explain? The spiritual language that He explains and narrates is for this one birth. That language doesn’t continue for birth after birth. The extent to which you grasp it in this birth; In which birth? It will be said, in the Confluence Age. Arey, not that confluence of the Golden Age and the Silver Age, the Silver Age and the Copper Age, the Copper Age and the Iron Age. No. This Elevated Confluence Age. Which [confluence]? The confluence of the Iron Age and the Golden Age. So, in this birth; The Confluence Age is of 100 years, isn’t it? The other religious fathers who came, the vidharmi religious fathers did come, didn’t they? Whether they are the Chandravanshis (those of the Moon dynasty), those of Islam, the Buddhists, the Christians or whoever they are, their helper religious fathers, so, those religious fathers come and; There have been their own languages in different births, so they narrated in that [language]. Their scriptures have been narrated [in those languages]. And this spiritual language that Baba, ShivBaba speaks, the extent to which someone grasps it in this one birth; which [birth]? The Purushottam Confluence Age. Among the purush; It was said, purushmeans the soul, wasn’t it? So, among the purush, among the souls, which are the souls who play the most elevated part on this stage like world, the confluence in which you get this information is called the Purushottam Confluence Age.

So, in this birth, the extent to which someone grasps [this language], assimilates it and makes others assimilate it, he makes his property (milkiyat) for many births to that extent. How? Will this language continue there, in the other births? Will it continue in the cycle of the 84 births? It won’t. Although it won’t continue, the Father says: These gems, the gems of knowledge of the spiritual language that you receive will become the physical gems. What? This is the maansi world (the world born from the mind), isn’t it? The shooting that is being performed through the mind in this maansi world isn’t something physical. Are the mind and the intellect physical? No. The mind and the intellect aren’t physical and yes, the world that is being created through the mind and the intellect isn’t physical either. So, yours is the secret knowledge, the spiritual knowledge. The soul alone understands it. And the one who narrates and explains it is also a soul.
(Someone said something.) Yes. So, it is only about these 100 years in this world. Someone can grasp it as much as he wants; after that he can never; yes, then, will this exist? These spiritual gems of the mind; the maansi world that is being created through the mind and the intellect, it will turn into the physical world. Will there be the world of the physical body in the Golden Age or will there be just the world of the mind? (Someone said something.) Yes, [there will be the world of] the physical body. There will be the creation of the subtle sense organs (gyanendriyaan) and there will be creation through the physical organs from the Copper Age; but it will certainly be created through the physical body, won’t it? Yes.

So, the property of your spiritual gems of knowledge will become physical gems of knowledge. Physical [gems] are required for the physical body, aren’t they? Yes. It is because this is property and the properties of the world [i.e.] gold, silver… all those metals... Earlier that is what was used [as currency], now paper notes have emerged, so, that is also property only, isn’t it? Yes. So, the properties of big palaces, multi storied buildings, factories, machines and factories, they too are properties, aren’t they? Yes. Farming, shop keeping, all these are the properties of that world, the physical properties. And daughter, that isn’t the property. Is there that property here in the Confluence Age? Not that. Which property [do we have here]? Yes, there is the spiritual property of the spiritual knowledge. So, there isn’t that [property]. You should study it like the other studies (of the world) are studied, hm, this spiritual study is also learnt in the same way. Money is earned in that study too, the property is earned, isn’t it? The property is earned. And even in this [study]? In this study too, your gems of knowledge which is your wealth is earned.

Those are the physical gems and these are the subtle gems of knowledge. What? Will the gems of knowledge be called subtle or physical?
(Someone said something.) Yes. The [way to earn] physical wealth and property is taught by the gurus that you pursue this occupation and business, become a Brahmin, organize big yagyas, you will receive a lot of money, this and that; this occupation belongs to the Brahmins, this occupation belongs to the Kshatriyas, become a king, the entire property of the kingdom, of the subjects is yours. And do farming, [the task] of the Vaishyas, rear cattle and keep all this farming and land under your control. Yes. And what about the Shudras? Arey, you serve everyone, you will receive a lot of properties by serving. So, that is the physical property. And this? What is this property? This is the property of the spiritual knowledge. So, just like that physical property is earned, in the same way, this is also the study of these gems of knowledge. Just like you study that knowledge, similarly this knowledge is also learnt. And [just like] they receive physical money, here too, do you receive the subtle gems of knowledge or not? Yes, you do receive.

So, you receive money in every birth. Hm? You receive physical money, gold, silver in that world. And here? Here, there is the business of the gems of knowledge. So, suppose at this time there are some sages, saints, great souls and if someone has become math-mandaleshwar (head of a sect) of those sages, saints, great souls. So, they depart leaving a lot of wealth in their sects [math-panth]. They leave it and go, don’t they? Yes. Look, recently so much wealth was found in a temple in south India. They left it, didn’t they? Yes. But did whatever they leave come in use for anyone? It didn’t come in use to anyone. And it is buried even now. The government brought out some of it. Yes, the corrupt government brought it out. So, what will the corrupt ones do? They will send it to the foreign countries. They will deposit it in a Swiss Bank. There is no benefit for the residents of India (Bharatvasis). The wealth that the sages, ascetics and great souls leave behind, it isn’t that they will be born in that very place. Will they? Hm? Will they be born in that very temple and sect? No, they won’t. It isn’t like that, is it?

This knowledge of yours, wherever you are born, hm, whether in the Golden Age, in the Silver Age, in heaven or in the world of hell, in the world of the dualistic demons, in the demoniac world, the demons who give sorrow. The people of Islam come 2500 years before, don’t they? Yes. So, did they use violence or not? Yes, they indulged in violence. So, they are demons, aren’t they? The Muslims came as their followers. So they used violence. So, those who use violence are called demons. What? Yes. Why are they called demons (daitya)? Diti means to rip and tear. Arey! What do those who use violence do? What does a lion, a cheetah do? It rips apart, doesn’t it? Yes. So, these violent ones who collected their wealth and property in their sects and communities aren’t born there. And you? In whichever birth or Age you are born, your knowledge, spiritual knowledge will be with you. And because of its with you, the main essence of it, the soul conscious stage will remain within you to some extent or the other till the end of the Iron Age. And the extent to which you assimilate the soul conscious stage through the power of Yoga, you will have Yoga with the Father, won’t you? The Father is certainly a Soul forever or does He ever become a body? He doesn’t become a body.

So, you attain the soul conscious stage number wise. Through what? It is through this knowledge. So, the attainment (praarabdh) of this knowledge of yours will go with you wherever you are born. And you will have wealth and only wealth there. It was said, wasn’t it? These subtle gems of knowledge that you receive will become the treasure of physical wealth there. So, there is no other topic here.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2844, दिनांक 08.04.2019
VCD 2844, dated 08.04.2019
रात्रि क्लास 19.11.1967
Night class dated 19.11.1967
VCD-2844-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.28
Time- 00.01-16.28


रात्रि क्लास चल रहा था - 19.11.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – ये जो दुनिया में पढ़ाइयां पढ़ाते हैं, ऐसे नहीं है कि ऊंची पढ़ाई पढ़ने के लिए सभी बनारस कॉलेज में जाते हैं। नहीं। ऐसी कॉलेजें तो इस दुनिया में ढ़ेर हैं जहां-तहां। परन्तु ये जो बेहद की नॉलेज है, रूहानी नॉलेज, वो फिर यहां पढ़ने आनी होती है। यहाँ माने कहाँ? जहाँ मधुबन में मुरलिया बाजे। ऐसे क्यों बोला? सभी मधुबन में तो मुरलिया बाजती है। हँ? बताया - फर्स्टक्लास मुरली है जो सन्मुख। और सेकण्ड क्लास वो है जो टेप रिकार्डर से सुनते हैं या टीवी में देखते हैं। थर्ड क्लास वो है जो कागज़ में सुनते हैं, पढ़ते हैं, सुनाते हैं। तो बताया, ये तो एक ही नॉलेज है और एक ही कॉलेज है। उसके लिए यहाँ ही पढ़ना आना होता है। बस। और इस टीचर के बिगर; किस टीचर के बिगर? हँ? किस तरफ इशारा किया? इस टीचर के बिगर और कोई पढ़ाय ही नहीं सकते हैं। हँ? और कोई माने कौन-कौन? हँ? चाहे कोई ब्रह्माकुमार हों, चाहे कोई ब्रह्माकुमारी हों, चाहे वो चतुर्मुखी ब्रह्मा हो, चार मुखों वाला, वो कोई भी ये पढ़ाई नहीं पढ़ाय सकते हैं सिवाय एक मुकर्रर रथधारी के। हँ? ये समझानी कोई दे ही नहीं सकते।

वो एक ही है। एक बिगर कोई दूसरा नहीं पढ़ाय सकते। अगर पढ़ाते भी हैं तो एक से समझ करके फिर औरों को पढ़ाते हैं। हँ? अब एक से कैसे समझेंगे? घड़ी-घड़ी माया जो है संशय में लाती रहती है। कि नहीं लाती है? लाती रहती है। तो फिर एक को जब अच्छे से समझेंगे और समझकरके फिर औरों को पढ़ाते हैं क्योंकि एक ही तो पढ़ाते हैं ना बच्ची। हँ? ऐसे तो नहीं कि ब्रह्मा के पांच मुख हैं तो पांचों मुख पढ़ाते हैं। हँ? नहीं पढ़ाते? अरे? बेसिक नॉलेज तो पढ़ाते हैं? नहीं? लेकिन बेसिक नॉलेज भी जो पढ़ाते हैं वो भी समझ में नहीं आती है तो पढ़ाने से फायदा क्या हुआ? थोड़ी समझ में भी तो आनी चाहिए। हाँ। ये ही बात नहीं बुद्धि में बैठती है। क्या? कि मुकर्रर रथ क्या होता है? टेम्परेरी रथ क्या होता है? और टेम्परेरी रथ कितने होते हैं और मुकर्रर रथ कितने होते हैं? कुछ भी पता नहीं है।

तो यहाँ जो एक से पढ़ाई पढ़ाई जाती है उसके ऊपर बहुत अटैन्शन चाहिए। हँ? अगर पढ़ाई के ऊपर अटैन्शन नहीं है तो फिर क्या होगा? और-और तरफ बुद्धि चली जाती है। और जब और-और तरफ बुद्धि चली जाती है; और-और तरफ माने? हँ? चतुर्मुखी ब्रह्मा के जो चार मुख हैं, हँ, जो अधोमुखी मुख हैं उनकी तरफ बुद्धि चली जाएगी तो क्या नुकसान होगा? हँ? नुकसान होगा या फायदा होगा? हाँ, नुकसान हो जाएगा। क्या नुकसान होगा? वो अधोमुखी ब्रह्मा जो है वो चारों मुख जो हैं वो नीचे की ओर खुद जाने वाले हैं चारों युगों में, तो तुमको भी कहाँ ले जावेंगे? नीचे की ओर ले जावेंगे। तो उसमें तुम्हारा नुकसान हो जाता है। हँ? इतनी पढ़ाई; कितनी? जितनी एक मुकर्रर रथधारी से पढ़ सकते हैं उतनी पढ़ाई और किसी टेम्परेरी मुख वाले ब्रह्मा से पढ़ ही नहीं सकते हैं। ऐसे बहुत हैं बच्चे। कैसे? हँ? कैसे बच्चे बहुत हैं? वो थोड़े नहीं हैं। कैसे? जो मुकर्रर रथ को पहचानते ही नहीं हैं। हँ? जिनकी पढ़ाई, पढ़ाई में ध्यान नही रहता है। फिर काहे में ध्यान रहता है? हँ? उनका जो ध्यान है ना वो काहे में रहता है? हँ? अरे, वो ही ब्रह्मा के जो चार मुख हैं ना, बस, वो मुख ही याद आते रहते हैं। या देह याद आती रहती है। मुख में से जो वाचा निकलेगी वो मिक्स ज्ञान सुनाएंगे या एक्यूरेट ज्ञान सुनाएंगे? हँ? मिक्स ही ज्ञान सुनाएंगे। और जब मिक्स ज्ञान सुनाएंगे तो फिर ऐसे ही बात हो जाती है जैसे दूध का भरा हुआ घड़ा हो, उसमें एक बूंद विष की डाल दो तो सारा ही? सारा ही विषैला हो जाएगा।

तो ऐसे जो बहुत बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई जो एक्यूरेट पढ़ाई है उस पढ़ाई में ध्यान ही नहीं रहता है। हँ? कुछ न कुछ चटक लगे और वो भी अच्छी चटक लगे। थोड़ा भी पढ़ें; किससे? उस एक मुकर्रर रथधारी जो सुप्रीम टीचर बाप है शिवबाबा, थोड़ा भी पढ़ें तो वो भी अच्छा। क्या? बाबा कहते हैं ना अगर थोड़ा भी पढ़ेंगे, पढ़ाएंगे तो विश्व के मालिक तो बनेंगे ना। हँ? विश्व के मालिक बनेंगे? विश्व के मालिक? अरे, विश्व का मालिक एक बनेगा कि अनेक बनेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) एक बनेगा? अरे? नहीं। बाप कहते हैं कि मैं आप समाना बनाता हूँ ना। तो मैं क्या विश्व का मालिक बनता हूँ? बनता हूँ? तो जिसको आप समान बनाऊंगा 100 परसेन्ट वो फिर विश्व का मालिकाना अपनी मुट्ठी में रखेगा सारा? हँ? रखेगा? छोटी-छोटी बातों के लिए भी वो अपना कंट्रोल चलाएगा क्या? नहीं चलाएगा ना। हाँ। फिर तो वो क्या हो गई? हिटलरशाही हो गई। हो गई कि नहीं हो गई? हाँ।

तो बताया, हाँ, जो और भी सहयोगी हैं ना वो सहयोगी भुजाएं जो मददगार बनती हैं सच्चाई से; हँ? कबसे लेकर कब तक? हँ? एक जनम या 2-4 जनम या सिर्फ 21 जनम? कितने जनम सहयोगी बनती हैं? हँ? अरे?
(किसी ने कुछ कहा।) 21 जनम सहयोगी बनती हैं? बाकि तलाक दे देती हैं, धोखा दे देती हैं? ऐसे? नहीं। वो जो भुजाएं हैं ना वो 83 जनम में भी पूरा सहयोग देती हैं। क्या? हाँ, एक के अलावा और कोई के सहयोगी नहीं बनते। जो गाते हैं ना, हँ, क्या? एक लिंग महाराज। मानते हैं कि नहीं? हाँ। एकलिंग को मानने वाले जो होते हैं वो एक लिंग को ही मानेंगे या अनेकों को पकड़ेंगे? हँ? एक को ही। उनके अंदर संस्कार भरे हुए हैं। तो वो तो शूटिंग पीरियड में भी, जबसे ज्ञान में निकलते हैं, तन से, मन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों की ताकत लगाकरके भी, हँ, किसके बनकरके रहते हैं? एक के ही बनकरके रहते हैं। क्या? वो अपने जेब का फूटी कौड़ी भी किसको नहीं देंगे? उनको नहीं देंगे। किनको? देह के संबंधियों को, या देह के संपर्क में जो आने वाले कितने भी हों प्यारे ते प्यारे, उनको नहीं देंगे। वो तो एक के बनकरके रहते हैं ना। उनकी खास पहचान है। जबसे ज्ञान में आवेंगे तबसे लेकर जबसे बाप को पहचानेंगे तबसे लेकरके वो एक बाप के ही बनकरके रहेंगे। हाँ, बाकि नंबरवार तो होंगे ना। नहीं होंगे? नंबरवार तो ज़रूर होंगे। कोई कम कोई ज्यादा।

तो ऐसे जो बच्चे हैं सहयोगी भुजाएं, हाँ, वो फिर जन्म-जन्मान्तर वो विश्व के मालिक ही कहे जावेंगे, विश्वपिता के साथ रहने वाले, हँ, उनके द्वारा बाप सारी विश्व को कंट्रोल करने वाला या अकेला ही कंट्रोल करता है? नहीं। हाँ। देखो, द्वापरयुग में भी जब शुरुआत होती है तो गायन है ना विक्रमादित्य के दरबार में नवरतन थे। तो नौ रतन जो हैं वो किसलिए थे? इसीलिए थे कि वो राजकाज सारा संभालते थे। हाँ। तो विश्व के मालिक तो बनेंगे ना। हाँ। और उनके कंट्रोल में चलने वाली जो प्रजा होगी वो भी तो यथा राजा तथा प्रजा होगी ना। हाँ। प्रजा भी विश्व का मालिक अपन को समझेगी या नहीं समझेगी? हँ? वो भी कहती है ना। कैसे? जैसे परिवार में छोटा बच्चा भी होता है, हँ, वो कहता है, उससे पूछे, अरे, ये कारखाना किसका है? तो क्या कहेगा? मेरा है, मेरे बाप का है। हँ? पूछने की क्या बात है? तुमको पता नहीं है? उमंग-उल्लास से कहेगा या ये कहेगा मेरे बाप का कारखाना है, मेरा तो नहीं है? ऐसे कहेगा? नहीं कहेगा।

तो बताया, तो इस हिसाब से मर्तबा तो बडा हुआ ना। किनका? चाहे प्रजावर्ग की आत्माएं हैं, चाहे राज-काज चलाने वाले ऊँचे-ऊँचे अधिकारी आत्माएं हैं, हँ, उनका मर्तबा तो अंदर से बड़ा है ना। हँ? कि प्रजा; प्रजा का मतलब क्या है? प्रकष्ट रूप से जा माने जन्म लिया जिसने। हँ? जिनकी प्रत्यक्षता रूपी जन्म प्रकष्ट रूप से हुआ। किसने दिया? बाप ने जन्म दिया। बाप ने बच्चों को प्रत्यक्ष किया। क्या होता है? बच्चे बाप को प्रत्यक्ष करते हैं, बाप बच्चों को प्रत्यक्ष करता है। ज्यादा पावरफुल कौन है? बच्चे ज्यादा पावरफुल होते हैं या बाप ज्यादा पावरफुल होता है? बाप ज्यादा पावरफुल होता है। तो बाप पहले बच्चों को प्रत्यक्षता रूपी जन्म देता है। क्या? हाँ। कि ये मेरे बच्चे हैं। और बच्चे भी यही समझते हैं कि ये मेरा बाप है। और मेरे सिवाय और किसी को सुख-शांति की मिल्कियत जो ज्ञान के द्वारा मिलती है, वो और किसी को, हँ, तहे दिल से और किसी को दे ही नहीं सकता। क्यों? क्योंकि सच्चे दिल के बच्चे जो होते हैं वो क्या कहते हैं? सच्चे दिल पर साहेब राज़ी। झूठे दिल के हैं वो अपना पोतामेल पूरा तन का, मन का, धन का, सब बातों का पोतामेल पूरा देंगे? बिल्कुल नहीं देंगे। नहीं देते हैं।

बोल दिया – हैं तो नंबरवार। आठ भी नंबरवार होंगे। लेकिन बताय दिया कि अपना पूरा-पूरा पोतामेल देने वाला कोई कोटों में एक ही है। तो बाकि तो फिर नंबरवार ही हुए ना। चलो, फिर भी देते तो हैं ना। हाँ, जितना भी देते हैं। हिसाब है। प्रजावर्ग में भी, हँ, अपना दिल सच्चा रखने वाले होंगे या दिल में एक बात है और बाहर से दूसरी बात? बाप कहते हैं जो अंदर से एक और बाहर से दूसरे होते हैं वो मेरे नज़दीक नहीं आ सकते। क्या? विश्व का पिता होगा ना, उसकी खासियत क्या है? उसकी खासियत बताई कि जो आदि लक्ष्मी और आदि नारायण के खास, आदि नारायण की ये खास क्वालिटी होगी। क्या? कि कोई भी आत्मा हो, प्रजावर्ग की हो, राजवर्ग की हो, हँ, दास-दासी वर्ग की हो, अधिकारी वर्ग की हो, सबके कनेक्शन में आता है। और सबसे बनाके रखता है। उसकी किसी से आमने-सामने की कोई ऐसा झगड़ा होता ही नहीं। तो बताया तो इस हिसाब से मर्तबा तो बड़ा हुआ ना। क्योंकि प्रजा भी कहती है हम विश्व के मालिक हैं। प्रजा माने बच्चे हुए ना। प्रजा। प्रकष्ट। जा माने जन्म लेने वाले। जिनको बाप से प्रकष्ट रूप से प्रत्यक्षता रूपी जन्म मिलता है। तो बाप के बच्चे हुए ना। हाँ।

A morning class dated 19.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was – The education that is being imparted in this world, it is not as if everyone goes to the Benares College to study higher education. No. There are numerous such colleges in this world everywhere. But in order to study this unlimited knowledge, the spiritual knowledge one has to come here. ‘Here’ refers to which place? To Madhuban where the Murli (flute) is played. Why was it said so? The Murli is played in all the Madhubans. Hm? It was told – First class Murli is that which is narrated face to face. And second class is that which you listen through the tape recorder or that which you see on TV. Third class is that which you listen from a paper, you read and narrate. So, it was told, it is the only knowledge and only college. For that you have to definitely come here to study. That is it. And without this teacher; Without which teacher? Hm? In which direction was a gesture made? None other than this teacher can teach at all. Hm? ‘None other’ refers to who all? Hm? Be it the Brahmakumars, be it the Brahmakumaris, be it the four-headed Brahma, the one with four heads, none of them can teach this knowledge except one permanent Chariot holder. Hm? Nobody can give this explanation at all.

He is only one. None other than one can teach. Even if they teach, they understand from one and then teach others. Hm? Well, how can they understand from one? Maya brings you in doubts every moment. Or doesn’t she? She keeps on bringing [you in doubts]. So, then when you understand one nicely and after understanding, you teach others because only one teaches, doesn’t He daughter? Hm? So, it is not as if there are five heads of Brahma, so, all the five heads teach. Hm? Don’t they teach? Arey? Do they not teach basic knowledge? No? But even the basic knowledge that they teach, they do not understand even that; so, what is the use of teaching? One should also understand a little. Yes. This topic itself doesn’t sit in the intellect. What? That what is a permanent Chariot? What is a temporary Chariot? And how many temporary chariots are there and how many permanent chariots are there? They don’t know anything.

So, you should pay a lot of attention to the education that is imparted here by one. Hm? What will happen if there is no attention on the studies? The intellect wanders in other directions. And when the intellect wanders in other directions; what is meant by ‘in other directions’? Hm? There are four heads of the four-headed Brahma; if the intellect moves towards the downward facing heads, then what will be the loss? Hm? Will you suffer loss or will you reap benefits? Yes, you will suffer loss. What will be the loss? The downward facing Brahma, all his four heads themselves move downwards in all the four Ages; so, where will they take you too? They will take you downwards. So, you suffer loss in that. Hm? Such education; How much? The knowledge that you can study from one permanent Chariot-holder, you cannot study through any Brahma with temporary head at all. There are many such children. How? Hm? What kind of children are more in numbers? They are not few. How? Those who do not recognize the permanent Chariot at all. Hm? They do not pay attention to the studies, the education. Then towards what do they pay attention? Hm? On what do they pay attention? Hm? Arey, the same four heads of Brahma; that is it, those heads only keep on coming to the mind. Or the body keeps on coming to the mind. The words that emerge from their mouth, do they narrate mix knowledge or accurate knowledge? Hm? They will narrate mix knowledge only. And when they narrate mix knowledge, then the topic is like if there is a pot full of milk and if you put a drop of poison in it, then the entire thing? The entire thing becomes poisonous.

So, there are many such children whose studies, they do not pay attention to the accurate studies at all. Hm? They should get some or the other enthusiasm and that too they should get good enthusiasm. They should study a little. From whom? Even if they study a little from that one permanent Chariot holder, the Supreme Teacher Father, ShivBaba, then that is also good. What? Baba says, doesn’t He that even if you study a little, teach a little, then you will become masters of the world, will you not? Hm? Will you become masters of the world? Masters of the world? Arey, will one person become master of the world or will many become?
(Someone said something.) Will one person become? Arey? No. The Father says that I make you equal to Myself, don’t I? So, do I become master of the world? Do I become? So, the one whom I make 100 percent equal to Myself, will he keep the entire ownership of the world in his hands? Hm? Will he keep? Will he exert control even for petty things? He will not, will he? Yes. Then what is that? It is Hitlerism. Is it or is it not? Yes.

So, it was told, yes, the other helpers, those helper arms, which become helpful truthfully; hm? From which time to which time? Hm? For one birth or for 2-4 births or just 21 births? For how many births do they become helpful? Hm? Arey?
(Someone said something.) Do they become helpful for 21 births? Do they give divorce, do they dupe for the rest of the births? Is it so? No. Those arms extend full help even in 83 births. What? Yes, they do not become helpful to anyone except one. It is sung, isn’t it? What? Ek ling Maharaj. Do they believe or not? Yes. Those who believe in Ekling, will they believe in only one ling or will they catch many? Hm? Only one. The sanskars are recorded in them. So, even in the shooting period, ever since they enter the path of knowledge, they remain faithful to whom through body, through mind, through wealth, through time, through contacts, through the power of the relatives? They remain faithful to one. What? To whom will they not give even a broken cowrie from their pocket? They will not give to them. To whom? To the relatives of the body or to those dearest ones who come in contact with the body, they will not give to them. They remain faithful to one, don’t they? This is their special indication. Ever since they enter the path of knowledge, ever since they recognize the Father, they will remain faithful to one Father only. Yes, but they will be numberwise, will they not? Will they not be? They will definitely be numberwise. Some less, some more.

So, such children, who are the helper arms, yes, they will then be called masters of the world birth by birth, who live with the Father of the world; does the Father control the entire world through them or does he control alone? No. Yes. Look, even when the Copper Age starts, then it is sung that there were nine gems in the Court of Vikramaditya. So, why did these nine gems exist? They existed because they used to take care of the entire governance. Yes. So, they will become masters of the world, will they not? Yes. And the subjects who work under their control will also be like the king (yatha raja tatha praja), will they not be? Yes. Will the subjects also consider themselves to be masters of the world or not? Hm? They too say, don’t they? How? For example, even if there is a small child in a family, hm, he says; if anyone asks him, arey, whose factory is this? Then what would he say? It is mine; it belongs to my Father. Hm? Where is the question of asking? Don’t you know? Will he say with zeal and enthusiasm or will he say that this is my Father’s factory, not mine? Will he say so? He will not say.

So, it was told that by this account the post is high, isn’t it? Whose? Be it the souls of the subjects category, be it the souls of high-ranking officials who run the government, hm, their position is big from inside, isn’t it? Hm? The praja (subjects); what is meant by praja? The one who was born in a special manner. Hm? Those who got revelation like birth in a special manner. Who gave? The Father gave birth. The Father revealed the children. What happens? Children reveal the Father, the Father reveals the children. Who is more powerful? Are the children more powerful or is the Father more powerful? The Father is more powerful. So, the Father gives revelation-like birth to the children first. What? Yes. That these are My children. And the children also think that this is my Father. And except me nobody else; the property of happiness and peace that one gets through knowledge; He cannot give that to anyone else from His heart [except me]. Why? It is because what do the children with a true heart say? Sachchey dil par saaheb raazi (God is pleased with the true heart). Will those with a false heart give their entire potamail of body, of mind, of wealth, of all the topics? They will not give at all. They do not give.

It was told – They are indeed numberwise. The eight will also be numberwise. But it was told that the one who gives his complete potamailis one in crores. So, all others are then numberwise only, aren’t they? Okay, however they do give, don’t they? Yes, to whatever extent they give. There is an account. Even among the subjects’ category, will they maintain a true heart or will they have something in their heart and something else outside? The Father says that the ones who are something inside and something else outside cannot come close to Me. What? What is the specialty of the Father of the world? His specialty was mentioned which would be special quality of the first Lakshmi and the first Narayan. What? That be it any soul, be it someone from the subjects category, be it someone from the royal category, hm, be it those from the category of servants and maids, be it those from the officers category, he comes in connection with everyone. And he maintains the relationship with everyone. He doesn’t enter into any fight with anyone face to face at all. So, it was told that by this account their position is big, isn’t it? It is because the subjects also say that we are masters of the world. Subjects means that they are children, aren’t they? Praja. Prakasht (special). Ja means ‘those who get birth’. Those who get revelation like birth from the Father in a special manner. So, they are the Father’s children, aren’t they? Yes.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
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रात्रि क्लास चल रहा था 19.11.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी - भक्ति मार्ग में तो शास्त्रों में चतुर्युगी की आयु की बड़ी लंबी-चौड़ी दिखाय दी है। और वैसे भी वो लिखने वाले शास्त्र खुद भी तो कहते हैं नेति-नेति। हम आदि, मध्य, अंत को नहीं जानते। तो उन्हें 84 जन्मों का चक्कर कुछ भी याद नहीं रह सकता है। और ये भी जानते हो कि जो पढ़ाते हैं वो कहां पढ़ करके तो नहीं आते हैं ना। हँ? यहां तो ज्ञान सागर बाप बैठा हुआ है ना। ऐसे नहीं कि उनको कोई देहधारी मनुष्य पढ़ाता है। नहीं। वो तो मनुष्य सृष्टि का बीज रूप है। उसको कौन पढ़ाएगा? बीज माने बाप। तो बच्चे जानते हैं कि जो बीज चैतन्य होगा उनको तो जरूर सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान है क्योंकि बीज में तो सारा वृक्ष होता है ना। बीज से ही सारा वृक्ष निकलता है।

तो बताया, इसीलिए गाया जाता है ना कि जिससे भी पूछो ऋषि-मुनि से तो वो बोलेंगे ना मुझे आदि, मध्य, अंत का ज्ञान सृष्टि का नहीं है। नेति-नेति कहते आए। शास्त्रों में ही लिख दिया। तो भई तुमको ये आदि, मध्य, अंत का ज्ञान नहीं है तो भई किसमें है? तो ये तो ज़रूर कह देते हैं कि ज्ञान का सागर तो परमपिता परमात्मा है। अरे, परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है तो फिर सूर्य कौन है? हँ? अरे, सागर में ज्यादा ज्ञान की रोशनी होती है, हँ, ज्ञान की गर्मी होती है या सूर्य में ज्यादा गर्मी होती है, ज्यादा रोशनी होती है? ज्ञान को रोशनी कहा जाता है ना। तो सूर्य में ज्यादा ज्ञान की रोशनी होती है, गर्मी होती है। और उस गर्मी को सागर सबसे जास्ती ग्रहण करता है। ऐसे तो नहीं है कि नदियां ग्रहण करती है जास्ती, पहाड़ ग्रहण करते हैं, पोखरे ग्रहण करते हैं, तालाब ग्रहण करते हैं, नहरें ग्रहण करती हैं। नहीं। सागर ही ज्ञान को सबसे जास्ती ग्रहण करता है। तो वो ज्ञान का सागर किससे लेता है ज्ञान? उस जड़ सूर्य से लेता है क्या? नहीं। वो तो ज्ञान लेता ही है चैतन्य ज्ञान सूर्य से। जैसे वो जड़ सूर्य सदा सागर से, पृथ्वी से, पहाड़ों से, नदियों से, मनुष्य मात्र से, प्राणी मात्र से डिटैच रहता है ना। ऐसे ही ये जो ज्ञान सूर्य है ना, हां, सभी आत्माओं का बाप, हां, वो तो सदा डिटैच रहने वाला ज्ञान सूर्य है। तो वो मानेंगे जरूर कि हाँ, ज्ञान सूर्य भी कोई है और अति सूक्ष्म है, चैतन्य है। क्योंकि वो जो आसमान का सूर्य है, चांद है, सितारे हैं, वो तो जड़ हैं। और इस सृष्टि पर तो आत्मा रूपी सितारे हैं। हँ? कोई चांद है। और इस सृष्टि पर पार्ट बजाने वाला सूर्य भी तो कोई होगा। हँ? पार्ट तो बजाता है लेकिन सदैव डिटैच होकर के पार्ट बजाता है। कोई में अटैचमेंट उसका जाता ही नहीं।

तो वो है परमपिता परमात्मा शिव कहा जाता है। उसको परमात्मा नाम क्यों लगाय दिया? परमपिता दो नाम क्यों लगाय दिए? वो भी तो बताया ना। परमपिता इसलिए कि वो सब आत्माओं का पिता है। जो भी बिंदु-बिंदु निराकर ज्योति स्टार रूप आत्माएं हैं सबका पिता। उसका कोई पिता नहीं है। और पीछे से परमात्मा शब्द लगाया जाता है। ऐसे थोड़े ही कि परमात्मा परमपिता कहेंगे कोई? नहीं। जैसे कहते हैं शिव शंकर भोलेनाथ। तो कभी ऐसे कहते हैं शंकर शिव भोले नाथ? कभी नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि जो बाप है उसका नाम आगे और बच्चे का नाम पीछे। तो ऐसे ही परम पिता, जो आत्माओं का पिता है शिव, वो इस सृष्टि पर आते हैं, तो इस सृष्टि पर पार्ट बजाने वाली जो भी मनुष्य आत्माएं हैं क्योंकि मनुष्यों को ही समझाएंगे ना। क्यों? और दूसरे प्राणियों को क्यों नहीं समझाएंगे? अरे, शास्त्रों में तो लिखा हुआ है कच्छ अवतार, मच्छ अवतार, मत्स्यावतार, वराह अवतार, हँ, घोड़ा अवतार। क्या-क्या अवतार दिखाई दिए हैं जानवरों के। अरे भाई, चैतन्य ज्ञान का सागर है तो ज्ञान जानवरों को सुनाएगा क्या? हँ? और जानवर ज्ञान सुनेंगे क्या? समझेंगे? अरे, यहां तो मनुष्यों में प्रवेश करते हैं, हँ, उनके मुख से जो सुनाते हैं वो ही नहीं समझ पाते। ये जो 4 मुखों का ब्रह्मा दिखाया है ना शास्त्रों में, तो 4 मुखों का ब्रह्मा भगवान की बातों को समझता है? हँ? अगर समझता होता तो चारों मुख एक ही बात बोलेंगे ज्ञान की कि अलग-अलग बातें अलग-अलग प्रकार से ज्ञान सुनाएंगे? हँ? एक ही बात बोलेंगे। इससे तो साबित होता है ना कि वो समझते कुछ भी नहीं है।

तो परमपिता तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर तमोप्रधान दुनिया में, कलियुग के अंत में आता है तो ऐसी आत्मा को पकड़ता है जो जन्म-जन्मांतर भले नीचे तो गिरती है, सतोप्रधान से तमोप्रधान तो हर आत्मा को बनना ही है। परंतु फिर भी औरों के मुकाबले सत्य पार्ट बजाती है या झूठा पार्ट बजाती है? सच्चाई का पार्ट बजाती है। सच बाप का बच्चा नंबरवार होंगे ना इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर? हँ? कि एक जैसे होंगे? नंबरवार। तो जो अव्वल नंबर बच्चा है उसका नाम गीता में भी, शास्त्रों में लिखा हुआ है शास्त्रकारों ने। क्या? हाँ, कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली दो प्रकार की खास आत्माएं हैं। याद हैं कौन-कौन सी? हँ? एक तो क्षर और एक अक्षर। हां, क्षर माना क्षरित होने वाली। अक्षर माने जो क्षरित होती ही नहीं। पतित होती ही नहीं। शक्ति क्षीण होती ही नहीं। तो दो प्रकार की आत्माएं हुई ना।

तो जो क्षरित होने वाली आत्माएं हैं वो तो ढेर की ढेर हैं। पशु-पक्षी, प्राणी, जितने भी मात्र हैं भोगी आत्माएं, वो सब क्षरित होती हैं। भोग भोगेंगी तो शक्ति क्षीण होगी ना सुख भोगने से। हाँ। सभी भोगी आत्माएं हैं। लेकिन जो अक्षर आत्मा है वो कितनी हैं? हँ? बोलो। अरे लिखो भई। कितनी हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) एक? अच्छा? अक्षर आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली कितनी हैं? लिखते ही नहीं। कहेंगे अब हम ये प्रश्न पत्र का जवाब नहीं देंगे। (किसी ने कुछ कहा।) दो। लो एक कहता है एक और दूसरा कहता है दो। तीसरा कहेगा तीन। अरे? अरे भाई दो प्रकार की आत्माएं बताई। तो जो अक्षर हैं वो भी दो प्रकार की आत्माएं, हँ, हैं तो उनमें अक्षर भी दो हैं कम से कम। क्या? एक तो आत्माओं का बाप अक्षर। और वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता है तो आप समान किसी को तो बना के जाएगा। हँ? हां। टीचर पढ़ाई पढ़ाए और सब फेल हो जाए तो कहेंगे कि टीचर ने पढ़ाया? नहीं। टीचर पढ़ाई पढ़ाए और एक निकले फर्स्ट क्लास, टॉप मोस्ट यूनिवर्सिटी में। तो क्या कहेंगे कि टीचर ने पढ़ाई पढ़ाई कि नहीं पढ़ाई? तो टीचर जो है सुप्रीम टीचर बाप भी आते हैं तो इस सृष्टि पर आकरके बताते हैं कि बच्चे तुम आत्मा हो ज्योति बिंदु आत्मा। जैसे मैं ज्योति बिंदु हूं ऐसे तुम भी ज्योति बिंदु आत्मा को।

तो तुम निराकारी हो। हँ? आत्मा भी जब निराकारी स्टेज धारण करती है तो निर्विकारी भी हो जाती है। निरहंकारी हो जाती है क्योंकि अहंकार तो देह का होता है ना। तो देह अहंकार भी नहीं होता। जैसे मैं निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, ऐसे तुम आत्माएं भी निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बन जाती हो। हँ? तो अब नंबरवार बनेंगे कि सब एक साथ बन पड़ेंगे? हँ? नंबरवार बनेंगे ना। तो जो अव्वल नंबर, जो ओटे सो अर्जुन, अव्वल नंबर का गायन होता है ना। तो जो अव्वल नंबर मिलता है बाप को बच्चा जो बस 7 दिन का कोर्स लिया, अरे 6 दिन भी पूरे हुए और बुद्धि में फट से बैठ जाता है कि मैं देह नहीं हूं, क्या हूं? ज्योति बिंदु आत्मा। और आत्मिक स्थिति में टिकना शुरू कर देता है। तो निराकार बाप है तो निराकार बाप किससे बात करेगा? हँ? निराकारी निराकारी से बात करेगा ना। और निराकारी; अरे, हाथी हाथी से बात कर लेता है। चींटी है; चींटी देखा होगा ना। चींटी चल रही है एक-दूसरे से मोहरा मिलाती हैं, बस, एक-दूसरे से बात हो जाती है। चींटी चींटी से बात करेगी। पक्षी पक्षी से बात करेगा। तो निराकार शिव बाप किससे बात करेगा? जो निराकार पहले बनेगा बस उसी से बात करेगा।

तो वो निराकार बाप वो निराकारी आत्मा जो बनती है, भले थोड़े समय के लिए, धीरे-धीरे बढ़ेगी ना प्रैक्टिस क्योंकि अनेक जन्मों की प्रैक्टिस पड़ी हुई है देह अहंकार की। देह से जन्म लिए हैं। हँ? देह का सुख भोगा है विकारी इंद्रियों का तो एकदम थोड़े ही हो जाएगा। तो जैसे-जैसे प्रैक्टिस बढ़ती जाती है आत्मिक स्थिति की वैसे-वैसे वो निराकारी बाप शिव ज्योति बिंदु, हँ, सुप्रीम सोल हेवनली गॉडफादर उस निराकार आत्मा को ज्ञान का डोज देते जाते हैं। क्या डोज़ देते हैं? सुनाते हैं? अरे, सुनाते तो हैं ब्रह्मा के द्वारा। किसके द्वारा? हां, उसके ही द्वारा सुनाएंगे जिसको मुख होगा। और मुख होने के साथ-साथ कान होंगे। हँ? सुनेगा तो सबसे पहले वो ही सुनेगा ना। और दूसरों को सुनाएगा तो वो ही सुनाएगा ना। सबसे जास्ती सुनेगा, सबसे जास्ति सुनाएगा। तो उसका नाम शास्त्रों में रख दिया कर्ण। कर्ण माने कान। क्या? वो कर्ण जो है वो किसकी तरफ से लड़ाई लड़ता है? कौरवों की तरफ से कि पांडवों की तरफ से? हँ? कौरवों की तरफ से लड़ाई लड़ता है।

कौरव नाम क्यों दिया? कौ माने कौआ, रव माने शोरगुल। कौओं की तरह शोरगुल बहुत करते हैं। ये प्रदर्शनी करो, ये प्रोजेक्टर शो, ये भाषण करो, ये कॉन्फ्रेन्स करो। दुनियाभर की टीवी में, चैनल्स में भाषणबाजी। हँ? और भाषणबाजी तो उसी तरह की होती है जैसे दुनिया में आजकल प्रजातंत्र गोर्मेन्ट के जो बड़े-बड़े मिनिस्टर हैं, हँ, वो कितनी भाषणबाजी करते हैं। करते हैं कि नहीं? हाँ। भाषणबाजी तो बहुत करते हैं। उनके बापूजी ने भाषणबाजी की ना। क्या कहते थे? रामराज्य लाएंगे। भाषणबाजी किसलिए की? क्या? ये अंग्रेजों का जो रावण राज्य है ये खलास करेंगे और रामराज्य लाएंगे। तो उनके बापूजी की बात उन्होंने भी सीख ली। और वो भी खूब भाषणबाजी करते हैं। हँ? भाषणबाजी करते-करते 47, सन् 47 से लेकरके अब 2019 शुरू हो गया। कितने साल हो गए पूरे? 70 साल से भी जास्ती टाइम हो गया भाषणबाजी करते-करते, रामराज्य लाएंगे, रामराज्य लाएंगे। दिल्ली को स्वर्ग बनाएंगे, इंद्रप्रस्थ बनाएंगे। अरे, दिल्ली को स्वर्ग बनाया कि और ही नर्क बनाय दिया? और दिल्ली को तो सारा भारत फालो करता है। सारे भारत में प्रजा बहुत दुखी हो रही है कि सुखी हो रही है? हँ? अकाल बढ़ता जा रहा है या कम होता जा रहा है? बहुत अत्याचारी राजाएं होते हैं, शासन करने वाले, तो उनके राज्य में, हाँ, प्रकृति जो है अकाल डाल देती है, ताकि लोगों को पता चले कि ये राजाएं जो हैं कंट्रोल करने वाले बहुत अत्याचार कर रहे हैं। अत्याचारी राजाओं के राज्य में अकाल पड़ता है, दुकाल पड़ता है, अतिवृष्टि होती है।

तो बहुत भाषणबाजी करते हैं। अब उनकी शूटिंग कौन करते हैं? ब्राह्मणों की दुनिया में ये शूटिंग करने वाले जो हैं ना बेसिक वाले तथाकथित ब्रह्माकुमार-कुमारी। बड़ी भाषणबाजियां, बड़ी कॉन्फ्रेन्स करते हैं, हँ, और स्वर्ग बन रहा है कि नरक बन रहा है? स्वर्ग बन रहा है? हँ? भीख मांग रहे हैं कि एकदम जैसे भारत को बाबा ने ऐसा देवताओं का स्थान बनाया जहाँ भरपूर धन-संपत्ति रही है, कुछ भी किसी से प्रजा के, फोर्थक्लास प्रजा होगी उसको भी कोई से कुछ भी मांगने की दरकार नहीं है। और ये क्या करते रहते? बस, बस भीख मांगते रहते हैं, हँ, हाँ, ये बात दूसरी है कोई रायल भीख मांगते हैं, भई ईश्वरीय सेवा करेंगे। अरे, क्या तुम ईश्वरीय सेवा करोगे? तुम पब्लिक को बेवकूफ बनाते जाते हो। उनसे जो पैसा मिलता है वो रिश्वत में देते जाते हो। और रिश्वत देकरके जो, हँ, हाँ, जो अच्छा काम करते हैं उनको डाउन करने के काम करते हो।

जैसे दुनिया में मठ, पंथ, संप्रदाय वाले होते हैं ना, मठ, पंथ, संप्रदाय वाले दूसरे मठ, पंथ, संप्रदाय वाले जो मुखिया होते हैं, उनको जान से मरवाने की कोशिश करते हैं। करते हैं कि नहीं? हाँ, मरवाय देते हैं। तो ऐसे ही जान से मरवाय दो और उनको जेल में डलवा दो। जैसे वो कौन? आसाराम बापू। उनको क्या किया? हँ? जेल में डलवाय दिया। अरे, भाई क्यों ऐसे काम करते हो? फिर भी तो वो ज्ञान की बातें सुनाता था। हँ? कोई ऐसे तो भ्रष्टाचारी नहीं था, जैसे आज की गोर्मेन्ट के नुमाइंदे भ्रष्टाचारी हैं। हँ? जो कुछ प्यार से मिलता था रुपया, दो रुपया वो सब इकट्ठा करता था, और उससे प्रोग्राम करता था और लोगों को खुश करता था, खुशी-खुशी लोग देते थे ना। और ये लोग चोर-डकैत ऐसे-ऐसे हैं बाहर की दुनिया में भी और ब्राह्मणों की शूटिंग करने वाली ब्राह्मणों की दुनिया में भी। कितना-कितना चोरी-चकारी, छल-छिद्र, कपट, कितना करते रहते हैं। तो ये भाषणबाजी बहुत करते हैं।

A night class dated 19.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was – On the path of Bhakti the duration of the four Ages has been shown to be very long in the scriptures. And even otherwise, those writers of the scriptures themselves also say – Neti-Neti. We don’t know the beginning, middle and the end. So, they cannot remember anything about the cycle of 84 births. And you also know that the one who teaches [you] does not study from anywhere and come, does He? Hm? Here, the ocean of knowledge Father is sitting, isn’t He? It is not as if a bodily human being teaches Him. No. He is the seed-form of the human world. Who will teach him? Seed means Father. So, children know that the living seed definitely has the knowledge of the beginning, middle and end of the world because the entire tree is contained in the seed, isn’t it? The entire tree emerges from the seed only.

So, it was told – This is why it is sung that whichever sage and saint you ask, they will say that I don’t have the knowledge of the beginning, middle and end of the world. They have been saying – Neti-Neti. It has been written in the scriptures itself. So brother, if you don’t have the knowledge of this beginning, middle and the end, then brother who has it? So, they definitely say that the Supreme Father Supreme Soul is the ocean of knowledge. Arey, if the Supreme Father Supreme Soul is the ocean of knowledge, then who is the Sun? Hm? Arey, is there more light of knowledge in the ocean, does it have more heat of knowledge or does the Sun have more heat of knowledge, more light? Knowledge is called light, isn’t it? So, there is more light, heat of knowledge in the Sun. And the ocean absorbs that heat more than anyone else. It is not as if the rivers absorb more, mountains absorb, ponds absorb, lakes absorb, canals absorb. No. The ocean itself absorbs the knowledge the most. So, from whom does that ocean of knowledge obtain knowledge? Does he obtain from that non-living Sun? No. He obtains the knowledge from the living Sun of Knowledge. Just as that non-living Sun always remains detached from the ocean, from the Earth, from the mountains, from the rivers, from the human beings, from the living beings, doesn’t it? Similarly, this Sun of Knowledge, yes, the Father of all the souls, yes, he is the Sun of Knowledge who remains detached forever. So, they will definitely accept that yes, there is also a Sun of Knowledge and he is very subtle, living. It is because that Sun, the Moon, the stars of the sky are non-living. And there are soul-like stars in this world. Hm? Someone is a Moon. And there must also be a Sun playing his part in this world. Hm? He does play His part, but He always plays His part in a detached manner. He never develops attachment for anyone at all.

So, He is called the Supreme Father Supreme Soul Shiv. Why was the name Supreme Soul added? Why were two names Supreme Father added? That was also told, wasn’t it? Supreme Father [was added] because He is the Father of all the souls. Father of all the point-like incorporeal, stars of light like souls. He does not have any Father. And later the word ‘Parmatma’ (Supreme Soul) is added. It is not as if anyone will say – Supreme Soul Supreme Father? No. For example, they say Shiv Shankar Bholeynath. So, do you ever say – Shankar Shiv Bholeynath? You will never say. Why? It is because the Father’s name is first and the child’s name is later. So, similarly, Supreme Father Shiv, who is the Father of souls, when He comes to this world, then all the human souls which play their parts in this world because He will explain only to the human beings, will He not? Why? Why will He not explain to other living beings? Arey, it has been written in the scriptures – Incarnation as a tortoise, incarnation as a crocodile, incarnation as a fish, incarnation as a pig, hm, incarnation as a horse. What all incarnations as animals have been depicted? Arey, brother, when He is the living ocean of knowledge then will He narrate knowledge to the animals? Hm? And will the animals listen to knowledge? Will they understand? Arey, here He enters in human beings; hm, they are unable to understand whatever He narrates through their mouths. This four-headed Brahma has been depicted in the scriptures, hasn’t he been? So, does four-headed Brahma understand the topics of God? Hm? Had he understood, then will all the four heads speak the same topic of knowledge or will they narrate different topics, different kinds of knowledge? Hm? They will speak the same topic. It proves that they don’t understand anything.

So, the Supreme Father comes on this world stage in a degraded (tamopradhan) world, in the end of the Iron Age; so, He catches such a soul which does fall birth by birth; every soul has to definitely become tamopradhan from satopradhan (pure). But however, when compared to others, does it play a true part or a false part? It plays the part of truth. Will the children of the true Father be numberwise on this world stage? Hm? Or will they be alike? Numberwise. So, the name of the number one child has been written by the writers of the scriptures in the Gita, in the scriptures also. What? Yes, there are two kinds of special souls playing their parts on this world stage. Do you remember which ones? Hm? One are kshar and one are akshar. Yes, kshar means those who get discharged. Akshar means those who do not get discharged at all. They do not become sinful at all. Their power does not decline at all. So, there are two kinds of souls, aren’t there?

So, the souls that get discharged are numerous. Animals, birds, all the living beings, the pleasure-seeker souls get discharged. When they enjoy pleasures, then their vigour will decrease by enjoying pleasure, will it not? Yes. All are pleasure-seeking (bhogi) souls. But how many akshar (non-discharging) souls are there? Hm? Speak up. Arey, write brother. How many are there?
(Someone said something.) One? Achcha? How many akshar souls play their part on this world stage? You don’t write at all. You will say that now we will not answer this question paper. (Someone said something.) Two. Look, one says ‘one’ and the other says ‘two’. The third one will say – Three. Arey? Arey, brother, two kinds of souls were mentioned. So, those who are akshar are also two kinds of souls; hm, even among the akshar, there are at least two. What? One akshar is the Father of souls. And when He comes to this world stage, then He will make someone equal to Himself. Hm? Yes. If a teacher imparts education and if everyone fails then will it be said that the teacher taught anything? No. If a teacher teaches and if one emerges to be first class, top most in the University, then what will you say? Did the teacher teach or not? So, when the teacher, the Supreme Teacher, the Father also comes then He comes to this world and tells that children you are souls, point of light souls. Just as I am a point of light similarly you too are points of light, souls.

So, you are incorporeal. Hm? When the soul also assumes an incorporeal stage, it becomes viceless as well. It becomes egoless because it is the body, whose ego one develops, isn’t it? So, there is no body consciousness as well. Just as I am incorporeal, viceless, egoless, similarly, you souls also become incorporeal, viceless and egoless. Hm? So, well, will you become numberwise or will everyone become simultaneously? Hm? You will become numberwise, will you not? So, the number one, the one who wins is Arjun, the number one is praised, isn’t he? So, the number one child whom the Father finds, who just undergoes the seven days course, arey, as soon as the sixth day is completed and it sits immediately in the intellect that I am not a body; what am I? A point of light soul. And he starts becoming constant in soul conscious stage. So, when the Father is incorporeal, then with whom will the incorporeal Father talk? Hm? The incorporeal will talk to the incorporeal, will He not? And incorporeal; arey, an elephant is able to talk to an elephant. There is an ant; you must have seen ants, haven’t you? An ant is moving; they touch each other’s face; that is it; they communicate with each other. An ant will talk to an ant. A bird will talk to a bird. So, with whom will the incorporeal Father Shiv talk? He will talk only to the one who becomes incorporeal first.

So, that incorporeal Father; the soul which becomes incorporeal, although for a short period; the practice will progress slowly, will it not? It is because there has been a practice of body consciousness since many births. You have been born through the body. Hm? You have enjoyed the pleasures of the body, of the vicious organs; so, will it become [soul conscious] suddenly? So, as and when the practice of soul conscious stage increases, that incorporeal Father Shiv, the point of light, hm, the Supreme Soul, the Heavenly God Father goes on giving the dose of knowledge to that incorporeal soul. What dose does He give? Does He narrate? Arey, He narrates through Brahma. Through whom? Yes, He will narrate only through the one who has a mouth. And along with a mouth he will have ears. Hm? If he has to listen, it is he who will listen first of all, will he not? And if he has to narrate to others, it is he who will narrate, will he not? He will listen the most and he will narrate the most. So, his name has been coined in the scriptures as Karna. Karna means ears. What? On whose behalf does that Karna fight? On behalf of the Kauravas or on behalf of the Pandavas? Hm? He fights on behalf of the Kauravas.

Why was the name Kaurava coined? Kau means Kauva (crow), rav means noise. They create a lot of noise like the crows. Organize this exhibition, this projector show, deliver this lecture, and organize this conference. Delivering lectures on TV, in the channels all over the world. Hm? And the lectures are same as the big ministers of today’s democratic governments in the world; they deliver so many lectures. Do they or don’t they? Yes. They deliver a lot of lectures. Their Bapuji (Mahatma Gandhi) delivered lectures, didn’t he? What did he used to say? We will usher in a kingdom of Ram. Why did he deliver lectures? What? We will end this kingdom of Ravan of the Britishers and usher in the kingdom of Ram. So, they too learnt the words of their Bapuji. And they too deliver a lot of lectures. Hm? While delivering lectures from 47, from 1947, now 2019 has started. How many years have passed? It has been more than 70 years time while delivering lectures; we will bring the kingdom of Ram, we will bring the kingdom of Ram. We will make Delhi a heaven, Indraprasth. Arey, did they make Delhi heaven or did they make it a hell? And the entire India follows Delhi. Are the subjects (praja) becoming very sorrowful all over India or are they becoming happy? Hm? Is drought increasing or is it decreasing? There are very tormentor kings, governors; so, yes, nature brings drought in their kingdom so that people realize that these kings who control [them] are torturing people a lot. Droughts, famines, excessive rainfall occurs in the kingdom of tormentor kings.

So, they deliver a lot of lectures. Well, who performs their shooting? Those who perform this shooting in the world of Brahmins are these so-called basic Brahmakumar-kumaris, don’t they? They deliver big lectures, organize big conferences, hm, and is heaven being established or is hell being established? Is heaven being established? Hm? Are they begging or is it completely like the Bhaarat which was made a place of deities by Baba where there was complete wealth and property; even the subjects, even the fourth class subjects will not require to seek anything from anyone. And what do these people keep doing? That is it; they just keep on begging, hm, yes, it is another aspect that some beg royally, brother, we will do Godly service. Arey, what Godly service will you do? You keep on fooling the public. You go on giving the money received from them as bribes. And after paying bribes, hm, yes, you perform the task of pulling down those who are doing a good work.

For example, there are math, panth, sampradaay (sects, communities), aren’t there? People belonging to math, panth, sampradaay try to get the heads of other math, panth, sampradaays killed. Do they try or not? Yes, they get them killed. So, similarly you get them killed and put them in jail. For example, who is that person? Aasaram Bapu. What was done to him? Hm? He was put in the jail. Arey brother, why do you perform such tasks? He only used to narrate topics of knowledge. Hm? He was not corrupt like the representatives of today’s government are corrupt. Hm? Whatever rupee or two rupees he used to get affectionately, he used to collect them and used to organize programmes with that and used to make people feel happy; people used to give him happily, didn’t they? And these people are such thieves and dacoits in the outside world as well as in the world of Brahmins performing the shooting of Brahmins. They keep on indulging in so much theft, cheating and deceit. So, these people deliver a lot of lectures.

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