Bap-Dada's LATEST & FINAL part

DEDICATED to Om Mandli ‘Godly Mission’ to present posts regarding the LATEST & FINAL part of BapDada of World Purification & World TRANSFORMATION – through Divine Mother Devaki - SAME soul of 'Mateshwari', Saraswati Mama.
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destroy old world
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Bap-Dada's LATEST & FINAL part

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ॐ... "पिताश्री" शिवबाबा याद है?

शिवबाबा की वाणी
14.07.2022 - रायपुर

"मीठे बच्चे .. सही मेहनत तो अभी है - अभी से पहले तो खेले, खाए, कूदे हो। सच्चा-सच्चा पुरुषार्थ अगली क्लास में जाने का, तो इस समय है - पूरे ब्राह्मण परिवार का - इस समय, यह अंतिम समय का पुरुषार्थ है!"

Link: https://www.youtube.com/watch?v=AT6swY8aLvI

अच्छा .. हर एक बच्चा बाप के प्यार में मगन है ना? *प्यार ऐसा - कि बस देखते रहे, और मुख से कुछ आवाज ना आवे।* हर एक बच्चा बाप के दिल के अती समीप है ना? सभी बाप से पूछते हैं – ‘बाबा, क्या आप हमसे प्यार करते हैं?’ हर एक बच्चा बाप से पूछता है – ‘क्या आपको हमसे प्यार है?’ तो बाप क्या कहेगा? जितना आप करते हैं ना, उससे 100 गुणा बाप को आपसे प्यार है - 100 गुणा! आपका एक गुणा कितना पावरफुल होगा! और बाप का 100 गुणा कितना पावरफुल होगा! तो अभी बच्चे, चेक करें - एक गुणा प्यार है, या आधा गुणा प्यार है, या 100 गुणा प्यार है? 100 का डबल करेंगे, तो कितना हुआ? कितना हुआ? आप जितने गुणा बढ़ाते जाएंगे, तो बाप की भी गुणा बढ़ती जाएगी। और आपका एक गुणा कम हुआ, तो ऑटोमेटिक बाप का भी 100 गुणा कम हो जाएगा। तो सभी बच्चे चेक करें – ‘मेरे दिल में दिलाराम है? मेरा निश्चय पक्का है?’ या कोई परिस्थिति आ गई, छोटी समस्या आ गई - किसी समस्या के साथ मेरा निश्चय तो नहीं डगमगाता? या मुझे किसी सवाल का जवाब नहीं मिला, बाबा ने इसका जवाब नहीं दिया - क्या तब तो निश्चय नहीं डगमगाता? क्या बाबा ने मुझे अपने पास बुलाके टोली नहीं खिलाई, मैंने इतना पावरफुल संकल्प किया कि आप मुझे टोली जरूर खिलाएंगे, बाप ने टोली नहीं खिलाई - क्या उसमें तो संशय नहीं आ जाए? क्या बाप ने मेरी तारीफ नहीं किया, मेरी महिमा नहीं की, कि मैंने इतनी सेवा की, और बाप ने मेरी महिमा ही नहीं की - क्या इसमें तो निश्चय नहीं डगमगाता ना? या मुझे बाबा कहे कि - हाँ, आप बहुत तीव्र पुरुषार्थी हो, आप 8, 108 के माला का मणका बनोगे, बाप कहाँ इससे मना कर देवे - कहीं इसमें तो निश्चय नहीं डगमगाता ना?

*आप प्यार करते हैं - वो बाप की दिल में, रजिस्टर में लिखा जाता है।* आपका पुरुषार्थ बाप के रजिस्टर में लिखता है, बाप के दिल में बैठते हो, आपकी महिमा बाप करता है। बस यह सोचना कभी नहीं कि – ‘मेरी महिमा सबके बीच में क्यों नहीं हुई? मेरा सम्मान क्यों नहीं हुआ? मेरा मान क्यों नहीं हुआ? मुझे मान-सम्मान क्यों नहीं मिला?’ *108 की माला के मणके, इन सब चीजों से परे रहते हैं।* मुझे मान मिले या ना मिले, मुझे कोई देखे या ना देखे, पर मेरे बाबा ने मुझे देखा है। मुझे कोई प्यार करे या ना करे, मेरा बाबा मुझे प्यार करता है। दुनिया के लिए अच्छा बनना है - या बाप को देखना है? दुनिया के मनुष्यों के साथ चलना है - या बाप के साथ चलना है? बाहर भल देह-अभिमान आवे, पर यहाँ जब आते हैं ना, देही-अभिमानी बन जावे। क्योंकि अंतिम समय है - इस देह का त्याग करके जाना है, इसको साथ लेके नहीं जाना। पर कहाँ ना कहाँ, अभी भी देह-अभिमान के शिकारी हैं। ‘चेकिंग’ - मुझे किसके साथ चलना है? क्योंकि जिसके साथ चलना है ना, उसके जैसा बनना पड़ेगा। कैसा बनना है? बाप के जैसा बनना है! बाप कैसा है? ‘विदेही’ - है ना? तो बनना कैसा है? ‘विदेही’ बनना है। देह-अभिमान कभी फायदा नहीं करता, सदा नुकसान करता है - खुद का भी, और दूसरों का भी। बच्चों, अभी तो, *सही मेहनत तो अभी है - अभी से पहले तो खेले, खाए, कूदे हो। सच्चा-सच्चा पुरुषार्थ अगली क्लास में जाने का, तो इस समय है - पूरे ब्राह्मण परिवार का - इस समय, यह अंतिम समय का पुरुषार्थ है!*

इसीलिए हर एक बच्चा देखे कि मुझे बाप से कितना प्यार है? क्योंकि *संस्कार परिवर्तन सहज तब होगा जब दिल में एक दिलाराम होगा, जब दृढ़ता पक्की होगी, निश्चय होगा।* जैसे अभी बाप आए हैं, बच्चों के संकल्प चलते हैं – ‘अगर भगवान है, तो इतने कम क्यों? बहुत ज्यादा होने चाहिए!’ और अगर भीड़ लगा देंगे, तो फिर पीछे बैठके कहेंगे – ‘लो, भगवान तो सिर्फ आगे वालों से ही मिलता है, हम पीछे वालों का क्या होगा?’ दोनों तरफ से। अब एकांत में हैं, कम हैं, तो भी विचार है – ‘इतने कम क्यों?’ जब भीड़ हो जाएगी तो क्या कहेंगे – ‘इतने ज्यादा क्यों?’ जो इस कम भीड़ में है ना, यह सोचके बैठो – ‘वाह, वाह मेरा भाग्य, वाह मैं, वाह मेरा बाबा - कि आज मेरा बाबा मुझे इतना पास से देख रहा है, और मैं अपने बाबा को इतना पास से देख रही हूँ।’ यह नशा, यह खुशी होनी चाहिए। फिर आने वाले समय में क्या होगा - फिर एक बड़ी सी टीवी लगेगा जगह-जगह – अच्छा, अब फिर टीवी से देखो, क्योंकि बाप तो सबको देख लेगा ना, चाहे कितना भी भीड़ हो - पर बच्चे बाप को नहीं देख पाएंगे। तो यह समय अच्छा है - या आने वाला समय अच्छा है? [यह समय] यह समय, जो फिर नशे से कहना – ‘वाह, मेरा बचपन बड़ा प्यारा गुजरा है, मेरे बचपन में मेरे पिता ने मुझे गोद में खिलाया है।’ *और अभी जो थोड़ा संशय बुद्धि होके बैठे हैं ना, वो फिर बाद में क्या कहेंगे – ‘काश पहले ही मेरी बुद्धि का ताला खुल गया होता, मैं बाप के उस प्यार का अनुभव कर पाता!’*

यह निश्चय होना चाहिए, पक्का निश्चय – ‘मैं और मेरा बाबा, मेरे सामने मेरा बाबा बैठा है।’ कोई बच्चा यह नहीं सोचे – ‘बाबा, क्या अब मेरे जो संकल्प है, मेरा जो प्यार है, क्या आपके पास पहुँचता है? मैं इतना याद आपको करता हूँ, क्या वो याद आपको पहुँचती है?’ बाबा क्या कहेगा - आपकी याद से ही बाप आते हैं, नहीं तो बाप का क्या है इस पतित दुनिया में? आप बच्चों के पीछे ही बाप दौड़ते हैं, यहाँ-वहाँ, नहीं बाप को क्या आवश्यकता है? बाप तो अपना परमधाम में आराम से बैठेगा ना? बाप क्यों दौड़ते हैं? बाप को थोड़ेही राज्य करना है! आपको करना है! और बाप आपके पीछे-पीछे - आप कहाँ जाओ, बाप फिर वहीं पर आवे। अब बाप कहाँ जावे, फिर बच्चे वहीं पर आवे। तो बाप किसके लिए आते हैं? किसके लिए आते हैं? आप बच्चों के लिए आते हैं। *कभी अकेला नहीं छोड़ते - भक्ति मार्ग में कहो, या ज्ञान मार्ग में कहो।* तो कितना प्यार होना चाहिए - बाप से कितना प्यार होना चाहिए। यह एक जन्म ही बाप ने कहा – बच्चे, पवित्र बनो, बाप को याद करो। एक जन्म, और उसका फल अनेक जन्म मिलेगा। इसलिए बाप को कब संकल्प नहीं आता कि बच्चों से बाप कुछ लेवे, क्योंकि बाप तो दाता है ना? ठीक है?

*हर एक बच्चे को, बाप दादा का, दिलाराम बाप की बड़ी दिलवाले बच्चों को, बड़ा मीठा याद-प्यार। ऐसे बाप के प्यार के झूले में झूलने वाले बच्चों को बाप का याद-प्यार।*

*बाप को ज्ञान से नहीं, प्यार से पहचानो! बाप पहले इतना घंटा बोलते थे, इससे नहीं - बाप के प्यार की खुशबू से पहचानो!* पहले इतने घंटे थे, तो बाप ने सबको इतनी पालना दी, पर अब समय कम है, तो बाप को सभी बच्चों को पालना देनी है। सबको इतनी पालन दी, उसका रिटर्न बाप को क्या मिला? क्या परिवर्तन हुआ? हाँ, अनन्य बच्चे हैं, जिसने उस पालना का बड़ा दिल से स्वीकार करके पुरुषार्थ में आगे बढ़े। *और वही अनन्य बच्चे बाप के पास, यहाँ आ रहे हैं, पहुँच गए हैं, और पहुँच जाएंगे - जिन्होंने सच में बाप से प्यार किया है, और परिवर्तन, और सच्चे दिल से सेवा की है। वंडरफुल बात है ना, उन्हीं के ऊपर क्या कहते हैं, कि माया खा गई। माया ने नहीं खाया! माया से, माया की गोद से, बाप ने अपनी गोद में बिठाया है। ऐसे पुरुषार्थी बच्चों को माया खा जावे, ऐसा हो नहीं सकता! वो बच्चे तो सीधा बाप की गोद में बैठते हैं।*

जब माया की गोद से बच्चे उठते हैं, तो माया को तो दर्द होता है ना, तकलीफ होती है, चिल्लाएगी, शोर मचाएगी, ग्लानी करेगी। लेकिन जब बाप की गोदी से बच्चे जाते हैं, तो बाप शांत रहते हैं। बाप सोचते हैं - है तो बाप का ही, कोई बात नहीं, थोड़ा घूमके आ जाएगा। बाप कभी शोर नहीं मचाते। पर जब बाप बच्चों को माया की गोदी से उठाते हैं ना, तो माया बड़ा शोर मचाती है, चिल्लाती है – ‘कहाँ जा रहे हो मुझे छोड़के, ऐसे नहीं जाना।’ बड़ा प्यार भी करेगी, बात नहीं मानेंगे तो गुस्सा भी करेगी - फिर बात नहीं मानेंगे तो ग्लानी भी करेगी। लेकिन बाप यह नहीं करेगा ना - क्योंकि बाप तो अपने बच्चों से बड़ा प्यार करते हैं। बाप को प्यार है - माया को प्यार है? है? है! माया को भी बहुत प्यार है। हाँ, लेकिन *सच्चा प्यार किसका है? बाप का है। सदा साथ निभाने वाला प्यार किसका है? बाप का है ना?* माया तो क्या करती है? बीच रास्ते में जाके छोड़ देती है, ध्यान भी नहीं रखेगी - मेरे बच्चे ने कुछ खाया या नहीं, ठीक है या नहीं - माया ऐसी है! और बाप कैसा है?

ठीक है? *सदा खुश रहो, बाप साथ है, साथ रहेगा, और संगमयुग पर साथ निभाएगा, और परमधाम में भी साथ लेके जाएगा। ‘साथी सदा साथ है।’* और अगर कोई कमी कमजोरी भी आती है, या है, तो उसको निकालने में भी मदद करेगा, अकेला नहीं छोड़ेगा कि आप बदल जाओ – नहीं! अगर कमी-कमजोरी है भी, तो उसमें भी साथ देकर कमी-कमजोरी से मुक्त करेगा। *सच्चा बाप तो यही है ना, जो कैसी भी परिस्थिति में साथ नहीं छोड़े - कैसी भी परिस्थिति हो, सदा साथ निभावे। बस हमें बदलने का संकल्प मजबूत करना है। हमें परिवर्तन करने का संकल्प मजबूत करना है। प्यार में सब कुछ हो सकता है।* आज लौकिक में, प्यार में सब कुछ बदल सकता है। अच्छे से अच्छा, बुरा भी बन सकता है; और बुरे से बुरा, अच्छा भी बन सकता है! लौकिक दुनिया की आकर्षण में - प्यार में नहीं - सिर्फ आकर्षण में। *तो प्यार में कितनी ताकत होगी? कि आप बच्चे बाप के प्यार में चलकर, श्रीमत पर चलकर, पूरे विश्व को स्वर्ग बना देते हो।*

बाप को याद-प्यार मिल गया, आपको भी बड़ा याद-प्यार, और आपका बाप के दिल में वेलकम है! पहले भी दिल में ही थे, पर आज और पास आ गए। ठीक है? ठीक है - सभी बच्चे? कहाँ बैठे हो? दिल में हो ना? कहाँ बैठे हो? [दिल में] सच में दिल में हैं, या कोई जमीन पे बैठा है? दिल में कौन-कौन हैं? सभी हैं ना, जमीन पे तो कोई नहीं बैठा ना? *आप बाप के दिल में बैठे हो, और दिल में बैठकर, दिल का दरवाजा बंद कर लेवे, ताकि बाहर निकलने का रास्ता ही ना हो!* और वैसे भी दिल में आने का रास्ता होता है, जाने का नहीं, क्योंकि जाने का रास्ता बनाया ही नहीं है। दिल में आ गए - और एकदम बंद! बस आराम से बाप के दिल में बैठकर मौज मनाओ। जब कोई किसी बड़ी समस्या में होता है, और वो दौड़कर छोटे से घर में जाएगा, चारों तरफ से दरवाजा बंद कर लेगा - और क्या सोचता है? ‘अब मैं सेफ हूँ।’ क्या सोचता है? सेफ्टी का अनुभव करता है ना। वो एक लौकिक दुनिया की कहानी है, वहाँ एक सेकंड का सुकून मिला – ‘अब मैं सेफ हूँ, सब दरवाजे बंद हो गए।’ लेकिन वो लौकिक दुनिया का थोड़े समय का है, वहाँ परमानेंट कुछ भी नहीं है।

*पर जो बाप की दिल है ना, सोचो एक झोपड़ी जैसे बना है, बहुत प्यारी - और आप वहाँ गए, और सारे दरवाजे बंद। आप परमानेंट के लिए सेफ हो गए। सेफ!* अब माया आएगी भी ना, तो भल दरवाजा खटखटावे। वैसे तो बाप के दिल में माया कभी आ नहीं सकती, क्योंकि माया के लिए कभी दरवाजा ही नहीं खुलता, सिर्फ बच्चों के लिए बाप की दिल का दरवाजा खुलता है। और जो बाप की दिल में हैं, वहाँ माया पहुँच ही नहीं पाएगी - और जो दिल के बाहर आ गए, माया भी वार करेगी। वैसे तो बाप की दिल का बाहर जाने का दरवाजा नहीं है, पर बच्चे ही कहाँ ना कहाँ से ढूँढ लेते हैं। क्योंकि माया को भी देखते हैं – ‘वाह, बड़ी सुंदर दिख रही है। यहाँ मैं बैठा हूँ, है ना, यहाँ कोई चकाचौंध नहीं है, पर माया तो सजी-सजाई है।’ पर वो सजी-सजाई क्या करती है? कितने मंजिल से गिराती है? 100 मंजिल पर लेके जाएगी और फिर वहाँ से छोड़ेगी तो हड़गुड़ ही टूट जाते हैं। तो इसलिए माया की चमक को नहीं देखना। माया की चमक ऐसी है ना, जो जीवन बहुत कम कर देती है। जो बाप के प्यार में सदाकाल का सुख है ना, वो सुख माया के पास कभी नहीं होगा।

अच्छा बच्चों फिर मिलेंगे ...

ब्रह्मा बाप से प्यार है? बहुत प्यार है ना, यह ब्रह्मा बाबा की लीला वंडरफुल लीला है!

(फिर बाबा ने सभी बच्चों को दृष्टि देकर, विदाई ली)!
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Zorba the Greek
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Bap-Dada's LATEST & FINAL part

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Versions of Shiv Baba
14.07.2022 - Raipur

"Sweet children .. real effort is to be made now – before this you played, ate, and pranced. It is now that you have to make real efforts in order to go to the next Class – for the entire Brahmin Family – at this time, your efforts are of the final period!"

Link: Baapdada Milan - 14.07.2022

OK .. Every child is merged in the Love of the Father, is it not? *Your Love is such – that you just keep watching, and no sound emerges from your mouth.* Every child is extremely close to the Father’s Heart, is it not? Everyone asks the Father – ‘Baba, do You Love us?’ Every child asks the Father – ‘Baba, do you Love me?’ So, what would the Father say? The Father has 100 times more Love for you – 100 times more – than the Love you have for Baba! How powerful would your Love be - for Baba! And how Powerful would the Father’s 100 times more Love be - for you! So, now you children should check – do you have as much Love, or half as much Love, or 100 times more Love? How much would double of 100 be? How much would that be? As much as you increase your Love, the Father’s Love would also increase accordingly. And if a little of your Love decreases, then the Father’s Love would also decrease hundred-fold of that decrease in your Love. So, all the children should check – ‘is the Comforter of Hearts within my heart? Do I have firm faith?’ Or, if any adverse situation arises, or if a little obstacle comes – does my faith fluctuate when such obstacle comes? Or, if I do not get a response to any question, if Baba has not given a response to my question – then does my faith fluctuate? If Baba does not call me up to Him and feed me toli, even when I emerged a powerful thought that Baba would definitely feed me toli, but the Father did not feed me toli – does any doubt arise in my mind due to this? If the Father did not praise me, if he did not glorify me, I performed so much service and yet the Father did not glorify me – then does my faith fluctuate in this? Or, if Baba tells me – yes, you are a very fast effort-maker, you will become a Bead of 8, or 108, and if the Father then declines that – would my faith fluctuate in this?

*When you Love Baba – that gets written within Baba’s Heart, in His Register.* Your efforts are written in the Father’s Register, you sit within the Father’s Heart, you are glorified by the Father. Just never think – ‘why was I not glorified in the midst of everyone? Why was I not given regard? Why was I not respected? Why did I not get that regard and respect?’ *The Beads of the Rosary of 108 remain beyond all these aspects.* Whether I receive respect or not, whether someone sees me or not, but my Baba has seen me. Whether someone loves me or not, my Baba Loves me. Do you have to become good for the world – or do you have to see the Father? Do you have to go along with the human beings of the world – or do you have to go along with the Father? There may be body-consciousness when you are outside, but when you come here, you should become soul-conscious. Because this is the final period of time – you have to leave this body and go, you cannot go along with this body. But somewhere or the other, you are still victims of body-consciousness. Check – with whom have I to go along? Because you have to become like the One with whom you have to go along. How have you to become? You have to become like the Father! How is the Father? ‘Bodiless’ – is He not? So, what should you become? You should become ‘bodiless’. Body-consciousness never benefits you, it always causes a loss – for your own self, as well as for others. Children, *real effort is to be made now – before this you played, ate, and pranced. It is now that you have to make real efforts in order to go to the next Class – for the entire Brahmin Family – at this time, your efforts are of the final period!*

This is why every child should check as to how much Love there is for the Father! Because *it will be easy to transform your sanskars only when the ‘Comforter of Hearts’ is within your heart, when you determination is firm, and when you have faith.* Just as, the Father has now come, and the children have such thoughts – ‘if this is God, then why are there so few? There should have been many more!’ And if there is a big crowd, then those who sit at the back will say – ‘look, God only meets those who are in front, what will happen to us who are sitting behind?’ They will speak in both ways. Now you are a few sitting in solitude, and still they think – ‘why are there so few?’ When there is a crowd then what would they say – ‘why are there so many?’ Those who are in this small crowd should sit here and think – ‘wow, wow my fortune, wow me, wow my Baba – today, my Baba is looking at me from so close, and I am seeing my Baba so close to me.’ You should have this intoxication and Happiness. Then, what would happen in times to come – then there will be a huge TV screen at various places – OK, now you may see on TV - because the Father will see everyone, regardless of how much crowd there is – but the children will not be able to see the Father. So, is this time good – or the time to come would be good? [This time] This time, when you can say with intoxication – ‘wow, I have had a very lovely childhood, in my childhood my Father has fed me in His Lap.’ *And what would those who are sitting with even a little doubt in their intellects say later on – ‘I wish the lock on my intellect had opened earlier, I would have been able to experience that Love of the Father!’*

You should have this firm faith – ‘I and my Baba, my Baba is sitting in front of me.’ No child should think – ‘Baba, does my Love, and does my thought which I have now, reach You? I Remember You so much, does this Remembrance reach You?’ What would Baba say – Baba comes only because of your Remembrance, otherwise what has Baba to do in this impure world? The Father runs only behind you children, here and there, otherwise what need is there for the Father? The Father would sit comfortably in His Supreme Abode, would He not? Why does the Father run after you? The Father does not have to rule! You have to rule! And the Father is behind you – wherever you go, the Father would then come there itself. Now, wherever the Father goes, the children should then come there itself. So, for whom does the Father come? For whom does He come? He comes for you children. *He does not leave you alone at anytime – whether on the path of Devotion, or on the path of Knowledge.* So, how much Love should you have – how much Love you should have for such a Father! Only in this one birth has Baba said – children, Remember the Father, become Pure. The fruit of this one Birth will be received for many births. This is why the Father does not have the thought of taking anything from the children at any time, because the Father is the Bestower, is He not? OK?

*To each and every child, to the children of the Father who is the ‘Comforter of Hearts’, to those who have large hearts, BapDada’s extremely Sweet Love and Remembrance. The Father’s Love and Remembrance to such children who swing in the Father’s ‘Swing of Love’!*

*Do not try to ReCognize the Father through Knowledge, but through Love! The Father used to speak for so many hours before - not by this – you should ReCognize the Father through the fragrance of His Love!* Before there was so much time, so the Father gave so much sustenance to the children; but now there is little time, and the Father has to give sustenance to all the children. What return did the Father receive after giving so much sustenance? What transformation took place? Yes, there are some unique children, who progressed in their efforts after having accepted that sustenance with their large hearts. *And those very same unique children are now coming here to the Father, they have reached here, and others will reach here – those who have truly Loved the Father, who have transformed, and who have performed Service with a true heart. It is a wonderful aspect, what they say about them, that Maya ate them up. Maya did not eat them up! The Father made them sit in His Lap from being with Maya, from Maya’s lap. It can never be that Maya could eat up such children who are such effort-makers! In fact, those children sit directly in the Father’s Lap.*

When the children leave Maya’s lap, then Maya is in pain and is troubled – Maya will shout, scream, and defame you. But when the children leave the Father’s Lap, the Father remains peaceful. The Father thinks – they are the Father’s anyway, it does not matter, they will roam around a little and then come back. The Father never screams. But when Baba takes the children away from Maya’s lap, then Maya screams and shouts loudly – ‘where are you going by leaving me, do not go away in this way.’ Maya will also love you a lot, and if you do not listen then she would even become angry – and if you still do not listen then she will also defame you. But the Father would not do this – because the Father has great Love for His children. The Father has Love – does Maya have love? Does she? She does! Even Maya has a lot of love for you. Yes, but *who has true Love? Baba. Whose Love is everlasting? The Father’s Love, is it not?* What does Maya do? She will go in the middle of the road and leave you there, and she will not even pay attention to you – whether my child has eaten anything or not, whether he/she is fine or not – such is Maya! And how is the Father?

OK? *Always be Happy – the Father is with you, He will remain with you, and He will accompany you during this Confluence Age, and He will also take you along with Him to the Supreme Abode. ‘The Companion is always with you.’* And if any deficiency or weakness comes, or if you have any of them, then He will even help you to become free from them, He will not leave you alone for you to transform by yourself – no! If there is any deficiency or weakness, then even in that He will accompany you, and free you from such deficiency or weakness. *This is the true Father who will not leave you under any adverse circumstances – He will always accompany you whatever may be the adverse circumstances. You just have to make your thought of transformation strong. You have to make your thought of transformation strong. Everything is possible through Love.* Today, in the ‘lokik’ world, everything can change through love - the one who is very good can also become bad; and the one who is very bad can also become good, through the attractions of the corporeal world – not through love – only through its attractions. *So, how much power exists in true Love – that you children transform the whole world into Heaven by experiencing the Father’s Love, and by following His Shrimat.*

The Father has received your Love and Remembrance - great Love and Remembrance to you also, and you are welcome within the Father’s Heart! You were within His Heart before also, but today you have come more close. OK? Are all the children fine? Where are you sitting? You are within My Heart, are you not? Where are you sitting? [within Your Heart] Are you truly within the Heart, or is anyone sitting on the ground? Who all are within the Heart? All of you are there - no one is sitting on the ground, is it not? *You are sitting within the Father’s Heart, and after sitting in His Heart, close the Door of the Heart, so that there is no way for you to get out!* And, in any case, there is always a way to come within the Heart, not to go out, because no way has been made to go out. You come within the Heart – and everything gets closed! You only have to enjoy by sitting comfortably within the Father’s Heart. When anyone is facing great obstacles, he would run and go to a little house, and close the doors all around – and what would he think? ‘Now, I am safe.’ What does he think? He experiences safety, is it not? That is the story of the ‘lokik’ world, there he would be at rest for one second – ‘now, I am safe, all the doors are closed.’ But that rest of the ‘lokik’ world lasts for a short period of time, nothing is permanent there.

*But think that the Father’s Heart is like a small cottage which is very Loveful – and you go there, and close all the doors. You become safe permanently. Safe!* Then, even if Maya comes she may continue to knock on the door. Actually, Maya can never come within the Father’s Heart, because no door opens for Maya - the Door of the Father’s Heart opens only for His children. And Maya will not be able to reach up to those who are within the Father’s Heart – and Maya will attack those who leave His Heart. Actually, there is no door to go out of the Father’s Heart, but the children, themselves, find a door somewhere or the other. Because they also see Maya – ‘wow, she is looking very beautiful; I am sitting here, that is right, but there is no glamour here, and Maya is fully decorated.’ But what does that decorated one do? From how many floors does she make you fall? She will take you to the hundredth floor and then leave you from there, and then your bones get crushed. This is why you should not look at Maya’s glamour. Maya’s glamour is such, that it shortens your life. The eternal Happiness which you experience from the Father’s Love – such Happiness can never be with Maya.

OK children, we will Meet again ...

Do you have Love for Father Brahma? You have a lot of Love, do you not? This Play of Father Brahma is a wonderful Play (‘Lila’)!

(Then Baba took leave, after giving ‘dhristi’ to all the children)!
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